श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1261–1270
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1261–1270
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तात! वरुण, कुबेर, इन्द्र और यमराज–इन चारों लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु तथा अन्य देवताओंके जो ऐसे ही लोक हैं, वे सब परमात्माके परमधामके सामने नरक ही हैं ॥ ५-६ ॥
अभयं चानिमित्तं च न तत् क्लेशसमावृतम् ।
द्वाभ्यां मुक्तं त्रिभिर्मुक्तमष्टाभिस्त्रिभिरेव च ॥ ७ ॥
परमात्माका परमधाम विनाशके भयसे रहित है; क्योंकि वह कारणरहित नित्य - सिद्ध है । वह अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक पाँच क्लेशोंसे घिरा हुआ नहीं है । उसमें प्रिय और अप्रिय ये दो भाव नहीं हैं । प्रिय और अप्रियके हेतुभूत तीन गुण- सत्त्व, रज और तम भी नहीं हैं तथा वह परमधाम भूत, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, उपासना, कर्म, प्राण और अविद्या - इन आठ पुरियोंसे भी मुक्त है । वहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय- इस त्रिपुटीका भी अभाव है ॥ ७ ॥
चतुर्लक्षणवर्जं तु चतुष्कारणवर्जितम् ।
अप्रहर्षमनानन्दमशोकं विगतक्लमम् ॥ ८ ॥
इतना ही नहीं, वह दृष्टि, श्रुति, मति और विज्ञाति- इन चार लक्षणोंसे रहित है । ज्ञानके कारणभूत प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द– इन चारोंसे वह परे है । वहाँ इष्ट विषयकी प्राप्तिसे होनेवाले हर्ष और उसके भोगजनित
आनन्दका भी अभाव है । वह शोक और श्रमसे भी सर्वथा रहित है ॥ ८ ॥
कालः सम्पद्यते तत्र कालस्तत्र न वै प्रभुः ।
स कालस्य प्रभू राजन् स्वर्गस्यापि तथेश्वरः ॥ ९ ॥
राजन्! कालकी उत्पत्ति भी वहींसे होती है । उस धामपर कालकी प्रभुता नहीं चलती । वह परमात्मा कालका भी स्वामी और स्वर्गका भी ईश्वर है ॥ ९ ॥
आत्मकेवलतां प्राप्तस्तत्र गत्वा न शोचति ।
ईदृशं परमं स्थानं निरयास्ते च तादृशाः ॥ १० ॥
जो आत्मकैवल्यको प्राप्त हो चुका है वही मनुष्य वहाँ जाकर शोकसे रहित हो जाता है । उस परमधामका स्वरूप ऐसा ही है और पहले जो नाना प्रकारके सुखभोगोंसे सम्पन्न लोक बताये गये हैं, वे सभी उसकी तुलनामें नरक हैं ॥ १० ॥
एते ते निरयाः प्रोक्ताः सर्व एव यथातथम् ।
तस्य स्थानवरस्येह सर्वे निरयसंज्ञिताः ॥ ११ ॥
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राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें यथार्थरूपसे ये सभी नरक बताये हैं । उस परमपदके सामने वस्तुतः वे सभी लोक ' नरक ' ही कहलाने योग्य हैं ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९८ ॥
3 - श्रुति भी कहती है— ' अशरीरं वावसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः । ’ २ - आठ पुरियोंका बोधक वचन इस प्रकार उपलब्ध होता है— भूतेन्द्रियमनोबुद्धिवासनाकर्मवायवः । अविद्या चेत्यमुं वर्गमाहुः पुर्यष्टकं बुधाः ॥ ३ - इन लक्षणोंका नाम- निर्देश श्रुतिमें इस प्रकार किया गया है—'न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुयान्न मतेर्मन्तारमन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ।
