श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1631–1640

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1631–1640

पृष्ठ 1631

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पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार -नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति शुक उवाच

यस्माद् धर्मात् परो धर्मो विद्यते नेह कश्चन ।

यो विशिष्टश्च धर्मेभ्यस्तं भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १ ॥

शुकदेवजीने पूछा- पिताजी! इस जगत् में जिस धर्मसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं तथा जो सब धर्मोंसे श्रेष्ठ है, उसका आप मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

व्यास उवाच

धर्मं ते सम्प्रवक्ष्यामि पुराणमृषिभिः कृतम् ।

विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यस्तमिहैकमनाः शृणु ॥ २ ॥

व्यासजीने कहा- बेटा! मैं ऋषियोंके बताये हुए उस प्राचीन धर्मका, जो सब धर्मोंसे श्रेष्ठ है, तुमसे यहाँ वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि बुद्धया संयम्य यत्नतः ।

सर्वतो निष्पतिष्णूनि पिता बालानिवात्मजान् ॥ ३ ॥

जैसे पिता अपने छोटे पुत्रोंको काबू में रखता है, उसी प्रकार मनुष्यको चाहिये कि वह सब विषयोंपर टूट पड़नेवाली अपनी प्रमथनशील इन्द्रियोंका बुद्धिके द्वारा यत्नपूर्वक संयम करके उन्हें वशमें रखे ॥ ३ ॥

मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्र्यं परमं तपः ।

तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते ॥ ४ ॥

मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही सबसे बड़ी तपस्या है । यही सब धर्मोंसे श्रेष्ठतम परम धर्म बताया जाता है ॥ ४ ॥

तानि सर्वाणि संधाय मनःषष्ठानि मेधया ।

आत्मतृप्त इवासीत बहुचिन्त्यमचिन्तयन् ॥ ५ ॥

मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंको बुद्धिके द्वारा स्थिर करके बहुत - से चिन्तनीय विषयोंका चिन्तन न करते हुए अपनी आत्मामें तृप्त- सा होकर निश्चिन्त और निश्चल हो जाय ॥ ५ ॥

गोचरेभ्यो निवृत्तानि यदा स्थास्यन्ति वेश्मनि ।

तदा त्वमात्मनाऽऽत्मानं परं द्रक्ष्यसि शाश्वतम् ॥ ६ ॥

जिस समय ये इन्द्रियाँ अपने विषयोंसे हटकर अपने निवासस्थानमें स्थित हो जायँगी, उस समय तुम स्वयं ही उस सनातन परमात्माका दर्शन कर लोगे ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1632

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सर्वात्मानं महात्मानं विधूममिव पावकम् ।

तं पश्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा ये मनीषिणः ॥ ७ ॥

धूमरहित अग्निके समान देदीप्यमान वह परमेश्वर ही सबका आत्मा और परम महान् है । महात्मा एवं ज्ञानी ब्राह्मण ही उसे देख पाते हैं ॥ ७ ॥

यथा पुष्पफलोपेतो बहुशाखो महाद्रुमः ।

आत्मनो नाभिजानीते क्व मे पुष्पं क्व मे फलम् ॥ ८ ॥

एवमात्मा न जानीते क्व गमिष्ये कुतस्त्वहम् ।

अन्यो ह्यत्रान्तरात्मास्ति यः सर्वमनुपश्यति ॥ ९ ॥

जैसे फल और फूलोंसे भरा हुआ अनेक शाखाओंसे युक्त विशाल वृक्ष अपने ही विषयमें यह नहीं जानता कि कहाँ मेरा फूल है और कहाँ मेरा फल है; उसी प्रकार जीवात्मा यह नहीं जानता कि मैं कहाँसे आया हूँ और कहाँ जाऊँगा । किंतु शरीरमें जीवसे पृथक् दूसरा ही अन्तरात्मा है, जो सबको सब प्रकारसे निरन्तर देखता रहता है ॥ ८ - ९ ॥

ज्ञानदीपेन दीप्तेन पश्यत्यात्मानमात्मनि ।

दृष्ट्वा त्वमात्मनाऽऽत्मानं निरात्मा भव सर्ववित् ॥ १० ॥

पुरुष प्रज्वलित ज्ञानमय प्रदीपके द्वारा अपनेमें ही परमात्माका दर्शन करता है; इसी प्रकार तुम भी आत्माद्वारा परमात्माका साक्षात्कार करके सर्वज्ञ और स्वाभिमानसे रहित हो जाओ ॥ १० ॥

