श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1761–1770
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1761–1770
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अभ्यासमकरोद् धर्मे ततस्तुष्टास्तु देवताः ॥ २८ ॥
भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! मणिभद्रके ऐसा कहनेपर भी महायशस्वी कुण्डधारने बार- बार अपनी वही बात दुहरायी । ब्राह्मणका धर्म बढ़े, इसीके लिये आग्रह किया । इससे सब देवता संतुष्ट हो गये ॥ २८ ॥
मणिभद्र उवाच
प्रीतास्ते देवताः सर्वा द्विजस्यास्य तथैव च ।
भविष्यत्येष धर्मात्मा धर्मे चाधास्यते मतिः ॥ २ ९ ॥
तब मणिभद्रने कहा— कुण्डधार! सब देवता तुमपर और इस ब्राह्मणपर भी बहुत प्रसन्न हैं । यह धर्मात्मा होगा और इसकी बुद्धि धर्ममें ही लगी रहेगी ॥
ततः प्रीतो जलधरः कृतकार्यो युधिष्ठिर ।
ईप्सितं मनसो लब्ध्वा वरमन्यैः सुदुर्लभम् ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ मनोवाञ्छित वर पाकर कृतकृत्य एवं सफल- मनोरथ हो वह मेघ बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ ३० ॥
ततोऽपश्यत चीराणि सूक्ष्माणि द्विजसत्तमः ।
पार्श्वतोऽभ्याशतो न्यस्तान्यथ निर्वेदमागतः ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपने निकट अगल- बगलमें रखे हुए बहुत - से सूक्ष्म चीर ( वल्कल आदि) देखे । इससे उसके मनमें बड़ा खेद एवं वैराग्य हुआ ॥ ब्राह्मणउवाच
अयं न सुकृतं वेत्ति कोन्वन्यो वेत्स्यते कृतम् ।
गच्छामि वनमेवाहं वरं धर्मेण जीवितुम् ॥ ३२ ॥
ब्राह्मण मन - ही - मन बोला- जब मेरे इस पुण्यमय तपका उद्देश्य यह कुण्डधार ही नहीं समझ पा रहा है, तब दूसरा कौन जानेगा! अच्छा, अब मैं वनको ही चलता हूँ । धर्ममय जीवन बिताना ही अच्छा है ॥ ३२ ॥
भीष्म उवाच
निर्वेदाद् देवतानां च प्रसादात् स द्विजोत्तमः ।
वनं प्रविश्य सुमहत् तप आरब्धवांस्तदा ॥ ३३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! वैराग्य और देवताओंके कृपाप्रसादसे वनमें जाकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने उस समय बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ३३ ॥
देवतातिथिशेषेण फलमूलाशनो द्विजः ।
धर्मे चास्य महाराज दृढा बुद्धिरजायत ॥ ३४ ॥
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देवताओं और अतिथियोंको अर्पण करके शेष बचे हुए फल- मूल आदिका वह आहार करता था । महाराज! धर्मके विषयमें उसकी बुद्धि अटल हो गयी थी ॥ ३४ ॥
त्यक्त्वा मूलफलं सर्वं पर्णाहारोऽभवद् द्विजः ।
पर्णं त्यक्त्वा जलाहारः पुनरासीद् द्विजस्तदा ॥ ३५ ॥
वायुभक्षस्ततः पश्चाद् बहून् वर्षगणानभूत् ।
न चास्य क्षीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३६ ॥
