05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1611–1620

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1611–1620

पृष्ठ 1611

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चाहिये ॥ २५ ॥

दानं हि भूताभयदक्षिणायाः सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह । तीक्ष्णां तनुं यः प्रथमं जहाति सोऽऽनन्त्यमाप्नोत्यभयं प्रजाभ्यः ॥ २६ ॥

इस जगत्में जीवोंको अभयकी दक्षिणा देना सब दानोंसे बढ़कर है । जो पहलेसे ही हिंसाका त्याग कर देता है, वह सब प्राणियोंसे निर्भय होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २६ ॥

उत्तान आस्ये न हविर्जुहोति लोकस्य नाभिर्जगतः प्रतिष्ठा । तस्याङ्गमङ्गानि कृताकृतं च वैश्वानरः सर्वमिदं प्रपेदे ॥ २७ ॥

जो संन्यासी खोले हुए मुखमें ' प्राणाय स्वाहा' इत्यादि मन्त्रोंसे प्राणोंके लिये अन्नकी आहुति नहीं देता, अपितु प्राणों ( इन्द्रिय-मन आदि) को ही आत्मामें होम देता - लीन करता है, उसका मस्तक आदि सारा अंगसमुदाय तथा किया हुआ और नहीं किया हुआ कर्मसमूह अग्निका ही अवयव हो जाता है अर्थात् वह उस अग्निका स्वरूप हो जाता है, जो सृष्टिके आरम्भसे ही प्राणियोंके नाभिस्थान– उदरमें जठरानलरूपमें विराजमान है तथा सम्पूर्ण जगत्का आश्रय है । उस वैश्वानर (अग्नि) ने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ २७ ॥

प्रादेशमात्रे हृदि निःसृतं यत् तस्मिन् प्राणानात्मयाजी जुहोति । तस्याग्निहोत्रं हुतमात्मसंस्थं सर्वेषु लोकेषु सदेवकेषु ॥ २८ ॥

आत्मयज्ञ करनेवाला ज्ञानी पुरुष नाभिसे लेकर हृदयतकका जो प्रादेशमात्र स्थान है, उसमें प्रकट हुई जो चैतन्यज्योति है, उसीमें समस्त प्राणोंकी - इन्द्रिय, मन आदिकी आहुति देता है अर्थात् समस्त प्राणादिका आत्मामें लय करता है । उसका प्राणाग्निहोत्र यद्यपि अपने शरीरके भीतर ही होता है तथापि वह सर्वात्मा होनेके कारण उसके द्वारा देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें प्राणाग्निहोत्रकर्म सम्पन्न हो जाता है; अर्थात् उसके प्राणोंकी तृप्तिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके प्राण तृप्त हो जाते हैं ॥ २८ ॥

देवं त्रिधातुं त्रिवृतं सुपर्ण ये विद्युरग्र्यां परमात्मतां च । ते सर्वलोकेषु महीयमाना देवाः समर्त्याः सुकृतं वदन्ति ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1612

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जो सम्पूर्ण जगत्में अपने चिन्मयस्वरूपसे प्रकाशित होता है, तीन धातु ( वर्ण- अकार, उकार, मकार) अर्थात् प्रणव जिसका वाचक है, जो सत्त्व आदि तीनों गुणोंमें— त्रिगुणमयी मायामें उसके नियन्तारूपसे विद्यमान है तथा जिसके जगत्- सम्बन्धी व्यापार वृक्षके सुन्दर पत्तोंके समान विस्तारको प्राप्त हुए हैं, उस अन्तर्यामी पुरुषको तथा उसकी उत्तम परब्रह्मस्वरूपताको जो जानते हैं, वे सम्पूर्ण लोकोंमें सम्मानित होते हैं और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण देवता उनके शुभकर्मकी प्रशंसा करते हैं ॥ २ ९ ॥ वेदांश्च वेद्यं तु विधिं च कृत्स्न- मथो निरुक्तं परमार्थतां च । सर्वं शरीरात्मनि यः प्रवेद तस्यैव देवाः स्पृहयन्ति नित्यम् ॥ ३० ॥

