05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1621–1630
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1621–1630
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मन, बुद्धि और स्वभाव ( अहंभाव) -ये तीनों अपने कारणभूत पूर्वसंस्कारोंसे उत्पन्न हुए हैं । ये तीनों पाञ्चभौतिक होते हुए भी भूतोंके अन्य कार्य जो श्रोत्रादि हैं, उनसे श्रेष्ठ हैं तो भी गुणोंका सर्वथा उल्लंघन नहीं कर पाते हैं ॥ १३ ॥
यथा कूर्म इहाङ्गानि प्रसार्य विनियच्छति ।
एवमेवेन्द्रियग्रामं बुद्धिः सृष्ट्वा नियच्छति ॥ १४ ॥
जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार बुद्धि सम्पूर्ण इन्द्रियोंको विषयोंकी ओर फैलाकर फिर उन्हें वहाँसे हटा लेती है ॥ १४ ॥
यदूर्ध्वं पादतलयोरवाङ्मूर्ध्नश्च पश्यति ।
एतस्मिन्नेव कृत्ये तु वर्तते बुद्धिरुत्तमा ॥ १५ ॥
पैरोंसे ऊपर और मस्तकसे नीचे मनुष्य जो कुछ देखता है अर्थात् सम्पूर्ण शरीरको जो अहंभावसे देखना है, इस कार्यमें उत्तम बुद्धि प्रवृत्त होती है । तात्पर्य यह कि शरीरमें जो अहंभावका अनुभव है, वह बुद्धिका ही रूपान्तर है ॥ १५ ॥
गुणान् नेनीयते बुद्धिर्बुद्धिरेवेन्द्रियाण्यपि ।
मनःषष्ठानि सर्वाणि बुद्धयभावे कुतो गुणाः ॥ १६ ॥
बुद्धि ही शब्द आदि गुणोंको श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके पास बार- बार ले जाती है और बुद्धि ही मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंको विषयोंके पास पुनः पुनः खींच ले जाती है; यदि इनके साथ बुद्धि न रहे तो इन्द्रियोंद्वारा शब्द आदि विषयोंका अनुभव कैसे हो सकता है ॥
इन्द्रियाणि नरे पञ्च षष्ठं तु मन उच्यते ।
सप्तमीं बुद्धिमेवाहुः क्षेत्रज्ञं पुनरष्टमम् ॥ १७ ॥
मनुष्यके शरीरमें पाँच इन्द्रियाँ हैं । छठा तत्त्व मन है । सातवाँ तत्त्व बुद्धि और आठवाँ क्षेत्रज्ञ बताया गया है ॥ १७ ॥
चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः ।
बुद्धिरध्यवसानाय साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते ॥ १८ ॥
आँख देखनेका काम करती है, ( यह उपलक्षण है । इससे सभी इन्द्रियोंके कार्यका लक्ष्य कराया गया है ) मन संदेह करता है और बुद्धि उसका निश्चय करती है; किंतु क्षेत्रज्ञ ( आत्मा) उन सबका साक्षी कहलाता है ॥
रजस्तमश्च सत्त्वं च यत्र एते स्वयोनिजाः ।
समाः सर्वेषु भूतेषु तान् गुणानुपलक्षयेत् ॥ १ ९ ॥
रजोगुण, तमोगुण और सत्वगुण– ये तीनों अपने कारणभूत मूल प्रकृतिसे प्रकट हुए हैं; वे तीनों गुण सब प्राणियोंमें समानरूपसे रहते हैं। उनकी पहचान उनके कार्योंद्वारा करे ॥ १ ९ ॥
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं किंचिदात्मनि लक्षयेत् ।
प्रशान्तमिव संशुद्धं सत्त्वं तदुपधारयेत् ॥ २० ॥
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जब अपनेमें कुछ प्रसन्नतायुक्त विशुद्ध और शान्त- सा भाव दिखायी दे, तब यह निश्चय करे कि सत्वगुण प्रवृत्त हुआ है ॥ २० ॥
यत् तु संतापसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।
प्रवृत्तं रज इत्येवं तत्र चाप्युपलक्षयेत् ॥ २१ ॥
शरीर अथवा मनमें जब कुछ संतापयुक्त भाव दृष्टिगोचर हो, तब वहाँ यह समझ लेना चाहिये कि रजोगुणकी प्रवृत्ति हो रही है ॥ २१ ॥
यत् तु सम्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधार्यताम् ॥ २२ ॥