कुछ कालके बाद वह ब्राह्मण सारे फल- मूलका भोजन छोड़कर केवल पत्ते चबाकर रहने लगा । फिर पत्तेका भी त्याग करके केवल जल पीकर निर्वाह करने लगा । तत्पश्चात् बहुत वर्षोंतक वह केवल वायु पीकर रहा । फिर भी उसकी प्राणशक्ति क्षीण नहीं होती थी, यह एक अद्भुत - सी बात थी ॥ ३५-३६ ॥
धर्मे च श्रद्दधानस्य तपस्युग्रे च वर्ततः ।
कालेन महता तस्य दिव्या दृष्टिरजायत ॥ ३७ ॥
धर्ममें श्रद्धा रखते हुए दीर्घकालतक उग्र तपस्यामें लगे हुए उस ब्राह्मणको दिव्यदृष्टि प्राप्त हो गयी ॥
तस्य बुद्धिः प्रादुरासीद् यदि दद्यामहं धनम् ।
तुष्टः कस्यचिदेवेह मिथ्यावाङ् न भवेन्मम ॥ ३८ ॥
उस समय उसे यह अनुभव हुआ कि यदि मैं संतुष्ट होकर इस जगत् में किसीको प्रचुर धन दे दूँ तो मेरा दिया हुआ वचन मिथ्या नहीं होगा ॥ ३८ ॥
ततः प्रहृष्टवदनो भूय आरब्धवांस्तपः ।
भूयश्चाचिन्तयत् सिद्धो यत्परं सोऽभिमन्यते ॥ ३ ९ ॥
यह विचार आते ही उसका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने बड़े उत्साहके साथ पुनः तपस्या आरम्भ की । पुनः सिद्धि प्राप्त होनेपर उसने देखा कि वह मनमें जो- जो संकल्प करता है, वह अत्यन्त महान् होनेपर भी सामने प्रस्तुत हो जाता है । यह देखकर ब्राह्मणने पुनः यों विचार किया— ॥ ३ ९ ॥ यदि दद्यामहं राज्यं तुष्टो वै यस्य कस्यचित् । स भवेदचिराद् राजा न मिथ्या वाग् भवेन्मम ।
‘ यदि मैं संतुष्ट होकर जिस किसीको भी राज्य दे दूँ तो वह शीघ्र ही राजा हो जायगा ।
मेरी यह बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती ' ॥ ३ ९ ॥
तस्य साक्षात् कुण्डधारो दर्शयामास भारत ॥ ४० ॥
ब्राह्मणस्य तपोयोगात् सौहृदेनाभिचोदितः ॥ ४१ ॥
समागम्य स तेनाथ पूजां चक्रे यथाविधि ।
ब्राह्मणः कुण्डधारस्य विस्मितश्चाभवन्नृप ॥ ४२ ॥
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भरतनन्दन! इतनेहीमें ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे तथा उसके प्रति सौहार्दसे प्रेरित होकर कुण्डधारने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उससे मिलकर ब्राह्मणने कुण्डधारकी विधिपूर्वक पूजा की । नरेश्वर! उसे देखकर ब्राह्मणको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४०–४२ ॥
ततोऽब्रवीत् कुण्डधारो दिव्यं ते चक्षुरुत्तमम् ।
पश्य राज्ञां गतिं विप्र लोकांश्चैव तु चक्षुषा ॥ ४३ ॥
तब कुण्डधारने ब्राह्मणसे कहा - ' विप्रवर! तुम्हें परम उत्तम दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है; अतः तुम अपनी आँखोंसे देख लो कि राजाओंको किस गतिकी प्राप्ति होती है तथा वे किन - किन लोकोंमें जाते हैं ' ॥ ४३ ॥
ततो राजसहस्राणि मग्नानि निरये तदा ।
दूरादपश्यद् विप्रः स दिव्ययुक्तेन चक्षुषा ॥ ४४ ॥
तब उस ब्राह्मणने दूरसे ही अपने दिव्य नेत्रोंसे देखा कि सहस्रों राजा नरकमें डूबे हुए हैं ॥ ४४ ॥
कुण्डधार उवाच
मां पूजयित्वा भावेन यदि त्वं दुःखमाप्नुयाः ।
कृतं मया भवेत् किं ते कश्च तेऽनुग्रहो भवेत् ॥ ४५ ॥
