श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1221–1230
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1221–1230
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स्वर्गमें अत्यन्त सुखदायिनी हवा चलती है । मनोहर सुगन्ध छायी रहती है । भूख, प्यास, परिश्रम, बुढ़ापा और पापके फलका कष्ट वहाँ कभी नहीं भोगना पड़ता है ॥ १३
नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभयम् ।
नरके दुःखमेवाहुः सुखं तत्परमं पदम् ॥ १४ ॥
स्वर्गमें सदा सुख ही होता है । इस मर्त्यलोकमें सुख और दुःख दोनों होते हैं । नरकमें केवल दुःख-ही- दुःख बताया गया है । वास्तविक सुख तो वह परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है ॥ १४ ॥
पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रियः ।
पुमान् प्रजापतिस्तत्र शुक्रं तेजोमयं विदुः ॥ १५ ॥
पृथ्वी सम्पूर्ण भूतोंकी जननी है । संसारकी स्त्रियाँ भी पृथ्वीके समान ही संतानकी जननी होती हैं । पुरुष ही वहाँ प्रजापतिके समान है । पुरुषका जो वीर्य है, उसे तेजःस्वरूप समझा जाता है ॥ १५ ॥
इत्येतल्लोकनिर्माणं ब्रह्मणा विहितं पुरा ।
प्रजाः समनुवर्तन्ते स्वैः स्वैः कर्मभिरावृताः ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस स्त्री- पुरुषस्वरूप जगत्की सृष्टि की थी । यहाँ समस्त प्रजा अपने - अपने कर्मोंसे आवृत होकर सुख- दुःखका अनुभव करती है ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ नब्बेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १९० ॥
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एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन भरद्वाज उवाच
दानस्य किं फलं प्राहुर्धर्मस्य चरितस्य च ।
तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य वा ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा — ब्रह्मन्! आचरणमें लाये हुए दानरूप धर्मका, भलीभाँति की हुई तपस्याका तथा स्वाध्याय और अग्निहोत्रका क्या फल बताया गया है? ॥ १ ॥
भृगुरुवाच
हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्यायैः शान्तिरुत्तमा ।
दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्नुयात् ॥ २ ॥
भृगुजीने कहा- मुने! अग्निहोत्रसे पापका निवारण किया जाता है, स्वाध्यायसे उत्तम शान्ति मिलती है, दानसे भोगोंकी प्राप्ति बतायी गयी है और तपस्यासे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च ।
सद्भयो यद् दीयते किंचित् तत्परत्रोपतिष्ठते ॥ ३ ॥
असद्भयो दीयते यत्तु तद् दानमिह भुज्यते ।
यादृशं दीयते दानं तादृशं फलमश्नुते ॥ ४ ॥
दान दो प्रकारका बताया जाता है –एक परलोकके लिये है और दूसरा इहलोकके लिये । सत्पुरुषोंको जो कुछ दिया जाता है, वह दान परलोकमें अपना फल देनेके लिये उपस्थित होता है और असत्पुरुषोंको जो दान दिया जाता है, उसका फल यहीं भोगा जाता है । जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही उसका फल भी भोगनेमें आता है ॥ ३-४ ॥ भरद्वाज उवाच
किं कस्य धर्माचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् ।
धर्मः कतिविधो वापि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ५ ॥
भरद्वाजने पूछा — ब्रह्मन्! किसका धर्माचरण कैसा होता है अथवा धर्मका लक्षण क्या है? या धर्मके कितने भेद हैं? यह सब आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ भृगुरुवाच
