श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1791–1800
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1791–1800
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अमृत और मृत्यु — ये दोनों इस शरीरमें ही विद्यमान हैं । मोहसे मृत्यु प्राप्त होती है और सत्यसे अमृतपदकी उपलब्धि होती है ॥ २ ९ ३ ॥ सोऽहं सत्यमहिसार्थी कामक्रोधबहिष्कृतः ॥ ३० ॥
समाश्रित्य सुखं क्षेमी मृत्युं हास्याम्यमृत्युवत् । अतः अब मैं काम और क्रोधको त्यागकर अहिंसाधर्मके पालनकी इच्छा करूँगा । सत्यका आश्रय लेकर कल्याणका भागी बनूँगा और अमरकी भाँति मृत्युको दूर हटा दूँगा ॥ ३०३ ॥
शान्तियज्ञरतो दान्तो ब्रह्मयज्ञे स्थितो मुनिः ॥ ३१ ॥
वाङ्मनःकर्मयज्ञश्च भविष्याम्युदगायने । सूर्यके उत्तरायण होनेपर शान्तिमय यज्ञमें तत्पर, जितेन्द्रिय, ब्रह्मयज्ञपरायण एवं मननशील होकर मैं जप- स्वाध्यायरूप वाग्यज्ञ, ध्यानरूप मनोयज्ञ और शास्त्रविहित कर्मोंका निष्कामभावसे आचरणरूप कर्मयज्ञका अनुष्ठान करूँगा ॥ ३१३ ॥
पशुयज्ञैः कथं हिंस्रैर्मादृशो यष्टुमर्हति ॥ ३२ ॥
अन्तवद्भिरुत प्राज्ञः क्षत्रयज्ञैः पिशाचवत् । मेरे- जैसा ज्ञानवान् पुरुष हिंसाप्रधान पशुयज्ञोंद्वारा कैसे यजन कर सकता है? अथवा पिशाचके समान विनाशशील क्षत्रिय - यज्ञोंके अनुष्ठानमें कैसे प्रवृत्त हो सकता है ॥ ३२३ || आत्मन्येवात्मना जात आत्मनिष्ठोऽप्रजः पितः ॥ ३३ ॥
आत्मयज्ञो भविष्यामि न मां तारयति प्रजा । पिताजी! मैं आत्मासे अपने आपमें ही उत्पन्न हुआ हूँ । अपने आपमें ही स्थित हूँ । मेरे कोई संतान नहीं है । मैं आत्मयज्ञका ही यजमान होऊँगा । मुझे संतान नहीं तार सकती है ॥ ३३३ ॥
यस्य वाङ्मनसी स्यातां सम्यक् प्रणिहिते सदा ॥ ३४ ॥
तपस्यागश्च योगश्च स तैः सर्वमवाप्नुयात् । जिसकी वाणी और मन सदा एकाग्र रहते हैं तथा जिसमें तप, त्याग और योग— तीनोंका समावेश है, वह उनके द्वारा सब कुछ पा लेता है ॥ ३४३ ॥
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति विद्यासमं फलम् ॥ ३५ ॥
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥ ३६ ॥
संसारमें ब्रह्मविद्याके समान कोई नेत्र नहीं है, ब्रह्मविद्याके समान कोई फल नहीं है, रागके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके समान कोई सुख नहीं है ॥ नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च ।
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शीले स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥ ३७ ॥
ब्रह्ममें एकीभाव, समता, सत्यपरायणता, सदाचार-निष्ठा, दण्डका त्याग ( अहिंसा ), सरलता तथा सब प्रकारके सकाम कर्मोंसे निवृत्ति– इनके समान ब्राह्मणका दूसरा कोई धर्म नहीं है ॥ ३७ ॥
किं ते धनैर्बान्धवैर्वापि किं ते किं ते दारैर्ब्राह्मण यो मरिष्यसि । आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं पितामहास्ते क्व गताः पिता च ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणदेव ( पिताजी )! जब एक दिन आपको मरना ही है, तब इन धन - वैभव, बन्धु-बान्धव तथा स्त्री - पुत्रोंसे क्या प्रयोजन है? अपनी हृदयगुहामें विराजमान आत्माकी खोज कीजिये । सोचिये तो सही, आज आपके पिताजी कहाँ हैं, दादा - बाबा कहाँ चले गये ॥ ३८ ॥
