05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1781–1790

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1781–1790

पृष्ठ 1781

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तेषामष्टादशो देही यः शरीरे स शाश्वतः ॥ २८ ॥

अथवा सशरीरास्ते गुणाः सर्वे शरीरिणाम् ।

संश्रितास्तद् वियोगे हि सशरीरा न सन्ति ते ॥ २ ९ ॥

पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, चित्त, मन, बुद्धि, प्राण तथा सात्त्विक आदि तीन भाव - ये सत्रह गुण माने गये हैं । इनका अधिष्ठाता देहाभिमानी जीवात्मा अठारहवाँ है, जो इस शरीरके भीतर निवास करता है । उसे सनातन माना गया है । अथवा शरीरसहित वे सभी गुण देहधारियोंके आश्रित रहते हैं । जब जीवका वियोग हो जाता है, तब शरीर और उसमें रहनेवाले वे तत्त्व भी नहीं रह जाते ॥ २८-२९ ॥

अथवा संनिपातोऽयं शरीरं पाञ्चभौतिकम् ।

एकश्च दश चाष्टौ च गुणाः सह शरीरिणा ॥ ३० ॥

अथवा इन सबका समुदाय ही पाञ्चभौतिक शरीर है। एक महत्तत्त्व और जीवसहित पूर्वोक्त अठारह गुण – ये सभी इस समुदायके अन्तर्गत हैं ॥ ३० ॥

ऊष्मणा सह विंशो वा संघातः पाञ्चभौतिकः ।

महान् संधारयत्येतच्छरीरं वायुना सह ॥ ३१ ॥

जठरानलके साथ - साथ उक्त तत्त्वोंकी गणना करनेपर यह पाञ्चभौतिक संघात बीस तत्त्वोंका समूह है। महत्तत्त्व प्राणवायुके साथ इस शरीरको धारण करता है । यह वायु शरीरका भेदन करनेमें प्रभावशाली महत्तत्त्वका उपकरणमात्र है ॥ ३१ ॥

तस्य प्रभावयुक्तस्य निमित्तं देहभेदने ।

यथैवोत्पद्यते किंचित् पञ्चत्वं गच्छते तथा ॥ ३२ ॥

पुण्यपापविनाशान्ते पुण्यपापसमीरितः ।

देहं विशति कालेन ततोऽयं कर्मसम्भवम् ॥ ३३ ॥

जैसे इस जगत्में घट आदि कोई वस्तु उत्पन्न होती और फिर नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार प्रारब्ध, पुण्य और पापका क्षय होनेपर शरीर पञ्चत्वको प्राप्त हो जाता है तथा संचित पुण्य और पापसे प्रेरित हो जीव समयानुसार कर्मजनित दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है ॥

हित्वा हित्वा ह्ययं प्रैति देहाद् देहं कृताश्रयः ।

कालसंचोदितः क्षेत्री विशीर्णाद् वा गृहाद् गृहम् ॥ ३४ ॥

जिस प्रकार घरमें रहनेवाला पुरुष एक घरके गिरनेपर दूसरेमें और दूसरेके गिरनेपर तीसरेमें चला जाता है, उसी प्रकार कालसे प्रेरित हुआ जीव क्रमशः एक- एक शरीरको छोड़कर पूर्वसंकल्पके द्वारा निर्मित दूसरे दूसरे शरीरमें जाता है ॥ ३४ ॥

तत्र नैवानुतप्यन्ते प्राज्ञा निश्चितनिश्चयाः ।

कृपणास्त्वनुतप्यन्ते जनाः सम्बन्धदर्शिनः ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 1782

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विद्वान् पुरुष यह निश्चितरूपसे जानते हैं कि आत्मा शरीरसे सर्वथा भिन्न, असंग और अविनाशी है, अतः शरीरका वियोग होनेपर उन्हें तनिक भी संताप नहीं होता; परंतु अज्ञानीजन देहसे अपना सम्बन्ध मानते हैं; इसलिये देह छूटनेसे उन्हें बड़ा दुःख होता ॥ ३५ ॥

न ह्ययं कस्यचित् कश्चिन्नास्य कश्चन विद्यते ।

भवत्येको ह्ययं नित्यं शरीरे सुखदुःखभाक् ॥ ३६ ॥

यह जीव वास्तवमें किसीका कोई नहीं है और न कोई दूसरा ही उसका कुछ है । वास्तवमें यह तो सदा अकेला ही है । परंतु शरीरमें रहकर उसे अपना माननेके कारण ही यह सुख- दुःखका भागी होता है ॥ ३६ ॥