जब मोहयुक्त भाव मनपर छा जाय, किसी भी विषयमें कोई बात स्पष्ट न जान पड़े, जब तर्क भी काम न दे और किसी तरह कोई बात समझमें न आवे, तब समझना चाहिये कि तमोगुण प्रवृत्त हुआ है ॥ २२ ॥
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः साम्यं स्वस्थात्मचित्तता ।
अकस्माद् यदि वा कस्माद् वर्तन्ते सात्त्विका गुणाः ॥ २३ ॥
जब अतिशय हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता और स्वस्थचित्तता - ये सद्गुण अकस्मात् या किसी कारणवश विकसित हों, तब समझना चाहिये कि ये सात्विक गुण हैं ॥ २३ ॥
अभिमानो मृषावादो लोभो मोहस्तथाक्षमा ।
लिङ्गानि रजसस्तानि वर्तन्ते हेत्वहेतुतः ॥ २४ ॥
अभिमान, असत्यभाषण, लोभ, मोह और असहनशीलता – ये दोष चाहे किसी कारणसे प्रकट हुए हों अथवा बिना कारणके हर एक परिस्थितिमें रजोगुणके ही चिह्न माने गये हैं ॥ २४ ॥
तथा मोहः प्रमादश्च निद्रा तन्द्रा प्रबोधिता ।
कथंचिदभिवर्तन्ते विज्ञेयास्तामसा गुणाः ॥ २५ ॥
इसी प्रकार मोह, प्रमाद, निद्रा, तन्द्रा और अज्ञान जिस किसी कारणसे हो जायँ, उन्हे तमोगुणका कार्य जानना चाहिये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४७ ॥
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अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः बुद्धिकी श्रेष्ठता और प्रकृति - पुरुष- विवेक व्यास उवाच
मनो विसृजते भावं बुद्धिरध्यवसायिनी ।
हृदयं प्रियाप्रिये वेद त्रिविधा कर्मचोदना ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं - पुत्र! कर्म करनेमें तीन प्रकारसे प्रेरणा प्राप्त होती है । पहले तो मन संकल्पमात्रसे नाना प्रकारके भावकी सृष्टि करता है, बुद्धि उसका निश्चय करती है । तत्पश्चात् हृदय उनकी अनुकूलता और प्रतिकूलताका अनुभव करता है । ( इसके बाद कर्ममें प्रवृत्ति होती है ) ॥ १ ॥
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा परो मतः ॥ २ ॥
इन्द्रियोंसे उनके विषय बलवान् हैं ( क्योंकि वे बलात् इन्द्रियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं ), उन विषयोंसे मन बलवान् है ( क्योंकि वह इन्द्रियोंको उनसे हटानेमें समर्थ है ) । मनसे बुद्धि बलवान् है ( क्योंकि वह मनको वशमें रख सकती है ) और बुद्धिसे आत्मा बलवान् माना गया है ( क्योंकि वह बुद्धिको सम बनाकर स्वाधीन कर सकता है ) ॥ २ ॥
बुद्धिरात्मा मनुष्यस्य बुद्धिरेवात्मनाऽऽत्मनि ।
यदा विकुरुते भावं तदा भवति सा मनः ॥ ३ ॥
बुद्धि प्राणियोंकी समस्त इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री है, इसलिये वह जीवात्माके समान ही उनकी आत्मा मानी गयी है । बुद्धि ही स्वयं अपने भीतर जब भिन्न-भिन्न विषयोंको ग्रहण करनेके लिये विकृत हो नाना प्रकारके रूप धारण करती है, तब वही मन बन जाती है ॥ ३ ॥
इन्द्रियाणां पृथग्भावाद् बुद्धिर्विक्रियते ह्यतः ।
शृण्वती भवति श्रोत्रं स्मृशती स्पर्श उच्यते ॥ ४ ॥
इन्द्रियाँ पृथक् - पृथक् हैं, इसलिये उनकी क्रियाएँ भी पृथक्- पृथक् हैं । अतः उन्हींके लिये बुद्धि नाना प्रकारके रूप धारण करती है । वही जब सुनती है तो श्रोत्र कहलाती है और स्पर्श करते समय स्पर्शेन्द्रिय ( त्वचा ) के नामसे पुकारी जाती है ॥ ४ ॥
पश्यती भवते दृष्टी रसती रसनं भवेत् ।
जिघ्रती भवति घ्राणं बुद्धिर्विक्रियते पृथक् ॥ ५ ॥