भीष्म उवाच
पुत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा तथाकार्षीत् पिता नृप ।
तथा त्वमपि वर्तस्व सत्यधर्मपरायणः ॥ ३ ९ ॥
भीष्मजी कहते हैं— नरेश्वर! पुत्रका यह वचन सुनकर उसके पिताने सब कुछ उसके कथनानुसार किया । उसी प्रकार तुम भी सत्य और धर्ममें तत्पर होकर उसी प्रकार आचरण करो ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पितापुत्रसंवादे सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पिता और पुत्रका संवादविषयक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७७ ॥
Papa
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अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः हारीत मुनिके द्वारा प्रतिपादित संन्यासीके स्वभाव, आचरण और धर्मोका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपरायणः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! प्रकृतिसे परे जो परब्रह्मका अविनाशी परमधाम है, उसे कैसे स्वभाव, किस तरहके आचरण, कैसी विद्या और किन कर्मोंमें तत्पर रहनेवाला पुरुष प्राप्त कर सकता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
प्राप्नोति परमं स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! जो पुरुष मोक्षधर्मोंमें तत्पर, मिताहारी और जितेन्द्रिय होता है, वह उस प्रकृतिसे परे परब्रह्म परमात्माका जो अविनाशी परमधाम है, उसे प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
(अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । हारीतेन पुरा गीतं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ ) युधिष्ठिर! पूर्वकालमें हारीत मुनिने जो ज्ञानका उपदेश किया है, इस विषयमें विज्ञ पुरुष उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, उसे सुनो ॥
स्वगृहादभिनिस्सृत्य लाभेऽलाभे समो मुनिः ।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ ३ ॥
मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि लाभ और हानिमें समान भाव रखकर मुनिवृत्तिसे रहे और भोगोंके उपस्थित होनेपर भी उनकी आकांक्षासे रहित हो अपने घरसे निकलकर संन्यास ग्रहण कर ले ॥ ३ ॥
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेदपि ।
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूषणं व्याहरेत् क्वचित् ॥ ४ ॥
न नेत्रसे, न मनसे और न वाणीसे ही वह दूसरेके दोष देखे, सोचे या कहे । किसीके सामने या परोक्षमें पराये दोषकी चर्चा कहीं न करे ॥ ४ ॥
न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् ।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ५ ॥
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समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करे - किसीको भी पीड़ा न दे । सबके प्रति मित्रभाव रखकर विचरता रहे । इस नश्वर जीवनको लेकर किसीके साथ शत्रुता न करे ॥ ५ ॥
अतिवादांस्तितिक्षेत नाभिमन्येत कंचन ।
