05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1601–1610

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1601–1610

पृष्ठ 1601

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1601 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमके धर्म और महिमाका वर्णन भीष्म उवाच

प्रोक्ता गृहस्थवृत्तिस्ते विहिता या मनीषिभिः ।

तदनन्तरमुक्तं यत् तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १ ॥

( व्यासेन कथितं पूर्वं सुताय सुमहात्मने । ) भीष्मजी कहते हैं - बेटा युधिष्ठिर! मनीषी पुरुषोंद्वारा जिसका विधान एवं आचरण किया गया है, उस गृहस्थ वृत्तिका मैंने तुमसे वर्णन किया । तदनन्तर व्यासजीने अपने महात्मा पुत्र शुकदेवसे जो कुछ कहा था, वह सब बताता हूँ, सुनो ॥ १ ॥

क्रमशस्त्ववधूयैनां तृतीयां वृत्तिमुत्तमाम् ।

संयोगव्रतखिन्नानां वानप्रस्थाश्रमौकसाम् ॥ २ ॥

श्रूयतां पुत्र भद्रं ते सर्वलोकाश्रमात्मनाम् ।

प्रेक्षापूर्वं प्रवृत्तानां पुण्यदेशनिवासिनाम् ॥ ३ ॥

वत्स! तुम्हारा कल्याण हो । गृहस्थकी इस उत्तम तृतीय वृत्तिकी भी उपेक्षा करके सहधर्मिणीके संयोगसे किये जानेवाले व्रत -नियमोंद्वारा जो खिन्न हो चुके हैं तथा वानप्रस्थ-आश्रमको जिन्होंने अपना आश्रय बना लिया है, सम्पूर्ण लोक और आश्रम जिनके अपने ही स्वरूप हैं, जो विचारपूर्वक व्रत और नियमोंमें प्रवृत्त हैं तथा पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं, ऐसे वनवासी मुनियोंका जो धर्म है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ २-३ ॥ व्यासउवाच

गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वलीपलितमात्मनः ।

अपत्यस्यैव चापत्यं वनमेव तदा श्रयेत् ॥ ४ ॥

तृतीयमायुषो भागं वानप्रस्थाश्रमे वसेत् ।

तानेवाग्नीन् परिचरेद् यजमानो दिवौकसः ॥ ५ ॥

व्यासजी बोले- बेटा! गृहस्थ पुरुष जब अपने सिरके बाल सफेद दिखायी दें, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जायँ और पुत्रको भी पुत्रकी प्राप्ति हो जाय तो अपनी आयुका तीसरा भाग व्यतीत करनेके लिये वनमें जाय और वानप्रस्थ आश्रममें रहे । वह वानप्रस्थ आश्रममें भी उन्हीं अग्नियोंका सेवन करे, जिनकी गृहस्थाश्रममें उपासना करता था । साथ ही वह प्रतिदिन देवाराधन भी करता रहे ॥ ४-५ ॥

नियतो नियताहारः षष्ठभुक्तोऽप्रमत्तवान् ।

तदग्निहोत्रं ता गावो यज्ञाङ्गानि च सर्वशः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1602

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1602 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वानप्रस्थी पुरुष नियमके साथ रहे, नियमानुकूल भोजन करे । दिनके छठे भाग अर्थात् तीसरे पहरमें एक बार अन्न ग्रहण करे और प्रमादसे बचा रहे । गृहस्थाश्रमकी ही भाँति अग्निहोत्र, वैसी ही गो- सेवा तथा उसी प्रकार यज्ञके सम्पूर्ण अंगोंका सम्पादन करना वानप्रस्थका धर्म है ॥ ६ ॥

अफालकृष्टं व्रीहियवं नीवारं विघसानि च ।

हवींषि सम्प्रयच्छेत मखेष्वत्रापि पञ्चसु ॥ ७ ॥

वनवासी मुनि बिना जोती हुई पृथ्वीसे पैदा हुआ धान, जौ, नीवार तथा विघस ( अतिथियोंको देनेसे बचे हुए ) अन्नसे जीवन-निर्वाह करे । वानप्रस्थमें भी पंचमहायज्ञोंमें हविष्य वितरण करे ॥ ७ ॥