सम्पूर्ण वेदशास्त्र, ज्ञेय वस्तु ( आकाश आदि भूत और भौतिक जगत्), समस्त विधि ( कर्मकाण्ड ), निरुक्त ( शब्दप्रमाणगम्य परलोक आदि) और परमार्थता ( आत्माकी सत्यस्वरूपता ) —यह सब कुछ शरीरके भीतर विद्यमान आत्मामें ही प्रतिष्ठित है । ऐसा जो जानता है, उस सर्वात्मा ज्ञानी पुरुषकी सेवाके लिये देवता भी सदा लालायित रहते हैं ॥ ३० ॥

भूमावसक्तं दिवि चाप्रमेयं हिरण्मयं योऽण्डजमण्डमध्ये । पतत्त्रिणं पक्षिणमन्तरिक्षे यो वेद भोग्यात्मनि रश्मिदीप्तः ॥ ३१ ॥

जो पृथ्वीपर रहकर भी उसमें आसक्त नहीं है, अनन्त आकाशमें अप्रमेयभावसे स्थित है, जो हिरण्मय ( चिन्मय ज्योतिस्वरूप), अण्डज– ब्रह्माण्डके भीतर प्रादुर्भूत और अण्ड-पिण्डात्मक शरीरके मध्यभागमें स्थित हृदय- कमलके आसनपर, भोग्यात्मा ( शरीर) के अन्तर्गत हृदयाकाशमें जीवरूपसे विराजमान है; जिसमें अनेक अंगदेवता छोटे - छोटे पंखोंके समान शोभा पाते हैं तथा जो मोद और प्रमोद नामक दो प्रमुख पंखोंसे शोभायमान है; उस सुवर्णमय पक्षीरूप जीवात्मा एवं ब्रह्मको जो जानता है, वह ज्ञानकी तेजोमयी किरणोंसे प्रकाशित होता है ॥ ३१ ॥

आवर्तमानमजरं विवर्तनं षण्णाभिकं द्वादशारं सुपर्व । यस्येदमास्ये परियाति विश्वं तत् कालचक्रं निहितं गुहायाम् ॥ ३२ ॥

जो निरन्तर घूमता रहता है, कभी जीर्ण या क्षीण नहीं होता, जो लोगोंकी आयुको क्षीण करता है, छः ऋतुएँ जिसकी नाभि हैं, बारह महीने जिसके अरे हैं, दर्शपौर्णमास आदि जिसके सुन्दर पर्व हैं; यह सम्पूर्ण विश्व जिसके मुँहमें भक्ष्य पदार्थके समान जाता है, वह

पृष्ठ 1613

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कालचक्र बुद्धिरूपी गुहामें स्थित है (उसे जो जानता है, देवगण उसके शुभकर्मकी प्रशंसा करते हैं ) ॥ ३२ ॥

यः सम्प्रसादो जगतः शरीरं

सर्वान् स लोकानधिगच्छतीह ।

तस्मिन् हितं तर्पयतीह देवां- स्ते वै तृप्तास्तर्पयन्त्यास्यमस्य ॥ ३३ ॥

जो मनको प्रसन्नता प्रदान करता है, इस जगत्का शरीर है अर्थात् सम्पूर्ण जगत् जिसके विराट् शरीरमें विराजित है, वह परमात्मा इस जगत् में सब लोकोंको घेरे स्थित है । उस परमात्मामें ध्यानद्वारा स्थापित किया हुआ मन, इस देहमें स्थित देवताओं— प्राणोंको तृप्त करता है और वे तृप्त हुए प्राण उस ज्ञानीके मुखको ज्ञानामृतसे तृप्त करते हैं ॥ ३३ ॥

तेजोमयो नित्यमयः पुराणो लोकाननन्तानभयानुपैति । भूतानि यस्मान्न त्रसन्ते कदाचित् स भूतानां न त्रसते कदाचित् ॥ ३४ ॥

जो ब्रह्मज्ञानमय तेजसे सम्पन्न और पुरातन नित्य-ब्रह्मपरायण है, वह भिक्षु अनन्त एवं निर्भय लोकोंको प्राप्त होता है । जिससे जगत्के प्राणी कभी भयभीत नहीं होते, वह भी संसारके प्राणियोंसे कभी भय नहीं पाता है ॥ अगर्हणीयो न च गर्हतेऽन्यान् स वै विप्रः परमात्मानमीक्षेत् । विनीतमोहो व्यपनीतकल्मषो न चेह नामुत्र च सोऽन्नमृच्छति ॥ ३५ ॥