क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ॥ ६ ॥
यदि कोई अपने प्रति अमर्यादित बात कहे– निन्दा या कटुवचन सुनाये तो उसके उन वचनोंको चुपचाप सह ले । किसीके प्रति अहंकार या घमंड न प्रकट करे । कोई क्रोध करे तो भी उससे प्रिय वचन ही बोले । यदि कोई गाली दे तो भी उसके प्रति हितकर वचन ही मुँहसे निकाले ॥
प्रदक्षिणं च सव्यं च ग्राममध्ये च नाचरेत् ।
भैक्षचर्यामनापन्नो न गच्छेत् पूर्वकेतितः ॥ ७ ॥
गाँव या जनसमुदायमें दायें-बायें न करे - किसीकी पक्ष- विपक्ष न करे तथा भिक्षावृत्तिको छोड़कर किसीके यहाँ पहलेसे निमन्त्रित होकर भोजनके लिये न जाय ॥
अवकीर्णः सुगुप्तश्च न वाचा ह्यप्रियं वदेत् ।
मृदुः स्यादप्रतिक्रूरो विस्रब्धः स्यादकत्थनः ॥ ८ ॥
कोई अपने ऊपर धूल या कीचड़ फेंके तो मुमुक्षु पुरुष उससे आत्मरक्षामात्र करे । बदलेमें स्वयं भी वैसा ही न करे और न मुँहसे कोई अप्रिय वचन ही निकाले । सर्वदा मृदुताका बर्ताव करे । किसीके प्रति कठोरता न करे । निश्चिन्त रहे और बहुत बढ़ - बढ़कर बातें न बनाये ॥
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
अतीतपात्रसंचारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः ॥ ९ ॥
जब रसोईघरसे धूआँ निकलना बंद हो जाय, अनाज- मसाला कूटनेके लिये उठाया हुआ मूसल अलग रख दिया जाय, चूल्हेकी आग ठंडी पड़ जाय, घरके लोग भोजन कर चुके हों और बर्तनोंका संचार - रसोई परोसी हुई थालीका इधर- उधर ले जाया जाना बंद हो जाय, उस समय संन्यासी मुनिको भिक्षा प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये ॥ ९ ॥
प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रालाभेष्वनादृतः ।
अलाभे न विहन्येत लाभश्चैनं न हर्षयेत् ॥ १० ॥
उसे केवल अपनी प्राणयात्राके निर्वाहमात्रका यत्न करना चाहिये । भर पेट भोजन मिल जाय, इसकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये । यदि भिक्षा न मिले तो उससे मनमें पीड़ाका अनुभव न करे और मिल जाय तो उसके कारण वह हर्षित न हो ॥ १० ॥
लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः ।
अभिपूजितलाभं हि जुगुप्सेतैव तादृशः ॥ ११ ॥
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साधारण ( लौकिक ) लाभकी इच्छा न करे । जहाँ विशेष आदर एवं पूजा होती हो, वहाँ भोजन न करे । मुमुक्षु पुरुषको आदर- सत्कारके लाभकी तो निन्दा करनी चाहिये ॥ ११ ॥
न चान्नदोषान् निन्देत न गुणानभिपूजयेत् ।
शय्यासने विविक्ते च नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥ १२ ॥
भिक्षामें मिले हुए अन्नके दोष बताकर उनकी निन्दा न करे और न उसके गुण बताकर उन गुणोंकी प्रशंसा ही करे । सोने और बैठनेके लिये सदा एकान्तका ही आदर करे ॥ १२ ॥
शून्यागारं वृक्षमूलमरण्यमथवा गुहाम् ।
अज्ञातचर्यां गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ॥ १३ ॥
सूने घर, वृक्षकी जड़, जंगल अथवा पर्वतकी गुफामें अथवा अन्य किसी गुप्त स्थानमें अज्ञातभावसे रहकर आत्मचिन्तनमें ही लगा रहे ॥ १३ ॥
अनुरोधविरोधाभ्यां समः स्यादचलो ध्रुवः ।
सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणा ॥ १४ ॥
लोगोंके अनुरोध या विरोध करनेपर भी सदा समभावसे रहे, निश्चल एवं स्थिरचित्त हो जाय तथा अपने कर्मोंद्वारा पुण्य एवं पापका अनुसरण न करे ॥ १४ ॥
नित्यतृप्तः सुसंतुष्टः प्रसन्नवदनेन्द्रियः ।
विभीर्जप्यपरो मौनी वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ १५ ॥
सर्वदा तृप्त और संतुष्ट रहे । मुख और इन्द्रियोंको प्रसन्न रखे । भयको पास न आने दे । प्रणव आदिका जप करता रहे तथा वैराग्यका आश्रय ले मौन रहे ॥ १५ ॥
अभ्यस्तं भौतिकं पश्यन् भूतानामागतिं गतिम् ।
निःस्पृहः समदर्शी च पक्वापक्वेन वर्तयन् ।
आत्मना यः प्रशान्तात्मा लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥ १६ ॥
भौतिक देह, इन्द्रिय आदि सभी वस्तुएँ नष्ट होनेवाली हैं और प्राणियोंके आवागमन— जन्म और मरण— बारंबार होते रहते हैं । यह सब देख और सोचकर जो सर्वत्र निःस्पृह तथा समदर्शी हो गया है, पके ( रोटी, भात आदि ) और कच्चे ( फल, मूल आदि) से जीवन - निर्वाह करता है, आत्मलाभके लिये जो शान्तचित्त हो गया है तथा जो मिताहारी और जितेन्द्रिय है, वही वास्तवमें संन्यासी कहलाने योग्य है ॥ वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं हिंसावेगमुदरोपस्थवेगम् । एतान् वेगान् विषहेद् वै तपस्वी निन्दा चास्य हृदयं नोपहन्यात् ॥ १७ ॥
संन्यासी तपस्वी होकर वाणी, मन, क्रोध, हिंसा, उदर और उपस्थ — इनके वेगोंको सहता हुआ इन्हें वशमें रखे । दूसरोंद्वारा की हुई निन्दा उसके हृदयमें कोई विकार न उत्पन्न
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करे ॥ १७ ॥
मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसानिन्दयोः समः ।
एतत् पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रमे ॥ १८ ॥
प्रशंसा और निन्दा—दोनोंमें समान भाव रखकर उदासीन ही रहना चाहिये ।
संन्यासाश्रममें इस प्रकारका आचरण परम पवित्र माना गया है ॥ १८ ॥
महात्मा सर्वतो दान्तः सर्वत्रैवानपाश्रितः ।
अपूर्वचारकः सौम्यो अनिकेतः समाहितः ॥ १ ९ ॥
संन्यासीको महामनस्वी, सब प्रकारसे जितेन्द्रिय, सब ओरसे असंग, सौम्य, मठ और कुटियासे रहित तथा एकाग्रचित होना चाहिये । उसे अपने पूर्व आश्रमके परिचित स्थानोंमें नहीं विचरना चाहिये ॥ १ ९ ॥
वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित् ।
अज्ञातलिप्सं लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ॥ २० ॥
वानप्रस्थों और गृहस्थोंके साथ उसे कभी संसर्ग नहीं रखना चाहिये । अपनी रुचि प्रकट किये बिना ही जो वस्तु प्राप्त हो जाय, उसीको लेनेकी इच्छा रखनी चाहिये तथा अभीष्ट वस्तुके मिलनेपर उसके मनमें हर्षका आवेश नहीं होना चाहिये ॥ २० ॥
विजानतां मोक्ष एष श्रमः स्यादविजानताम् ।
मोक्षयानमिदं कृत्स्नं विदुषां हारितोऽब्रवीत् ॥ २१ ॥
यह संन्यासाश्रम ज्ञानियोंके लिये तो मोक्षरूप है, परंतु अज्ञानियोंके लिये श्रमरूप ही है । हारीत मुनिने विद्वानोंके लिये इस सम्पूर्ण धर्मको मोक्षका विमान बताया है ॥ २१ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेद् गृहात् ।
