श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1821–1830
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1821–1830
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भीष्म उवाच
रथेनेन्द्रः प्रयातो वै सार्धं देवगणैः पुरा ।
ददर्शाथाग्रतो वृत्रं धिष्ठितं पर्वतोपमम् ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! प्राचीन कालकी बात है, इन्द्र रथपर आरूढ़ हो देवताओंको साथ ले वृत्रासुरसे युद्ध करनेके लिये चले । उन्होंने अपने सामने खड़े हुए पर्वतके समान विशालकाय वृत्रको देखा ॥ ७ ॥
योजनानां शतान्यूर्ध्वं पञ्चोच्छ्रितमरिंदम ।
शतानि विस्तरेणाथ त्रीण्येवाभ्यधिकानि वै ॥ ८ ॥
शत्रुदमन नरेश! वह पाँच सौ योजन ऊँचा था और कुछ अधिक तीन सौ योजन उसकी मोटाई थी ॥ ८ ॥
तत् प्रेक्ष्य तादृशं रूपं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् ।
वृत्रस्य देवाः संत्रस्ता न शान्तिमुपलेभिरे ॥ ९ ॥
वृत्रासुरका वह वैसा रूप, जो तीनों लोकोंके लिये भी दुर्जय था, देखकर देवतालोग डर गये । उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ९ ॥
शक्रस्य तु तदा राजन्नूरुस्तम्भो व्यजायत ।
भयाद् वृत्रस्य सहसा दृष्ट्वा तद्रूपमुत्तमम् ॥ १० ॥
राजन्! उस समय वृत्रासुरका वह उत्तम एवं विशाल रूप देखकर सहसा भयके मारे इन्द्रकी दोनों जाँघें अकड़ गयीं ॥ १० ॥
ततो नादः समभवद् वादित्राणां च निःस्वनः ।
देवासुराणां सर्वेषां तस्मिन् युद्धे ह्युपस्थिते ॥ ११ ॥
तदनन्तर वह युद्ध उपस्थित होनेपर समस्त देवताओं और असुरोंके दलोंमें रणवाद्योंका भीषण नाद होने लगा ॥
अथ वृत्रस्य कौरव्य दृष्ट्वा शक्रमवस्थितम् ।
न सम्भ्रमो न भीः काचिदास्था वा समजायत ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! इन्द्रको खड़ा देखकर भी वृत्रासुरके मनमें न तो घबराहट हुई, न कोई भय हुआ और न इन्द्रके प्रति उसकी कोई युद्धविषयक चेष्टा ही हुई ॥
ततः समभवद् युद्धं त्रैलोक्यस्य भयंकरम् ।
शक्रस्य च सुरेन्द्रस्य वृत्रस्य च महात्मनः ॥ १३ ॥
फिर तो देवराज इन्द्र और महामनस्वी वृत्रासुरमें भारी युद्ध छिड़ गया, जो तीनों लोकोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाला था ॥ १३ ॥
असिभिः पट्टिशैः शूलैः शक्तितोमुद्गरैः ।
शिलाभिर्विविधाभिश्च कार्मुकैश्च महास्वनैः ॥ १४ ॥
शस्त्रैश्च विविधैर्दिव्यैः पावकोल्काभिरेव च ।
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देवासुरैस्ततः सैन्यैः सर्वमासीत् समाकुलम् ॥ १५ ॥
उस समय तलवार, पट्टिश, त्रिशूल, शक्ति, तोमर, मुद्गर, नाना प्रकारकी शिला, भयानक टंकार करनेवाले धनुष, अनेक प्रकारके दिव्य अस्त्र- शस्त्र तथा आगकी ज्वालाओंसे एवं देवताओं और असुरोंकी सेनाओंसे यह सारा आकाश व्याप्त हो गया ॥ १४-१५ ॥
पितामहपुरोगाश्च सर्वे देवगणास्तथा ।
ऋषयश्च महाभागास्तद् युद्धं द्रष्टुमागमन् ॥ १६ ॥
विमानाग्र्यैर्महाराज सिद्धाश्च भरतर्षभ ।
गन्धर्वाश्च विमानाग्र्यैरप्सरोभिः समागमन् ॥ १७ ॥
भरतभूषण महाराज! ब्रह्मा आदि समस्त देवता, महाभाग ऋषि, सिद्धगण तथा अप्सराओंसहित गन्धर्व–ये सबके सब श्रेष्ठ विमानोंपर आरूढ़ हो उस अद्भुत युद्धका दृश्य देखनेके लिये वहाँ आ गये थे ॥ १६-१७ ॥
ततोऽन्तरिक्षमावृत्य वृत्रो धर्मभृतां वरः ।
अश्मवर्षेण देवेन्द्रं समाकिरदतिद्रुतम् ॥ १८ ॥
तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरने आकाशको घेरकर बड़ी उतावलीके साथ देवराज इन्द्रपर पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १८ ॥
ततो देवगणाः क्रुद्धाः सर्वतः शरवृष्टिभिः ।
अश्मवर्षमपोहन्त वृत्रप्रेरितमाहवे ॥ १ ९ ॥
यह देख देवगण कुपित हो उठे । उन्होंने युद्धमें सब ओरसे बाणोंकी वर्षा करके वृत्रासुरके चलाये हुए पत्थरोंकी वर्षाको नष्ट कर दिया ॥ १ ९ ॥