विमुक्तः सर्वपापेभ्यो मुक्तत्वच इवोरगः ।

परां बुद्धिमवाप्येह विपाप्मा विगतज्वरः ॥ ११ ॥

केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पके समान सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो उत्तम बुद्धि पाकर तुम यहाँ पाप और चिन्तासे रहित हो जाओ ॥ ११ ॥

सर्वतः स्रोतसं घोरां नदीं लोकप्रवाहिनीम् ।

पञ्चेन्द्रियग्राहवतीं मनः संकल्परोधसम् ॥ १२ ॥

लोभमोहतृणच्छन्नां कामक्रोधसरीसृपाम् ।

सत्यतीर्थानृतक्षोभां क्रोधपङ्कां सरिद्वराम् ॥ १३ ॥

अव्यक्तप्रभवां शीघ्रां दुस्तरामकृतात्मभिः ।

प्रतरस्व नदीं बुद्धया कामग्राहसमाकुलाम् ॥ १४ ॥

संसारसागरगमां योनिपातालदुस्तराम् ।

आत्मकर्मोद्भवां तात जिह्वावर्तां दुरासदाम् ॥ १५ ॥

यह संसार एक भयंकर नदी है, जो सम्पूर्ण लोकमें प्रवाहित हो रही है । इसके स्रोत सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर बहते हैं । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इसके भीतर पाँच ग्राहोंके समान हैं । मनके संकल्प ही इसके किनारे हैं । लोभ और मोहरूपी घास और सेवारसे यह ढकी हुई है । काम और क्रोध इसमें सर्पके समान निवास करते हैं । सत्य इसका घाट है । मिथ्या इसकी

पृष्ठ 1633

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हलचल है । क्रोध ही कीचड़ है । यह नदी दूसरी नदियोंसे श्रेष्ठ है । यह अव्यक्त प्रकृतिरूपी पर्वतसे प्रकट हुई है । इसके जलका वेग बड़ा प्रखर है। अजितात्मा पुरुषोंके लिये इसे पार करना अत्यन्त कठिन है । इसमें कामरूप ग्राह सब ओर भरे हैं । यह नदी संसार - सागरमें मिली है । वासनारूपी गहरे गड्ढोंके कारण इसे पार करना अन्यन्त कठिन है । तात! यह अपने कर्मोंसे ही उत्पन्न हुई है । जिह्वा भवँर है तथा इस नदीको लाँघना दुष्कर है । तुम अपनी विशुद्ध बुद्धिके द्वारा इस नदीको पार कर जाओ ॥ १२–१५ ॥

यां तरन्ति कृतप्रज्ञा धृतिमन्तो मनीषिणः ।

तां तीर्णः सर्वतो मुक्तो विधृतात्माऽऽत्मविच्छुचिः ॥ १६ ॥

उत्तमां बुद्धिमास्थाय ब्रह्मभूयान् भविष्यसि ।

संतीर्णः सर्वसंसारात् प्रसन्नात्मा विकल्मषः ॥ १७ ॥

धैर्यशाली, मनीषी और तत्त्वज्ञानी लोग जिस नदीको पार करते हैं, उसे तुम भी तैर जाओ । सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त, संयतचित्त, आत्मज्ञ और पवित्र हो जाओ । उत्तम बुद्धि ( ज्ञान) का आश्रय ले तुम सब प्रकारके सांसारिक बन्धनोंसे छूट जाओगे और निष्पाप एवं प्रसन्नचित्त हो ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाओगे ॥

भूमिष्ठानीव भूतानि पर्वतस्थो निशामय ।

अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च न नृशंसमतिस्तथा ॥ १८ ॥

जैसे पर्वतके शिखरपर खड़ा हुआ पुरुष धरतीपर रहनेवाले समस्त प्राणियोंको सुस्पष्ट देखता है, उसी प्रकार तुम भी ज्ञानरूपी शैलशिखरपर आरूढ़ हो समस्त प्राणियोंकी अवस्थापर दृष्टिपात करो । क्रोध और हर्षसे रहित हो जाओ तथा बुद्धिकी क्रूरतासे भी रहित हो जाओ ॥ १८ ॥

