05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 171–180
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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दुष्यन्त्याददतो भृत्या नित्यं दस्युभयादिव ।
दुर्लभं च धनं प्राप्य भृशं दत्त्वानुतप्यते ॥ २२ ॥
‘ अपना वेतन यथासमय पाते हुए भी जब भृत्योंको संतोष नहीं होता, तब वे स्वामीसे अप्रसन्न रहते हैं और वह धनी दुर्लभ धनको पाकर यदि सेवकोंको अधिक देता है तो उसे उतना ही अधिक संताप होता है, जितना चोर- डाकुओंसे भयके कारण हुआ करता है ॥ २२ ॥
अधनः कस्य किं वाच्यो विमुक्तः सर्वशः सुखी ।
देवस्वमुपगृह्यैव धनेन न सुखी भवेत् ॥ २३ ॥
' निर्धनको कौन क्या कह सकता है? वह सब प्रकारके भयसे मुक्त हो सुखी रहता है ।
देवताओंकी सम्पत्ति लेकर भी कोई धनसे सुखी नहीं हो सकता ॥ २३ ॥
अत्र गाथां यज्ञगीतां कीर्तयन्ति पुराविदः ।
त्रयीमुपाश्रितां लोके यज्ञसंस्तरकारिकाम् ॥ २४ ॥
‘ इस विषयमें यज्ञमें ऋत्विजोंद्वारा गायी हुई एक गाथा है जो तीनों वेदोंके आश्रित है, वह गाथा लोकमें यज्ञकी प्रतिष्ठा करनेवाली है । पुरानी बातोंको जाननेवाले लोग उसे ऐसे अवसरोंपर दुहराया करते हैं ॥ २४ ॥
यज्ञाय सृष्टानि धनानि धात्रा यज्ञाय सृष्टः पुरुषो रक्षिता च । तस्मात् सर्वं यज्ञ एवोपयोज्यं धनं न कामाय हितं प्रशस्तम् ॥ २५ ॥
‘ विधाताने यज्ञके लिये ही धनकी सृष्टि की है और यज्ञके लिये उसकी रक्षा करनेके निमित्त पुरुषको उत्पन्न किया है; इसलिये सारे धनका यज्ञ- कार्यमें ही उपयोग करना चाहिये । भोगके लिये धनका उपयोग न तो हितकर है और न उत्तम ही ॥ २५ ॥
एतत् स्वार्थे च कौन्तेय धनं धनवतां वर ।
धाता ददाति मर्त्येभ्यो यज्ञार्थमिति विद्धि तत् ॥ २६ ॥
‘ धनवानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार धनंजय! विधाता मनुष्योंको स्वार्थके लिये भी जो धन देते हैं उसे यज्ञार्थ ही समझो ॥ २६ ॥
तस्माद् बुद्ध्यन्ति पुरुषा न हि तत् कस्यचिद् ध्रुवम् ।
श्रद्दधानस्ततो लोको दद्याच्चैव यजेत च ॥ २७ ॥
‘ इसीलिये बुद्धिमान् पुरुष यह समझते हैं कि धन कभी किसी एकके पास स्थिर होकर नहीं रहता; अतः श्रद्धालु मनुष्यको चाहिये कि वह उस धनका दान करे और उसे यज्ञमें लगावे ॥ २७ ॥
लब्धस्य त्यागमित्याहुर्न भोगं न च संचयम् ।
तस्य किं संचयेनार्थः कार्ये ज्यायसि तिष्ठति ॥ २८ ॥
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' प्राप्त किये हुए धनका दान करना ही उचित बताया गया है । उसे भोगमें लगाना या संग्रह करके रखना ठीक नहीं है । जिसके सामने बहुत बड़ा कार्य यज्ञ आदि मौजूद है, उसे धनको संग्रह करके रखनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ २८ ॥
ये स्वधर्मादपेतेभ्यः प्रयच्छन्त्यल्पबुद्धयः ।
शतं वर्षाणि ते प्रेत्य पुरीषं भुञ्जते जनाः ॥ २ ९ ॥
' जो मन्दबुद्धि मानव अपने धर्मसे गिरे हुए मनुष्योंको धन देते हैं, वे मरनेके बाद सौ वर्षोंतक विष्ठा भोजन करते हैं ॥ २ ९ ॥
