श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 181–190
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190
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सभी प्राणियोंके लिये बैठना, सोना, चलना - फिरना, उठना और खाना - पीना - ये सभी कार्य समयके अनुसार ही नियत रूपसे होते रहते हैं ॥ २१ ॥
वैद्याश्चाप्यातुराः सन्ति बलवन्तश्च दुर्बलाः ।
श्रीमन्तश्चापरे षण्ढा विचित्रः कालपर्ययः ॥ २२ ॥
कभी - कभी वैद्य भी रोगी, बलवान् भी दुर्बल और श्रीमान् भी असमर्थ हो जाते हैं, यह समयका उलट - फेर बड़ा अद्भुत है ॥ २२ ॥
कुले जन्म तथा वीर्यमारोग्यं रूपमेव च ।
सौभाग्यमुपभोगश्च भवितव्येन लभ्यते ॥ २३ ॥
उत्तम कुलमें जन्म, बल - पराक्रम, आरोग्य, रूप, सौभाग्य और उपभोग - सामग्री — ये सब होनहारके अनुसार ही प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥
सन्ति पुत्राः सुबहवो दरिद्राणामनिच्छताम् ।
नास्ति पुत्रः समृद्धानां विचित्रं विधिचेष्टितम् ॥ २४ ॥
जो दरिद्र हैं और संतानकी इच्छा नहीं रखते हैं, उनके तो बहुत- से पुत्र हो जाते हैं और जो धनवान् हैं, उनमेंसे किसी -किसीको एक पुत्र भी नहीं प्राप्त होता । विधाताकी चेष्टा बड़ी विचित्र है ॥ २४ ॥
व्याधिरग्निर्जलं शस्त्रं बुभुक्षाश्चापदो विषम् ।
ज्वरश्च मरणं जन्तोरुच्चाच्च पतनं तथा ॥ २५ ॥
निर्माणे यस्य यद् दिष्टं तेन गच्छति सेतुना । रोग, अग्नि, जल, शस्त्र, भूख, प्यास, विपत्ति, विष, ज्वर और ऊँचे स्थानसे गिरना — ये सब जीवकी मृत्युके निमित्त हैं । जन्मके समय जिसके लिये प्रारब्धवश जो निमित्त नियत कर दिया गया है, वही उसका सेतु है, अतः उसीके द्वारा वह जाता है अर्थात् परलोकमें गमन करता है ॥ २५३ ॥
दृश्यते नाप्यतिक्रामन्न निष्क्रान्तोऽथवा पुनः ॥ २६ ॥
दृश्यते चाप्यतिक्रामन्ननिग्राह्योऽथवा पुनः । कोई इस सेतुका उल्लंघन करता दिखायी नहीं देता अथवा पहले भी किसीने इसका उल्लंघन किया हो, ऐसा देखनेमें नहीं आया । कोई- कोई पुरुष जो ( तपस्या आदि प्रबल पुरुषार्थके द्वारा) दैवके नियन्त्रणमें रहनेयोग्य नहीं है, वह पूर्वोक्त सेतुका उल्लंघन करता भी दिखायी देता है ॥ २६३ ॥
दृश्यते हि युवैवेह विनश्यन् वसुमान् नरः ।
दरिद्रश्च परिक्लिष्टः शतवर्षो जरान्वितः ॥ २७ ॥
इस जगत्में धनवान् मनुष्य भी जवानीमें ही नष्ट होता दिखायी देता है और क्लेशमें पड़ा हुआ दरिद्र भी सौ वर्षोंतक जीवित रहकर अत्यन्त वृद्धावस्थामें मरता देखा जाता है ॥ २७ ॥
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अकिञ्चनाश्च दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविनः ।
समृद्धे च कुले जाता विनश्यन्ति पतंगवत् ॥ २८ ॥
जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे दरिद्र भी दीर्घजीवी देखे जाते हैं और धनवान् कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य भी कीट- पतंगोंके समान नष्ट होते रहते हैं ॥
प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते ।
काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ २ ९ ॥
जगत्में प्रायः धनवानोंको खाने और पचानेकी शक्ति ही नहीं रहती है और दरिद्रोंके पेटमें काठ भी पच जाते हैं ॥ २ ९ ॥
अहमेतत् करोमीति मन्यते कालनोदितः ।
यद् यदिष्टमसंतोषाद् दुरात्मा पापमाचरेत् ॥ ३० ॥
