05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1771–1780
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1771–1780
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लोभमोहाभिभूतस्य रागद्वेषान्वितस्य च ।
न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद् धर्मं करोति च ॥ ६ ॥
लोभ और मोहसे घिरे हुए तथा राग- द्वेषके वशीभूत हुए मनुष्यकी बुद्धि धर्ममें नहीं लगती है । वह किसी - न- किसी बहाने से दिखाऊ धर्मका आचरण करता है ॥ ६ ॥
व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते ।
व्याजेन सिद्धयमानेषु धनेषु कुरुनन्दन ॥ ७ ॥
तत्रैव कुरुते बुद्धिं ततः पापं चिकीर्षति ।
सुहृद्भिर्वार्यमाणोऽपि पण्डितैश्चापि भारत ॥ ८ ॥
उत्तरं न्यायसम्बद्धं ब्रवीति विधिचोदितम् । कुरुनन्दन! वह कोई बहाना लेकर ही धर्म करता है, कपटसे ही धन कमानेकी रुचि रखता है और यदि कपटसे धन प्राप्त करनेमें सफलता मिल गयी तो वह उसीमें अपनी सारी बुद्धि लगा देता है । भरतनन्दन! फिर तो विद्वानों और सुहृदोंके मना करनेपर भी वह केवल पाप ही करना चाहता है तथा मना करनेवालोंको धर्मशास्त्रके वाक्योंके द्वारा प्रतिपादित न्याययुक्त उत्तर दे देता है ॥ ७-८३ ॥ अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्धते रागमोहजः ॥ ९ ॥
पापं चिन्तयते चैव प्रब्रवीति करोति च । उसका राग और मोहजनित तीन प्रकारका अधर्म बढ़ता है । वह मनसे पापकी ही बात सोचता है, वाणीसे पाप ही बोलता है और क्रियाद्वारा पाप ही करता है ॥ तस्याधर्मप्रवृत्तस्य दोषान् पश्यन्ति साधवः ॥ १० ॥
एकशीलाश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः ।
सनेह सुखमाप्नोति कुत एव परत्र वै ॥ ११ ॥
श्रेष्ठ पुरुष तो अधर्ममें प्रवृत्त हुए मनुष्यके दोष जानते हैं; परंतु उस पापीके समान स्वभाववाले पापाचारी मनुष्य उसके साथ मित्रता स्थापित करते हैं । ऐसा पुरुष इस लोकमें ही सुख नहीं पाता है, फिर परलोकमें तो पा ही कैसे सकता है ॥ १०-११ ॥
एवं भवति पापात्मा धर्मात्मानं तु मे शृणु ।
यथा कुशलधर्मा स कुशलं प्रतिपद्यते ॥ १२ ॥
कुशलेनैव धर्मेण गतिमिष्टां प्रपद्यते । इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है । अब धर्मात्माके विषयमें मुझसे सुनो । वह जिस प्रकार परहित- साधक कल्याणकारी धर्मका आचरण करता है, उसी प्रकार कल्याणका भागी होता है । वह क्षेमकारक धर्मके प्रभावसे ही अभीष्ट गतिको प्राप्त होता है ॥ १२६ ॥
य एतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥ १३ ॥
कुशलः सुखदुःखानां साधूंश्चाप्यथ सेवते ।
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तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते ॥ १४ ॥
जो पुरुष अपनी बुद्धिसे राग आदि दोषोंको पहले ही देख लेता है, वह सुख- दुःखको समझनेमें कुशल होता है । फिर वह श्रेष्ठ पुरुषोंका सेवन करता है । सत्पुरुषोंकी सेवा या सत्संगसे और सत्कर्मोंके अभ्याससे उस पुरुषकी बुद्धि बढ़ती है ॥ १३-१४ ॥
प्रज्ञा धर्मे च रमते धर्मं चैवोपजीवति ।
सोऽथ धर्मादवाप्तेषु धनेषु कुरुते मनः ॥ १५ ॥
वह बढ़ी हुई बुद्धि धर्ममें ही सुख मानती और उसीका सहारा लेती है । वह पुरुष धर्मसे प्राप्त होनेवाले धनमें मन लगाता है ॥ १५ ॥
