05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1271–1280
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1271–1280
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वाग्वज्रा ब्राह्मणाः प्रोक्ताः क्षत्रिया बाहुजीविनः ।
वाग्युद्धं तदिदं तीव्रं मम विप्र त्वया सह ॥ ४६ ॥
राजाने कहा – विप्रवर! ब्राह्मणोंकी वाणी ही वज्रके समान प्रभाव डालनेवाली होती है और क्षत्रिय बाहुबलसे जीवन - निर्वाह करनेवाले होते हैं । अतः आपके साथ मेरा यह तीव्र वाग्युद्ध उपस्थित हुआ है ॥ ब्राह्मणउवाच
सैवाद्यापि प्रतिज्ञा मे स्वशक्त्या किं प्रदीयताम् ।
ब्रूहि दास्यामि राजेन्द्र विभवे सति मा चिरम् ॥ ४७ ॥
ब्राह्मणने कहा— राजेन्द्र! मेरी वही प्रतिज्ञा इस समय भी है । मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपको क्या दूँ? बोलिये, विलम्ब न कीजिये । मैं शक्ति रहते आपको मुँहमाँगी वस्तु अवश्य प्रदान करूँगा ॥ ४७ ॥
राजोवाच
यत्तद् वर्षशतं पूर्णं जप्यं वै जपता त्वया ।
फलं प्राप्तं तत् प्रयच्छ मम दित्सुर्भवान् यदि ॥ ४८ ॥
राजाने कहा – मुने! यदि आप देना ही चाहते हैं तो पूरे सौ वर्षोंतक जप करके आपने जिस फलको प्राप्त किया है, वही मुझे दे दीजिये ॥ ४८ ॥
ब्राह्मणउवाच
परमं गृह्यतां तस्य फलं यज्जपितं मया ।
अर्धं त्वमविचारेण फलं तस्य ह्यवाप्नुहि ॥ ४ ९ ॥
अथवा सर्वमेवेह मामकं जापकं फलम् ।
राजन् प्राप्नुहि कामं त्वं यदि सर्वमिहेच्छसि ॥ ५० ॥
ब्राह्मणने कहा — राजन्! मैंने जो जप किया है उसका उत्तम फल आप ग्रहण करें । मेरे झपका आधा फल तो आप बिना विचारे ही प्राप्त करें अथवा यदि आप मेरेद्वारा किये हुए जपका सारा ही फल लेना चाहते हों तो अवश्य अपनी इच्छाके अनुसार वह सब प्राप्त कर लें ॥ ४ ९ -५० || राजोवाच
कृतं सर्वेण भद्रं ते जप्यं यद् याचितं मया ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि किञ्च तस्य फलं वद ॥ ५१ ॥
राजाने कहा — ब्रह्मन्! मैंने जो जपका फल माँगा है, उन सबकी पूर्ति हो गयी । आपका भला हो, कल्याण हो । मैं चला जाऊँगा; किंतु यह तो बता दीजिये कि उसका फल क्या है? ॥ ५१ ॥
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ब्राह्मणउवाच
फलप्राप्तिं न जानामि दत्तं यज्जपितं मया ।
अयं धर्मश्च कालश्च यमो मृत्युश्च साक्षिणः ॥ ५२ ॥
ब्राह्मणने कहा — राजन्! इस जपका फल क्या मिलेगा? इसको मैं नहीं जानता; परंतु मैंने जो कुछ जप किया था, वह सब आपको दे दिया । ये धर्म, यम, मृत्यु और काल इस बातके साक्षी हैं ॥ ५२ ॥
राजोवाच अज्ञातमस्य धर्मस्य फलं किं मे करिष्यति ।