नैव संजायते जन्तुर्न च जातु विपद्यते ।

याति देहमयं मुक्त्वा कदाचित्परमां गतिम् ॥ ३७ ॥

जीव न कभी उत्पन्न होता है, न मरता है । जब कभी इसे तत्त्वज्ञान होता है, तब यह शरीर — अभिमान छोड़कर परमगतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ३७ ॥

पुण्यपापमयं देहं क्षपयन् कर्मसंक्षयात् ।

क्षीणदेहः पुनर्देही ब्रह्मत्वमुपगच्छति ॥ ३८ ॥

यह शरीर पुण्य- पापमय है । देहधारी जीव प्रारब्ध कर्मोंके क्षयके साथ - साथ इस शरीरको क्षीण करता रहता है । इस प्रकार शरीरका नाश हो जानेपर वह मुक्त पुरुष ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ३८ ॥

पुण्यपापक्षयार्थं हि सांख्यज्ञानं विधीयते ।

तत्क्षये ह्यस्य पश्यन्ति ब्रह्मभावे परां गतिम् ॥ ३ ९ ॥

पुण्य और पापोंके क्षयके लिये ही ज्ञानयोगको साधन बताया गया है । उनका क्षय हो जानेपर जब जीवात्माको ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है, तब विद्वान्लोग उसकी परमगति मानते हैं ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारदासितसंवादे पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारद और असितदेवलका संवादविषयक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २७५ ॥

पृष्ठ 1783

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षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद युधिष्ठिर उवाच

भ्रातरः पितरः पौत्रा ज्ञातयः सुहृदः सुताः ।

अर्थहेतोर्हताः क्रूरैरस्माभिः पापकर्मभिः ॥ १ ॥

यमर्थोद्भवा तृष्णा कथमेतां पितामह निवर्तयेयं पापानि तृष्णया कारिता वयम् ॥ २ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! हमलोग बड़े पापी और क्रूर हैं । हमने धनके लिये ही भाई, पिता, पौत्र, कुटुम्बीजन, सुहृद् और पुत्र– इन सबका संहार कर डाला । यह जो धनजनित तृष्णा है, इसीने हमसे बड़े - बड़े पाप करवाये हैं । हम इस तृष्णाको किस तरह दूर करें? ॥ १-२ ॥ भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

गीतं विदेहराजेन माण्डव्यायानुपृच्छते ॥ ३ ॥

भीष्मजी बोले – राजन्! एक बार माण्डव्य मुनिने विदेहराज जनकसे ऐसा ही प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें विदेहराजने जो उद्गार प्रकट किया था, उसी प्राचीन इतिहासको विज्ञ पुरुष ऐसे अवसरोंपर उदाहरणके तौरपर दुहराया करते हैं ॥ ३ ॥

सुसुखं बत जीवामि यस्य मे नास्ति किंचन ।

मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन ॥ ४ ॥

राजा जनकने कहा था कि मैं बड़े सुखसे जीवन व्यतीत करता हूँ; क्योंकि इस जगत्की कोई भी वस्तु मेरी नहीं है । किसीपर भी मेरा ममत्व नहीं है । यदि सारी मिथिलामें आग लग जाय तो भी मेरा कुछ नहीं जलता है ॥ ४ ॥

अर्थाः खलु समृद्धा हि बाढं दुःखं विजानताम् ।

असमृद्धास्त्वपि सदा मोहयन्त्यविचक्षणान् ॥ ५ ॥

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।

तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ ६ ॥

जो विवेकी हैं, उन्हें बड़े समृद्धिसम्पन्न विषय भी दुःखरूप ही जान पड़ते हैं । परंतु अज्ञानियोंको तुच्छ विषय भी सदा मोहमें डाले रहते हैं । लोकमें जो कामजनित सुख है तथा

पृष्ठ 1784

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जो स्वर्गका दिव्य एवं महान् सुख है, वे दोनों तृष्णाक्षयसे होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाकी भी तुला पानेके योग्य नहीं हैं ॥ ५-६ ॥

यथैव शृङ्गं गोः काले वर्धमानस्य वर्धते ।

तथैव तृष्णा वित्तेन वर्धमानेन वर्धते ॥ ७ ॥

जिस प्रकार समयानुसार बड़े होते हुए बछड़ेका सींग भी उसके शरीरके साथ ही बढ़ता है, उसी प्रकार बढ़ते हुए धनके साथ उसकी तृष्णा भी बढ़ती जाती है ॥ ७ ॥

किंचिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम् ।

तदेव परितापाय नाशे सम्पद्यते पुनः ॥ ८ ॥

कोई भी वस्तु क्यों न हो, जब उसके प्रति ममता कर ली जाती है- वह वस्तु अपनी मान ली जाती है, तब नष्ट होनेपर वही संतापका कारण बन जाती है ॥

न कामाननुरुद्ध्येत दुःखं कामेषु वै रतिः ।

प्राप्यार्थमुपयुञ्जीत धर्मं कामान् विसर्जयेत् ॥ ९ ॥

इसलिये कामनाओं या भोगोंकी वृद्धिके लिये आग्रह नहीं रखना चाहिये । भोगोंमें जो आसक्ति होती है, वह दुःखरूप ही है । धन पाकर भी उसे धर्ममें ही लगा देना चाहिये । काम- भोगोंको तो सर्वथा त्याग ही देना चाहिये ॥ ९ ॥

विद्वान् सर्वेषु भूतेषु आत्मना सोपमो भवेत् ।

कृतकृत्यो विशुद्धात्मा सर्वं त्यजति चैव ह ॥ १० ॥

विद्वान् पुरुष सभी प्राणियोंके प्रति अपने समान ही भाव रखे। इससे वह कृतकृत्य और शुद्धचित्त होकर समस्त दोषोंको त्याग देता है ॥ १० ॥

उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ प्रियाप्रिये ।

भयाभयं च संत्यज्य स प्रशान्तो निरामयः ॥ ११ ॥

वह सत्य- असत्य, हर्ष- शोक, प्रिय- अप्रिय तथा भय- अभय आदि सभी द्वन्द्वोंको त्यागकर अत्यन्त शान्त और निर्विकार हो जाता है ॥ ११ ॥

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।

योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ १२ ॥

खोटी बुद्धिवाले मूढ़ पुरुषोंके लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो शरीरके जराजीर्ण हो जानेपर भी स्वयं जीर्ण न होकर नयी नवेली ही बनी रहती है तथा जिसे प्राणान्तकालतक रहनेवाला रोग माना गया है, उस तृष्णाको जो त्याग देता है, उसीको परम सुख मिलता है ॥ १२ ॥

चारित्रमात्मनः पश्यंश्चन्द्रशुद्धमनामयम् ।

धर्मात्मा लभते कीर्तिं प्रेत्य चेह यथासुखम् ॥ १३ ॥

जो अपने सदाचारको चन्द्रमाके समान विशुद्ध, उज्ज्वल एवं निर्विकार देखता है, वह धर्मात्मा पुरुष इहलोक और परलोकमें कीर्ति एवं उत्तम सुख पाता है ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1785

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राज्ञस्तद् वचनं श्रुत्वा प्रीतिमानभवद् द्विजः ।

पूजयित्वा च तद् वाक्यं माण्डव्यो मोक्षमाश्रितः ॥ १४ ॥

राजाके ये वचन सुनकर ब्रह्मर्षि माण्डव्य बड़े प्रसन्न हुए । उनके कथनकी प्रशंसा करके मुनिने मोक्षमार्गका आश्रय लिया ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि माण्डव्यजनकसंवादे षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें माण्डव्य और जनकका संवादविषयक दोसौछिहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २७६ ॥

Fara Pac

पृष्ठ 1786

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सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश - पिता - पुत्रका संवाद युधिष्ठिरउवाच

अतिक्रामति कालेऽस्मिन् सर्वभूतभयावहे ।

किं श्रेयः प्रतिपद्येत तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! सम्पूर्ण प्राणियोंको भय देनेवाला यह काल धीरे - धीरे बीता जा रहा है । ( कौन कबतक जीवित रहेगा, इसका कुछ निश्चय नहीं है । ) ऐसी दशामें मनुष्य किस कार्यको अपने लिये कल्याणकारी समझे, यह मुझे बताइये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

पितुः पुत्रेण संवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष पिता - पुत्र -संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, उसे सुनो ॥ २ ॥

द्विजातेः कस्यचित् पार्थ स्वाध्यायनिरतस्य वै ।

पुत्रो बभूव मेधावी मेधावी नाम नामतः ॥ ३ ॥

कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालमें किसी स्वाध्यायपरायण ब्राह्मणके एक बड़ा मेधावी पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ' मेधावी' ही था ॥ ३ ॥