कुण्डधार बोला — ब्रह्मन्! तुमने बड़े भक्तिभावसे मेरी पूजा की थी । इसपर भी यदि तुम धन पाकर दुःख ही भोगते रहते तो मेरे द्वारा तुम्हारा क्या उपकार हुआ होता और तुम्हारे ऊपर मेरा कौन-सा अनुग्रह सिद्ध हो सकता था ॥
पश्य पश्य च भूयस्त्वं कामानिच्छेत् कथं नरः ।
स्वर्गद्वारं हि संरुद्धं मानुषेषु विशेषतः ॥ ४६ ॥
देखो- देखो, एक बार फिर लोगोंकी दशापर दृष्टिपात करो । यह सब देख - सुनकर मनुष्य भोगोंकी इच्छा कैसे कर सकता है । जो धन और भोगोंमें आसक्त हैं, ऐसे लोगों, विशेषतः मनुष्योंके लिये स्वर्गका दरवाजा प्रायः बंद ही रहता है ॥ ४६ ॥
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यत् स कामं च क्रोधं लोभं भयं मदम् ।
निद्रां तन्द्रीं तथाऽऽलस्यमावृत्य पुरुषान् स्थितान् ॥ ४७ ॥
भीष्मजी कहते हैं – राजन्! तदनन्तर ब्राह्मणने देखा कि उन भोगी पुरुषोंको काम, क्रोध, लोभ, भय, मद, निद्रा, तन्दा और आलस्य आदि शत्रु घेरकर खड़े हैं ॥ कुण्डधार उवाच
एतैर्लोकाः सुसंरुद्धा देवानां मानुषाद् भयम् ।
तथैव देववचनाद् विघ्नं कुर्वन्ति सर्वशः ॥ ४८ ॥
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कुण्डधार बोला - विप्रवर! देखो, सब लोग इन्हीं दोषोंसे घिरे हुए हैं । देवताओंको मनुष्योंसे भय बना रहता है, इसलिये ये काम आदि दोष देवताओंके आदेशसे मनुष्यके धर्म और तपस्यामें सब प्रकारसे विघ्न डाला करते हैं ॥ ४८ ॥
न देवैरननुज्ञातः कश्चिद् भवति धार्मिकः ।
एष शक्तोऽसि तपसा दातुं राज्यं धनानि च ॥ ४ ९ ॥
देवताओंकी अनुमति प्राप्त किये बिना कोई निर्विघ्नरूपसे धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता; किंतु तुम्हें तो देवताओंका अनुग्रह प्राप्त हो गया है । इसलिये अब तुम अपने तपके प्रभावसे दूसरोंको राज्य और धन देनेमें समर्थ हो गये हो ॥ ४ ९ ॥ भीष्म उवाच
ततः पपात शिरसा ब्राह्मणस्तोयधारिणे ।
उवाच चैनं धर्मात्मा महान् मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ५० ॥
कामलोभानुबन्धेन पुरा ते यदसूयितम् ।
मया स्नेहमविज्ञाय तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तब उस धर्मात्मा ब्राह्मणने धरतीपर मस्तक टेककर कुण्डधार मेघको साष्टांग प्रणाम किया और उससे कहा - ' प्रभो! आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया है । आपके स्नेहको न समझकर काम और लोभके बन्धनमें बँधे रहनेसे मैंने पहले आपके प्रति जो दोषदृष्टि कर ली थी, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें ' ।
क्षान्तमेव मयेत्युक्त्वा कुण्डधारो द्विजर्षभम् ।
सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५२ ॥
( कुण्डधारने कहा— ) ‘ विप्रवर! मैं तो पहलेसे ही क्षमा कर चुका हूँ' ऐसा कहकर उस मेघने उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी दोनों भुजाओंद्वारा हृदयसे लगा लिया और वह फिर वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ ५२ ॥