फलं ब्रवीषि धर्मस्य न चेज्जप्यकृतस्य माम् ।
प्राप्नोतु तत् फलं विप्रो नाहमिच्छे ससंशयम् ॥ ५३ ॥
राजाने कहा —ब्रह्मन्! यदि आप मुझे अपने जपजनित धर्मका फल नहीं बता रहे हैं तो इस धर्मका अज्ञात फल मेरे किस काम आयेगा? वह सारा फल आपहीके पास रहे । मैं संदिग्ध फल नहीं चाहता ॥ ५३ ॥
ब्राह्मणउवाच
नाददेऽपरवक्तव्यं दत्तं चास्य फलं मया ।
वाक्यं प्रमाणं राजर्षे ममाद्य तव चैव हि ॥ ५४ ॥
ब्राह्मणने कहा — राजर्षे! अब तो मैं अपने जपका फल दे चुका; अतः दूसरी कोई बात नहीं स्वीकार करूंगा । इस विषयमें आज मेरी और आपकी बातें ही प्रमाणस्वरूप हैं ( हम दोनोंको अपनी- अपनी बातोंपर दृढ़ रहना चाहिये ) ॥ ५४ ॥
नाभिसंधिर्मया जप्ये कृतपूर्वः कदाचन ।
जप्यस्य राजशार्दूल कथं वेत्स्याम्यहं फलम् ॥ ५५ ॥
राजसिंह! मैंने जप करते समय कभी फलकी कामना नहीं की थी; अतः इस जपका क्या फल होगा, यह कैसे जान सकूँगा? ॥ ५५ ॥
ददस्वेति त्वया चोक्तं ददानीति मया तथा ।
न वाचं दूषयिष्यामि सत्यं रक्ष स्थिरो भव ॥ ५६ ॥
- आपने कहा था कि ‘ दीजिये ' और मैंने कहा था कि 'दूँगा' – ऐसी दशामें मैं अपनी बात झूठी नहीं करूँगा । आप सत्यकी रक्षा कीजिये और इसके लिये सुस्थिर हो जाइये ॥ ५६ ॥
अथैवं वदतो मेऽद्य वचनं न करिष्यसि ।
महानधर्मो भविता तव राजन् मृषा कृतः ॥ ५७ ॥
राजन्! यदि इस तरह स्पष्ट बात करनेपर भी आप आज मेरे वचनका पालन नहीं करेंगे तो आपको असत्यका महान् पाप लगेगा ॥ ५७ ॥
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न युक्तं तु मृषा वाणी त्वया वक्तुमरिंदम ।
तथा मयाप्यभिहितं मिथ्या कर्तुं न शक्यते ॥ ५८ ॥
शत्रुदमन नरेश! आपके लिये भी झूठ बोलना उचित नहीं है और मैं भी अपनी कही हुई बातको मिथ्या नहीं कर सकता ॥ ५८ ॥
संश्रुतं च मया पूर्वं ददानीत्यविचारितम् ।
तद् गृह्णीष्वाविचारेण यदि सत्ये स्थितो भवान् ॥ ५ ९ ॥
मैंने बिना कुछ सोच - विचार किये ही पहले देनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; अतः आप भी बिना विचारे मेरा दिया हुआ जप ग्रहण करें । यदि आप सत्यपर दृढ़ हैं तो आपको ऐसा अवश्य करना चाहिये ॥ ५ ९ ॥
इहागम्य हि मां राजन् जाप्यं फलमयाचथाः ।
तन्मे निसृष्टं गृह्णीष्व भव सत्ये स्थिरोऽपि च ॥ ६० ॥
राजन्! आपने स्वयं यहाँ आकर मुझसे जपके फलकी याचना की है और मैंने उसे आपके लिये दे दिया है; अतः आप उसे ग्रहण करें और सत्यपर डटे रहें ॥
नायं लोकोऽस्ति न परो न च पूर्वान् स तारयेत् ।
कुत एव जनिष्यांस्तु मृषावादपरायणः ॥ ६१ ॥
