श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1801–1810
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1801–1810
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अजेयः सर्वभूतानामासं नित्यमपेतभीः ॥ २६ ॥
मेरे शरीरसे आगकी लपटें निकलती थीं और मैं ज्वालामालाओंसे घिरकर सदा आकाशमें निर्भय विचरता हुआ समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गया था ॥ २६ ॥
ऐश्वर्यं तपसा प्राप्तं भ्रष्टं तच्च स्वकर्मभिः ।
धृतिमास्थाय भगवन् न शोचामि ततस्त्वहम् ॥ २७ ॥
भगवन्! इस प्रकार मैंने तपस्याके प्रभावसे जो ऐश्वर्य प्राप्त किया था, वह मेरे अपने ही कर्मोंसे नष्ट हो गया । तथापि मैं धैर्य धारण करके उसके लिये शोक नहीं करता हूँ ॥ २७ ॥
युयुत्सुना महेन्द्रेण पुंसा सार्धं महात्मना ।
ततो मे भगवान् दृष्टो हरिर्नारायणः प्रभुः ॥ २८ ॥
महामनस्वी पुरुषप्रवर देवराज इन्द्र जब युद्धकी इच्छासे मेरे सामने आये, उस समय उनके साथ उन्हींकी सहायताके लिये आये हुए सबके प्रभु भगवान् श्रीनारायण हरिका मैंने दर्शन किया था ॥ २८ ॥
वैकुण्ठः पुरुषोऽनन्तः शुक्लो विष्णुः सनातनः ।
मुञ्जकेशो हरिश्मश्रुः सर्वभूतपितामहः ॥ २ ९ ॥
वे भगवान् वैकुण्ठ, पुरुष, अनन्त, शुक्ल, विष्णु, सनातन, मुंजकेश, हरिश्मश्रु तथा सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ २ ९ ॥
नूनं तु तस्य तपसः सावशेषमिहास्ति वै ।
यदहं प्रष्टुमिच्छामि भगवन् कर्मणः फलम् ॥ ३० ॥
भगवन्! अवश्य ही मेरी उस तपस्याका कोई अंश अब भी शेष रह गया है, अतः मैं उस कर्मफलके विषयमें प्रश्न करना चाहता हूँ ॥ ३० ॥
ऐश्वर्यं वै महद् ब्रह्म वर्णे कस्मिन् प्रतिष्ठितम् ।
निवर्तते चापि पुनः कथमैश्वर्यमुत्तमम् ॥ ३१ ॥
अणिमा आदि ऐश्वर्य और महद् ब्रह्म किस वर्ण में प्रतिष्ठित हैं? तथा वह उत्तम ऐश्वर्य कैसे नष्ट हो जाता है? ॥ ३१ ॥
कस्माद् भूतानि जीवन्ति प्रवर्तन्ते तथा पुनः ।
किं वा फलं परं प्राप्य जीवस्तिष्ठति शाश्वतः ॥ ३२ ॥
प्राणी किस हेतुसे जीवन धारण करते हैं? तथा किस कारणसे कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं? जीव किस परम फलको पाकर अविनाशी एवं सनातनरूपसे प्रतिष्ठित होता है? ॥ ३२ ॥
केन वा कर्मणा शक्यमथ ज्ञानेन केन वा ।
तदवाप्तुं फलं विप्र तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३३ ॥
विप्रवर! किस कर्म अथवा ज्ञानसे उस फलको प्राप्त किया जा सकता है? यह मुझे बताने कृपा करें ॥ ३३ ॥
इतीदमुक्तः स मुनिस्तदानीं
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प्रत्याह यत् तच्छृणु राजसिंह ।
मयोच्यमानं पुरुषर्षभ त्व- मनन्यचित्तः सह सोदरीयैः ॥ ३४ ॥
