श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1081–1090

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090

पृष्ठ 1081

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अश्मभिश्चाभ्यवर्षन्त प्रदीप्तैश्च तथोल्मुकैः ॥ ५४ ॥

घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः क्षुरधारैरयोमयैः । कुछ लोग पत्थर बरसाने लगे, कुछ जलते लुआठे चलाने लगे, दूसरे भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे काम लेने लगे और कितने ही लोहनिर्मित छुरोंकी तीखी धारोंसे चोट करने लगे ॥ ५४३ ॥

ततस्तु दानवानीकं सम्प्रणेतारमच्युतम् ॥ ५५ ॥

रुद्रं दृष्ट्वा बलोद्भूतं प्रमुमोह चचाल च । तत्पश्चात् दानवदलने देखा कि देवसेनापतिका कार्य सँभालनेवाले उत्कट बलशाली रुद्रदेव युद्धसे पीछे नहीं हट रहे हैं, तब वे मोहित और विचलित हो उठे ॥ ५५३ ॥

चित्रं शीघ्रपदत्वाच्च चरन्तमसिपाणिनम् ॥ ५६ ॥

तमेकमसुराः सर्वे सहस्रमिति मेनिरे । शीघ्रतापूर्वक पैर उठानेके कारण विचित्र गतिसे विचरण करनेवाले एकमात्र खड्गधारी रुद्रदेवको वे सब असुर सहस्रोंके समान समझने लगे ॥ ५६३ ॥

छिन्दन् भिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पोथयन्नपि ॥ ५७ ॥

अचरद् वैरिसङ्गेषु दावाग्निरिव कक्षगः । जैसे सूखी लकड़ी और घास - फूँसमें लगा हुआ दावानल वनके समस्त वृक्षोंको जला देता है, उसी प्रकार भगवान् रुद्र शत्रुसमुदायमें दैत्योंको मारते -काटते, चीरते -फाड़ते, घायल करते, छेदते तथा विदीर्ण और धराशायी करते हुए विचरने लगे ॥ ५७३ ॥

असिवेगप्रभग्नास्ते छिन्नबाहूरुवक्षसः ॥ ५८ ॥

सम्प्रकीर्णान्त्रगात्राश्च पेतुरुर्व्यां महाबलाः । तलवारके वेगसे उन सबमें भगदड़ मच गयी । कितनोंकी भुजाएँ और जाँघें कट गयीं । बहुतोंके वक्षःस्थल विदीर्ण हो गये और कितनोंके शरीरोंसे आँतें बाहर निकल आयीं । इस प्रकार वे महाबली दैत्य मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५८३ ॥

अपरे दानवा भग्नाः खड्गपातावपीडिताः ॥ ५ ९ ॥ अन्योन्यमभिनर्दन्तो दिशः सम्प्रतिपेदिरे । दूसरे दानव तलवारकी चोटसे पीड़ित हो भाग खड़े हुए और एक- दूसरेको डाँट बताते हुए उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली ॥ ५ ९ ३ ॥ भूमिं केचित् प्रविविशुः पर्वतानपरे तथा ॥ ६० ॥

अपरे जग्मुराकाशमपरेऽम्भः समाविशन् । कितने ही धरतीमें घुस गये, बहुत - से पर्वतोंमें छिप गये, कुछ आकाशमें उड़ चले और दूसरे बहुत - से दानव पानीमें समा गये ॥ ६० ॥

तस्मिन् महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 1082

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बभूव भूः प्रतिभया मांसशोणितकर्दमा । वह अत्यन्त दारुण महान् युद्ध आरम्भ होनेपर पृथ्वीपर रक्त और मांसकी कीच जम गयी । जिससे वह अत्यन्त भयंकर प्रतीत होने लगी ॥ ६१३ ॥

दानवानां शरीरैश्च पतितैः शोणितोक्षितैः ॥ ६२ ॥

समाकीर्णा महाबाहो शैलैरिव सकिंशुकैः । महाबाहो! खूनसे लथपथ होकर गिरी हुई दानवोंकी लाशोंसे ढकी हुई यह भूमि पलाशके फूलोंसे युक्त पर्वत - शिखरोंद्वारा आच्छादित - सी जान पड़ती थी ॥ ६२ ॥

