05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1231–1240

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1231–1240

पृष्ठ 1231

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एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते ।

यस्त्वेतान् नाचरेद् विद्वांस्तपस्तस्य प्रवर्धते ॥ १८ ॥

कपट, शठता, चोरी, निन्दा, दूसरोंके दोष देखना, दूसरोंको हानि पहुँचाना, प्राणियोंकी हिंसा करना, चुगली खाना और झूठ बोलना– जो इन दुर्गुणोंका सेवन करता है, उसकी तपस्या क्षीण होती है और जो विद्वान् इन दोषोंको कभी अपने आचरणमें नहीं लाता, उसकी तपस्या निरन्तर बढ़ती रहती है ॥ १७-१८ ॥ इह चिन्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः ।

कर्मभूमिरियं लोके इह कृत्वा शुभाशुभम् ।

शुभैः शुभमवाप्नोति तथाशुभमथान्यथा ॥ १ ९ ॥

इस लोकमें पुण्य और पापकर्मके सम्बन्धमें अनेक प्रकारके विचार होते रहते हैं । यह कर्मभूमि है। इस जगत्में शुभ और अशुभ कर्म करके मनुष्य शुभ कर्मोंका शुभ फल पाता है और अशुभ कर्मोंका अशुभ फल भोगता है ॥ १ ९ ॥

इह प्रजापतिः पूर्वं देवाः सर्षिगणास्तथा ।

इष्ट्वेष्टतपसः पूता ब्रह्मलोकमुपाश्रिताः ॥ २० ॥

पूर्वकालमें यहीं प्रजापति, देवता तथा ऋषियोंने यज्ञ और अभीष्ट तपस्या करके पवित्र हो ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लिया ॥ २० ॥

उत्तरः पृथिवीभागः सर्वपुण्यतमः शुभः ।

इहस्थास्तत्र जायन्ते ये वै पुण्यकृतो जनाः ॥ २१ ॥

पृथ्वीका उत्तरभाग सबसे अधिक पवित्र और मंगलमय है । इस लोकमें जो पुण्यात्मा मनुष्य हैं, वे ही मृत्युके पश्चात् उस भूभागमें जन्म लेते हैं ॥ २१ ॥

असत्कर्माणि कुर्वन्तस्तिर्यग्योनिषु चापरे ।

क्षीणायुषस्तथा चान्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ॥ २२ ॥

दूसरे लोग जो यहाँ पापकर्म करते हैं, वे पशु- पक्षियोंकी योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं और दूसरे कितने ही आयुक्षय होनेपर नष्ट हो जाते हैं और पातालमें चले जाते हैं ॥ २२ ॥

अन्योन्यभक्षणासक्ता लोभमोहसमन्विताः ।

इहैव परिवर्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम् ॥ २३ ॥

जो लोभ और मोहसे युक्त हो एक दूसरेको खा जानेके लिये उद्यत रहते हैं, वे भी इसी लोकमें आवागमन करते रहते हैं, उत्तरदिशाके उत्कृष्ट लोकमें नहीं जाने पाते हैं ॥

ये गुरून् पर्युपासन्ते नियता ब्रह्मचारिणः ।

पन्थानं सर्वलोकानां विजानन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥

जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरुजनोंकी उपासना करते हैं, वे मनीषी पुरुष सभी लोकोंके मार्गको जानते हैं ॥ २४ ॥

इत्युक्तोऽयं मया धर्मः संक्षिप्तो ब्रह्मनिर्मितः ।

पृष्ठ 1232

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धर्माधर्मो हि लोकस्य यो वै वेत्ति स बुद्धिमान् ॥ २५ ॥

इस प्रकार मैंने यहाँ ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित इस धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया है । जो लोकमें करने और न करने योग्य धर्म और अधर्मको जानता है, वही बुद्धिमान् है ॥ २५ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तो भृगुणा राजन् भरद्वाजः प्रतापवान् ।

भृगुं परमधर्मात्मा विस्मितः प्रत्यपूजयत् ॥ २६ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! भृगुजीके इस प्रकार कहनेपर परम धर्मात्मा प्रतापी भरद्वाजने आश्चर्यचकित होकर उनकी पूजा की ॥ २६ ॥