जो न तो स्वयं निन्दनीय है और न दूसरोंकी निन्दा करता है, वही ब्राह्मण परमात्माका दर्शन कर सकता है । जिसके मोह और पाप दूर हो गये हैं, वह इस लोक और परलोकके भोगोंमें आसक्त नहीं होता ॥ ३५ ॥

अरोषमोहः समलोष्टकाञ्चनः

प्रहीणकोशो गतसंधिविग्रहः ।

अपेतनिन्दास्तुतिरप्रियाप्रिय- श्चरन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ॥ ३६ ॥

ऐसे संन्यासीको रोष और मोह नहीं छू सकते । वह मिट्टीके ढेले और सोनेको समान समझता है । पाँच कोशोंका अभिमान त्याग देता है और संधि- विग्रह तथा निन्दा - स्तुतिसे रहित हो जाता है । उसकी दृष्टिमें न कोई प्रिय होता है न अप्रिय । वह संन्यासी उदासीनकी भाँति सर्वत्र विचरता रहता है ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1614

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४५ ॥

पृष्ठ 1615

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षट्चत्वारिशंदधिकद्विशततमोऽध्यायः परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय व्यासउवाच

प्रकृत्यास्तु विकारा ये क्षेत्रज्ञस्तैरधिष्ठितः ।

न चैनं ते प्रजानन्ति स तु जानाति तानपि ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं — बेटा! देह, इन्द्रिय और मन आदि जो प्रकृतिके विकार हैं, वे क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) के ही आधारपर स्थित रहते हैं । वे जड होनेके कारण क्षेत्रज्ञको नहीं जानते; परंतु क्षेत्रज्ञ उन सबको जानता है ॥

तैश्चैवं कुरुते कार्यं मनःषष्ठैरिहेन्द्रियैः ।

सुदान्तैरिव संयन्ता दृढैः परमवाजिभिः ॥ २ ॥

जैसे चतुर सारथि अपने वशमें किये हुए बलवान् और उत्तम घोड़ोंसे अच्छी तरह काम लेता है, उसी प्रकार यहाँ क्षेत्रज्ञ भी अपने वशमें किये हुए मनसहित इन्द्रियोंके द्वारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करता है ॥ २ ॥

इन्द्रियेभ्यः परे ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ ३ ॥

इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय बलवान् हैं, विषयोंसे मन बलवान् है, मनसे बुद्धि बलवान् है और बुद्धिसे जीवात्मा बलवान् है ॥ ३ ॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् परतोऽमृतम् ।

अमृतान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ४ ॥

जीवात्मासे बलवान् है अव्यक्त ( मूल प्रकृति ) और अव्यक्तसे बलवान् और श्रेष्ठ है अमृतस्वरूप परमात्मा । उस परमात्मासे बढ़कर श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है । वही श्रेष्ठताकी चरम सीमा और परम गति है ॥ ४ ॥

एवं सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते ।

दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ ५ ॥

इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर उनकी हृदय-गुफामें छिपा हुआ वह परमात्मा इन्द्रियोंद्वारा प्रकाशमें नहीं आता। सूक्ष्मदर्शी ज्ञानी महात्मा ही अपनी सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ बुद्धिद्वारा उसका दर्शन करते हैं ॥ ५ ॥

अन्तरात्मनि संलीय मनःषष्ठानि मेधया ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च बहुचिन्त्यमचिन्तयन् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1616

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ध्यानेनोपरमं कृत्वा विद्यासम्पादितं मनः ।

अनीश्वरः प्रशान्तात्मा ततोऽर्च्छत्यमृतं पदम् ॥ ७ ॥

योगी बुद्धिके द्वारा मनसहित इन्द्रियों और उनके विषयोंको अन्तरात्मामें लीन करके नाना प्रकारके चिन्तनीय विषयका चिन्तन न करता हुआ जब विवेकद्वारा विशुद्ध किये हुए मनको ध्यानके द्वारा सब ओरसे पूर्णतया उपरत करके अपनेको कुछ भी करनेमें असमर्थ बना लेता है अर्थात् सर्वथा कर्तापनके अभिमानसे शून्य हो जाता है, तब उसका मन अविचल परम शान्ति - सम्पन्न हो जाता है और वह अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ६-७ ॥