स रुद्रो दानवान् हत्वा कृत्वा धर्मोत्तरं जगत् ॥ ६३ ॥

रौद्रं रूपमथोत्क्षिप्य चक्रे रूपं शिवं शिवः । दानवोंका वध करके जगत्में धर्मकी प्रधानता स्थापित करनेके पश्चात् भगवान् रुद्रदेवने उस रौद्ररूपको त्याग दिया । फिर वे कल्याणकारी शिव अपने मङ्गलमय रूपसे सुशोभित होने लगे ॥ ६३ ॥

ततो महर्षयः सर्वे सर्वे देवगणास्तथा ॥ ६४ ॥

जयेनाद्भुतकल्पेन देवदेवं तथार्चयन् । तत्पश्चात् सम्पूर्ण महर्षियों और देवताओंने उस अद्भुत विजयसे संतुष्ट हो देवाधिदेव महादेवकी पूजा की ॥ ततः स भगवान् रुद्रो दानवक्षतजोक्षितम् ॥ ६५ ॥

असिं धर्मस्य गोप्तारं ददौ सत्कृत्य विष्णवे । तदनन्तर भगवान् रुद्रने दानवोंके खूनसे रँगे हुए उस धर्मरक्षक खड्गको बड़े सत्कारके साथ भगवान् विष्णुके हाथमें दे दिया ॥ ६५३ ॥

विष्णुर्मरीचये प्रादान्मरीचिर्भगवानपि ॥ ६६ ॥

महर्षिभ्यो ददौ खड्गमृषयो वासवाय च । भगवान् विष्णुने मरीचिको, मरीचिने महर्षियोंको और महर्षियोंने इन्द्रको वह खड्ग प्रदान किया ॥ ६६३ ॥

महेन्द्रो लोकपालेभ्यो लोकपालास्तु पुत्रक ॥ ६७ ॥

मनवे सूर्यपुत्राय ददुः खड्गं सुविस्तरम् । बेटा! फिर महेन्द्रने लोकपालोंको और लोकपालोंने सूर्य पुत्र मनुको वह विशाल खड्ग दे दिया ॥ ६७ ॥

ऊचुश्चैनं तथा वाक्यं मानुषाणां त्वमीश्वरः ॥ ६८ ॥

असिना धर्मगर्भेण पालयस्व प्रजा इति । तलवार देकर उन्होंने मनुसे कहा- ' तुम मनुष्योंके शासक हो; अतः इस धर्मगर्भित खड्गसे प्रजाका पालन करो ॥ ६८३ ॥

पृष्ठ 1083

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धर्मसेतुमतिक्रान्ताः स्थूलसूक्ष्मात्मकारणात् ॥ ६ ९ ॥

विभज्य दण्डं रक्ष्यास्तु धर्मतो न यदृच्छया ।

दुर्वाचा निग्रहो दण्डो हिरण्यबहुलस्तथा ॥ ७० ॥

व्यङ्गता च शरीरस्य वधो वानल्पकारणात् ।

असेरेतानि रूपाणि दुर्वारादीनि निर्दिशेत् ॥ ७१ ॥

‘ जो लोग स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीरको सुख देनेके लिये धर्मकी मर्यादाका उल्लंघन करें, उन्हें न्यायपूर्वक पृथक् - पृथक् दण्ड देना । धर्मपूर्वक समस्त प्रजाकी रक्षा करना, किसीके प्रति स्वेच्छाचार न करना। कटुवचनसे अपराधीका दमन करना ‘ वाग्दण्ड ’ कहलाता है । जिसमें अपराधीसे बहुतसा सुवर्ण वसूल किया जाय, वह ‘ अर्थदण्ड ’ कहलाता है । शरीरके किसी अङ्गविशेषका छेदन करना ' काय- दण्ड' कहा गया है । किसी महान् अपराधके कारण अपराधीका जो वध किया जाता है, वह “ प्राणदण्ड ” के रूपमें प्रसिद्ध है । ये चारों दण्ड तलवारके दुर्निवार या दुर्धर्ष रूप हैं । यह बात समस्त प्रजाको बता देनी चाहिये ॥ ६ ९ –७१ ॥