ततो द्रक्ष्यसि सर्वेषां भूतानां प्रभवाप्ययौ ।

एनं वै सर्वभूतेभ्यो विशिष्टं मेनिरे बुधाः ।

धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठा मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥ १ ९ ॥

ऐसा करनेसे तुम समस्त भूतोंके उत्पत्ति और प्रलयको देख सकोगे । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तत्त्वदर्शी ज्ञानी मुनि इस धर्मको समस्त प्राणियोंके लिये सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ॥ १ ९ ॥

आत्मनो व्यापिनो ज्ञानमिदं पुत्रानुशासनम् ।

प्रयताय प्रवक्तव्यं हितायानुगताय च ॥ २० ॥

बेटा! यह उपदेश व्यापक आत्माका ज्ञान करानेवाला है । जो संयतचित्त, हितैषी और अनुगत भक्त हो, उसीके समक्ष इसका वर्णन करना चाहिये ॥ २० ॥

आत्मज्ञानमिदं गुह्यं सर्वगुह्यतमं महत् ।

अब्रुवं यदहं तात आत्मसाक्षिकमञ्जसा ॥ २१ ॥

यह गोपनीय आत्मज्ञान सबसे अधिक गुह्यतम और महान् है । तात! मैंने जिसका उपदेश किया है, वह यथार्थतः मेरे अपने प्रत्यक्ष अनुभवमें लाया हुआ ज्ञान है ॥

पृष्ठ 1634

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नैव स्त्री न पुमानेतन्नैव चेदं नपुंसकम् ।

अदुःखमसुखं ब्रह्म भूतभव्यभवात्मकम् ॥ २२ ॥

दुःख और सुखसे रहित तथा भूत, भविष्य एवं वर्तमानस्वरूप ब्रह्म तो न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है ॥ २२ ॥

नैतज्ज्ञात्वा पुमान् स्त्री वा पुनर्भवमवाप्नुते ।

अभवप्रतिपत्त्यर्थमेतद् धर्मं विधीयते ॥ २३ ॥

पुरुष हो या स्त्री, इस ब्रह्मको जान ले तो उसका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता । अपुनर्भवस्थिति प्राप्त करनेके लिये ही इस ब्रह्मज्ञानरूप धर्मका विधान किया गया है ॥ २३ ॥

यथा मतानि सर्वाणि तथैतानि यथा तथा ।

कथितानि मया पुत्र भवन्ति न भवन्ति च ॥ २४ ॥

बेटा! सारे विभिन्न मत जैसे रहे हैं, वैसे ही मेरेद्वारा तुम्हारे समक्ष यथार्थरूपसे बताये गये हैं । जो इन मतोंका अनुसरण करते हैं; वे मुक्त हो जाते हैं, जो नहीं करते हैं, वे नहीं होते ॥ २४ ॥

तत् प्रीतियुक्तेन गुणान्वितेन पुत्रेण सत्पुत्र दमान्वितेन । पृष्टो हि सम्प्रीतमना यथार्थं ब्रूयात् सुतस्येह यदुक्तमेतत् ॥ २५ ॥

सत्पुत्र शुकदेव! प्रीतियुक्त, गुणवान् तथा इन्द्रियसंयमी पुत्र यदि प्रश्न करे तो पिता संतुष्टचित्त होकर उस जिज्ञासु पुत्रके समीप यथार्थरूपसे इस ज्ञानका उपदेश करे, जो कुछ मैंने तुम्हारे निकट कहा है ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौपचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५० ॥

पृष्ठ 1635

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एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणके लक्षण और परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय व्यासउवाच गन्धान् रसान् नानुरुन्ध्यात् सुखं वा नालंकारांश्चाप्नुयात् तस्य तस्य । मानं च कीर्तिं च यशश्च नेच्छेत् स वै प्रचारः पश्यतो ब्राह्मणस्य ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं - बेटा! साधकको चाहिये कि गन्ध और रस आदि विषयोंका उपभोग न करे, विषयसेवनजनित सुखकी ओर न जाय, स्वर्ण आदिके बने हुए सुन्दर- सुन्दर आभूषणोंको भी न धारण करे तथा मान, बड़ाई और यशकी इच्छा न करे, यही ज्ञानवान् ब्राह्मणका आचार है ॥ १ ॥