राजसिंह! पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! उसके ऐसा प्रश्न करनेपर मुनिवर शुक्राचार्यने उस समय उसे जो उत्तर दिया, उसे मैं बता रहा हूँ, तुम अपने भाइयोंके साथ एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रगीतासु एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्र -गीताविषयक दोसौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७९ ॥
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अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण उशनोवाच
नमस्तस्मै भगवते देवाय प्रभविष्णवे ।
यस्य पृथ्वीतलं तात साकाशं बाहुगोचरः ॥ १ ॥
शुक्राचार्यने कहा — तात! आकाशसहित यह सारी पृथ्वी जिनकी भुजाओंके बलपर स्थित है, महान् प्रभावशाली उन भगवान् विष्णुदेवको नमस्कार है ॥ १ ॥
मूर्धा यस्य त्वनन्तं च स्थानं दानवसत्तम ।
तस्याहं ते प्रवक्ष्यामि विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥ २ ॥
दानवश्रेष्ठ! जिनका मस्तक और स्थान भी अनन्त है, उन भगवान् विष्णुका उत्तम माहात्म्य मैं तुम्हें बताऊँगा ॥
तयोः संवदतोरेवमाजगाम महामुनिः ।
सनत्कुमारो धर्मात्मा संशयच्छेदनाय वै ॥ ३ ॥
शुक्राचार्य और वृत्रासुरमें ये बातें हो ही रही थीं कि वहाँ महामुनि धर्मात्मा सनत्कुमार उनके संशयका निवारण करनेके लिये आ पहुँचे ॥ ३ ॥
स पूजितोऽसुरेन्द्रेण मुनिनोशनसा तथा ।
निषसादासने राजन् महार्हे मुनिपुङ्गवः ॥ ४ ॥
राजन्! असुरराज वृत्र और मुनि शुक्राचार्यके द्वारा पूजित हो मुनिवर सनत्कुमार एक बहुमूल्य सिंहासनपर विराजमान हुए ॥ ४ ॥
तमासीनं महाप्रज्ञमुशना वाक्यमब्रवीत् ।
ब्रूह्यस्मै दानवेन्द्राय विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥
जब महाज्ञानी सनत्कुमार आरामसे बैठ गये, तब शुक्राचार्यने उनसे कहा — ‘ भगवन्! आप इस दानवराजको भगवान् विष्णुका उत्तम माहात्म्य बताइये ' ॥ ५ ॥
सनत्कुमारस्तु ततः श्रुत्वा प्राह वचोऽर्थवत् ।
विष्णोर्माहात्म्यसंयुक्तं दानवेन्द्राय धीमते ॥ ६ ॥
यह सुनकर सनत्कुमारजीने बुद्धिमान् दानवराज वृत्रासुरके प्रति भगवान् विष्णुकी महिमासे युक्त यह सार्थक वचन कहा- ॥ ६ ॥
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शृणु सर्वमिदं दैत्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।
विष्णौ जगत् स्थितं सर्वमिति विद्धि परंतप ॥ ७ ॥
‘ शत्रुओंको संताप देनेवाले दैत्य! भगवान् विष्णुका यह सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य सुनो— तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि यह समस्त संसार भगवान् विष्णुमें ही स्थित है ॥ ७ ॥
सृजत्येष महाबाहो भूतग्रामं चराचरम् ।
एष चाक्षिपते काले काले विसृजते पुनः ॥ ८ ॥
‘ पर महाबाहो! ये श्रीविष्णु ही सम्पूर्ण चराचर प्राणिसमुदायकी सृष्टि करते हैं और ये ही समय आनेपर उसका विनाश करते हैं एवं समय आनेपर पुनः सृष्टि भी करते हैं ॥ ८ ॥
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सनकादि महर्षियोंकी शुक्राचार्य एवं वृत्रासुरसे भेंट
