05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1811–1820
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1811–1820
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स चैव तस्मिन् निवसत्यनीशो युगक्षये तपसा संवृतात्मा ॥ ३८ ॥
'तदनन्तर वह जीव लाखों बार (या लाखों वर्षोंतक ) नरकमें विचरण करके फिर धूम्रवर्ण पाता है ( पशु - पक्षी आदिकी योनिमें जन्म लेता है ) । उस योनिमें भी वह विवश होकर बड़े दुःखसे निवास करता है । फिर युगक्षय होनेपर वह तप ( पुरातन पुण्यकर्म या विवेक ) के प्रभावसे सुरक्षित होकर उस संकटसे उद्धार पा जाता है ॥ ३८ ॥
स वै यदा सत्त्वगुणेन युक्त- स्तमो व्यपोहन् घटते स्वबुद्ध्या । स लोहितं वर्णमुपैति नीलान् मनुष्यलोके परिवर्तते च ॥ ३ ९ ॥ ' वही जीव जब सत्त्वगुणसे युक्त होता है, तब अपनी बुद्धिके द्वारा तमोगुणकी प्रवृत्तिको दूर हटाता हुआ अपने कल्याणके लिये प्रयत्न करता है । उस समय सत्त्वगुणके बढ़ जानेपर वह रक्तवर्णको प्राप्त होता है ( इसीको अनुग्रह सर्ग कहा गया है, चित्तकी विभिन्न वृत्तियोंपर अनुग्रह करनेवाले देवविशेषका ही नाम ' अनुग्रह' है ) । जब सत्त्वगुणमें कुछ कमी रह जाती है, तब वह जीव नीलवर्णको प्राप्त होकर मनुष्यलोकमें आवागमन करने लगता है ॥ ३ ९ ॥ स तत्र संहारविसर्गमेकं स्वधर्मजैर्बन्धनैः क्लिश्यमानः । ततः स हारिद्रमुपैति वर्णं संहारविक्षेपशते व्यतीते ॥ ४० ॥
‘ तत्पश्चात् वह मनुष्यलोकमें एक कल्पतक स्वधर्मजनित बन्धनोंसे बँधकर क्लेश उठाता हुआ जब धीरे- धीरे अपनी तपस्याको बढ़ाता है, तब हल्दीकी - सी कान्तिवाले पीतवर्ण– देवताभावको प्राप्त होता है । वहाँ भी सैकड़ों कल्प व्यतीत कर लेनेपर वह पुनः पुण्यक्षयके पश्चात् मनुष्य होता है ( इस प्रकार वह देवतासे मनुष्य और मनुष्यसे देवता होता रहता है) ॥ हारिद्रवर्णस्तु प्रजाविसर्गात् सहस्रशस्तिष्ठति संचरन् वै । अविप्रमुक्तो निरये च दैत्य ततः सहस्राणि दशापराणि ॥ ४१ ॥
गतीः सहस्राणि च पञ्च तस्य चत्वारि संवर्तकृतानि चैव । विमुक्तमेनं निरयाच्च विद्धि सर्वेषु चान्येषु च सम्भवेषु ॥ ४२ ॥
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‘ दैत्य! सहस्रों कल्पोंतक देवरूपसे विचरते रहनेपर भी जीव विषयभोगसे मुक्त नहीं होता तथा प्रत्येक कल्पमें किये हुए अशुभ कर्मोंके फलोंको नरकमें रहकर भोगता हुआ जीव उन्नीस * हजार विभिन्न गतियोंको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् उसे नरकसे छुटकारा मिलता है । मनुष्यके सिवा अन्य सभी योनियोंमें केवल सुख-दुःखके भोग प्राप्त होते हैं । मोक्षका सुयोग हाथ नहीं लगता है । इस बातको तुम्हें भलीभाँति समझ लेना चाहिये ॥ ४१-४२ ॥ स देवलोके विहरत्यभीक्ष्णं ततश्च्युतो मानुषतामुपैति । संहारविक्षेपशतानि चाष्टौ मर्त्येषु तिष्ठत्यमृतत्वमेति ॥ ४३ ॥
‘ वह जीव निरन्तर देवलोकमें विहार करता है और वहाँसे भ्रष्ट होनेपर मनुष्ययोनिको प्राप्त होता है । मर्त्यलोकमें वह आठ सौ कल्पोंतक बारंबार जन्म लेता रहता है । तत्पश्चात् शुभकर्म करके वह पुनः देवभावको प्राप्त करता है ( यह आवागमनका चक्र तभीतक चलता है, जबतक जीवको परमज्ञान या अनन्य भक्तिकी प्राप्ति नहीं हो जाती, उसकी प्राप्ति होनेपर तो वह मुक्त या परमात्माको प्राप्त हो जाता है । ) ॥ ४३ ॥