वही देखते समय दृष्टि और रसास्वादनके समय रसना हो जाती है । जब वह गन्धको ग्रहण करती है, तब वही घ्राणेन्द्रिय कहलाती है । इस प्रकार बुद्धि ही पृथक् - पृथक् विकृत होती है ॥ ५ ॥
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इन्द्रियाणि तु तान्याहुस्तेष्वदृश्योऽधितिष्ठति ।
तिष्ठती पुरुषे बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ॥ ६ ॥
बुद्धिके इन विकारोंको ही इन्द्रियाँ कहते हैं । अदृश्य जीवात्मा उन सबमें अधिष्ठित है । बुद्धि उस जीवात्मामें ही स्थित हो सात्त्विक आदि तीनों भावोंमें रहती है ॥ ६ ॥
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदपि शोचति ।
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदिह युज्यते ॥ ७ ॥
इसी हेतुसे वह कभी प्रेम और प्रसन्नता लाभ करती है ( यह उसका सात्त्विक भाव है ) । कभी शोकमें डूबती है ( यह उसका राजस भाव है ) । और कभी न तो सुखसे युक्त होती है एवं न दुःखसे ही; उसपर मोह छाया रहता है ( यही उसका तामस भाव है ) ॥ ७ ॥
सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते ।
सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ॥ ८ ॥
जैसे उत्ताल तरंगोंसे युक्त सरिताओंका स्वामी समुद्र कभी- कभी अपनी विशाल तटभूमिको भी लाँघ जाता है, उसी प्रकार यह भावात्मिका बुद्धि चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगमें स्थित होनेपर इन तीनों भावोंको लाँघ जाती है ॥ ८ ॥
यदा प्रार्थयते किंचित् तदा भवति सा मनः ।
अधिष्ठानानि वै बुद्धयां पृथगेतानि संस्मरेत् ।
इन्द्रियाण्येव मेध्यानि विजेतव्यानि कृत्स्नशः ॥ ९ ॥
मनुष्य जब किसी वस्तुकी इच्छा करता है, तब उसकी बुद्धि मनके रूपमें परिणत हो जाती है । ये जो एक दूसरेसे पृथक् - पृथक् इन्द्रियोंके भाव हैं, इन्हें बुद्धिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये । ‘ मेधा ' कहते हैं रूप आदिके ज्ञानको, उसमें हितकर या सहायक होनेके कारण इन्द्रियाँ ‘ मेध्य' कही गयी हैं । योगीको सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनी चाहिये ॥ ९ ॥
सर्वाण्येवानुपूर्व्येण यद् यदानुविधीयते ।
अविभागगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते ॥ १० ॥
बुद्धि सम्पूर्ण इन्द्रियोंमेंसे जब जिस इन्द्रियके साथ हो जाती है, उस समय पहले अलग न होनेपर भी वह बुद्धि संकल्पात्मक मन एवं घटादि पदार्थोंमें उपस्थित होती है अर्थात् बुद्धिसे अनुगृहीत होनेपर ही कोई भी इन्द्रिय संकल्पजनित घट- पटादिको क्रमशः ग्रहण करती है ॥ १० । |
ये चैव भावा वर्तन्ते सर्व एष्वेव ते त्रिषु ।
अन्वर्थाः सम्प्रवर्तन्ते रथनेमिमरा इव ॥ ११ ॥
जगत्में जो भी नाना भाव हैं, वे सब - के - सब सात्त्विक, राजस और तामस —इन तीनों भावोंके ही अन्तर्गत हैं। जैसे अरे रथकी नेमिसे जुड़े होते हैं, उसी प्रकार सभी भाव सात्विक आदि गुणोंके अनुगामी हैं ॥
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प्रदीपार्थं मनः कुर्यादिन्द्रियैर्बुद्धिसत्तमैः ।
निश्चरद्भिर्यथायोगमुदासीनैर्यदृच्छया ॥ १२ ॥
बुद्धिरूप अधिष्ठानमें स्थित हुई उदासीनभावसे स्वभावके अनुसार यथासम्भव विषयोंकी ओर जानेवाली इन्द्रियोंद्वारा मन दीपकका कार्य करता है अर्थात् जैसे दीपक अपनी प्रभाद्वारा घटादि वस्तुओंको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार मन नेत्र आदि इन्द्रियोंद्वारा घट - पट आदि वस्तुओंका दर्शन एवं ग्रहण कराता है ॥ १२ ॥