दुरात्मा मनुष्य कालसे प्रेरित होकर यह अभिमान करने लगता है कि मैं यह करूँगा । तत्पश्चात् असंतोषवश उसे जो- जो अभीष्ट होता है, उस पापपूर्ण कृत्यको भी वह करने लगता है ॥ ३० ॥
मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं प्रसंगा निन्दिता बुधैः ।
दृश्यन्ते पुरुषाश्चात्र सम्प्रयुक्ता बहुश्रुताः ॥ ३१ ॥
विद्वान् पुरुष शिकार करने, जूआ खेलने, स्त्रियोंके संसर्गमें रहने और मदिरा पीनेके प्रसंगोंकी बड़ी निन्दा करते हैं, परंतु इन पापकर्मोंमें अनेक शास्त्रोंके श्रवण और अध्ययनसे सम्पन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं ॥
इति कालेन सर्वार्थानीप्सितानीप्सितानिह ।
स्पृशन्ति सर्वभूतानि निमित्तं नोपलभ्यते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार कालके प्रभावसे समस्त प्राणी इष्ट और अनिष्ट पदार्थोंको प्राप्त करते रहते हैं, इस इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिका अदृष्टके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता ॥ ३२ ॥
वायुमाकाशमग्निं च चन्द्रादित्यावहःक्षपे ।
ज्योतींषि सरितः शैलान् कः करोति बिभर्ति च ॥ ३३ ॥
वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, दिन, रात, नक्षत्र, नदी और पर्वतोंको कालके सिवा कौन बनाता और धारण करता है? ॥ ३३ ॥
शीतमुष्णं तथा वर्षं कालेन परिवर्तते ।
एवमेव मनुष्याणां सुखदुःखे नरर्षभ ॥ ३४ ॥
सर्दी, गर्मी और वर्षाका चक्र भी कालसे ही चलता है । नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार मनुष्योंके सुख- दुःख भी कालसे ही प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥
नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपाः ।
त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम् ॥ ३५ ॥
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वृद्धावस्था और मृत्युके वशमें पड़े हुए मनुष्यको औषध, मन्त्र, होम और जप भी नहीं बचा पाते हैं ॥
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागमः ॥ ३६ ॥
जैसे महासागरमें एक काठ एक ओरसे और दूसरा दूसरी ओरसे आकर दोनों थोड़ी देरके लिये मिल जाते हैं तथा मिलकर फिर बिछुड़ भी जाते हैं, इसी प्रकार यहाँ प्राणियोंके संयोग - वियोग होते रहते हैं ॥ ३६ ॥
ये चैव पुरुषाः स्त्रीभिर्गीतवाद्यैरुपस्थिताः ।
ये चानाथाः परान्नादाः कालस्तेषु समक्रियः ॥ ३७ ॥
जगत्में जिन धनवान् पुरुषोंकी सेवामें बहुत- सी सुन्दरियाँ गीत और वाद्योंके साथ उपस्थित हुआ करती हैं और जो अनाथ मनुष्य दूसरोंके अन्नपर जीवन निर्वाह करते हैं, उन सबके प्रति कालकी समान चेष्टा होती है ॥ ३७ ॥
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।
संसारेष्वनुभूतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ॥ ३८ ॥
हमने संसारमें अनेक बार जन्म लेकर सहस्रों माता- पिता और सैकड़ों स्त्री- पुत्रोंके सुखका अनुभव किया है; परंतु अब वे किसके हैं अथवा हम उनमेंसे किसके हैं? ॥ ३८ ॥
नैवास्य कश्चिद् भविता नायं भवति कस्यचित् ।
पथि संगतमेवेदं दारबन्धुसुहृज्जनैः ॥ ३ ९ ॥
इस जीवका न तो कोई सम्बन्धी होगा और न यह किसीका सम्बन्धी है । जैसे मार्गमें चलनेवालोंको दूसरे राहगीरोंका साथ मिल जाता है, उसी प्रकार यहाँ भाई-बन्धु, स्त्री- पुत्र और सुहृदोंका समागम होता है ॥ ३ ९ ॥
क्वासे क्व च गमिष्यामि को न्वहं किमिहास्थितः ।
