श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1591–1600
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1591–1600
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द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः आश्रमधर्मकी प्रस्तावना करते हुए ब्रह्मचर्य आश्रमका वर्णन शुक उवाच
क्षरात्प्रभृति यः सर्गः सगुणानीन्द्रियाणि च ।
बुद्ध्यैश्वर्यातिसर्गोऽयं प्रधानश्चात्मनः श्रुतम् ॥ १ ॥
शुकदेवजीने पूछा — पिताजी! क्षर अर्थात् प्रधानसे जो चौबीस तत्त्वोंवाली सामान्य सृष्टि हुई है तथा शब्द आदि विषयोंसहित जो इन्द्रियाँ हैं, उनकी सृष्टि बुद्धिके सामर्थ्यसे हुई है, अतः यह अतिसर्ग— असाधारण सृष्टि है । बन्धनकारी होनेके कारण इसे प्रमुख या प्रबल माना गया है, यह दोनों प्रकारकी सृष्टि पुरुषके संनिधानसे, प्रकृतिसे उत्पन्न हुई है; यह सब मैंने पहले सुन लिया है ॥ १ ॥
भूय एव तु लोकेऽस्मिन् सद्वृत्तिं कालहैतुकीम् ।
यया सन्तः प्रवर्तन्ते तदिच्छाम्यनुवर्तितुम् ॥ २ ॥
अब पुनः इस संसारमें प्रत्येक युगके अनुसार जो शिष्ट पुरुषोंकी आचार-परम्परा रही है तथा जिसके अनुकूल सत्पुरुषोंका बर्ताव होता आया है, उसका मैं भी अनुसरण करना चाहता हूँ ॥ २ ॥
वेदे वचनमुक्तं तु कुरु कर्म त्यजेति च ।
कथमेतद् विजानीयां तच्च व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
- वेदमें ‘ कर्म करो ' और ' कर्म छोड़ो' – ये दोनों बातें कही गयी हैं । मैं इनका तात्पर्य कैसे
समझँ? जिससे इनका विरोध हट जाय । आप इस विषयकी व्याख्या करें ॥ ३ ॥
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञः पूतोऽहं गुरुशासनात् ।
कृत्वा बुद्धिं विमुक्तात्मा द्रक्ष्याम्यात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
मैं आप - जैसे गुरुके उपदेशसे पवित्र हो गया हूँ तथा मुझे जगत्के वृत्तान्त ( लौकिक नीति - रीति) का भी ज्ञान हो गया है; अतः धर्माचरणसे बुद्धिका संस्कार करके स्थूल देहका अभिमान त्यागकर अपने अविनाशीस्वरूप परमात्माका दर्शन करूँगा ॥ ४ ॥
व्यास उवाच
यथा वै विहिता वृत्तिः पुरस्ताद् ब्रह्मणा स्वयम् ।
एषा पूर्वतरैः सद्भिराचीर्णा परमर्षिभिः ॥ ५ ॥
व्यासजीने कहा- बेटा! पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने जिस आचार- व्यवहारका विधान कर दिया है, पहलेके सत्पुरुष तथा ऋषि महर्षि भी उसीका पालन करते आ रहे
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हैं ॥ ५ ॥
ब्रह्मचर्येण वै लोकान् जयन्ति परमर्षयः ।
आत्मनश्च ततः श्रेयांस्यन्विच्छन् मनसाऽऽत्मनि ॥ ६ ॥
परम ऋषियोंने ब्रह्मचर्यके पालनसे ही उत्तम लोकोंपर विजय पायी है; अतः मन- ही-मन अपने कल्याणकी इच्छा रखकर पहले ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥
वने मूलफलाशी च तप्यन् सुविपुलं तपः ।