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां वश्यात्मा चलितस्मृतिः ।

आत्मनः सम्प्रदानेन मर्त्यो मृत्युमुपाश्नुते ॥ ८ ॥

जिसका मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंके वशमें होता है, वह मनुष्य विवेक शक्तिको खो देता है और अपनेको काम आदि शत्रुओंके हाथोंमें सौंपकर मृत्युका कष्ट भोगता है ॥ ८ ॥

आहत्य सर्वसंकल्पान् सत्त्वे चित्तं निवेशयेत् ।

सत्त्वे चित्तं समावेश्य ततः कालंजरो भवेत् ॥ ९ ॥

अतः सब प्रकारके संकल्पोंका नाश करके चित्तको सूक्ष्म बुद्धिमें लीन करे । इस प्रकार बुद्धिमें चित्तका लय करके वह कालपर विजय पा जाता है ॥

चित्तप्रसादेन यतिर्जहातीह शुभाशुभम् ।

प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ १० ॥

चित्तकी पूर्ण शुद्धिसे सम्पन्न हुआ यत्नशील योगी इस जगत्में शुभ और अशुभको त्याग देता है और प्रसन्नचित्त एवं आत्मनिष्ठ होकर अक्षय सुखका उपभोग करता है ॥ १० ॥

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा स्वप्ने सुखं स्वपेत् ।

निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते ॥ ११ ॥

मनुष्य नींदके समय जैसे सुखसे सोता है - सुषुप्तिके सुखका अनुभव करता है, अथवा जैसे वायुरहित स्थानमें जलता हुआ दीपक कम्पित नहीं होता, एकतार जला करता है, उसी प्रकार मन कभी चंचल न हो, यही उसके प्रसादका अर्थात् परम शुद्धिका लक्षण है ॥ ११ ॥

एवं पूर्वापरे काले युञ्जन्नात्मानमात्मनि ।

लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १२ ॥

जो मिताहारी और शुद्धचित्त होकर रातके पहले और पिछले पहरोंमें उपर्युक्त प्रकारसे आत्माको परमात्माके ध्यानमें लगाता है, वही अपने अन्तःकरणमें परमात्माका दर्शन करता है ॥ १२ ॥

रहस्यं सर्ववेदानामनैतिह्यमनागमम् ।

पृष्ठ 1617

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आत्मप्रत्ययिकं शास्त्रमिदं पुत्रानुशासनम् ॥ १३ ॥

बेटा! मैंने जो यह उपदेश दिया है, यह परमात्माका ज्ञान करानेवाला शास्त्र है । यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है । केवल अनुमान या आगमसे इसका ज्ञान नहीं होता, अनुभवसे ही यह ठीक - ठीक समझमें आता है ॥ १३ ॥

धर्माख्यानेषु सर्वेषु सत्याख्याने च यद् वसु ।

दशेदमृक्सहस्राणि निर्मथ्यामृतमुद्धृतम् ॥ १४ ॥

धर्म और सत्यके जितने भी आख्यान हैं, उन सबका यह सारभूत धन है । ऋग्वेदकी दस हजार ऋचाओंका मन्थन करके यह अमृतमय सारतत्त्व निकाला गया है ॥ १४ ॥

नवनीतं यथा दध्नः काष्ठादग्निर्यथैव च ।

तथैव विदुषां ज्ञानं पुत्र हेतोः समुद्धृतम् ॥ १५ ॥

बेटा! मनुष्य जैसे दहीसे मक्खन निकालते हैं और काठसे आग प्रकट करते हैं, उसी प्रकार मैंने भी विद्वानोंके लिये ज्ञानजनक यह मोक्षशास्त्र शास्त्रोंको मथकर निकाला है ॥ १५ ॥

स्नातकानामिदं शास्त्रं वाच्यं पुत्रानुशासनम् ।

तदिदं नाप्रशान्ताय नादान्तायातपस्विने ॥ १६ ॥

बेटा! व्रतधारी स्नातकोंको ही तुम इस मोक्ष- शास्त्रका उपदेश करना । जिसका मन शान्त नहीं है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं तथा जो तपस्वी नहीं है, उसे इस ज्ञानका उपदेश नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥

नावेदविदुषे वाच्यं तथा नानुगताय च ।

नासूयकायानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे ॥ १७ ॥

न तर्कशास्त्रदग्धाय तथैव पिशुनाय च । जो वेदका विद्वान् न हो, अनुगत भक्त न हो, दोषदृष्टिसे रहित न हो, सरल स्वभावका न हो और आज्ञाकारी न हो तथा तर्कशास्त्रकी आलोचना करते - करते जिसका हृदय दग्ध -रस- शून्य हो गया हो और जो दूसरोंकी चुगली खाता हो - ऐसे लोगोंको इस ज्ञानका उपदेश देना उचित नहीं है ॥ १७३ ॥

श्लाघिने श्लाघनीयाय प्रशान्ताय तपस्विने ॥ १८ ॥

इदं प्रियाय पुत्राय शिष्यायानुगताय च ।

रहस्यधर्मं वक्तव्यं नान्यस्मै तु कथंचन ॥ १ ९ ॥

जो तत्त्वज्ञानकी अभिलाषा रखनेवाला, स्पृहणीय गुणोंसे युक्त, शान्तचित्त, तपस्वी एवं अनुगत शिष्य हो अथवा इन्हीं गुणोंसे युक्त प्रिय पुत्र हो, उसीको इस गूढ़ रहस्यमय धर्मका उपदेश देना चाहिये; दूसरे किसीको किसी प्रकार भी नहीं ॥ १८-१९ ॥

यद्यप्यस्य महीं दद्याद् रत्नपूर्णामिमां नरः ।

इदमेव ततः श्रेय इति मन्येत तत्त्ववित् ॥ २० ॥

पृष्ठ 1618

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यदि कोई मनुष्य रत्नोंसे भरी हुई यह सम्पूर्ण पृथ्वी देने लगे तो भी तत्त्ववेत्ता पुरुष यही समझे कि इस सारे धनकी अपेक्षा यह ज्ञान ही श्रेष्ठ है ॥ २० ॥

अतो गुह्यतरार्थं तदध्यात्ममतिमानुषम् ।

यत् तन्महर्षिभिर्दृष्टं वेदान्तेषु च गीयते ॥ २१ ॥

तत् तेरहं सम्प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २२ ॥

बेटा! तुम मुझसे जो प्रश्न कर रहे हो, उसके अनुसार मैं इससे भी गूढ़तर अर्थवाले अलौकिक अध्यात्मज्ञानका उपदेश करूँगा, जिसे महर्षियोंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है और जिसका वेदान्तशास्त्र - उपनिषदोंमें गान किया गया है ॥ २१-२२ ॥ यच्च ते मनसि वर्तते परं यत्र चास्ति तव संशयः क्वचित् । श्रूयतामयमहं तवाग्रतः पुत्र किं हि कथयामि ते पुनः ॥ २३ ॥

पुत्र! तुम्हारे मनमें जो वस्तु सर्वश्रेष्ठ जान पड़ती हो तथा जिसके विषयमें तुम्हें कहीं संशय हो रहा हो, उसे पूछो और उसके उत्तरमें मैं जो कुछ तुम्हारे सामने कहूँ, उसे सुनो! बोलो, मैं फिर तुम्हें किस विषयका उपदेश करूँ ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौछियालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४६ ॥

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पृष्ठ 1619

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सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन शुक उवाच

अध्यात्मं विस्तरेणेह पुनरेव वदस्व मे ।

यदध्यात्मं यथा वेद भगवनृषिसत्तम ॥। १ ॥

शुकदेवजीने कहा — भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! अब पुनः मुझे अध्यात्मज्ञानका विस्तारपूर्वक उपदेश दीजिये । अध्यात्म क्या है और उसे मैं कैसे जानूँगा? ॥ १ ॥

व्यासउवाच

अध्यात्मं यदिदं तात पुरुषस्येह पठ्यते ।

तत् तेऽहं वर्तयिष्यामि तस्य व्याख्यामिमां शृणु ॥ २ ॥

व्यासजीने कहा — तात! मनुष्यके लिये शास्त्रमें जो यह अध्यात्मविषयकी चर्चा की जाती है, उसका परिचय मैं तुम्हें दे रहा हूँ; तुम अध्यात्मकी यह व्याख्या सुनो ॥ २ ॥

भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाश एव च ।

महाभूतानि भूतानां सागरस्योर्मयो यथा ॥ ३ ॥

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - ये पाँच महाभूत सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें स्थित हैं । जैसे समुद्रकी लहरें उठती और विलीन होती रहती हैं, उसी प्रकार ये पाँचों महाभूत प्राणियोंके शरीरके रूपमें जन्म ग्रहण करते और विलीन होते रहते हैं ॥ ३ ॥