असेरेवं प्रमाणानि परिपाल्य व्यतिक्रमात् ।

स विसृज्याथ पुत्रं स्वं प्रजानामधिपं ततः ॥ ७२ ॥

मनुः प्रजानां रक्षार्थं क्षुपाय प्रददावसिम् ।

क्षुपाज्जग्राह चेक्ष्वाकुरिक्ष्वाकोश्च पुरूरवाः ॥ ७३ ॥

‘ जब प्रजाके द्वारा धर्मका उल्लङ्घन हो जाय तो खड्गके द्वारा प्रमाणित ( साधित ) होनेवाले इन दण्डोंका यथायोग्य प्रयोग करके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये । ' ऐसा कहकर लोकपालोंने अपने पुत्र प्रजापालक मनुको विदा कर दिया । तत्पश्चात् मनुने प्रजाकी रक्षाके लिये वह खड्ग क्षुपको दे दिया । क्षुपसे इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकुसे पुरूरवाने उस तलवारको ग्रहण किया ॥ ७२-७३ ॥

आयुश्च तस्माल्लेभे तं नहुषश्च ततो भुवि ।

ययातिर्नहुषाच्चापि पूरुस्तस्माच्च लब्धवान् ॥ ७४ ॥

पुरूरवासे आयुने, आयुसे नहुषने, नहुषसे ययातिने और ययातिसे पूरुने इस भूतलपर वह खड्ग प्राप्त किया ॥ ७४ ॥

अमूर्तरयसस्तस्मात्ततो भूमिशयो नृपः ।

भरतश्चापि दौष्यन्तिर्लेभे भूमिशयादसिम् ॥ ७५ ॥

पूरुसे अमूर्तरया, अमूर्तरयासे राजा भूमिशयने और भूमिशयसे दुष्यन्तकुमार भरतने उस खड्ग को ग्रहण किया ॥ ७५ ॥

तस्माल्लेभे च धर्मज्ञो राजन्नैलविलस्तथा ।

ततस्त्वैलविलाल्लेभे धुन्धुमारो नरेश्वरः II ७६ ॥

पृष्ठ 1084

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राजन्! उनसे धर्मज्ञ ऐलविलने वह तलवार प्राप्त की । ऐलविलसे वह महाराज धुन्धुमारको मिली ॥ ७६ ॥

धुन्धुमाराच्च काम्बोजो मुचुकुन्दस्ततोऽलभत् ।

मुचुकुन्दान्मरुत्तश्च मरुत्तादपि रैवतः ॥ ७७ ॥

रैवताद् युवनाश्वश्च युवनाश्वात्ततो रघुः ।

इक्ष्वाकुवंशजस्तस्माद्धरिणाश्वः प्रतापवान् ॥ ७८ ॥

हरिणाश्वादसिं लेभे शुनकः शुनकादपि ।

उशीनरो वै धर्मात्मा तस्माद् भोजः स यादवः ॥ ७९ ॥

यदुभ्यश्च शिबिर्लेभे शिबेश्चापि प्रतर्दनः ।

प्रतर्दनादष्टकश्च पृषदश्वोऽष्टकादपि ॥ ८० ॥

धुन्धुमारसे काम्बोजने, काम्बोजसे मुचुकुन्दने, मुचुकुन्दसे मरुत्तने, मरुत्तसे रैवतने, रैवतसे युवनाश्वने, युवनाश्वसे इक्ष्वाकुवंशी रघुने, रघुसे प्रतापी हरिणाश्वने, हरिणाश्वसे शुनकने, शुनकसे धर्मात्मा उशीनरने, उशीनरसे युदवंशी भोजने, यदुवंशियोंसे शिबिने, शिबिसे प्रतर्दनने, प्रतर्दनसे अष्टकने तथा अष्टकसे पृषदश्वने वह तलवार प्राप्त की ॥ ७७– ८० ॥

पृषदश्वाद् भरद्वाजो द्रोणस्तस्मात् कृपस्ततः ।

ततस्त्वं भ्रातृभिः सार्धं परमासिमवाप्तवान् ॥ ८१ ॥

पृषदश्वसे भरद्वाजवंशी द्रोणाचार्यने और द्रोणाचार्यसे कृपाचार्यने खड्गविद्या प्राप्त की । फिर कृपाचार्यसे भाइयों सहित तुमने उस उत्तम खड्गका उपदेश प्राप्त किया है ॥ ८१ ॥

कृत्तिकास्तस्य नक्षत्रमसेरग्निश्च दैवतम् ।

रोहिणी गोत्रमस्याथ रुद्रश्च गुरुरुत्तमः ॥ ८२ ॥

उस ‘ असि’ का नक्षत्र कृत्तिका है, देवता अग्नि है, गोत्र रोहिणी है तथा उत्तम गुरु रुद्रदेव हैं ॥ ८२ ॥