लोकास्तेजोमयास्तस्य तथाऽऽनन्त्याय कल्पते ॥ २२ ॥
जो पुरुष सबको अभय- दान देकर घरसे निकल जाता है, उसे तेजोमय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा वह अनन्त परमात्मपदको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि हारीतगीतायां अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें हारीतगीताविषयक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुछ २३ श्लोक हैं ) Fard
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एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र - शुक्र- संवादक आरम्भ युधिष्ठिरउवाच
धन्या धन्या इति जनाः सर्वेऽस्मान् प्रवदन्त्युत ।
न दुःखिततरः कश्चित् पुमानस्माभिरस्ति ह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - पितामह! सभी लोग हमलोगोंको धन्य- धन्य कहते हैं, परंतु हमलोगोंसे बढ़कर अत्यन्त दुखी दूसरा कोई मनुष्य नहीं है ॥ १ ॥
लोकसम्भावितैर्दुःखं यत् प्राप्तं कुरुसत्तम ।
प्राप्य जातिं मनुष्येषु देवैरपि पितामह ॥ २ ॥
कुरुश्रेष्ठ पितामह! देवताओंद्वारा मानवलोकमें जन्म पाकर तथा सब लोगोंद्वारा सम्मानित होकर भी हमें यहाँ महान् दुःख प्राप्त हुआ है ॥ २ ॥
कदा वयं करिष्यामः संन्यासं दुःखसंज्ञकम् ।
दुःखमेतच्छरीराणां धारणं कुरुसत्तम ॥ ३ ॥
कुरुश्रेष्ठ! संसारी मनुष्य जिसे दुःख कहते हैं, उस संन्यासका अवलम्बन हमलोग कब करेंगे? हमें तो इन शरीरोंका धारण करना ही दुःख जान पड़ता है ॥ ३ ॥
विमुक्ताः सप्तदशभिर्हेतुभूतैश्च पञ्चभिः ।
इन्द्रियार्थैर्गुणैश्चैव अष्टाभिश्च पितामह ॥ ४ ॥
न गच्छन्ति पुनर्भावं मुनयः संशितव्रताः ।
कदा वयं गमिष्यामो राज्यं हित्वा परंतप ॥ ५ ॥
पितामह! पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन और बुद्धि – ये सत्रह तत्त्व; काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न – ये संसारके पाँच हेतु; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँच विषय; सत्त्व, रज और तम–ये तीन गुण तथा पाँच भूतोंसहित अविद्या, अहंकार और कर्म — ये आठ तत्त्वोंके समुदाय सब मिलाकर अड़तीस तत्त्व होते हैं । इन सबसे मुक्त हुए तीक्ष्ण व्रतधारी मुनि पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते हैं । परंतप पितामह! हमलोग भी कब अपना राज्य छोड़कर इसी स्थितिको प्राप्त होंगे ॥ ४-५ ॥ भीष्म उवाच
नास्त्यनन्तं महाराज सर्वं संख्यानगोचरः ।
पुनर्भावोऽपि विख्यातो नास्ति किंचिदिहाचलम् ॥ ६ ॥
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भीष्मजीने कहा – महाराज! दुःख अनन्त नहीं हैं । जगत्की सभी वस्तुएँ संख्याकी सीमामें ही हैं — असंख्य नहीं हैं । पुनर्जन्म भी नश्वरताके लिये विख्यात ही है । तात्पर्य यह कि इस जगत्में कोई भी वस्तु अचल या स्थायी नहीं है ॥ ६ ॥
न चापि मन्यसे राजन्नेष दोषः प्रसङ्गतः ।
उद्योगादेव धर्मज्ञाः कालेनैव गमिष्यथ ॥ ७ ॥
तुम जो ऐसा मानते हो कि ऐश्वर्य दोषकारक होता है, क्योंकि वह आसक्तिका हेतु होनेके कारण मोक्षका प्रतिबन्धक है तो तुम्हारी यह मान्यता ठीक नहीं है; क्योंकि तुम सब लोग धर्मके ज्ञाता हो । स्वयं ही उद्योग करके शम, दम आदि साधनोंद्वारा कुछ ही कालमें मोक्ष प्राप्त कर सकते हो ॥ ७ ॥