वानप्रस्थाश्रमेऽप्येताश्चतस्रो वृत्तयः स्मृताः ।

सद्यःप्रक्षालकाः केचित् केचिन्मासिकसंचयाः ॥ ८ ॥

वानप्रस्थ - आश्रममें भी चार प्रकारकी वृत्तियाँ मानी गयी हैं । कोई उतने ही अन्नका संग्रह करते हैं कि तुरंत बना-खाकर बर्तनको धो- माँजकर साफ कर लें अर्थात् वे दूसरे दिनके लिये कुछ नहीं बचाते। कुछ दूसरे लोग वे हैं, जो एक महीनेके लिये अनाजका संग्रह करते हैं ॥ ८ ॥

वार्षिकं संचयं केचित् केचिद् द्वादशवार्षिकम् ।

कुर्वन्त्यतिथिपूजार्थं यज्ञतन्त्रार्थमेव वा ॥ ९ ॥

कोई वर्षभरके लिये और कोई बारह वर्षोंके लिये अन्नका संग्रह करते हैं । उनका यह संग्रह अतिथि- सेवा तथा यज्ञकर्मके लिये होता है ॥ ९ ॥

अभ्रावकाशा वर्षासु हेमन्ते जलसंश्रयाः ।

ग्रीष्मे च पञ्च तपसः शश्वच्च मितभोजनाः ॥ १० ॥

वे वर्षाके समय खुले आकाशके नीचे और सर्दीमें पानीके भीतर खड़े रहते हैं । जब गर्मी आती है, तब पंचाग्निसे शरीरको तपाते हैं और सदा स्वल्प भोजन करनेवाले होते हैं ॥ १० ॥

भूमौ विपरिवर्तन्ते तिष्ठन्ति प्रपदैरपि ।

स्थानासनैर्वर्तयन्ति सवनेष्वभिषिञ्चते ॥ ११ ॥

वानप्रस्थी महात्मा जमीनपर लोट- पोट करते, पंजोंके बल खड़े होते, एक स्थानपर आसन लगाकर बैठते तथा तीनों काल स्नान और संध्या करते हैं ॥ ११ ॥

दन्तोलूखलिकाः केचिदश्मकुट्टास्तथा परे ।

शुक्लपक्षे पिबन्त्येके यवागूं क्वथितां सकृत् ॥ १२ ॥

कृष्णपक्षे पिबन्त्यन्ये भुञ्जते वा यथागतम् ।

पृष्ठ 1603

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1603 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कोई दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं, अर्थात् कच्चे अन्नको चबा -चबाकर खाते हैं । दूसरे लोग पत्थरपर कूटकर भोजन करते हैं और कोई- कोई शुक्लपक्ष या कृष्णपक्षमें एक बार जौका औटाया हुआ माँड़ पीकर रह जाते हैं अथवा समयानुसार जो कुछ मिल जाय वही खाकर जीवन- निर्वाह करते हैं ॥ १२३ ॥

मूलैरेके फलैरेके पुष्पैरेके दृढव्रताः ॥ १३ ॥

वर्तयन्ति यथान्यायं वैखानसगतिं श्रिताः । वानप्रस्थ- धर्मका आश्रय लेकर कोई कन्द-मूलसे और कोई- कोई दृढ़ व्रतका पालन करते हुए फूलोंसे ही धर्मानुकूल जीविका चलाते हैं ॥ १३३ ॥

एताश्चान्याश्च विविधा दीक्षास्तेषां मनीषिणाम् ॥ १४ ॥

चतुर्थश्चौपनिषदो धर्मः साधारणः स्मृतः ।

वानप्रस्थाद् गृहस्थाच्च ततोऽन्यः सम्प्रवर्तते ॥ १५ ॥

उन मनीषी पुरुषोंके लिये ये तथा और भी बहुत-से नाना प्रकारके नियम शास्त्रोंमें बताये गये हैं । चौथे संन्यास आश्रममें विहित जो उपनिषद्- प्रतिपादित शाम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधानरूप धर्म है, वह सभी आश्रमोंके लिये साधारण माना गया है, उसका पालन सभी आश्रमवालोंको करना चाहिये; किंतु चौथे आश्रम संन्यासका जो विशेष धर्म है, वह वानप्रस्थ और गृहस्थसे भिन्न है ॥ १४-१५ ॥

