श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 161–170
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170
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पञ्चविंशोऽध्यायः सेनजित्के उपदेशयुक्त उद्गारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच
द्वैपायनवचः श्रुत्वा कुपिते च धनंजये ।
व्यासमामन्त्र्य कौन्तेयः प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! व्यासजीकी बात सुनकर और अर्जुनके कुपित हो जानेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने व्यासजीको आमन्त्रित करके उत्तर देना आरम्भ किया ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
न पार्थिवमिदं राज्यं न भोगाश्च पृथग्विधाः ।
प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य शोको मां रुन्धयत्ययम् ॥ २ ॥
युधिष्ठिर बोले — मुने! यह भूतलका राज्य और ये भिन्न - भिन्न प्रकारके भोग आज मेरे
मनको प्रसन्न नहीं कर रहे हैं । यह शोक मुझे चारों ओरसे घेरे हुए है ॥ २ ॥
श्रुत्वा वीरविहीनानामपुत्राणां च योषिताम् ।
परिदेवयमानानां शान्तिं नोपलभे मुने ॥ ३ ॥
महर्षे! पति और पुत्रोंसे हीन हुई युवतियोंका करुण विलाप सुनकर मुझे शान्ति नहीं मिल रही है ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं व्यासो योगविदां वरः ।
युधिष्ठिरं महाप्राज्ञो धर्मज्ञो वेदपारगः ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और वेदोंके पारंगत विद्वान् धर्मज्ञ महाज्ञानी व्यासने उनसे फिर इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
व्यास उवाच न कर्मणा लभ्यते चिन्तया वा नाप्यस्ति दाता पुरुषस्य कश्चित् । पर्याययोगाद् विहितं विधात्रा कालेन सर्वं लभते मनुष्यः ॥ ५ ॥
व्यासजी बोले – राजन्! न तो कोई कर्म करनेसे नष्ट हुई वस्तु मिल सकती है, न चिन्तासे ही । कोई ऐसा दाता भी नहीं है, जो मनुष्यको उसकी विनष्ट वस्तु दे दे । बारी-बारीसे विधाताके विधानानुसार मनुष्य समयपर सब कुछ पा लेता है ॥ ५ ॥
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न बुद्धिशास्त्राध्ययनेन शक्यं प्राप्तुं विशेषं मनुजैरकाले । मूर्खोऽपि चाप्नोति कदाचिदर्थान् कालो हि कार्यं प्रति निर्विशेषः ॥ ६ ॥
बुद्धि अथवा शास्त्राध्ययनसे भी मनुष्य असमयमें किसी विशेष वस्तुको नहीं पा सकता और समय आनेपर कभी - कभी मूर्ख भी अभीष्ट पदार्थोंको प्राप्त कर लेता है; अतः काल ही कार्यकी सिद्धिमें सामान्य कारण है ॥ ६ ॥
नाभूतिकालेषु फलं ददन्ति शिल्पानि मन्त्राश्च तथौषधानि । तान्येव कालेन समाहितानि सिद्ध्यन्ति वर्धन्ति च भूतिकाले ॥ ७ ॥
अवनतिके समय शिल्पकलाएँ, मन्त्र तथा औषध भी कोई फल नहीं देते हैं । वे ही जब उन्नतिके समय उपयोगमें लाये जाते हैं, तब कालकी प्रेरणासे सफल होते और वृद्धिमें सहायक बनते हैं ॥ ७ ॥
कालेन शीघ्राः प्रवहन्ति वाताः कालेन वृष्टिर्जलदानुपैति । कालेन पद्मोत्पलवज्जलं च कालेन पुष्यन्ति वनेषु वृक्षाः ॥ ८ ॥
समयसे ही तेज हवा चलती है, समयसे ही मेघ जल बरसाते हैं, समयसे ही पानीमें कमल तथा उत्पल उत्पन्न हो जाते हैं और समयसे ही वनमें वृक्ष पुष्ट होते हैं ॥ ८ ॥
कालेन कृष्णाश्च सिताश्च रात्र्यः कालेन चन्द्रः परिपूर्णबिम्बः । नाकालतः पुष्पफलं द्रुमाणां नाकालवेगाः सरितो वहन्ति ॥ ९ ॥