ततः सर्वांस्तदा लोकान् ब्राह्मणोऽनुचचार ह ।
कुण्डधारप्रसादेन तपसा सिद्धिमागतः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर कुण्डधारके कृपाप्रसादसे तपस्याद्वारा सिद्धि पाकर वह ब्राह्मण सम्पूर्ण लोकोंमें विचरने लगा ॥
विहायसा च गमनं तथा संकल्पितार्थता ।
धर्माच्छक्त्या तथा योगाद् या चैव परमा गतिः ॥ ५४ ॥
आकाशमार्गसे चलना, संकल्पमात्रसे ही अभीष्ट वस्तुका प्राप्त हो जाना तथा धर्म, शक्ति और योगके द्वारा जो परमगति प्राप्त होती है, वह सब कुछ उस ब्राह्मणको प्राप्त हो गयी ॥ ५४ ॥
देवता ब्राह्मणाः सन्तो यक्षा मानुषचारणाः ।
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धार्मिकान् पूजयन्तीह न धनाढ्यान् न कामिनः ॥ ५५ ॥
देवता, ब्राह्मण, साधु - संत, यक्ष, मनुष्य और चारण- ये सब- के - सब इस जगत्में धर्मात्माओंका ही पूजन करते हैं, धनियों और भोगियोंका नहीं ॥ ५५ ॥
सुप्रसन्ना हि ते देवा यत्ते धर्मे रता मतिः ।
धने सुखकला काचिद् धर्मे तु परमं सुखम् ॥ ५६ ॥
राजन्! तुम्हारे ऊपर भी देवता बहुत प्रसन्न हैं, जिससे तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी हुई है ।
धनमें तो सुखका कोई लेशमात्र ही रहता है । परमसुख तो धर्ममें ही है ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि कुण्डधारोपाख्याने एकसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें कुण्डधारका उपाख्यानविषयक दो सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७१ ॥
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द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः यज्ञमें हिंसाकी निन्दा और अहिंसाकी प्रशंसा युधिष्ठिरउवाच
बहूनां यज्ञतपसामेकार्थानां पितामह ।
धर्मार्थं न सुखार्थार्थं कथं यज्ञः समाहितः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! यज्ञ और तप तो बहुत हैं और वे सब एकमात्र भगवत्प्रीतिके लिये किये जा सकते हैं; परंतु उनमेंसे जिस यज्ञका प्रयोजन केवल धर्म हो, स्वर्ग--सुख अथवा धनकी प्राप्ति न हो, उसका सम्पादन कैसे होता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि नारदेनानुकीर्तितम् ।
उञ्छवृत्तेः पुरावृत्तं यज्ञार्थे ब्राह्मणस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! पूर्वकालमें उञ्छवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाले एक ब्राह्मणका यज्ञके सम्बन्धमें जैसा वृत्तान्त है और जिसे नारदजीने मुझसे कहा था, वही प्राचीन इतिहास मैं यहाँ तुम्हें बता रहा हूँ ॥ २ ॥
नारद उवाच
राष्ट्रे धर्मोत्तरे श्रेष्ठे विदर्भेष्वभवद् द्विजः ।
उञ्छवृत्तिर्ऋषिः कश्चिद् यज्ञं यष्टुं समादधे ॥ ३ ॥
नारदजीने कहा — जहाँ धर्मकी ही प्रधानता है, उस उत्तम राष्ट्र विदर्भमें कोई ब्राह्मण ऋषि निवास करता था । वह कटे हुए खेत या खलिहानसे अन्नके बिखरे हुए दानोंको बीन लाता और उसीसे जीवन- निर्वाह करता था । एक बार उसने यज्ञ करनेका निश्चय किया ॥ ३ ॥