कस्मात् किमनुशोचेयमित्येवं स्थापयेन्मनः ॥ ४० ॥
अतः विवेकी पुरुषको अपने मनमें यह विचार करना चाहिये कि ' मैं कहाँ हूँ, कहाँ जाऊँगा, कौन हूँ, यहाँ किसलिये आया हूँ और किसलिये किसका शोक करूँ? ' ॥
अनित्ये प्रियसंवासे संसारे चक्रवद्गतौ ।
पथि संगतमेवैतद् भ्राता माता पिता सखा ॥ ४१ ॥
यह संसार चक्रके समान घूमता रहता है । इसमें प्रियजनोंका सहवास अनित्य है । यहाँ भ्राता, मित्र, पिता और माता आदिका साथ रास्तेमें मिले हुए बटोहियोंके समान ही है ॥ ४१ ॥
न दृष्टपूर्वं प्रत्यक्षं परलोकं विदुर्बुधाः ।
आगमांस्त्वनतिक्रम्य श्रद्धातव्यं बुभूषता ॥ ४२ ॥
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यद्यपि विद्वान् पुरुष कहते हैं कि परलोक न तो आँखोंके सामने है और न पहलेका ही देखा हुआ है, तथापि अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन न करके उसकी बातोंपर विश्वास करना चाहिये ॥ ४२ ॥
कुर्वीत पितृदैवत्यं धर्माणि च समाचरेत् ।
यजेच्च विद्वान् विधिवत् त्रिवर्गं चाप्युपाचरेत् ॥ ४३ ॥
विज्ञ पुरुष पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका यजन करे । धर्मानुकूल कार्योंका अनुष्ठान और यज्ञ करे तथा विधिपूर्वक धर्म, अर्थ और कामका भी सेवन करे ॥ ४३ ॥
संनिमज्जेज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे ।
जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदवबुध्यते ॥ ४४ ॥
जिसमें जरा और मृत्युरूपी बड़े -बड़े ग्राह पड़े हुए हैं, उस गम्भीर कालसमुद्रमें यह सारा संसार डूब रहा है, किंतु कोई इस बातको समझ नहीं पाता है ॥ ४४ ॥
आयुर्वेदमधीयानाः केवलं सपरिग्रहाः ।
दृश्यन्ते बहवो वैद्या व्याधिभिः समभिप्लुताः ॥ ४५ ॥
केवल आयुर्वेदका अध्ययन करनेवाले बहुत से वैद्य भी परिवारसहित रोगोंके शिकार हुए देखे जाते हैं ॥
ते पिबन्तः कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च ।
न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ॥ ४६ ॥
वे कड़वे- कड़वे काढ़े और नाना प्रकारके घृत पीते रहते हैं तो भी जैसे महासागर अपनी तट- भूमिसे आगे नहीं बढ़ता, उसी प्रकार वे मौतको लाँघ नहीं पाते हैं ॥
रसायनविदश्चैव सुप्रयुक्तरसायनाः ।
दृश्यन्ते जरया भग्ना नगा नागैरिवोत्तमैः ॥ ४७ ॥
रसायन जाननेवाले वैद्य अपने लिये रसायनोंका अच्छी तरह प्रयोग करके भी वृद्धावस्थाद्वारा वैसे ही जर्जर हुए दिखायी देते हैं, जैसे श्रेष्ठ हाथियोंके आघातसे टूटे हुए वृक्ष दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ४७ ॥
तथैव तपसोपेताः स्वाध्यायाभ्यसने रताः ।
दातारो यज्ञशीलाश्च न तरन्ति जरान्तकौ ॥ ४८ ॥
इसी प्रकार शास्त्रोंके स्वाध्याय और अभ्यासमें लगे हुए विद्वान्, तपस्वी, दानी और यज्ञशील पुरुष भी जरा और मृत्युको पार नहीं कर पाते हैं ॥ ४८ ॥
न ह्यानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः समाः ।
जातानां सर्वभूतानां न पक्षा न पुनः क्षपाः ॥ ४९ ॥
संसारमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणियोंके दिन- रात, वर्ष, मास और पक्ष एक बार बीतकर फिर वापस नहीं लौटते हैं ॥ ४ ९ ॥ सोऽयं विपुलमध्वानं कालेन ध्रुवमध्रुवः ।
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नरोऽवशः समभ्येति सर्वभूतनिषेवितम् ॥ ५० ॥