समयसे ही अँधेरी और उजेली रातें होती हैं, समयसे ही चन्द्रमाका मण्डल परिपूर्ण होता है, असमयमें वृक्षोंमें फल और फूल भी नहीं लगते हैं और न असमयमें नदियाँ ही वेगसे बहती हैं ॥ ९ ॥
नाकालमत्ताः खगपन्नगाश्च मृगद्विपाः शैलमृगाश्च लोके । नाकालतः स्त्रीषु भवन्ति गर्भा नायान्त्यकाले शिशिरोष्णवर्षाः ॥ १० ॥
लोकमें पक्षी, सर्प, जंगली मृग, हाथी और पहाड़ी मृग भी समय आये बिना मतवाले नहीं होते हैं । असमयमें स्त्रियोंके गर्भ नहीं रहते और बिना समयके सर्दी, गर्मी तथा वर्षा भी
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नहीं होती है ॥ १० ॥
नाकालतो म्रियते जायते वा नाकालतो व्याहरते च बालः । नाकालतो यौवनमभ्युपैति नाकालतो रोहति बीजमुप्तम् ॥ ११ ॥
बालक समय आये बिना न जन्म लेता है, न मरता है और न असमयमें बोलता ही है । बिना समयके जवानी नहीं आती और बिना समयके बोया हुआ बीज भी नहीं उगता है ॥ ११ ॥
नाकालतो भानुरुपैति योगं नाकालतोऽस्तंगिरिमभ्युपैति । नाकालतो वर्धते हीयते च चन्द्रः समुद्रोऽपि महोर्मिमाली ॥ १२ ॥
असमयमें सूर्य उदयाचलसे संयुक्त नहीं होते हैं, समय आये बिना वे अस्ताचलपर भी नहीं जाते हैं, असमयमें न तो चन्द्रमा घटते - बढ़ते हैं और न समुद्रमें ही ऊँची - ऊँची तरंगें उठती हैं ॥ १२ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गीतं राज्ञा सेनजिता दुःखार्तेन युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं । एक समय शोकसे आतुर हुए राजा सेनजित्ने जो उद्गार प्रकट किया था, वही तुम्हें सुना रहा हूँ ॥ १३ ॥
सर्वानेवैष पर्यायो मर्त्यान् स्पृशति दुःसहः ।
कालेन परिपक्वा हि म्रियन्ते सर्वपार्थिवाः ॥ १४ ॥
( राजा सेनजित्ने मन- ही- मन कहा कि ) ' यह दुःसह कालचक्र सभी मनुष्योंपर अपना प्रभाव डालता है । एक दिन सभी भूपाल कालसे परिपक्व होकर मृत्युके अधीन हो जाते हैं ॥ १४ ॥
घ्नन्ति चान्यान् नरा राजंस्तानप्यन्ये तथा नराः ।
संज्ञैषा लौकिकी राजन् न हिनस्ति न हन्यते ॥ १५ ॥
' राजन्! मनुष्य दूसरोंको मारते हैं, फिर उन्हें भी दूसरे लोग मार देते हैं । नरेश्वर! यह मरना- मारना लौकिक संज्ञामात्र है । वास्तवमें न कोई मारता है और न मारा ही जाता है ॥ १५ ॥
हन्तीति मन्यते कश्चिन्न हन्तीत्यपि चापरः ।
स्वभावतस्तु नियतौ भूतानां प्रभवाप्ययौ ॥ १६ ॥
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‘एक मानता है कि आत्मा मारता है । ' दूसरा ऐसा मानता है कि ‘ नहीं मारता है । ’ पाञ्चभौतिक शरीरोंके जन्म और मरण स्वभावतः नियत हैं ॥ १६ ॥
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् दुःखस्यापचितिं चरेत् ॥ १७ ॥
' धनके नष्ट होनेपर अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु होनेपर मनुष्य ' हाय! मुझपर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा' इस प्रकार चिन्ता करते हुए उस दुःखकी निवृत्तिकी चेष्टा करता है ॥ १७ ॥
स किं शोचसि मूढः सन् शोच्यान् किमनुशोचसि ।
पश्य दुःखेषु दुःखानि भयेषु च भयान्यपि ॥ १८ ॥
'तुम मूढ़ बनकर शोक क्यों कर रहे हो? उन मरे हुए शोचनीय व्यक्तियोंका बारंबार स्मरण ही क्यों करते हो? देखो, शोक करनेसे दुःखमें दुःख तथा भयमें भयकी वृद्धि होगी ॥ १८ ॥
आत्मापि चायं न मम सर्वापि पृथिवी मम ।
यथा मम तथान्येषामिति पश्यन् न मुह्यति ॥ १ ९ ॥
