श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1251–1260

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1251–1260

पृष्ठ 1251

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ध्यानयोगको जाननेवाला साधक ऐसे विक्षेपके समय खेद या क्लेशका अनुभव न करे; अपितु आलस्य और मात्सर्यका त्याग करके ध्यानके द्वारा मनको पुनः एकाग्र करनेका प्रयत्न करे ॥ १४ ॥

विचारश्च विवेकश्च वितर्कश्चोपजायते ।

मुनेः समादधानस्य प्रथमं ध्यानमादितः ॥ १५ ॥

योगी जब ध्यानका आरम्भ करता है, तब पहले उसके मनमें ध्यानविषयक विचार, विवेक और वितर्क आदि प्रकट होते हैं ॥ १५ ॥

मनसा क्लिश्यमानस्तु समाधानं च कारयेत् ।

न निर्वेदं मुनिर्गच्छेत् कुर्यादिवात्मनो हितम् ॥ १६ ॥

ध्यानके समय मनमें कितना ही क्लेश क्यों न हो, साधकको उससे ऊबना नहीं चाहिये; बल्कि और भी तत्परताके साथ मनको एकाग्र करनेका प्रयत्न करना चाहिये । ध्यानयोगी मुनिको सर्वथा अपने कल्याणका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ १६ ॥

पांसुभस्मकरीषाणां यथा वै राशयश्चिताः ।

सहसा वारिणासिक्ता न यान्ति परिभावनम् ॥ १७ ॥

किञ्चित् स्निग्धं यथा चस्याच्छुष्कचूर्णमभावितम् ।

क्रमशस्तु शनैर्गच्छेत् सर्वं तत्परिभावनम् ॥ १८ ॥

एवमेवेन्द्रियग्रामं शनैः सम्परिभावयेत् ।

संहरेत् क्रमशश्चैव स सम्यक् प्रशमिष्यति ॥ १ ९ ॥

जैसे धूलि, भस्म और सूखे गोबरके चूर्णकी अलग- अलग इकट्ठी की हुई ढेरियोंपर जल छिड़का जाय तो वे सहसा जलसे भीगकर इतनी तरल नहीं हो सकतीं कि उनके द्वारा कोई आवश्यक कार्य किया जा सके; क्योंकि बार- बार भिगोये बिना वह सूखा चूर्ण थोड़ा - सा भीगता है, पूरा नहीं भीगता; परंतु उसको यदि बार- बार जल देकर क्रमसे भिगोया जाय तो धीरे- धीरे वह सब गीला हो जाता है, उसी प्रकार योगी विषयोंकी ओर बिखरी हुई इन्द्रियोंको धीरे- धीरे विषयोंकी ओरसे समेटे और चित्तको ध्यानके अभ्याससे क्रमशः स्नेहयुक्त बनावे । ऐसा करनेपर वह चित्त भलीभाँति शान्त हो जाता है ॥ १७-१९ ॥

स्वयमेव मनश्चैवं पञ्चवर्गं च भारत ।

पूर्वं ध्यानपथे स्थाप्य नित्ययोगेन शाम्यति ॥ २० ॥

भरतनन्दन! ध्यानयोगी पुरुष स्वयं ही मन और पाँचों इन्द्रियोंको पहले ध्यानमार्गमें स्थापित करके नित्य किये हुए योगाभ्यासके बलसे शान्ति प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥

न तत्पुरुषकारेण न च दैवेन केनचित् ।

सुखमेष्यति तत् तस्य यदेवं संयतात्मनः ॥ २१ ॥

इस प्रकार मनोनिग्रहपूर्वक ध्यान करनेवाले योगीको जो दिव्य सुख प्राप्त होता है, वह मनुष्यको किसी दूसरे पुरुषार्थसे या दैवयोगसे भी नहीं मिल सकता ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1252

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सुखेन तेन संयुक्तो रंस्यते ध्यानकर्मणि ।

