05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1241–1250

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1241–1250

पृष्ठ 1241

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इन्द्रियाँ विषयोंको ग्रहण कराती हैं । मन संकल्प- विकल्प करता है । बुद्धि निश्चय करानेवाली है और क्षेत्रज्ञ ( आत्मा) साक्षीकी भाँति स्थित रहता है ॥ १३ ॥

ऊर्ध्वं पादतलाभ्यां यदर्वाक्चोर्ध्वं च पश्यति ।

एतेन सर्वमेवेदं विद्धयभिव्याप्तमन्तरम् ॥ १४ ॥

दोनों पैरोंके तलोंसे लेकर ऊपरतक जो शरीर स्थित है, उसे जो साक्षीभूत चेतन ऊपर-नीचे सब ओरसे देखता है, वह इस सारे शरीरके भीतर और बाहर सब जगह व्याप्त है । इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ १४ ॥

पुरुषैरिन्द्रियाणीह वेदितव्यानि कृत्स्नशः ।

तमो रजश्च सत्त्वं च तेऽपि भावास्तदाश्रिताः ॥ १५ ॥

सभी मनुष्योंको अपनी इन्द्रियों ( और मन- बुद्धि) की देख- भाल करके उनके विषयमें पूरी जानकारी रखनी चाहिये; क्योंकि सत्त्व, रज और तम – ये तीनों गुण उन्हींका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ १५ ॥

एतां बुद्ध्वा नरो बुद्ध्या भूतानामागतिं गतिम् ।

समवेक्ष्य शनैश्चैव लभते शममुत्तमम् ॥ १६ ॥

मनुष्य अपनी बुद्धिके बलसे इन सबको और जीवोंके आवागमनकी अवस्थाको जानकर शनैः - शनैः उसपर विचार करनेसे उत्तम शान्ति पा जाता है ॥ १६ ॥

गुणैर्नेनीयते बुद्धिर्बुद्धेरेवेन्द्रियाण्यपि ।

मनःषष्ठानि सर्वाणि तदभावे कुतो गुणाः ॥ १७ ॥

तम आदि गुण बुद्धिको बारंबार विषयोंकी ओर ले जाते हैं; तथा बुद्धिके साथ- साथ मनसहित पाँचों इन्द्रियोंको और उनकी समस्त वृत्तियोंको भी ले जाते हैं । उस बुद्धिके अभावमें गुण कैसे रह सकते हैं? ॥

इति तन्मयमेवैतत् सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।

प्रलीयते चोद्भवति तस्मान्निर्दिश्यते तथा ॥ १८ ॥

यह चराचर जगत् बुद्धिके उदय होनेपर ही उत्पन्न होता है और उसके लयके साथ ही लीन हो जाता है; इसलिये यह सारा प्रपंच बुद्धिमय ही है; अतएव श्रुतिने सबकी बुद्धिरूपताका ही निर्देश किया है ॥

येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते ।

जिघ्रति घ्राणमित्याहू रसं जानाति जिह्वया ॥ १ ९ ॥

बुद्धि जिसके द्वारा देखती है, उसे नेत्र और जिसके द्वारा सुनती है, उसे श्रोत्र कहते हैं । इसी प्रकार जिससे वह सूँघती है, उसे घ्राण कहा गया है, वही जिह्वाके द्वारा रसका अनुभव करती है ॥ १ ९ ॥

त्वचा स्पर्शयते स्पर्शं बुद्धिर्विक्रियतेऽसकृत् ।

येन प्रार्थयते किञ्चित् तदा भवति तन्मनः ॥ २० ॥

पृष्ठ 1242

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बुद्धि त्वचासे स्पर्शका बोध प्राप्त करती है । इस प्रकार वह बारंबार विकारको प्राप्त होती रहती है । वह जिस करणके द्वारा जिसका अनुभव करना चाहती है, मन उसीका रूप धारण कर लेता है ॥ २० ॥

अधिष्ठानानि बुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा ।

इन्द्रियाणीति यान्याहुस्तान्यदृश्योऽधितिष्ठति ॥ २१ ॥

भिन्न- भिन्न विषयोंको ग्रहण करनेके लिये जो बुद्धिके पाँच अधिष्ठान हैं, उन्हींको पाँच इन्द्रियाँ कहते हैं । अदृश्य जीवात्मा उन सबका अधिष्ठाता ( प्रेरक ) है ॥ २१ ॥

पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ।

कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदनुशोचति ॥ २२ ॥

न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते । जीवात्माके आश्रित रहकर बुद्धि ( सुख, दुःख और मोह) तीन भावोंमें स्थित होती है । वह कभी तो प्रसन्नताका अनुभव करती है, कभी शोकमें डूबी रहती है और कभी सुख और दुःख दोनोंके अनुभवसे रहित मोहाच्छन्न हो जाती है ॥ २२ ॥

एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता ॥ २३ ॥

सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते ।

सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ॥ २४ ॥

इस प्रकार वह मनुष्योंके मनके भीतर तीन भावोंमें अवस्थित है, यह भावात्मिका बुद्धि ( समाधि- अवस्थामें) सुख, दुःख और मोह -इन तीनों भावोंको लाँघ जाती है । ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र उत्ताल तरंगोंसे संयुक्त हो अपनी विशाल तटभूमिको भी कभी - कभी लाँघ जाता है ॥ २३-२४ ॥

अतिभावगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते ।

प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावमनुवर्तते ॥ २५ ॥

उपर्युक्त भावोंको लाँघ जानेपर भी बुद्धि भावात्मक मनमें सूक्ष्मरूपसे स्थित रहती है । तत्पश्चात् समाधिसे उत्थानके समय प्रवृत्त्यात्मक रजोगुण बुद्धिभावका अनुसरण करता है ॥ २५ ॥

इन्द्रियाणि हि सर्वाणि प्रवर्तयति सा तदा ।

ततः सत्त्वं तमोभावः प्रीतियोगात् प्रवर्तते ॥ २६ ॥

उस समय रजोगुणसे युक्त हुई बुद्धि सारी इन्द्रियोंको प्रवृत्तिमें लगा देती है । तदनन्तर विषयोंके सम्बन्धसे प्रीतिरूप सत्त्वगुण प्रकट होता है । उसके बाद पुरुषके आसक्ति आदि दोषोंसे तमोमय भावका उदय होता है ॥ २६ ॥

प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमो मोहस्तु ते त्रयः ।

ये ये च भावा लोकेऽस्मिन् सर्वेष्वेतेषु वै त्रिषु ॥ २७ ॥

पृष्ठ 1243

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प्रसन्नता या हर्ष सत्त्वगुणका कार्य है, शोक रजोगुणरूप है और मोह तमोगुणरूप । इस संसारमें जो - जो भाव हैं, वे सब इन्हीं तीनोंके अन्तर्गत हैं ॥ २७ ॥

इति बुद्धिगतिः सर्वा व्याख्याता तव भारत ।

इन्द्रियाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता ॥ २८ ॥

भारत! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष बुद्धिकी सम्पूर्ण गतिका विशद विवेचन किया है । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखे ॥

सत्त्वं रजस्तमश्चैव प्राणिनां संश्रिताः सदा ।

त्रिविधा वेदना चैव सर्वसत्त्वेषु दृश्यते ॥ २९ ॥

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति भारत । भारत! सत्त्व, रज और तम- ये तीन गुण सदा ही प्राणियोंमें स्थित रहते हैं और इनके कारण उन सब जीवोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसी - यह तीन प्रकारकी अनुभूति देखी जाती है ॥ २ ९ ॥

सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः ।

तमोगुणेन संयुक्तौ भवतोऽव्यावहारिकौ ॥ ३० ॥

सत्त्वगुण सुखकी अनुभूति करानेवाला है, रजोगुण दुःखकी प्राप्ति कराता है और जब वे दोनों तमोगुण ( मोह ) - से संयुक्त होते हैं, तब व्यवहारके विषय नहीं रह जाते ॥ ३० ॥

तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।

वर्तते सात्त्विको भाव इत्याचक्षीत तत् तथा ॥ ३१ ॥

जब शरीर या मनमें किसी प्रकारसे भी प्रसन्नताका भाव हो, तब यह कहना चाहिये कि सात्त्विक भावका उदय हुआ है ॥ ३१ ॥

अथ यद् दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ।

प्रवृत्तं रज इत्येव तन्न संरभ्य चिन्तयेत् ॥ ३२ ॥

जब अपने मनमें दुःखसे युक्त अप्रसन्न्ताका भाव जाग्रत् हो, तब यह समझना चाहिये कि रजोगुणकी प्रवृत्ति हुई है । अतः उस दुःखको पाकर मनमें चिन्ता न करे ( क्योंकि चिन्तासे दुःख और बढ़ता है ) ॥ ३२ ॥

