श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1341–1350
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1341–1350
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नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान्की स्तुति युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ युधि सत्यपराक्रम ।
श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन कृष्णमव्ययमीश्वरम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- युद्धमें सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले महाप्राज्ञ पितामह! भगवान् श्रीकृष्ण अविनाशी ईश्वर हैं; मैं पूर्णरूपसे इनके महत्त्वका वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
यच्चास्य तेजः सुमहद् यच्च कर्म पुरा कृतम् ।
तन्मे सर्वं यथातत्त्वं ब्रूहि त्वं पुरुषर्षभ ॥ २ ॥
पुरुषप्रवर! इनका जो महान् तेज है, इन्होंने पूर्वकालमें जो महान् कर्म किया है, वह सब आप मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ २ ॥
तिर्यग्योनिगतं रूपं कथं धारितवान् प्रभुः केन कार्यनिसर्गेण तमाख्याहि महाबल ॥ ३ ॥
महाबली पितामह! सम्पूर्ण जगत्के प्रभु होकर भी इन्होंने किस निमित्तसे तिर्यग्योनिमें जन्म ग्रहण किया; यह मुझे बताइये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
पुराहं मृगयां यातो मार्कण्डेयाश्रमे स्थितः ।
तत्रापश्यं मुनिगणान् समासीनान् सहस्रशः ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! पहलेकी बात है, मैं शिकार खेलनेके लिये वनमें गया और
मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर ठहरा । वहाँ मैंने सहस्रों मुनियोंको बैठे देखा ॥ ४ ॥
ततस्ते मधुपर्केण पूजां चक्रुरथो मयि ।
प्रतिगृह्य च तां पूजां प्रत्यनन्दमृषीनहम् ॥ ५ ॥
मेरे जानेपर उन महर्षियोंने मधुपर्क समर्पित करके मेरा आतिथ्य सत्कार किया । मैंने भी उनका सत्कार ग्रहण करके उन सभी महर्षियोंका अभिनन्दन किया ॥ ५ ॥
कथैषा कथिता तत्र कश्यपेन महर्षिणा ।
मनःप्रह्लादिनीं दिव्यां तामिहैकमनाः शृणु ॥ ६ ॥
फिर महर्षि कश्यपने मनको आनन्द प्रदान करनेवाली यह दिव्य कथा मुझे सुनायी । मैं उसे कहता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥
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पुरा दानवमुख्या हि क्रोधलोभसमन्विताः ।
बलेन मत्ताः शतशो नरकाद्या महासुराः ॥ ७ ॥
पूर्वकालमें नरकासुर आदि सैकड़ों मुख्य- मुख्य दानव क्रोध और लोभके वशीभूत हो बलके मदसे मतवाले हो गये थे ॥ ७ ॥
तथैव चान्ये बहवो दानवा युद्धदुर्मदाः ।
न सहन्ते स्म देवानां समृद्धिं तामनुत्तमाम् ॥ ८ ॥
इनके सिवा और भी बहुत- से रणदुर्मद दानव थे, जो देवताओंकी उत्तम समृद्धिको सहन नहीं कर पाते थे ॥
दानवैरर्द्यमानास्तु देवा देवर्षयस्तथा ।
न शर्म लेभिरे राजन् विशमानास्ततस्ततः ॥ ९ ॥
राजन्! उन दानवोंसे पीड़ित हो देवता और देवर्षि कहीं चैन नहीं पाते थे । वे इधर- उधर लुकते - छिपते फिरते थे ॥ ९ ॥
पृथिवीमार्तरूपां ते समपश्यन् दिवौकसः ।
दानवैरभिसंस्तीर्णां घोररूपैर्महाबलैः ॥ १० ॥
समूचे भूमण्डलमें भयानक रूपधारी महाबली दानव फैल गये थे । देवताओंने देखा, यह पृथ्वी दानवोंके पापभारसे पीड़ित एवं आर्त हो उठी है ॥ १० ॥
भारार्तामप्रहृष्टां च दुःखितां संनिमज्जतीम् ।