स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवन्ति मनीषिणः ।
तेषां स्वर्गफलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यते ॥ ६ ॥
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भृगुजीने कहा – मुने! जो मनीषी पुरुष अपने वर्णाश्रमोचित धर्मके आचरणमें सावधानीके साथ लगे रहते हैं, उन्हें स्वर्गरूपी फलकी प्राप्ति होती है । जो इसके विपरीत अधर्मका आचरण करता है, वह मोहके वशीभूत होता है * ॥ ६ ॥
भरद्वाजउवाच
यदेतच्चातुराश्रम्यं ब्रह्मर्षिविहितं पुरा ।
तेषां स्वे स्वे समाचारास्तान् मे वक्तुमिहार्हसि ॥ ७ ॥
भरद्वाज ऋषिने पूछा- भगवन्! ब्रह्मर्षियोंने पूर्वकालमें जो चार आश्रमोंका विभाग किया है, उनके अपने - अपने धर्म क्या हैं? उन्हें बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ७ ॥
भृगुरुवाच भगवता ब्रह्मणा लोकहितमनुतिष्ठता पूर्वमेव I धर्मसंरक्षणार्थमाश्रमाश्चत्वारोऽभिनिर्दिष्टाः तत्र गुरुकुलवासमेवप्रथममाश्रममुदाहरन्ति । सम्यग् यत्र शौचसंस्कारनियमव्रतविनियतात्मा उभे संध्ये भास्कराग्निदेवतान्युपस्थाय विहाय तन्द्र्यालस्ये गुरोरभिवादनवेदाभ्यासश्रवणपवित्रीकृतान्तरात्मा त्रिषवणमुपस्पृश्य ब्रह्मचर्याग्निपरिचरणगुरुशुश्रूषानि - त्यभिक्षाभैक्ष्यादि सर्वनिवेदितान्तरात्मा गुरुवचननि -र्देशानुष्ठानाप्रतिकूलो गुरुप्रसादलब्धस्वाध्यायतत्परः स्यात् ॥ ८ ॥
भृगुजीने कहा – मुने! जगत्का कल्याण करनेवाले भगवान् ब्रह्माने पूर्वकालमें ही धर्मकी रक्षाके लिये चार आश्रमोंका निर्देश किया था। उनमेंसे ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक गुरुकुलवासको ही पहला आश्रम कहते हैं । उसमें रहनेवाले ब्रह्मचारीको बाहर- भीतरकी शुद्धि, वैदिक संस्कार तथा व्रत- नियमोंका पालन करते हुए अपने मनको वशमें रखना चाहिये । सुबह और शाम दोनों संध्याओंके समय संध्योपासना, सूर्योपस्थान और अग्निहोत्रके द्वारा अग्निदेवकी आराधना करनी चाहिये । तन्द्रा और आलस्यको त्यागकर प्रतिदिन गुरुको प्रणाम करे और वेदोंके अभ्यास तथा श्रवणसे अपनी अन्तरात्माको पवित्र करे । सबेरे, शाम और दोपहर तीनों समय स्नान करे । ब्रह्मचर्यका पालन, अग्निकी उपासना और गुरुकी सेवा करे । प्रतिदिन भिक्षा माँगकर लाये । भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, वह सब गुरुको अर्पण कर दे । अपनी अन्तरात्माको भी गुरुके चरणोंमें निछावर कर दे । गुरुजी जो कुछ कहें जिसके लिये संकेत करें और जिस कार्यके निमित्त स्पष्ट शब्दोंमें आज्ञा दें, उसके विपरीत आचरण न करे । गुरुके कृपाप्रसादसे मिले हुए स्वाध्यायमें तत्पर होवे ॥ ८ ॥
भवति चात्र श्लोकः- गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमवाप्नुयात् ।
तस्य स्वर्गफलावाप्तिः सिध्यते चास्य मानसमिति ॥ ९ ॥
इस विषयमें यह श्लोक है—
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जो द्विज गुरुकी आराधना करके वेदाध्ययन करता है, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है और उसका मानसिक संकल्प सिद्ध होता है ॥ ९ ॥