एवं स्वभावमेवेदमिति विद्वान् न मुह्यति ।
अशोचन्नप्रहृष्यन् हि नित्यं विगतमत्सरः ॥ १३ ॥
इस जगत्का ऐसा ही परिवर्तनस्वभाव है, ऐसा जाननेवाला ज्ञानी पुरुष कभी मोहमें नहीं पड़ता, हर्ष और शोक नहीं करता तथा ईर्ष्या -द्वेष आदिसे रहित रहता है ॥ १३ ॥
न चात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रियैः कामगोचरैः ।
प्रवर्तमानैरनये दुष्करैरकृतात्मभिः ॥ १४ ॥
जो दुष्कर्मपरायण और अशुद्ध अन्तःकरणवाले हैं, वे अज्ञानी पुरुष अन्यायपूर्वक मनोवाञ्छित विषयोंमें विचरनेवाली इन्द्रियोंद्वारा आत्माका दर्शन नहीं कर सकते ॥
तेषां तु मनसा रश्मीन् यदा सम्यङ्नियच्छति ।
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा दीपदीप्ता यथाऽऽकृतिः ॥ १५ ॥
परंतु जब मनुष्य अपने मनके द्वारा इन्द्रियरूपी अश्वोंकी बागडोरको सदा पकड़े रहकर उन्हें अच्छी तरह काबूमें कर लेता है, तब उसे ज्ञानके प्रकाशमें आत्माका दर्शन उसी प्रकार होता है जिस प्रकार दीपकके प्रकाशमें किसी वस्तुकी आकृति स्पष्ट दिखायी देती है ॥ १५ ॥
सर्वेषामेव भूतानां तमस्यपगते यथा ।
प्रकाशं भवते सर्वं तथेदमुपधार्यताम् ॥ १६ ॥
जैसे अन्धकार दूर हो जानेपर सभी प्राणियोंके सामने प्रकाश छा जाता है, उसी प्रकार यह निश्चितरूपसे समझ लो कि अज्ञानका नाश होनेपर ही ज्ञानस्वरूप आत्माका साक्षात्कार होता है ॥ १६ ॥
यथा वारिचरः पक्षी न लिप्यति जले चरन् ।
विमुक्तात्मा तथा योगी गुणदोषैर्न लिप्यते ॥ १७ ॥
जैसे जलचर पक्षी जलमें विचरता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार मुक्तात्मा योगी संसारमें रहकर भी उसके गुण और दोषोंसे लिपायमान नहीं होता ॥ १७ ॥
एवमेव कृतप्रज्ञो न दोषैर्विषयांश्चरन् ।
असज्जमानः सर्वेषु कथंचन न लिप्यते ॥ १८ ॥
इसी प्रकार जिसकी बुद्धि शुद्ध है, वह स्त्री, पुत्र आदि सम्बन्धियोंमें आसक्त न होनेके कारण विषयोंका सेवन करता हुआ भी किसी प्रकार उनके दोषोंसे लिप्त नहीं होता
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है ॥ १८ ॥
त्यक्त्वा पूर्वकृतं कर्म रतिर्यस्य सदाऽऽत्मनि ।
सर्वभूतात्मभूतस्य गुणवर्गेष्वसज्जतः ॥ १ ९ ॥
जो अपने पूर्वकृत कर्मोंके संस्कारोंका त्याग करके सदा परमात्मामें ही अनुराग रखता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा हो जाता है और विषयोंमें कभी आसक्त नहीं होता ॥ १ ९ ॥
सत्त्वमात्मा प्रसरति गुणान् वापि कदाचन ।
न गुणा विदुरात्मानं गुणान् वेद स सर्वदा ॥ २० ॥
परिद्रष्टा गुणानां च परिस्रष्टा यथातथम् ।
सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मयोः ॥ २१ ॥
जीवात्मा कभी बुद्धिकी ओर झुकता है और कभी गुणोंकी ओर । गुण आत्माको नहीं जानते, किंतु आत्मा गुणोंको सदा जानता रहता है, क्योंकि वह गुणोंका द्रष्टा और यथावत्रूपसे स्रष्टा भी है । यद्यपि बुद्धि और क्षेत्रज्ञ दोनों ही सूक्ष्म वस्तु हैं, किंतु उन दोनोंमें यही अन्तर समझो कि बुद्धि दृश्य है और आत्मा द्रष्टा है ॥ २१ ॥
सृजते ऽत्र गुणानेक एको न सृजते गुणान् ।
पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा ॥ २२ ॥
इन दोनोंमेंसे एक ( बुद्धि) तो गुणोंकी सृष्टि करती है और दूसरा ( आत्मा) गुणोंकी सृष्टि नहीं करता है । वे दोनों स्वरूपतः एक दूसरेसे पृथक् हैं; परंतु सदा संयुक्त रहते हैं ॥ २२ ॥