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै ।
धर्मात्मा भवति ह्येवं मित्रं च लभते शुभम् ॥ १६ ॥
वह जहाँ गुण देखता है, उसीके मूलको सींचता है । ऐसा करनेसे वह पुरुष धर्मात्मा होता है और शुभकारक मित्र प्राप्त करता है ॥ १६ ॥
स मित्रधनलाभात् तु प्रेत्य चेह च नन्दति ।
शब्दे स्पर्शे रसे रूपे तथा गन्धे च भारत ॥ १७ ॥
प्रभुत्वं लभते जन्तुर्धर्मस्यैतत् फलं विदुः ।
स तु धर्मफलं लब्ध्वा न हृष्यति युधिष्ठिर ॥ १८ ॥
भारत! उत्तम मित्र और धनके लाभसे वह इहलोक और परलोकमें भी आनन्दित होता है । ऐसा पुरुष शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध– इन पाँचों विषयोंपर प्रभुत्व प्राप्त कर लेता है । इसे धर्मका फल माना जाता है । युधिष्ठिर! वह धर्मका फल पाकर भी हर्षसे फूल नहीं उठता है ॥
अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ।
प्रज्ञाचक्षुर्यदा कामे रसे गन्धे न रज्यते ॥ १ ९ ॥
शब्दे स्पर्शे तथा रूपे न च भावयते मनः ।
विमुच्यते तदा कामान्न च धर्मं विमुञ्चति ॥ २० ॥
वह इससे तृप्त न होनेके कारण विवेकदृष्टिसे वैराग्यको ही ग्रहण करता है, बुद्धिरूप नेत्रके खुल जानेके कारण जब वह कामोपभोग, रस और गन्धमें अनुरक्त नहीं होता तथा शब्द, स्पर्श और रूपमें भी उसका चित्त नहीं फँसता, तब वह सब कामनाओंसे मुक्त हो जाता है और धर्मका त्याग नहीं करता ॥
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् ।
ततो मोक्षाय यतते नानुपायादुपायतः ॥ २१ ॥
शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च ।
धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम् ॥ २२ ॥
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सम्पूर्ण लोकोंको नाशवान् समझकर वह सर्वस्वका मनसे त्याग कर देनेका यत्न करता है । तदनन्तर वह अयोग्य उपायसे नहीं किंतु योग्य उपायसे मोक्षके लिये यत्नशील हो जाता है । इस प्रकार धीरे - धीरे मनुष्यको वैराग्यकी प्राप्ति होनेपर वह पापकर्म तो छोड़ देता है
और धर्मात्मा बन जाता है । तत्पश्चात् परम मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ २१-२२ ॥
एतत् ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
पापं धर्मस्तथा मोक्षो निर्वेदश्चैव भारत ॥ २३ ॥
तात! भरतनन्दन! तुमने मुझसे पाप, धर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें जो प्रश्न किया था, वह सब मैंने कह सुनाया ॥ २३ ॥
तस्माद् धर्मे प्रवर्तेथाः सर्वावस्थं युधिष्ठिर ।
धर्मे स्थितानां कौन्तेय सिद्धिर्भवति शाश्वती ॥ २४ ॥
अतः कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम सभी अवस्थाओंमें धर्मका ही आचरण करो; क्योंकि जो लोग धर्ममें स्थित रहते हैं, उन्हें सदा रहनेवाली मोक्षरूप परम सिद्धि प्राप्त होती है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चतुःप्राश्निको नाम त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें चार प्रश्न और उनका उत्तर नामक दोसौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७३ ॥
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चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मोक्षके साधनका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