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नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः जापकको सावित्रीका वरदान, उसके पास धर्म, यम और काल आदिका आगमन, राजा इक्ष्वाकु और जापक ब्राह्मणका संवाद, सत्यकी महिमा तथा जापककी परम गतिका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
कालमृत्युयमानां ते इक्ष्वाकोर्ब्राह्मणस्य च ।
विवादो व्याहृतः पूर्वं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आपने काल, मृत्यु, यम, इक्ष्वाकु और ब्राह्मणके विवादकी पहले चर्चा की थी; अतः उसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
इक्ष्वाकोः सूर्यपुत्रस्य यद् वृत्तं ब्राह्मणस्य च ॥ २ ॥
कालस्य मृत्योश्च तथा यद् वृत्तं तन्निबोध मे ।
यथा स तेषां संवादो यस्मिन् स्थानेऽपि चाभवत् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इसी प्रसंगमें उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें राजा इक्ष्वाकु, सूर्यपुत्र यम, ब्राह्मण, काल और मृत्युके वृत्तान्तका उल्लेख है । जिस स्थानपर और जिस रूपमें उनका वह संवाद हुआ था, उसे बताता हूँ, मुझसे सुनो ॥ २-३ ॥
ब्राह्मणो जापकः कश्चिद् धर्मवृत्तो महायशाः ।
षडङ्गविन्महाप्राज्ञः पैप्पलादिः स कौशिकः ॥ ४ ॥
तस्यापरोक्षं विज्ञानं षडङ्गेषु बभूव ह ।
वेदेषु चैव निष्णातो हिमवत्पादसंश्रयः ॥ ५ ॥
कहते हैं कि हिमालय पर्वतके निकटवर्ती पहाड़ियोंपर एक महायशस्वी धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था, जो वेदके छहों अंगोंका ज्ञाता, परम बुद्धिमान् तथा जपमें तत्पर रहनेवाला था । वह पिप्पलादका पुत्र था और कौशिक वंशमें उसका जन्म हुआ था । वेदके छहों अंगोंका विज्ञान उसे प्रत्यक्ष हो गया था, अतः वह वेदोंका पारंगत विद्वान् था ॥ ४-५ ॥ सोद्यं ब्राह्मं तपस्तेपे संहितां संयतो जपन् ।
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तस्य वर्षसहस्रं तु नियमेन तथा गतम् ॥ ६ ॥
वह अर्थज्ञानपूर्वक संहिताका जप करता हुआ इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मणोचित तपस्या करने लगा । नियमपूर्वक जप-तप करते हुए उसके एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ६ ॥
स देव्या दर्शितः साक्षात् प्रीतास्मीति तदा किल ।
जप्यमावर्तयंस्तूष्णीं न स तां किञ्चिदब्रवीत् ॥ ७ ॥
कहते हैं, उसके उस जपसे प्रसन्न होकर देवी सावित्रीने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा कि मैं तुझपर प्रसन्न हूँ । ब्राह्मण अपने जपनीय वेद संहिताके गायत्रीमन्त्रकी आवृत्ति कर रहा था; इसलिये सावित्रीदेवीके आनेपर भी चुपचाप बैठा ही रह गया । उनसे कुछ न बोला ॥ ७ ॥
तस्यानुकम्पया देवी प्रीता समभवत् तदा ।
वेदमाता ततस्तस्य तज्जप्यं समपूजयत् ॥ ८ ॥
देवी सावित्रीकी उसपर कृपा हो गयी थी; अतः वे उसके उस समयके व्यवहारसे भी प्रसन्न ही हुईं । वेदमाताने ब्राह्मणके उस नियमानुकूल जपकी मन- ही- मन प्रशंसा की ॥ ८ ॥