श्यामाकमशनं तत्र सूर्यपर्णी सुवर्चला ।
तिक्तं च विरसं शाकं तपसा स्वादुतां गतम् ॥ ४ ॥
जहाँ वह रहता था, वहाँ अन्नके नामपर साँवाँ मिलता था । दाल बनानेके लिये सूर्यपर्णी ( जंगली उड़द ) मिलती थी और शाक- भाजीके लिये सुवर्चला (ब्राह्मी लता ) तथा अन्य प्रकारके तिक्त एवं रसहीन शाक उपलब्ध होते थे; परंतु ब्राह्मणकी तपस्यासे उपर्युक्त सभी वस्तुएँ सुस्वादु हो गयी थीं ॥ ४ ॥
उपगम्य वने सिद्धिं सर्वभूताविहिंसया ।
अपि मूलफलैरिष्टो यज्ञः स्वर्ग्यः परंतप ॥ ५ ॥
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परंतप युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणने वनमें तपस्याद्वारा सिद्धि लाभ करके समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करते हुए मूल और फलोंद्वारा भी स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ५ ॥
तस्य भार्या व्रतकृशा शुचिः पुष्करधारिणी ।
यज्ञपत्नी समानीता सत्येनानुविधीयते ॥ ६ ॥
उस ब्राह्मणके एक पत्नी थी, जिसका नाम था पुष्करधारिणी । उसके आचार- विचार परम पवित्र थे । वह व्रत- उपवास करते - करते दुर्बल हो गयी थी । ब्राह्मणका नाम सत्य था । यद्यपि वह ब्राह्मणी अपने पति सत्यके हिंसाप्रधान यज्ञकी इच्छा प्रकट करनेपर उसके अनुकूल नहीं होती थी, तो भी ब्राह्मण उसे यज्ञपत्नीके स्थानपर आग्रहपूर्वक बुला ही लाता था ॥ ६ ॥
सा तु शापपरित्रस्ता तत्स्वभावानुवर्तिनी ।
मायूरजीर्णपर्णानां वस्त्रं तस्याश्च वर्णितम् ॥ ७ ॥
ब्राह्मणी शापसे डरकर पतिके स्वभावका सर्वथा अनुसरण करती थी । ऐसा कहा जाता है कि वह मोरोंकी टूटकर गिरी पुरानी पाँखोंको जोड़कर उनसे ही अपना शरीर ढँकती थी ॥ ७ ॥
अकामया कृतस्तत्र यज्ञो होत्रनुशासनात् ।
शुक्रस्य पुनराजातिः पर्णादो नाम धर्मवित् ॥ ८ ॥
होताके आदेशसे इच्छा न होनेपर भी ब्राह्मण पत्नीने उस यज्ञका कार्य सम्पन्न किया । होताका कार्य पर्णाद नामसे प्रसिद्ध एक धर्मज्ञ ऋषि करते थे, जो शुक्राचार्यके वंशज थे ॥ ८ ॥
तस्मिन् वने समीपस्थो मृगोऽभूत् सहवासिकः ।
वचोभिरब्रवीत् सत्यं त्वयेदं दुष्कृतं कृतम् ॥ ९ ॥
उस वनमें सत्यका सहवासी एक मृग था, जो वहाँ पास ही रहता था । एक दिन उसने मनुष्यकी बोलीमें सत्यसे कहा – ' ब्राह्मण! तुमने यज्ञके नामपर यह दुष्कर्म किया है ॥ ९ ॥
यदि मन्त्राङ्गहीनोऽयं यज्ञो भवति वै कृतः ।
मां भोः प्रक्षिप होत्रे त्वं गच्छ स्वर्गमनिन्दितः ॥ १० ॥
' यदि किया हुआ यज्ञ मन्त्र और अंगसे हीन हो तो वह यजमानके लिये दुष्कर्म ही है । ब्राह्मणदेव! तुम मुझे होताको सौंप दो और स्वयं निन्दारहित होकर स्वर्गलोकमें जाओ ' ॥ १० ॥
ततस्तु यज्ञे सावित्री साक्षात् तं संन्यमन्त्रयत् ।
निमन्त्रयन्ती प्रत्युक्ता न हन्यां सहवासिनम् ॥ ११ ॥