मृत्युके इस विशाल मार्गका सेवन सभी प्राणियोंको करना पड़ता है । इस अनित्य मानवको भी कालसे विवश होकर कभी न टलनेवाले मृत्युके मार्गपर आना ही पड़ता है ॥ ५० ॥
देहो वा जीवतोऽभ्येति जीवो वाभ्येति देहतः ।
पथि संगममभ्येति दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ॥ ५१ ॥
( आस्तिक मतके अनुसार ) जीव (चेतन ) से शरीरकी उत्पत्ति हो या ( नास्तिकोंकी मान्यताके अनुसार ) शरीरसे जीवकी । सर्वथा स्त्री- पुत्र आदि या अन्य बन्धुओंके साथ जो समागम होता है, वह रास्तेमें मिलनेवाले राहगीरोंके समान ही है ॥ ५१ ॥
नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित् ।
अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ५२ ॥
किसी भी पुरुषको कभी किसीके साथ भी सदा एक स्थानमें रहनेका सुयोग नहीं मिलता । जब अपने शरीरके साथ भी बहुत दिनोंतक सम्बन्ध नहीं रहता, तब दूसरे किसीके साथ कैसे रह सकता है? ॥ ५२
क्व नु तेऽद्य पिता राजन् क्व नु तेऽद्य पितामहाः ।
न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽनघ ॥ ५३ ॥
राजन्! आज तुम्हारे पिता कहाँ हैं? आज तुम्हारे पितामह कहाँ गये? निष्पाप नरेश! आज न तो तुम उन्हें देख रहे हो और न वे तुम्हें देखते हैं ॥ ५३ ॥
न चैव पुरुषो द्रष्टा स्वर्गस्य नरकस्य च ।
आगमस्तु सतां चक्षुर्नृपते तमिहाचर ॥ ५४ ॥
कोई भी मनुष्य यहींसे इन स्थूल नेत्रोंद्वारा स्वर्ग और नरकको नहीं देख सकता । उन्हें देखनेके लिये सत्पुरुषोंके पास शास्त्र ही एकमात्र नेत्र हैं, अतः नरेश्वर! तुम यहाँ उस शास्त्रके अनुसार ही आचरण करो ॥ ५४ ॥
चरितब्रह्मचर्यो हि प्रजायेत यजेत च ।
पितृदेवमनुष्याणानृण्यादनसूयकः ॥ ५५ ॥
मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पूर्णरूपसे पालन करके गृहस्थ आश्रम स्वीकार करे और पितरों, देवताओं तथा मनुष्यों ( अतिथियों ) के ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पादन तथा यज्ञ करे, किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखे ॥ ५५ ॥
स यज्ञशीलः प्रजने निविष्टः प्राग् ब्रह्मचारी प्रविविक्तचक्षुः । आराधयेत् स्वर्गमिमं च लोकं परं च मुक्त्वा हृदयव्यलीकम् ॥ ५६ ॥
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मनुष्य पहले ब्रह्मचर्यका पालन करके संतानोत्पादनके लिये विवाह करे, नेत्र आदि इन्द्रियोंको पवित्र रखे और स्वर्गलोक तथा इहलोकके सुखकी आशा छोड़कर हृदयके शोक- संतापको दूर करके यज्ञपरायण हो परमात्माकी आराधना करता रहे ॥ ५६ ॥
समं हि धर्मं चरतो नृपस्य द्रव्याणि चाभ्याहरतो यथावत् । प्रवृत्तधर्मस्य यशोऽभिवर्धते सर्वेषु लोकेषु चराचरेषु ॥ ५७ ॥
राजा यदि नियमपूर्वक प्रजाके निकटसे करके रूपमें द्रव्य ग्रहण करे और राग- द्वेषसे रहित हो राजधर्मका पालन करता रहे तो उस धर्मपरायण नरेशका सुयश सम्पूर्ण चराचर लोकोंमें फैल जाता है ॥ ५७ ॥
इत्येवमाज्ञाय विदेहराजो
वाक्यं समग्रं परिपूर्णहेतुः ।
अश्मानमामन्त्र्य विशुद्धबुद्धि- गृहं स्वं प्रति शान्तशोकः ॥ ५८ ॥
निर्मल बुद्धिवाले विदेहराज जनक अश्माका यह युक्तिपूर्ण सम्पूर्ण उपदेश सुनकर शोकरहित हो गये और उनकी आज्ञा ले अपने घरको लौट गये ॥ ५८ ॥
तथा त्वमप्यच्युत मुञ्च शोक- मुत्तिष्ठ शक्रोपम हर्षमेहि । क्षात्रेण धर्मेण मही जिता ते तां भुङ्क्ष्व कुन्तीसुत मावमंस्थाः ॥ ५ ९ ॥ अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी कुन्तीकुमार युधिष्ठिर! तुम भी शोक छोड़कर उठो और हृदयमें हर्ष धारण करो । तुमने क्षत्रियधर्मके अनुसार इस पृथ्वीपर