‘ यह शरीर भी अपना नहीं है और सारी पृथ्वी भी अपनी नहीं है । यह जिस तरहसे मेरी है, उसी तरह दूसरोंकी भी है । ऐसी दृष्टि रखनेवाला पुरुष कभी मोहमें नहीं फँसता ॥ १ ९ ॥
शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ २० ॥
' शोकके सहस्रों स्थान हैं, हर्षके भी सैकड़ों अवसर हैं । वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही प्रभाव डालते हैं, विद्वान्पर नहीं ॥ २० ॥
एवमेतानि कालेन प्रियद्वेष्याणि भागशः ।
जीवेषु परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ २१ ॥
इस प्रकार ये प्रिय और अप्रिय भाव ही दुःख और सुख बनकर अलग - अलग सभी जीवोंको प्राप्त होते रहते हैं ॥ २१ ॥
दुःखमेवास्ति न सुखं तस्मात् तदुपलभ्यते ।
तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ॥ २२ ॥
‘ संसारमें केवल दुःख ही है, सुख नहीं, अतः दुःख ही उपलब्ध होता है । तृष्णाजनित पीड़ासे दुःख और दुःखकी पीड़ासे सुख होता है अर्थात् दुःखसे आर्त हुए मनुष्यको ही उसके न रहनेपर सुखकी प्रतीति होती है ॥ २२ ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ॥ २३ ॥
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' सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है । कोई भी न तो सदा दुःख पाता है और न निरन्तर सुख ही प्राप्त करता है ॥ २३ ॥
सुखमेव हि दुःखान्तं कदाचिद् दुःखतः सुखम् ।
तस्मादेतद् द्वयं जह्याद् य इच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥ २४ ॥
सुखान्तप्रभवं दुःखं दुःखान्तप्रभवं सुखम् । ‘ कभी दुःखके अन्तमें सुख और कभी सुखके अन्तमें दुःख भी आता है; अतः जो नित्य सुखकी इच्छा रखता हो, वह इन दोनोंका परित्याग कर दे; क्योंकि दुःख सुखके अन्तमें अवश्यम्भावी है, वैसे ही सुख भी दुःखके अन्तमें अवश्यम्भावी है ॥ २४ ॥
यन्निमित्तो भवेच्छोकस्तापो वा भृशदारुणः ॥ २५ ॥
आयासो वापि यन्मूलस्तदेकाङ्गमपि त्यजेत् । ‘ जिसके कारण शोक और बढ़ा हुआ ताप होता हो अथवा जो आयासका भी मूल कारण हो, वह अपने शरीरका एक अंग भी हो तो भी उसको त्याग देना चाहिये ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाप्रियम् ।
प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ २६ ॥
' सुख हो या दुःख, प्रिय हो अथवा अप्रिय, जब जो कुछ प्राप्त हो, उस समय उसे सहर्ष अपनावे । अपने हृदयसे उसके सामने पराजय न स्वीकार करे ( हिम्मत न हारे ) ॥ २६ ॥
ईषदप्यङ्ग दाराणां पुत्राणां वा चराप्रियम् ।
ततो ज्ञास्यसि कः कस्य केन वा कथमेव च ॥ २७ ॥
‘ प्रिय मित्र! स्त्री अथवा पुत्रोंका थोड़ा -सा भी अप्रिय कर दो, फिर स्वयं समझ जाओगे कि कौन किस हेतुसे किस तरह किसके साथ कितना सम्बन्ध रखता है? ॥
ये च मूढतमा लोके ये च बुद्धेः परं गताः ।
त एव सुखमेधन्ते मध्यमः क्लिश्यते जनः ॥ २८ ॥
‘ संसारमें जो अत्यन्त मूर्ख हैं, अथवा जो बुद्धिसे परे पहुँच गये हैं, वे ही सुखी होते हैं; बीचवाले लोग कष्ट ही उठाते हैं ' ॥ २८ ॥
इत्यब्रवीन्महाप्राज्ञो युधिष्ठिर स सेनजित् ।
परावरज्ञो लोकस्य धर्मवित् सुखदुःखवित् ॥ २ ९ ॥
युधिष्ठिर! लोकके भूत और भविष्य तथा सुख एवं दुःखको जाननेवाले धर्मवेत्ता महाज्ञानी सेनजित्ने ऐसा ही कहा है ॥ २ ९ ॥
येन दुःखेन यो दुःखी न स जातु सुखी भवेत् ।
दुःखानां हि क्षयो नास्ति जायते ह्यपरात् परम् ॥ ३० ॥
जिस किसी भी दुःखसे जो दुखी है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःखोंका अन्त नहीं है । एक दुःखसे दूसरा दुःख होता ही रहता है ॥ ३० ॥