एष ते प्रसवो राजन् जगतः सम्प्रकीर्तितः ।

निखिलेन महाप्राज्ञ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २७ ॥

परम बुद्धिमान् नरेश! इस प्रकार मैंने तुमसे जगत्की उत्पत्तिके सम्बन्धमें ये सारी बातें बतायी हैं । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु- भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ बानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ २ ॥ * आचार्य नीलकण्ठने ' उत्तरे हिमवत्पार्श्वे' इत्यादिसे लेकर इस अध्यायके अन्ततकके श्लोकोंका आध्यात्मिक अर्थ किया है । वे परलोक या उत्कृष्ट लोकका अर्थ परमात्मा मानते हैं और इसी दृष्टिसे उन्होंने श्रुति और युक्तिका आश्रय ले पूरे प्रकरणकी संगति लगायी है ।

पृष्ठ 1233

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त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा युधिष्ठिरउवाच

आचारस्य विधिं तात प्रोच्यमानं त्वयानघ ।

श्रोतुमिच्छामि धर्मज्ञ सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— धर्मज्ञ पितामह! अब मैं आपके मुखसे सदाचारकी विधि सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

दुराचारा दुर्विचेष्टा दुष्प्रज्ञाः प्रियसाहसाः ।

असंतस्त्विति विख्याताः संतश्चाचारलक्षणाः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! जो दुराचारी, बुरी चेष्टावाले, दुर्बुद्धि और दुःसाहसको प्रिय माननेवाले हैं, वे दुष्टात्माके नामसे विख्यात होते हैं । श्रेष्ठ पुरुष तो वही हैं, जिनमें सदाचार -देखा जाय – सदाचार ही उनका लक्षण है ॥ २ ॥

पुरीषं यदि वा मूत्रं येन कुर्वन्ति मानवाः ।

राजमार्गे गवां मध्ये धान्यमध्ये च ते शुभाः ॥ ३ ॥

जो मनुष्य सड़कपर, गौओंके बीचमें और अनाजमें मल या मूत्रका त्याग नहीं करते हैं, वे श्रेष्ठ समझे जाते हैं ॥ ३ ॥

शौचमावश्यकं कृत्वा देवतानां च तर्पणम् ।

धर्ममाहुर्मनुष्याणामुपस्मृश्य नदीं तरेत् ॥ ४ ॥

प्रतिदिन आवश्यक शौचका सम्पादन करके आचमन करे; फिर नदीमें नहाये और अपने अधिकारके अनुसार संध्योपासनाके अनन्तर देवता आदिका तर्पण करे । इसे विद्वान् पुरुष मानवमात्रका धर्म बताते हैं ॥ ४ ॥

सूर्यं सदोपतिष्ठेत न च सूर्योदये स्वपेत् ।

सायं प्रातर्जपेत् संध्यां तिष्ठन् पूर्वां तथेतराम् ॥ ५ ॥

नित्यप्रति सूर्योपस्थान करे । सूर्योदयके समय कभी न सोये । सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय संध्योपासना करके गायत्रीमन्त्रका जप करे ॥ ५ ॥

पञ्चार्द्रा भोजनं भुञ्ज्यात् प्राङ्मुखो मौनमास्थितः ।

न निन्द्यादन्नभक्ष्यांश्च स्वाद्वस्वादु च भक्षयेत् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1234

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दोनों हाथ, दोनों पैर और मुँह - इन पाँच अंगोंको धोकर* पूर्वाभिमुख हो भोजन करे । भोजनके समय मौन रहे । परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे । वह स्वादिष्ट हो या न हो, प्रेमसे भोजन कर ले ॥ ६ ॥

आर्द्रपाणिः समुत्तिष्ठेन्नार्द्रपादः स्वपेन्निशि ।

देवर्षिर्नारदः प्राह एतदाचारलक्षणम् ॥ ७ ॥

भोजनके बाद हाथ धोकर उठे । रातको भीगे पैर न सोये । देवर्षि नारद इसीको सदाचारका लक्षण कहते हैं ॥

शुचिं देशमनड्वाहं देवगोष्ठं चतुष्पथम् ।

ब्राह्मणं धार्मिकं चैत्यं नित्यं कुर्यात् प्रदक्षिणम् ॥ ८ ॥

अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च ।

सामान्यं भोजनं भृत्यैः पुरुषस्य प्रशस्यते ॥ ९ ॥

यज्ञशाला आदि पवित्र स्थान, बैल, देवालय, चौराहा, ब्राह्मण, धर्मात्मा मनुष्य तथा चैत्य ( देवसम्बन्धी वृक्ष )- इनको सदा दाहिने करके चले । गृहस्थ पुरुषको घरमें अतिथियों, सेवकों और स्वजनोंके लिये भी एक - सा भोजन बनवाना श्रेष्ठ माना गया है ॥ ८ - ९ ॥

सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं वेदनिर्मितम् ।

नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् ॥ १० ॥

शास्त्रमें मनुष्योंके लिये सायंकाल और प्रातःकाल दो ही समय भोजन करनेका विधान है । बीचमें भोजन करनेकी विधि नहीं देखी गयी है । जो इस नियमका पालन करता है, उसे उपवास करनेका फल प्राप्त होता है ॥ १० ॥

होमकाले तथा जुह्वन्नृतुकाले तथा व्रजन् ।

अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ब्रह्मचारी तथा भवेत् ॥ ११ ॥

जो होमके समय प्रतिदिन हवन करता, ऋतुकालमें स्त्रीके पास जाता और परायी स्त्रीपर कभी दृष्टि नहीं डालता, वह बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मचारीके समान माना जाता है ॥ ११ ॥

अमृतं ब्राह्मणोच्छिष्टं जनन्या हृदयं कृतम् ।

तज्जनाः पर्युपासन्ते सत्यं सन्तः समासते ॥ १२ ॥

ब्राह्मणको भोजन करानेके बाद बचा हुआ अन्न अमृत है । वह माताके स्तन्यकी भाँति हितकर है । उसको जो लोग सेवन करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेते हैं ॥ १२ ॥

लोष्टमर्दा तृणच्छेदो नखखादी तु यो नरः ।

नित्योच्छिष्टः शंकुशुको नेहायुर्विन्दते महत् ॥ १३ ॥

जो मनुष्य मिट्टीके ढेले फोड़ता, तिनके तोड़ता, नख चबाता, सदा जूठे हाथ और जूठे मुँह रहता है तथा खूँटीमें बँधे हुए तोतेके समान पराधीन जीवन बिताता है, उसे इस जगत्में

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बड़ी आयु नहीं मिलती ॥ १३ ॥

यजुषा संस्कृतं मांसं निवृत्तो मांसभक्षणात् ।

न भक्षयेद् वृथामांसं पृष्ठमांसं च वर्जयेत् ॥ १४ ॥

जो मांस - भक्षण न करता हो, वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा संस्कार किया हुआ मांस भी न खाय । व्यर्थ मांस और श्राद्धशेष मांस भी वह त्याग दे ॥ १४ ॥

स्वदेशे परदेशे वा अतिथिं नोपवासयेत् ।

काम्यकर्मफलं लब्ध्वा गुरूणामुपपादयेत् ॥ १५ ॥

मनुष्य स्वदेशमें हो या परदेशमें - अपने पास आये हुए अतिथिको भूखा न रहने दे । सकाम कर्तव्यकर्मोंके फलरूपमें प्राप्त पदार्थ अपने गुरुजनोंको निवेदित कर दे ॥ १५ ॥

गुरुभ्य आसनं देयं कर्तव्यं चाभिवादनम् ।

गुरूनभ्यर्च्य युज्यन्ते आयुषा यशसा श्रिया ॥ १६ ॥

गुरुजन पधारें तो उन्हें बैठनेके लिये आसन दे, प्रणाम करे, गुरुओंकी पूजा करनेसे मनुष्य आयु, यश और लक्ष्मीसे सम्पन्न होते हैं ॥ १६ ॥

नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं न च नग्नां परस्त्रियम् ।

मैथुनं सततं धर्म्यं गुह्मे चैव समाचरेत् ॥ १७ ॥

उगते हुए सूर्यकी ओर न देखे, नंगी हुई परायी स्त्रीकी ओर दृष्टि न डाले और सदा धर्मानुसार ऋतुकालके समय अपनी ही पत्नीके साथ एकान्त स्थानमें समागम करे ॥ १७ ॥

तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः ।

सर्वमार्यकृतं चौक्ष्यं वालसंस्पर्शनानि च ॥ १८ ॥

तीर्थोंमें श्रेष्ठ तीर्थ विशुद्ध हृदय है, पवित्र वस्तुओंमें अतिपवित्र भी विशुद्ध हृदय ही है । शिष्ट पुरुष जिसे आचरणमें लाते हैं, वह आचरण सर्वश्रेष्ठ है । चँवर आदिमें लगे हुए गायकी पूँछके बालोंका स्पर्श भी शिष्टाचारानुमोदित होनेके कारण शुद्ध है ॥ १८ ॥