सर्वान् वेदानधीयीत शुश्रूषुर्ब्रह्मचर्यवान् ।

ऋचो यजूंसि सामानि न तेन न स वै द्विजः ॥ २ ॥

जो सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर ले, गुरुकी सेवामें रहे, ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करे तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेदका पूरा- पूरा ज्ञान प्राप्त कर ले, वही मुख्य ब्राह्मण है ॥ २ ॥

ज्ञातिवत् सर्वभूतानां सर्ववित् सर्ववेदवित् ।

नाकामो म्रियते जातु न तेन न च वै द्विजः ॥ ३ ॥

जो समस्त प्राणियोंको अपने कुटुम्बकी भाँति समझकर उनपर दया करता है । जाननेयोग्य तत्त्वका ज्ञाता तथा सब वेदोंका तत्त्वज्ञ है और कामनासे रहित है । वह कभी मृत्युको प्राप्त नहीं होता अर्थात् जन्म- मृत्युके बन्धन से सदाके लिये मुक्त हो जाता है। इन लक्षणोंसे सम्पन्न पुरुष ब्राह्मण नहीं है ऐसी बात नहीं, किंतु वही सच्चा ब्राह्मण है ॥ ३ ॥

इष्टीश्च विविधाः प्राप्य क्रतूंश्चैवाप्तदक्षिणान् ।

प्राप्नोति नैव ब्राह्मण्यमविधानात् कथंचन ॥ ४ ॥

नाना प्रकारकी इष्टियों और बड़ी- बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंका अनुष्ठान करनेमात्रसे बिना विधानके अर्थात् बिना आत्मज्ञानके किसीको किसी तरह भी ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त हो सकता ॥ ४ ॥

यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति ।

यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ५ ॥

जिस समय वह दूसरे प्राणियोंसे नहीं डरता और दूसरे प्राणी भी उससे भयभीत नहीं होते तथा जब वह इच्छा और द्वेषका सर्वथा परित्याग कर देता है, उसी समय उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1636

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यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् ।

कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ६ ॥

जब वह मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीकी बुराई करनेका विचार अपने मनमें नहीं करता, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥

कामबन्धनमेवैकं नान्यदस्तीह बन्धनम् ।

कामबन्धनमुक्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ७ ॥

जगत्में कामना ही एकमात्र बन्धन है, यहाँ दूसरा कोई बन्धन नहीं है । जो कामनाके बन्धनसे छूट जाता है, वह ब्रह्मभाव प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है ॥ ७ ॥

कामतो मुच्यमानस्तु धूम्राभ्रादिव चन्द्रमाः ।

विरजाः कालमाकांक्षन् धीरो धैर्येण वर्तते ॥ ८ ॥

कामनासे मुक्त हुआ रजोगुणरहित धीर पुरुष धूमिल रंगके बादलसे निकले हुए चन्द्रमाकी भाँति निर्मल होकर धैर्यपूर्वक कालकी प्रतीक्षा करता रहता है ॥ ८ ॥

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामः ॥ ९ ॥

जैसे नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण और अविचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, उसी प्रकार सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही प्रविष्ट हो जाते हैं, वही पुरुष परम शान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंको चाहनेवाला नहीं ॥ ९ ॥

स कामकान्तो न तु कामकामः सवै कामात् स्वर्गमुपैति देही ॥ १० ॥

भोग ही उस स्थितप्रज्ञ पुरुषकी कामना करते हैं, परंतु वह भोगोंकी कामना नहीं रखता । जो कामभोग चाहनेवाला देहाभिमानी है, वह कामनाओंके फल -स्वरूप स्वर्गलोकमें चला जाता है ॥ १० ॥

वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।

दमस्योपनिषद् दानं दानस्योपनिषत् तपः ॥ ११ ॥

वेदका सार है सत्य वचन, सत्यका सार है इन्द्रियोंका संयम, संयमका सार है दान और दानका सार है तपस्या ॥ ११ ॥

तपसोपनिषत् त्यागस्त्यागस्योपनिषत् सुखम् ।

सुखस्योपनिषत् स्वर्गः स्वर्गस्योपनिषच्छमः ॥ १२ ॥

तपस्याका सार है त्याग, त्यागका सार है सुख, सुखका सार है स्वर्ग और स्वर्गका सार है शान्ति ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1637