जो'झूठ बोलनेवाला है, उस मनुष्यको न इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही । वह अपने पूर्वजोंको भी नहीं तार सकता; फिर भविष्यमें होनेवाली संततिका उद्धार तो कर ही कैसे सकता है? ॥
न यज्ञाध्ययने दानं नियमास्तारयन्ति हि ।
यथा सत्यं परे लोके तथेह पुरुषर्षभ ॥ ६२ ॥
पुरुषश्रेष्ठ! परलोकमें सत्य जिस प्रकार जीवोंका उद्धार करता है, उस प्रकार यज्ञ, वेदाध्ययन, दान और नियम भी नहीं तार सकते हैं ॥ ६२ ॥
तपांसि यानि चीर्णानि चरिष्यन्ति च यत् तपः ।
शतैः शतसहस्रैश्च तैः सत्यान्न विशिष्यते ॥ ६३ ॥
लोगोंने अबतक जितनी तपस्याएँ की हैं और भविष्यमें भी जितनी करेंगे, उन सबको सौगुना या लाखगुना करके एकत्र किया जाय तो भी उनका महत्त्व सत्यसे बढ़कर नहीं सिद्ध होगा ॥ ६३ ॥
सत्यमेकाक्षरं ब्रह्म सत्यमेकाक्षरं तपः ।
सत्यमेकाक्षरो यज्ञः सत्यमेकाक्षरं श्रुतम् ॥ ६४ ॥
सत्य ही एकमात्र अविनाशी ब्रह्म है । सत्य ही एकमात्र अक्षय तप है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी यज्ञ है, सत्य ही एकमात्र नाशरहित सनातन वेद है ॥ ६४ ॥
सत्यं वेदेषु जागार्ति फलं सत्ये परं स्मृतम् ।
सत्याद् धर्मो दमश्चैव सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ६५ ॥
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वेदोंमें सत्य ही जागता है— उसीकी महिमा बतायी गयी है । सत्यका ही सबसे श्रेष्ठ फल माना गया है । धर्म और इन्द्रिय- संयमकी सिद्धि भी सत्यसे ही होती है । सत्यके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ॥ ६५ ॥
सत्यं वेदास्तथाङ्गानि सत्यं विद्यास्तथा विधिः ।
व्रतचर्या तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च ॥ ६६ ॥
सत्य ही वेद और वेदांग है । सत्य ही विद्या तथा विधि है । सत्य ही व्रतचर्या तथा सत्य ही ओंकार है ॥ ६६ ॥
प्राणिनां जननं सत्यं सत्यं संततिरेव च ।
सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः ॥ ६७ ॥
सत्य प्राणियोंको जन्म देनेवाला ( पिता ) है, सत्य ही संतति है, सत्यसे ही वायु चलती है और सत्यसे ही सूर्य तपता है ॥ ६७ ॥
सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः ।
सत्यं यज्ञस्तपो वेदाः स्तोभा मन्त्राः सरस्वती ॥ ६८ ॥
सत्यसे ही आग जलती है तथा सत्यपर ही स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है । यज्ञ, तप, वेद, स्तोभ, मन्त्र और सरस्वती - सब सत्यके ही स्वरूप हैं ॥ ६८ ॥
तुलामारोपितो धर्मः सत्यं चैवेति नः श्रुतम् ।
समकक्षां तुलयतो यतः सत्यं ततोऽधिकम् ॥ ६ ९ ॥