नेशेऽयं सततं देही नृपते पुण्यपापयोः ।
तत एव समुत्थेन तमसा रुध्यतेऽपि च ॥ ८ ॥
नरेश्वर! यह जीवात्मा पुण्य और पापके फल सुख और दुःख भोगनेमें स्वतन्त्र नहीं है, उन पुण्य और पापोंसे उत्पन्न संस्काररूप अन्धकारसे यह आच्छन्न हो जाता है ॥ ८ ॥
यथाञ्जनमयो वायुः पुनर्मानःशिलं रजः ।
अनुप्रविश्य तद्वर्णो दृश्यते रञ्जयन् दिशः ॥ ९ ॥
तथा कर्मफलैर्देही रञ्जितस्तमसाऽऽवृतः ।
विवर्णो वर्णमाश्रित्य देहेषु परिवर्तते ॥ १० ॥
जैसे अन्धकारमयी वायु मैनसिलके लाल- पीले चूर्णमें प्रवेश करके उसीके रंगसे युक्त हो सम्पूर्ण दिशाओंको रँगती दिखायी देती है, उसी प्रकार स्वभावतः वर्णविहीन यह जीवात्मा तमोमय अज्ञानसे आवृत और कर्मफलसे रंजित हो वही वर्ण ग्रहण कर अर्थात् विभिन्न शरीरोंके धर्मोंको स्वीकार करके समस्त प्राणियोंके शरीरोंमें घूमता रहता है ॥ ९ -१० ॥
ज्ञानेन हि यदा जन्तुरज्ञानप्रभवं तमः ।
व्यपोहति तदा ब्रह्म प्रकाशति सनातनम् ॥ ११ ॥
जब जीव तत्त्वज्ञानद्वारा अज्ञानजनित अन्धकारको दूर कर देता है, तब उसके हृदयमें सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है ॥ ११ ॥
अयत्नसाध्यं मुनयो वदन्ति ये चापि मुक्तास्त उपासितव्याः । त्वया च लोकेन च सामरेण तस्मान्नमस्यामि महर्षिसङ्घान् ॥ १२ ॥
ऋषि-मुनि कहते हैं कि ब्रह्मकी प्राप्ति किसी क्रियात्मक यत्नसे साध्य नहीं है । इसके लिये तो देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्को और तुमको उन पुरुषोंकी उपासना करनी चाहिये, जो जीवन्मुक्त हैं; अतएव मैं महर्षियोंके समुदायको नमस्कार करता हूँ ॥ १२ ॥
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अस्मिन्नर्थे पुरा गीतं शृणुष्वैकमना नृप ।
यथा दैत्येन वृत्रेण भ्रष्टैश्वर्येण चेष्टितम् ॥ १३ ॥
निर्जितेनासहायेन हृतराज्येन भारत ।
अशोचता शत्रुमध्ये बुद्धिमास्थाय केवलाम् ॥ १४ ॥
नरेश्वर! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है । उसे एकचित्त होकर सुनो । भरतनन्दन! पूर्वकालमें वृत्रासुर पराजित और ऐश्वर्य- भ्रष्ट हो गया था । उसका कोई सहायक नहीं रह गया था । देवताओंने उसका राज्य छीन लिया था । उस दशामें पड़कर भी उस असुरने जैसी चेष्टा की थी, उसीका इस कथामें वर्णन है । वह शत्रुओंके बीचमें रहकर भी आसक्तिशून्य बुद्धिका आश्रय ले शोक नहीं करता था ॥ १३-१४ ॥
भ्रष्टैश्वर्यं पुरा वृत्रमुशना वाक्यमब्रवीत् ।
काचित् पराजितस्याद्य न व्यथा तेऽस्ति दानव ॥ १५ ॥
पूर्वकालकी बात है कि वृत्रासुरको ऐश्वर्यभ्रष्ट हुआ देख शुक्राचार्यने उससे पूछा ——दानवराज! तुम्हें देवताओंने पराजित कर दिया है तो भी आजकल तुम्हारे चित्तमें किसी प्रकारकी व्यथा नहीं है; इसका क्या कारण है? ' ॥ १५ ॥
वृत्रउवाच
सत्येन तपसा चैव विदित्वासंशयं ह्यहम् ।
न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम् ॥ १६ ॥
वृत्रासुरने कहा — ब्रह्मन्! मैंने सत्य और तपके प्रभावसे जीवोंके आवागमनका रहस्य निश्चितरूपसे जान लिया है; इसलिये मैं उसके विषयमें हर्ष और शोक नहीं करता हूँ ॥ १६ ॥