पुण्यायतनचारी च भूतानामविहिंसकः ॥ ७ ॥
( फिर वानप्रस्थ- धर्मका आश्रय ले ) वनमें फल- मूल खाकर रहे, भारी तपस्यामें तत्पर हो जाय, पुण्य - तीर्थोंमें भ्रमण करे और किसी भी प्राणीकी अपने द्वारा हिंसा न होने दे ॥ ७ ॥
विधूमे सन्नमुसले वानप्रस्थप्रतिश्रये ।
काले प्राप्ते चरन् भैक्ष्यं कल्पते ब्रह्मभूयसे ॥ ८ ॥
इसके बाद संन्यासी होकर यथासमय भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हुए भिक्षाके लिये ‘ वानप्रस्थी’ के आश्रमपर उस समय जाना चाहिये, जब कि मूसलसे धान कूटनेकी आवाज न सुनायी पड़े और रसोईघरसे धूँआ निकलना बंद जो जाय । इस प्रकार जीवन बितानेवाला संन्यासी ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ॥ ८ ॥
निःस्तुतिर्निर्नमस्कारः परित्यज्य शुभाशुभे ।
अरण्ये विचरैकाकी येन केनचिदाशितः ॥ ९ ॥
शुकदेव! तुम भी स्तुति और नमस्कारसे अलग रहकर शुभाशुभ कर्मोंका परित्याग करके जो कुछ फल- मूल मिल जाय, उसीसे भूख मिटाते हुए वनमें अकेले विचरते रहो ॥ ९ ॥
शुक उवाच
यदिदं वेदवचनं लोकवादे विरुध्यते ।
प्रमाणे वाप्रमाणे च विरुद्धे शास्त्रता कुतः ॥ १० ॥
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि प्रमाणं तूभयं कथम् ।
कर्मणामविरोधेन कथं मोक्षः प्रवर्तते ॥ ११ ॥
शुकदेवने पूछा- पिताजी! 'कर्म करो ' और 'कर्म छोड़ो' - ये जो वेदके दो तरहके वचन हैं, लोकदृष्टिसे विचार करनेपर परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं । ये प्रामाणिक हैं या अप्रामाणिक? यदि प्रामाणिक हैं तो परस्पर विरोध रहते हुए इन्हें शास्त्रवचन कैसे माना जा सकता है तथा दोनों ही प्रामाणिक कैसे हो सकते हैं? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ; साथ ही यह भी बताइये कि कर्मोंका विरोध किये बिना मोक्षकी प्राप्ति किस तरह हो सकती है? ॥ १०-११ ॥
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भीष्म उवाच
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं गन्धवत्याः सुतः सुतम् ।
ऋषिस्तत्पूजयन् वाक्यं पुत्रस्यामिततेजसः ॥ १२ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उनके इस प्रकार पूछनेपर गन्धवती ( सत्यवती ) के पुत्र महर्षि व्यासने अपने अमिततेजस्वी पुत्रके वचनका आदर करते हुए उससे इस प्रकार कहा ॥ १२ ॥
व्यास उवाच
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः ।
यथोक्तचारिणः सर्वे गच्छन्ति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
व्यासजी बोले- बेटा! ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी – ये सभी अपने-अपने आश्रमके लिये विहित शास्त्रोक्त कर्मोंका पालन करते हुए परम गतिको प्राप्त होते ॥ १३ ॥
एको वाप्याश्रमानेतान् योऽनुतिष्ठेद् यथाविधि ।
अकामद्वेषसंयुक्तः स परत्र विधीयते ॥ १४ ॥