अस्मिन्नेव युगे तात विप्रैः सर्वार्थदर्शिभिः ।

अगस्त्यः सप्त ऋषयो मधुच्छन्दोऽघमर्षणः ॥ १६ ॥

सांकृतिः सुदिवा तण्डिर्यथावासोऽकृतश्रमः ।

अहोवीर्यस्तथा काव्यस्ताण्ड्यो मेधातिथिर्बुधः ॥ १७ ॥

बलवान् कर्णनिर्वाकः शून्यपालः कृतश्रमः ।

एनं धर्मं कृतवन्तस्ततः स्वर्गमुपागमन् ॥ १८ ॥

तात! इस युगमें भी सर्वार्थदर्शी ब्राह्मणोंने इस वानप्रस्थ - धर्मका पालन एवं प्रसार किया । अगस्त्य, सप्तर्षिगण, मधुच्छन्द, अघमर्षण, सांकृति, सुदिवा, तण्डि, यथावास, अकृतश्रम, अहोवीर्य, काव्य ( शुक्राचार्य), ताण्ड्य, मेधातिथि, बुध, शक्तिशाली कर्ण निर्वाक, शून्यपाल और कृतश्रम- इन सबने इस धर्मका पालन किया, जिससे ये सभी स्वर्गलोकको प्राप्त हुए ॥ १६–१८ ॥

तात प्रत्यक्षधर्माणस्तथा यायावरा गणाः ।

ऋषीणामुग्रतपसां धर्मनैपुणदर्शिनाम् ॥ १ ९ ॥

अन्ये चापरिमेयाश्च ब्राह्मणा वनमाश्रिताः ।

वैखानसा वालखिल्याः सैकताश्च तथा परे ॥ २० ॥

तात! जिनकी तपस्या उग्र है, जिन्होंने धर्मकी निपुणताको देखा और अनुभव किया है, उन ऋषियोंके यायावर नामक गण भी वानप्रस्थी हैं, जिन्हें धर्मके फलका प्रत्यक्ष अनुभव

पृष्ठ 1604

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1604 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

है । वे तथा और भी असंख्य वनवासी ब्राह्मण, बालखिल्य और सैकत नामवाले दूसरे मुनि भी वैखानस ( वानप्रस्थ ) धर्मका पालन करनेवाले हैं ॥

कर्मभिस्ते निरानन्दा धर्मनित्या जितेन्द्रियाः ।

गताः प्रत्यक्षधर्माणस्ते सर्वे वनमाश्रिताः ॥ २१ ॥

अनक्षत्रास्त्वनाधृष्या दृश्यन्ते ज्योतिषां गणाः । ये सब ब्राह्मण प्रायः उपवास आदि क्लेशदायक कर्म करनेके कारण लौकिक सुखसे रहित थे । सदा धर्ममें तत्पर रहते और इन्द्रियोंको वशमें रखते थे । उन्हें धर्मके फलका प्रत्यक्ष अनुभव था । वे सब- के - सब वानप्रस्थी थे । इस लोकसे जानेपर आकाशमें वे नक्षत्र भिन्न, दुर्धर्ष ज्योतिर्मय तारोंके रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं ॥ जरया च परिद्यूनो व्याधिना च प्रपीडितः ॥ २२ ॥

चतुर्थे चायुषः शेषे वानप्रस्थाश्रमं त्यजेत् ।

सद्यस्कारां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् ॥ २३ ॥

इस प्रकार वानप्रस्थकी अवधि पूरी कर लेनेके बाद जब आयुका चौथा भाग शेष रह जाय, वृद्धावस्थासे शरीर दुर्बल हो जाय और रोग सताने लगें तो उस आश्रमका परित्याग कर दे ( और संन्यास - आश्रम ग्रहण कर ले ) । संन्यासकी दीक्षा लेते समय एक दिनमें पूरा होनेवाला यज्ञ करके अपना सर्वस्व दक्षिणामें दे डाले ।