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क्लेदनं शोकमनसोः संतापं तृष्णया सह ।

सत्त्वमिच्छसि संतोषाच्छान्तिलक्षणमुत्तमम् ॥ १३ ॥

मनुष्यको संतोषपूर्वक रहकर शान्तिके उत्तम उपाय सत्त्वगुणको अपनानेकी इच्छा करनी चाहिये । सत्त्वगुण मनकी तृष्णा, शोक और संकल्पको उसी प्रकार जलाकर नष्ट करनेवाला है, जैसे गरम जल चावलको गला देता है ॥ १३ ॥

विशोको निर्ममः शान्तः प्रसन्नात्मा विमत्सरः ।

षड्भिर्लक्षणवानेतैः समग्रः पुनरेष्यति ॥ १४ ॥

शोकशून्य, ममतारहित, शान्त, प्रसन्नचित्त, मात्सर्यहीन और संतोषी –इन छः लक्षणोंसे युक्त मनुष्य पूर्णतः ज्ञानसे तृप्त हो मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥

षड्भिः सत्त्वगुणोपेतैः प्राज्ञैरधिगतं त्रिभिः ।

ये विदुः प्रेत्य चात्मानमिहस्थं तं गुणं विदुः ॥ १५ ॥

जो देहाभिमानसे मुक्त होकर सत्त्वप्रधान सत्य, दम, दान, तप, त्याग और शम – इन छः गुणों तथा श्रवण, मनन, निदिध्यासनरूप त्रिविध साधनोंसे प्राप्त होनेवाले आत्माको इस शरीरके रहते हुए ही जान लेते हैं, वे परम शान्तिरूप गुणको प्राप्त होते हैं ॥ १५ ॥

अकृत्रिममसंहार्यं प्राकृतं निरुपस्कृतम् ।

अध्यात्मं सुकृतं प्राप्तः सुखमव्ययमश्नुते ॥ १६ ॥

जो उत्पत्ति और विनाशसे रहित, स्वभावसिद्ध, संस्कारशून्य तथा शरीरके भीतर स्थित सुकृत नामसे प्रसिद्ध ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, वह अक्षय सुखका भागी होता है ॥ १६ ॥

निष्प्रचारं मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वशः ।

यामयं लभते तुष्टिं सा न शक्याऽऽत्मनोऽन्यथा ॥ १७ ॥

अपने मनको इधर-उधर जानेसे रोककर आत्मामें सम्पूर्णरूपसे स्थापित कर लेनेपर पुरुषको जिस संतोष और सुखकी प्राप्ति होती है, उसका दूसरे किसी उपायसे प्राप्त होना असम्भव है ॥ १७ ॥

येन तृप्यत्यभुञ्जानो येन तृप्यत्यवित्तवान् ।

येनास्नेहो बलं धत्ते यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १८ ॥

जिससे बिना भोजनके भी मनुष्य तृप्त हो जाता है, जिसके होनेसे निर्धनको भी पूर्ण संतोष रहता है तथा जिसका आश्रय मिलनेसे घृत आदि स्निग्ध पदार्थका सेवन किये बिना भी मनुष्य अपनेमें अनन्त बलका अनुभव करता है, उस ब्रह्मको जो जानता है, वही वेदोंका तत्त्वज्ञ है ॥ १८ ॥

संगुप्तान्यात्मनो द्वाराण्यपिधाय विचिन्तयन् ।

यो ह्यास्ते ब्राह्मणः शिष्टः स आत्मरतिरुच्यते ॥ १ ९ ॥

जो अपनी इन्द्रियोंके सुरक्षित द्वारोंको सब ओरसे बंद करके नित्य ब्रह्मका चिन्तन करता रहता है, वही श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माराम कहलाता है ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1638

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समाहितं परे तत्त्वे क्षीणकाममवस्थितम् ।

सर्वतः सुखमन्वेति वपुश्चान्द्रमसं यथा ॥ २० ॥

जो अपनी कामनाओंको नष्ट करके परम तत्त्वरूप परमात्मामें एकाग्रचित्त होकर स्थित है, उसका सुख शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति सब ओरसे बढ़ता रहता है ॥ २० ॥

