श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1281–1290

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1281–1290

पृष्ठ 1281

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यदि मैं आज ब्राह्मणकी दी हुई वस्तु ग्रहण न करूँ तो किस प्रकार महान् पापसे निर्लिप्त रह सकूँगा ॥ १०७ ॥

तौ चोवाच स राजर्षिः कृतकार्यौ गमिष्यथः ।

नेदानीं मामिहासाद्य राजधर्मो भवेन्मृषा ॥ १०८ ॥

इसके बाद राजर्षि इक्ष्वाकुने उन दोनोंसे कहा– ' तुम दोनों अपने विवादका निपटारा हो जानेपर ही यहाँसे जाना । इस समय मेरे पास आकर अपना कार्य पूर्ण हुए बिना न ना मुझे भय है कि राजधर्म मिथ्या अथवा कलंकित न हो जाय ॥ १०८ ॥

स्वधर्मः परिपाल्यस्तु राज्ञामिति विनिश्चयः ।

विप्रधर्मश्च गहनो मामनात्मानमाविशत् ॥ १० ९ ॥

राजाओंको अपने धर्मका पालन करना चाहिये, यही शास्त्रका सिद्धान्त है । इधर मुझ अजितात्माके भीतर गहन ब्राह्मणधर्मने प्रवेश किया है ॥ १० ९ ॥ ब्राह्मणउवाच

गृहाण धारयेऽहं च याचितं संश्रुतं मया ।

न चेद् ग्रहीष्यसे राजन् शपिष्ये त्वां न संशयः ॥ ११० ॥

ब्राह्मणने कहा — राजन्! आपने जो वस्तु माँगी थी और जिसे देनेकी मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी, उसे मैं आपकी धरोहरके रूपमें अपने पास रखता हूँ; अतः शीघ्र उसे ले लें । यदि नहीं लेंगे तो निस्संदेह मैं आपको शाप दे दूँगा ॥ ११० ॥

राजोवाच

धिग्राजधर्मं यस्यायं कार्यस्येह विनिश्चयः ।

इत्यर्थं मे ग्रहीतव्यं कथं तुल्यं भवेदिति ॥ १११ ॥

राजाने कहा — धिक्कार है राजधर्मको, जिसके कार्यका यहाँ यह परिणाम निकला । ब्राह्मणको और मुझको समान फलकी प्राप्ति कैसे हो, इसी उद्देश्यसे मुझे यह दान ग्रहण करना है ॥ १११ ॥

एष पाणिरपूर्वं मे निक्षेपार्थं प्रसारितः ।

यन्मे धारयसे विप्र तदिदानीं प्रदीयताम् ॥ ११२ ॥

ब्रह्मन्! यह मेरा हाथ जो आजसे पहले किसीके सामने नहीं फैलाया गया था, आज आपसे धरोहर लेनेके लिये आपके सामने फैला है । आप मेरा जो कुछ भी धरोहर धारण करते हैं, उसे इस समय मुझे दे दीजिये ॥ ब्राह्मणउवाच

संहितां जपता यावान् गुणः कश्चित् कृतो मया ।

तत् सर्वं प्रतिगृह्णीष्व यदि किञ्चिदिहास्ति मे ॥ ११३ ॥

पृष्ठ 1282

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ब्राह्मणने कहा — राजन्! मैंने संहिताका जप करते हुए कहींसे जितना भी पुण्य अथवा सद्गुण संग्रह किया है, वह सब आप ले लें । इसके सिवा भी मेरे पास जो कुछ पुण्य हो, उसे ग्रहण करें ॥ ११३ ॥

राजोवाच

जलमेतन्निपतितं मम पाणौ द्विजोत्तम ।

सममस्तु सहैवास्तु प्रतिगृह्णातु वै भवान् ॥ ११४ ॥

राजाने कहा – द्विजश्रेष्ठ! मेरे हाथपर यह संकल्पका जल पड़ा हुआ है । मेरा और आपका सारा पुण्य हम दोनों के लिये समान हो और हम साथ- साथ उसका उपभोग करें; इस उद्देश्यसे आप मेरा दिया हुआ दान भी ग्रहण करें ॥ ११४ ॥