आत्मयाजी सोऽऽत्मरतिरात्मक्रीडात्मसंश्रयः ।

आत्मन्यग्नीन् समारोप्य त्यक्त्वा सर्वपरिग्रहान् ॥ २४ ॥

साद्यस्कांश्च यजेद् यज्ञानिष्टीश्चैवेह सर्वदा ।

यदैव याजिनां यज्ञादात्मनीज्या प्रवर्तते ॥ २५ ॥

फिर आत्माका ही यजन, आत्मामें ही रत होकर आत्मामें ही क्रीडा करे । सब प्रकारसे आत्माका ही आश्रय ले । अग्निहोत्रकी अग्नियोंको आत्मामें ही आरोपित करके सम्पूर्ण संग्रह- परिग्रहको त्याग दे और तुरंत सम्पन्न किये जानेवाले ब्रह्मयज्ञ आदि यज्ञों तथा इष्टियोंका सदा ही मानसिक अनुष्ठान करता रहे । ऐसा तबतक करे, जबतक कि याज्ञिकोंके कर्ममय यज्ञसे हटकर आत्मयज्ञका अभ्यास न हो जाय ॥ २४-२५ ॥

त्रींश्चैवाग्नीन् यजेत् सम्यगात्मन्येवात्ममोक्षणात् ।

प्राणेभ्यो यजुषः पञ्च षट् प्राश्नीयादकुत्सयम् ॥ २६ ॥

आत्मयज्ञका स्वरूप इस प्रकार है, अपने भीतर ही तीनों अग्नियोंकी विधिपूर्वक स्थापना करके देहपात होनेतक प्राणाग्निहोत्रकी * विधिसे भलीभाँति यजन करता रहे । यजुर्वेदके ‘ प्राणाय स्वाहा' आदि मन्त्रोंका उच्चारण करता हुआ पहले अन्नके पाँच - छः ग्रास ग्रहण करे ( फिर आचमनके पश्चात्) शेष अन्नकी निन्दा न करते हुए मौनभावसे भोजन करे ॥ २६ ॥

केशलोमनखान् वाप्य वानप्रस्थो मुनिस्ततः ।

पृष्ठ 1605

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1605 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आश्रमादाश्रमं पुण्यं पूतो गच्छति कर्मभिः ॥ २७ ॥

तदनन्तर वानप्रस्थ मुनि केश, लोम और नख कटाकर कर्मोंसे पवित्र हो वानप्रस्थ- आश्रमसे पुण्यमय संन्यास आश्रममें प्रवेश करे ॥ २७ ॥

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेद् द्विजः ।

लोकास्तेजोमयास्तस्य प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ २८ ॥

जो ब्राह्मण सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान देकर संन्यासी हो जाता है, वह मरनेके पश्चात् तेजोमय लोकमें जाता है और अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥

सुशीलवृत्तो व्यपनीतकल्मषो न चेह नामुत्र च कर्तुमीहते । अरोषमोहो गतसंधिविग्रहो भवेदुदासीनवदात्मविन्नरः ॥ २ ९ ॥ आत्मज्ञानी पुरुष सुशील, सदाचारी और पापरहित होता है । वह इहलोक और परलोकके लिये भी कोई कर्म करना नहीं चाहता । क्रोध, मोह, संधि और विग्रहका त्याग करके वह सब ओरसे उदासीन - सा रहता है ॥ यमेषु चैवानुगतेषु न व्यथे स्वशास्त्रसूत्राहुतिमन्त्रविक्रमः । भवेद् यथेष्टागतिरात्मवेदिनि न संशयो धर्मपरे जितेन्द्रिये ॥ ३० ॥

जो अहिंसा आदि यमों और शौच- संतोष आदि नियमोंका पालन करनेमें कभी कष्टका अनुभव नहीं करता, संन्यास आश्रमका विधान करनेवाले शास्त्रके सूत्रभूत वचनोंके अनुसार त्यागमयी अग्निमें अपने सर्वस्वकी आहुति दे देनेके लिये निरन्तर उत्साह दिखाता है, उसे इच्छानुसार गति ( मुक्ति) प्राप्त होती है। ऐसे जितेन्द्रिय एवं धर्मपरायण आत्मज्ञानीकी मुक्तिके विषयमें तनिक भी संदेहके लिये स्थान नहीं है ॥ ३० ॥

ततः परं श्रेष्ठमतीव सद्गुणै- रधिष्ठितं त्रीनधिवृत्तिमुत्तमम् । चतुर्थमुक्तं परमाश्रमं शृणु प्रकीर्त्यमानं परमं परायणम् ॥ ३१ ॥