मैंने सुना है कि किसी समय धर्म और सत्यको तराजूपर, जिसके दोनों पलड़े बराबर थे, रखा और तौला गया; उस समय जिस ओर सत्य था, उधरका ही पलड़ा भारी हुआ ॥ ६ ९ ॥
यतो धर्मस्ततः सत्यं सर्वं सत्येन वर्धते ।
किमर्थमनृतं कर्म कर्तुं राजंस्त्वमिच्छसि ॥ ७० ॥
जहाँ धर्म है वहाँ सत्य है । सत्यसे ही सबकी वृद्धि होती है । राजन्! आप क्यों असत्यपूर्ण बर्ताव करना चाहते हैं? ॥ ७० ॥
सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथाः ।
कस्मात्त्वमनृतं वाक्यं देहीति कुरुषेऽशुभम् ॥ ७१ ॥
महाराज! आप सत्यमें ही अपने मनको स्थिर कीजिये । मिथ्यापूर्ण बर्ताव न कीजिये । यदि लेना ही नहीं था तो आपने ' दीजिये' यह झूठा और अशुभ वचन क्यों मुँहसे निकाला था ॥ ७१ ॥
यदि जप्यफलं दत्तं मया नैषिष्यसे नृप ।
धर्मेभ्यः सम्परिभ्रष्टो लोकाननुचरिष्यसि ॥ ७२ ॥
नरेश्वर! यदि आप मेरे दिये हुए इस जपके फलको नहीं स्वीकार करेंगे तो धर्मभ्रष्ट होकर सम्पूर्ण लोकोंमें भटकते फिरेंगे ॥ ७२ ॥
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संश्रुत्य यो न दित्सेत याचित्वा यश्च नेच्छति ।
उभावानृतिकावेतौ न मृषा कर्तुमर्हसि ॥ ७३ ॥
जो पहले देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर देना नहीं चाहता तथा जो याचना तो करता है, किंतु मिलनेपर उसे लेना नहीं चाहता, वे दोनों ही मिथ्यावादी होते हैं; अतः आप अपनी और मेरी भी बात मिथ्या न कीजिये ॥ ७३ ॥
राजोवाच
योद्धव्यं रक्षितव्यं च क्षत्रधर्मः किल द्विज ।
दातारः क्षत्रियाः प्रोक्ता गृह्णीयां भवतः कथम् ॥ ७४ ॥
राजाने कहा — ब्रह्मन्! क्षत्रियका धर्म तो प्रजाकी रक्षा और युद्ध करना है । क्षत्रियोंको दाता कहा गया है; फिर मैं उलटे ही आपसे दान कैसे ले सकता हूँ? ॥ ब्राह्मणउवाच
न च्छन्दयामि ते राजन्नापि ते गृहमाव्रजम् ।
इहागम्य तु याचित्वा न गृह्णीषे पुनः कथम् ॥ ७५ ॥
ब्राह्मणने कहा— राजन्! दान लेनेके लिये मैंने आपसे अनुरोध या आग्रह नहीं किया था और न मैं देनेके लिये आपके घर ही गया था । आपने स्वयं यहाँ आकर याचना की है; फिर लेनेसे कैसे इनकार करते हैं? ॥ ७५ ॥
धर्मउवाच
अविवादोऽस्तु युवयोर्वित्त मां धर्ममागतम् ।
द्विजो दानफलैर्युक्तो राजा सत्यफलेन च ॥ ७६ ॥
धर्म बोले- आप दोनोंमें विवाद न हो । आपको विदित होना चाहिये कि मैं साक्षात् धर्म यहाँ आया हूँ । ब्राह्मणदेवता दानके फलसे युक्त हो जायँ और राजा भी सत्यके फलसे सम्पन्न हों ॥ ७६ ॥
स्वर्गउवाच
स्वर्गं मां विद्धि राजेन्द्र रूपिणं स्वयमागतम् ।
अविवादोऽस्तु युवयोरुभौ तुल्यफलौ युवाम् ॥ ७७ ॥