सर्वमनुव्याख्यास्यामःगार्हस्थ्यं खलु । द्वितीयमाश्रमंसमावृत्तानां सदाचाराणांवदन्ति सहधर्मचर्यफलार्थिनातस्य समुदाचारलक्षणंगृहाश्रमो विधीयते I। धर्मार्थकामावाप्तिर्ह्यत्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितेन कर्मणा धनान्यादाय स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षेण वा ब्रह्मर्षिनिर्मितेन वा अद्रिसारगतेन वा हव्यकव्यनियमाभ्यासदैवत-प्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत् । तद्धि सर्वाश्रमाणां मूलमुदाहरन्ति । गुरुकुलनिवासिनः परिव्राजका ये चान्ये एव -प्रवर्तन्तेसंकल्पितव्रतनियम॥ १० ॥ धर्मानुष्ठायिनस्तेषामप्यत भिक्षाबलिसंविभागाः
गार्हस्थ्यको दूसरा आश्रम कहते हैं । अब हम उसमें पालन करने योग्य समस्त उत्तम आचरणोंकी व्याख्या करेंगे। जो सदाचारका पालन करनेवाले ब्रह्मचारी विद्या पढ़कर गुरुकुलसे स्नातक होकर लौटते हैं, उन्हें यदि सहधर्मिणीके साथ रहकर धर्माचरण करने और उसका फल पानेकी इच्छा हो तो उनके लिये गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी विधि है । इस आश्रममें धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी प्राप्ति होती है; इसलिये त्रिवर्गसाधनकी इच्छा रखकर गृहस्थको उत्तम कर्मके द्वारा धन संग्रह करना चाहिये, अर्थात् वह स्वाध्यायसे प्राप्त हुई विशिष्ट योग्यतासे, ब्रह्मर्षियोंद्वारा धर्मशास्त्रोंमें निश्चित किये हुए मार्गसे अथवा पर्वतसे उपलब्ध हुए उसके सारभूत मणि रत्न, दिव्यौषधि एवं स्वर्ण आदिसे धनका संचय करे । अथवा हव्य ( यज्ञ ), कव्य ( श्राद्ध ), नियम, वेदाभ्यास तथा देवताओंकी प्रसन्नतासे प्राप्त धनके द्वारा गृहस्थ पुरुष अपनी गृहस्थीका निर्वाह करे; क्योंकि गृहस्थ आश्रमको सब आश्रमोंका मूल कहते हैं । गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारी, वनमें रहकर संकल्पके अनुसार व्रत, नियम तथा धर्मोंका पालन करनेवाले अन्यान्य वानप्रस्थ एवं सब कुछ त्यागकर सर्वत्र विचरनेवाले संन्यासी भी इस गृहस्थाश्रमसे ही भिक्षा, भेंट, उपहार तथा दान आदि पाकर अपने - अपने धर्मके पालनमें प्रवृत्त होते हैं ॥ १० ॥
वानप्रस्थानां - च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधवः साधुपथ्यौदनाःIस्वाध्यायप्रसङ्गिन स्तीर्थाभिगमनदेशदर्शनार्थं पृथिवीं पर्यटन्ति तेषां प्रत्युत्थानाभिगमनाभिवादनानसूयवाक्प्रदानसुखश-क्त्यासनसुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति ॥ ११ ॥
वानप्रस्थोंके लिये धनका संग्रह करना निषिद्ध है । ये श्रेष्ठ लोग प्रायः शुद्ध एवं हितकर अन्नमात्रके इच्छुक होकर स्वाध्याय, तीर्थयात्रा एवं देश- दर्शनके निमित्त सारी पृथ्वीपर घूमते - फिरते हैं । ये घरपर पधारें तो उठकर, आगे बढ़कर इनका स्वागत करे । इनके चरणोंमें मस्तक झुकावे, दोषदृष्टि न रखकर उनसे उत्तम वचन बोले । यथाशक्ति सुखद आसन दे,
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सुखद शय्यापर उन्हें सुलावे और उत्तम भोजन करावे । इस प्रकार उनका पूर्ण सत्कार करे । यही उन श्रेष्ठ पुरुषके प्रति गृहस्थका कर्तव्य है ॥ ११ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः- अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ।
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ १२ ॥
इस विषयमें ये श्लोक प्रसिद्ध हैं— जिस गृहस्थके दरवाजेसे कोई अतिथि भिक्षा न पानेके कारण निराश होकर लौट जाता है, वह उस गृहस्थको अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ अपि चात्र यज्ञक्रियाभिर्देवताः प्रीयन्ते ।
निवापेन पितरो विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषयः ।
अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति ॥ १३ ॥
इसके सिवा गृहस्थाश्रममें रहकर यज्ञ करनेसे देवता, श्राद्ध - तर्पण करनेसे पितर, वेद- शास्त्रोंके श्रवण, अभ्यास और धारणसे ऋषि तथा संतानोत्पादनसे प्रजापति प्रसन्न होते हैं ॥ १३ ॥
श्लोकौ चात्र भवतः—
वात्सल्यात्सर्वभूतेभ्यो वाच्याः श्रोत्रसुखा गिरः ।
परितापोपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम् ॥ १४ ॥
इस विषयमें ये दो श्लोक प्रसिद्ध हैं- वाणी ऐसी बोलनी चाहिये, जिसमें सब प्राणियोंके प्रति स्नेह भरा हो तथा जो सुनते समय कानोंको सुखद जान पड़े । दूसरोंको पीड़ा देना, मारना और कटुवचन सुनाना — ये सब निन्दित कार्य हैं ॥ १४ ॥
अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव विगर्हितः ।
अहिंसा सत्यमक्रोधः सर्वाश्रमगतं तपः ॥ १५ ॥
किसीका अनादर करना, अहंकार दिखाना और ढोंग करना – इन दुर्गुणोंकी भी विशेष निन्दा की गयी है । किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना और मनमें क्रोध न आने देना — यह सभी आश्रमवालोंके लिये उपयोगी तप है ॥ १५ ॥
अपि चात्र माल्याभरणवस्त्राभ्यङ्गनित्योपभोग-नृत्यगीतवादित्रश्रुतिसुखनयनाभिरामदर्शनानां प्राप्तिर्भ-क्ष्यभोज्यलेह्यपेयचोष्याणामभ्यवहार्याणां विविधानामुपभोगः । स्वविहारसंतोषः कामसुखा--वाप्तिरिति ॥ १६ ॥
इसके सिवा इस गृहस्थ आश्रममें फूलोंकी माला, नाना प्रकारके आभूषण, वस्त्र, अंगराग ( तेल - उबटन ), नित्य उपभोगकी वस्तु, नृत्य, गीत, वाद्य, श्रवणसुखद शब्द और नयनाभिराम रूपके दर्शनकी भी प्राप्ति होती है । भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्यरूप
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नानाप्रकारके भोजनसम्बन्धी पदार्थ खाने -पीनेको भी मिलते हैं । अपने उद्यानमें घूमने-फिरनेका आनन्द प्राप्त होता है और कामसुखकी भी उपलब्धि होती है ॥ १६ ॥
त्रिवर्गगुणनिर्वृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे ।
स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात् ॥ १७ ॥
जिस पुरुषको गृहस्थाश्रममें सदा धर्म, अर्थ और कामके गुणोंकी सिद्धि होती रहती है, वह इस लोकमें सुखका अनुभव करके अन्तमें शिष्ट पुरुषोंकी गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
उञ्छवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्माचरणे रतः ।
त्यक्तकामसुखारम्भः स्वर्गस्तस्य न दुर्लभः ॥ १८ ॥
जो गृहस्थ ब्राह्मण अपने धर्मके आचरणमें तत्पर हो उञ्छवृत्तिसे ( खेत या बाजारमें बिखरे हुए अनाजके एक-एक दानेको बीनकर ) जीविका चलाता है तथा काम- सुखका परित्याग कर देता है, उसके लिये स्वर्ग कोई दुर्लभ वस्तु नहीं है ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ इक्यानबेवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १ ९ १ ॥ * इस श्लोकमें पूर्वोक्त तीनों प्रश्नोंका एक साथ ही सामान्य उत्तर दे दिया गया है । जो जिस वर्ण अथवा आश्रमका है, उसका धर्माचरण भी वैसा ही है । धर्मका लक्षण है— स्वर्गप्राप्ति करानेवाला वर्णाश्रमोचित आचार । वर्ण और आश्रमके जितने भेद हैं, उतने ही उनके धर्मके भी हैं ।