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अस्मिन् गच्छन्ति विलयमस्माच्च प्रभवन्त्युत ।
नैष ज्ञानवता शक्यस्तपसा नैव चेज्यया ।
सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणां तु संयमेनैव शक्यते ॥ ९ ॥
' समस्त प्राणी इन्हींमें लयको प्राप्त होते हैं और इन्हींसे प्रकट भी होते हैं । इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञके द्वारा भी नहीं पा सकता । केवल इन्द्रियोंके संयमसे ही उनकी उपलब्धि हो सकती है ॥ ९ ॥
बाह्ये चाभ्यन्तरे चैव कर्मणोर्मनसि स्थितः ।
निर्मलीकुरुते बुद्ध्या सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ॥ १० ॥
' जो बाह्य ( यज्ञ आदि ) और आभ्यन्तर ( शम, दम आदि) कर्मोंमें प्रवृत्त होकर मनके विषयमें स्थिरता प्राप्त करके अर्थात् मनको स्थिर करके बुद्धिके द्वारा उसे निर्मल बनाता है, वह परलोकमें अक्षय सुख ( मोक्ष ) को प्राप्त कर लेता है ॥ १० ॥
यथा हिरण्यकर्ता वै रूप्यमग्नौ विशोधयेत् ।
बहुशोऽतिप्रयत्नेन महताऽऽत्मकृतेन ह ॥ ११ ॥
तद्वज्जाति शतैर्जीवः शुद्ध्यतेऽनेन कर्मणा ।
यत्नेन महता चैवाप्येकजातौ विशुद्ध्यते ॥ १२ ॥
‘ जैसे सोनार बारंबार किये हुए अपने महान् प्रयत्नके द्वारा चाँदीको आगमें डालकर उसे शुद्ध करता है, उसी प्रकार जीव सैकड़ों जन्मोंमें अपने मनको शुद्ध कर पाता है; परंतु इस यज्ञ आदि और शम-दम आदि कर्मों द्वारा यदि वह महान् प्रयत्न करे तो एक ही जन्ममें शुद्ध हो जाता है ॥ ११-१२ ॥
लीलयाल्पं यथा गात्रात् प्रमृज्यादात्मनो रजः ।
बहुयत्नेन महता दोषनिर्हरणं तथा ॥ १३ ॥
‘ जैसे अपने शरीरमें लगी हुई थोड़ी - सी धूलको मनुष्य साधारण चेष्टासे खेल - खेलमें ही झाड़ - पोछ देता है, उसी प्रकार बारंबार किये हुए महान् प्रयत्नसे वह अपने राग- द्वेष आदि दोषोंको भी दूर कर सकता है ॥ १३ ॥
यथा चाल्पेन माल्येन वासितं तिलसर्षपम् ।
न मुञ्चति स्वकं गन्धं तद्वत् सूक्ष्मस्य दर्शनम् ॥ १४ ॥
‘ जैसे थोड़े - से पुष्प एवं मालाद्वारा वासित किया हुआ तिल और सरसोंका तेल अपनी गन्ध नहीं छोड़ता है, उसी प्रकार थोड़े - से प्रयत्नसे न तो दोष दूर होते हैं और न सूक्ष्म ब्रह्मका साक्षात्कार ही हो पाता है ॥ १४ ॥
तदेव बहुभिर्माल्यैर्वास्यमानं पुनः पुनः ।
विमुञ्चति स्वकं गन्धं माल्यगन्धे च तिष्ठति ॥ १५ ॥
एवं जातििशतैर्युक्तो गुणैरेव प्रसङ्गिषु ।
बुद्ध्या निवर्तते दोषो यत्नेनाभ्यासजेन ह ॥ १६ ॥
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'वही तिल या सरसोंका तेल बहुत-से सुगन्धित पुष्पोंद्वारा बारंबार वासित होनेपर अपनी गन्धको छोड़ देता है और उस फूलकी गन्धमें ही स्थित हो जाता है । उसी प्रकार सैकड़ों जन्मोंमें स्त्री-पुत्र आदिके संसर्गसे युक्त तथा सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंद्वारा प्रवर्तित दोषसमूह बुद्धि तथा अभ्यासजनित यत्नसे निवृत्त हो पाता है ॥ १५-१६ ॥