गच्छन्ति योगिनो ह्येवं निर्वाणं तन्निरामयम् ॥ २२ ॥

उस ध्यानजनित सुखसे सम्पन्न होकर योगी उस ध्यानयोगमें अधिकाधिक अनुरक्त होता जाता है । इस प्रकार योगीलोग दुःख - शोकसे रहित निर्वाण ( मोक्ष ) पदको प्राप्त हो जाते हैं ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ध्यानयोगकथने पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ध्यानयोगका वर्णनविषयक एक सौ पञ्चानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९५ ॥

पृष्ठ 1253

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षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल युधिष्ठिरउवाच

चातुराश्रम्यमुक्तं ते राजधर्मास्तथैव च ।

नानाश्रयाश्च बहव इतिहासाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आपने चार आश्रमों तथा राजधर्मोंका वर्णन किया एवं अनेकानेक विषयोंसे सम्बन्ध रखनेवाले बहुत - से भिन्न -भिन्न इतिहास भी सुनाये ॥ १ ॥

श्रुतास्त्वत्तः कथाश्चैव धर्मयुक्ता महामते ।

संदेहोऽस्ति तु कश्चिन्मे तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ २ ॥

महामते! मैंने आपके मुखसे अनेक धर्मयुक्त कथाएँ सुनी हैं; फिर भी मेरे मनमें एक संदेह रह गया है, उसे आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

जापकानां फलावाप्तिं श्रोतुमिच्छामि भारत ।

किंफलं जपतामुक्तं क्व वा तिष्ठन्ति जापकाः ॥ ३ ॥

भरतनन्दन! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जप करनेवालोंको फलकी प्राप्ति कैसे होती है? जापकोंके जपका फल क्या बताया गया है अथवा जप करनेवाले पुरुष किन लोकोंमें स्थान पाते हैं? ॥ ३ ॥

जप्यस्य च विधिं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि मेऽनघ ।

जापका इति किञ्चैतत् सांख्ययोगक्रियाविधिः ॥ ४ ॥

अनघ! आप मुझे जपकी सम्पूर्ण विधि भी बताइये । 'जापक ' इस पदसे क्या तात्पर्य है? क्या यह सांख्ययोग, ध्यानयोग अथवा क्रियायोगका अनुष्ठान है? ॥ ४ ॥

किं यज्ञविधिरेवैष किमेतज्जप्यमुच्यते ।

एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ ५ ॥

अथवा यह जप भी कोई यज्ञकी ही विधि है? जिसका जप किया जाता है, वह क्या वस्तु है? आप यह सारी बातें मुझे बताइये; क्योंकि आप मेरी मान्यताके अनुसार सर्वज्ञ हैं ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

यमस्य यत् पुरावृत्तं कालस्य ब्राह्मणस्य च ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1254

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भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें विद्वान् पुरुष उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो पूर्वकालमें यम, काल और ब्राह्मणके बीचमें घटित हुआ था ॥ ६ ॥

सांख्ययोगौ तु यायुक्त मुनिभिर्मोक्षदर्शिभिः ।

संन्यास एव वेदान्ते वर्तते जपनं प्रति ॥ ७ ॥

मोक्षदर्शी मुनियोंने जो सांख्य और योगका वर्णन किया है, उनमेंसे वेदान्त ( सांख्य) -में तो जपका संन्यास ( त्याग) ही बताया गया है ॥ ७ ॥

वेदवादाश्च निर्वृत्ताः शान्ता ब्रह्मण्यवस्थिताः ।

सांख्ययोगौ तु यायुक्तौ मुनिभिः समदर्शिभिः ॥ ८ ॥

मार्गौ तावप्युभावेतौ संश्रितौ न च संश्रितौ । उपनिषदोंके वाक्य निर्वृत्ति ( परमानन्द ), शान्ति तथा ब्रह्मनिष्ठताका बोध करानेवाले हैं ( अतः वहाँ जपकी अपेक्षा नहीं है ) । समदर्शी मुनियोंने जो सांख्य और योग बताये हैं, वे दोनों मार्ग चित्तशुद्धिके द्वारा ज्ञानप्राप्तिमें उपकारक होनेसे जपका आश्रय लेते हैं, नहीं भी लेते हैं ॥ ८३ ॥