स्वर्ग बोला — राजेन्द्र! आपको विदित हो कि मैं स्वर्ग हूँ और स्वयं ही शरीर धारण करके यहाँ आया हूँ। आप दोनोंमें विवाद न हो । आप दोनों समान फलके भागी हों ॥ ७७ ॥
राजोवाच कृतं स्वर्गेण मे कार्यं गच्छ स्वर्ग यथागतम् ।
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विप्रो यदीच्छते गन्तुं चीर्णं गृह्णातु मे फलम् ॥ ७८ ॥
राजाने कहा- मुझे स्वर्गकी कोई आवश्यकता नहीं है । स्वर्ग! तुम जैसे आये थे, वैसे ही लौट जाओ । यदि ये ब्राह्मणदेवता स्वर्गमें जाना चाहते हों तो मेरे किये हुए पुण्यफलको ग्रहण करें ॥ ७८ ॥
ब्राह्मणउवाच
बाल्ये यदि स्यादज्ञानान्मया हस्तः प्रसारितः ।
निवृत्तलक्षणं धर्ममुपासे संहितां जपन् ॥ ७९ ॥
ब्राह्मणने कहा - यदि बाल्यावस्थामें अज्ञानवश मैंने कभी किसीके सामने हाथ फैलाया हो तो उसका मुझे स्मरण नहीं है; परंतु अब तो संहिता - गायत्रीमन्त्रका जप करता हुआ निवृत्तिधर्मकी उपासना करता हूँ ॥ ७ ९ ॥ निवृत्तं मां चिराद्राजन् विप्रलोभयसे कथम् ।
स्वेन कार्यं करिष्यामि त्वत्तो नेच्छे फलं नृप ।
तपःस्वाध्यायशीलोऽहं निवृत्तश्च प्रतिग्रहात् ॥ ८० ॥
राजन्! मैं निवृत्तिमार्गका पथिक हूँ, आप बहुत देरसे मुझे लुभानेका प्रयत्न क्यों करते हैं? नरेश्वर! मैं स्वयं ही अपना कर्तव्य करूँगा, आपसे कोई फल नहीं लेना चाहता । मैं प्रतिग्रहसे निवृत्त होकर तप और स्वाध्यायमें लगा हुआ हूँ ॥ ८० ॥
राजोवाच
यदि विप्र विसृष्टं ते जप्यस्य फलमुत्तमम् ।
आवयोर्यत् फलं किञ्चित् सहितं नौ तदस्त्विह ॥ ८१ ॥
राजाने कहा — विप्रवर! यदि आपने अपने जपका उत्तम फल दे ही दिया है तो ऐसा कीजिये कि हम दोनोंके जो भी पुण्यफल हों, उन्हें एकत्र करके हम दोनों साथ ही भोगें— हम दोनोंका उनपर समान अधिकार रहे ॥ ८१ ॥
द्विजाः प्रतिग्रहे युक्ता दातारो राजवंशजाः ।
यदि धर्मः श्रुतो विप्र सहैव फलमस्तु नौ ॥ ८२ ॥
ब्राह्मणोंको दान लेनेका अधिकार है और क्षत्रिय केवल दान देते हैं, लेते नहीं; यह धर्म आपने भी सुना होगा; अतः विप्रवर! हम दोनोंके कार्यका फल साथ ही हम दोनोंके उपयोगमें आवे ॥ ८२ ॥
मा वा भूत् सहभोज्यं नौ मदीयं फलमाप्नुहि ।
प्रतीच्छ मत्कृतं धर्मं यदि ते मय्यनुग्रहः ॥ ८३ ॥
अथवा यदि आपकी इच्छा न हो तो हमें साथ रहकर कर्मफल भोगनेकी आवश्यकता नहीं है । उस अवस्थामें मैं यही प्रार्थना करूँगा कि यदि आपका मुझपर अनुग्रह हो तो आप
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ही मेरे शुभकर्मोंका पूरा - पूरा फल ग्रहण कर लें । मैंने जो कुछ भी धर्म किया है, वह सब आप स्वीकार कर लें ॥ ८३ ॥
भीष्म उवाच