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द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु - भरद्वाज - संवादका उपसंहार भृगुरुवाच वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरन्तः पुण्यानि तीर्थानि नदीप्रस्रवणानि सुविविक्तेष्वरण्येषु मृगमहिषवराहशार्दूवनगजाकीर्णेषु तपस्यन्तोऽनुसंचरन्ति त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधि - फलमूलपर्णपरिमितविचित्रनियताहाराः - -स्थानास निनो भूमिपाषाणसिकताशर्करावालुका भस्म शायिनःकाशकुशचर्मवल्कलसंवृताङ्गाः केश श्मश्रुनखरोमधारिणो नियतकालोपस्पर्शना अस्क- न्दितकालबलिहोमानुष्ठायिनः समित्कुशकुसुमापहा - रसम्मार्जनलब्धविश्रामाः -शीतोष्णवर्षपवनविष्टम्भवि भिन्नसर्वत्वचो विविधनियमोपयोगचर्यानुष्ठानविहि-तपरिशुष्कमांसशोणितत्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्व - योगाच्छरीराण्युद्वहन्ते ॥ १ ॥
भृगुजी कहते हैं - मुने! तीसरे आश्रम वानप्रस्थका पालन करनेवाले मनुष्य धर्मका अनुसरण करते हुए पवित्र तीर्थोंमें, नदियोंके किनारे, झरनोंके आसपास तथा मृग, भैंसे, सूअर, सिंह एवं जंगली हाथियोंसे भरे हुए एकान्त वनोंमें तप करते हुए विचरते रहते हैं । गृहस्थोंके उपभोगमें आनेवाले ग्रामजनोचित सुन्दर वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन और विषयभोगोंका परित्याग करके वे जंगलमें अपने -आप होनेवाले अन्न, फल, मूल तथा पत्तोंका परिमित, विचित्र एवं नियत आहार करते हैं । भूमिपर ही बैठते हैं । जमीन, पत्थर, रेत, कँकरीली मिट्टी, बालू अथवा राखपर ही सोते हैं । काश, कुश, मृगचर्म और वृक्षोंकी छालसे बने वस्त्रोंसे अपना शरीर ढकते हैं । सिरके बाल, दाढ़ी, मूँछ, नख और रोम सदा धारण किये रहते हैं । नियत समयपर स्नान करके निश्चित कालका उल्लंघन न करते हुए बलिवैश्वदेव तथा अग्निहोत्र आदि कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं । सबेरे हवन- पूजनके लिये समिधा, कुशा और फूल आदिका संग्रह करके आश्रमको झाड़- बुहार लेनेके पश्चात् उन्हें कुछ विश्राम मिलता है । सर्दी गर्मी, वर्षा और हवाका वेग सहते - सहते उनके शरीरके चमड़े फट जाते हैं । नाना प्रकारके नियमोंका पालन और सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके रक्त और मांस सूख जाते हैं और शरीरकी जगह चामसे ढँकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह जाता है; फिर भी धैर्य रखकर साहसपूर्वक शरीरका भार ढोते रहते हैं ॥ १ ॥
यस्त्वेतां नियतश्चर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् स दहेदग्निवद्दोषान् जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥ २ ॥
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जो पुरुष नियमके साथ रहकर ब्रह्मर्षियोंद्वारा आचरणमें लायी हुई इस वानप्रस्थ धर्मकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह अग्निकी भाँति अपने दोषोंको भस्म करके दुर्लभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
परिव्राजकानां पुनराचारः - तद्यथा विमुच्याग्नि- धनकलत्रपरिबर्हणं संगेष्वात्मनः समलोष्टाश्मकाञ्चनास्त्रिवर्गप्रवृत्तेष्व-स्नेहपाशानवधूय परिव्रजन्ति सक्तबुद्धयोऽरिमित्रोदासीनानां तुल्यदर्शनाः स्थावर-जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जानां भूतानां बाङ्मनः कर्मभिरनभिद्रोहिणोऽनिकेताः पर्वतपुलिनवृक्षमूलदेवतायतनान्यनुचरन्तो वासार्थमुपेयुर्नगरं ग्रामं वा नगरे पञ्चरात्रिकाः ग्रामे चैकरात्रिकाः प्रविश्य च प्राणधारणार्थं द्विजातीनां भवनान्यसंकीर्णकर्मणामुपतिष्ठेयुः पात्रपतितायाचितभैक्ष्याः कामक्रोधदर्प-लोभमोहकार्पण्यदम्भपरिवादाभिमानहिंसानिवृत्ता इति ॥ ३ ॥