यथा संश्रूयते राजन् कारणं चात्र वक्ष्यते ॥ ९ ॥

मनःसमाधिरत्रापि तथेन्द्रियजयः स्मृतः । राजन्! यहाँ जैसा कारण सुना जाता है, वैसा आगे बताया जायगा । सांख्य और योग -इन दोनों मार्गोंमें भी मनोनिग्रह और इन्द्रियसंयम आवश्यक माने गये हैं ॥ ९ ३ ॥ सत्यमग्निपरीचारो विविक्तानां च सेवनम् ॥ १० ॥

ध्यानं तपो दमः क्षान्तिरनसूया मिताशनम् ।

विषयप्रतिसंहारो मितजल्पस्तथा शमः ॥ ११ ॥

एष प्रवर्तको यज्ञो निवर्तकमथो शृणु ।

यथा निवर्तते कर्म जपतो ब्रह्मचारिणः ॥ १२ ॥

सत्य, अग्निहोत्र, एकान्तसेवन, ध्यान तपस्या, दम, क्षमा, अनसूया, मिताहार, विषयोंका संकोच, मितभाषण तथा शम — यह प्रवर्तक यज्ञ है । अब निवर्तक यज्ञका वर्णन सुनो; जिसके अनुसार जप करनेवाले ब्रह्मचारी साधकके सारे कर्म निवृत्त हो जाते हैं ( अर्थात् उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है ) ॥ १०-१२ ॥

एतत् सर्वमशेषेण यथोक्तं परिवर्तयेत् ।

निवृत्तं मार्गमासाद्य व्यक्ताव्यक्तमनाश्रयम् ॥ १३ ॥

इन मनोनिग्रह आदि पूर्वोक्त सभी साधनोंका निष्कामभावसे अनुष्ठान करके उन्हें प्रवृत्तिके विपरीत निवृत्तिमार्गमें बदल डाले । निवृत्तिमार्ग तीन तरहका है— व्यक्त, अव्यक्त और अनाश्रय, उस मार्गका आश्रय लेकर स्थिरचित्त हो जाय ॥ १३ ॥

कुशोच्चयनिषण्णः सन् कुशहस्तः कुशैः शिखी ।

पृष्ठ 1255

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कुशैः परिवृतस्तस्मिन् मध्ये छन्नः कुशैस्तथा ॥ १४ ॥

निवृत्तिमार्गपर पहुँचनेकी विधि यह है -जपकर्ताको कुशासनपर बैठना चाहिये । उसे अपने हाथमें भी कुश रखना चाहिये । शिखामें भी कुश बाँध लेना चाहिये, वह कुशोंसे घिरकर बैठे और मध्यभागमें भी कुशोंसे आच्छादित रहे ॥ १४ ॥

विषयेभ्यो नमस्कुर्याद् विषयान्न च भावयेत् ।

साम्यमुत्पाद्य मनसा मनस्येव मनो दधत् ॥ १५ ॥

विषयोंको दूरसे ही नमस्कार करे और कभी उनका अपने मनमें चिन्तन न करे । मनसे समताकी भावना करके मनका मनमें ही लय करे ॥ १५ ॥

तद् धिया ध्यायति ब्रह्म जपन् वै संहिताम् हिताम् ।

संन्यस्यत्यथवा तां वै समाधौ पर्यवस्थितः ॥ १६ ॥

फिर बुद्धिके द्वारा परब्रह्म परमात्माका ध्यान करे तथा सर्व-हितकारिणी वेदसंहिताका एवं प्रणव और गायत्री मन्त्रका जप करे । फिर समाधिमें स्थित होनेपर उस संहिता एवं गायत्री मन्त्र आदिके जपको भी त्याग दे ॥