सोऽस्मादथ भ्रश्यति कालयोगात्
कृष्णे तले तिष्ठति सर्वकृष्टे ।
यथा त्वयं सिद्ध्यति जीवलोक- स्तत् तेऽभिधास्याम्यसुरप्रवीर ॥ ४४ ॥
' असुरोंके प्रमुख वीर! वह जीव कालक्रमसे अशुभ कर्म करके कभी - कभी मर्त्यलोकसे भी नीचे गिर जाता है और सबसे निकृष्ट, तलप्रदेशकी भाँति निम्नतम, कृष्णवर्ण ( स्थावर योनि) में जन्म ग्रहण करके स्थित होता है । इस प्रकार उत्थान- पतनके चक्रमें पड़े हुए इस जीवसमूहको जिस प्रकार सिद्धि ( मुक्ति) प्राप्त होती है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥ ४४ ॥
दैवानि स व्यूहशतानि सप्त
रक्तो हरिद्रोऽथ तथैव शुक्लः ।
संश्रित्य संधावति शुक्लमेत- मष्टावरानर्च्यतमान् स लोकान् ॥ ४५ ॥
‘ क्रमशः रक्तवर्ण ( अनुग्राहक देवता ), हरिद्रावर्ण ( देवता ) तथा शुक्लवर्ण ( सनकादिकुमारों जैसा सिद्ध शरीरधारी ) होकर वह जीव बारी - बारीसे सात सौ दिव्य शरीरोंका आश्रय ले भू आदि सात उत्तमोत्तम लोकोंमें विचरण करके पूर्व पुण्यके प्रभावसे वेगपूर्वक विशुद्ध ब्रह्मलोकमें चला जाता है ॥ ४५ ॥
अष्टौ च षष्टिं च शतानि चैव मनोनिरुद्धानि महाद्युतीनाम् ।
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शुक्लस्य वर्णस्य परा गतिर्या त्रीण्येव रुद्धानि महानुभाव ॥ ४६ ॥
'महानुभाव वृत्रासुर! प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ — ये आठ, तथा दूसरे साठ* तत्त्व और इनकी जो सैकड़ों वृत्तियाँ हैं- ये सब महातेजस्वी योगियोंके मनके द्वारा अवरुद्ध की हुई होती हैं तथा सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणोंको भी वे अवरुद्ध कर देते हैं। अतः शुक्लवर्णवाले ( सनकादिकोंके समान सिद्ध) पुरुषको जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वही उन योगियोंको मिलती है ॥ ४६ ॥
संहारविक्षेपमनिष्टमेकं चत्वारि चान्यानि वसत्यनीशः । षष्ठस्य वर्णस्य परा गतिर्या सिद्धावसिद्धस्य गतक्लमस्य ॥ ४७ ॥
‘ जो परमगति छठे ( शुक्ल ) वर्णके साधकको मिलती है, उसे पानेका अधिकार भ्रष्ट करके भी जो असिद्ध हो रहा है एवं जिसके समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं ऐसा योगी भी यदि योगजनित ऐश्वर्यके सुखभोगकी वासनाका त्याग करनेमें असमर्थ है तो वह न चाहनेपर भी एक कल्पतक अपनी साधनाके फलरूप महर, जन, तप और सत्य — इन चारों लोकोंमें क्रमशः निवास करता है ( और कल्पके अन्तमें मुक्त हो जाता है ) ॥ ४७ ॥
सप्तोत्तरं तत्र वसत्यनीशः संहारविक्षेपशतं सशेषम् । तस्मादुपावृत्य मनुष्यलोके ततो महान् मानुषतामुपैति ॥ ४८ ॥
‘ किंतु जो भलीभाँति योगसाधनमें असमर्थ है, वह योगभ्रष्ट पुरुष सौ कल्पोंतक ऊपरके सात लोकोंमें निवास करता है । फिर बचे हुए कर्मसंस्कारोंके सहित वहाँसे लौटकर मनुष्यलोकमें पहलेसे बढ़कर महत्त्व सम्पन्न हो मनुष्यशरीरको पाता है ॥ ४८ ॥