विजय पायी है; अतः इसे भोगो । इसकी अवहेलना न करो ॥ ५ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्येऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक अट्ठाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
OFF FUR * नीलकण्ठने ‘ प्राप्ति ' का अर्थ ' लाभ ' और ' व्यायाम ' का अर्थ उसके विपरीत ' अलाभ' किया है ।
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एकोनत्रिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णके द्वारा नारद - सृजय - संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न वैशम्पायन उवाच
अव्याहरति राजेन्द्रे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे ।
गुडाकेशो हृषीकेशमभ्यभाषत पाण्डवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सबके समझाने -बुझानेपर भी जब धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर मौन ही रह गये, तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ १ ॥
अर्जुनउवाच
ज्ञातिशोकाभिसंतप्तो धर्मपुत्रः परंतपः ।
एष शोकार्णवे मग्नस्तमाश्वासय माधव ॥ २ ॥
अर्जुन बोले- माधव! शत्रुओंको संताप देनेवाले ये धर्मपुत्र युधिष्ठिर स्वयं भाई-बन्धुओंके शोकसे संतप्त हो शोकके समुद्रमें डूब गये हैं, आप इन्हें धीरज बँधाइये ॥
सर्वे स्म ते संशयिताः पुनरेव जनार्दन ।
अस्य शोकं महाबाहो प्रणाशयितुमर्हसि ॥ ३ ॥
महाबाहु जनार्दन! हम सब लोग पुनः महान् संशयमें पड़ गये हैं । आप इनके शोकका नाश कीजिये ॥ वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गोविन्दो विजयेन महात्मना ।
पर्यवर्तत राजानं पुण्डरीकेक्षणोऽच्युतः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! महामना अर्जुनके ऐसा कहनेपर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले कमलनयन भगवान् गोविन्द राजा युधिष्ठिरकी ओर घूमे — उनके सम्मुख हुए ॥ ४ ॥
अनतिक्रमणीयो हि धर्मराजस्य केशवः ।
बाल्यात् प्रभृति गोविन्दः प्रीत्या चाभ्यधिकोऽर्जुनात् ॥ ५ ॥
धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे; क्योंकि श्रीकृष्ण बाल्यावस्थासे ही उन्हें अर्जुनसे भी अधिक प्रिय थे ॥ ५ ॥
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सम्प्रगृह्य महाबाहुर्भुजं चन्दनभूषितम् ।
शैलस्तम्भोपमं शौरिरुवाचाभिविनोदयन् ॥ ६ ॥
महाबाहु गोविन्दने युधिष्ठिरकी पत्थरके बने हुए खम्भे जैसी चन्दनचर्चित भुजाको हाथमें लेकर उनका मनोरंजन करते हुए इस प्रकार बोलना आरम्भ किया ॥ ६ ॥
शुशुभे वदनं तस्य सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् ।
व्याकोशमिव विस्पष्टं पद्मं सूर्य इवोदिते ॥ ७ ॥
उस समय सुन्दर दाँतों और मनोहर नेत्रोंसे युक्त उनका मुखारविन्द सूर्योदयके समय पूर्णतः विकसित हुए कमलके समान शोभा पा रहा था ॥ ७ ॥
वासुदेव उवाच
मा कृथाः पुरुषव्याघ्र शोकं त्वं गात्रशोषणम् ।
न हि ते सुलभा भूयो ये हतास्मिन् रणाजिरे ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले - पुरुषसिंह! तुम शोक न करो । शोक तो शरीरको सुखा देनेवाला होता है । इस समरांगणमें जो वीर मारे गये हैं, वे फिर सहज ही मिल सकें, यह सम्भव नहीं है ॥ ८ ॥
स्वप्नलब्धा यथा लाभा वितथाः प्रतिबोधने ।