अनर्हते यद् ददाति न ददाति यदर्हते ।
अर्हानर्हापरिज्ञानाद् दानधर्मोऽपि दुष्करः ॥ ३० ॥
' लोग अधिकारीको धन नहीं देते और अनधिकारीको दे डालते हैं, योग्य - अयोग्य पात्रका ज्ञान न होनेसे दानधर्मका सम्पादन भी बहुत कठिन है ॥ ३० ॥
लब्धानामपि वित्तानां बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ ।
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पाये चाप्रतिपादनम् ॥ ३१ ॥
‘ प्राप्त हुए धनका उपयोग करनेमें दो प्रकारकी भूलें हुआ करती हैं, जिन्हें ध्यानमें रखना चाहिये । पहली भूल है अपात्रको धन देना और दूसरी है सुपात्रको धन न देना ' ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका वाक्यविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
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सप्तविंशोऽध्यायः युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना युधिष्ठिर उवाच
अभिमन्यौ हते बाले द्रौपद्यास्तनयेषु च ।
धृष्टद्युम्ने विराटे च द्रुपदे च महीपतौ ॥ १ ॥
वृषसेने च धर्मज्ञे धृष्टकेतौ तु पार्थिवे ।
तथान्येषु नरेन्द्रेषु नानादेश्येषु संयुगे ॥ २ ॥
न च मुञ्चति मां शोको ज्ञातिघातिनमातुरम् ।
राज्यकामुकमत्युग्रं स्ववंशोच्छेदकारिणम् ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने व्यासजीसे कहा - मुनिश्रेष्ठ! इस युद्धमें बालक अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्न, विराट, राजा द्रुपद, धर्मज्ञ वृषसेन, चेदिराज धृष्टकेतु तथा नाना देशोंके निवासी अन्यान्य नरेश भी वीरगतिको प्राप्त हुए हैं । मैं जाति- भाइयोंका घातक, राज्यका लोभी, अत्यन्त क्रूर और अपने वंशका विनाश करनेवाला निकला, यही सब सोचकर मुझे शोक नहीं छोड़ रहा है और मैं अत्यन्त आतुर हो रहा हूँ ॥ १–३ ॥
यस्यांके क्रीडमानेन मया वै परिवर्तितम् ।
स मया राज्यलुब्धेन गांगेयो युधि पातितः ॥ ४ ॥
जिनकी गोदीमें खेलता हुआ मैं लोटपोट हो जाता था, उन्हीं पितामह गंगानन्दन भीष्मजीको मैंने राज्यके लोभसे मरवा डाला ॥ ४ ॥
यदा ह्येनं विघूर्णन्तमपश्यं पार्थसायकैः ।
कम्पमानं यथा वज्रः प्रेक्ष्यमाणं शिखण्डिना ॥ ५ ॥
जीर्णसिंहमिव प्रांशुं नरसिंहं पितामहम् ।
कीर्यमाणं शरैर्दृष्ट्वा भृशं मे व्यथितं मनः ॥ ६ ॥
जब मैंने देखा कि अर्जुनके वज्रोपम बाणोंसे आहत हो बूढ़े सिंहके समान मेरे उन्नतकाय पुरुषसिंह पितामह कम्पित हो रहे हैं और उन्हें चक्कर- सा आने लगा है, शिखण्डी उनकी ओर देख रहा है और उनका सारा शरीर बाणोंसे खचाखच भर गया है तो यह सब देखकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ५-६ ॥
प्राङ्मुखं सीदमानं च रथे पररथारुजम् ।
घूर्णमानं यथा शैलं तदा मे कश्मलोऽभवत् ॥ ७ ॥
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जो शत्रुदलके रथियोंको पीड़ा देनेमें समर्थ थे, वे पूर्वकी ओर मुँह करके चुपचाप बैठे हुए बाणोंका आघात सह रहे थे और जैसे पर्वत हिल रहा हो, उसी प्रकार झूम रहे थे । उस समय उनकी यह अवस्था देखकर मुझे मूर्छा - सी आ गयी थी ॥ ७ ॥