सोऽब्रवीत् पितरं पुत्रः स्वाध्यायकरणे रतम् ।

मोक्षधर्मेष्वकुशलं मोक्षधर्मविचक्षणः ॥ ४ ॥

उसके पिता सदा स्वाध्यायमें ही तत्पर रहते थे, किंतु मोक्षधर्ममें इतने निपुण नहीं थे । पुत्र मोक्षधर्मके ज्ञानमें कुशल था; अतः उसने अपने पितासे पूछा ॥ ४ ॥

पुत्र उवाच धीरः किंस्वित् तात कुर्यात् प्रजानन् क्षिप्रं ह्यायुर्भ्रश्यते मानवानाम् । पितस्तथाऽऽख्याहि यथार्थयोगं ममानुपूर्व्या येन धर्मं चरेयम् ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1787

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1787 का मूल पृष्ठ
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पुत्र बोला - तात! मनुष्योंकी आयु तीव्रगतिसे बीती जा रही है । इस बातको अच्छी तरह जाननेवाला धीर पुरुष किस धर्मका अनुष्ठान करे? पिताजी! यह सब क्रमशः और यथार्थरूपसे आप मुझे बताइये, जिससे मैं भी उस धर्मका आचरण कर सकूँ ॥ ५ ॥

पितोवाच अधीत्य वेदान् ब्रह्मचर्येषु पुत्र पुत्रानिच्छेत् पावनाय पितॄणाम् । अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत् ॥ ६ ॥

पिताने कहा- बेटा! द्विजको चाहिये कि वह पहले ब्रह्मचर्य आश्रममें रहकर वेदोंका अध्ययन कर ले, फिर पितरोंका उद्धार करनेके लिये गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करके पुत्रोत्पादनकी इच्छा करे । वहाँ विधिपूर्वक अग्नियोंकी स्थापना करके उनमें विधिवत् अग्निहोत्र करे । इस प्रकार यज्ञकर्मका सम्पादन करके वानप्रस्थ - आश्रममें प्रविष्ट हो मुनिवृत्तिसे रहनेकी इच्छा करे ॥ ६ ॥

पुत्रउवाच

एवमभ्याहते लोके सर्वतः परिवारिते ।

अमोघासु पतन्तीषु किं धीर इव भाषसे ॥ ७ ॥

पुत्रने पूछा – पिताजी! यह लोक तो किसीके द्वारा अत्यन्त ताड़ित और सब ओरसे घिरा हुआ जान पड़ता है । यहाँ ये अमोघ वस्तुएँ निरन्तर हमलोगोंपर टूटी पड़ती हैं । ऐसी दशामें आप धीर पुरुषके समान कैसे बातचीत कर रहे हैं? ॥ ७ ॥

पितोवाच

कथमभ्याहतो लोकः केन वा परिवारितः ।

अमोघाः काः पतन्तीह किं नु भीषयसीव माम् ॥ ८ ॥

पिता बोले - पुत्र! तुम मुझे डरानेकी चेष्टा क्यों करते हो? भला, यह लोक कैसे ताड़ित होता है अथवा किसने इसे घेर रखा है? और यहाँ कौन - सी अमोघ वस्तुएँ हमपर टूटी पड़ती हैं? ॥ ८ ॥

पुत्रउवाच

मृत्युनाभ्याहतो लोको जरया परिवारितः ।

अहोरात्राः पतन्तीमे तच्च कस्मान्न बुद्ध्यसे ॥ ९ ॥

पुत्र बोला — पिताजी! देखिये, मृत्यु सारे जगत्‌को पीट रही है । बुढ़ापेने इसे घेर लिया है । ये दिन और रात्रियाँ हमपर टूटी पड़ती हैं । इस बातको आप समझ क्यों नहीं रहे हैं? ॥ ९ ॥

पृष्ठ 1788

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1788 का मूल पृष्ठ
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यदाहमेव जानामि न मृत्युस्तिष्ठतीति ह ।

सोऽहं कथं प्रतीक्षिष्ये ज्ञानेनापिहितश्चरन् ॥ १० ॥

जब मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि मौत मेरे कहनेसे क्षणभर भी रुक नहीं सकती और मैं ज्ञानरूपी कवचसे अपनेको बिना ढके हुए ही विचर रहा हूँ, तब यह समझकर भी मैं अपने कल्याणसाधनमें एक क्षणकी भी प्रतीक्षा कैसे करूँगा? ॥ १० ॥

रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं यदा ।

गाधोदके मत्स्य इव सुखं विन्देत कस्तदा ॥ ११ ॥

जब प्रत्येक रात बीतनेके बाद आयु क्षीण होकर कुछ- न- कुछ थोड़ी होती चली जा रही है, तब छिछले पानीमें रहनेवाली मछलीके समान कौन सुख पा सकता है? ॥ ११ ॥

पुष्पाणीव विचिन्वन्तमन्यत्र गतमानसम् ।

अनवाप्तेषु कामेषु मृत्युरभ्येति मानवम् ॥ १२ ॥

जैसे मनुष्य वनमें फूल चुन रहा हो, उसी बीचमें कोई हिंसक जीव उसपर आक्रमण कर दे; उसी प्रकार जब मनुष्यका मन दूसरी ओर ( विषयभोगोंमें) लगा होता है, उसी समय उसकी इच्छा पूर्ण होनेके पहले ही सहसा मौत आकर उसे दबोच लेती है ॥ १२ ॥

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्निकम् ।

न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम् ॥ १३ ॥

इसलिये जिस कामको कल करना हो, उसे आज ही कर ले । जिसे अपराह्णमें करना हो, उसे पूर्वाह्णमें ही कर डाले; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसका काम पूरा हो गया या नहीं ॥ १३ ॥

अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगान्महान् ।

को हि जानाति कस्याद्य मृत्युकालो भविष्यति ॥ १४ ॥

जो कल्याणकारी कार्य है, उसे आप आज ही कर डालिये । यह महान् काल आपको लाँघ न जाय; क्योंकि कौन जानता है कि आज किसकी मृत्युकी घड़ी आ पहुँचेगी ॥ १४ ॥

अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ।

युवैव धर्मशीलः स्यादनिमित्तं हि जीवितम् ॥ १५ ॥

सारे काम अधूरे ही रह जाते हैं और मौत अपनी ओर खींच लेती है, इसलिये युवावस्थामें ही मनुष्यको धर्मका आचरण करना चाहिये, क्योंकि जीवनका कुछ ठिकाना नहीं है ॥ १५ ॥

कृते धर्मे भवेत् प्रीतिरिह प्रेत्य च शाश्वती ।

मोहेन हि समाविष्टः पुत्रदारार्थमुद्यतः ॥ १६ ॥

कृत्वा कार्यमकार्यं वा तुष्टिमेषां प्रयच्छति ।

तं पुत्रपशुसम्पन्नं व्यासक्तमनसं नरम् ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1789

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सुप्तं व्याघ्रं महौघो वा मृत्युरादाय गच्छति । धर्माचरण करनेसे इस लोकमें प्रसन्नता प्राप्त होती है और मृत्युके पश्चात् परलोकमें अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है । जिसपर मोहका आवेश होता है, वही स्त्री - पुत्रोंके लिये तरह - तरहके काम- धंधोंकी खटपटमें लगा रहता है । वह करने और न करने योग्य काम करके भी इन सबको संतोष देता है । पुत्रों और पशुओंसे सम्पन्न हो जब मनुष्यका मन उन्हींमें आसक्त रहता है, उसी समय जैसे नदीका महान् जलप्रवाह अपने तटपर सोये हुए व्याघ्रको बहा ले जाता है, उसी प्रकार मृत्यु उस मनुष्यको लेकर चल देती है ॥ १६-१७ || संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् ॥ १८ ॥

वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति । वह भोग - सामग्रियोंका संयम करता और कामनाओंसे अतृप्त ही रहता है । तभी मृत्यु आकर उसे उसी तरह उठा ले जाती है, जैसे बाघिन भेड़के पास पहुँचकर उसे दबोच लेती है ॥ १८३ ॥

इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत् कृताकृतम् ॥ १ ९ ॥ एवमीहासमायुक्तं मृत्युरादाय गच्छति । मनुष्य सोचता है कि यह काम तो मैंने कर लिया, इस कामको अभी करना है और यह दूसरा कार्य कुछ हदतक हो गया है और शेष बाकी पड़ा है । इस प्रकार मनसूबे बाँधनेमें लगे हुए उस मनुष्यको मौत लेकर चल देती है ॥ १ ९ ३ ॥ कृतानां फलमप्राप्तं कार्याणां कर्मसङ्गिनाम् ॥ २० ॥