दर्शने दर्शने नित्यं सुखप्रश्नमुदाहरेत् ।

सायं प्रातश्च विप्राणां प्रदिष्टमभिवादनम् ॥ १ ९ ॥

परिचित मनुष्यसे जब - जब भेंट हो, सदा उसका कुशल- समाचार पूछे । सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय ब्राह्मणोंको प्रणाम करे, यह शास्त्रकी आज्ञा है ॥

देवागारे गवां मध्ये ब्राह्मणानां क्रियापथे ।

स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ २० ॥

देवमन्दिरमें, गौओंके बीचमें, ब्राह्मण के यज्ञादि कर्मोंमें, शास्त्रोंके स्वाध्यायकालमें और भोजन करते समय दाहिने हाथसे काम ले ॥ २० ॥

सायं प्रातश्च विप्राणां पूजनं च यथाविधि ।

पण्यानां शोभते पण्यं कृषीणां बाद्यते कृषिः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1236

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बहुकारं च सस्यानां वाह्ये वाहो गवां तथा । सबेरे और शाम दोनों समय विधिपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन ( सेवा-सत्कार ) करना चाहिये । यही व्यापारोंमें उत्तम व्यापारकी भाँति शोभा पाता है और यही खेतीमें सबसे अच्छी खेतीके समान प्रत्यक्ष फलदायक है । ब्राह्मणपूजक पुरुषके विविध अन्नोंकी वृद्धि होती है और उसे वाहनों में गोजातिके श्रेष्ठ वाहन सुलभ होते हैं ॥ २१ ॥

सम्पन्नं भोजने नित्यं पानीये तर्पणं तथा ॥ २२ ॥

सुशृतं पायसे ब्रूयाद् यवाग्वां कृसरे तथा । भोजन करानेके पश्चात् दाता पूछे कि क्या भोजन सम्पन्न हो गया? ब्राह्मण उत्तर दे कि सम्पन्न हो गया । इसी प्रकार जल पिलानेके बाद दाता पूछे तृप्ति हुई क्या? ब्राह्मण उत्तर दे कि अच्छी तरह तृप्ति हो गयी । खीर खिलानेके बाद जब यजमान पूछे कि अच्छा बना था न? तब ब्राह्मण उत्तर दे बहुत अच्छा बना था । इसी प्रकार जौका हलुआ और खिचड़ी खिलानेके बाद भी प्रश्न और उत्तर होना चाहिये ॥ २२ ॥

श्मश्रुकर्मणि सम्प्राप्ते क्षुते स्नानेऽथ भोजने ।

व्याधितानां च सर्वेषामायुष्यमभिनन्दनम् ॥ २३ ॥

हजामत बनाने, छींकने, स्नान और भोजन करनेके बाद हरेक मनुष्यको तथा सभी अवस्थाओंमें सम्पूर्ण रोगियोंका कर्तव्य है कि वे ब्राह्मणोंको प्रणाम आदिसे प्रसन्न करें । इससे उनकी आयु बढ़ती है ॥ २३ ॥

प्रत्यादित्यं न मेहेत न पश्येदात्मनः शकृत् ।

सह स्त्रियाथ शयनं सह भोज्यं च वर्जयेत् ॥ २४ ॥

सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब न करे। अपनी विष्ठापर दृष्टि न डाले । स्त्रीके साथ एक शय्यापर सोना और एक थालीमें भोजन करना छोड़ दे ॥ २४ ॥

त्वंकारं नामधेयं च ज्येष्ठानां परिवर्जयेत् ।

अवराणां समानानामुभयेषां न दुष्यति ॥ २५ ॥

अपनेसे बड़ोंका नाम लेकर या तू कहकर न पुकारे, जो अपनेसे छोटे या समवयस्क हों, उनके लिये वैसा करना दोषकी बात नहीं है ॥ २५ ॥

हृदयं पापवृत्तानां पापमाख्याति वैकृतम् ।

ज्ञानपूर्वं विनश्यन्ति गूहमाना महाजने ॥ २६ ॥

पापियोंका हृदय तथा उनके नेत्र और मुख आदिका विकार ही उनके पापोंको बता देता है। जो लोग जान- बूझकर किये हुए पापको महापुरुषोंसे छिपाते हैं, वे गिर जाते हैं ॥ २६ ॥