ततो विकृतवेषौ द्वौ पुरुषौ समुपस्थितौ ।
गृहीत्वान्योन्यमावेष्ट्य कुचैलावूचतुर्वचः ॥ ८४ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इसी समय वहाँ विकराल वेषधारी दो पुरुष उपस्थित हुए । दोनोंने एक- दूसरेको पकड़कर अपने हाथोंसे आवेष्टित कर रखा था । दोनोंके शरीरपर मैले वस्त्र थे ( उनमेंसे एकका नाम विकृत था और दूसरेका नाम विरूप) । वे दोनों बारंबार इस प्रकार कह रहे थे ॥ ८४ ॥
न मे धारयसीत्येको धारयामीति चापरः ।
इहास्ति नौ विवादोऽयमयं राजानुशासकः ॥ ८५ ॥
एकने कहा — भाई! तुम्हारे ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है । दूसरा कहता— नहीं, मैं तुम्हारा ऋणी हूँ। पहलेने कहा-यहाँ जो हम दोनोंका विवाद है, इसका निर्णय ये सबका शासन करनेवाले राजा करेंगे ॥ ८५ । ।
सत्यं ब्रवीम्यहमिदं न मे धारयते भवान् ।
अनृतं वदसीह त्वमृणं ते धारयाम्यहम् ॥ ८६ ॥
दूसरा बोला — मैं सच कहता हूँ कि तुमपर मेरा कोईऋण नहीं है । पहलेने कहा— तुम
झूठ बोलते हो । मुझपर तुम्हारा ऋण है ॥ ८६ ॥
तावुभौ सुभृशं तप्तौ राजानमिदमूचतुः ।
परीक्ष्य त्वं यथा स्यावो नावामिह विगर्हितौ ॥ ८७ ॥
तब वे दोनों अत्यन्त संतप्त होकर राजासे इस प्रकार बोले — आप हमारे मामलेकी जाँच -पड़ताल- प करके फैसला कर दें, जिससे हम दोनों यहाँ दोषके भागी और निन्दाके पात्र न हों ॥ ८७ ॥
विरूप उवाच
धारयामि नरव्याघ्र विकृतस्येह गोः फलम् ।
ददतश्च न गृह्णाति विकृतो मे महीपते ॥ ८८ ॥
विरूप बोला – पुरुषसिंह! मैं विकृतके एक गोदानका फल ऋणके तौरपर अपने यहाँ रखता हूँ । पृथ्वीनाथ! उस ऋणको आज मैं दे रहा हूँ; परंतु यह विकृत ले नहीं रहा है ॥ ८८ ॥
विकृतउवाच न मे धारयते किञ्चिद् विरूपोऽयं नराधिप ।
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मिथ्या ब्रवीत्ययं हि त्वां सत्याभासं नराधिप ॥ ८ ९ ॥ विकृतने कहा- नरेश्वर! इस विरूपपर मेरा कोई ऋण नहीं है । यह आपसे झूठ बोलता है । इसकी बातमें सत्यका आभासमात्र है ॥ ८ ९ ॥ राजोवाच
विरूप किं धारयते भवानस्य ब्रवीतु मे ।
श्रुत्वा तथा करिष्येऽहमिति मे धीयते मनः ॥ ९० ॥
राजा बोले- विरूप! तुम्हारे ऊपर विकृतका कौन-सा ऋण है। बताओ, मैं उसे
सुनकर कोई निर्णय करूंगा । मेरे मनका ऐसा ही निश्चय है ॥ ९ ० ॥
विरूप उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् यथैतद् धारयाम्यहम् ।
विकृतस्यास्य राजर्षे निखिलेन नराधिप ॥ ९ १ ॥
विरूप बोला — राजन्! नरेश्वर! आप सावधान होकर सुनें, राजर्षे! इस विकृतका ऋण जिस प्रकार मैं धारण करता हूँ, वह सब पूर्णरूपसे बता रहा हूँ ॥ ९ १ ॥