यदि कोई एक पुरुष भी इन आश्रमोंके धर्मोंका राग-द्वेषसे शून्य होकर विधिपूर्वक अनुष्ठान कर ले तो वह परब्रह्म परमात्माको तत्त्वसे जाननेका अधिकारी हो जाता है ॥ १४ ॥
चतुष्पदी हि निःश्रेणी ब्रह्मण्येषा प्रतिष्ठिता ।
एतामारुह्य निःश्रेणीं ब्रह्मलोके महीयते ॥ १५ ॥
ये चारों आश्रम ब्रह्ममें ही प्रतिष्ठित हैं और ब्रह्मतक पहुँचानेके लिये चार पैंडीवाली सीढ़ीके समान माने गये हैं । इस सीढ़ीपर चढ़कर मनुष्य ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ॥ १५ ॥
आयुषस्तु चतुर्भागं ब्रह्मचार्यनसूयकः ।
गुरौ वा गुरुपुत्रे वा वसेद् धर्मार्थकोविदः ॥ १६ ॥
द्विजके बालकको चाहिये कि ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरु अथवा गुरुपुत्रकी सेवामें अपनी आयुके एक चौथाई भाग अर्थात् पच्चीस वर्षोंतक रहे । वहाँ रहते हुए किसीके दोष न देखे । ऐसा करनेवाला ब्रह्मचारी धर्म और अर्थके ज्ञानमें कुशल होता है ॥ १६ ॥
जघन्यशायी पूर्वं स्यादुत्थाय गुरुवेश्मनि ।
यच्च शिष्येण कर्तव्यं कार्यं दासेन वा पुनः ॥ १७ ॥
वह गुरुके सोनेके पश्चात् नीचे आसनपर सोवे और उनके जागनेसे पहले ही उठ जाय । गुरुके घरमें एक शिष्य या दासके करने योग्य जो कुछ भी कार्य हो, उसे वह स्वयं पूरा
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करे ॥ १७ ॥
कृतमित्येव तत्सर्वं कृत्वा तिष्ठेत पार्श्वतः ।
किंकरः सर्वकारी स्यात् सर्वकर्मसु कोविदः ॥ १८ ॥
गुरुजी जो भी आज्ञा दें उसके लिये सदा यही उत्तर दे कि ' भगवन्! इसे अभी पूरा किया ' और वह सब कार्य करके उनके पास आकर खड़ा जो जाय । ‘ मेरे लिये क्या आज्ञा है? ' ऐसा पूछते हुए एक आज्ञाकारी सेवककी भाँति गुरुका सारा कार्य करनेके लिये तैयार रहे और सभी कर्मोंके सम्पादनमें कुशल हो ॥ १८ ॥
कर्मातिशेषेण गुरावध्येतव्यं बुभूषता ।
दक्षिणोऽनपवादी स्यादाहूतो गुरुमाश्रयेत् ॥ १ ९ ॥
अपनी उन्नति चाहनेवाले शिष्यको गुरुकी सेवा- टहलका सारा कार्य समाप्त करके उनके पास बैठकर अध्ययन करना चाहिये । वह सबके प्रति सदा उदार रहे और किसीपर कोई कलंक न लगावे । गुरुके बुलानेपर झट उनकी सेवामें उपस्थित हो जाय ॥ १ ९ ॥
शुचिर्दक्षो गुणोपेतो ब्रूयादिष्टमिवान्तरा ।
चक्षुषा गुरुमव्यग्रो निरीक्षेत जितेन्द्रियः ॥ २० ॥
बाहर- भीतरसे पवित्र रहे । कार्यमें कुशल हो । गुणवान् बने । भीतरसे सद्भावना रखकर बीच - बीचमें ऐसी बात बोले जो गुरुको प्रिय लगनेवाली हो । शान्त भावसे भक्तिभरी दृष्टि डालकर गुरुकी ओर देखे और इन्द्रियोंको वशमें रखे ॥ २० ॥
नाभुक्तवति चाश्नीयादपीतवति नो पिबेत् ।
नातिष्ठति तथाऽऽसीत नासुप्ते प्रस्वपेत च ॥ २१ ॥
आचार्य जबतक भोजन न कर लें, तबतक स्वयं भी न खाय । वे जबतक जल - पान न कर लें, तबतक स्वयं भी न करे । उनके बैठनेसे पहले स्वयं भी न बैठे और उनके सोनेसे पहले स्वयं भी न सोये ॥ २१ ॥