अथादितेयाः संत्रस्ता ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ॥ ११ ॥
यह भारसे व्याकुल, हर्ष और उल्लाससे शून्य तथा दुखी हो रसातलमें डूब रही है । यह देखकर अदितिके सभी पुत्र भयसे थर्रा उठे और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥
कथं शक्ष्यामहे ब्रह्मन् दानवैरभिमर्दनम् ।
स्वयम्भूस्तानुवाचेदं निसृष्टोऽत्र विधिर्मया ॥ १२ ॥
‘ ब्रह्मन्! दानवलोग जो हमें इस प्रकार रौंद रहे हैं, इसे हम किस प्रकार सह सकेंगे? ' तब स्वयम्भू ब्रह्माने उनसे इस प्रकार कहा - ' देवताओ! इस विपत्तिको दूर करनेके लिये मैंने उपाय कर दिया है ॥ १२ ॥
ते वरेणाभिसम्पन्ना बलेन च मदेन च ।
नावबुध्यन्ति सम्मूढा विष्णुमव्यक्तदर्शनम् ॥ १३ ॥
वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि । ‘ वे दानव वर पाकर बल और अभिमानसे मत्त हो उठे हैं । वे मूढ़ दैत्य अव्यक्तस्वरूप भगवान् विष्णुको नहीं जानते, जो देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष हैं । उन्होंने वाराह रूप धारण कर रखा है ॥ १३३ ॥
एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमाः ॥ १४ ॥
अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः ।
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शमयिष्यति तच्छ्रुत्वा जहृषुः सुरसत्तमाः ॥ १५ ॥
‘ वे सहस्रों घोर दैत्य और दानवाधम भूमिके भीतर पाताललोकमें निवास करते हैं; भगवान् वाराह वेगपूर्वक वहीं जाकर उन सबका विनाश कर देंगे । यह सुनकर सभी श्रेष्ठ देवता हर्षसे खिल उठे ॥ १४-१५ ॥
ततो विष्णुर्महातेजा वाराहं रूपमास्थितः ।
अन्तर्भूमिं सम्प्रविश्य जगाम दितिजान् प्रति ॥ १६ ॥
उधर महातेजस्वी भगवान् विष्णु वाराहरूप धारण कर बड़े वेगसे भूमिके भीतर प्रविष्ट हुए और दैत्योंके पास जा पहुँचे ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा च सहिताः सर्वे दैत्याः सत्त्वममानुषम् ।
प्रसह्य तरसा सर्वे संतस्थुः कालमोहिताः ॥ १७ ॥
उस अलौकिक जन्तुको देखकर सब दैत्य एक साथ हो वेगपूर्वक उसका सामना करनेके लिये हठात् खड़े हो गये; क्योंकि वे कालसे मोहित हो रहे थे ।
ततस्ते समभिद्रुत्य वराहं जगृहुः समम् ।
संक्रुद्धाश्च वराहं तं व्यकर्षन्त समन्ततः ॥ १८ ॥
उन सबने कुपित होकर भगवान् वाराहपर एक साथ धावा बोल दिया और उन्हें हाथोंहाथ पकड़ लिया । पकड़कर वे वाराहदेवको चारों ओरसे खींचने लगे ॥ १८ ॥
दानवेन्द्रा महाकाया महावीर्यबलोच्छ्रिताः ।
नाशक्नुवंश्च किंचित् ते तस्य कर्तुं तदा विभो ॥ १ ९ ॥
प्रभो! यद्यपि वे विशालकाय दानवराज महान् बल और वीर्यसे सम्पन्न थे, तो भी उन भगवान्का कुछ बिगाड़ न सके ॥ १ ९ ॥
ततोऽगच्छत् विस्मयं ते दानवेन्द्रा भयं तथा ।
संशयं गतमात्मानं मेनिरे च सहस्रशः ॥ २० ॥
इससे उन दानवेन्द्रोंको बड़ा विस्मय और भय प्राप्त हुआ । वे सहस्रों दैत्य अपने आपको जीवनके संशयमें पड़ा हुआ मानने लगे ॥ २० ॥
ततो देवाधिदेवः स योगात्मा योगसारथिः ।
योगमास्थाय भगवांस्तदा भरतसत्तम ॥ २१ ॥
विननाद महानादं क्षोभयन् दैत्यदानवान् ।
संनादिता येन लोकाः सर्वाश्चैव दिशो दश ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद योगस्वरूप योगके नियन्ता देवाधिदेव भगवान् वाराह दैत्यों और दानवोंको क्षोभमें डालनेके लिये योगका आश्रय ले बड़े जोर- जोरसे गर्जना करने लगे । उस भीषण गर्जनासे तीनों लोक और ये सारी दसों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ २१-२२ ॥