विरूप उवाच

कामक्रोधौ विद्धि नौ त्वमावाभ्यां कारितो भवान् ।

सहेति च यदुक्तं ते समा लोकास्तवास्य च ॥ ११५ ॥

विरूपने कहा — राजन्! आपको विदित हो कि हम दोनों काम और क्रोध हैं । हमने ही आपको इस कार्यमें लगाया है । आपने जो साथ - साथ फल भोगनेकी बात कही है, इससे आपको और इस ब्राह्मणको एक समान लोक प्राप्त होंगे ॥ ११५ ॥

नायं धारयते किञ्चिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ।

कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ॥ ११६ ॥

सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निघृष्टं पश्यतस्तव ।

गच्छ लोकान् जितान् स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ॥ ११७ ॥

यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझपर भी इसका कोई ऋण नहीं है । यह सब खेल तो हमलोगोंने आपकी परीक्षा लेनेके लिये किया था । काल, धर्म, मृत्यु, काम, - सब एक - दूसरेकी कसौटीपर - - -क्रोध और आप दोनों ये सब के- आपके देखते देखते कसेगये हैं । अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्मसे जीते हुए उन लोकोंमें जाइये ॥ ११६-११७ ॥

जापकानां फलावाप्तिर्मया ते सम्प्रदर्शिता ।

गतिः स्थानं च लोकाश्च जापकेन यथा जिताः ॥ ११८ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! जापकोंको किस प्रकार फलकी प्राप्ति होती है? इस बातका दिग्दर्शन मैंने तुम्हें करा दिया । जापक ब्राह्मणने कौन- सी गति प्राप्त की? किस स्थानपर अधिकार किया? कौन - कौन - से लोक उसके लिये सुलभ हुए? और यह सब किस प्रकार सम्भव हुआ? ये बातें बतायी जायँगी ॥ ११८ ॥

प्रयाति संहिताध्यायी ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।

अथवाग्निं समायाति सूर्यमाविशतेऽपि वा ॥ ११ ९ ॥

पृष्ठ 1283

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संहिताका स्वाध्याय करनेवाला द्विज परमेष्ठी ब्रह्माको प्राप्त होता है अथवा अग्निमें समा जाता है अथवा सूर्यमें प्रवेश कर जाता है ॥ ११ ९ ॥

स तैजसेन भावेन यदि तत्र रमत्युत ।

गुणांस्तेषां समाधत्ते रागेण प्रतिमोहितः ॥ १२० ॥

यदि वह जापक तैजस् शरीरसे उन लोकोंमें रमण करता है तो रागसे मोहित होकर उनके गुणों को अपने भीतर धारण कर लेता है ॥ १२० ॥

एवं सोमे तथा वायौ भूम्याकाशशरीरगः ।

सरागस्तत्र वसति गुणांस्तेषां समाचरन् ॥ १२१ ॥

इसी प्रकार संहिताका जप करनेवाला पुरुष रागयुक्त होनेपर चन्द्रलोक, वायुलोक, भूमिलोक तथा अन्तरिक्षलोकके योग्य शरीर धारण करके वहाँ निवास करता है और उन लोकोंमें रहनेवाले पुरुषोंके गुणोंका आचरण करता रहता है ॥ १२१ ॥

अथ तत्र विरागी स गच्छति त्वथ संशयम् ।

परमव्ययमिच्छन् स तमेवाविशते पुनः ॥ १२२ ॥

यदि उन लोकोंकी उत्कृष्टतामें संदेह हो जाय और इस कारण वह जापक वहाँसे विरक्त हो जाय तो वह उत्कृष्ट एवं अविनाशी मोक्षकी इच्छा रखता हुआ फिर उसी परमेष्ठी ब्रह्मामें प्रवेश कर जाता है ॥ १२२ ॥