सुखं च दुःखं च भवाभवौ च
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लाभालाभौ मरणं जीवितं च । पर्यायतः सर्वमवाप्नुवन्ति तस्माद् धीरो नैव हृष्येन्न शोचेत् ॥ ३१ ॥
सुख-दुःख, उत्पत्ति- विनाश, लाभ-हानि और जीवन- मरण - ये समय- समयपर क्रमसे सबको प्राप्त होते हैं; इसलिये धीर पुरुष इनके लिये हर्ष और शोक न करे ॥ ३१ ॥
दीक्षां राज्ञः संयुगे युद्धमाहु- र्योगं राज्ये दण्डनीत्यां च सम्यक् । वित्तत्यागो दक्षिणानां च यज्ञे सम्यग् दानं पावनानीति विद्यात् ॥ ३२ ॥
राजाके लिये संग्राममें जूझना ही यज्ञकी दीक्षा लेना बताया गया है । राज्यकी रक्षा करते हुए दण्डनीतिमें भलीभाँति प्रतिष्ठित होना ही उसके लिये योगसाधन है तथा यज्ञमें दक्षिणारूपसे धनका त्याग एवं उत्तम रीति से दान ही राजाके लिये त्याग है । ये तीनों कर्म राजाको पवित्र करनेवाले हैं, ऐसा समझे ॥ ३२ ॥
रक्षन् राज्यं बुद्धिपूर्वं नयेन
संत्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा ।
सर्वाल्लोंकान् धर्मदृष्ट्या चरंश्चा- प्यूर्ध्वं देहान्मोदते देवलोके ॥ ३३ ॥
जो राजा अहंकार छोड़कर बुद्धिमानीसे नीतिके अनुसार राज्यकी रक्षा करता है, स्वभावसे ही यज्ञके अनुष्ठानमें लगा रहता है और धर्मकी रक्षाको दृष्टिमें रखकर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है, वह महामनस्वी नरेश देहत्यागके पश्चात् देवलोकमें आनन्द भोगता है ॥ जित्वा संग्रामान् पालयित्वा च राष्ट्रं सोमं पीत्वा वर्धयित्वा प्रजाश्च । युक्त्या दण्डं धारयित्वा प्रजानां युद्धे क्षीणो मोदते देवलोके ॥ ३४ ॥
जो संग्राममें विजय, राष्ट्रका पालन, यज्ञमें सोमरसका पान, प्रजाओंकी उन्नति तथा प्रजावर्गके हितके लिये युक्तिपूर्वक दण्डधारण करते हुए युद्धमें मृत्युको प्राप्त होता है, वह देवलोकमें आनन्दका भागी होता है ॥ ३४ ॥
सम्यग् वेदान् प्राप्य शास्त्राण्यधीत्य सम्यग् राज्यं पालयित्वा च राजा । चातुर्वर्ण्य स्थापयित्वा स्वधर्मे पूतात्मा वै मोदते देवलोके ॥ ३५ ॥
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सम्यक् प्रकारसे वेदोंका ज्ञान, शास्त्रोंका अध्ययन, राज्यका ठीक- ठीक पालन तथा चारों वर्णोंका अपने - अपने धर्ममें स्थापन करके जो अपने मनको पवित्र कर चुका है, वह राजा देवलोकमें सुखी होता है ॥ ३५ ॥
यस्य वृत्तं नमस्यन्ति स्वर्गस्थस्यापि मानवाः ।
पौरजानपदामात्याः स राजा राजसत्तमः ॥ ३६ ॥
स्वर्गलोकमें रहनेपर भी जिसके चरित्रको नगर और जनपदके मनुष्य एवं मन्त्री मस्तक झुकाते हैं, वही राजा समस्त नरपतियोंमें सबसे श्रेष्ठ है ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सेनजिदुपाख्याने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सेनजित्का उपाख्यानविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
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षड्विंशोऽध्यायः युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच
अस्मिन्नेव प्रकरणे धनंजयमुदारधीः ।
अभिनीततरं वाक्यमित्युवाच युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय । इसी प्रसंगमें उदारबुद्धि राजा युधिष्ठिरने अर्जुनसे यह युक्तियुक्त बात कही ॥ १ ॥
यदेतन्मन्यसे पार्थ न ज्यायोऽस्ति धनादिति ।
न स्वर्गो न सुखं नार्थो निर्धनस्येति तन्मृषा ॥ २ ॥