मोक्षः पितामहेनोक्त उपायान्नानुपायतः ।
तमुपायं यथान्यायं श्रोतुमिच्छामि भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! आपने योग्य उपायसे मोक्षकी प्राप्ति बतायी, अयोग्य उपायसे नहीं । भरतनन्दन! वह यथायोग्य उपाय क्या है? इसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
त्वय्येवैतन्महाप्राज्ञ युक्तं निपुणदर्शनम् ।
येनोपायेन सर्वार्थं नित्यं मृगयसेऽनघ ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – महाप्राज्ञ निष्पाप नरेश! तुम उचित उपायसे ही सदा सम्पूर्ण धर्म आदि पुरुषार्थोंकी खोज किया करते हो। इसलिये तुममें सुने हुए विषयोंकी परीक्षा करनेकी निपुण दृष्टिका होना उचित ही है ॥ २ ॥
करणे घटस्य या बुद्धिर्घटोत्पत्तौ न सा मता ।
एवं धर्माभ्युपायेषु नान्यधर्मेषु कारणम् ॥ ३ ॥
घटके निर्माणकालमें जिस बुद्धिका उपयोग है, वह घटकी उत्पत्ति हो जानेपर आवश्यक नहीं रहती, इसी प्रकार चित्त शुद्धिके उपायभूत यज्ञादि धर्मोंका लक्ष्य पूरा हो जानेपर मोक्षसाधनरूप शमदमादि अन्य धर्मोंके लिये वे आवश्यक नहीं रहते ॥ ३ ॥
पूर्वे समुद्रे यः पन्थाः स न गच्छति पश्चिमम् ।
एकः पन्था हि मोक्षस्य तन्मे विस्तरतः शृणु ॥ ४ ॥
देखो, जो मार्ग पूर्व समुद्रकी ओर जाता है, वह पश्चिम समुद्रकी ओर नहीं जा सकता । इसी प्रकार मोक्षका भी एक ही मार्ग है, उसे मैं विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
क्षमया क्रोधमुच्छिन्द्यात् कामं संकल्पवर्जनात् ।
सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्रां च च्छेत्तुमर्हति ॥ ५ ॥
मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि क्षमासे क्रोधका और संकल्पोंके त्यागसे कामनाओंका उच्छेद कर डाले । धीर पुरुष ज्ञानध्यानादि सात्त्विक गुणोंके सेवनसे निद्राका क्षय करे ॥ ५ ॥
अप्रमादाद् भयं रक्षेत् श्वासं क्षेत्रज्ञशीलनात् ।
इच्छां द्वेषं च कामं च धैर्येण विनिवर्तयेत् ॥ ६ ॥
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अप्रमादसे भयको दूर करे, आत्माके चिन्तनसे श्वासकी रक्षा करे अर्थात् प्राणायाम करे और धैर्यके द्वारा इच्छा, द्वेष एवं कामका निवारण करे ॥ ६ ॥
भ्रमं सम्मोहमावर्तमभ्यासाद् विनिवर्तयेत् ।
निद्रां च प्रतिभां चैव ज्ञानाभ्यासेन तत्त्ववित् ॥ ७ ॥
तत्त्ववेत्ता पुरुष शास्त्रके अभ्याससे भ्रम, मोह और संशयका तथा आलस्य और प्रतिभा ( नानाविषयिणी बुद्धि ) —–इन दोनों दोषोंका ज्ञानके अभ्याससे निराकरण करे ॥ ७ ॥
उपद्रवांस्तथा रोगान् हितजीर्णमिताशनात् ।
लोभं मोहं च संतोषाद् विषयांस्तत्त्वदर्शनात् ॥ ८ ॥
शारीरिक उपद्रवों तथा रोगोंका हितकर, सुपाच्य और परिमित आहारसे, लोभ और मोहका संतोषसे तथा विषयोंका तात्त्विक दृष्टिसे निवारण करे ॥ ८ ॥
अनुक्रोशादधर्मं च जयेद् धर्ममवेक्षया ।
आयत्या च जयेदाशामर्थं संगविवर्जनात् ॥ ९ ॥
अधर्मको दयासे और धर्मको विचारपूर्वक पालन करनेसे जीते । भविष्यका विचार करके आशापर और आसक्तिके त्यागसे अर्थपर विजय प्राप्त करे ॥ ९ ॥
अनित्यत्वेन च स्नेहं क्षुधां योगेन पण्डितः ।
कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः ॥ १० ॥
विद्वान् पुरुष वस्तुओंकी अनित्यताका चिन्तन करके स्नेहको योगाभ्यासके द्वारा क्षुधाको, करुणाके द्वारा अपने अभिमानको और संतोषसे तृष्णाको जीते ॥ १० ॥