अमृताच्चामृतं प्राप्तः शान्तीभूतो निरात्मवान् ।

ब्रह्मभूतः स निर्द्वन्द्वः सुखी शान्तो निरामयः ॥ १२३ ॥

अन्य लोकोंकी अपेक्षा परमेष्ठिभावकी प्राप्ति अमृतरूप है । उससे भी उत्कृष्ट कैवल्यरूपी अमृतको प्राप्त होकर वह शान्त ( निष्काम), अहंकारशून्य, निर्द्वन्द्व, सुखी, शान्तिपरायण तथा रोग- शोकसे रहित ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥ १२३ ॥

ब्रह्मस्थानमनावर्तमेकमक्षरसंज्ञकम् ।

अदुःखमजरं शान्तं स्थानं तत् प्रतिपद्यते ॥ १२४ ॥

ब्रह्मपद पुनरावृत्तिरहित, एक, अविनाशी, संज्ञारहित, दुःख- शून्य, अजर और शान्त आश्रय है, उसे ही वह जापक प्राप्त होता है ॥ १२४ ॥

चतुर्भिर्लक्षणैर्हीनं तथा षड्भिः सषोडशैः ।

पुरुषं तमतिक्रम्य आकाशं प्रतिपद्यते ॥ १२५ ॥

जापक पूर्वोक्त परमेष्ठी पुरुष ( सगुण ब्रह्म ) से भी ऊपर उठकर आकाशस्वरूप निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होता है । वहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द – इन चारों प्रमाणों और लक्षणोंकी पहुँच नहीं है । क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह तथा जरा और मृत्यु —ये छः तरंगें वहाँ नहीं हैं । पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँचों कर्मेन्द्रियाँ, पाँचों प्राण तथा मन – इन सोलह उपकरणोंसे भी वह रहित है ॥ १२५ ॥

अथ नेच्छति रागात्मा सर्वं तदधितिष्ठति ।

पृष्ठ 1284

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यच्च प्रार्थयते तच्च मनसा प्रतिपद्यते ॥ १२६ ॥

यदि उसके मनमें भोगोंके प्रति राग है और वह निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होना नहीं चाहता है तो वह सभी पुण्यलोकोंका अधिष्ठाता बन जाता है और मनसे जिस वस्तुको पाना चाहता है, उसे तुरंत प्राप्त कर लेता है ॥ १२६ ॥

अथवा चेक्षते लोकान् सर्वान् निरयसंज्ञितान् ।

निस्पृहः सर्वतो मुक्तस्तत्र वै रमते सुखम् ॥ १२७ ॥

अथवा वह सम्पूर्ण उत्तम लोकोंको भी नरकके तुल्य देखता है और सब ओरसे निःस्पृह एवं मुक्त होकर उसी निर्गुण ब्रह्ममें सुखपूर्वक रमण करता है ॥ १२७ ॥

एवमेषा महाराज जापकस्य गतिर्यथा ।

एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १२८ ॥

महाराज! इस प्रकार यह जापककी गति बतायी गयी है । यह सारा प्रसंग मैंने कह सुनाया । अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ १२८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९९ ॥ Fara

पृष्ठ 1285

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द्विशततमोऽध्यायः जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता युधिष्ठिर उवाच

किमुत्तरं तदा तौ स्म चक्रतुस्तस्य भाषिते ।

ब्राह्मणो वाथवा राजा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! उस समय विरूपके पूर्वोक्त वचन कहनेपर ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकु उन दोनोंने उसे क्या उत्तर दिया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

अथवा तौ गतौ तत्र यदेतत् कीर्तितं त्वया ।

संवादो वा तयोः कोऽभूत् किं वा तौ तत्र चक्रतुः ॥ २ ॥

तथा आपने जो यह सद्योमुक्ति, क्रममुक्ति और लोकान्तरकी प्राप्तिरूप तीन प्रकारकी गति बतायी है, उनमेंसे वे दोनों किस गतिको प्राप्त हुए? उस समय उन दोनोंमें क्या बातचीत हुई और उन्होंने क्या किया? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