यः स बाणधनुष्पाणिर्योधयामास भार्गवम् ।
बहून्यहानि कौरव्यः कुरुक्षेत्रे महामृधे ॥ ८ ॥
समेतं पार्थिवं क्षत्रं वाराणस्यां नदीसुतः ।
कन्यार्थमाह्वयद् वीरो रथेनैकेन संयुगे ॥ ९ ॥
येन चोग्रायुधो राजा चक्रवर्ती दुरासदः ।
दग्धश्चास्त्रप्रतापेन स मया युधि घातितः ॥ १० ॥
जिन कुरुकुलशिरोमणि वीरने कुरुक्षेत्रमें महायुद्ध ठानकर हाथमें धनुष-बाण लिये बहुत दिनोंतक परशुरामजीके साथ युद्ध किया था, जिन वीर गंगा- नन्दन भीष्मने वाराणसीपुरीमें काशिराजकी कन्याओंके लिये युद्धका अवसर उपस्थित होनेपर एकमात्र रथके द्वारा वहाँ एकत्र हुए समस्त क्षत्रिय नरेशोंको ललकारा था तथा जिन्होंने दुर्जय चक्रवर्ती राजा उग्रायुधको अपने अस्त्रोंके प्रतापसे दग्ध कर दिया था, उन्हींको मैंने युद्धमें मरवा डाला ॥ ८–१० ॥
स्वयं मृत्युं रक्षमाणः पाञ्चाल्यं यः शिखण्डिनम् ।
न बाणैः पातयामास सोऽर्जुनेन निपातितः ॥ ११ ॥
जिन्होंने अपने लिये मृत्यु बनकर आये हुए पाञ्चाल राजकुमार शिखण्डीकी स्वयं ही रक्षा की और उसे बाणोंसे धराशायी नहीं किया, उन्हीं पितामहको अर्जुनने मार गिराया ॥ ११ ॥
यदैनं पतितं भूमावपश्यं रुधिरोक्षितम् ।
तदैवाविशदत्युग्रो ज्वरो मां मुनिसत्तम ॥ १२ ॥
मुनिश्रेष्ठ! जब मैंने पितामहको खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा देखा, उसी समय मुझपर अत्यन्त भयंकर शोक - ज्वरका आवेश हो गया ॥ १२ ॥
येन संवर्धिता बाला येन स्म परिरक्षिताः ।
स मया राज्यलुब्धेन पापेन गुरुघातिना ॥ १३ ॥
अल्पकालस्य राज्यस्य कृते मूढेन घातितः । जिन्होंने हमें बचपनसे पाल- पोसकर बड़ा किया और सब प्रकारसे हमारी रक्षा की, उन्हींको मुझ पापी, राज्य- लोभी, गुरुघाती एवं मूर्खने थोड़े समयतक रहनेवाले राज्यके लिये मरवा डाला ॥ १३३ ॥
आचार्यश्च महेष्वासः सर्वपार्थिवपूजितः ॥ १४ ॥
अभिगम्य रणे मिथ्या पापेनोक्तः सुतं प्रति ।
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सम्पूर्ण राजाओंसे पूजित, महाधनुर्धर आचार्यके पास जाकर मुझ पापीने उनके पुत्रके सम्बन्धमें झूठी बात कही ॥ १४३ ॥
तन्मे दहति गात्राणि यन्मां गुरुरभाषत ॥ १५ ॥
सत्यमाख्याहि राजंस्त्वं यदि जीवति मे सुतः ।
सत्यमामर्षयन् विप्रो मयि तत् परिपृष्टवान् ॥ १६ ॥
मुझसे पूछा था—–'' राजन्!,? ' उस समय गुरुने सच बताओ क्या मेरा पुत्र जीवित है उन ब्राह्मणने सत्यका निर्णय करनेके लिये ही मुझसे यह बात पूछी थी । उनकी वह बात जब याद आती है तो मेरा सारा शरीर शोकाग्निसे दग्ध होने लगता है ॥ १५-१६ ॥
कुञ्जरं चान्तरं कृत्वा मिथ्योपचरितं मया ।
सुभृशं राज्यलुब्धेन पापेन गुरुघातिना ॥ १७ ॥
परंतु राज्यके लोभमें अत्यन्त फँसे हुए मुझ पापी गुरु- हत्यारेने मरे हुए हाथीकी आड़ लेकर उनसे झूठ बोल दिया और उनके साथ धोखा किया ॥ १७ ॥
सत्यकञ्चुकमुन्मुच्य मया स गुरुराहवे ।
अश्वत्थामा हत इति निरुक्तः कुञ्जरे हते ॥ १८ ॥