समाप्तजप्यस्तूत्थाय शिरसा पादयोस्तदा ।
पपात देव्या धर्मात्मा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
जब जप समाप्त हो गया, तब धर्मात्मा ब्राह्मणने उठकर देवी सावित्रीके चरणोंमें मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार कहा- ॥ ९ ॥
दिष्ट्या देवि प्रसन्ना त्वं दर्शनं चागता मम ।
यदि चापि प्रसन्नासि जप्ये मे रमतां मनः ॥ १० ॥
‘देवि! आज मेरा अहोभाग्य है कि आपने प्रसन्न होकर मुझे दर्शन दिया । यदि वास्तवमें आप मुझपर संतुष्ट हैं तो ऐसी कृपा कीजिये जिससे मेरा मन जपमें लगा रहे ' ॥ १० ॥
सावित्र्युवाच
किं प्रार्थयसि विप्रर्षे किं चेष्टं करवाणि ते ।
प्रब्रूहि जपतां श्रेष्ठ सर्वं तत् ते भविष्यति ॥ ११ ॥
सावित्रीने कहा – ब्रह्मर्षे! तुम क्या चाहते हो? कौन-सी वस्तु तुम्हें अभीष्ट है? बताओ । मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूंगी । जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम अपनी अभिलाषा बताओ । तुम्हारी वह सारी इच्छा पूर्ण हो जायगी ॥ ११ ॥
इत्युक्तः स तदा देव्या विप्रः प्रोवाच धर्मवित् ।
जप्यं प्रति ममेच्छेयं वर्धत्विति पुनः पुनः ॥ १२ ॥
मनसश्च समाधिर्मे वर्धेताहरहः शुभे ।
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सावित्रीदेवीके ऐसा कहनेपर वह धर्मात्मा ब्राह्मण बोला- ' शुभे! इस मन्त्रके जपमें मेरी यह इच्छा बराबर बढ़ती रहे और मेरे मनकी एकाग्रता भी प्रतिदिन बढ़े ' ॥ १२३ ॥
तत् तथेति ततो देवी मधुरं प्रत्यभाषत ॥ १३ ॥
इदं चैवापरं प्राह देवी तत्पियकाम्यया ।
निरयं नैव याता त्वं यत्र याता द्विजर्षभाः ॥ १४ ॥
यास्यसि ब्रह्मणः स्थानमनिमित्तमनिन्दितम् ।
साधये भविता चैतद् यत्त्वयाहमिहार्थिता ॥ १५ ॥
नियतो जप चैकाग्रो धर्मस्त्वां समुपैष्यति ।
कालो मृत्युर्यमश्चैव समायास्यन्ति तेऽन्तिकम् ॥ १६ ॥
भविता च विवादोऽत्र तव तेषां च धर्मतः । तब सावित्रीदेवीने मधुर वाणीमें ' तथास्तु ' कहा । इसके बाद देवीने ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे यह दूसरा वचन और कहा -' विप्रवर! जहाँ दूसरे श्रेष्ठ ब्राह्मण गये हैं, उन स्वर्गादि निम्नश्रेणीके लोकोंमें तुम नहीं जाओगे । तुम्हें स्वभावसिद्ध एवं निर्दोष ब्रह्मपदकी प्राप्ति होगी । तुमने मुझसे जो यहाँ प्रार्थना की है, वह पूरी होगी । मैं उसे पूर्ण करनेकी चेष्टा करूँगी । तुम नियमपूर्वक एकाग्रचित्त होकर जप करो । धर्म स्वयं तुम्हारी सेवामें उपस्थित होगा । काल, मृत्यु और यम भी तुम्हारे निकट पधारेंगे, तुम्हारा उन सबके साथ यहाँ धर्मानुकूल वाद- विवाद भी होगा ॥ १३–१६३ ॥ भीष्म उवाच एवमुक्त्वा भगवती जगाम भवनं स्वकम् ॥ १७ ॥
ब्राह्मणोऽपि जपन्नास्ते दिव्यं वर्षशतं तथा । भीष्मजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर भगवती सावित्री देवी अपने धामको चली गयीं और ब्राह्मण भी दिव्य सौ वर्षोंतक पूर्ववत् जपमें संलग्न रहा ॥ १७३ ॥
सदा दान्तो जितक्रोधः सत्यसंधोऽनसूयकः ॥ १८ ॥