अनेन धर्मप्राप्त्यर्थं शुभा दत्ता पुरानघ ।
धेनुर्विप्राय राजर्षे तपःस्वाध्यायशीलिने ॥ ९ २ ॥
निष्पाप राजर्षे! इसने धर्मकी प्राप्तिके लिये एक तपस्वी और स्वाध्यायशील ब्राह्मणको एक दूध देनेवाली उत्तम गाय दी थी ॥ ९ २ ॥
तस्याश्चायं मया राजन् फलमभ्येत्य याचितः ।
विकृतेन च मे दत्तं विशुद्धेनान्तरात्मना ॥ ९ ३ ॥
राजन्! मैंने इसके घर जाकर इससे उसी गोदानका फल माँगा था और विकृतने शुद्ध हृदयसे मुझे वह दे दिया था ॥ ९ ३ ॥
ततो मे सुकृतं कर्म कृतमात्मविशुद्धये ।
गावौ च कपिले क्रीत्वा वत्सले बहुदोहने ॥ ९ ४ ॥
ते चोञ्छवृत्तये राजन् मया समपवर्जिते ।
यथाविधि यथाश्रद्धं तदस्याहं पुनः प्रभो ॥ ९ ५ ॥
तदनन्तर मैंने भी अपनी शुद्धिके लिये पुण्यकर्म किया । राजन्! दो अधिक दूध देनेवाली कपिला गौएँ, जिनके साथ उनके बछड़े भी थे, खरीदकर उन्हें मैंने एक उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको विधि और श्रद्धा- पूर्वक दे दिया । प्रभो! उसी गोदानका फल मैं पुनः इसे वापस करना चाहता हूँ ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥
इहाद्यैव गृहीत्वा तु प्रयच्छे द्विगुणं फलम् ।
एवं स्यात् पुरुषव्याघ्र कः शुद्धः कोऽत्र दोषवान् ॥ ९ ६ ॥
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पुरुषसिंह! इससे एक गोदानका फल लेकर आज मैं इसे दूना फल लौटा रहा हूँ। ऐसी परिस्थितिमें आप स्वयं निर्णय कीजिये कि हम दोनोंमेंसे कौन शुद्ध है और कौन दोषी? ॥ ९ ६ ॥
एवं विवदमानौ स्वस्त्वामिहाभ्यागतौ नृप ।
कुरु धर्ममधर्मं वा विनये नौ समादध ॥ ९७ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार आपसमें विवाद करते हुए हम दोनों यहाँ आपके समीप आये हैं।
आप निर्णय कीजिये । अब आप चाहे न्याय करें या अन्याय । इस झगड़ेका निपटारा कर दें ।
हम दोनोंको विशिष्ट न्यायके मार्गपर लगा दें ॥ ९ ७ ॥
यदि नेच्छति मे दानं यथा दत्तमनेन वै ।
भवानत्र स्थिरो भूत्वा मार्गे स्थापयिताद्य नौ ॥ ९ ८ ॥
इसने जिस तरह मुझे दान दिया है, उसी तरह यदि स्वयं भी मुझसे लेना नहीं चाहता है तो आप स्वयं सुस्थिर होकर हम दोनोंको धर्मके मार्गपर स्थापित कर दें ॥ ९ ८ ॥ राजोवाच
दीयमानं न गृह्णासि ऋणं कस्मात् त्वमद्य वै ।
यथैव तेऽभ्यनुज्ञातं तथा गृह्णीष्व मा चिरम् ॥ ९९ ॥
राजाने कहा — विकृत! जब विरूप तुम्हें तुम्हारा दिया हुआ ऋण लौटा रहा है, तब तुम उसे आज ग्रहण क्यों नहीं करते? जैसे इसने तुम्हारी दी हुई वस्तु स्वीकार कर ली थी,
उसी प्रकार तुम भी इसकी दी हुई वस्तुको ले लो । विलम्ब न करो ॥ ९९ ॥