उत्थानेन जयेत् तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत् ।
मौनेन बहुभाष्यं च शौर्येण च भयं त्यजेत् ॥ ११ ॥
आलस्यको उद्योगसे और विपरीत तर्कको शास्त्रके प्रति दृढ़ विश्वाससे जीते, मौनावलम्बनद्वारा बहुत बोलनेकी आदतको और शूरवीरताके द्वारा भयको त्याग दे ॥ ११ ॥
यच्छेद् वाङ्मनसी बुद्धया तां यच्छेज्ज्ञानचक्षुषा ।
ज्ञानमात्मावबोधेन यच्छेदात्मानमात्मना ॥ १२ ॥
तदेतदुपशान्तेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा । मन और वाणीको अर्थात् मनसहित समस्त इन्द्रियोंको बुद्धिद्वारा वशमें करे, बुद्धिका विवेकरूप नेत्रद्वारा शमन करे, फिर आत्मज्ञानद्वारा विवेकज्ञानका शमन करे और आत्माको परमात्मामें विलीन कर दे । इस प्रकार पवित्र आचार- विचारसे युक्त साधकको सब ओरसे उपरत होकर शान्तभावसे परमात्माका साक्षात्कार करना चाहिये ॥ १२३ ॥
योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः ॥ १३ ॥
कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् ।
परित्यज्य निषेवेत यतवाग् योगसाधनान् ॥ १४ ॥
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काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा- ये ही योगसम्बन्धी वे पाँच दोष हैं, जिनको विद्वान् पुरुष जानते हैं । इनका मूलोच्छेद कर देना चाहिये तथा इनका परित्याग करके वाणीको संयममें रखते हुए योगसाधनोंका सेवन करना चाहिये ॥ १३-१४ ॥
ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा ।
शौचमाहारतः शुद्धिरिन्द्रियाणां च संयमः ॥ १५ ॥
एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानमुपहन्ति च ।
सिध्यन्ति चास्य संकल्पा विज्ञानं च प्रवर्तते ॥ १६ ॥
ध्यान, अध्ययन, दान, सत्य, लज्जा, सरलता, क्षमा, बाहर- भीतरकी पवित्रता, आहारशुद्धि और इन्द्रियोंका संयम— ये ही योगके साधन हैं । इन सबके द्वारा साधकका तेज बढ़ता है । वह अपने पापोंका नाश कर डालता है । उसके संकल्प सिद्ध होने लगते हैं और हृदयमें विज्ञानका आविर्भाव हो जाता है ॥ १५-१६ ॥
धूतपापः स तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम् ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब पाप धुल जायँ और साधक तेजस्वी, मिताहारी और जितेन्द्रिय हो जाय, तब वह काम और क्रोधको अपने अधीन करके अपने - आपको ब्रह्मपदमें प्रतिष्ठित करनेकी इच्छा करे ॥ १७ ॥
अमूढत्वमसंगित्वं कामक्रोधविवर्जनम् ।
अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थितिः ॥ १८ ॥
एष मार्गों हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमलः शुचिः ।
तथा वाक्कायमनसां नियमः कामतोऽन्यथा ॥ १ ९ ॥
मूढता और आसक्तिका अभाव, काम और क्रोधका त्याग एवं दीनता, उद्दण्डता तथा उद्वेगसे रहित होना और चित्तकी स्थिरता एवं निष्कामभावसे मन, वाणी और इन्द्रियोंका संयम — यह मोक्षका स्वच्छ, निर्मल एवं पवित्र मार्ग है ॥ १८-१९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगाचारानुवर्णनं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगसम्बन्धी आचारका वर्णन नामक दो सौ चौहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २७४ ॥