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तदनन्तर उस यज्ञमें साक्षात् सावित्रीने पधारकर उस ब्राह्मणको मृगकी आहुति देनेकी सलाह दी । ब्राह्मणने यह कहकर कि मैं अपने सहवासी मृगका वध नहीं कर सकता, सावित्रीकी आज्ञा माननेसे इनकार कर दी ॥ ११ ॥
एवमुक्ता निवृत्ता सा प्रविष्टा यज्ञपावकम् ।
किं नु दुश्चरितं यज्ञे दिदृक्षुः सा रसातलम् ॥ १२ ॥
ब्राह्मणसे इस प्रकार कोरा जवाब मिल जानेपर सावित्रीदेवी लौट पड़ीं और यज्ञाग्निमें प्रविष्ट हो गयीं । यज्ञमें कौन- सा दुष्कर्म या त्रुटि है — यही देखनेकी इच्छासे वे आयी थीं और फिर रसातलमें चली गयीं ॥ १२ ॥
स तु बद्धाञ्जलिं सत्यमयाचद्धरिणः पुनः ।
सत्येन स परिष्वज्य संदिष्टो गम्यतामिति ॥ १३ ॥
सत्य सावित्रीदेवीकी ओर हाथ जोड़कर खड़ा था । इतनेहीमें उस हरिणने पुनः अपनी आहुति देनेके लिये याचना की । सत्यने मृगको हृदयसे लगा लिया और बड़े प्यारसे कहा -' तुम यहाँसे चले जाओ ' ॥ १३ ॥
ततः स हरिणो गत्वा पदान्यष्टौ न्यवर्तत ।
साधु हिंसय मां सत्य हतो यास्यामि सद्गतिम् ॥ १४ ॥
तब वह हरिण आठ पग आगे जाकर लौट पड़ा और बोला- ' सत्य! तुम विधिपूर्वक मेरी हिंसा करो । मैं यज्ञमें वधको प्राप्त होकर उत्तम गति पा लूँगा ॥ १४ ॥
पश्य ह्यप्सरसो दिव्य मया दत्तेन चक्षुषा ।
विमानानि विचित्राणि गन्धर्वाणां महात्मनाम् ॥ १५ ॥
' मैंने तुम्हें दिव्यदृष्टि प्रदान की है; उससे देखो, आकाशमें वे दिव्य अप्सराएँ खड़ी हैं । महात्मा गन्धर्वोंके विचित्र विमान भी शोभा पा रहे हैं' ॥ १५ ॥
ततः स सुचिरं दृष्ट्वा स्पृहालग्नेन चक्षुषा ।
मृगमालोक्य हिंसायां स्वर्गवासं समर्थयत् ॥ १६ ॥
सत्यकी आँखें बड़ी चाहसे उधर ही जा लगीं । उसने बड़ी देरतक वह रमणीय दृश्य देखा, फिर मृगकी ओर दृष्टिपात करके 'हिंसा करनेपर ही मुझे स्वर्गवासका सुख मिल सकता है ' यह मन - ही- मन निश्चय किया ॥ १६ ॥
स तु धर्मो मृगो भूत्वा बहुवर्षोषितो वने ।
तस्य निष्कृतिमाधत्त न त्वसौ यज्ञसंविधिः ॥ १७ ॥
वास्तवमें उस मृगके रूपमें साक्षात् धर्म थे, जो मृगका शरीर धारण करके बहुत वर्षोंसे वनमें निवास करते थे । पशुहिंसा यज्ञकी विधिके प्रतिकूल कर्म है। भगवान् धर्मने उस ब्राह्मणका उद्धार करनेका विचार किया ॥ १७ ॥
तस्य तेनानुभावेन मृगहिंसात्मनस्तदा ।
तपो महत्समुच्छिन्नं तस्माद्धिंसा न यज्ञिया ॥। १८ ॥
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मैं उस पशुका वध करके स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा; यह सोचकर मृगकी हिंसा करनेके लिये उद्यत उस ब्राह्मणका महान् तप तत्काल नष्ट हो गया। इसलिये हिंसा यज्ञके लिये हितकर नहीं है ॥ १८ ॥
ततस्तं भगवान् धर्मो यज्ञं याजयतः स्वयम् ।
समाधानं च भार्याया लेभे स तपसा परम् ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर भगवान् धर्मने स्वयं सत्यका यज्ञ कराया । फिर सत्यने तपस्या करके अपनी पत्नी पुष्करधारिणीके मनकी जैसी स्थिति थी, वैसा ही उत्तम समाधान प्राप्त किया ( उसे यह दृढ़ निश्चय हो गया कि हिंसासे बड़ी हानि होती है, अहिंसा ही परम कल्याणका साधन है ) ॥ १ ९ ॥