कर्मणा स्वनुरक्तानि विरक्तानि च दानव ।
यथा कर्मविशेषांश्च प्राप्नुवन्ति तथा शृणु ॥ १७ ॥
‘ दनुनन्दन! कर्मसे अनुरक्त और कर्मसे विरक्त होनेवाले प्राणिसमूह जिस प्रकार राग और विरागके हेतुभूत विभिन्न कर्मोंको प्राप्त होते हैं, वह सुनो ॥ १७ ॥
यथावत् सम्प्रवर्तन्ते यस्मिंस्तिष्ठन्ति वा विभो ।
तत् तेऽनुपूर्व्या व्याख्यास्ये तदिहैकमनाः शृणु ॥ १८ ॥
‘ प्रभो! जिस प्रकार वे कर्ममें प्रवृत्त होते तथा जिस निमित्तसे उसमें स्थित होते हैं और जिस अवस्थामें उससे निवृत्त हो जाते हैं, वह सब मैं तुमसे क्रमशः बताऊँगा । तुम उसे यहाँ एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ १८ ॥
अनादिनिधनः श्रीमान् हरिर्नारायणः प्रभुः ।
देवः सृजति भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ १ ९ ॥
‘ श्रीमान् भगवान् नारायण हरि आदि और अन्तसे रहित हैं । वे ही चराचर प्राणियोंकी रचना करते हैं ॥
स वै सर्वेषु भूतेषु क्षरश्चाक्षर एव च ।
एकादशविकारात्मा जगत् पिबति रश्मिभिः ॥ २० ॥
‘ वे ही सम्पूर्ण प्राणियोंमें क्षर और अक्षररूपसे विद्यमान हैं । ग्यारह इन्द्रियोंका जो वैकारिक* सर्ग है, वह भी उन्हींका स्वरूप है । वे अपनी चैतन्यमयी किरणोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हो रहे हैं ॥ २० ॥
पादौ तस्य महीं विद्धि मूर्धानं दिवमित्युत ।
बाहवस्तु दिशो दैत्य श्रोत्रमाकाशमेव च ॥ २१ ॥
तस्य तेजोमयः सूर्यो मनश्चन्द्रमसि स्थितम् ।
बुद्धिर्ज्ञानगता नित्यं रसस्त्वप्सु प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
‘ दैत्यराज! पृथ्वीको भगवान् विष्णुके दोनों चरण समझो, स्वर्गलोकको मस्तक जानो, ये चारों दिशाएँ उनकी चार भुजाएँ हैं, आकाश कान है, तेजस्वी सूर्य उनका नेत्र है, मन चन्द्रमा है, बुद्धि ( महत्तत्त्व ) उनकी नित्य ज्ञानवृत्ति है और जल रसनेन्द्रिय है ॥ २१-२२ ॥
भ्रुवोरनन्तरास्तस्य ग्रहा दानवसत्तम ।
नक्षत्रचक्रं नेत्राभ्यां पादयोर्भूश्च दानव ॥ २३ ॥
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'दानवप्रवर! सम्पूर्ण ग्रह उनकी दोनों भौंहोंके बीचमें स्थित हैं । नक्षत्रमण्डल नेत्रोंसे प्रकट हुआ है । दनुनन्दन! यह पृथ्वी उनके दोनों चरणोंमें स्थित है ॥ ( तं विद्धि भूतं विश्वादिं परमं विद्धि चेश्वरम् । )
रजस्तमश्च सत्त्वं च विद्धि नारायणात्मकम् ।
सोऽऽश्रमाणां फलं तात कर्मणस्तत् फलं विदुः ॥ २४ ॥
'उन्हें तुम सम्पूर्ण भूतस्वरूप, इस जगत्का आदिकारण और परमेश्वर समझो । रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण–इन तीनोंको नारायणमय ही मानो । तात! समस्त आश्रमोंका फल वे ही हैं । विद्वान् पुरुष समस्त कर्मोंद्वारा प्राप्तव्य फल उन्हींको मानते हैं ॥ २४ ॥
अकमर्णः फलं चैव स एव परमव्ययः ।
छन्दांसि यस्य रोमाणि ह्यक्षरं च सरस्वती ॥ २५ ॥