अब संन्यासियोंका आचरण बतलाया जाता है । वह इस प्रकार है— इसमें प्रवेश करनेवाले पुरुष अग्निहोत्र, धन, स्त्री आदि परिवार तथा घरकी सारी सामग्रीका परित्याग करके भोगों और संगोंके प्रति अपनी आसक्तिके बन्धनोंको तोड़कर सदाके लिये घरसे बाहर निकल जाते हैं । ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हैं । धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी प्रवृत्तियोंमें उनकी बुद्धि आसक्त नहीं होती । शत्रु, मित्र और उदासीन — सबके प्रति वे समान दृष्टि रखते हैं । स्थावर, पिण्डज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और कियाओंद्वारा कभी द्रोह नहीं करते हैं, कुटी या मठ बनाकर नहीं रहते हैं । उन्हें चाहिये कि चारों ओर विचरते रहें तथा रात्रिमें ठहरनेके लिये पर्वतकी गुफा, नदीका किनारा, वृक्षकी जड़, देवमन्दिर, नगर अथवा गाँवमें चले जाया करें । नगरमें पाँच रात्रि और गाँवमें एक रातसे अधिक न ठहरें। प्राणधारणके लिये अपने विशुद्ध धर्मोंका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - इन द्विजातियोंके ऐसे घरोंपर जाकर खड़े हो जायँ, जहाँ संकीर्णता न हो । बिना माँगे ही पात्रमें जितनी भिक्षा आ जाय, उतनी ही स्वीकार करें । काम, क्रोध, दर्प, लोभ, मोह, कृपणता, दम्भ, निन्दा, अभिमान तथा हिंसासे सर्वथा दूर रहें ॥ ३ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः- अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः ।
न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ॥ ४ ॥
इस विषयमें ये श्लोक प्रसिद्ध हैं— जो मुनि सब प्राणियोंको अभयदान देकर विचरता है, उसको सम्पूर्ण प्राणियोंमें किसीसे भी कहीं भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।
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विप्रस्तु भैक्ष्योपगतैर्हविर्भि- श्चिताग्निनां स व्रजते हि लोकम् ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण अग्निहोत्रको अपने शरीरमें आरोपित करके शरीरस्थ अग्निके उद्देश्यसे अपने मुखमें प्राप्त भिक्षारूप हविष्यका होम करता है, वह अग्नि- चयन करनेवाले अग्निहोत्रियोंके लोकमें जाता है ॥ ५ ॥
मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितमुक्तबुद्धिः । अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते मनुष्यः ॥ ६ ॥
जो बुद्धिको संकल्परहित करके पवित्र हो शास्त्रोक्त विधिके अनुसार मोक्ष - आश्रम ( संन्यास ) के नियमोंका पालन करता है, वह मनुष्य बिना ईंधनकी आगके समान परम शान्त ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
भरद्वाज उवाच
अस्माल्लोकात् परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते ।
तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ७ ॥
भरद्वाजने पूछा –ब्रह्मन्! इस लोकसे कोई श्रेष्ठ लोक सुना जाता है; किंतु वह देखनेमें नहीं आता । मैं उसे जानना चाहता हूँ, आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥
भृगुरुवाच
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते ।
पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥ ८ ॥
भृगुजीने कहा- मुने! उत्तरदिशामें हिमालयके पार्श्वभागमें, जो सर्वगुणसम्पन्न एवं पुण्यमय प्रदेश है, वहाँके भू- भागपर श्रेष्ठ लोक बताया जाता है, वह पवित्र, कल्याणकारी और कमनीय लोक है ॥ ८ ॥