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पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः जीवात्माके देहाभिमानसे मुक्त होनेके विषयमें नारद और असितदेवलका संवाद भीष्म उवाच
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादं देवलस्यासितस्य च ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस विषयमें देवर्षि नारद तथा ब्रह्मर्षि असितदेवलके संवादरूप प्राचीन इतिहासका विद्वान् पुरुष उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥
आसीनं देवलं वृद्धं बुद्ध्वा बुद्धिमतां वरम् ।
नारदः परिपप्रच्छ भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥ २ ॥
एक समयकी बात है, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बूढ़े असितदेवलको आसनपर बैठा हुआ जान नारदजीने उनसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके विषयमें प्रश्न किया ॥ २ ॥
नारद उवाच
कुतः सृष्टमिदं विश्वं ब्रह्मन् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रलये च कमभ्येति तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ ३ ॥
नारदजीने पूछा — ब्रह्मन्! इस समस्त चराचर जगत्की सृष्टि किससे हुई है तथा यह प्रलयके समय किसमें लीन हो जाता है, यह आप मुझे बताइये? ॥ ३ ॥
असितउवाच
येभ्यः सृजति भूतानि काले भावप्रचोदितः ।
महाभूतानि पञ्चेति तान्याहुर्भूतचिन्तकाः ॥ ४ ॥
असितदेवलने कहा— देवर्षे! सृष्टिके समय परमात्मा प्राणियोंकी वासनाओंसे प्रेरित हो समयपर जिन तत्त्वोंसे सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करते हैं, उन्हें भूतचिन्तक ( भौतिक विज्ञानवादी ) विद्वान् पंचमहाभूत कहते हैं ॥ ४ ॥
तेभ्यः सृजति भूतानि काल आत्मप्रचोदितः ।
एतेभ्यो यः परं ब्रूयादसद् ब्रूयादसंशयम् ॥ ५ ॥
परमात्माकी प्रेरणासे काल इन पाँच तत्त्वोंद्वारा समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करता है । जो इनसे भिन्न किसी अन्य तत्त्वको प्राणियोंके शरीरोंका उपादान कारण बताता है, वह निस्संदेह झूठी बात कहता है ॥
विद्धि नारद पञ्चैतान् शाश्वतानचलान् ध्रुवान् ।
महतस्तेजसो राशीन् कालषष्ठान् स्वभावतः ॥ ६ ॥
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- नारद! पाँचभूतऔर छठा काल – इन छः तत्त्वोंको तुम प्रवाहरूपसे शाश्वत, अविचल और ध्रुव समझो । ये तेजोमय महत्तत्त्वकी स्वाभाविक कलाएँ हैं ॥
आपश्चैवान्तरिक्षं च पृथिवी वायुपावकौ ।
नासीद्धि परमं तेभ्यो भूतेभ्यो मुक्तसंशयम् ॥ ७ ॥
जल, आकाश, पृथ्वी, वायु और अग्नि- इन भूतोंसे भिन्न कोई तत्त्व कभी नहीं था; इसमें संशय नहीं है ॥
नोपपत्त्या न वा युक्त्या त्वसद् ब्रूयादसंशयम् ।
वेत्थैतानभिनिर्वृत्तान् षडेते यस्य राशयः ॥ ८ ॥
किसी भी युक्ति या प्रमाणसे इन छःके अतिरिक्त और कोई तत्त्व नहीं बताया जा सकता । इसलिये जो कोई दूसरी बात कहता है, वह निस्संदेह झूठ बोलता है । तुम सभी कार्योंमें अनुगत हुए इन छः तत्त्वोंको और जिसके ये कार्य हैं, उस कारणको भी जानते हो ॥ ८ ॥
पञ्चैव तानि कालश्च भावाभावौ च केवलौ ।
अष्टौ भूतानि भूतानां शाश्वतानि भवात्ययौ ॥ ९ ॥
पाँच महाभूत, काल तथा विशुद्ध भाव और अभाव अर्थात् नित्य आत्मतत्त्व और परिवर्तनशील महत्तत्त्व-ये आठ तत्त्व नित्य हैं । ये ही चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान हैं ॥ ९ ॥