उत्तानाभ्यां च पाणिभ्यां पादावस्य मृदु स्पृशेत् ।
दक्षिणं दक्षिणेनैव सव्यं सव्येन पीडयेत् ॥ २२ ॥
दोनों हाथ फैलाकर अपने दाहिने हाथसे गुरुका दाहिना चरण और बायें हाथसे उनका बायाँ चरण धीरे - धीरे छूकर प्रणाम करे ॥ २२ ॥
अभिवाद्य गुरुं ब्रूयादधीष्व भगवन्निति ।
इदं करिष्ये भगवन्निदं चापि कृतं मया ॥ २३ ॥
इस प्रकार अभिवादनके पश्चात् हाथ जोड़कर गुरुसे कहे —' भगवन्! अब आप मुझे पढ़ावें । मैंने अमुक काम पूरा कर लिया है और यह अमुक कार्य अभी करूँगा ॥ २३ ॥
ब्रह्मंस्तदपि कर्तास्मि यद् भवान् वक्ष्यते पुनः ।
इति सर्वमनुज्ञाप्य निवेद्य च यथाविधि ॥ २४ ॥
कुर्यात् कृत्वा च तत्सर्वमाख्येयं गुरवे पुनः ।
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‘ ब्रह्मन्! इसके सिवा और भी जिन कार्योंके लिये आप आज्ञा देंगे, उन्हें भी मैं शीघ्र पूर्ण करूँगा । ' इस तरह सब बातें विधिवत् निवेदन करके गुरुकी आज्ञा लेकर फिर दूसरा कार्य करे और उसे पूरा करके पुनः उसका सारा समाचार गुरुजीको बतावे ॥ २४३ ॥
यांस्तु गन्धान् रसान् वापि ब्रह्मचारी न सेवते ॥ २५ ॥
सेवेत तान् समावृत्य इति धर्मेषु निश्चयः । जिन -जिन गन्धों और रसोंका ब्रह्मचारीको सेवन नहीं करना चाहिये, उनका वह ब्रह्मचर्यकालमें त्याग करे । समावर्तनसंस्कारके बाद ही वह उनका सेवन कर सकता है, यही धर्मका निश्चय है ॥ २५ ॥
ये केचिद् विस्तरेणोक्ता नियमा ब्रह्मचारिणः ॥ २६ ॥
तान् सर्वानाचरेन्नित्यं भवेच्चानपगो गुरोः । शास्त्रोंमें ब्रह्मचारीके लिये जो कोई भी नियम विस्तारपूर्वक बताये गये हैं, उन सबका वह पालन करे तथा सदा गुरुके समीप ही रहे ॥ २६३ ॥
स एवं गुरवे प्रीतिमुपहृत्य यथाबलम् ॥ २७ ॥
आश्रमादाश्रमेष्वेव शिष्यो वर्तेत कर्मणा । इस प्रकार शिष्य यथाशक्ति सेवा करके गुरुको प्रसन्न करे और उन्हें उपहार देकर उनकी आज्ञासे ब्रह्मचर्य आश्रमसे दूसरे आश्रमोंमें पदार्पण करे और वहाँ भी उन आश्रमोंके कर्तव्योंका पालन करता रहे ॥ वेदव्रतोपवासेन चतुर्थे चायुषो गते ॥ २८ ॥
गुरवे दक्षिणां दत्वा समावर्त्तेद् यथाविधि ॥ २ ९ ॥ जब वेदसम्बन्धी व्रत और उपवास करते हुए आयुका एक चौथाई भाग व्यतीत हो जाय, तब गुरुको दक्षिणा देकर विधिपूर्वक समावर्तन- संस्कार सम्पन्न करे ॥ २८-२९ ॥
धर्मलब्धैर्युतो दारैरग्नीनुत्पाद्य यत्नतः ।
द्वितीयमायुषो भागं गृहमेधी भवेद् व्रती ॥ ३० ॥
धर्मतः पत्नीका पाणिग्रहण करके उसके साथ यत्नपूर्वक अग्निकी स्थापना करे और आयुके द्वितीय भाग अर्थात् पचास वर्षकी अवस्थातक उत्तम व्रतका पालन करते हुए गृहस्थ बना रहे ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४२ ॥
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त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्राह्मणोंके उपलक्षणसे गार्हस्थ्य - धर्मका वर्णन व्यासउवाच