अथ यन्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत् ।

अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ ३३ ॥

जब मनमें कोई मोहयुक्त भाव पैदा हो और किसी भी इन्द्रियका विषय स्पष्ट जान न पड़े, उसके विषयमें कोई तर्क भी काम न करे और वह किसी तरह समझमें न आवे, तब यही निश्चय करना चाहिये कि तमोगुणकी वृद्धि हुई है ॥ ३३ ॥

प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता ।

कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणाः ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1244

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जब मनमें किसी प्रकार भी अत्यन्त हर्ष, प्रेम, आनन्द, सुख और शान्तिका अनुभव हो रहा हो, तब इन गुणोंको सात्त्विक समझना चाहिये ॥ ३४

अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा ।

लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ॥ ३५ ॥

जिस समय किसी कारणसे या बिना कारण ही असंतोष, शोक, संताप, लोभ और असहनशीलताके भाव दिखायी दें तो उन्हें रजोगुणका चिह्न जानना चाहिये ॥ ३५ ॥

अवमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता ।

कथंचिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ ३६ ॥

इसी प्रकार जब अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष किसी तरह भी घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप समझे ॥ ३६ ॥

दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् ।

मनः सुनियतं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च ॥ ३७ ॥

जिसका दूरतक दौड़ लगानेवाला और अनेक विषयोंकी ओर जानेवाला कामनायुक्त संशयात्मक मन अच्छी तरह वशमें हो जाता है, वह मनुष्य इहलोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी सुखी होता है ॥ ३७ ॥

सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः ।

सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान् ॥ ३८ ॥

बुद्धि और आत्मा — ये दोनों ही सूक्ष्म तत्त्व हैं तथापि इनमें बड़ा भारी अन्तर है । तुम इस अन्तरपर दृष्टिपात करो । इनमें बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और आत्मा गुणोंकी सृष्टिसे अलग रहता है ॥ ३८ ॥

मशकोदुम्बरौ वापि सम्प्रयुक्तौ यथा सदा ।

अन्योन्यमेतौ ख्यातां च सम्प्रयोगस्तथा तयोः ॥ ३ ९ ॥

जैसे गूलरका फल और उसके भीतर रहनेवाले कीड़े एक साथ रहते हुए भी एक-दूसरेसे अलग हैं, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा दोनोंका एक साथ रहना और भिन्न - भिन्न होना समझना चाहिये ॥ ३ ९ ॥

पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा ।

यथा मत्स्यो जलं चैव सम्प्रयुक्तौ तथैव तौ ॥ ४० ॥

ये दोनों स्वभावसे ही अलग- अलग हैं तो भी सदा एक - दूसरेसे मिले रहते हैं । ठीक वैसे ही, जैसे मछली और जल एक- दूसरेसे पृथक् होकर भी परस्पर संयुक्त रहते हैं । यही स्थिति बुद्धि और आत्माकी भी है ॥ ४० ॥

न गुणा विदुरात्मानं स गुणान् वेत्ति सर्वशः ।

परिद्रष्टा गुणानां तु संसृष्टान्मन्यते तथा ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 1245

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सत्त्व आदि गुण जड होनेके कारण आत्माको नहीं जानते; किंतु आत्मा चेतन है, इसलिये वह गुणोंको सब प्रकारसे जानता है । यद्यपि आत्मा गुणोंका साक्षी है, अतः उनसे सर्वथा भिन्न है तो भी वह अपनेको उन गुणोंसे संयुक्त मानता है ॥ ४१ ॥

इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं कुरुते बुद्धिसप्तमैः ।

निर्विचेष्टैरजानद्भिः परमात्मा प्रदीपवत् ॥ ४२ ॥

जैसे घड़ेमें रखा हुआ दीपक घड़ेके छेदोंसे अपना प्रकाश फैलाकर वस्तुओंका ज्ञान कराता है, उसी प्रकार परमात्मा शरीरके भीतर स्थित होकर चेष्टा और ज्ञानसे शून्य इन्द्रियों तथा मन- बुद्धि इन सातोंके द्वारा सम्पूर्ण पदार्थोंका अनुभव कराता है ॥ ४२ ॥