प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः ।

तद्वन्महान्ति भूतानि यवीयःसु विकुर्वते ॥ ४ ॥

जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको सब ओर फैलाकर फिर समेट लेता है, इसी प्रकार ये सारे महाभूत छोटे -छोटे शरीरोंमें विकृत होते – उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ॥ ४ ॥

इति तन्मयमेवेदं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।

सर्गे च प्रलये चैव तस्मिन् निर्दिश्यते तथा ॥ ५ ॥

इस प्रकार यह समस्त स्थावर- जंगम जगत् पंचभूतमय ही है । सृष्टिकालमें पंचभूतोंसे ही सबकी उत्पत्ति होती है और प्रलयके समय उन्हींमें सबका लय बताया जाता है ॥ ५ ॥

महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् ।

अकरोत् तात वैषम्यं यस्मिन् यदनुपश्यति ॥ ६ ॥

यद्यपि सम्पूर्ण शरीरोंमें पाँच ही भूत हैं तथापि लोगोंको उनमेंसे जिसमें जो वैषम्य दिखायी देता है, उसका कारण यह है कि सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीने समस्त प्राणियोंमें उनके कर्मानुसार ही न्यूनाधिकरूपमें उन भूतोंका समावेश किया है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1620

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शुक उवाच

अकरोद् यच्छरीरेषु कथं तदुपलक्षयेत् ।

इन्द्रियाणि गुणाः केचित् कथं तानुपलक्षयेत् ॥ ७ ॥

शुकदेवजीने पूछा- पिताजी! देवता, मनुष्य, पशु और पक्षी आदिके शरीरोंमें विधाताने जो वैषम्य किया है, उसको किस प्रकार लक्ष्य किया जाय? शरीरमें इन्द्रियाँ भी हैं -और कुछ गुण भी हैं, उन्हें कैसे देखा जाय – उनमें से कौन किस महाभूतके कार्य हैं, इसकी पहचान कैसे हो? ॥ ७ || व्यास उवाच

एतत् ते वर्तयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।

शृणु तत् त्वमिहैकाग्रो यथातत्त्वं यथा च तत् ॥ ८ ॥

व्यासजीने कहा— बेटा! मैं इस विषयका क्रमशः और यथावत्रूपसे प्रतिपादन करूँगा । यह समस्त विषय तत्त्वतः जैसा है, वह सब तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ८ ॥

शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशसम्भवम् ।

प्राणश्चेष्टा तथा स्पर्श एते वायुगुणास्त्रयः ॥ ९ ॥

शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय तथा शरीरके सम्पूर्ण छिद्र — ये तीनों वस्तुएँ आकाशसे उत्पन्न हुई हैं । प्राण, चेष्टा तथा स्पर्श- ये तीनों वायुके गुण ( कार्य ) हैं ॥ ९ ॥

रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिधा ज्योतिर्विधीयते ।

रसोऽथ रसनं स्नेहो गुणास्त्वेते त्रयोऽम्भसः ॥ १० ॥

रूप, नेत्र और जठरानल- इन तीन रूपोंमें अग्निका ही कार्य प्रकट हुआ है । रस, रसना और स्नेह— ये तीनों जलके कार्य हैं ॥ १० ॥

प्रेयं घ्राणं शरीरं च भूमेरेते गुणास्त्रयः ।

एतावानिन्द्रियग्रामैर्व्याख्यातः पाञ्चभौतिकः ॥ ११ ॥

गन्ध, नासिका और शरीर – ये तीनों भूमिके गुण हैं । इस प्रकार इन्द्रियसमुदायसहित यह शरीर पाञ्चभौतिक बताया गया है ॥ ११ ॥

वायोः स्पर्शो रसोऽद्भ्यश्च ज्योतिषो रूपमुच्यते ।

आकाशप्रभवः शब्दो गन्धो भूमिगुणः स्मृतः ॥ १२ ॥

स्पर्श वायुका, रस जलका और रूप तेजका गुण बताया जाता है एवं शब्द आकाशका और गन्ध भूमिका गुण माना गया है ॥ १२ ॥

मनो बुद्धिः स्वभावश्च त्रय एते स्वयोनिजाः ।

न गुणानतिवर्तन्ते गुणेभ्यः परमागताः ॥ १३ ॥