तस्मादुपावृत्य ततः क्रमेण सोऽग्रेण संतिष्ठति भूतसर्गम् । स सप्तकृत्वश्च परैति लोकान् संहारविक्षेपकृतप्रभावः ॥ ४ ९ ॥ ‘ तदनन्तर मनुष्ययोनिसे निकलकर वह उत्तरोत्तर श्रेष्ठ देवादि योनियोंकी ओर अग्रसर होता है एवं सातों लोकोंमें प्रभावशाली होकर एक कल्पतक निवास करता है ॥ ४ ९ ॥ सप्तैव संहारमुपप्लवानि सम्भाव्य संतिष्ठति जीवलोके । ततोऽव्ययं स्थानमनन्तमेति देवस्य विष्णोरथ ब्रह्मणश्च ।
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शेषस्य चैवाथ नरस्य चैव देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ॥ ५० ॥
' फिर वह योगी भू आदि सात लोकोंको विनाशशील क्षणभंगुर समझकर पुनः मनुष्यलोकमें भलीभाँति ( शोक -मोहसे रहित होकर) निवास करता है । तदनन्तर शरीरका अन्त होनेपर वह अव्यय ( अविनाशी या निर्विकार) एवं अनन्त (देश, काल और वस्तुकृत परिच्छेदसे शून्य ) स्थान ( परब्रह्मपद) को प्राप्त होता है । वह अव्यय एवं अनन्त स्थान किसीके मतमें महादेवजीका कैलासधाम है । किसीके मतमें भगवान् विष्णुका वैकुण्ठधाम है । किसीके मतमें ब्रह्माजीका सत्यलोक है । कोई- कोई उसे भगवान् शेष या अनन्तका धाम बताते हैं । कोई वह जीवका ही परमधाम है - ऐसा कहते हैं और कोई - कोई उसे सर्वव्यापी चिन्मय प्रकाशसे युक्त परब्रह्मका स्वरूप बताते हैं ॥ ५० ॥
संहारकाले परिदग्धकाया ब्रह्माणमायान्ति सदा प्रजा हि । चेष्टात्मनो देवगणाश्च सर्वे ये ब्रह्मलोकादपराः स्म तेऽपि ॥ ५१ ॥
‘ ज्ञानाग्निके द्वारा जिनके सूक्ष्म, स्थूल और कारण- शरीर दग्ध हो गये हैं, वे प्रजाजन अर्थात् योगीलोग प्रलयकालमें सदा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं एवं जो ब्रह्मलोकसे नीचेके लोकोंमें रहनेवाले साधनशील दैवी प्रकृतिसे सम्पन्न साधक हैं, वे सब परब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ५१ ॥
प्रजाविसर्गं तु सशेषकाले स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः । निःशेषतस्तत्पदं यान्ति चान्ते सर्वे देवा ये सदृशा मनुष्याः ॥ ५२ ॥
‘ प्रलयकालमें जो जीव देवभावको प्राप्त थे, वे यदि अपने सम्पूर्ण कर्मफलोंका उपभोग समाप्त करनेसे पहले ही लयको प्राप्त हो जाते हैं तो कल्पान्तरमें पुनः प्रजाकी सृष्टि होनेपर वे शेष फलका उपभोग करनेके लिये उन्हीं स्थानोंको प्राप्त होते हैं, जो उन्हें पूर्वकल्पमें प्राप्त थे; किंतु जो कल्पान्तमें उस योनिसम्बन्धी कर्मफल- भोगको पूर्ण कर चुके हैं, वे स्वर्गलोकका नाश हो जानेपर दूसरे कल्पमें उनके जैसे कर्म हैं, उसीके सदृश अन्य प्राणियोंकी भाँति मनुष्य योनिको ही प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥
ये तु च्युताः सिद्धलोकात् क्रमेण तेषां गतिं यान्ति तथाऽऽनुपूर्व्या । जीवाः परे तद्बलतुल्यरूपाः स्वं स्वं विधिं यान्ति विपर्ययेण ॥ ५३ ॥
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‘जो योगी सिद्धलोकसे गिरकर मृत्युलोकमें आये हैं, उनके समान साधनबलसे सम्पन्न जो अन्य योगी हैं, वे भी एक लोकसे दूसरे लोकमें ऊपर उठते हुए क्रमशः उन सिद्ध पुरुषोंकी ही गतिको प्राप्त होते हैं । परंतु जो वैसे नहीं हैं, वे विपरीतभावके कारण अपनी-अपनी गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ५३ ॥