सृजते हि गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ।

सम्प्रयोगस्तयोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवः ॥ ४३ ॥

बुद्धि गुणोंकी सृष्टि करती है और आत्मा साक्षी बनकर देखता रहता है । उन बुद्धि और आत्माका यह संयोग अनादि है ॥ ४३ ॥

आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्चन ।

सत्त्वं मनः संसृजते न गुणान् वै कदाचन ॥ ४४ ॥

बुद्धिका परमात्माके सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है और क्षेत्रज्ञका भी कोई दूसरा आश्रय नहीं है। बुद्धि मनसे ही घनिष्ठ सम्बन्ध रखती है । गुणोंके साथ उसका साक्षात् सम्पर्क कदापि नहीं होता ॥ ४४ ॥

रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्नियच्छति ।

तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव ॥ ४५ ॥

जब जीव बुद्धिरूपी सारथि और मनरूपी बागडोर- द्वारा इन्द्रियरूपी अश्वोंकी लगाम अच्छी तरह काबूमें रखता है तब घड़े में रखे हुए प्रज्वलित दीपकके समान अपने भीतर ही उसका आत्मा प्रकाशित होने लगता है ॥ ४५ ॥

त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनिः ।

सर्वभूतात्मभूस्तस्मात् स गच्छेदुत्तमां गतिम् ॥ ४६ ॥

जो सांसारिक कर्मोंका परित्याग करके सदा अपने - आपमें ही अनुरक्त रहता है, वह मननशील मुनि सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा होकर परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ४६ ॥

यथा वारिचरः पक्षी सलिलेन न लिप्यते ।

एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते ॥ ४७ ॥

जैसे जलचर पक्षी जलसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार विशुद्धबुद्धि ज्ञानी पुरुष निर्लिप्त रहकर ही सम्पूर्ण भूतोंमें विचरता है ॥ ४७ ॥

एवं स्वभावमेवैतत् स्वबुद्धया विहरेन्नरः ।

अशोचन्नप्रहृष्यंश्च समो विगतमत्सरः ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 1246

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यह आत्मतत्त्व ऐसा ही निर्लिप्त एवं शुद्ध-बुद्धिस्वरूप है - ऐसा अपनी बुद्धिके द्वारा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष हर्ष, शोक और मात्सर्य-दोषसे रहित हो सर्वत्र समानभाव रखते हुए विचरे ॥ ४८ ॥

स्वभावयुक्त्या युक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् ।

ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तुवद् गुणाः ॥ ४९ ॥

आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित रहकर ही सदा गुणोंकी सृष्टि करता है । ठीक उसी तरह, जैसे मकड़ी अपने स्वरूपमें स्थित रहती हुई ही जाला बनाती है । मकड़ीके जालेके ही समान समस्त गुणोंकी सत्ता समझनी चाहिये ॥ ४ ९ ॥

प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते ।

प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिध्यति ॥ ५० ॥

एवमेकेऽध्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे ।

उभयं सम्प्रधार्यैतद् व्यवस्येत यथामति ॥ ५१ ॥

आत्मसाक्षात् हो जानेपर गुण नष्ट हो जाते हैं तो भी सर्वथा निवृत्त नहीं होते हैं; क्योंकि उनकी निवृत्ति प्रत्यक्ष नहीं देखी जाती है । जो परोक्ष वस्तु है उसकी सिद्धि अनुमानसे होती है । एक श्रेणीके विद्वानोंका ऐसा ही निश्चय है । दूसरे लोग यह मानते हैं कि गुणोंकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है । इन दोनों मतोंपर भलीभाँति विचार करके अपनी बुद्धिके अनुसार यथार्थ वस्तुका निश्चय करना चाहिये ॥ ५०-५१ ॥

इतीमं हृदयग्रन्थिं बुद्धिभेदमयं दृढम् ।

विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशयः ॥ ५२ ॥

बुद्धिके द्वारा कल्पित हुआ जो भेद है, वही –हृदयकी सुदृढ़ गाँठ है। उसे खोलकर संशयरहित हो ज्ञानवान् पुरुष सुखसे रहे, कदापि शोक न करे ॥ ५२ ॥