असेरष्टौ हि नामानि रहस्यानि निबोध मे ।

पाण्डवेय सदा यानि कीर्तयन् लभते जयम् ॥ ८३ ॥

पाण्डुनन्दन! असिके आठ गोपनीय नाम हैं । उन्हें मेरे मुँहसे सुनो । उन नामोंका कीर्तन करनेवाला पुरुष युद्धमें विजय प्राप्त करता है ॥ ८३ ॥

असिर्विशसनः खड्गस्तीक्ष्णधारो दुरासदः ।

श्रीगर्भो विजयश्चैव धर्मपालस्तथैव च ॥ ८४ ॥

१. असि, २. विशसन, ३. खड्ग, ४. तीक्ष्णधार, ५. दुरासद, ६. श्रीगर्भ, ७. विजय और ८. धर्मपाल- ये ही वे आठ नाम हैं ॥ ८४ ॥

अग्रयः प्रहरणानां च खड्गो माद्रवतीसुत ।

पृष्ठ 1085

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महेश्वरप्रणीतश्च पुराणे निश्चयं गतः ॥ ८५ ॥

(एतानि चैव नामानि पुराणे निश्चितानि वै । ) माद्रीनन्दन! खड्ग सब आयुधोंमें श्रेष्ठ है । भगवान् रुद्रने सबसे पहले इसका संचालन किया था । पुराणमें इसकी श्रेष्ठताका निश्चय किया गया है । उपर्युक्त सारे नाम पुराणोंमें निश्चितरूपसे कहे गये हैं ॥ ८५ ॥

पृथुस्तूप्तादयामास धनुराद्यमरिंदमः ।

तेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि सुबहून्यपि ।

धर्मेण च यथापूर्वं वैन्येन परिरक्षिता ॥ ८६ ॥

शत्रुदमन पृथुने सबसे पहले धनुषका उत्पादन किया था और उन्होंने ही इस पृथ्वीसे नाना प्रकारके शस्यों ( अन्नके बीजों ) का दोहन किया था । उन वेनकुमार पृथुने पहलेके ही समान धर्मपूर्वक इस पृथ्वीकी रक्षा की थी ॥ ८६ ॥

तदेतदार्षं माद्रेय प्रमाणं कर्तुमर्हसि ।

असेश्च पूजा कर्तव्या सदा युद्धविशारदैः ॥ ८७ ॥

माद्रीनन्दन! यह ऋषियोंका बताया हुआ मत है । तुम्हें इसे प्रमाण मानकर इसपर विश्वास करना चाहिये । युद्धविशारद पुरुषोंको सदा ही खड्ग की पूजा करनी चाहिये ॥ ८७ ॥

इत्येष प्रथमः कल्पो व्याख्यातस्ते सुविस्तरात् ।

असेरुत्पत्तिसंसर्गो यथावद् भरतर्षभ ॥ ८८ ॥

भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने असि ( खड्ग) की उत्पत्ति का प्रसङ्ग तुम्हें विस्तारपूर्वक और यथावत्पसे बताया है । इससे यह सिद्ध हुआ कि खड्ग ही आयुधोंमें सबसे प्रथम प्रकट हुआ है ॥ ८८ ॥

सर्वथैतदिदं श्रुत्वा खड्गसाधनमुत्तमम् ।

लभते पुरुषः कीर्तिं प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ८ ९ ॥

खड्गप्राप्तिका यह उत्तम प्रसङ्ग सब प्रकारसे सुनकर पुरुष इस संसारमें कीर्ति पाता है और देहत्यागके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ८ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि खड्गोत्पत्तिकथने षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें खड्गकी उत्पत्तिका कथनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ८९ ३ श्लोक हैं ) FULL OF

पृष्ठ 1086

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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक् - पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तवति भीष्मे तु तूष्णींभूते युधिष्ठिरः ।

पप्रच्छावसथं गत्वा भ्रातॄन् विदुरपञ्चमान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यह कहकर जब भीष्मजी चुप हो गये, तब राजा युधिष्ठिरने घर जाकर अपने चारों भाइयों तथा पाँचवें विदुरजीसे प्रश्न किया - ॥ १ ॥

धर्मे चार्थे च कामे च लोकवृत्तिः समाहिता ।

तेषां गरीयान् कतमो मध्यमः को लघुश्च कः ॥ २ ॥

‘ लोगोंकी प्रवृत्ति प्रायः धर्म, अर्थ और कामकी ओर होती है । इन तीनोंमें कौन सबसे श्रेष्ठ, कौन मध्यम और कौन लघु है? ' ॥ २ ॥