‘पार्थ! तुम जो यह समझते हो कि धनसे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है तथा निर्धनको स्वर्ग, सुख और अर्थकी भी प्राप्ति नहीं हो सकती, यह ठीक नहीं है ॥ २ ॥
स्वाध्याययज्ञसंसिद्धा दृश्यन्ते बहवो जनाः ।
तपोरताश्च मुनयो येषां लोकाः सनातनाः ॥ ३ ॥
'बहुत - से मनुष्य केवल स्वाध्याययज्ञ करके सिद्धिको प्राप्त हुए देखे जाते हैं । तपस्यामें लगे हुए बहुतेरे मुनि ऐसे हो गये हैं, जिन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति हुई है ॥ ३ ॥
ऋषीणां समयं शश्वद् ये रक्षन्ति धनंजय ।
आश्रिताः सर्वधर्मज्ञा देवास्तान् ब्राह्मणान् विदुः ॥ ४ ॥
‘ धनंजय! सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले जो लोग ब्रह्मचर्य आश्रममें स्थित हो ऋषियोंकी स्वाध्याय- परम्पराकी सदैव रक्षा करते हैं, देवता उन्हें ही ब्राह्मण मानते हैं ॥
स्वाध्यायनिष्ठान् हि ऋषीन् ज्ञाननिष्ठांस्तथापरान् ।
बुद्ध्येथाः संततं चापि धर्मनिष्ठान् धनंजय ॥ ५ ॥
'अर्जुन! तुम्हें सदा यह समझना चाहिये कि ऋषियोंमेंसे कुछ लोग वेद - शास्त्रोंके स्वाध्यायमें ही तत्पर रहते हैं, कुछ ज्ञानोपार्जनमें संलग्न होते हैं और कुछ लोग धर्म - पालनमें ही निष्ठा रखते हैं ॥ ५ ॥
ज्ञाननिष्ठेषु कार्याणि प्रतिष्ठाप्यानि पाण्डव ।
वैखानसानां वचनं यथा नो विदितं प्रभो ॥ ६ ॥
‘ पाण्डुनन्दन! प्रभो! वानप्रस्थोंके वचनको जैसा हमने समझा है, उसके अनुसार ज्ञाननिष्ठ महात्माओंको ही राज्यके सारे कार्य सौंपने चाहिये ॥ ६ ॥
अजाश्च पृश्नयश्चैव सिकताश्चैव भारत ।
अरुणाः केतवश्चैव स्वाध्यायेन दिवं गताः ॥ ७ ॥
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‘ भारत! अज, पृश्नि, सिकत, अरुण और केतु नामवाले ऋषिगणोंने तो स्वाध्यायके द्वारा ही स्वर्ग प्राप्त कर लिया था ॥ ७ ॥
अवाप्यैतानि कर्माणि वेदोक्तानि धनंजय ।
दानमध्ययनं यज्ञो निग्रहश्चैव दुर्ग्रहः ॥ ८ ॥
दक्षिणेन च पन्थानमर्यम्णो ये दिवं गताः ।
एतान् क्रियावतां लोकानुक्तवान् पूर्वमप्यहम् ॥ ९ ॥
‘ धनंजय! दान, अध्ययन, यज्ञ और निग्रह - ये सभी कर्म बहुत कठिन हैं । इन वेदोक्त कर्मोंका ( सकामभावसे ) आश्रय लेकर लोग सूर्यके दक्षिण मार्गसे स्वर्गमें जाते हैं । इन कर्ममार्गी पुरुषोंके लोकोंकी चर्चा मैं पहले भी कर चुका हूँ ॥ ८ - ९ ॥
उत्तरेण तु पन्थानं नियमाद् यं प्रपश्यसि ।
एते यागवतां लोका भान्ति पार्थ सनातनाः ॥ १० ॥
‘ कुन्तीनन्दन! सूर्यके उत्तरमें स्थित जो मार्ग है, जिसे तुम नियमके प्रभावसे देख रहे हो, वहाँ जो ये सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, वे निष्काम यज्ञ करनेवालोंको प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
तत्रोत्तरां गतिं पार्थ प्रशंसन्ति पुराविदः ।
संतोषो वै स्वर्गतमः संतोषः परमं सुखम् ॥ ११ ॥
‘ पार्थ! प्राचीन इतिहासको जाननेवाले लोग इन दोनों मार्गोंमेंसे उत्तर मार्गकी प्रशंसा करते हैं । वास्तवमें संतोष ही सबसे बढ़कर स्वर्ग है और संतोष ही सबसे बड़ा सुख है ॥ ११ ॥
तुष्टेर्न किञ्चित् परमं सा सम्यक् प्रतितिष्ठति ।
विनीतक्रोधहर्षस्य सततं सिद्धिरुत्तमा ॥ १२ ॥
‘ संतोषसे बढ़कर कुछ नहीं है । जिसने क्रोध और हर्षको जीत लिया है, उसीके हृदयमें उस परम वैराग्यरूप संतोषकी सम्यक् प्रतिष्ठा होती है और उसे ही सदा उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १२ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा गीता ययातिना ।