' कर्मोंका त्यागरूप जो संन्यास है, उसका फल भी वे ही अविनाशी परमात्मा हैं । वेद- मन्त्र उनके रोम हैं तथा प्रणव उनकी वाणी है ॥ २५ ॥
बह्वाश्रयो बहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः ।
स ब्रह्म परमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ॥ २६ ॥
'बहुत - से वर्ण और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं । हृदयमें आश्रित धर्म भी उन्हींका स्वरूप है । वे ही ब्रह्म हैं । वे ही आत्मदर्शनरूप परम धर्म हैं । वे ही तप और सदसत्स्वरूप हैं ॥ २६ ॥
श्रुतिशास्त्रग्रहोपेतः षोडशर्त्विक् क्रतुश्च सः ।
पितामहश्च विष्णुश्च सोऽश्विनौ स पुरंदरः ।
मित्रोऽथ वरुणश्चैव यमोऽथ धनदस्तथा ॥ २७ ॥
' श्रुति ( वेद ), शास्त्र और सोमपात्रसहित सोलह* ऋत्विजोंवाला यज्ञ भी वे ही हैं । वे ही ब्रह्मा, विष्णु, अश्विनीकुमार, इन्द्र, मित्र, वरुण, यम और कुबेर हैं ॥
ते पृथग्दर्शनास्तस्य संविदन्ति तथैकताम् ।
एकस्य विद्धि देवस्य सर्वं जगदिदं वशे ॥ २८ ॥
‘उनका दर्शन पृथक् - पृथक् होनेपर भी वे अपनी एकताको जानते हैं । तुम भी इस सम्पूर्ण जगत्को एक परमात्मदेवके ही अधीन समझो ॥ २८ ॥
नानाभूतस्य दैत्येन्द्र तस्यैकत्वं वदत्ययम् ।
जन्तुः पश्यति विज्ञानात् ततो ब्रह्म प्रकाशते ॥ २ ९ ॥
‘ दैत्यराज! अनेक रूपोंमें प्रकट हुए उन परमात्माकी एकताका यह वेद प्रतिपादन करता है । जीव विज्ञानबलसे ही ब्रह्मका साक्षात्कार करता है । उस समय उसकी बुद्धिमें वह ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है ॥ २ ९ ॥ संहारविक्षेपसहस्रकोटी-
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स्तिष्ठन्ति जीवाः प्रचरन्ति चान्ये । प्रजाविसर्गस्य च पारिमाण्यं वापीसहस्राणि बहूनि दैत्य ॥ ३० ॥
'कितने ही जीव करोड़ों कल्पोंतक स्थावररूपसे एक स्थानमें स्थित रहते हैं और कितने ही उतने समयतक इधर- उधर विचरते रहते हैं । दैत्यप्रवर! प्रजाके सृष्टिका परिमाण कई हजार बावड़ियोंकी संख्याके समान है ॥ वाप्यः पुनर्योजनविस्तृतास्ताः क्रोशं च गम्भीरतयावगाढाः । आयामतः पञ्चशताश्च सर्वाः प्रत्येकशो योजनतः प्रवृद्धाः ॥ ३१ ॥
वाप्या जलं क्षिप्यति वालकोट्या त्वह्ना सकृच्चाप्यथ न द्वितीयम् । तासां क्षये विद्धि परं विसर्गं संहारमेकं च तथा प्रजानाम् ॥ ३२ ॥
‘ वे सारी बावड़ियाँ पाँच सौ योजन चौड़ी, पाँच सौ योजन लंबी और एक - एक कोस गहरी हों । गहराई इतनी हो कि कोई उनमें प्रवेश न कर सके । तात्पर्य यह कि प्रत्येक बावड़ी बहुत लंबी -चौड़ी और गहरी हो - उनमेंसे एक बावड़ीके जलको कोई दिनभरमें एक ही बार एक बालकी नोकसे उलीचे, दूसरी बार न उलीचे । इस प्रकार उलीचनेसे उन सारी बावड़ियोंका जल जितने समयमें समाप्त हो सकता है, उतने ही समयमें प्राणियोंकी सृष्टि और संहारके क्रमकी समाप्ति हो सकती है ( अर्थात् जैसे उक्त प्रकारसे उलीचनेपर उन बावड़ियोंका जल सूखना असम्भव है, वैसे ही बिना ज्ञानके संसारका उच्छेद होना असम्भव