कस्मिंश्चात्मा निधातव्यस्त्रिवर्गविजयाय वै ।

संहृष्टा नैष्ठिकं वाक्यं यथावद् वक्तुमर्हथ ॥ ३ ॥

‘ इन तीनोंपर विजय पानेके लिये विशेषतः किसमें मन लगाना चाहिये । आप सब लोग हर्ष और उत्साहके साथ इस प्रश्नका यथावत्रूपसे उत्तर दें और वही बात कहें, जिसपर आपकी पूरी आस्था हो ' ॥ ३ ॥

ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् ।

जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ॥ ४ ॥

तब अर्थकी गति और तत्त्वको जाननेवाले प्रतिभाशाली विदुरजीने धर्मशास्त्रका स्मरण करके सबसे पहले कहना आरम्भ किया ॥ ४ ॥

विदुर उवाच

बाहुश्रुत्यं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिया क्षमा ।

भावशुद्धिर्दया सत्यं संयमश्चात्मसम्पदः ॥ ५ ॥

विदुरजी बोले – राजन्! बहुत-से शास्त्रोंका अनुशीलन, तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और संयम – ये सब आत्माकी सम्पत्ति हैं ॥ ५ ॥

एतदेवाभिपद्यस्व मा तेऽभूच्चलितं मनः ।

एतन्मूलौ हि धर्मार्थावेतदेकपदं हि मे ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1087

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युधिष्ठिर! तुम इन्हींको प्राप्त करो । इनकी ओरसे तुम्हारा मन विचलित नहीं होना

चाहिये । धर्म और अर्थकी जड़ ये ही हैं । मेरे मतमें ये ही परम पद हैं ॥ ६ ॥

धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः ।

धर्मेण देवा ववृधुर्धर्मे चार्थः समाहितः ॥ ७ ॥

धर्मसे ही ऋषियोंने संसार- समुद्रको पार किया है । धर्मपर ही सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं । धर्मसे ही देवताओंकी उन्नति हुई है और धर्ममें ही अर्थकी भी स्थिति है ॥ ७ ॥

धर्मो राजन् गुणः श्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते ।

कामो यवीयानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ८ ॥

राजन्! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थको मध्यम बताया जाता है और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ ८ ॥

तस्माद् धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना ।

तथा च सर्वभूतेषु वर्तितव्यं यथात्मनि ॥ ९ ॥

अतः मनको वशमें करके धर्मको अपना प्रधान ध्येय बनाना चाहिये और सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, जैसा हम अपने लिये चाहते हैं ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

समाप्तवचने तस्मिन्नर्थशास्त्रविशारदः ।

पार्थो धर्मार्थतत्त्वज्ञो जगौ वाक्यं प्रचोदितः ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! विदुरजीकी बात समाप्त होनेपर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले अर्थशास्त्रविशारद अर्जुनने युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर कहा ॥ अर्जुनउवाच

कर्मभूमिरियं राजन्निह वार्ता प्रशस्यते ।

कृषिर्वाणिज्यगोरक्षं शिल्पानि विविधानि च ॥ ११ ॥

अर्जुन बोले — राजन्! यह कर्म - भूमि है । यहाँ जीविकाके साधनभूत कर्मोंकी ही प्रशंसा होती है । खेती, व्यापार, गोपालन तथा भाँति- भाँतिके शिल्प– ये सब अर्थप्राप्तिके साधन हैं ॥ ११ ॥

अर्थ इत्येव सर्वेषां कर्मणामव्यतिक्रमः ।

न ह्यृतेऽर्थेन वर्तेते धर्मकामाविति श्रुतिः ॥ १२ ॥

अर्थ ही समस्त कर्मोंकी मर्यादाके पालनमें सहायक है । अर्थके बिना धर्म और काम भी सिद्ध नहीं होते - ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ १२ ॥

विषयैरर्थवान् धर्ममाराधयितुमुत्तमम् ।

कामं च चरितुं शक्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1088

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धनवान् मनुष्य धनके द्वारा उत्तम धर्मका पालन और अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुर्लभ कामनाओंकी प्राप्ति कर सकता है ॥ १३ ॥