स यावदेवास्ति सशेषभुक् ते प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले । तावत् तदङ्गेषु विशुद्धभावः संयम्य पञ्चेन्द्रियरूपमेतत् ॥ ५४ ॥
‘विशुद्धभावसे सम्पन्न सिद्ध पुरुष जबतक पंचेन्द्रियरूप इस करणसमुदायका संयम करके शेष प्रारब्ध कर्मका उपभोग करता है, तबतक उसके शरीरमें समस्त प्रजागणोंका अर्थात् इन्द्रियोंके देवताओंका तथा अपरा और परा विद्याका निवास रहता है ॥ ५४ ॥
शुद्धां गतिं तां परमां परैति शुद्धेन नित्यं मनसा विचिन्वन् । ततोऽव्ययं स्थानमुपैति ब्रह्म दुष्प्रापमभ्येति स शाश्वतं वै ॥ ५५ ॥
' जो साधक सदा शुद्ध मनसे उस विशुद्ध परमगतिका अनुसंधान करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है । तदनन्तर अविकारी, दुर्लभ एवं सनातन ब्रह्मपदको प्राप्त करके वह उसीमें प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ५५ ॥
इत्येतदाख्यातमहीनसत्त्व नारायणस्येह बलं मया ते ॥ ५६ ॥
‘ उत्कृष्ट बलशाली दैत्यराज! इस प्रकार यहाँ मैंने तुमसे यह भगवान् नारायणका बल एवं प्रभाव बताया है ' ॥ ५६ ॥
वृत्रउवाच एवं गते मे न विषादोऽस्ति कश्चित् सम्यक् च पश्यामि वचस्तथैतत् । श्रुत्वा तु ते वाचमदीनसत्त्व विकल्मषोऽस्म्यद्य तथा विपाप्मा ॥ ५७ ॥
वृत्रासुर बोला —उदारचित्त महात्मा सनत्कुमारजी! यदि ऐसी बात है तो मुझे कोई विषाद नहीं है । मैं आपके वचनको अच्छी तरह समझता और इसे यथार्थ मानता हूँ । आज मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि आपकी इस वाणीको सुनकर मेरे सारे पाप और कलुष दूर हो गये ॥ ५७ ॥
प्रवृत्तमेतद् भगवन् महर्षे
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महाद्युतेश्चक्रमनन्तवीर्यम् । विष्णोरनन्तस्य सनातनं तत् स्थानं सर्गा यत्र सर्वे प्रवृत्ताः । सवै महात्मा पुरुषोत्तमो वै तस्मिन् जगत् सर्वमिदं प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥
भगवन्! महर्षे! महातेजस्वी, अनन्त एवं सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका यह अमित शक्तिशाली संसारचक्र चल रहा है । यह भगवान् विष्णुका वह सनातन स्थान है, जहाँसे सारी सृष्टियोंका आरम्भ होता है । महात्मा विष्णु पुरुषोत्तम हैं । उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ ५८ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स कौन्तेय वृत्रः प्राणानवासृजत् ।
योजयित्वा तथाऽऽत्मानं परं स्थानमवाप्तवान् ॥ ५ ९ ॥
भीष्मजी कहते हैं – कुन्तीनन्दन! ऐसा कहकर वृत्रासुरने अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर उन्हींका ध्यान करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वरके परमधामको प्राप्त कर लिया ॥ ५ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच
अयं स भगवान् देवः पितामह जनार्दनः ।
सनत्कुमारो वृत्राय यत्तदाख्यातवान् पुरा ॥ ६० ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! पूर्वकालमें महात्मा सनत्कुमारने वृत्रासुरसे जिनके स्वरूपका वर्णन किया था, वे भगवान् विष्णु -ये हमारे जनार्दन श्रीकृष्ण ही तो हैं? ॥ ६० ॥