मैंने सत्यका चोला उतार फेंका और युद्धमें अश्वत्थामा नामक हाथीके मारे जानेपर गुरुदेवसे कह दिया कि ' अश्वत्थामा मारा गया । ' ( इससे उन्हें अपने पुत्रके मारे जानेका विश्वास हो गया ) ॥ १८ ॥
काँल्लोकांस्तु गमिष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
अघातयं च यत् कर्णं समरेष्वपलायिनम् ॥ १ ९ ॥
ज्येष्ठभ्रातरमत्युग्रं को मत्तः पापकृत्तमः । यह अत्यन्त दुष्कर पापकर्म करके मैं किन लोकोंमें जाऊँगा? युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले अत्यन्त उग्र पराक्रमी अपने बड़े भाई कर्णको भी मैंने मरवा दिया- मुझसे बढ़कर महान् पापाचारी दूसरा कौन होगा? ॥ १ ९ ३ ॥ अभिमन्युं च यद् बालं जातं सिंहमिवाद्रिषु ॥ २० ॥
प्रावेशयमहं लुब्धो वाहिनीं द्रोणपालिताम् ।
तदाप्रभृति बीभत्सुं न शक्नोमि निरीक्षितुम् ॥ २१ ॥
कृष्णं च पुण्डरीकाक्षं किल्बिषी भ्रूणहा यथा । मैंने राज्यके लोभमें पड़कर जब पर्वतोंपर उत्पन्न हुए सिंहके समान पराक्रमी अभिमन्युको द्रोणाचार्यद्वारा सुरक्षित कौरवसेनामें झोंक दिया, तभीसे भ्रूण -हत्या करनेवाले पापीके समान मैं अर्जुन तथा कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर आँख उठाकर देख नहीं पाता हूँ ॥ द्रौपदीं चापि दुःखार्तां पञ्चपुत्रैर्विनाकृताम् ॥ २२ ॥
शोचामि पृथिवीं हीनां पञ्चभिः पर्वतैरिव ।
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जैसे पृथ्वी पाँच पर्वतोंसे हीन हो जाय, उसी प्रकार अपने पाँचों पुत्रोंसे हीन होकर दुःखसे आतुर हुई द्रौपदीके लिये भी मुझे निरन्तर शोक बना रहता है ॥ सोऽहमागस्करः पापः पृथिवीनाशकारकः ॥ २३ ॥
आसीन एवमेवेदं शोषयिष्ये कलेवरम् । अतः मैं पापी, अपराधी तथा सम्पूर्ण भूमण्डलका विनाश करनेवाला हूँ; इसलिये यहीं इसी रूपमें बैठा हुआ अपने इस शरीरको सुखा डालूँगा ॥ २३३ ॥
प्रायोपविष्टं जानीध्वमथ मां गुरुघातिनम् ॥ २४ ॥
जातिष्वन्यास्वपि यथा न भवेयं कुलान्तकृत् । आपलोग मुझ गुरुघातीको आमरण अनशनके लिये बैठा हुआ समझें, जिससे दूसरे जन्मोंमें मैं फिर अपने कुलका विनाश करनेवाला न होऊँ ॥ २४३ ॥
न भोक्ष्ये न च पानीयमुपभोक्ष्ये कथञ्चन ॥ २५ ॥
शोषयिष्ये प्रियान् प्राणानिहस्थोऽहं तपोधनाः । तपोधनो! अब मैं किसी तरह न तो अन्न खाऊँगा और न पानी ही पीऊँगा । यहीं रहकर अपने प्यारे प्राणोंको सुखा दूँगा ॥ २५३ ॥
यथेष्टं गम्यतां काममनुजाने प्रसाद्य वः ॥ २६ ॥
सर्वे मामनुजानीत त्यक्ष्यामीदं कलेवरम् । मैं आपलोगोंको प्रसन्न करके अपनी ओरसे चले जानेकी अनुमति देता हूँ । जिसकी जहाँ इच्छा हो वहाँ अपनी रुचिके अनुसार चला जाय। आप सब लोग मुझे आज्ञा दें कि मैं इस शरीरको अनशन करके त्याग दूँ ॥ वैशम्पायन उवाच तमेवंवादिनं पार्थं बन्धुशोकेन विह्वलम् ॥ २७ ॥
मैवमित्यब्रवीद् व्यासो निगृह्य मुनिसत्तमः । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! अपने बन्धु- जनोंके शोकसे विह्वल होकर युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख मुनिवर व्यासजीने उन्हें रोककर कहा - ' नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ' ॥ २७३ ॥