अभावं यान्ति तेष्वेव तेभ्यश्च प्रभवन्त्यपि ।
विनष्टोऽप्यनु तान्येव जन्तुर्भवति पञ्चधा ॥ १० ॥
सब प्राणी उन्हींमें लीन होते हैं और उन्हींसे उनका प्राकट्य भी होता है । जीवोंका शरीर नष्ट हो जानेपर पाँच भागोंमें विभक्त होकर अपने- अपने कारणमें विलीन हो जाता है ॥ १० ॥
तस्य भूमिमयो देहः श्रोत्रमाकाशसम्भवम् ।
सूर्याच्चक्षुरसुर्वायोरद्भ्यस्तु खलु शोणितम् ॥ ११ ॥
प्राणियोंका शरीर पृथ्वीका विकार है, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशसे उत्पन्न हुई है, नेत्रेन्द्रिय सूर्यसे, प्राण वायुसे और रक्त जलसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ११ ॥
चक्षुषी नासिकाकर्णौ त्वक् जिह्वेति च पञ्चमी ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थानां ज्ञानानि कवयो विदुः ॥ १२ ॥
विद्वान् पुरुष ऐसा मानते हैं कि नेत्र, नासिका, कर्ण, त्वचा और पाँचवीं जिह्वा - से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही विषयोंको ग्रहण करनेवाली हैं ॥ १२ ॥
दर्शनं श्रवणं घ्राणं स्पर्शनं रसनं तथा ।
उपपत्त्या गुणान् विद्धि पञ्च पञ्चसु पञ्चधा ॥ १३ ॥
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बाह्य पदार्थोंको देखना, सुनना, सूँघना, छूना तथा रस लेना – ये क्रमशः नेत्र आदि पाँच इन्द्रियोंके कार्य हैं। उन्हें युक्तिसे तुम इन इन्द्रियोंके गुण ही समझो । पाँचों इन्द्रियाँ पाँचों विषयोंमें पाँच प्रकारसे (दर्शन आदि क्रियाओंके रूपमें) विद्यमान हैं ॥ १३ ॥
रूपं गन्धो रसः स्पर्शः शब्दश्चैवाथ तद्गुणाः ।
इन्द्रियैरुपलभ्यन्ते पञ्चधा पञ्च पञ्चभिः ॥ १४ ॥
नेत्र आदि पाँच इन्द्रियोंद्वारा रूप, गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द - ये पाँच गुण दर्शन आदि पाँच प्रकारोंसे उपलब्ध किये जाते हैं ॥ १४ ॥
रूपं गन्धं रसं स्पर्शं शब्दं चैवाथ तद्गुणान् ।
इन्द्रियाणि न बुध्यन्ते क्षेत्रज्ञस्तैस्तु बुध्यते ॥ १५ ॥
रूप, गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द– इन्द्रियोंके इन पाँचों गुणोंको स्वयं इन्द्रियाँ नहीं जानती हैं । उन इन्द्रियोंद्वारा क्षेत्रज्ञ ( जीवात्मा) ही उनका अनुभव करता है ॥ १५ ॥
चित्तमिन्द्रियसंघातात् परं तस्मात् परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिः क्षेत्रज्ञो बुद्धितः परः ॥ १६ ॥
शरीर और इन्द्रियोंके संघातसे चित्त श्रेष्ठ है, चित्तसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धिसे भी क्षेत्रज्ञ श्रेष्ठ है ॥ १६ ॥
पूर्वं चेतयते जन्तुरिन्द्रियैर्विषयान् पृथक् ।
विचार्य मनसा पश्चादथ बुद्धया व्यवस्यति ।
इन्द्रियैरुपलब्धार्थान् बुद्धिमांस्तु व्यवस्यति ॥ १७ ॥
जीव पहले तो इन्द्रियोंद्वारा उनके अलग- अलग विषयोंको प्रकाशित करता है, फिर मनसे विचार करके बुद्धिद्वारा उसका निश्चय करता है । बुद्धियुक्त जीव ही इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध विषयोंका निश्चितरूपसे अनुभव करता है ॥ १७ ॥
चित्तमिन्द्रियसंघातं मनो बुद्धिस्तथाष्टमी ।
अष्टौ ज्ञानेन्द्रियाण्याहुरेतान्यध्यात्मचिन्तकाः ॥ १८ ॥