भीष्म उवाच
मूलस्थायी महादेवो भगवान् स्वेन तेजसा ।
तत्स्थःसृजति तान् भावान् नानारूपान् महामनाः ॥ ६१ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! मूल कारणरूपसे स्थित, महान् देव, महामनस्वी भगवान् नारायण हैं । वे अपने उस चिन्मय स्वरूपमें स्थित होकर अपने प्रभावसे नाना प्रकारके सम्पूर्ण पदार्थोंकी सृष्टि करते हैं ॥ ६१ ॥
तुरीयांशेन तस्येमं विद्धि केशवमच्युतम् ।
तुरीयार्धेन लोकांस्त्रीन् भावयत्येव बुद्धिमान् ॥ ६२ ॥
अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले इन भगवान् श्रीकृष्णको तुम उस श्रीनारायणके एक चतुर्थ अंशसे सम्पन्न समझो । बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपने उस चतुर्थ अंशसे
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ही तीनों लोकोंकी रचना करते हैं ॥ ६२ ॥
अवाक् स्थितस्तु यः स्थायी कल्पान्ते परिवर्तते ।
स शेते भगवानप्सु योऽसावतिबलः प्रभुः ।
तान् विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ॥ ६३ ॥
जो परवर्ती सनातन नारायण प्रलयकालमें भी विद्यमान हैं, वे ही अत्यन्त बलशाली और सबके अधीश्वर भगवान् श्रीहरि कल्पान्तमें जलके भीतर शयन करते हैं तथा वे प्रसन्नात्मा सृष्टिकर्ता ईश्वर उन समस्त शाश्वत लोकोंमें विचरण करते हैं ॥ ६३ ॥
सर्वाण्यशून्यानि करोत्यनन्तः सनातनः संचरते च लोकान् । स चानिरुद्धः सृजते महात्मा तत्स्थं जगत् सर्वमिदं विचित्रम् ॥ ६४ ॥
अनन्त एवं सनातन भगवान् श्रीहरि समस्त कारणोंको सत्ता और स्फूर्ति देकर परिपूर्ण करते और लीलावपु धारण करके लोकोंमें विचरण करते हैं । उन महापुरुषकी गतिको कोई रोक नहीं सकता । वे ही इस जगत्की सृष्टि करते हैं । उन्हींमें यह सम्पूर्ण विचित्र विश्व प्रतिष्ठित है ॥ ६४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽऽत्मनो गतिः ।
शुभा तस्मात् स सुखितो न शोचति पितामह ॥ ६५ ॥
युधिष्ठिरने कहा - परमार्थतत्त्वके ज्ञाता पितामह! मैं समझता हूँ कि वृत्रासुरने आत्माके शुभ एवं यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार कर लिया था; इसीलिये वह सुखी था, शोक नहीं करता था ॥ ६५ ॥
शुक्लः शुक्लाभिजातीयः साध्यो नावर्ततेऽनघ ।
तिर्यग्गतेश्च निर्मुक्तो निरयाच्च पितामह ॥ ६६ ॥
निष्पाप पितामह! वह शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुआ था और स्वभावसे भी शुद्ध था । जान पड़ता है वह साध्य नामक देवता ही था; इसीलिये पुनः संसारमें नहीं लौटा । वह पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकसे छुटकारा पा गया ॥ ६६ ॥
हारिद्रवर्णे रक्ते वा वर्तमानस्तु पार्थिव ।
तिर्यगेवानुपश्येत कर्मभिस्तामसैर्वृतः ॥ ६७ ॥
पृथ्वीनाथ! पीतवर्णवाले देवसर्गमें तथा रक्तवर्णवाले अनुग्रहसर्गमें विद्यमान प्राणी कभी तामस कर्मोंसे आवृत होकर तिर्यग्योनिका भी दर्शन कर सकता है ॥ ६७ ॥
वयं तु भृशमापन्ना रक्ता दुःखसुखेऽसुखे ।
कां गतिं प्रतिपत्स्यामो नीलां कृष्णाधमामथ ॥ ६८ ॥