अहिंसा सकलो धर्मो हिंसाधर्मस्तथाहितः ।
सत्यं तेऽहं प्रवक्ष्यामि यो धर्मः सत्यवादिनाम् ॥ २० ॥
अहिंसा ही सम्पूर्ण धर्म है । हिंसा अधर्म है और अधर्म अहितकारक होता है । अब मैं तुम्हें सत्यका महत्त्व बताऊँगा, जो सत्यवादी पुरुषोंका परम धर्म है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि यज्ञनिन्दानाम द्विसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमेंहिंसात्मक यज्ञकी निन्दा नामक दो सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७२ ॥
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त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः धर्म, अधर्म, वैराग्य और मोक्षके विषयमें युधिष्ठिरके चार प्रश्न और उनका उत्तर युधिष्ठिर उवाच
कथं भवति पापात्मा कथं धर्मं करोति वा ।
केन निर्वेदमादत्ते मोक्षं वा केन गच्छति ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! मनुष्य पापात्मा कैसे हो जाता है? वह धर्मका आचरण किस प्रकार करता है? किस हेतुसे उसे वैराग्य प्राप्त होता है और किस साधनसे वह मोक्ष पाता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
विदिताः सर्वधर्मास्ते स्थित्यर्थं त्वं तु पृच्छसि ।
शृणु मोक्षं सनिर्वेदं पापं धर्मं च मूलतः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! तुम्हें सब धर्मोंका ज्ञान है । तुम तो लोकमर्यादाकी रक्षा तथा मेरी प्रतिष्ठा बढ़ानेके लिये मुझसे प्रश्न कर रहे हो । अच्छा अब तुम मोक्ष, वैराग्य, पाप और धर्मका मूल क्या है, इसको श्रवण करो ॥ २ ॥
विज्ञानार्थं हि पञ्चानामिच्छा पूर्वं प्रवर्तते ।
प्राप्यैकं जायते कामो द्वेषो वा भरतर्षभ ॥ ३ ॥
- भरतश्रेष्ठ! मनुष्यको ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध– इन) पाँचों विषयोंका अनुभव करनेके लिये पहले इच्छा होती है । फिर उन पाँचों विषयोंमेंसे किसी एकको पाकर उसके प्रति राग या द्वेष हो जाता है ॥ ३ ॥
ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते महत् ।
इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च चिकीर्षति ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् जिसके प्रति राग होता है, उसे पानेके लिये वह प्रयत्न करता है । बड़े - बड़े कार्योंका आरम्भ करता है । वह अपने इच्छित रूप और गन्ध आदिका बारंबार सेवन करना चाहता है ॥ ४ ॥
ततो रागः प्रभवति द्वेषश्च तदनन्तरम् ।
ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ॥५ ॥
इससे उन विषयोंके प्रति उसके मनमें राग उत्पन्न हो जाता है । तदनन्तर प्रतिकूल विषयसे द्वेष होता है । फिर अनुकूल विषयके लिये लोभ होता है और लोभके बाद उसके मनपर मोह अधिकार जमा लेता है ॥ ५ ॥