मलिनाः प्राप्नुयुः शुद्धिं यथा पूर्णां नदीं नराः ।

अवगाह्य सुविद्वांसो विद्धि ज्ञानमिदं तथा ॥ ५३ ॥

जैसे मैले शरीरवाले मनुष्य जलसे भरी हुई नदीमें नहा- धोकर साफ- सुथरे हो जाते हैं, उसी प्रकार इस ज्ञानमयी नदीमें अवगाहन करके मलिनचित्त मनुष्य भी शुद्ध एवं ज्ञानसम्पन्न हो जाते हैं – ऐसा जानो ॥ ५३ ॥

महानद्या हि पारज्ञस्तप्यते न तदन्यथा ।

न तु तप्यति तत्त्वज्ञः फले ज्ञाते तरत्युत ॥ ५४ ॥

किसी महानदीके पारको जाननेवाला पुरुष केवल जाननेमात्रसे कृतकृत्य नहीं होता; जबतक वह नौका आदिके द्वारा वहाँ पहुँच न जाय, तबतक वह चिन्तासे संतप्त ही रहता है । परंतु तत्त्वज्ञ पुरुष ज्ञानमात्रसे ही संसार-सागरसे पार हो जाता है; उसे संताप नहीं होता । क्योंकि यह ज्ञान स्वयं ही पुलस्वरूप है ॥ ५४ ॥

एवं ये विदुराध्यात्मं केवलं ज्ञानमुत्तमम् ॥ ५५ ॥

पृष्ठ 1247

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एतां बुद्ध्वा नरः सर्वां भूतानामागतिं गतिम् ।

अवेक्ष्य च शनैर्बुद्धया लभते शमनं ततः ॥ ५६ ॥

जो मनुष्य बुद्धिसे जीवोंके इस आवागमनपर शनैः - शनैः विचार करके उस विशुद्ध एवं उत्तम आध्यात्मिक ज्ञानको प्राप्त कर लेता है, वह परम शान्ति पाता है ॥ ५५-५६ ॥

त्रिवर्गो यस्य विदितः प्रेक्ष्य यश्च विमुञ्चति ।

अन्विष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ॥ ५७ ॥

जिसे धर्म, अर्थ और काम- इन तीनोंका ठीक-ठीक ज्ञान है, जो खूब सोच - समझकर उनका परित्याग कर चुका है और जिसने मनके द्वारा आत्मतत्त्वका अनुसंधान करके योगयुक्त हो आत्मासे भिन्न वस्तुके लिये उत्सुकताका त्याग कर दिया है, वही तत्त्वदर्शी है ॥ ५७ ॥

न चात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रियैश्च विभागशः ।

तत्र तत्र विसृष्टैश्च दुर्वार्यैश्चाकृतात्मभिः ॥ ५८ ॥

जिन्होंने अपने मनको वशमें नहीं किया है, वे भिन्न - भिन्न विषयोंकी ओर प्रेरित हुई दुर्निवार्य इन्द्रियोंद्वारा आत्माका साक्षात्कार नहीं कर सकते ॥ ५८ ॥

एतद् बुद्ध्वा भवेद् बुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् ।

विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥ ५ ९ ॥

यह जानकर मनुष्य ज्ञानी हो जाता है । ज्ञानीका इसके सिवा और क्या लक्षण है? क्योंकि मनीषी पुरुष उस परमात्मतत्त्वको जानकर ही अपनेको कृतकृत्य मानते हैं ॥ ५ ९ ॥ न भवति विदुषां ततो भयं यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत् । न हि गतिरधिकास्ति कस्यचित् सति हि गुणे प्रवदन्त्यतुल्यताम् ॥ ६० ॥

अज्ञानियोंके लिये जो महान् भयका स्थान है, उसी संसारसे ज्ञानी पुरुषोंको भय नहीं होता । ज्ञान होनेपर सबको एक-सी ही गति ( मुक्ति ) प्राप्त होती है । किसीको उत्कृष्ट या निकृष्ट गति नहीं मिलती; क्योंकि गुणोंका सम्बन्ध रहनेपर ही उनके तारतम्यके अनुसार प्राप्त होनेवाली गतिमें भी असमानता बतायी जाती है ( ज्ञानीका गुणोंसे सम्बन्ध नहीं रहता ) ॥ ६० ॥

यः करोत्यनभिसंधिपूर्वकं तच्च निर्णुदति यत्पुराकृतम् । नाप्रियं तदुभयं कुतः प्रियं तस्य तज्जनयतीह सर्वतः ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 1248