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हमलोग तो और भी अधिक आपत्तिसे घिरे हुए हैं । दुःख- सुखसे मिश्रित भावमें अथवा केवल दुःखमय भावमें आसक्त हैं । ऐसी दशामें पता नहीं हमें किस गतिकी प्राप्ति होगी । हम नीलवर्णवाली मानव - योनिमें पड़ेंगे या कृष्णवर्णवाली स्थावर योनिसे भी हीन दशाको जा पहुँचेंगे ॥ ६८ ॥
भीष्म उवाच
शुद्धाभिजनसम्पन्नाः पाण्डवाः संशितव्रताः ।
विहृत्य देवलोकेषु पुनर्मानुषमेष्यथ ॥ ६ ९ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! तुम सभी पाण्डव विशुद्ध कुलसे सम्पन्न और तीक्ष्ण व्रतोंका भलीभाँति पालन करनेवाले हो; अतः देवताओंके लोकोंमें विहार करके पुनः मनुष्य- शरीरको ही प्राप्त करोगे ॥ ६ ९ ॥ प्रजाविसर्गं च सुखेन काले प्रत्येत्य देवेषु सुखानि भुक्त्वा । सुखेन संयास्यथ सिद्धसंख्यां मावो भयं भूद् विमलाः स्थ सर्वे ॥ ७० ॥
तुम सब लोग यथासमय सुखसे संतानोत्पादन करके देवलोकोंमें जाकर सुख भोगोगे । तत्पश्चात् सुखपूर्वक सिद्धि प्राप्त करके सिद्धोंमें गिने जाओगे । तुम्हारे मनमें दुर्गतिका भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि तुम सब लोग निर्मल एवं निष्पाप हो ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रगीतासु अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्रगीताविषयक दो सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ७०३ श्लोक हैं) • श्रीविष्णुपुराणमें तीन प्रकारकी प्राकृत सृष्टि बतायी गयी है - पहली महत्तत्त्वकी सृष्टि है, जिसे यहाँ ‘ क्षर' शब्दसे कहा गया है । दूसरी भूत- सृष्टि मानी गयी है, जो तन्मात्राओंकी सृष्टि है । यहाँ ' भूतेषु' पदके द्वारा उसीकी ओर संकेत किया गया है । ‘ एकादशविकारात्मा' इस पदके द्वारा तीसरी सृष्टिका निर्देश किया गया है, जिसे वैकारिक अथवा ऐन्द्रियक सर्ग भी कहते हैं। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन– इन ग्यारह तत्त्वोंकी रचना हुई है । * सोलह ऋत्विजोंके नाम इस प्रकार हैं - १ -ब्रह्मा, २ -ब्राह्मणाच्छंसी, ३-आग्नीध्र और ४ -पोता – ये चार ऋत्विज सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता होते हैं । ५ - होता, ६ - मैत्रावरुण, ७- अछावाक और ८-ग्रावस्तोता – ये चार ऋत्विजऋग्वेदी होते हैं । ९-अध्वर्यु, १० -प्रतिपस्थाता, ११- नेष्टा और १२ -उन्नेता– ये चार यजुर्वेदी होते हैं । १३ -उद्गाता, १४- प्रस्तोता, १५ -प्रतिहर्ता तथा १६ - सुब्रह्मण्य — ये सामवेदके गायक होते हैं । * जब तमोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्यूनता और रजोगुणकी सम अवस्था हो, तब कृष्णवर्ण होता है । यह स्थावर सृष्टिका रंग माना गया है । तमोगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और सत्त्वगुणकी सम अवस्था होनेपर धूम्रवर्ण होता