द्वितीयमायुषो भागं गृहमेधी गृहे वसेत् ।
धर्मलब्धैर्युतो दारैरग्नीनाहृत्य सुव्रतः ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं - बेटा! गृहस्थ पुरुष अपनी आयुके दूसरे भागतक गृहस्थधर्मका पालन करते हुए घरपर ही रहे । धर्मानुसार स्त्रीसे विवाह करके उसके साथ अग्नि- स्थापना करनेके पश्चात् नित्य अग्निहोत्र आदि करे और उत्तम व्रतका पालन करता रहे ॥ १ ॥
गृहस्थवृत्तयश्चैव चतस्रः कविभिः स्मृताः ।
कुसूलधान्यः प्रथमः कुम्भधान्यस्त्वनन्तरम् ॥ २ ॥
अश्वस्तनोऽथ कापोतीमाश्रितोवृत्तिमाहरेत् ।
तेषां परः परो ज्यायान् धर्मतो धर्मजित्तमः ॥ ३ ॥
गृहस्थ ब्राह्मणके लिये विद्वानोंने चार प्रकारकी आजीविका बतायी है— कोठेभर अनाजका संग्रह करके रखना, यह पहली जीविकावृत्ति है । कुंडेभर अन्नका संग्रह करना, यह दूसरी वृत्ति है तथा उतने ही अन्नका संग्रह करना जो दूसरे दिनके लिये शेष न रहे, यह तीसरी वृत्ति है । अथवा ' कापोतीवृत्ति' ( उञ्छवृत्ति ) का आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करे, यह चौथी वृत्ति है । इन चारोंमें पहलीकी अपेक्षा दूसरी- दूसरी वृत्ति श्रेष्ठ है । अन्तिम वृत्तिका आश्रय लेनेवाला धर्मकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ है और वही सबसे बढ़कर धर्मविजयी है ॥
षट्कर्मा वर्तयत्येकस्त्रिभिरन्यः प्रवर्तते ।
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रे व्यवस्थितः ॥ ४ ॥
पहली श्रेणीके अनुसार जीविका चलानेवाले ब्राह्मणको यजनयाजन, अध्ययन-अध्यापन तथा दान और प्रतिग्रह- ये छः कर्म करने चाहिये । दूसरी श्रेणीवालेको अध्ययन, यजन और दान — इन तीन कर्मोंमें ही प्रवृत्त होना चाहिये । तीसरी श्रेणीवालेको अध्ययन और दान —ये दो ही कर्म करने चाहिये तथा चौथी श्रेणीवालेको केवल ब्रह्मयज्ञ ( वेदाध्ययन ) करना उचित है ॥ ४ ॥
गृहमेधिव्रतान्यत्र महान्तीह प्रचक्षते ।
नात्मार्थे पाचयेदन्नं न वृथा घातयेत् पशून् ॥ ५ ॥
गृहस्थोंके लिये शास्त्रोंमें बहुत-से श्रेष्ठ नियम बताये गये हैं । वह केवल अपने ही भोजनके लिये रसोई न बनावे ( अपितु देवता, पितर और अतिथियोंके उद्देश्यसे ही बनावे ) और पशुहिंसा न करे, क्योंकि यह अनर्थमूलक है ॥ ५ ॥
प्राणी वा यदि वाप्राणी संस्कारं यजुषार्हति ।
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न दिवा प्रस्वपेज्जातु न पूर्वापररात्रिषु ॥ ६ ॥
यज्ञमें यजमान एवं हविष्य आदि सबका यजुर्वेदके मन्त्रसे संस्कार होना चाहिये ।
गृहस्थ पुरुष दिनमें कभी न सोये । रातके पहले और पिछले भागमें भी नींद न ले ॥ ६ ॥
न भुञ्जीतान्तरा काले नानृतावाह्वयेत् स्त्रियम् ।
नास्यानश्नन् गृहे विप्रो वसेत् कश्चिदपूजितः ॥ ७ ॥