यथा मत्स्योऽद्भिरन्यः स्यात् सम्प्रयुक्तौ तथैव तौ ।
मशकोदुम्बरौ वापि सम्प्रयुक्तौ यथा सह ॥ २३ ॥
जैसे मछली जलसे भिन्न है, फिर भी वे एक दूसरेसे संयुक्त रहते हैं । जैसे गूलर और उसके कीड़े एक दूसरेसे पृथक् हैं तथापि परस्पर संयुक्त रहते हैं । उसी प्रकार बुद्धि और क्षेत्रज्ञको भी समझना चाहिये ॥
इषीका वा यथा मुञ्जे पृथक् च सह चैव च ।
तथैव सहितावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ ॥ २४ ॥
जैसे मूँजमें जो सींक है, वह उससे पृथक् है तो भी वे दोनों साथ ही रहते हैं, उसी प्रकार बुद्धि और क्षेत्रज्ञ सर्वथा एक दूसरेसे पृथक् होते हुए भी दोनों साथ- साथ और एक दूसरेके आश्रित रहते हैं ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ अड़तालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४८ ॥
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एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ज्ञानके साधन तथा ज्ञानीके लक्षण और महिमा व्यास उवाच
सृजते तु गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञस्त्वधितिष्ठति ।
गुणान् विक्रियतः सर्वानुदासीनवदीश्वरः ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं - पुत्र! प्रकृति ही गुणोंकी सृष्टि करती है । क्षेत्रज्ञ – आत्मा तो उदासीनकी भाँति उन सम्पूर्ण विकारशील गुणोंको देखा करता है । वह स्वाधीन एवं उनका अधिष्ठाता है ॥ ||
स्वभावयुक्तं तत् सर्वं यदिमान् सृजते गुणान् ।
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं सृजते तद्गुणांस्तथा ॥ २ ॥
जैसे मकड़ी अपने शरीरसे तन्तुओंकी सृष्टि करती है, उसी प्रकार प्रकृति भी समस्त त्रिगुणात्मक पदार्थोंको उत्पन्न करती है । प्रकृति जो इन सब विषयोंकी सृष्टि करती है, वह सब उसके स्वभावसे ही होता है ॥ २ ॥
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते ।
एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे ॥ ३ ॥
किन्हींका मत है कि तत्त्वज्ञानसे जब गुणोंका नाश कर दिया जाता है, तब भी वे सर्वथा नष्ट नहीं होते; किंतु तत्त्वज्ञके लिये उनकी उपलब्धि नहीं होती अर्थात् उसका उनसे सम्बन्ध नहीं रहता । दूसरे लोग मानते हैं कि उनकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है अर्थात् उनका अस्तित्त्व नहीं रहता ॥ ३ ॥
उभयं सम्प्रधार्यैतदध्यवस्येद् यथामति ।
अनेनैव विधानेन भवेद् गर्भशयो महान् ॥ ४ ॥
इन दोनों मतोंपर अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके सिद्धान्तका निश्चय करे । इस प्रकार निश्चय करनेसे ( बार - बार ) गर्भमें शयन करनेवाला जीव महान् हो जाता है ॥ ४ ॥
अनादिनिधनो ह्यात्मा तं बुद्ध्वा विचरेन्नरः ।
अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च नित्यं विगतमत्सरः ॥ ५ ॥
आत्मा आदि और अन्तसे रहित है । उसे जानकर मनुष्य सदा हर्ष, क्रोध और ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो विचरता रहे ॥ ५ ॥
इत्येवं हृदयग्रन्थिं बुद्धिचिन्तामयं दृढम् ।
अनित्यं सुखमासीत अशोचंश्छिन्नसंशयः ॥ ६ ॥
साधकको चाहिये कि बुद्धिके चिन्ता आदि धर्मोंसे सुदृढ़ हुई हृदयकी अविद्यामयी अनित्य ग्रन्थिको उपर्युक्त प्रकारसे काटकर शोक और संदेहसे रहित हो सुखपूर्वक