एवं ते क्षत्रिया राजन् ये व्यतीता महारणे ॥ ९ ॥
राजन्! जैसे सपनेमें मिले हुए धन जगनेपर मिथ्या हो जाते हैं, उसी प्रकार जो क्षत्रिय महासमरमें नष्ट हो गये हैं, उनका दर्शन अब दुर्लभ है ॥ ९ ॥
सर्वेऽप्यभिमुखाः शूरा विजिता रणशोभिनः ।
नैषां कश्चित् पृष्ठतो वा पलायन् वापि पातितः ॥ १० ॥
संग्राममें शोभा पानेवाले वे सभी शूरवीर शत्रुका सामना करते हुए पराजित हुए हैं ।
उनमेंसे कोई भी पीठपर चोट खाकर या भागता हुआ नहीं मारा गया है ॥
सर्वे त्यक्त्वाऽऽत्मनः प्राणात् युद्ध्वा वीरा महामृधे ।
शस्त्रपूता दिवं प्राप्ता न तान् शोचितुमर्हसि ॥ ११ ॥
सभी वीर महायुद्धमें जूझते हुए अपने प्राणोंका परित्याग करके अस्त्र - शस्त्रोंसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें गये हैं, अतः तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
क्षत्रधर्मरताः शूरा वेदवेदाङ्गपारगाः ।
प्राप्ता वीरगतिं पुण्यां तान् न शोचितुमर्हसि ॥ १२ ॥
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् । क्षत्रिय- धर्ममें तत्पर रहनेवाले, वेद - वेदांगोंके पारंगत वे शूरवीर नरेश पुण्यमयी वीर-गतिको प्राप्त हुए हैं । पहलेके मरे हुए महानुभाव भूपतियोंका चरित्र सुनकर तुम्हें अपने उन बन्धुओंके लिये भी शोक नहीं करना चाहिये ॥ १२३ ॥
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अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ॥ १३ ॥
सृजयं पुत्रशोकार्तं यथायं नारदोऽब्रवीत् । इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जैसा कि इन देवर्षि नारदजीने पुत्र - शोकसे पीड़ित हुए राजा संजयसे कहा था ॥ १३३ ॥
सुखदुःखैरहं त्वं च प्रजाः सर्वाश्च सृजय ॥ १४ ॥
अविमुक्ता मरिष्यामस्तत्र का परिदेवना । ‘ सृजय! मैं, तुम और ये समस्त प्रजावर्गके लोग कोई भी सुख और दुःखोंके बन्धनसे मुक्त नहीं हुए हैं तथा एक दिन हम सब लोग मरेंगे भी । फिर इसके लिय शोक क्या करना है? ॥ १४३ ॥
महाभाग्यं पुरा राज्ञां कीर्त्यमानं मया शृणु ॥ १५ ॥
गच्छावधानं नृपते ततो दुःखं प्रहास्यसि । ‘ नरेश्वर! मैं पूर्ववर्ती राजाओंके महान् सौभाग्यका वर्णन करता हूँ । सुनो और सावधान हो जाओ । इससे तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा ॥ १५३ ॥
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ॥ १६ ॥
शममानय संतापं शृणु विस्तरशश्च मे । ' मरे हुए महानुभाव भूपतियोंके नाम सुनकर ही तुम अपने मानसिक संतापको शान्त कर लो और मुझसे विस्तारपूर्वक उन सबका परिचय सुनो ॥ १६३ ॥
क्रूरग्रहाभिशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ १७ ॥
अग्रिमाणां क्षितिभुजामुपादानं मनोहरम् । ‘ उन पूर्ववर्ती राजाओंका श्रवण करनेयोग्य मनोहर वृत्तान्त बहुत ही उत्तम, क्रूर ग्रहोंको शान्त करनेवाला और आयुको बढ़ानेवाला है ॥ १७३ ॥
आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ॥ १८ ॥
यस्य सेन्द्राः सवरुणा बृहस्पतिपुरोगमाः ।
देवा विश्वसृजो राज्ञो यज्ञमीयुर्महात्मनः ॥ १ ९ ॥
' सृजय! हमने सुना है कि अविक्षित्के पुत्र वे राजा मरुत्त भी मर गये, जिन महात्मा नरेशके यज्ञमें इन्द्र तथा वरुणसहित सम्पूर्ण देवता और प्रजापतिगण बृहस्पतिको आगे करके पधारे थे ॥ १८-१९ ॥
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महाभारत, स्वयं श्रीकृष्ण शोकमग्न युधिष्ठिरको समझा रहे हैं ।