अर्थस्यावयवावेतौ धर्मकामाविति श्रुतिः ।

अर्थसिद्धया विनिर्वृत्तावुभावेतौ भविष्यतः ॥ १४ ॥

श्रुतिका कथन है कि धर्म और काम अर्थके ही दो अवयव हैं । अर्थकी सिद्धिसे उन दोनोंकी भी सिद्धि हो जायगी ॥ १४ ॥

तद्गतार्थं हि पुरुषं विशिष्टतरयोनयः ।

ब्रह्माणमिव भूतानि सततं पर्युपासते ॥ १५ ॥

जैसे सब प्राणी सदा ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार उत्तम जातिके मनुष्य भी सदा धनवान् पुरुषकी उपासना किया करते हैं ॥ १५ ॥

जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रियाः ।

मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ॥ १६ ॥

जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले जितेन्द्रिय संयतचित्त शरीरमें पंक धारण किये मुण्डितमस्तक नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी अर्थकी अभिलाषा रखकर पृथक् - पृथक् निवास करते हैं ॥ १६ ॥

काषायवसनाश्चान्ये श्मश्रुला हीनिषेविणः ।

विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ताः सर्वपरिग्रहैः ॥ १७ ॥

अर्थार्थिनः सन्ति केचिदपरे स्वर्गकांक्षिणः ।

कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वं स्वं धर्ममनुष्ठिताः ॥ १८ ॥

सब प्रकारके संग्रहसे रहित, संकोचशील, शान्त, गेरुआ वस्त्रधारी, दाढ़ी- मूँछ बढ़ाये विद्वान् पुरुष भी धनकी अभिलाषा करते देखे गये हैं । कुछ दूसरे प्रकारके ऐसे लोग हैं जो स्वर्ग पानेकी इच्छा रखते हैं; और कुलपरम्परागत नियमोंका पालन करते हुए अपने - अपने वर्ण तथा आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान कर रहे हैं; किंतु वे भी धनकी इच्छा रखते हैं ॥ १७-१८ ॥

आस्तिका नास्तिकाश्चैव नियताः संयमे परे ।

अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशिता ॥ १ ९ ॥

दूसरे बहुत - से आस्तिक- नास्तिक संयम नियम- परायण पुरुष हैं जो अर्थके इच्छुक होते हैं । अर्थकी प्रधानताको न जानना तमोमय अज्ञान है । अर्थकी प्रधानताका ज्ञान प्रकाशमय है ॥ १ ९ ॥ भृत्यान् भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान् ।

एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम् ।

अनयोस्तु निबोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठयोः ॥ २० ॥

पृष्ठ 1089

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धनवान् वही है जो अपने भृत्योंको उत्तम भोग और शत्रुओंको दण्ड देकर उनको वशमें रखता है । बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! मुझे तो यही मत ठीक जँचता है । अब आप इन दोनोंकी बात सुनिये । इनकी वाणी कण्ठतक आ गयी है, अर्थात् ये दोनों भाई बोलनेके लिये उतावले हो रहे हैं ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो धर्मार्थकुशली माद्रीपुत्रावनन्तरम् ।

नकुलः सहदेवश्च वाक्यं जगदतुः परम् ॥ २१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर धर्म और अर्थके ज्ञानमें कुशल माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने अपनी उत्तम बात इस प्रकार उपस्थित की ॥ २१ ॥

नकुलसहदेवावूचतुः

आसीनश्च शयानश्च विचरन्नपि वा स्थितः ।

अर्थयोगं दृढं कुर्याद् योगैरुच्चावचैरपि ॥ २२ ॥

नकुल सहदेव बोले – महाराज! मनुष्यको बैठते, सोते, घूमते - फिरते अथवा खड़े होते समय भी छोटे - बड़े हर तरहके उपायोंसे धनकी आयको सुदृढ़ बनाना चाहिये ॥ २२ ॥

अस्मिंस्तु वै विनिर्वृत्ते दुर्लभे परमप्रिये ।

इह कामानवाप्नोति प्रत्यक्षं नात्र संशयः ॥ २३ ॥

धन अत्यन्त प्रिय और दुर्लभ वस्तु है । इसकी प्राप्ति अथवा सिद्धि हो जानेपर मनुष्य संसारमें अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर सकता है, इसका सभीको प्रत्यक्ष अनुभव है— इसमें संशय नहीं है ॥ २३ ॥