कालचोदिता जीवा मज्जन्ति नरकेऽवशाः ।
परितुष्टानि सर्वाणि दिव्यान्याहुर्मनीषिणः ॥ १७ ॥
कालसे प्रेरित हुए जीव अपने पापकर्मोंके फलस्वरूप विवश होकर नरकमें डूबते हैं और पुण्यके फलसे वे सब - के - सब स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ आनन्द भोगते हैं । ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है ॥ १७ ॥
क्षपयित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिताः ।
सावशेषेण कालेन सम्भवन्ति पुनः पुनः ॥ १८ ॥
इस प्रकार स्वर्ग अथवा नरकमें कर्मफलभोगद्वारा निश्चित समय व्यतीत करके भोगनेसे बचे हुए'कर्म- सहित कालकी प्रेरणासे वे बारंबार इस संसारमें जन्म लेते रहते हैं ॥ १८ ॥
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च ।
निर्गच्छन्त्यवशा जीवाः कामबन्धनबन्धनाः ॥ १ ९ ॥
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कामनाओंके बन्धनमें बँधकर विवश हुए कितने ही जीव सहस्रों बार तिर्यक्योनि तथा नरकमें पड़कर पुनः वहाँसे निकलते हैं ॥ १ ९ ॥
एवं संसरमाणानि जीवान्यहमदृष्टवान् ।
यथा कर्म तथा लाभ इति शास्त्रनिदर्शनम् ॥ २० ॥
इस प्रकार मैंने सभी जीवोंको जन्म- मरणके चक्कर में पड़ा हुआ देखा है । शास्त्रका भी ऐसा सिद्धान्त है कि जैसा कर्म होता है, वैसा ही फल मिलता है ॥
तिर्यग् गच्छन्ति नरकं मानुष्यं दैवमेव च ।
सुखदुःखे प्रिये द्वेष्ये चरित्वा पूर्वमेव ह ॥ २१ ॥
प्राणी पहले ही सुख- दुःख तथा प्रिय और अप्रिय विषयोंमें विचरण करके कर्मके अनुसार नरक, तिर्यग्योनि, मनुष्ययोनि अथवा देवयोनिमें जाते हैं ॥ २१ ॥
कृतान्तविधिसंयुक्तः सर्वो लोकः प्रपद्यते ।
गतं गच्छन्ति चाध्वानं सर्वभूतानि सर्वदा ॥ २२ ॥
समस्त जीव जगत् - विधाताके विधानसे ही परिचालित हो सुख-दुःख पाता है और समस्त प्राणी सदा चले हुए मार्गपर ही चलते हैं ॥ २२ ॥
कालसंख्यानसंख्यातं सृष्टिस्थितिपरायणम् ।
तं भाषमाणं भगवानुशना प्रत्यभाषत ।
धीमान् दुष्टप्रलापांस्त्वं तात कस्मात् प्रभाषसे ॥ २३ ॥
जो काल नामसे प्रसिद्ध एवं सृष्टि और पालनके परम आश्रय हैं, उन परमात्माका प्रतिपादन करते हुए वृत्रासुरकी बात सुनकर भगवान् शुक्राचार्यने उससे कहा — ' तात! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो, फिर ये असुरभावके विपरीत दोषयुक्त निरर्थक वचन कैसे कह रहे हो? ॥ २३ ॥
वृत्रउवाच
प्रत्यक्षमेतद् भवतस्तथान्येषां मनीषिणाम् ।
मया यज्जयलुब्धेन पुरा तप्तं महत् तपः ॥ २४ ॥
वृत्रासुरने कहा — ब्रह्मन्! आपने तथा दूसरे मनीषी महानुभावोंने यह तो प्रत्यक्ष देखा है कि मैंने पहले विजयके लोभसे बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ २४ ॥
गन्धानादाय भूतानां रसांश्च विविधानपि ।
अवर्धं त्रीन् समाक्रम्य लोकान् वै स्वेन तेजसा ॥ २५ ॥
मैं बलमें बहुत बढ़ा - चढ़ा था; अतः मैंने अपने ही तेजसे तीनों लोकोंपर आक्रमण करके दूसरे प्राणियोंको धूलमें मिलाकर उनके उपभोगकी गन्ध और रस आदि विविध वस्तुएँ छीन ली थीं ॥ २५ ॥
ज्वालामालापरिक्षिप्तो वैहायसचरस्तथा ।