अध्यात्मतत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले पुरुष पाँच इन्द्रिय तथा चित्त, मन और आठवीं बुद्धि – इन आठोंको ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं ॥ १८ ॥
पाणिपादं च पायुश्च मेहनं पञ्चमं मुखम् ।
इति संशब्द्यमानानि शृणु कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥ १ ९ ॥
हाथ, पैर, पायु और उपस्थ तथा पाँचवाँ मुख – ये सब-के - सब कर्मेन्द्रिय कहे जाते हैं । तुम इनका भी विवरण सुनो ॥ १ ९ ॥
जल्पनाभ्यवहारार्थं मुखमिन्द्रियमुच्यते ।
गमनेन्द्रियं तथा पादौ कर्मणः करणे करौ ॥ २० ॥
मुख - इन्द्रियका उपयोग बोलने और भोजन करनेके लिये बताया जाता है । पैर चलनेकी और हाथ काम करनेकी इन्द्रियाँ हैं ॥ २० ॥
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पायूपस्थं विसर्गार्थमिन्द्रिये तुल्यकर्मणी ।
विसर्गे च पुरीषस्य विसर्गे चापि कामिके ॥ २१ ॥
पायु और उपस्थ — ये दो इन्द्रियाँ क्रमशः मल और मूत्रका त्याग करनेके लिये हैं । इन दोनोंके त्यागरूप कर्म समान ही हैं । इनमेंसे पायु - इन्द्रिय मलका त्याग करती है और उपस्थ मैथुनके समय वीर्यका भी त्याग करता है ॥ २१ ॥
बलं षष्ठं षडेतानि वाचा सम्यग्यथा मम ।
ज्ञानचेष्टेन्द्रियगुणाः सर्वेषां शब्दिता मया ॥ २२ ॥
इसके सिवा छठी कर्मेन्द्रिय बल अर्थात् प्राणसमूह है । इस प्रकार मैंने अपनी वाणीद्वारा तुम्हें समस्त इन्द्रियाँ और उनके ज्ञान, कर्म एवं गुण सुना दिये ॥ २२ ॥
इन्द्रियाणां स्वकर्मेभ्यः श्रमादुपरमो यदा ।
भवतीन्द्रियसंत्यागादथ स्वपिति वै नरः ॥ २३ ॥
जब अपने - अपने कर्मोंसे थककर इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं, तब इन्द्रियोंका त्याग करके जीवात्मा सो जाता है ॥ २३ ॥
इन्द्रियाणां व्युपरमे मनोऽव्युपरतं यदि ।
सेवते विषयानेव तं विद्यात् स्वप्नदर्शनम् ॥ २४ ॥
इन्द्रियोंके उपरत हो जानेपर भी यदि मन निवृत्त न होकर विषयोंका ही सेवन करता है तो उसे स्वप्नदर्शनकी अवस्था समझना चाहिये ॥ २४ ॥
सात्त्विकाश्चैव ये भावास्तथा तामसराजसाः ।
कर्मयुक्तान् प्रशंसन्ति सात्त्विकानितरांस्तथा ॥ २५ ॥
जो सात्त्विक, राजस और तामसभाव प्रसिद्ध हैं, वे ही जब भोग प्रदान करनेवाले कर्मोंसे संयुक्त होते हैं, तब उन सात्त्विक आदि भावोंकी मनुष्य प्रशंसा करते हैं ॥ २५ ॥
आनन्दः कर्मणां सिद्धिः प्रतिपत्तिः परा गतिः ।
सात्त्विकस्य निमित्तानि भावान् संश्रयते स्मृतिः ॥ २६ ॥
आनन्द, सुख, कर्मोंकी सिद्धि जाननेकी सामर्थ्य और उत्तम गति— ये चार सात्त्विक भाव हैं । सात्त्विक पुरुषकी स्मृति इन्हीं चार निमित्तोंका आश्रय लेती है अर्थात् सात्त्विक पुरुष जाग्रत् कालकी भाँति स्वप्नमें भी आनन्द आदि भावोंका ही स्मरण करता है ॥ २६ ॥
जन्तुष्वेकतमेष्वेवं भावा ये विधिमास्थिताः ।
भावयोरीप्सितं नित्यं प्रत्यक्षं गमनं तयोः ॥ २७ ॥
इनसे भिन्न राजस और तामस - प्राणियोंमेंसे जिस किसी एक श्रेणीके जीवोंमें जो - जो भाव ( वासनाएँ ), विधि ( कर्मगति) का आश्रय लेकर स्थित हैं, उन्हीं भावोंको उनकी स्मृति -ग्रहण करती है । अर्थात् जाग्रत् और स्वप्न– दोनों ही अवस्थाओंमें उन मनुष्योंको अपनी-अपनी रुचिके अनुसार राजस और तामस पदार्थोंका सदा प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥ २७ ॥
इन्द्रियाणि च भावाश्च गुणाः सप्तदश स्मृताः ।