समाप्ते नियमे तस्मिन्नथ विप्रस्य धीमतः ।
साक्षात् प्रीतस्तदा धर्मो दर्शयामास तं द्विजम् ॥ १ ९ ॥
वह सदा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखता था, क्रोधको जीत चुका था । अपनी की हुई प्रतिज्ञाका सचाईके साथ पालन करता था और किसीके दोष नहीं देखता था । बुद्धिमान् ब्राह्मणका वह नियम पूर्ण होनेपर साक्षात् भगवान् धर्म उस समय उसपर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ १८-१९ ॥ धर्मउवाच
द्विजाते पश्य मां धर्ममहं त्वां द्रष्टुमागतः ।
जप्यस्यास्य फलं यत्तत् सम्प्राप्तं तच्च मे शृणु ॥ २० ॥
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धर्म बोले- विप्रवर! तुम मेरी ओर देखो । मैं धर्म हूँ और तुम्हारा दर्शन करनेके लिये आया हूँ । तुम्हें इस झपका जो फल प्राप्त हुआ है, वह सब मुझसे सुन लो ॥ २० ॥
जिता लोकास्त्वया सर्वे ये दिव्या ये च मानुषाः ।
देवानां निलयान् साधो सर्वानुत्क्रम्य यास्यसि ॥ २१ ॥
तुमने दिव्य और मानुष सभी लोकोंपर विजय प्राप्त की है । साधो! तुम सम्पूर्ण देवताओंके लोकोंको लाँघकर उनसे भी ऊपर जाओगे ॥ २१ ॥
प्राणत्यागं कुरु मुने गच्छ लोकान् यथेप्सितान् ।
त्यक्त्वाऽऽत्मनः शरीरं च ततो लोकानवाप्स्यसि ॥ २२ ॥
मुने! अब तुम अपने प्राणोंका परित्याग करो और अभीष्ट लोकोंमें जाओ । अपने शरीरका परित्याग करनेके पश्चात् ही तुम उन पुण्यलोकोंमें जाओगे ॥ २२ ॥
ब्राह्मणउवाच
किं नुनु लोकैर्हि मे धर्म गच्छ त्वं च यथासुखम् ।
बहुदुःखसुखं देहं नोत्सृजेयमहं विभो ॥ २३ ॥
ब्राह्मणने कहा – धर्म! मुझे उन लोकोंको लेकर क्या करना है? आप सुखपूर्वक यहाँसे अपने स्थानको पधारिये । प्रभो! मैंने इस शरीर के साथ बहुत दुःख और सुख उठाया है; अतः इसका त्याग नहीं कर सकता ॥ २३ ॥
धर्मउवाच
अवश्यं भोः शरीरं ते त्यक्तव्यं मुनिपुङ्गव ।
स्वर्गमारोह भो विप्र किं वा वै रोचतेऽनघ ॥ २४ ॥
धर्म बोले — निष्पाप मुनिश्रेष्ठ! शरीर तो तुम्हें अवश्य त्यागना पड़ेगा । विप्रवर! अब स्वर्गलोकपर आरूढ़ हो जाओ अथवा तुम्हारी क्या रुचि है? बताओ ॥ २४ ॥
ब्राह्मणउवाच
न रोचये स्वर्गवासं विना देहमहं विभो ।
गच्छ धर्म न मे श्रद्धा स्वर्गं गन्तुं विनाऽऽत्मना ॥ २५ ॥
ब्राह्मणने कहा — प्रभो! मैं इस शरीरके बिना स्वर्गलोकमें निवास करना नहीं चाहता; अतः धर्मदेव! आप यहाँसे जाइये । इस शरीरको छोड़कर स्वर्गलोकमें जानेके लिये मेरे मनमें तनिक भी उत्साह नहीं है ॥ २५ ॥
धर्मउवाच
अलं देहे मनः कृत्वा त्यक्त्वा देहं सुखी भव ।
गच्छ लोकानरजसो यत्र गत्वा न शोचसि ॥ २६ ॥
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धर्म बोले- मुने! शरीरमें मनको आसक्त रखना ठीक नहीं है । तुम देह त्यागकर सुखी हो जाओ । उन रजोगुणरहित निर्मल लोकोंमें जाओ, जहाँ जाकर फिर तुम्हें शोक नहीं करना पड़ेगा ॥ २६ ॥
ब्राह्मणउवाच
रमे जपन् महाभाग किं नु लोकैः सनातनैः ।
सशरीरेण गन्तव्यं मया स्वर्गं न वा विभो ॥ २७ ॥
ब्राह्मणने कहा- महाभाग! मैं तो जपमें ही सुख मानता हूँ । मुझे सनातन लोकोंको लेकर क्या करना है? भगवन्! यह बताइये, मैं सशरीर स्वर्गलोकमें जा सकता हूँ या नहीं? ॥ २७ ॥