अविशेषाणि भूतानि गुणांश्च जहतो मुनेः ।

सुखेनापोह्यते दुःखं भास्करेण तमो यथा ॥ २१ ॥

जो सामान्यतः सम्पूर्ण भूतों और भौतिक गुणोंका त्याग कर देता है, उस मुनिका दुःख उसी प्रकार सुखपूर्वक अनायास नष्ट हो जाता है, जैसे सूर्योदयसे अन्धकार ॥

तमतिक्रान्तकर्माणमतिक्रान्तगुणक्षयम् ।

ब्राह्मणं विषयाश्लिष्टं जरामृत्यू न विन्दतः ॥ २२ ॥

गुणोंके ऐश्वर्य तथा कर्मोंका परित्याग करके विषयवासनासे रहित हुए उस ब्रह्मवेत्ता पुरुषको जरा और मृत्यु नहीं प्राप्त होती हैं ॥ २२ ॥

स यदा सर्वतो मुक्तः समः पर्यवतिष्ठते ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च शरीरस्थोऽतिवर्तते ॥ २३ ॥

जब मनुष्य समस्त बन्धनोंसे पूर्णतया मुक्त होकर समतामें स्थित हो जाता है, उस समय इस शरीरके भीतर रहकर भी वह इन्द्रियों और उनके विषयोंकी पहुँचके बाहर हो जाता है ॥ २३ ॥

कारणं परमं प्राप्य अतिक्रान्तस्य कार्यताम् ।

पुनरावर्तनं नास्ति सम्प्राप्तस्य परं पदम् ॥ २४ ॥

इस प्रकार जो परम कारणस्वरूप ब्रह्मको पाकर कार्यमयी प्रकृतिकी सीमाको लाँघ जाता है, वह ज्ञानी परमपदको प्राप्त हो जाता है । उसे पुनः इस संसारमें नहीं लौटना पड़ता है ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौइक्यावनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २५१ ॥

पृष्ठ 1639

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द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शरीरमें पञ्चभूतोंके कार्य और गुणोंकी पहचान व्यासउवाच

द्वन्द्वानि मोक्षजिज्ञासुरर्थधर्मावनुष्ठितः ।

वक्त्रा गुणवता शिष्यः श्राव्यः पूर्वमिदं महत् ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं — बेटा! जो अर्थ और धर्मका अनुष्ठान करके सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंको धैर्यपूर्वक सहता हो और मोक्षकी जिज्ञासा रखता हो, उस श्रद्धालु शिष्यको गुणवान् वक्ता पहले इस महत्त्वपूर्ण अध्यात्म- शास्त्रका श्रवण कराये ॥ १ ॥

आकाशं मारुतो ज्योतिरापः पृथ्वी च पञ्चमी ।

भावाभावौ च कालश्च सर्वभूतेषु पञ्चसु ॥ २ ॥

आकाश, वायु जल, तेज और पाँचवाँ पृथ्वी तथा भाव पदार्थ अर्थात् गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय एवं अभाव और काल ( दिक्, आत्मा और मन ) —ये सब- के-सब समस्त पांचभौतिक शरीरधारी प्राणियोंमें स्थित हैं ॥ २ ॥

अन्तरात्मकमाकाशं तन्मयं श्रोत्रमिन्द्रियम् ।

तस्य शब्दं गुणं विद्यान्मूर्तिशास्त्रविधानवित् ॥ ३ ॥

आकाश अवकाशस्वरूप है और श्रवणेन्द्रिय आकाशमय है । शरीर- शास्त्रके विधानको जाननेवाला मनुष्य शब्दको आकाशका गुण जाने ॥ ३ ॥

चरणं मारुतात्मेति प्राणापानौ च तन्मयौ ।

स्पर्शनं चेन्द्रियं विद्यात् तथा स्पर्शं च तन्मयम् ॥ ४ ॥

चलना- फिरना वायुका धर्म है । प्राण और अपान भी वायुस्वरूप ही हैं ( समान, उदान और व्यानको भी वायुरूप ही मानना चाहिये ) । स्पर्शेन्द्रिय ( त्वचा ) तथा स्पर्श नामक गुणको भी वायुमय ही समझना चाहिये ॥ ४ ॥

तापः पाकः प्रकाशश्च ज्योतिश्चक्षुश्च पञ्चमम् ।

तस्य रूपं गुणं विद्यात् ताम्रगौरासितात्मकम् ॥ ५ ॥

ताप, पाक, प्रकाश और नेत्रेन्द्रिय – ये सब तेज या अग्नितत्त्वके कार्य हैं । श्याम, गौर और ताम्र आदि वर्णवाले रूपको उसका गुण समझना चाहिये ॥ ५ ॥