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जो निष्काम भावसे कर्म करता है, उसका वह कर्म पहलेके किये हुए समस्त कर्म- संस्कारोंका नाश कर देता है । पूर्वजन्म और इस जन्मके किये हुए वे दोनों प्रकारके कर्म उस पुरुषके लिये न तो अप्रिय फल उत्पन्न करते हैं और न तो प्रिय फलके ही जनक होते हैं ( क्योंकि कर्तापनके अभिमान और फलकी आसक्तिसे शून्य होनेके कारण उनका उन कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं रह जाता) ॥ ६१ ॥

लोकमातुरमसूयते जन- स्तस्य तज्जनयतीह सर्वतः ॥ ६२ ॥

जो काम, क्रोध आदि दुर्व्यसनोंसे आतुर रहता है, उसे विचारवान् पुरुष धिक्कारते हैं । उसके निन्दनीय कर्म उस आतुर मानवको सभी योनियों ( पशु- पक्षी आदिके शरीरों ) -में जन्म दिलाता है ॥ ६२ ॥

लोक आतुरजनान् विराविण- स्तत्तदेव बहु पश्य शोचतः । तत्र पश्य कुशलानशोचतो ये विदुस्तदुभयं पदं सताम् ॥ ६३ ॥

लोकमें भोगासक्तिके कारण आतुर रहनेवाले लोग स्त्री, पुत्र आदिके नाश होनेपर उनके लिये बहुत शोक करते और फूट- फूटकर रोते हैं । तुम उनकी इस दुर्दशाको देख लो । साथ ही जो सारासार-र- विवेकमें कुशल हैं और सत्पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले दो प्रकारके पदको अर्थात् सगुण-उपासना और निर्गुण उपासनाके फलको जानते हैं, वे कभी शोक नहीं करते । उनकी अवस्थापर भी दृष्टिपात कर लो ( फिर तुम्हें अपने लिये जो हितकर दिखायी दे, उसी पथका आश्रय लो ) ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अध्यात्मकथने चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अध्यात्मतत्त्वका वर्णनविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९४ ॥

पृष्ठ 1249

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पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ध्यानयोगका वर्णन भीष्म उवाच

हन्त वक्ष्यामि ते पार्थ ध्यानयोगं चतुर्विधम् ।

यं ज्ञात्वा शाश्वतीं सिद्धिं गच्छन्तीह महर्षयः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं –कुन्तीनन्दन! अब मैं तुमसे ध्यानयोगका वर्णन करूँगा जो आलम्बनके भेदसे चार प्रकारका होता है । जिसे जानकर महर्षिगण यहीं सनातन सिद्धिको प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥

यथा स्वनुष्ठितं ध्यानं तथा कुर्वन्ति योगिनः ।

महर्षयो ज्ञानतृप्ता निर्वाणगतमानसाः ॥ २ ॥

निर्वाणस्वरूप मोक्षमें मन लगानेवाले ज्ञानतृप्त योगयुक्त महर्षिगण उसी उपायका अवलम्बन करते हैं, जिससे ध्यानका भलीभाँति अनुष्ठान हो सके ॥ २ ॥

नावर्तन्ते पुनः पार्थ मुक्ताः संसारदोषतः ।

जन्मदोषपरिक्षीणाः स्वभावे पर्यवस्थिताः ॥ ३ ॥

कुन्तीनन्दन! वे संसारके काम, क्रोध आदि दोषोंसे मुक्त तथा जन्मसम्बन्धी दोषसे शून्य होकर परमात्माके स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं, इसलिये पुनः इस संसारमें उन्हें नहीं लौटना पड़ता ॥ ३ ॥

निर्द्वन्द्वा नित्यसत्त्वस्था विमुक्ता नियमस्थिताः ।

असङ्गान्यविवादीनि मनःशान्तिकराणि च ॥ ४ ॥

तत्र ध्यानेन संश्लिष्टमेकाग्रं धारयेन्मनः ।

पिण्डीकृत्येन्द्रियग्राममासीनः काष्ठवन्मुनिः ॥ ५ ॥

ध्यानयोगके साधकोंको चाहिये कि सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वोंसे रहित, नित्य सत्त्वगुणमें स्थित, सब प्रकारके दोषोंसे रहित और शौच- संतोषादि नियमोंमें तत्पर रहें । जो स्थान असंग ( सब प्रकारके भोगोंके संगसे शून्य), ध्यानविरोधी वस्तुओंसे रहित तथा मनको शान्ति देनेवाले हों, वहीं इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेटकर काठकी भाँति स्थिरभावसे बैठ जाय और मनको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें लगा दे ॥ ४-५ ॥