तेन संनादशब्देन लोकानां क्षोभ आगमत् ।
संत्रस्ताश्च भृशं लोके देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ २३ ॥
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उस भीषण गर्जनासे समस्त लोकोंमें हलचल मच गयी । स्वर्गलोकमें इन्द्र आदि देवता भी अत्यन्त भयभीत हो उठे ॥ २३ ॥
निर्विचेष्टं जगच्चापि बभूवातिभृशं तदा ।
स्थावरं जङ्गमं चैव तेन नादेन मोहितम् ॥ २४ ॥
उस सिंहनादसे मोहित होकर समस्त चराचर जगत् अत्यन्त चेष्टारहित हो गया ॥ २४ ॥
ततस्ते दानवाः सर्वे तेन नादेन भीषिताः ।
पेतुर्गतासवश्चैव विष्णुतेजः प्रमोहिताः ॥ २५ ॥
तदनन्तर वे सब दानव भगवान्की उस गर्जनासे भयभीत हो प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । वे सब - के - सब भगवान् विष्णुके तेजसे मोहित हो अपनी सुध- बुध खो बैठे थे ॥ २५ ॥
रसातलगतश्चापि वराहस्त्रिदशद्विषाम् ।
खुरैर्विदारयामास मांसमेदोऽस्थिसंचयान् ॥ २६ ॥
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भगवान् वराहकी ऋषियोंद्वारा स्तुति
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रसातलमें जाकर भी भगवान् वाराहने देवद्रोही असुरोंको अपने खुरोंसे विदीर्ण कर दिया । उनके मांस, मेदा और हड्डियोंके ढेर लग गये थे ॥ २६ ॥
नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः ।
पद्मनाभो महायोगी भूताचार्यः स भूतराट् ॥ २७ ॥
सम्पूर्ण प्राणियोंके आचार्य और स्वामी महायोगी वे भगवान् पद्मनाभ अपने महान् सिंहनादके कारण ‘ सनातन*' माने गये हैं ॥ २७ ॥
ततो देवगणाः सर्वे पितामहमुपाद्रवन् ।
तत्र गत्वा महात्मानमूचुश्चैव जगत्पतिम् ॥ २८ ॥
नादोऽयं कीदृशो देव नैतं विद्म वयं प्रभो ।
कोऽसौ हि कस्य वा नादो येन विह्वलितं जगत् ॥ २ ९ ॥
देवाश्च दानवाश्चैव मोहितास्तस्य तेजसा । उनके उस सिंहनादको सुनकर सब देवता जगदीश्वर भगवान् ब्रह्माजीके पास गये । वहाँ पहुँचकर वे इस प्रकार बोले— ' देव! प्रभो! यह कैसा सिंहनाद है? इसे हमलोग नहीं जानते ।
वह कौन वीर है? अथवा किसकी गर्जना है? जिसने इस जगत्को व्याकुल कर दिया है ।
देवता और दानव सभी उसके तेजसे मोहित हो रहे हैं ' ॥ २८-२९ ३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुर्वाराहं रूपमास्थितः ।
उदतिष्ठन्महाबाहो स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ३० ॥
महाबाहो! इसी बीचमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु जलसे ऊपर उठे । उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ ३० ॥
पितामहउवाच
निहत्य दानवपतीन् महावर्ष्मा महाबलः ।
एष देवो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजी बोले – देवताओ! ये महाकाय महाबली महायोगी भूतभावन भूतात्मा भगवान् विष्णु हैं, जो दानवराजोंका वध करके आ रहे हैं ॥ ३१ ॥
सर्वभूतेश्वरो योगी मुनिरात्मा तथाऽऽत्मनः ।
स्थिरीभवत कृष्णोऽयं सर्वविघ्नविनाशनः ॥ ३२ ॥
ये सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर, योगी, मुनि तथा आत्माके भी आत्मा हैं, ये ही समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाले श्रीकृष्ण हैं; अतः तुमलोग धैर्य धारण करो ॥ ३२ ॥
कृत्वा कर्मातिसाध्वेतदशक्यममितप्रभः ।