प्रक्लेदः क्षुद्रता स्नेह इत्यपामुपदिश्यते ।

असृङ्मज्जा च यच्चान्यत् स्निग्धं विद्यात् तदात्मकम् ॥ ६ ॥

क्लेदन ( किसी वस्तुको सड़ा- गला देना ), क्षुद्रता ( सूक्ष्मता ) तथा स्निग्धता — ये जलके धर्म बताये जाते हैं । रक्त, मज्जा तथा अन्य जो कुछ स्निग्ध पदार्थ हैं, उन सबको जलमय समझे ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1640

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रसनं चेन्द्रियं जिह्वा रसश्चापां गुणो मतः ।

संघातः पार्थिवो धातुरस्थिदन्तनखानि च ॥ ७ ॥

रसनेन्द्रिय, जिह्वा और रस- ये सब जलके गुण माने गये हैं । शरीरमें जो संघात या कड़ापन है, वह पृथ्वीका कार्य है, अतः हड्डी, दाँत और नख आदिको पृथ्वीका अंश समझना चाहिये ॥ ७ ||

श्मश्रु रोम च केशाश्च शिरा स्नायु च चर्म च ।

इन्द्रियं घ्राणसंज्ञातं नासिकेत्यभिसंज्ञिता ॥ ८ ॥

गन्धश्चेवेन्द्रियार्थोऽयं विज्ञेयः पृथिवीमयः । इसी प्रकार दाढ़ी - मूँछ, शरीरके रोएँ, केश, नाड़ी, स्नायु और चर्म– इन सबकी उत्पत्ति भी पृथ्वीसे ही हुई है । नासिका नामसे प्रसिद्ध जो घ्राणेन्द्रिय है, वह भी पृथ्वीका ही अंश है । इस गन्धनामक विषयको भी पार्थिव गुण ही जानना चाहिये ॥ ८३ ॥

उत्तरेषु गुणाः सन्ति सर्वसत्त्वेषु चोत्तराः ॥ ९ ॥

उत्तरोत्तर सभी भूतोंमें पूर्ववर्ती भूतोंके गुण विद्यमान हैं, ( जैसे आकाशमें शब्दमात्र गुण है; वायुमें शब्द और स्पर्श दो गुण; तेजमें शब्द, स्पर्श और रूप- तीन गुण; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस — चार गुण तथा पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध – पाँच गुण हैं) ॥ ९ ॥

पञ्चानां भूतसंघानां संततिं मुनयो विदुः ।

मनो नवममेषां तु बुद्धिस्तु दशमी स्मृता ॥ १० ॥

मुनिलोग भावना, अज्ञान और कर्म– इन तीनोंको पाँच महाभूतोंके समुदायकी संतति मानते हैं । इन्हीं तीनोंको अविद्या, काम और कर्म भी कहते हैं । ये सब मिलकर आठ हुए । इनके साथ मनको नवाँ और बुद्धिको दसवाँ तत्त्व माना गया है ॥ १० ॥

एकादशस्त्वनन्तात्मा स सर्वः पर उच्यते ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिर्मनो व्याकरणात्मकम् ।

कर्मानुमानाद् विज्ञेयः स जीवः क्षेत्रसंज्ञकः ॥ ११ ॥

अविनाशी आत्मा ग्यारहवाँ तत्त्व है । उसीको सर्वस्वरूप और श्रेष्ठ बताया जाता है । बुद्धि निश्चयात्मिका होती है और मनका स्वरूप संशय बताया गया है । कर्मोंका ज्ञाता और कर्ता कोई भी जड़तत्त्व नहीं हो सकता, इस अनुमान- ज्ञानसे उस क्षेत्रज्ञ नामक जीवात्माको समझना चाहिये ॥ ११ ॥

एभिः कालात्मकैर्भावैर्यः सर्वैः सर्वमन्वितम् ।

पश्यत्यकलुषं कर्म स मोहं नानुवर्तते ॥ १२ ॥

जो मनुष्य सारे जगत्को इन समस्त कालात्मक भावोंसे सम्पन्न देखता और निष्पाप कर्म करता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता है ॥ १२ ॥