ध्यानमुत्पादयत्यत्र संहिताबलसंश्रयात् ।

शुद्धात्मा तपसा दान्तो निवृत्तद्वेषकामवान् ॥ १७ ॥

अरागमोहो निर्द्वन्द्वो न शोचति न सज्जते ।

न कर्ता कारणानां च न कार्याणामिति स्थितिः ॥ १८ ॥

संहिताके जपसे जो बल प्राप्त होता है, उसका आश्रय लेकर साधक अपने ध्यानको सिद्ध कर लेता है । वह शुद्धचित्त होकर तपके द्वारा मन और इन्द्रियोंको जीत लेता है तथा द्वेष और कामनासे रहित एवं आसक्ति और मोहसे रहित हुआ शीत और उष्ण आदि समस्त द्वन्द्वोंसे अतीत हो जाता है । अतः वह न तो कभी शोक करता है और न कहीं भी आसक्त होता है । वह कर्मोंका कारण और कार्यका कर्ता नहीं होता ( अर्थात् अपनेमें कर्तापनका अभिमान नहीं लाता है ) ॥

न चाहङ्कारयोगेन मनः प्रस्थापयेत् क्वचित् ।

न चार्थग्रहणे युक्तो नावमानी न चाक्रियः ॥ १९ ॥

वह अहंकारसे मुक्त होकर कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता है । वह न तो स्वार्थ-साधनमें संलग्न होता है, न किसीका अपमान करता है और न अकर्मण्य होकर ही बैठता है ॥ १ ९ ॥

ध्यानक्रियापरो युक्तो ध्यानवान् ध्याननिश्चयः ।

ध्याने समाधिमुत्पाद्य तदपि त्यजति क्रमात् ॥ २० ॥

वह ध्यानरूप क्रियामें ही नित्य तत्पर रहता है, ध्याननिष्ठ हो ध्यानके द्वारा ही तत्त्वका निश्चय कर लेता है, ध्यानमें समाधिस्थ होकर क्रमशः ध्यानरूप क्रियाका भी त्याग कर देता है ॥ २० ॥

पृष्ठ 1256

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स वै तस्यामवस्थायां सर्वत्यागकृतः सुखम् ।

निरिच्छस्त्यजति प्राणान् ब्राह्मीं संविशते तनुम् ॥ २१ ॥

वह उस अवस्थामें स्थित हुआ योगी निस्संदेह सर्वत्यागरूप निर्बीज समाधिसे प्राप्त होनेवाले दिव्य परमानन्दका अनुभव करता है । वह योगजनित अणिमा आदि सिद्धियोंकी भी इच्छा न रखकर सर्वथा निष्काम हो प्राणोंका परित्याग कर देता है और विशुद्ध परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रवेश कर जाता है ॥ २१ ॥

अथवा नेच्छते तत्र ब्रह्मकायनिषेवणम् ।

उत्क्रामति च मार्गस्थो नैव क्वचन जायते ॥ २२ ॥

अथवा यदि वह परब्रह्मका सायुज्य नहीं प्राप्त करना चाहता तो देवयानमार्गपर स्थित हो ऊपरके लोकोंमें गमन करता है, अर्थात् परब्रह्म परमात्माके परम धाममें चला जाता है । पुनः इस संसारमें कहीं जन्म नहीं लेता ॥

आत्मबुद्धया समास्थाय शान्तीभूतो निरामयः ।

अमृतं विरजः शुद्धमात्मानं प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥

आत्मस्वरूपका बोध हो जानेसे वह रजोगुणसे रहित निर्मल शान्तस्वरूप योगी अमृतस्वरूप विशुद्ध आत्माको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ६ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ छानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९६ ॥

पृष्ठ 1257

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सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः जापकमें दोष आनेके कारण उसे नरककी प्राप्ति युधिष्ठिर उवाच

गतीनामुत्तमा प्राप्तिः कथितां जापकेष्विह ।

एकैवैषा गतिस्तेषामुत यान्त्यपरामपि ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आपने यहाँ जापकोंके लिये गतियोंमें उत्तम गतिकी प्राप्ति बतायी है । क्या उनके लिये एकमात्र यही गति है? या वे किसी दूसरी गतिको भी प्राप्त होते हैं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् जापकानां गतिं विभो ।