तथेत्येवं प्रतिश्रुत्य धर्मं सम्पूज्य च प्रभो ।

यमं कालं च मृत्युं च स्वर्गं सम्पूज्य चार्हतः ॥ ३ ॥

पूर्वं ये चापरे तत्र समेता ब्राह्मणर्षभाः ।

सर्वान् सम्पूज्य शिरसा राजानं सोऽब्रवीद् द्विजः ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा — प्रभो! तब ' बहुत अच्छा' कहकर ब्राह्मणने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग— इन सभी पूजनीय देवताओंका पूजन किया । वहाँ पहलेसे जो ब्राह्मण मौजूद थे और दूसरे भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबके चरणोंमें सिर झुकाकर सबकी यथोचित पूजा करके ब्राह्मणने राजासे कहा- ॥ ३-४ ॥

फलेनानेन संयुक्तो राजर्षे गच्छ मुख्यताम् ।

भवता चाभ्यनुज्ञातो जपेयं भूय एव ह ॥ ५ ॥

‘ राजर्षे! इस फलसे संयुक्त होकर आप श्रेष्ठ गतिको प्राप्त कीजिये और आपकी आज्ञा लेकर मैं फिर जपमें लग जाऊँगा ॥ ५ ॥

वरश्च मम पूर्वं हि दत्तो देव्या महाबल ।

श्रद्धा ते जपतो नित्यं भवत्विति विशाम्पते ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1286

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' महाबली प्रजानाथ! मुझे देवी सावित्रीने वर दिया है कि जपमें तुम्हारी नित्य श्रद्धा बनी रहेगी ' ॥ ६ ॥

राजोवाच

यद्येवमफला सिद्धिः श्रद्धा च जपितुं तव ।

गच्छ विप्र मया सार्धं जापकं फलमाप्नुहि ॥ ७ ॥

राजाने कहा — विप्रवर! यदि इस प्रकार मुझे फल समर्पण करनेके कारण आपको फलकी प्राप्ति नहीं हो रही है और पुनः जप करनेमें ही आपकी श्रद्धा होती है तो आप मेरे साथ ही चलें और जप- दानजनित फलको प्राप्त करें ॥ ७ ॥

ब्राह्मणउवाच

कृतः प्रयत्नः सुमहान् सर्वेषां संनिधाविह ।

सह तुल्यफलावावं गच्छावो यत्र नौ गतिः ॥ ८ ॥

ब्राह्मणने कहा- राजन्! मैंने यहाँ सबके समीप आपको अपने जपका फल देनेके लिये महान् प्रयत्न किया है; फिर भी आपका आग्रह साथ- साथ फलका उपभोग करनेका रहा है; अतः हम दोनों समान फलके ही भागी हों । चलिये, जहाँतक हम दोनोंकी गति हो सके, साथ- साथ चलें ॥ ८ ॥

भीष्म उवाच

व्यवसायं तयोस्तत्र विदित्वा त्रिदशेश्वरः ।

सह देवैरुपययौ लोकपालैस्तथैव च ॥ ९ ॥

साध्याश्च विश्वे मरुतो वाद्यानि सुमहान्ति च ।

नद्यः शैलाः समुद्राश्च तीर्थानि विविधानि च ॥ १० ॥

तपांसि संयोगविधिर्वेदाः स्तोभाः सरस्वती ।

नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहूः ॥ ११ ॥

गन्धर्वश्चित्रसेनश्च परिवारगणैर्युतः ।

नागाः सिद्धाश्च मुनयो देवदेवः प्रजापतिः ॥ १२ ॥

विष्णुः सहस्रशीर्षश्च देवोऽचिन्त्यः समागमत् ।

अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि वा विभो ॥ १३ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये । उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवगण और मरुद्गण भी थे । बड़े - बड़े वाद्य बज रहे थे । नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ ( साम- गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि ), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित

पृष्ठ 1287

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चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे । प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे ॥ ९ –१३ ॥

पुष्पवर्षाणि दिव्यानि तत्र तेषां महात्मनाम् ।

ननृतुश्चाप्सरः संघास्तत्र तत्र समन्ततः ॥ १४ ॥

वहाँ उन महात्माओंपर दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगी । झुंडकी झुंड अप्सराएँ सब ओर नृत्य करने लगीं ॥ १४ ॥

अथ स्वर्गस्तथा रूपी ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ।

संसिद्धस्त्वं महाभाग त्वं च सिद्धस्तथा नृप ॥ १५ ॥

तदनन्तर मूर्तिमान् स्वर्गने ब्राह्मणसे कहा - ' महाभाग! तुम सिद्ध हो गये । ' फिर राजासे कहा— ‘ नरेश्वर! तुम भी सिद्ध हो गये ' ॥ १५ ॥

अथ तौ सहितौ राजन्नन्योन्यविधिना ततः ।

विषयप्रतिसंहारमुभावेव प्रचक्रतुः ॥ १६ ॥

राजन्! तदनन्तर वे दोनों एक- दूसरेका उपकार करते हुए एक साथ हो गये । उन्होंने एक ही साथ अपने मनको विषयोंकी ओरसे हटा लिया ॥ १६ ॥

प्राणापानौ तथोदानं समानं व्यानमेव च ।

एवं तौ मनसि स्थाप्य दधतुः प्राणयोर्मनः ॥ १७ ॥

उपस्थितकृतौ तौ च नासिकाग्रमधो भ्रुवोः ।

भ्रुकुट्या चैव मनसा शनैर्धारयतस्तदा ॥ १८ ॥

तदनन्तर प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान-इन पाँचों प्राण वायुओंको हृदयमें स्थापित किया; इस प्रकार स्थित हुए उन दोनोंने मनको प्राण और अपानके साथ मिला दिया। भौहोंके नीचे नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए मनसहित प्राण- अपानको उन्होंने दोनों भौहोंके बीच स्थिर किया ॥ १७-१८ ॥

निश्चेष्टाभ्यां शरीराभ्यां स्थिरदृष्टी समाहितौ ।

जितात्मानौ तथाऽऽधाय मूर्धन्यात्मानमेव च ॥ १ ९ ॥

इस प्रकार मनको जीतकर दृष्टिको एकाग्र करके उन दोनोंने प्राणसहित मनको सुषुम्णा मार्गद्वारा मूर्धामें स्थापित कर दिया । फिर वे दोनों समाधिमें स्थित हो गये । उस समय उन दोनोंके शरीर जड़की भाँति चेष्टाहीन हो गये ॥ १ ९ ॥

तालुदेशमथोद्दाल्य ब्राह्मणस्य महात्मनः ।

ज्योतिर्ज्वाला सुमहती जगाम त्रिदिवं तदा ॥ २० ॥

इसी समय महात्मा ब्राह्मणके तालुदेश (ब्रह्म- रन्ध्र ) का भेदन करके एक ज्योतिर्मयी विशाल ज्वाला निकली और स्वर्गकी ओर चल दी ॥ २० ॥

हाहाकारस्तथा दिक्षु सर्वेषां सुमहानभूत् ।

पृष्ठ 1288

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तज्ज्योतिः स्तूयमानं स्म ब्रह्माणं प्राविशत् तदा ॥ २१ ॥

ततः स्वागतमित्याह तत् तेजः प्रपितामहः ।

प्रादेशमात्रं पुरुषं प्रत्युद्गम्य विशाम्पते ॥ २२ ॥

फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् कोलाहल मच गया । उस ज्योतिकी सभी लोग स्तुति करने लगे । प्रजानाथ! प्रादेशके बराबर लंबे पुरुषका आकार धारण किये वह तेजःपुंज ब्रह्माजीके पास पहुँचा, तब ब्रह्माजीने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया ॥ २१-२२ ॥