शब्दं न विन्देच्छ्रोत्रेण स्पर्शं त्वचा न वेदयेत् ।

रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्वया न रसांस्तथा ॥ ६ ॥

प्रेयाण्यपि च सर्वाणि जह्याद् ध्यानेन योगवित् ।

पञ्चवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1250

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योगको जाननेवाले समर्थ पुरुषको चाहिये कि कानोंके द्वारा शब्द न सुने, त्वचासे स्पर्शका अनुभव न करे, आँखसे रूपको न देखे और जिह्वासे रसोंको ग्रहण न करे एवं ध्यानके द्वारा समस्त सूँघने योग्य वस्तुओंको भी त्याग दे तथा पाँचों इन्द्रियोंको मथ डालनेवाले इन विषयोंकी कभी मनसे भी इच्छा न करे ॥ ६-७ ॥

ततो मनसि संगृह्य पञ्चवर्गं विचक्षणः ।

समादध्यान्मनो भ्रान्तमिन्द्रियैः सह पञ्चभिः ॥ ८ ॥

तत्पश्चात् बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष पाँचों इन्द्रियोंको मनमें स्थिर करे । उसके बाद पाँचों इन्द्रियोंसहित चंचल मनको परमात्माके ध्यानमें एकाग्र करे ॥ ८ ॥

विसंचारि निरालम्बं पञ्चद्वारं चलाचलम् ।

पूर्वं ध्यानपथे धीरः समादध्यान्मनोऽन्तरा ॥ ९ ॥

मन नाना प्रकारके विषयोंमें विचरण करनेवाला है । उसका कोई स्थिर आलम्बन नहीं है । पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ उसके इधर- उधर निकलनेके द्वार हैं तथा वह अत्यन्त चंचल है । ऐसे मनको धीर योगी पुरुष पहले अपने हृदयके भीतर ध्यानमार्गमें एकाग्र करे ॥ ९ ॥

इन्द्रियाणि मनश्चैव यदा पिण्डीकरोत्ययम् ।

एष ध्यानपथः पूर्वो मया समनुवर्णितः ॥ १० ॥

जब यह योगी इन्द्रियोंसहित मनको एकाग्र कर लेता है, तभी उसके प्रारम्भिक ध्यानमार्गका आरम्भ होता है । युधिष्ठिर! यह मैंने तुम्हारे निकट प्रथम ध्यानमार्गका वर्णन किया है ॥ १० ॥

तस्य तत् पूर्वसंरुद्धमात्मनः षष्ठमान्तरम् ।

स्फुरिष्यति समुद्भ्रान्ता विद्युदम्बुधरे यथा ॥ ११ ॥

इस प्रकार प्रयत्न करनेसे जो इन्द्रियोंसहित मन कुछ देरके लिये स्थिर हो जाता है, वही फिर अवसर पाकर जैसे बादलोंमें बिजली चमक उठती है, उसी प्रकार पुनः बारंबार विषयोंकी ओर जानेके लिये चंचल हो उठता है ॥ ११ ॥

जलबिन्दुर्यथा लोलः पर्णस्थः सर्वतश्चलः ।

एवमेवास्य चित्तं च भवति ध्यानवर्त्मनि ॥ १२ ॥

जैसे पत्तेपर पड़ी हुई पानीकी बूँद सब ओरसे हिलती रहती है, उसी प्रकार ध्यानमार्गमें स्थित साधकका मन भी प्रारम्भमें चंचल होता रहता है ॥ १२ ॥

समाहितं क्षणं किञ्चिद् ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति ।

पुनर्वायुपथं भ्रान्तं मनो भवति वायुवत् ॥ १३ ॥

एकाग्र करनेपर कुछ देर तो वह ध्यानमें स्थित रहता है; परंतु फिर नाड़ी मार्गमें पहुँचकर भ्रान्त- सा होकर वायुके समान चंचल हो उठता है ॥ १३ ॥

अनिर्वेदो गतक्लेशो गततन्द्रिरमत्सरी ।

समादध्यात् पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित् ॥ १४ ॥