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परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जाय ॥ ६ ॥
ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्व्या यथा पूर्णां नदीं नराः ।
अवगाढा ह्यविद्वांसो विद्धि लोकमिमं तथा ॥ ७ ॥
जैसे तैरनेकी कला न जाननेवाले मनुष्य यदि किनारेकी भूमिसे जलपूर्ण नदीमें गिर पड़ते हैं तो गोते खाते हुए महान् क्लेश सहन करते हैं; उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य इस संसार- सागरमें डूबकर कष्ट भोगते रहते हैं — ऐसा समझो ॥ ७ ॥
न तु ताम्यति वै विद्वान् स्थले चरति तत्त्ववित् ।
एवं यो विन्दतेऽऽत्मानं केवलं ज्ञानमात्मनः ॥ ८ ॥
परंतु जो तैरना जानता है, वह कष्ट नहीं उठाता । वह तो जलमें भी स्थलकी ही भाँति चलता है, उसी तरह ज्ञानस्वरूप विशुद्ध आत्माको प्राप्त हुआ तत्त्ववेत्ता संसार - सागरसे पार हो जाता है ॥ ८ ॥
एवं बुद्ध्वा नरः सर्वं भूतानामागतिं गतिम् ।
समवेक्ष्य च वैषम्यं लभते शममुत्तमम् ॥ ९ ॥
जो मनुष्य इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंके आवागमनको जानता तथा उनकी विषम अवस्थापर विचार करता है, उसे परम उत्तम शान्ति प्राप्त होती है ॥ ९ ॥
एतद् वै जन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्परायणम् ॥ १० ॥
विशेषरूपसे ब्राह्मणमें और समानभावसे मनुष्यमात्रमें इस ज्ञानको प्राप्त करनेकी जन्मसिद्ध शक्ति है । मन और इन्द्रियोंका संयम तथा आत्मज्ञान मोक्ष - प्राप्तिके लिये पर्याप्त साधन है ॥ १० ॥
एतद् बुद्ध्वा भवेत् शुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् ।
विज्ञायैतद् विमुच्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥ ११ ॥
शम और आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष अत्यन्त शुद्ध- बुद्ध हो जाता है । ज्ञानीका इसके सिवा और क्या लक्षण हो सकता है । बुद्धिमान् मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानकर कृतार्थ और मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥
न भवति विदुषां महद्भयं यदविदुषां सुमहद्भयं परत्र । न हि गतिरधिकास्ति कस्यचिद् भवति हि या विदुषः सनातनी ॥ १२ ॥
परलोकमें जो अज्ञानी मनुष्योंको महान् भय प्राप्त होता है, यह महान् भय ज्ञानी पुरुषोंको नहीं होता । ज्ञानीको जो सनातन गति प्राप्त होती है, उससे बढ़कर उत्तम गति और किसीको भी प्राप्त नहीं होती ॥ १२ ॥
लोकमातुरमसूयते जन-
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स्तत् तदेव च निरीक्ष्य शोचते । तत्र पश्य कुशलानशोचतो ये विदुस्तदुभयं कृताकृतम् ॥ १३ ॥
कुछ लोग मनुष्योंको दुखी और रोगी देखकर उनमें दोष - दृष्टि करते हैं और दूसरे लोग उनकी वह अवस्था देखकर शोक करते हैं । परंतु जो कार्य और कारण दोनोंको तत्त्वसे
जानते हैं, वे शोक नहीं करते । तुम उन्हीं लोगोंको वहाँ कुशल समझो ॥ १३ ॥
यत् करोत्यनभिसंधिपूर्वकं तच्च निर्णुदति तत् पुराकृतम् । न प्रियं तदुभयं न चाप्रियं तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः ॥ १४ ॥
कर्मपरायण मनुष्य निष्कामभावसे जिस कर्मका अनुष्ठान करते हैं, वह पहलेके किये हुए सकाम या अशुभ कर्मोंको भी नष्ट कर देता है; इस प्रकार कर्म करनेवाले साधकके कर्म इस लोकमें या परलोकमें कहीं भी उसका भला -बुरा या दोनों कुछ भी नहीं कर सकते ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ९ ॥