याभिः प्रत्याहरेत् कामान् कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ॥ १३ ॥
इस प्रसंगमें लोग राजा ययातिकी गायी हुई इन गाथाओंको उदाहरणके तौरपर कहा करते हैं । जिनके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको उसी प्रकार समेट लेता है, जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे सिकोड़ लिया करता है ॥ १३ ॥
यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति ।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ १४ ॥
राजा ययातिने कहा था- ' जब यह पुरुष किसीसे नहीं डरता, जब इससे भी किसीको भय नहीं रहता तथा जब यह न तो किसीको चाहता है और न उससे द्वेष ही रखता है, तब
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ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥
यदा न भावं कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् ।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ १५ ॥
“ जब यह मन, वाणी और क्रियाद्वारा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति पाप-बुद्धिका परित्याग कर देता है, तब परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥
विनीतमानमोहश्च बहुसङ्गविवर्जितः ।
तदाऽऽत्मज्योतिषः साधोर्निर्वाणमुपपद्यते ॥ १६ ॥
“जिसके मान और मोह दूर हो गये हैं, जो नाना प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित है तथा जिसे आत्माका ज्ञान प्राप्त हो गया है, उस साधु पुरुषको मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है ' ॥ १६ ॥
इदं तु शृणु मे पार्थ ब्रुवनः संयतेन्द्रियः ।
धर्ममन्ये वृत्तमन्ये धनमीहन्ति चापरे ॥ १७ ॥
' कुन्तीनन्दन! मैं जो बात कह रहा हूँ, उसे अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको संयममें रखकर सुनो! कुछ लोग धर्मकी, कोई सदाचारकी और दूसरे कितने ही मनुष्य धनकी प्राप्तिके लिये सचेष्ट रहते हैं ॥ १७ ॥
धनहेतोर्य ईहेत तस्यानीहा गरीयसी ।
भूयान् दोषो हि वित्तस्य यश्च धर्मस्तदाश्रयः ॥ १८ ॥
' जो धनके लिये चेष्टा करता है, उसका निश्चेष्ट होकर बैठ रहना ही ठीक है, क्योंकि धन और उसके आश्रित धर्ममें महान् दोष दिखायी देता है ॥ १८ ॥
प्रत्यक्षमनुपश्यामि त्वमपि द्रष्टुमर्हसि ।
वर्जनं वर्जनीयानामीहमानेन दुष्करम् ॥ १ ९ ॥
' मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ और तुम भी देख सकते हो, जो लोग धनोपार्जनके प्रयत्नमें लगे हुए हैं, उनके लिये त्याज्य कर्मोंको छोड़ना अत्यन्त कठिन हो रहा है ॥
ये वित्तमभिपद्यन्ते सम्यक्त्वं तेषु दुर्लभम् ।
द्रुह्यतः प्रैति तत् प्राहुः प्रतिकूलं यथातथम् ॥ २० ॥
‘जो धनके पीछे पड़े हुए हैं, उनमें साधुता दुर्लभ है; क्योंकि जो लोग दूसरोंसे द्रोह करते हैं, उन्हींको धन प्राप्त होता है, ऐसा कहा जाता है तथा वह मिला हुआ धन प्रकारान्तरसे प्रतिकूल ही होता है ॥ २० ॥
यस्तु सम्भिन्नवृत्तः स्याद् वीतशोकभयो नरः ।
अल्पेन तृषितो द्रुह्यन् भ्रूणहत्यां न बुध्यते ॥ २१ ॥
' शोक और भयसे रहित होनेपर भी जो मनुष्य सदाचारसे भ्रष्ट है, उसे यदि धनकी थोड़ी- सी भी तृष्णा हो तो वह दूसरोंसे ऐसा द्रोह करता है कि भ्रूण हत्या - जैसे पापका भी ध्यान नहीं रखता ॥ २१ ॥