तत्र ह्यपापकर्माणः शुचयोऽत्यन्तनिर्मलाः ।
लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥ ९ ॥
वहाँ पापकर्मसे रहित, पवित्र, अत्यन्त निर्मल, लोभ और मोहसे शून्य तथा सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित मानव निवास करते हैं ॥ ९ ॥
स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः ।
काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधयो न च ॥ १० ॥
वह देश स्वर्गके तुल्य है । वहाँ सभी शुभ गुणोंकी स्थिति बतायी गयी है । वहाँ समयपर ही मृत्यु होती है । रोग - व्याधि किसीका स्पर्श नहीं करते हैं ॥ १० ॥
न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः ।
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नान्योन्यं बध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः ।
परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते ॥ ११ ॥
वहाँ किसीके मनमें परायी स्त्रियोंके प्रति लोभ नहीं होता । सब लोग अपनी ही स्त्रियोंमें अनुरक्त रहते हैं। वहाँके निवासी धनके लिये एक दूसरेका वध नहीं करते । किसीको बन्धनमें नहीं डालते । उन्हें कभी महान् विस्मय नहीं होता । अधर्मका तो वहाँ नाम भी नहीं है । वहाँ किसीके मनमें संदेह नहीं पैदा होता है ॥ ११ ॥
कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते ।
पानासनाशनोपेताः प्रासादभवनाश्रयाः ॥ १२ ॥
सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः ।
प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते ।
श्रमेण महता केचित् कुर्वन्ति प्राणधारणम् ॥ १३ ॥
वहाँ किये हुए कर्मका फल प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है । उस लोकमें कुछ लोग बड़े - बड़े महलोंमें रहते, अच्छे आसनोंपर बैठते और उत्तमोत्तम वस्तुएँ खाते - पीते हैं । समस्त कामनाओंसे सम्पन्न और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित होते हैं तथा कुछ लोगोंको प्राणधारणमात्रके लिये भोजन प्राप्त होता है, कुछ लोग बड़े परिश्रमसे तपोमय जीवन व्यतीत करते हुए प्राण धारण करते हैं ( इस प्रकार वह लोक इस लोकसे सर्वथा उत्कृष्ट है ) * ॥ १२-१३ ॥
इह धर्मपराः केचित् केचिन्नैकृतिका नराः ।
सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनोऽपरे ॥ १४ ॥
इस मनुष्यलोकमें कुछ मनुष्य धर्मपरायण होते हैं तो कुछ बड़े भारी ठग निकलते हैं । इसीलिये कोई सुखी और कोई दुखी होते हैं । कुछ धनवान् और कुछ लोग निर्धन हो जाते हैं ॥ १४ ॥
इह श्रमो भयं मोहः क्षुधा तीव्रा च जायते ।
लोभश्चार्थकृतो नृणां येन मुह्यन्त्यपण्डिताः ॥ १५ ॥
इहलोकमें श्रम, भय, मोह और तीव्र भूखका कष्ट होता है। मनुष्योंमें धनका लोभ विशेष होता है, जिससे अज्ञानी पुरुष मोहमें पड़ जाते हैं ॥ १५ ॥
इह वार्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कारिणः ।
यस्तद्वेदोभयं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते ॥ १६ ॥
इस देशमें धर्म और अधर्म करनेवाले मनुष्योंके विषयमें नाना प्रकारकी बातें सुनी जाती हैं । जो धर्म और अधर्म दोनोंके परिणामको जानता है, वह विद्वान् पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ १६ ॥
सोपधं निकृतिः स्तेयं परीवादो ह्यसूयिता ।
परोपघातो हिंसा च पैशुन्यमनृतं तथा ॥ १७ ॥