धर्मउवाच
यदि त्वं नेच्छसे त्यक्तुं शरीरं पश्य वै द्विज ।
एष कालस्तथा मृत्युर्यमश्च त्वामुपागताः ॥ २८ ॥
धर्म बोले — ब्रह्मन्! यदि तुम शरीर छोड़ना नहीं चाहते हो तो देखो, ये काल, मृत्यु और यम तुम्हारे पास आये हैं ॥ २८ ॥
भीष्म उवाच
अथ वैवस्वतः कालो मृत्युश्च त्रितयं विभो ।
ब्राह्मणं तं महाभागमुपगम्येदमब्रुवन् ॥ २ ९ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर वैवस्वत यम, काल और मृत्यु –तीनों उस महाभाग ब्राह्मणके पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥ २ ९ ॥ यम उवाच
तपसोऽस्य सुतप्तस्य तथा सुचरितस्य च ।
फलप्राप्तिस्तव श्रेष्ठा यमोऽहं त्वामुपब्रुवे ॥ ३० ॥
यमराज बोले — ब्रह्मन्! तुम्हारेद्वारा भलीभाँति की हुई इस तपस्याका तथा शुभ आचरणोंका भी तुम्हें उत्तम फल प्राप्त हुआ है । मैं यमराज हूँ और स्वयं तुमसे यह बात कहता हूँ ॥ ३० ॥
काल उवाच
यथावदस्य जप्यस्य फलं प्राप्तमनुत्तमम् ।
कालस्ते स्वर्गमारोढुं कालोऽहं त्वामुपागतः ॥ ३१ ॥
कालने कहा — विप्रवर! तुम्हारे इस जपका यथायोग्य सर्वोत्तम फल प्राप्त हुआ है । अतः अब तुम्हारे लिये स्वर्गलोकमें जानेका समय आया है । यही सूचित करनेके लिये मैं
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साक्षात् काल तुम्हारे पास आया हूँ ॥ मृत्युरुवाच
मृत्युं मां विद्धि धर्मज्ञ रूपिणं स्वयमागतम् ।
कालेन चोदितो विप्र त्वामितो नेतुमद्य वै ॥ ३२ ॥
मृत्युने कहा - धर्मज्ञ ब्राह्मण! मुझे मृत्यु समझो । मैं स्वयं ही शरीर धारण करके यहाँ आया हूँ । विप्रवर! मैं कालसे प्रेरित होकर आज तुम्हें यहाँसे ले जानेके लिये उपस्थित हुआ हूँ ॥ ३२ ॥
ब्राह्मणउवाच
स्वागतं सूर्यपुत्राय कालाय च महात्मने ।
मृत्यवे चाथ धर्माय किं कार्यं करवाणि वः ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणने कहा - सूर्यपुत्र यम, महामना काल, मृत्यु तथा धर्म - इन सबका स्वागत है । बताइये, मैं आपलोगोंका कौन - सा कार्य करूँ? ॥ ३३ ॥
भीष्म उवाच
अर्घ्यं पाद्यं च दत्त्वा स तेभ्यस्तत्र समागमे ।
अब्रवीत् परमप्रीतः स्वशक्त्या किं करोमि वः ॥ ३४ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! वहाँ उन सबका समागम होनेपर ब्राह्मणने उनके लिये अर्घ्य और पाद्य देकर बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा – ' देवताओ! मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ? ' ॥ ३४ ॥
तस्मिन्नेवाथ काले तु तीर्थयात्रामुपागतः ।
इक्ष्वाकुरगमत् तत्र समेता यत्र ते विभो ॥ ३५ ॥
इसी समय तीर्थयात्राके लिये आये हुए राजा इक्ष्वाकु भी उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ वे सब लोग एकत्र हुए थे ॥ ३५ ॥
सर्वानेव तु राजर्षिः सम्पूज्याथ प्रणम्य च ।
कुशलप्रश्नमकरोत् सर्वेषां राजसत्तमः ॥ ३६ ॥
नृपश्रेष्ठ राजर्षि इक्ष्वाकुने उन सबको प्रणाम करके उनकी पूजा की और उन सबका कुशल- समाचार पूछा ॥ ३६ ॥
तस्मै सोऽथासनं दत्त्वा पाद्यमर्घ्यं तथैव च ।