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है । यह पशु -पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेवाले प्राणियोंका वर्ण माना गया है । रजोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्यूनता और तमोगुणकी सम अवस्था होनेपर नीलवर्ण होता है । यह मानवसर्गका वर्ण बताया गया है । इसीमें जब सत्त्वगुणकी सम अवस्था और तमोगुणकी न्यूनावस्था हो तो मध्यमवर्ण होता है । उसका रंग लाल होता है । इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं । जब सत्त्वगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और तमोगुणकी सम अवस्था हो तो हरिद्राके समान पीतवर्ण होता है । यही देवताओंका वर्ण है, अतः इसे देवसर्ग कहते हैं । उसीमें जब रजोगुणकी सम अवस्था और तमोगुणकी न्यूनता हो तो शुक्लवर्ण होता है । इसीको कौमारसर्ग कहा गया है । * दस इन्द्रिय, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण - ये उन्नीस भोगके साधन हैं, विषय और वृत्तियोंके भेदसे इन्हींके उतने ही सौ और उतने ही हजार प्रकार हो जाते हैं । * पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय- ये दस इन्द्रियाँ सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तिके भेदसे प्रत्येक छः-छः प्रकारकी होती हैं । इस प्रकार इनके साठ भेद हो जाते हैं ।
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एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन युधिष्ठिरउवाच
अहो धर्मिष्ठता तात वृत्रस्यामिततेजसः ।
यस्य विज्ञानमतुलं विष्णोर्भक्तिश्च तादृशी ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- दादाजी! अमित तेजस्वी वृत्रासुरकी धर्मनिष्ठा अद्भुत थी । उसका विज्ञान भी अनुपम था और भगवान् विष्णुके प्रति उसकी भक्ति भी वैसी ही उच्चकोटिकी थी ॥ १ ॥
दुर्विज्ञेयं पदं तात विष्णोरमिततेजसः ।
कथं वा राजशार्दूल पदं तु ज्ञातवानसौ ॥ २ ॥
तात! अनन्त तेजस्वी श्रीविष्णुके स्वरूपका ज्ञान तो अत्यन्त कठिन है । नृपश्रेष्ठ! उस वृत्रासुरने उस परमपदका ज्ञान कैसे प्राप्त कर लिया? यह बड़े आश्चर्यकी बात है ॥ २ ॥
भवता कथितं ह्येतच्छ्रद्दधे चाहमच्युत ।
भूयस्तु मे समुत्पन्ना बुद्धिरव्यक्तदर्शनात् ॥ ३ ॥
आपने इस घटनाका वर्णन किया है; इसलिये मैं इसे सत्य मानता और इसपर विश्वास करता हूँ; क्योंकि आप कभी सत्यसे विचलित नहीं होते हैं तथापि यह बात स्पष्टरूपसे मेरी समझमें नहीं आयी है; अतः पुनः मेरी बुद्धिमें प्रश्न उत्पन्न हो गया ॥ ३ ॥
कथं विनिहतो वृत्रः शक्रेण पुरुषर्षभ ।
धार्मिको विष्णुभक्तश्च तत्त्वज्ञश्च पदान्वये ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर! वृत्रासुर धर्मात्मा, भगवान् विष्णुका भक्त और वेदान्तके पदोंका अन्वय करके उनके तात्पर्यको ठीक- ठीक समझनेमें कुशल था तो भी इन्द्रने उसे कैसे मार डाला? ॥ ४ ॥
एतन्मे संशयं ब्रूहि पृच्छते भरतर्षभ ।
वृत्रस्तु राजशार्दूल यथा शक्रेण निर्जितः ॥ ५ ॥
भरतभूषण! नृपश्रेष्ठ! मैं यह बात आपसे पूछता हूँ, आप मेरे इस संशयका समाधान कीजिये । इन्द्रने वृत्रासुरको कैसे परास्त किया? ॥ ५ ॥
यथा चैवाभवद् युद्धं तच्चाचक्ष्व पितामह ।
विस्तरेण महाबाहो परं कौतूहलं हि मे ॥ ६ ॥
महाबाहु पितामह! इन्द्र और वृत्रासुरमें किस प्रकार युद्ध हुआ था, यह विस्सारपूर्वक बताइये; इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्सुकता हो रही है ॥ ६ ॥