सबेरे और शाम दो ही समय भोजन करे, बीचमें न खाय । ऋतुकालके सिवा अन्य समयमें स्त्रीको अपनी शय्यापर न बुलावे । उसके घरपर आया हुआ कोई ब्राह्मण अतिथि आदर- सत्कार और भोजन पाये बिना न रह जाय ॥ ७ ॥
तथास्यातिथयः पूज्या हव्यकव्यवहाः सदा ।
वेदविद्याव्रतस्नाताः श्रोत्रिया वेदपारगाः ॥ ८ ॥
स्वधर्मजीविनो दान्ताः क्रियावन्तस्तपस्विनः ।
तेषां हव्यं च कव्यं चाप्यर्हणार्थं विधीयते ॥ ९ ॥
यदि द्वारपर अतिथिके रूपमें वेदके पारंगत विद्वान्, स्नातक, श्रोत्रिय, हव्य ( यज्ञान्न) और कव्य ( श्राद्धान्न ) भोजन करनेवाले, जितेन्द्रिय, क्रियानिष्ठ, स्वधर्मसे ही जीवन- निर्वाह करनेवाले और तपस्वी ब्राह्मण आ जायँ तो सदा उनकी विधिवत् पूजा करके उन्हें हव्य और कव्य समर्पित करने चाहिये । उनके सत्कारके लिये यह सब करनेका विधान है ॥ ८ -९ ॥
नखरैः सम्प्रयातस्य स्वधर्मज्ञापकस्य च ।
अपविद्धाग्निहोत्रस्य गुरोर्वालीककारिणः ॥ १० ॥
संविभागोऽत्र भूतानां सर्वेषामेव शिष्यते ।
तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना ॥ ११ ॥
जो धार्मिकताका ढोंग दिखानेके लिये अपने नख और बाल बढ़ाकर आया हो, अपने ही मुखसे अपने किये हुए धर्मका विज्ञापन करता हो, अकारण अग्निहोत्रका त्याग कर चुका हो अथवा गुरुके साथ कपट करनेवाला हो, ऐसा मनुष्य भी गृहस्थके घरमें अन्न पानेका अधिकारी है । वहाँ सभी प्राणियोंके लिये अन्न वितरणकी विधि है । जो अपने हाथसे भोजन नहीं बनाते, ऐसे लोगों ( ब्रह्मचारियों और संन्यासियों) के लिये गृहस्थ पुरुषको सदा ही अन्न देना चाहिये ॥
विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं चामृतभोजनः ।
अमृतं यज्ञशेषं स्याद् भोजनं हविषा समम् ॥ १२ ॥
गृहस्थको सदा विघस और अमृत अन्नका भोजन करना चाहिये । यज्ञसे बचा हुआ भोजन हविष्यके समान और अमृत माना गया है ॥ १२ ॥
भृत्यशेषं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम् ।
विघसं भृत्यशेषं तु यज्ञशेषमथामृतम् ॥ १३ ॥
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कुटुम्बमें भरण- पोषणके योग्य जितने लोग हैं, उनको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको जो भोजन करता है, उसे विघसाशी ( विघस अन्न भोजन करनेवाला ) बताया गया है । पोष्यवर्गसे बचे हुए अन्नको विघस तथा पंचमहायज्ञ एवं बलिवैश्वदेवसे बचे हुए अन्नको अमृत कहते हैं ॥ १३ ॥
स्वदारनिरतो दान्तो ह्यनसूयुर्जितेन्द्रियः ।
ऋत्विक् पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः ॥ १४ ॥
वृद्धबालातुरैर्वेद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः ।
मातापितृभ्यां जामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया ॥ १५ ॥
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ।
एतान् विमुच्य संवादान् सर्वपापैर्विमुच्यते ॥ १६ ॥