भूयश्चैवापरं प्राह वचनं मधुरं तदा ।

जापकैस्तुल्यफलता योगानां नात्र संशयः ॥ २३ ॥

ब्रह्माजीने उस तेजोमय पुरुषका स्वागत करनेके पश्चात् पुनः उससे मधुर वाणी इस प्रकार कहा— ‘ विप्रवर! योगियोंको जो फल मिलता है, निस्संदेह वही फल जप करनेवालोंको भी प्राप्त होता है ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1289

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8 जापक ब्राह्मण एवं महाराज इक्ष्वाकुकी ऊर्ध्वगति

पृष्ठ 1290

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योगस्य तावदेतेभ्यः प्रत्यक्षं फलदर्शनम् ।

जापकानां विशिष्टं तु प्रत्युत्थानं समाहितम् ॥ २४ ॥

‘ योगियोंको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह इन सभासदोंने प्रत्यक्ष देखा है; किंतु जापकोंको उनसे भी श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, यह सूचित करनेके लिये ही मैंने उठकर तुम्हारा स्वागत किया है ॥ २४ ॥

उष्यतां मयि चेत्युक्त्वा चेतयत् सततं पुनः ।

अथास्यं प्रविवेशास्य ब्राह्मणो विगतज्वरः ॥ २५ ॥

' अब तुम मेरे भीतर सुखपूर्वक निवास करो । ' इतना कहकर ब्रह्माजीने उसे पुनः तत्त्वज्ञान प्रदान किया । आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण- तेज रोग - शोकसे मुक्त हो ब्रह्माजीके मुखारविन्दमें प्रविष्ट हो गया ॥ २५ ॥

राजाप्येतेन विधिना भगवन्तं पितामहम् ।

यथैव द्विजशार्दूलस्तथैव प्राविशत् तदा ॥ २६ ॥

राजा इक्ष्वाकु भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी ही भाँति विधिपूर्वक भगवान् ब्रह्माजीके मुखारविन्दमें प्रविष्ट हो गये ॥ २६ ॥

स्वयम्भुवमथो देवा अभिवाद्य ततोऽब्रुवन् ।

जापकानां विशिष्टं तु प्रत्युत्थानं समाहितम् ॥ २७ ॥

तदनन्तर देवताओंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा – ' भगवन्! आपने जो आगे बढ़कर इस ब्राह्मणका स्वागत किया है, इससे सिद्ध हो गया कि जापकोंको योगियोंसे भी श्रेष्ठ फलकी प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥

जापकार्थमयं यत्नो यदर्थं वयमागताः ।

कृतपूजाविमौ तुल्यौ त्वया तुल्यफलाविमौ ॥ २८ ॥

‘इस जापक ब्राह्मणको सद्गति देनेके लिये ही आपने ऐसा उद्योग किया था । इसीको देखनेके लिये हमलोग भी आये थे । आपने इन दोनोंका समानरूपसे आदर किया और ये दोनों ही एक- सी स्थितिमें पहुँचकर आपके समान फलके भागी हुए हैं ॥ २८ ॥

योगजापकयोर्दृष्टं फलं सुमहदद्य वै ।

सर्वाल्लोँकानतिक्रम्य गच्छेतां यत्र वाञ्छितम् ॥ २ ९ ॥

‘ आज हमलोगोंने योगी और जापकके महान् फलको प्रत्यक्ष देख लिया । वे सम्पूर्ण लोकोंको लाँघकर जहाँ उनकी इच्छा हो, जा सकते हैं ' ॥ २ ९ ॥ ब्रह्मोवाच

महास्मृतिं पठेद् यस्तु तथैवानुस्मृतिं शुभाम् ।

तावप्येतेन विधिना गच्छेतां मत्सलोकताम् ॥ ३० ॥

यश्च योगे भवेद् भक्तः सोऽपि नास्त्यत्र संशयः ।