व्यास उवाच अतिवेलं महाराज न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ २८ ॥
पुनरुक्तं तु वक्ष्यामि दिष्टमेतदिति प्रभो । व्यासजी बोले – महाराज! तुम बहुत शोक न करो । प्रभो! मैं पहलेकी कही हुई बात
ही फिर दुहरा रहा हूँ। यह सब प्रारब्धका ही खेल है ॥ २८३ ॥
संयोगा विप्रयोगान्ता जातानां प्राणिनां ध्रुवम् ॥ २ ९ ॥
बुद्बुदा इव तोयेषु भवन्ति न भवन्ति च ।
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जैसे पानीमें बुलबुले होते और मिट जाते हैं, उसी प्रकार संसारमें उत्पन्न हुए प्राणियोंके जो आपसमें संयोग होते हैं, उनका अन्त निश्चय ही वियोगमें होता है ॥ सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ॥ ३० ॥
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् । सम्पूर्ण संग्रहोंका अन्त विनाश है, सारी उन्नतियोंका अन्त पतन है, संयोगोंका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है ॥ ३० ॥
सुखं दुःखान्तमालस्यं दाक्ष्यं दुःखं सुखोदयम् ।
भूतिः श्रीर्हीर्धृतिः कीर्तिर्दक्षे वसति नालसे ॥ ३१ ॥
आलस्य सुखरूप प्रतीत होता है, परंतु उसका अन्त दुःख है तथा कार्यदक्षता दुःखरूप प्रतीत होती है, परंतु उससे सुखका उदय होता है । इसके सिवा ऐश्वर्य, लक्ष्मी, लज्जा, धृति और कीर्ति — ये कार्यदक्ष पुरुषमें ही निवास करती हैं, आलसीमें नहीं ॥ ३१ ॥
नालं सुखाय सुहृदो नालं दुःखाय शत्रवः ।
न च प्रजालमर्थेभ्यो न सुखेभ्योऽप्यलं धनम् ॥ ३२ ॥
न तो सुहृद् सुख देनेमें समर्थ हैं न शत्रु दुख देनेमें । इसी प्रकार न तो प्रजा धन दे सकती है और न धन सुख दे सकता है ॥ ३२ ॥
यथा सृष्टोऽसि कौन्तेय धात्रा कर्मसु तत् कुरु ।
अत एव हि सिद्धिस्ते नेशस्त्वं कर्मणां नृप ॥ ३३ ॥
कुन्तीनन्दन! नरेश्वर! विधाताने जैसे कर्मोंके लिये तुम्हारी सृष्टि की है, तुम उन्हींका अनुष्ठान करो । उन्हींसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी । तुम कर्मोंके ( फलके ) स्वामी या नियन्ता नहीं हो ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
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अष्टाविंशोऽध्यायः अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच
ज्ञातिशोकाभितप्तस्य प्राणानभ्युत्सिसृक्षतः ।
ज्येष्ठस्य पाण्डुपुत्रस्य व्यासः शोकमपानुदत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! भाई- बन्धुओं के शोकसे संतप्त हो अपने प्राणोंको त्याग देनेकी इच्छावाले ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके शोकको महर्षि व्यासने इस प्रकार दूर किया ॥ १ ॥
व्यास उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अश्मगीतं नरव्याघ्र तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