गृहस्थ पुरुष सदा अपनी ही स्त्रीसे प्रेम करे । इन्द्रियोंका संयम करके जितेन्द्रिय बने । किसीके गुणोंमें दोष न ढूँढ़े । वह ऋत्विज, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, शरणागत, वृद्ध, बालक, रोगी, वैद्य, जाति- भाई, सम्बन्धी, बन्धु -बान्धव, माता-पिता, कुटुम्बकी स्त्री, भाई, पुत्र, पत्नी, पुत्री तथा सेवक - समूहके साथ कभी विवाद न करे । जो इन सबके साथ कलह त्याग देता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १४–१६ ॥
एतैर्जितस्तु जयति सर्वाल्लोंकान् न संशयः ।
आचार्यो ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः ॥ १७ ॥
अतिथिस्त्विन्द्रलोकस्य देवलोकस्य चर्त्विजः ।
जामयोऽप्सरसां लोके वैश्वदेवे तु ज्ञातयः ॥ १८ ॥
इनसे हार मानकर रहनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पाता है, इसमें संशय नहीं है । आचार्य ब्रह्मलोकका स्वामी है, पिता प्रजापतिलोकका ईश्वर है, अतिथि इन्द्रलोकके और ऋत्विज देवलोकके स्वामी हैं । कुटुम्बकी स्त्रियाँ अप्सराओंके लोककी स्वामिनी हैं और जाति - भाई विश्वेदेव लोकके अधिकारी हैं ॥ १७-१८ ॥
सम्बन्धिबान्धवा दिक्षु पृथिव्यां मातृमातुलौ ।
वृद्धबालातुरकृशास्त्वाकाशे प्रभविष्णवः ॥ १ ९ ॥
सम्बन्धी और बन्धु - बान्धव दिशाओंपर, माता और मामा पृथ्वीपर तथा वृद्ध, बालक और निर्बल रोगी आकाशपर अपना प्रभुत्व रखते हैं । इन सबको संतुष्ट रखनेसे उन- उन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ १ ९ ॥
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ।
छाया स्वा दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् ॥ २० ॥
बड़ा भाई पिताके समान है । पत्नी और पुत्र अपने ही शरीर हैं तथा सेवकगण अपनी
छायाके समान हैं । बेटी तो और भी अधिक दयनीय है ॥ २० ॥
तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेन्नित्यमसंज्वरः ।
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गृहधर्मपरो विद्वान् धर्मशीलो जितक्लमः ॥ २१ ॥
अतः इनके द्वारा कभी अपना तिरस्कार भी हो जाय तो सदा क्रोधरहित रहकर सहन कर लेना चाहिये । गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले विद्वान् पुरुषको निश्चिन्त होकर क्लेश और थकावटको जीतकर धर्मका निरन्तर पालन करते रहना चाहिये ॥ २१ ॥
न चार्थबद्धः कर्माणि धर्मवान् कश्चिदाचरेत् ।
गृहस्थवृत्तयस्तिस्रस्तासां निःश्रेयसं परम् ॥ २२ ॥
किसी भी धर्मात्मा पुरुषको धनके लोभसे धर्मकर्मोंका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये । गृहस्थ ब्राह्मणके लिये जो तीन आजीविकाकी वृत्तियाँ बतायी गयी हैं, उनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ एवं कल्याणकारिणी हैं ॥ २२ ॥
परं परं तथैवाहुश्चातुराश्रम्यमेव तत् ।
यथोक्ता नियमास्तेषां सर्वं कार्यं बुभूषता ॥ २३ ॥