यथा गच्छन्ति निरयाननेकान् पुरुषर्षभ ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! तुम सावधान होकर जापकोंकी गतिका वर्णन सुनो । प्रभो! पुरुषप्रवर! अब मैं यह बता रहा हूँ कि वे किस तरह नाना प्रकारके नरकोंमें पड़ते हैं* ॥ २ ॥

यथोक्तपूर्वं पूर्वं यो नानुतिष्ठति जापकः ।

एकदेशक्रियश्चात्र निरयं स च गच्छति ॥ ३ ॥

जो जापक जैसा पहले बताया गया है, उसी तरह नियमोंका ठीक -ठीक पालन नहीं करता, एकदेशका ही अनुष्ठान करता है अर्थात् किसी एक ही नियमका पालन करता है, वह नरकमें पड़ता है ॥ ३ ॥

अवमानेन कुरुते न प्रीयति न हृष्यति ।

ईदृशो जापको याति निरयं नात्र संशयः ॥ ४ ॥

जो अवहेलनापूर्वक जप करता है, उसके प्रति प्रेम या प्रसन्नता नहीं प्रकट करता है, ऐसा जापक भी निःसंदेह नरकमें ही पड़ता है ॥ ४ ॥

अहङ्कारकृतश्चैव सर्वे निरयगामिनः ।

परावमानी पुरुषो भविता निरयोपगः ॥ ५ ॥

जपके कारण अपनेमें बड़प्पनका अभिमान करनेवाले सभी जापक नरकगामी होते हैं । दूसरोंका अपमान करनेवाला जापक भी नरकमें ही पड़ता है ॥ ५ ॥

अभिध्यापूर्वकं जप्यं कुरुते यश्च मोहितः ।

यत्राभिध्यां स कुरुते तं वै निरयमृच्छति ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1258

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जो मोहित हो फलकी इच्छा रखकर जप करता है, वह जिस फलका चिन्तन करता है, उसीके उपयुक्त नरकमें पड़ता है ॥ ६ ॥

अथैश्वर्यप्रवृत्तेषु जापकस्तत्र रज्यते ।

स एव निरयस्तस्य नासौ तस्मात् प्रमुच्यते ॥ ७ ॥

यदि जप करनेवाले साधकको अणिमा आदि ऐश्वर्य प्राप्त हों और वह उनमें अनुरक्त हो जाय तो वह ही उसके लिये नरक है, वह उससे छुटकारा नहीं पाता है ॥

रागेण जापको जप्यं कुरुते तत्र मोहितः ।

यत्रास्य रागः पतति तत्र तत्रोपपद्यते ॥ ८ ॥

जो जापक मोहके वशीभूत हो विषयासक्तिपूर्वक जप करता है, वह जिस फलमें उसकी आसक्ति होती है, उसीके अनुरूप शरीरको प्राप्त होता है । इस प्रकार उसका पतन हो जाता है ॥ ८ ॥

दुर्बुद्धिरकृतप्रज्ञश्चले मनसि तिष्ठति ।

चलामेव गतिं याति निरयं वा नियच्छति ॥ ९ ॥

जिसकी बुद्धि भोगोंमें आसक्तिके कारण दूषित है तथा जो विवेकशील नहीं है, वह जापक यदि मनके चंचल रहते हुए ही जप करता है तो विनाशशील गतिको प्राप्त होता है अथवा नरकमें गिरता है । अर्थात् विनाशशील या स्वर्गादि विचलित स्वभाववाले लोकोंको प्राप्त होता है या तिर्यक् - योनियोंमें जाता है ॥ ९ ॥

अकृतप्रज्ञको बालो मोहं गच्छति जापकः ।

स मोहान्निरयं याति तत्र गत्वानुशोचति ॥ १० ॥

जो विवेकशून्य मूढ़ जापक मोहग्रस्त हो जाता है, वह उस मोहके कारण नरकमें गिरता है और उसमें गिरकर निरन्तर शोकमग्न रहता है ॥ १० ॥