क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादाय गच्छति । वह अपने खेत, दूकान और घरके ही चक्करमें पड़ा रहता है । उनके लिये तरह - तरहके कर्मोंमें फँसता है; परंतु उनका फल मिलने भी नहीं पाता कि मौत उसको इस संसारसे उठा ले जाती है ॥ २० ॥

दुर्बलं बलवन्तं च प्राज्ञं शूरं जडं कविम् ॥ २१ ॥

अप्राप्तसर्वकामार्थं मृत्युरादाय गच्छति । मनुष्य दुर्बल हो या बलवान्, बुद्धिमान् हो या शूरवीर अथवा मूर्ख हो या विद्वान्– मृत्यु उसकी समस्त कामनाओंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसे उठा ले जाती है ॥ २१३ ॥

मृत्युर्जरा च व्याधिश्च दुःखं चानेककारणम् ॥ २२ ॥

असंत्याज्यं यदा मर्त्यैः किं स्वस्थ इव तिष्ठसि । पिताजी! जब इस शरीरमें मृत्यु, जरा, व्याधि और अनेक कारणोंसे होनेवाले दुःखोंका ताँता बँधा ही रहता है और मनुष्य किसी प्रकार भी उनसे अपना पिण्ड नहीं छुड़ा सकते, तब ऐसी दशामें आप निश्चिन्त - से क्यों बैठे हैं? ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1790

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जातमेवान्तकोऽन्ताय जरा चाभ्येति देहिनम् ॥ २३ ॥

अनुषक्ता द्वयेनैते भावाः स्थावरजङ्गमाः । मनुष्यके जन्म लेते ही उसका अन्त कर डालनेके लिये अन्तक ( यमराज ) उसके पीछे लग जाता है और बुढ़ापा भी देहधारीके पास आता ही है । समस्त चराचर पदार्थ इन दोनोंसे बँधे हुए हैं ॥ २३३ ॥

न मृत्युसेनामायान्तीं जातु कश्चित् प्रबाधते ॥ २४ ॥

बलात् सत्यमृते त्वेकं सत्ये ह्यमृतमाश्रितम् । एकमात्र सत्यके बिना कोई भी मनुष्य कभी सामने आती हुई मृत्युकी सेनाको

बलपूर्वक नहीं दबा सकता ( अतः असत्यको त्यागकर सत्यका ही आश्रय लेना चाहिये ) ।

क्योंकि सत्यमें ही अमृत (ब्रह्म) प्रतिष्ठित है ॥

मृत्योर्वा गृहमेतद् वै या ग्रामे वसतो रतिः ॥ २५ ॥

देवानामेष वै गोष्ठो यदरण्यमिति श्रुतिः । गाँव या नगरमें रहकर स्त्री- पुत्रोंमें आसक्ति रखना- यह मृत्युका घर ही है । ‘ यदरण्यम्’ इस श्रुतिके अनुसार जो वानप्रस्थ आश्रम है, यह देवताओंकी गोशालाके समान है ॥ २५१३ || निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः ॥ २६ ॥

छित्त्वैनां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः । गाँवोंमें रहकर विषय- भोगोंमें आसक्त होना- यह जीवको बाँधनेवाली रस्सीके समान है । केवल पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं । पापी पुरुष इसे नहीं काट सकते ॥ २६३ ॥

यो न हिंसति सत्त्वानि मनोवाक्कर्महेतुभिः ॥ २७ ॥

जीवितार्थापनयनैः प्राणिभिर्न स बद्ध्यते । जो मन, वाणी, क्रिया तथा अन्य कारणोंद्वारा किसी भी प्राणीकी जीविकाका अपहरण करके उसकी हिंसा नहीं करता, उसको दूसरे प्राणी भी वध या बन्धनके कष्टमें नहीं डालते ॥ २७ ॥

तस्मात् सत्यव्रताचारः सत्यव्रतपरायणः ॥ २८ ॥

सत्यकामः समो दान्तः सत्येनैवान्तकं जयेत् । अतः मनुष्यको सत्यव्रतका आचरण करना चाहिये । सत्यरूपी व्रतके पालनमें तत्पर रहना चाहिये । वह सत्यकी कामना करे । सबके प्रति समान भाव रखे । जितेन्द्रिय बने और सत्यके द्वारा ही मृत्युपर विजय प्राप्त करे ॥ २८३ ॥

अमृतं चैव मृत्युश्च द्वयं देहे प्रतिष्ठितम् ॥ २ ९ ॥ मृत्युरापद्यते मोहात् सत्येनापद्यतेऽमृतम् ।