इसी प्रकार चारों आश्रम भी उत्तरोत्तर श्रेष्ठ कहे गये हैं । उन आश्रमोंके जो शास्त्रोक्त नियम हैं, उन सबका अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको पालन करना चाहिये ॥ २३ ॥
कुम्भधान्यैरुञ्छशिलैः कापोतीं चास्थितास्तथा ।
यस्मिंश्चैते वसन्त्यर्हास्तद् राष्ट्रमभिवर्धते ॥ २४ ॥
कुंडेभर अनाजका संग्रह करके अथवा उञ्छशिल ( अनाजके एक- एक दाने बीनने अथवा उस अनाजकी बाली बीनने ) के द्वारा अन्नका संग्रह करके ' कापोती - वृत्ति ' का आश्रय लेनेवाले पूजनीय ब्राह्मण जिस देशमें निवास करते हैं, उस राष्ट्रकी वृद्धि होती है ॥ २४ ॥
पूर्वान् दश दश परान् पुनाति च पितामहान् ।
गृहस्थवृत्तीश्चाप्येता वर्तयेद् यो गतव्यथः ॥ २५ ॥
जो मनमें तनिक भी क्लेशका अनुभव न करके गृहस्थकी इन वृत्तियोंके सहारे जीवन निभाता है, वह अपनी दस पीढ़ीके पूर्वजोंको तथा दस पीढ़ीतक आगे होनेवाली संतानोंको पवित्र कर देता है ॥ २५ ॥
स चक्रधरलोकानां सदृशीमाप्नुयाद् गतिम् ।
जितेन्द्रियाणामथवा गतिरेषा विधीयते ॥ २६ ॥
उसे चक्रधारी श्रीविष्णुके लोकके सदृश उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती है अथवा वह जितेन्द्रिय पुरुषको मिलनेवाली श्रेष्ठ गति प्राप्त कर लेता है ॥ २६ ॥
स्वर्गलोको गृहस्थानामुदारमनसां हितः ।
स्वर्गो विमानसंयुक्तो वेददृष्टः सुपुष्पितः ॥ २७ ॥
उदारचित्तवाले गृहस्थोंको हितकारक स्वर्गलोक प्राप्त होता है । उनके लिये विमानसहित सुन्दर फूलोंसे सुशोभित परम रमणीय स्वर्ग सुलभ होता है, जिसका वेदोंमें वर्णन है ॥ २७ ॥
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स्वर्गलोको गृहस्थानां प्रतिष्ठा नियतात्मनाम् ।
ब्रह्मणा विहिता योनिरेषा यस्माद् विधीयते ।
द्वितीयं क्रमशः प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ २८ ॥
मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले गृहस्थोंके लिये स्वर्गलोकको ही प्रतिष्ठाका स्थान नियत किया है । ब्रह्माजीने गार्हस्थ्य-आश्रमको स्वर्गकी प्राप्तिका कारण बनाया है; इसीलिये इसके पालनका विधान किया गया है । इस प्रकार क्रमशः द्वितीय आश्रम गार्हस्थ्यको पाकर मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २८ ॥
अतः परं परममुदारमाश्रमं तृतीयमाहुस्त्यजतां कलेवरम् । वनौकसां गृहपतिनामनुत्तमं शृणुष्व संश्लिष्टशरीरकारिणाम् ॥ २ ९ ॥ इस गृहस्थाश्रमके पश्चात् तीसरा उससे भी श्रेष्ठ परम उदार वानप्रस्थ- आश्रम है; जो शरीरको सुखाकर अस्थिचर्मावशिष्ट कर देनेवाले तथा वनमें रहकर तपस्यापूर्वक शरीरको त्यागनेवाले वानप्रस्थियोंका आश्रय है । यह गृहस्थोंसे श्रेष्ठतम माना गया है, अब इसके धर्म बताता हूँ, सुनो ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ तैंतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४३ ॥
FUD OF