है । ) ॥
षड् जीववर्णाः परमं प्रमाणं कृष्णो धूम्रो नीलमथास्य मध्यम् । रक्तं पुनः सह्यतरं सुखं तु हारिद्रवर्णं सुसुखं च शुक्लम् ॥ ३३ ॥
‘ प्राणियोंके वर्ण छः प्रकारके हैं- कृष्ण, धूम्र, नील, रक्त, हरिद्रा ( पीला ) और शुक्ल* । इनमेंसे कृष्ण, धूम्र और नील वर्णका सुख मध्यम होता है । रक्तवर्ण विशेष रूपसे सहन करने योग्य होता है । हरिद्राकी - सी कान्ति सुख देनेवाली होती है और शुक्लवर्ण अत्यन्त सुखदायक होता है ॥ ३३ ॥
परं तु शुक्लं विमलं विशोकं गतक्लमं सिद्ध्यति दानवेन्द्र । गत्वा तु योनिप्रभवाणि दैत्य
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सहस्रशः सिद्धिमुपैति जीवः ॥ ३४ ॥
‘दानवराज! शुक्लवर्ण निर्मल, शोकहीन, परिश्रम- शून्य होनेके कारण सिद्धिकारक होता है । दितिकुलनन्दन! जीव सहस्रों योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेके बाद मनुष्ययोनिमें आकर कभी सिद्धि लाभ करता है ॥ ३४ ॥
गतिं च यां दर्शनमाह देवो गत्वा शुभं दर्शनमेव चापि । गतिः पुनर्वर्णकृता प्रजानां वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र ॥ ३५ ॥
‘ असुरेन्द्र! देवराज इन्द्रने मंगलमय तत्त्वज्ञान प्राप्त करके हमारे निकट जिस गति और दर्शन- शास्त्रका वर्णन किया है, वह प्राणियोंकी वर्णजनित गति है अर्थात् शुक्लवर्णवालोंको
वही सिद्धि प्राप्त होती है । वह वर्ण कालकृत माना गया है ॥ ३५ ॥
शतं सहस्राणि चतुर्दशेह परागतिर्जीवगणस्य दैत्य । आरोहणं तत्कृतमेव विद्धि स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम् ॥ ३६ ॥
‘ दैत्यप्रवर! इस जगत्में समस्त जीव- समुदायकी परागति चौदह लाख बतायी गयी है । ( पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – ये चौदह करण हैं । इन्हींके भेदसे चौदह प्रकारकी गति होती है । फिर विषयभेदसे वृत्तिभेद होनेके कारण चौदह लाख प्रकारकी गति होती है । ) जीवका जो ऊर्ध्वलोकोंमें गमन होता है, वह भी उन्हीं चौदह करणोंद्वारा सम्पादित होता है । विभिन्न स्थानोंमें जो स्थिरतापूर्वक निवास है, वह और उन स्थानोंसे जो उन जीवोंका अधःपतन होता है, वह भी उन्हींके सम्बन्धसे होता है । इस बातको तुम अच्छी तरह जान लो ( अतः इन चौदह करणोंको सात्त्विक मार्गाभिमुखी बनाना चाहिये ) ॥ ३६ ॥
कृष्णस्य वर्णस्य गतिर्निकृष्टा स सज्जते नरके पच्यमानः । स्थानं तथा दुर्गतिभिस्तु तस्य प्रजाविसर्गान् सुबहून् वदन्ति ॥ ३७ ॥
‘ कृष्णवर्णकी गति नीच बतायी गयी है । वह नरक प्रदान करनेवाले निषिद्ध कर्मोंमें आसक्त होता है, इसीलिये नरककी आगमें पकाया जाता है । वह कुमार्ग में प्रवृत्त हुए पूर्वोक्त चौदह करणोंद्वारा पापाचार करनेके कारण अनेक कल्पोंतक नरकमें ही निवास करता है-ऐसा ऋषि -मुनि कहते हैं ॥ ३७ ॥
शतं सहस्राणि ततश्चरित्वा प्राप्नोति वर्णं हरितं तु पश्चात् ।