दृढग्राही करोमीति जाप्यं जपति जापकः ।

न सम्पूर्णो न संयुक्तो निरयं सोऽनुगच्छति ॥ ११ ॥

' मैं निश्चय ही जपका अनुष्ठान पूरा करूंगा, ' ऐसा दृढ़ आग्रह रखकर जो जापक जपमें प्रवृत्त होता है, परंतु न तो उसमें अच्छी तरह संलग्न होता है और न उसे पूरा ही कर पाता है, वह नरकमें गिरता है ॥ ११ ॥

युधिष्ठिरउवाच

अनिवृत्तं परं यत्तदव्यक्तं ब्रह्मणि स्थितम् ।

तद्भूतो जापकः कस्मात् स शरीरमिहाविशेत् ॥ १२ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- जो कभी निवृत्त न होनेवाला सनातन अव्यक्त ब्रह्म है, उस गायत्रीके जपमें स्थित रहने - वाला एवं उससे भावित हुआ जापक किस कारणसे यहाँ शरीरमें प्रवेश करता है अर्थात् पुनर्जन्म ग्रहण करता है? ॥

पृष्ठ 1259

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भीष्म उवाच

दुष्प्रज्ञानेन निरया बहवः समुदाहृताः ।

प्रशस्तं जापकत्वं च दोषाश्चैते तदात्मकाः ॥ १३ ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! काम आदिसे बुद्धि दूषित होनेके कारण ही उसके लिये बहुत - से नरकोंकी प्राप्ति अर्थात् नाना योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेकी बात कही गयी है । जापक होना तो बहुत उत्तम है । वे उपर्युक्त राग आदि दोष तो उसमें दूषित बुद्धिके कारण ही आते हैं ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ७ ॥ FUEL O FUTE * इस प्रकरणमें पुनर्जन्मको ही नरकके नामसे कहा गया है । यह बात छठे और सातवें श्लोकके वर्णनसे स्पष्ट हो जाती

पृष्ठ 1260

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अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः परमधामके अधिकारी जापकके लिये देवलोक भी नरक - तुल्य हैं - इसका प्रतिपादन युधिष्ठिर उवाच

कीदृशं निरयं याति जापको वर्णयस्व मे ।

कौतूहलं हि राजन् मे तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- दादाजी! जप करनेवालेको उसके दोषोंके कारण किस तरहके नरककी प्राप्ति होती है? उसका मुझसे वर्णन कीजिये । राजन्! उसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है; अतः आप अवश्य बतावें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

धर्मस्यांशप्रसूतोऽसि धर्मिष्ठोऽसि स्वभावतः ।

धर्ममूलाश्रयं वाक्यं शृणुष्वावहितोऽनघ ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा – अनघ! तुम धर्मके अंशसे उत्पन्न हुए हो और स्वभावसे ही धर्मनिष्ठ हो; अतः सावधान होकर धर्मके मूलभूत वेद और परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली मेरी बात सुनो ॥ २ ॥

अमूनि यानि स्थानानि देवानां परमात्मनाम् ।

नानासंस्थानवर्णानि नानारूपफलानि च ॥ ३ ॥

दिव्यानि कामचारीणि विमानानि सभास्तथा ।

आक्रीडा विविधा राजन् पद्मिन्यश्चैव काञ्चनाः ॥ ४ ॥

परम बुद्धिमान् देवताओंके ये जो स्थान बताये जाते हैं, उनके रूप-रंग अनेक प्रकारके हैं। फल भी नाना प्रकारके हैं । देवताओंके यहाँ इच्छानुसार विचरनेवाले दिव्य विमान तथा दिव्य सभाएँ होती हैं । राजन्! उनके यहाँ नाना प्रकारके क्रीडास्थल तथा सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित बावलियाँ होती हैं ॥ ३-४ ॥

चतुर्णां लोकपालानां शुक्रस्याथ बृहस्पतेः ।

मरुतां विश्वदेवानां साध्यानामश्विनोरपि ॥ ५ ॥

रुद्रादित्यवसूनां च तथान्येषां दिवौकसाम् ।

एते वै निरयास्तात स्थानस्य परमात्मनः ॥ ६ ॥