ज्ञानपूर्वकृतं पापं छादयत्यबहुश्रुतः ।

नैनं मनुष्याः पश्यन्ति पश्यन्त्येव दिवौकसः ॥ २७ ॥

पृष्ठ 1237

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मूर्ख मनुष्य ही जान- बूझकर किये हुए पापको छिपाता है । यद्यपि उस पापको मनुष्य नहीं देखते हैं, तो भी देवतालोग तो देखते ही हैं ॥ २७ ॥

पापेनापिहितं पापं पापमेवानुवर्तते ।

धर्मेणापिहितो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते ।

धार्मिकेण कृतो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते ॥ २८ ॥

पापी मनुष्यका पापके द्वारा छिपाया हुआ पाप पुनः उसे पापमें ही लगाता है और धर्मात्माका धर्मतः गुप्त रक्खा हुआ धर्म उसे पुनः धर्ममें ही प्रवृत्त करता है ॥ पापं कृतं न स्मरतीह मूढो विवर्तमानस्य तदेति कर्तुः । राहुर्यथा चन्द्रमुपैति चापि तथाबुधं पापमुपैति कर्म ॥ २ ९ ॥ मूर्ख मनुष्य अपने किये हुए पापको याद नहीं रखता; परंतु पापमें प्रवृत्त हुए कर्ताका पाप स्वयं ही उसके पीछे लगा रहता है, जैसे राहु चन्द्रमाके पास स्वतः पहुँच जाता है, उसी प्रकार उस मूढ़ मनुष्यके पास उसका पाप स्वयं चला जाता है ॥ २ ९ ॥

आशया संचितं द्रव्यं दुःखेनैवोपभुज्यते ।

तद् बुधा न प्रशंसन्ति मरणं न प्रतीक्षते ॥ ३० ॥

किसी विशेष कामनाकी पूर्तिकी आशासे जो धन संचित करके रखा गया है, उसका उपभोग दुःखपूर्वक ही किया जाता है; अतः विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि मृत्यु किसीकी कामना--पूर्तिके अवसरकी प्रतीक्षा नहीं करती है ॥ ३० ॥

मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः ।

तस्मात् सर्वेषु भूतेषु मनसा शिवमाचरेत् ॥ ३१ ॥

मनीषी पुरुषोंका कथन है कि समस्त प्राणियोंके लिये मनद्वारा किया हुआ धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः मनसे सम्पूर्ण जीवोंका कल्याण सोचता रहे ॥ ३१ ॥

एक एव चरेद् धर्मं नास्ति धर्मे सहायता ।

केवलं विधिमासाद्य सहायः किं करिष्यति ॥ ३२ ॥

केवल वेदविधिका सहारा लेकर अकेले ही धर्मका आचरण करना चाहिये । उसमें

सहायताकी आवश्यकता नहीं है । कोई दूसरा सहायक आकर क्या करेगा ॥ ३२ ॥

धर्मो योनिर्मनुष्याणां देवानाममृतं दिवि ।

प्रेत्यभावे सुखं धर्माच्छश्वत्तैरुपभुज्यते ॥ ३३ ॥

धर्म ही मनुष्योंकी योनि है । वही स्वर्गमें देवताओंका अमृत है । धर्मात्मा मनुष्यमरनेके पश्चात् धर्मके ही बलसे सदा सुख भोगते हैं ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 1238

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भीष्मयुधिष्ठिर संवादे आचारविधौ त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भीष्म-युधिष्ठिरसंवादके प्रसंगमें आचारविधिविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १ ९३ ॥ - तात्पर्य यह कि भोजनके लिये जाते समय तत्काल हाथ, पैर और मुँह धोने चाहिये । बहुत पहलेके धोये हों, तो भी उस समय धो लेना आवश्यक है ।

पृष्ठ 1239

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चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः अध्यात्मज्ञानका निरूपण युधिष्ठिर उवाच

अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह चिन्त्यते ।

यदध्यात्मं यथा चैतत् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अध्यात्मके नामसे जिसका विचार किया जाता है, वह अध्यात्मज्ञान क्या है और कैसा है? यह मुझे बताइये ॥

कुतः सृष्टमिदं विश्वं ब्रह्मन् स्थावरजङ्गमम् ।

प्रलये कथमभ्येति तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ २ ॥

ब्रह्मन्! इस चराचर जगत्की सृष्टि किससे हुई है और प्रलयकालमें इसका लय किस प्रकार होता है; इस विषयका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अध्यात्ममिति मां पार्थ यदेतदनुपृच्छसि ।