योऽर्थो धर्मेण संयुक्तो धर्मो यश्चार्थसंयुतः ।

तद्धि त्वामृतसंवादं तस्मादेतौ मताविह ॥ २४ ॥

जो धन धर्मसे युक्त हो और जो धर्म धनसे सम्पन्न हो, वह निश्चितरूपसे आपके लिये अमृतके समान होगा, यह हम दोनोंका मत है ॥ २४ ॥

अनर्थस्य न कामोऽस्ति तथार्थोऽधर्मिणः कुतः ।

तस्मादुद्विजते लोको धर्मार्थाद् यो बहिष्कृतः ॥ २५ ॥

निर्धन मनुष्यकी कामना पूर्ण नहीं होती और धर्महीन मनुष्यको धन भी कैसे मिल सकता है । जो पुरुष धर्मयुक्त अर्थसे वञ्चित है, उससे सब लोग उद्विग्न रहते हैं ॥ २५ ॥

तस्माद् धर्मप्रधानेन साध्योऽर्थः संयतात्मना ।

विश्वस्तेषु हि भूतेषु कल्पते सर्वमेव हि ॥ २६ ॥

इसलिये मनुष्य अपने मनको संयममें रखकर जीवनमें धर्मको प्रधानता देते हुए पहले धर्माचरण करके ही फिर धनका साधन करे; क्योंकि धर्मपरायण पुरुषपर ही समस्त

पृष्ठ 1090

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प्राणियोंका विश्वास होता है और जब सभी प्राणी विश्वास करने लगते हैं तब मनुष्यका सारा काम स्वतः सिद्ध हो जाता है ॥ २६ ॥

धर्मं समाचरेत् पूर्वं ततोऽर्थं धर्मसंयुतम् ।

ततः कामं चरेत् पश्चात् सिद्धार्थः स हि तत्परम् ॥ २७ ॥

अतः सबसे पहले धर्मका आचरण करे; फिर धर्मयुक्त धनका संग्रह करे । इसके बाद दोनोंकी अनुकूलता रखते हुए कामका सेवन करे । इस प्रकार त्रिवर्गका संग्रह करनेसे मनुष्य सफलमनोरथ हो जाता है ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

विरेमतुस्तु तद् वाक्यमुक्त्वा तावश्विनोः सुतौ ।

भीमसेनस्तदा वाक्यमिदं वक्तुं प्रचक्रमे ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इतना कहकर नकुल और सहदेव चुप हो गये ।

तब भीमसेनने इस तरह कहना आरम्भ किया ॥ २८ ॥

भीमसेन उवाच

नाकामः कामयत्यर्थं नाकामो धर्ममिच्छति ।

नाकामः कामयानोऽस्ति'तस्मात् कामो विशिष्यते ॥ २ ९ ॥

भीमसेन बोले - धर्मराज! जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, उसे न तो धन कमानेकी इच्छा होती है और न धर्म करनेकी ही । कामनाहीन पुरुष तो काम ( भोग ) भी नहीं चाहता है; इसलिये त्रिवर्गमें काम ही सबसे बढ़कर है ॥ २ ९ ॥

कामेन युक्ता ऋषयस्तपस्येव समाहिताः ।

पलाशफलमूलादा वायुभक्षाः सुसंयताः ॥ ३० ॥

किसी - न - किसी कामनासे संयुक्त होकर ही ऋषि लोग तपस्यामें मन लगाते हैं । फल,

मूल और पत्ते चबाकर रहते हैं । वायु पीकर मन और इन्द्रियोंका संयम करते हैं ॥

वेदोपवेदेष्वपरे युक्ताः स्वाध्यायपारगाः ।

श्राद्धयज्ञक्रियायां च तथा दानप्रतिग्रहे ॥ ३१ ॥

कामनासे ही लोग वेद और उपवेदोंका स्वाध्याय करते तथा उसमें पारङ्गत विद्वान् हो जाते हैं । कामनासे ही श्राद्धकर्म, यज्ञकर्म, दान और प्रतिग्रहमें लोगोंकी प्रवृत्ति होती है ॥ ३१ ॥

वणिजः कर्षका गोपाः कारवः शिल्पिनस्तथा ।

देवकर्मकृतश्चैव युक्ताः कामेन कर्मसु ॥ ३२ ॥

व्यापारी, किसान, ग्वाले, कारीगर और शिल्पी तथा देवसम्बन्धी कार्य करनेवाले लोग भी कामनासे ही अपने - अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं ॥ ३२ ॥

समुद्रं वा विशन्त्यन्ये नराः कामेन संयुताः ।