अबवीद् ब्राह्मणो वाक्यं कृत्वा कुशलसंविदम् ॥ ३७ ॥
ब्राह्मणने भी राजाको अर्घ्य, पाद्य और आसन देकर कुशल-मंगल पूछनेके बाद इस प्रकार कहा— । |
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con
स्वागतं ते महाराज ब्रूहि यद् यदिहेच्छसि ।
स्वशक्त्या किं करोमीह तद् भवान् प्रब्रवीतु माम् ॥ ३८ ॥
‘ महाराज! आपका स्वागत है! आपकी जो- जो इच्छा हो, उसे यहाँ बताइये । मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपकी क्या सेवा करूँ? यह आप मुझे बतावें' ॥ ३८ ॥
राजोवाच
राजाहं ब्राह्मणश्च त्वं यदा षट्कर्मसंस्थितः ।
ददानि वसु किंचित्ते प्रथितं तद् वदस्व मे ॥ ३ ९ ॥
राजाने कहा — विप्रवर! मैं क्षत्रिय राजा हूँ और आप छः कर्मोंमें स्थित रहनेवाले ब्राह्मण । अतः मैं आपको कुछ धन देना चाहता हूँ। आप प्रसिद्ध धनरत्न मुझसे माँगिये ॥ ३ ९ ॥ ब्राह्मणउवाच
द्विविधा ब्राह्मणा राजन् धर्मश्च द्विविधः स्मृतः ।
प्रवृत्ताश्च निवृत्ताश्च निवृत्तोऽहं प्रतिग्रहात् ॥ ४० ॥
ब्राह्मणने कहा- राजन्! ब्राह्मण दो प्रकारके होते हैं और धर्म भी दो प्रकारका माना
गया है — प्रवृत्ति और निवृत्ति। मैं प्रतिग्रहसे निवृत्त ब्राह्मण हूँ ॥ ४० ॥
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तेभ्यः प्रयच्छ दानानि ये प्रवृत्ता नराधिप
अहं न प्रतिगृह्णामि किमिष्टं किं ददामि ते ।
ब्रूहि त्वं नृपतिश्रेष्ठ तपसा साधयामि किम् ॥ ४१ ॥
नरेश्वर! आप उन ब्राह्मणोंको दान दीजिये, जो प्रवृत्तिमार्गमें हों । मैं आपसे दान नहीं लूँगा । नृपश्रेष्ठ! इस समय आपको क्या अभीष्ट है? मैं आपको क्या दूँ? बताइये, मैं अपनी तपस्याद्वारा आपका कौन- सा कार्य सिद्ध करूँ? ॥ ४१ ॥
राजोवाच
क्षत्रियोऽहं न जानामि देहीति वचनं क्वचित् ।
प्रयच्छ युद्धमित्येवंवादिनः स्मो द्विजोत्तम ॥ ४२ ॥
राजा बोले – द्विजश्रेष्ठ! मैं क्षत्रिय हूँ । ' दीजिये' ऐसा कहकर याचना करनेकी बातको मैं कभी नहीं जानता । माँगनेके नामपर तो हमलोग यही कहना जानते हैं कि ' युद्ध दो' ॥ ४२ ॥
ब्राह्मणउवाच
तुष्यसि त्वं स्वधर्मेण तथा तुष्टा वयं नृप ।
अन्योन्यस्यान्तरं नास्ति यदिष्टं तत् समाचर ॥ ४३ ॥
ब्राह्मणने कहा- नरेश्वर! जैसे आप अपने धर्मसे संतुष्ट हैं, उसी तरह हम भी अपने धर्मसे संतुष्ट हैं । हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है । अतः आपको जो अच्छा लगे, वह कीजिये ॥ ४३ ॥
राजोवाच
स्वशक्त्याहं ददानीति त्वया पूर्वमुदाहृतम् ।
याचे त्वां दीयतां मह्यं जप्यस्यास्य फलं द्विज ॥ ४४ ॥
राजाने कहा — ब्रह्मन्! आपने मुझसे पहले कहा है कि ' मैं अपनी शक्तिके अनुसार दान दूँगा' तो मैं आपसे यही माँगता हूँ कि आप अपने झपका फल मुझे दे दीजिये ॥ ४४ ॥
ब्राह्मणउवाच
युद्धं मम सदा वाणी याचतीति विकत्थसे ।
न च युद्धं मया सार्धं किमर्थं याचसे पुनः ॥ ४५ ॥
ब्राह्मणने कहा- राजन्! आप तो बहुत बढ़ - बढ़कर बातें बना रहे थे कि मेरी वाणी सदा युद्धकी ही याचना करती है । तब आप मेरे साथ भी युद्धकी ही याचना क्यों नहीं कर रहे हैं? ॥ ४५ ॥
राजोवाच