तद् व्याख्यास्यामि ते तात श्रेयस्करतमं सुखम् ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा — तात! कुन्तीनन्दन! तुम जिस अध्यात्मज्ञानके विषयमें पूछ रहे हो, उसकी व्याख्या मैं तुम्हारे लिये करता हूँ; वह परम कल्याणकारी और सुखस्वरूप है ॥ ३ ॥

सृष्टिप्रलयसंयुक्तमाचार्यैः परिदर्शितम् ।

यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विन्दति ।

फललाभश्च तस्य स्यात् सर्वभूतहितं च तत् ॥ ४ ॥

आचार्योंने सृष्टि और प्रलयकी व्याख्याके साथ अध्यात्मज्ञानका विवेचन किया है, जिसे जानकर मनुष्य इस संसारमें सुख और प्रसन्नताका भागी होता है । उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति भी होती है । वह अध्यात्मज्ञान समस्त प्राणियोंके लिये हितकर है ॥ ४ ॥

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।

महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ॥ ५ ॥

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि- ये पाँच महाभूत सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ॥ ५ ॥

यतः सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति पुनः पुनः ।

महाभूतानि भूतेभ्यः सागरस्योर्मयो यथा ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1240

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जैसे लहरें समुद्रसे प्रकट होकर फिर उसीमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ये पाँच महाभूत भी जिस परमात्मासे उत्पन्न हुए हैं, उसीमें सब प्राणियोंके सहित बारंबार लीन होते हैं ॥ ६ ॥

प्रसार्य च यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः ।

तहद् भूतानि भूतात्मा सृष्टानि हरते पुनः ॥ ७ ॥

जैसे कछुआ अपने अंगोंको फैलाकर पुनः समेट लेता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परब्रह्म परमेश्वर अपने रचे हुए सम्पूर्ण भूतोंको फैलाकर फिर अपने भीतर ही समेट लेते हैं ॥ ७ ॥

महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् ।

अकरोत् तेषु वैषम्यं तत्तु जीवो न पश्यति ॥ ८ ॥

सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले परमात्माने सब प्राणियोंके शरीरोंमें पाँच ही महाभूतोंको स्थापित किया है; परंतु उनमें विषमता कर दी है - किसी महाभूतके अंशको अधिक और किसीके अंशको कम करके रखा है। उस वैषम्यको साधारण जीव नहीं देख पाता ॥ ८ ॥

शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम् ।

वायोः स्पर्शस्तथा चेष्टा त्वक् चैव त्रितयं स्मृतम् ॥ ९ ॥

शब्दगुण, श्रोत्र इन्द्रिय और शरीरके सम्पूर्ण छिद्र– ये तीन आकाशके कार्य हैं । स्पर्श, चेष्टा और त्वगिन्द्रिय — ये तीन वायुके कार्य माने गये हैं ॥ ९ ॥

रूपं चक्षुस्तथा पाकस्त्रिविधं तेज उच्यते ।

रसः क्लेदश्च जिह्वा च त्रयो जलगुणाः स्मृताः ॥ १० ॥

रूप, नेत्र और परिपाक- ये तीन तेजके कार्य बताये जाते हैं । रस, जिह्वा तथा क्लेद ( गीलापन ) – ये तीन जलके गुण अर्थात् कार्य माने गये हैं ॥ १० ॥

घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणास्त्रयः ।

महाभूतानि पञ्चैव षष्ठं च मन उच्यते ॥ ११ ॥

गन्ध, घ्राणेन्द्रिय और शरीर– ये तीन भूमिके गुण अर्थात् कार्य हैं । इस प्रकार इस शरीरमें पाँच महाभूत और छठा मन है; ऐसा बताया जाता है ॥ ११ ॥

इन्द्रियाणि मनश्चैव विज्ञानान्यस्य भारत ।

सप्तमी बुद्धिरित्याहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः ॥ १२ ॥

भरतनन्दन! श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियाँ और मन- ये जीवात्माको विषयोंका ज्ञान करानेवाले हैं । शरीरमें इन छः के अतिरिक्त सातवीं बुद्धि और आठवाँ क्षेत्रज्ञ है ॥

चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः ।

बुद्धिरध्यवसानाय क्षेत्रज्ञः साक्षिवत् स्थितः ॥ १३ ॥