व्यासजी बोले – पुरुषसिंह युधिष्ठिर! इस प्रसंगमें जानकार लोग अश्मा ब्राह्मणके गीतसम्बन्धी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, इसे सुनो ॥ २ ॥
अश्मानं ब्राह्मणं प्राज्ञं वैदेहो जनको नृपः ।
संशयं परिपप्रच्छ दुःखशोकसमन्वितः ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, दुःख- शोक में डूबे हुए विदेहराज जनकने ज्ञानी ब्राह्मण अश्मासे अपने मनका संदेह इस प्रकार पूछा ॥ ३ ॥
जनक उवाच
आगमे यदि वापाये ज्ञातीनां द्रविणस्य च ।
नरेण प्रतिपत्तव्यं कल्याणं कथमिच्छता ॥ ४ ॥
जनक बोले — ब्रह्मन्! कुटुम्बीजन और धनकी उत्पत्ति या विनाश होनेपर कल्याण चाहनेवाले पुरुषको कैसा निश्चय करना चाहिये? ॥ ४ ॥
अश्मोवाच
उत्पन्नमिममात्मानं नरस्यानन्तरं ततः ।
तानि तान्यनुवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ ५ ॥
अश्माने कहा — राजन्! मनुष्यका यह शरीर जब जन्म ग्रहण करता है, तब उसके साथ ही सुख और दुःख भी उसके पीछे लग जाते हैं ॥ ५ ॥
तेषामन्यतरापत्तौ यद् यदेवोपपद्यते ।
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तदस्य चेतनामाशु हरत्यभ्रमिवानिलः ॥ ६ ॥
इन दोनोंमेंसे एक-न-एककी प्राप्ति तो होती ही है; अतः जो भी सुख या दुःख उपस्थित होता है, वही मनुष्यके ज्ञानको उसी प्रकार हर लेता है, जैसे हवा बादलको उड़ा ले जाती है ॥ ६ ॥
अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः ।
इत्येभिर्हेतुभिस्तस्य त्रिभिश्चित्तं प्रसिच्यते ॥ ७ ॥
इसीसे ' मैं कुलीन हूँ, सिद्ध हूँ और कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ ' ये अहंकारकी तीन धाराएँ मनुष्यके चित्तको सींचने लगती हैं ॥ ७ ॥
सम्प्रसक्तमना भोगान् विसृज्य पितृसंचितान् ।
परिक्षीणः परस्वानामादानं साधु मन्यते ॥ ८ ॥
फिर वह मनुष्य भोगोंमें आसक्तचित्त होकर क्रमशः बाप- दादोंकी रखी हुई कमाईको उड़ाकर कंगाल हो जाता है और दूसरोंके धनको हड़प लेना अच्छा मानने लगता है ॥ ८ ॥
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम् ।
प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभिः ॥ ९ ॥
जैसे व्याधे अपने बाणोंद्वारा मृगोंको आगे बढ़नेसे रोकते हैं, उसी प्रकार मर्यादा लाँघकर अनुचितरूपसे दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाले उस मनुष्यको राजालोग दण्डद्वारा वैसे कुमार्गपर चलनेसे रोकते हैं ॥ ९ ॥
ये च विंशतिवर्षा वा त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः ।
परेण ते वर्षशतान्न भविष्यन्ति पार्थिव ॥ १० ॥
राजन्! जो बीस या तीस वर्षकी उम्रवाले मनुष्य चोरी आदि कुकर्मोंमें लग जाते हैं, वे सौ वर्षतक जीवित नहीं रह पाते ॥ १० ॥
तेषां परमदुःखानां बुद्ध्या भैषज्यमाचरेत् ।
सर्वप्राणभृतां वृत्तं प्रेक्षमाणस्ततस्ततः ॥ ११ ॥
जहाँ- तहाँ समस्त प्राणियोंके दुःखद बर्तावसे उनपर जो कुछ बीतता है उसे देखता हुआ मनुष्य दरिद्रतासे प्राप्त होनेवाले उन महान् दुःखोंका निवारण करनेके लिये बुद्धिके द्वारा औषध करे ( अर्थात् विचारद्वारा अपने - आपको कुमार्गपर जानेसे रोके ) ॥ ११ ॥