समायातः स्वमात्मानं महाभागो महाद्युतिः ॥ ३३ ॥
अनन्त प्रभासे परिपूर्ण, महातेजस्वी एवं महान् सौभाग्यके आश्रयभूत ये भगवान् अत्यन्त उत्तम और दूसरोंके लिये असम्भव कार्य करके आ रहे हैं ॥ ३३ ॥
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पद्मनाभो महायोगी महात्मा भूतभावनः ।
न संतापो न भीः कार्या शोको वा सुरसत्तमाः ॥ ३४ ॥
सुरश्रेष्ठगण! ये महायोगी भूतभावन महात्मा पद्मनाभ हैं; अतः तुम्हें अपने मनसे संताप, भय एवं शोकको दूर कर देना चाहिये ॥ ३४ ॥
विधिरेष प्रभावश्च कालः संक्षयकारकः ।
लोकान् धारयता तेन नादो मुक्तो महात्मना ॥ ३५ ॥
ये ही विधि हैं, ये ही प्रभाव हैं और ये ही संहारकारी काल हैं, इन्हीं परमात्माने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हुए यह भीषण सिंहनाद किया है ॥ ३५ ॥
स एष हि महाबाहुः सर्वलोकनमस्कृतः ।
अच्युतः पुण्डरीकाक्षः सर्वभूतादिरीश्वरः ॥ ३६ ॥
ये सम्पूर्ण भूतोंके आदि कारण, सर्वलोकवन्दित ईश्वर महाबाहु कमलनयन अच्युत हैं ॥ ३६ ॥
(युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
प्रयाणकाले किं जप्यं मोक्षिभिस्तत्त्वचिन्तकैः ॥
युधिष्ठिरने पूछा- सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले तत्त्व-चिन्तकोंको मृत्युकालमें किस मन्त्रका जप करना चाहिये ॥
किमनुस्मरन् कुरुश्रेष्ठ मरणे पर्युपस्थिते ।
प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
कुरुश्रेष्ठ! मृत्युका समय उपस्थित होनेपर किसका चिन्तन करनेवाला पुरुष परम सिद्धिको प्राप्त हो सकता है? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ भीष्म उवाच
सद्युक्तिसहितः सूक्ष्म उक्तः प्रश्नस्त्वयानघ ।
शृणुष्वावहितो राजन् नारदेन पुरा श्रुतम् ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! निष्पाप नरेश! तुमने जो प्रश्न उपस्थित किया है, वह उत्तम युक्तियुक्त और सूक्ष्म है । उसे सावधान होकर सुनो । जो पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे सुना था, वहीं मैं तुमसे कहता हूँ ॥
श्रीवत्साङ्कं जगद्बीजमनन्तं लोकसाक्षिणम् ।
पुरा नारायणं देवं नारदः परिपृष्टवान् ॥
जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है, जो इस जगत्के बीज ( मूल कारण) हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है तथा जो इस जगत्के साक्षी हैं, उन्हीं भगवान् नारायणसे पूर्वकालमें नारदजीने इस प्रकार प्रश्न किया ॥
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नारद उवाच
त्वामक्षरं परं ब्रह्म निर्गुणं तमसः परम् ।
आहुर्वेद्यं परं धाम ब्रह्मादिकमलोद्भवम् ॥
भगवन् भूतभव्येश श्रद्दधानैर्जितेन्द्रियैः ।
कथं भक्तैर्विचिन्त्योऽसि योगिभिर्मोक्षकांक्षिभिः ॥
नारदजीने पूछा — भगवन्! महर्षिगण कहते हैं, आप अविनाशी ( नित्य ), परब्रह्म, निर्गुण, अज्ञानान्धकार एवं तमोगुणसे अतीत, विद्याके अधिपति, परम धामस्वरूप, ब्रह्मा तथा उनकी प्राकट्यभूमि- आदिकमलके उत्पत्ति-स्थान हैं । भूत और भविष्यके स्वामी परमेश्वर! श्रद्धालु और जितेन्द्रिय भक्तों तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले योगियोंको आपके स्वरूपका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? ॥
किं च जप्यं जपेन्नित्यं कल्यमुत्थाय मानवः ।
कथं युञ्जन् सदा ध्यायेद् ब्रूहि तत्त्वं सनातनम् ॥
मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर किस जपनीय मन्त्रका जप करे और योगी पुरुष किस प्रकार निरन्तर ध्यान करे? आप इस सनातन तत्त्वका वर्णन कीजिये ॥
श्रुत्वा तस्य तु देवर्षेर्वाक्यं वाचस्पतिः स्वयम् ।
प्रोवाच भगवान् विष्णुर्नारदं वरदः प्रभुः ॥
देवर्षि नारदका यह वचन सुनकर वाणीके अधिपति वरदायक भगवान् विष्णुने नारदजीसे इस प्रकार कहा ॥ श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि इमां दिव्यामनुस्मृतिम् ।
यामधीत्य प्रयाणे तु मद्भावायोपपद्यते ॥
श्रीभगवान् बोले – देवर्षे! मैं हर्षपूर्वक तुम्हारे सामने इस दिव्य अनुस्मृतिका वर्णन करता हूँ। मृत्युकालमें जिसका अध्ययन और श्रवण करके मनुष्य मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥
ओङ्कारमग्रतः कृत्वा मां नमस्कृत्य नारद ।
एकाग्रः प्रयतो भूत्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥
ओं नमो भगवते वासुदेवायेति । नारद! आदिमें ओंकारका उच्चारण करके मुझे नमस्कार करे। अर्थात् एकाग्र एवं पवित्रचित्त होकर इस मन्त्रका उच्चारण करे– 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' इति ॥ इत्युक्तो नारदः प्राह प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥ सर्वदेवेश्वरं विष्णुं सर्वात्मानं हरिं प्रभुम् ।
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भगवान्के ऐसा कहनेपर नारदजी हाथ जोड़ प्रणाम करके खड़े हो गये और उन सर्वदेवेश्वर सर्वात्मा एवं पापहारी प्रभु श्रीविष्णुसे बोले ॥ नारद उवाच अव्यक्तं शाश्वतं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् ॥ प्रपद्ये प्राञ्जलिर्विष्णुमक्षरं परमं पदम् । नारदजीने कहा – प्रभो! जो अव्यक्त सनातन देवता, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुरुषोत्तम, अविनाशी और परम पदस्वरूप हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं हाथ जोड़कर शरण लेता हूँ ॥ पुराणं प्रभवं नित्यमक्षयं लोकसाक्षिणम् ॥ प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षमीशं भक्तानुकम्पिनम् । जो पुराणपुरुष, सबकी उत्पत्तिके कारण, नित्य, अक्षय और सम्पूर्ण जगत्के साक्षी हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, उन भक्तवत्सल भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ॥ लोकनाथं सहस्राक्षमद्भुतं परमं पदम् ॥ भगवन्तं प्रपन्नोऽस्मि भूतभव्यभवत्प्रभुम् । जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी तथा संरक्षक हैं, जिनके सहस्रों नेत्र हैं; तथा जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन अद्भुत परमपदरूप भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता
हूँ।
स्रष्टारं सर्वलोकानामनन्तं विश्वतोमुखम् ॥
पद्मनाथं हृषीकेशं प्रपद्ये सत्यमच्युतम् । समस्त लोकोंके स्रष्टा और सब ओर मुखवाले, अनन्त, सत्य, अच्युत एवं सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् पद्मनाभकी मैं शरण लेता हूँ ॥ हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भं परतः परम् ॥ प्रभोः प्रभुमनाद्यन्तं प्रपद्ये तं रविप्रभम् । जो हिरण्यगर्भ, अमृतस्वरूप, पृथ्वीको गर्भमें धारण करनेवाले, परात्पर तथा प्रभुओंके भी प्रभु हैं, उन अनादि, अनन्त तथा सूर्यके समान कान्तिवाले भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ ॥ सहस्रशीर्षं पुरुषं महर्षिं तत्त्वभावनम् ॥ प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् । जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी आत्मा हैं, तत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले महर्षि कपिलस्वरूप हैं, उन सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयप्रद भगवान् श्रीहरिकी शरण लेता हूँ॥ नारायणं पुराणर्षिं योगात्मानं सनातनम् ॥
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संस्थानं सर्वतत्त्वानां प्रपद्ये ध्रुवमीश्वरम् । जो पुरातन ऋषि नारायण हैं, योगात्मा हैं, सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण तत्त्वोंके अधिष्ठान एवं अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ ॥ यः प्रभुः सर्वभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ॥ चराचरगुरुर्विष्णुः स मे देवः प्रसीदतु । जो सम्पूर्ण भूतोंके प्रभु हैं, जिन्होंने इस समस्त संसारको व्याप्त कर रखा है; तथा जो चर और अचर प्राणियोंके गुरु हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ॥ यस्मादुत्पद्यते ब्रह्मा पद्मयोनिः पितामहः ॥ ब्रह्मयोनिर्हि विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु । जिनसे पद्मयोनि पितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति होती है; तथा जो वेद और ब्राह्मणोंकी योनि हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ॥
यः पुरा प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके परावरे ॥
आभूतसम्प्लवे चैव प्रलीने प्रकृतौ महान् ।
एकस्तिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥
प्राचीन कालमें महाप्रलय प्राप्त होनेपर जब सभी चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, ब्रह्मा आदि देवताओंका भी लय हो जाता है और संसारकी छोटी- बड़ी सभी वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं; तथा सम्पूर्ण भूतोंका क्रमशः लय होकर जब प्रकृतिमें महत्तत्त्व भी विलीन हो जाता है, उस समय जो एकमात्र शेष रह जाते हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ॥
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च ।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥
चार, चार, दो, पाँच तथा दो - इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंद्वारा जिन्हें आहुति दी जाती है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ॥
पर्जन्यः पृथिवी सस्यं कालो धर्मः क्रियाक्रिये ।
गुणाकरः स मे बभ्रुर्वासुदेवः प्रसीदतु ॥
मेघ, पृथ्वी, सस्य, काल, धर्म, कर्म और कर्मका अभाव– ये सब जिनके स्वरूप हैं, गुणोंके भण्डाररूप वे श्यामवर्ण भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों ॥
अग्नीषोमार्कताराणां ब्रह्मरुद्रेन्द्रयोगिनाम् ।
यस्तेजयति तेजांसि स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥
जो अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, तारागण, ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके भी तेजको जीत लेते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ॥
योगावास नमस्तुभ्यं सर्वावास वरप्रद ।
यज्ञगर्भ हिरण्याङ्ग पञ्चयज्ञ नमोऽस्तु ते ॥