जो वानप्रस्थ - आश्रमसे उत्कृष्ट तथा अपने सद्गुणोंके कारण अति ही श्रेष्ठ है, जो पूर्वोक्त तीनों आश्रमोंसे ऊपर है, जिसमें शम आदि गुणोंका अधिक विकास होता है, जो सबसे श्रेष्ठ और सबकी परम गति है, उस सर्वोत्तम चतुर्थ आश्रमका यद्यपि वर्णन किया गया है, तथापि पुनः विशेषरूपसे उसका प्रतिपादन करता हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1606

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1606 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौचौवालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ३१३ श्लोक हैं ) * ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा —ये प्राणाग्निहोत्रके पाँच मन्त्र हैं, भोजन आरम्भ करते समय पहले आचमन करके इनमें से एक-एक मन्त्रको पढ़कर एक -एक ग्रास अन्न मुँहमें डाले । इस प्रकार पाँच ग्रास पूरे होनेपर पुनः आचमन कर ले । यही प्राणाग्निहोत्र कहलाता है ।

पृष्ठ 1607

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1607 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः संन्यासीके आचरण और ज्ञानवान् संन्यासीकी प्रशंसा शुक उवाच

वर्तमानस्तथैवात्र वानप्रस्थाश्रमे यथा ।

योक्तव्योऽऽत्मा कथं शक्त्या वेद्यं वै काङ्क्षता परम् ॥ १ ॥

शुकदेवजीने पूछा- पिताजी! ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंमें जैसे शास्त्रोक्त नियमके अनुसार चलना आवश्यक है, उसी प्रकार इस वानप्रस्थ आश्रममें भी शास्त्रोक्त नियमका पालन करते हुए चलना चाहिये । यह सब तो मैंने सुन लिया । अब मैं यह जानना चाहता हूँ, जो जानने योग्य परब्रह्म परमात्माको पाना चाहता हो, उसे अपनी शक्तिके अनुसार उस परमात्माका चिन्तन कैसे करना चाहिये? ॥ १ ॥

व्यासउवाच

प्राप्य संस्कारमेताभ्यामाश्रमाभ्यां ततः परम् ।

यत्कार्यं परमार्थं तु तदिहैकमनाः शृणु ॥ २ ॥

व्यासजीने कहा- बेटा! ब्रह्मचर्य और गृहस्थाश्रमके धर्मोद्वारा चित्तका संस्कार ( शोधन) करनेके अनन्तर मुक्तिके लिये जो वास्तविक कर्तव्य है, उसे बताता हूँ, तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥

कषायं पाचयित्वाऽऽशु श्रेणिस्थानेषु च त्रिषु ।

प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम् ॥ ३ ॥

पंक्तिक्रमसे स्थित पूर्वोक्त तीन आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थमें चित्तके राग-द्वेष आदि दोषोंको पकाकर - उन्हें नष्ट करके शीघ्र ही सर्वोत्तम चतुर्थ आश्रम संन्यासको ग्रहण कर ले ॥ ३ ॥

तत् भवानेवमभ्यस्थ वर्ततां श्रूयतां तथा ।

एक एव चरेद् धर्मं सिद्धयर्थमसहायवान् ॥ ४ ॥

बेटा! तुम इस संन्यास धर्मके नियमोंको सुनो और उन्हें अभ्यासमें लाकर उसीके अनुसार बर्ताव करो । संन्यासीको चाहिये कि वह सिद्धि प्राप्त करनेके लिये किसीको साथ न लेकर अकेला ही संन्यास धर्मका पालन करे ॥ ४ ॥

एकश्चरति यः पश्यन् न जहाति न हीयते ।

अनग्निरनिकेतश्च ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ॥ ५ ॥

जो आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करके एकाकी विचरता रहता है, वह सर्वव्यापी होनेके कारण न तो स्वयं किसीका त्याग करता है और न दूसरे ही उसका त्याग करते हैं । संन्यासी

पृष्ठ 1608

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1608 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कभी न तो अग्निकी स्थापना करे और न घर या मठ ही बनाकर रहे; केवल भिक्षा लेनेके लिये ही गाँवमें जाय ॥ ५ ॥

अश्वस्तनविधाता स्यान्मुनिर्भावसमाहितः ।

लघ्वाशी नियताहारः सकृदन्ननिषेविता ॥ ६ ॥

वह दूसरे दिनके लिये अन्नका संग्रह न करे। चित्त वृत्तियोंको एकाग्र करके मौनभावसे रहे। हलका और नियमानुकूल भोजन करे तथा दिन - रातमें केवल एक ही बार अन्न ग्रहण करे ॥ ६ ॥

कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता ।

उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद् भिक्षुलक्षणम् ॥ ७ ॥

भिक्षापात्र एवं कमण्डलु रखे । वृक्षकी जड़में सोये या निवास करे । जो देखनेमें सुन्दर न हो, ऐसा वस्त्र धारण करे । किसीको साथ न रखे और सब प्राणियोंकी उपेक्षा कर दे । ये सब संन्यासीके लक्षण हैं ॥ ७ ॥

यस्मिन् वाचः प्राविशन्ति कूपे त्रस्ता द्विपा इव ।

न वक्तारं पुनर्यान्ति स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ ८ ॥

जैसे डरे हुए हाथी भागकर किसी जलाशयमें प्रवेश कर जाते हैं, फिर सहसा निकलकर अपने पूर्व स्थानको नहीं लौटते उसी प्रकार जिस पुरुषमें दूसरोंके कहे हुए निन्दात्मक या प्रशंसात्मक वचन समा जाते हैं, परंतु प्रत्युत्तरके रूपमें वे वापस पुनः नहीं लौटते अर्थात् जो किसीकी की हुई निन्दा या स्तुतिका कोई उत्तर नहीं देता, वही संन्यास-आश्रममें निवास कर सकता है ॥

नैव पश्येन शृणुयादवाच्यं जातु कस्यचित् ।

ब्राह्मणानां विशेषेण नैव ब्रूयात् कथंचन ॥ ९ ॥

संन्यासी किसीकी निन्दा करनेवाले पुरुषकी ओर आँख उठाकर देखे नहीं, कभी किसीका निन्दात्मक वचन सुने नहीं तथा विशेषतः ब्राह्मणोंके प्रति किसी प्रकार न कहने योग्य बात न कहे ॥ ९ ॥

यद् ब्राह्मणस्य कुशलं तदेव सततं वदेत् ।

तूष्णीमासीत निन्दायां कुर्वन् भैषज्यमात्मनः ॥ १० ॥

जिससे ब्राह्मणोंका हित हो, वैसा ही वचन सदा बोले । अपनी निन्दा सुनकर भी चुप रह जाय –इस मौनावलम्बनको भवरोगसे छूटनेकी दवा समझकर इसका सेवन करता रहे ॥ १० ॥

येन पूर्णमिवाकाशं भवत्येकेन सर्वदा ।

शून्यं येन जनाकीर्णं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ११ ॥

जो सदा अपने सर्वव्यापी स्वरूपसे स्थित होनेके कारण अकेले ही सम्पूर्ण आकाशमें परिपूर्ण - सा हो रहा है तथा जो असंग होनेके कारण लोगोंसे भरे हुए स्थानको भी सूना

पृष्ठ 1609

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1609 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समझता है, उसे ही देवतालोग ब्राह्मण ( ब्रह्मज्ञानी ) मानते हैं ॥ ११ ॥

येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचिदाशितः ।

यत्र क्वचन शायी च तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ १२ ॥

जो जिस किसी भी ( वस्त्र- वल्कल आदि ) वस्तुसे अपना शरीर ढक लेता है, समयपर जो भी रूखा- सूखा मिल जाय, उसीसे भूख मिटा लेता है और जहाँ कहीं भी सो रहता है, उसे देवता ब्रह्मज्ञानी समझते हैं ॥ १२ ॥

अहेरिव गणाद् भीतः सौहित्यान्नरकादिव ।

कुणपादिव च स्त्रीभ्यस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ १३ ॥

जो जनसमुदायको सर्प-सा समझकर उसके निकट जानेसे डरता है, स्वादिष्ट भोजनजनित तृप्तिको नरक- सा मानकर उससे दूर रहता है और स्त्रियोंको मुर्दोंके समान समझकर उनकी ओरसे विरक्त होता है, उसे देवता ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ॥ १३ ॥

न क्रुद्धयेन प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः ।

सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ १४ ॥

जो सम्मान प्राप्त होनेपर हर्षित, अपमानित होनेपर कुपित नहीं होता तथा जिसने सम्पूर्ण प्राणियोंको अभय दान कर दिया है, उसे ही देवता लोग ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ॥ १४ ॥

नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् ।

कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥ १५ ॥

संन्यासी न तो जीवनका अभिनन्दन करे और न मृत्युका ही । जैसे सेवक स्वामीके आदेशकी प्रतीक्षा करता रहता है, उसी प्रकार उसे भी कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये ॥ १५ ॥

अनभ्याहतचित्तः स्यादनभ्याहतवाग् भवेत् ।

निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भयम् ॥ १६ ॥

संन्यासी अपने चित्तको राग -द्वेष आदि दोषोंसे दूषित न होने दे । अपनी वाणीको निन्दा आदि दोषोंसे बचावे और सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सर्वथा शत्रुहीन हो जाय । जिसे ऐसी स्थिति प्राप्त हो उसे किसीसे क्या भय हो सकता है? ॥ १६ ॥

अभयं सर्वभूतेभ्यो भूतानामभयं ततः ।

तस्य मोहाद् विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ १७ ॥

जिसे सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय प्राप्त है तथा जिसकी ओरसे किसी भी प्राणीको कोई भय नहीं है, उस मोहमुक्त पुरुषको किसीसे भी भय नहीं होता ॥

यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम् ।

सर्वाण्येवापिधीयन्ते पदजातानि कौञ्जरे ॥ १८ ॥

एवं सर्वमहिंसायां धर्मार्थमपिधीयते ।

पृष्ठ 1610

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1610 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अमृतः स नित्यं वसति यो हिंसां न प्रपद्यते ॥ १ ९ ॥ जैसे पैरोंद्वारा चलनेवाले अन्य प्राणियोंके सम्पूर्ण पदचिह्न हाथीके पदचिह्नमें समा जाते हैं, उसी प्रकार सारा धर्म और अर्थ अहिंसाके अन्तर्भूत है । जो किसीकी हिंसा नहीं करता, वह सदा अमृत (जन्म और मृत्युके बन्धनसे मुक्त ) होकर निवास करता है ॥ १८-१९ ॥

अहिंसकः समः सत्यो धृतिमान् नियतेन्द्रियः ।

शरण्यः सर्वभूतानां गतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ २० ॥

जो हिंसा न करनेवाला, समदर्शी, सत्यवादी, धैर्यवान्, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाला है, वह अत्यन्त उत्तम गति पाता है ॥ २० ॥

एवं प्रज्ञानतृप्तस्य निर्भयस्य निराशिषः ।

न मृत्युरतिगो भावः स मृत्युमधिगच्छति ॥ २१ ॥

इस प्रकार जो ज्ञानानन्दसे तृप्त होकर भय और कामनाओंसे रहित हो गया है, उसपर

मृत्युका जोर नहीं चलता । वह स्वयं ही मृत्युको लाँघ जाता है ॥ २१ ॥

विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यो मुनिमाकाशवत् स्थितम् ।

अस्वमेकचरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ २२ ॥

जो सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर मुनिवृत्तिसे रहता है, आकाशकी भाँति निर्लेप और स्थिर है, किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता, एकाकी विचरता और शान्तभावसे रहता है, उसे देवता ब्रह्मवेत्ता मानते हैं ॥

जीवितं यस्य धर्मार्थं धर्मो हर्यर्थमेव च ।

अहोरात्राश्च पुण्यार्थं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ २३ ॥

जिसका जीवन धर्मके लिये और धर्म भगवान् श्रीहरिके लिये होता है, जिसके दिन और रात धर्म- पालनमें ही व्यतीत होते हैं, उसे देवता ब्रह्मज्ञ मानते हैं ॥

निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् ।

निर्मुक्तं बन्धनैः सर्वैस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ २४ ॥

जो कामनाओंसे रहित तथा सब प्रकारके आरम्भोंसे रहित है, नमस्कार और स्तुतिसे दूर रहता तथा सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होता है, उसे ही देवता ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ॥ २४ ॥

सर्वाणि भूतानि सुखे रमन्ते सर्वाणि दुःखस्य भृशं त्रसन्ते । तेषां भयोत्पादनजातखेदः कुर्यान्न कर्माणि हि श्रद्दधानः ॥ २५ ॥

सम्पूर्ण प्राणी सुखमें प्रसन्न होते और दुःखसे बहुत डरते हैं; अतः प्राणियोंपर भय आता देखकर जिसे खेद होता है, उस श्रद्धालु पुरुषको भयदायक कर्म नहीं करना