मानसानां पुनर्योनिर्दुःखानां चित्तविभ्रमः ।
अनिष्टोपनिपातो वा तृतीयं नोपपद्यते ॥ १२ ॥
मनुष्योंको बार- बार मानसिक दुःखोंकी प्राप्तिके कारण दो ही हैं - चित्तका भ्रम और
अनिष्टकी प्राप्ति । तीसरा कोई कारण सम्भव नहीं है ॥ १२ ॥
एवमेतानि दुःखानि तानि तानीह मानवम् ।
विविधान्युपवर्तन्ते तथा संस्पर्शजान्यपि ॥ १३ ॥
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इस प्रकार मनुष्यको इन्हीं दो कारणोंसे ये भिन्न -भिन्न प्रकारके दुःख प्राप्त होते हैं। विषयोंकी आसक्तिसे भी ये दुःख प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥
जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव ।
बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ॥ १४ ॥
बुढ़ापा और मृत्यु — ये दोनों दो भेड़ियोंके समान हैं, जो बलवान् दुर्बल, छोटे और बड़े सभी प्राणियोंको खा जाते हैं ॥ १४ ॥
न कश्चिज्जात्वतिक्रामेज्जरामृत्यू हि मानवः ।
अपि सागरपर्यन्तां विजित्येमां वसुन्धराम् ॥ १५ ॥
कोई भी मनुष्य कभी बुढ़ापे और मौतको लाँघ नहीं सकता । भले ही वह समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीपर विजय पा चुका हो ॥ १५ ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं भूतानां पर्युपस्थितम् ।
प्राप्तव्यमवशैः सर्वं परिहारो न विद्यते ॥ १६ ॥
प्राणियोंके निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है, वह सब उन्हें विवश होकर सहना ही पड़ता है, क्योंकि उसके टालनेका कोई उपाय नहीं है ॥ १६ ॥
पूर्वे वयसि मध्ये वाप्युत्तरे वा नराधिप ।
अवर्जनीयास्तेऽर्था वै कांक्षिता ये ततोऽन्यथा ॥ १७ ॥
नरेश्वर! पूर्वावस्था, मध्यावस्था अथवा उत्तरावस्थामें कभी-न- कभी वे क्लेश अनिवार्यरूपसे प्राप्त होते ही हैं, जिन्हें मनुष्य उनके विपरीतरूपमें चाहता है ( अर्थात् सुख-ही- सुखकी इच्छा करता है; परंतु उसे कष्ट भी प्राप्त होते ही हैं ) ॥ १७ ॥
अप्रियैः सह संयोगो विप्रयोगश्च सुप्रियैः ।
अर्थानर्थौ सुखं दुःखं विधानमनुवर्तते ॥ १८ ॥
अप्रिय वस्तुओंके साथ संयोग, अत्यन्त प्रिय वस्तुओंका वियोग, अर्थ, अनर्थ, सुख और दुःख — इन सबकी प्राप्ति प्रारब्धके विधानके अनुसार होती है ॥ १८ ॥
प्रादुर्भावश्च भूतानां देहत्यागस्तथैव च ।
प्राप्तिर्व्यायामयोगश्च सर्वमेतत् प्रतिष्ठितम् ॥ १ ९ ॥
प्राणियोंकी उत्पत्ति, देहावसान, लाभ और हानि- ये सब प्रारब्धके ही आधारपर स्थित हैं ॥ १ ९ ॥
गन्धवर्णरसस्पर्शा निवर्तन्ते स्वभावतः ।
तथैव सुखदुःखानि विधानमनुवर्तते ॥ २० ॥
जैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध स्वभावतः आते -जाते रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य सुख और दुःखोंको प्रारब्धानुसार पाता रहता है ॥ २० ॥
आसनं शयनं यानमुत्थानं पानभोजनम् ।
नियतं सर्वभूतानां कालेनैव भवत्युत ॥ २१ ॥