विकृतउवाच
धारयामीत्यनेनोक्तं ददानीति तथा मया ।
नायं मे धारयत्यद्य गच्छतां यत्र वाञ्छति ॥ १०० ॥
विकृत बोला - राजन्! विरूपने अभी आपसे कहा है कि मैं ऋण धारण करता हूँ; परंतु मैंने उस समय ‘ दान' कह करके वह वस्तु इसे दी थी; इसलिये इसके ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है । अब यह जहाँ जाना चाहे, जा सकता है ॥ १०० ॥
राजोवाच
ददतोऽस्य न गृह्णासि विषमं प्रतिभाति मे ।
दण्ड्यो हि त्वं मम मतो नास्त्यत्र खलु संशयः ॥ १०१ ॥
राजाने कहा - विकृत! यह तुम्हें तुम्हारी वस्तु दे रहा है और तुम लेते नहीं हो । यह मुझे अनुचित जान पड़ता है; अतः मेरे मतमें तुम दण्डनीय हो; इसमें कोई संशय नहीं ॥ १०१ ॥
विकृत उवाच
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मयास्य दत्तं राजर्षे गृह्णीयां तत् कथं पुनः ।
काममत्रापराधो मे दण्डमाज्ञापय प्रभो ॥ १०२ ॥
विकृत बोला — राजर्षे! मैंने इसे दान दिया था; फिर वह दान इससे वापस कैसे ले लूँ ।
भले, इसमें मेरा अपराध समझा जाय; परंतु मैं दिया हुआ दान वापस नहीं ले सकता ।
प्रभो! मुझे दण्ड भोगनेकी आज्ञा प्रदान करें ॥ १०२ ॥
विरूप उवाच
दीयमानं यदि मया नेषिष्यसि कथञ्चन ।
नियंस्यति त्वां नृपतिरयं धर्मानुशासकः ॥ १०३ ॥
विरूपने कहा — विकृत! यदि तुम मेरी दी हुई वस्तु स्वीकार नहीं करोगे तो ये धर्मपूर्ण शासन करनेवाले नरेश तुम्हें कैद कर लेंगे ॥ १०३ ॥
विकृत उवाच
स्वं मया याचितेनेह दत्तं कथमिहाद्य तत् ।
गृह्णीयां गच्छतु भवानभ्यनुज्ञां ददानि ते ॥ १०४ ॥
विकृत बोला- तुम्हारे माँगनेपर मैंने अपना धन दानके रूपमें दिया था; फिर आज उसे वापस कैसे ले सकता हूँ? तुम्हारे ऊपर मेरा कुछ भी पावना नहीं है । मैं तुम्हें जानेके लिये आज्ञा देता हूँ, तुम जाओ ॥ १०४ ॥
ब्राह्मणउवाच
श्रुतमेतत्त्वया राजन्ननयोः कथितं द्वयोः ।
प्रतिज्ञातं मया यत्ते तद् गृहाणाविचारितम् ॥ १०५ ॥
इसी बीचमें जापक ब्राह्मण बोल उठा - राजन्! आपने इन दोनोंकी बातें सुन लीं । मैंने आपको देनेके लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आप मेरा दान बिना विचारे ग्रहण करें ॥ १०५ ॥
राजोवाच
प्रस्तुतं सुमहत् कार्यमनयोर्गह्वरं यथा ।
जापकस्य दृढीकारः कथमेतद् भविष्यति ॥ १०६ ॥
राजाने मन - ही - मन कहा- इन दोनोंका बड़ा भारी और गहन कार्य सामने आ गया है । इधर जापक ब्राह्मणका सुदृढ़ आग्रह ज्यों -का - त्यों बना हुआ है । इससे निपटारा कैसे होगा ॥ १०६ ॥
यदि तावन्न गृह्णामि ब्राह्मणेनापवर्जितम् ।
कथं न लिप्येयमहं पापेन महताद्य वै ॥ १०७ ॥