वृत्रस्तु कुरुशार्दूल महामायो महाबलः ।
मोहयामास देवेन्द्रं मायायुद्धेन सर्वशः ॥ २० ॥
तस्य वृत्रार्दितस्याथ मोह आसीच्छतक्रतोः ।
रथन्तरेण तं तत्र वसिष्ठः समबोधयत् ॥ २१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! महामायावी महाबली वृत्रासुरने सब ओरसे मायामय युद्ध छेड़कर देवराज इन्द्रको मोहमें डाल दिया । वृत्रासुरसे पीड़ित हुए इन्द्रपर मोह छा गया । तब वसिष्ठजीने रथन्तर सामद्वारा वहाँ इन्द्रको सचेत किया ॥ २०-२१ ॥ वसिष्ठ उवाच
देवश्रेष्ठोऽसि देवेन्द्र दैत्यासुरनिबर्हण ।
त्रैलोक्यबलसंयुक्तः कस्माच्छक्र विषीदसि ॥ २२ ॥
वसिष्ठजीने कहा — देवेन्द्र! तुम सब देवताओंमें श्रेष्ठ हो । दैत्यों तथा असुरोंका संहार करनेवाले शक्र! तुम तो त्रिलोकीके बलसे सम्पन्न हो; फिर इस प्रकार विषादमें क्यों पड़े
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हो? ॥ २२ ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवश्चैव जगत्पतिः ।
सोमश्च भगवान् देवः सर्वे च परमर्षयः ॥ २३ ॥
( समुद्विग्नं समीक्ष्य त्वां स्वस्तीत्यूचुर्जयाय ते । ) ये जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा भगवान् सोमदेव और समस्त महर्षि तुम्हें उद्विग्न देखकर तुम्हारी विजयके लिये स्वस्तिवाचन कर रहे हैं ॥ २३ ॥
मा कार्षीः कश्मलं शक्र कश्चिदेवेतरो यथा ।
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि शत्रून् सुराधिप ॥ २४ ॥
इन्द्र! किसी साधारण मनुष्यके समान तुम कायरता न प्रकट करो । सुरेश्वर! युद्धके लिये श्रेष्ठ बुद्धिका सहारा लेकर अपने शत्रुओंका संहार करो ॥ २४ ॥
एष लोकगुरुस्त्र्यक्षः सर्वलोकनमस्कृतः ।
निरीक्षते त्वां भगवांस्त्यज मोहं सुराधिप ॥ २५ ॥
देवराज! ये सर्वलोकवन्दित लोकगुरु भगवान् त्रिलोचन शिव तुम्हारी ओर कृपापूर्ण
दृष्टिसे देख रहे हैं । तुम मोहको त्याग दो ॥ २५ ॥
एते ब्रह्मर्षयश्चैव बृहस्पतिपुरोगमाः ।
स्तवेन शक्र दिव्येन स्तुवन्ति त्वां जयाय वै ॥ २६ ॥
शक्र! ये बृहस्पति आदि ब्रह्मर्षि तुम्हारी विजयके लिये दिव्य स्तोत्रद्वारा स्तुति कर रहे हैं ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच
एवं सम्बोध्यमानस्य वसिष्ठेन महात्मना ।
अतीव वासवस्यासीद् बलमुत्तमतेजसः ॥ २७ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! महात्मा वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार सचेत किये जानेपर महातेजस्वी इन्द्रका बल बहुत बढ़ गया ॥ २७ ॥
ततो बुद्धिमुपागम्य भगवान् पाकशासनः ।
योगेन महता युक्तस्तां मायां व्यपकर्षत ॥ २८ ॥
तब भगवान् पाकशासनने उत्तम बुद्धिका आश्रय ले महान् योगसे युक्त हो उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ २८ ॥
ततोऽङ्गिरःसुतः श्रीमांस्ते चैव सुमहर्षयः ।
दृष्ट्वा वृत्रस्य विक्रान्तमुपागम्य महेश्वरम् ॥ २ ९ ॥
ऊचुर्वृत्रविनाशार्थं लोकानां हितकाम्यया ।
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तदनन्तर अंगिराके पुत्र श्रीमान् बृहस्पति तथा बड़े- बड़े महर्षियोंने जब वृत्रासुरका पराक्रम देखा, तब महादेवजीके पास आकर लोकहितकी कामनासे वृत्रासुरके विनाशके लिये उनसे निवेदन किया ॥ २ ९ ३ ॥ ततो भगवतस्तेजो ज्वरो भूत्वा जगत्पतेः ॥ ३० ॥
समाविशत् तदा रौद्रो वृत्रं लोकपतिं तदा । तब जगदीश्वर भगवान् शिवका तेज रौद्र ज्वर होकर लोकेश्वर वृत्रके शरीरमें समा गया ॥ ३० ॥
विष्णुश्च भगवान् देवः सर्वलोकाभिपूजितः ॥ ३१ ॥
ऐन्द्रं समाविशद् वज्रं लोकसंरक्षणे रतः । फिर लोकरक्षापरायण सर्वलोकपूजित देवेश्वर भगवान् विष्णुने भी इन्द्रके वज्रमें प्रवेश किया ॥ ३१३ ॥
ततो बृहस्पतिर्धीमानुपागम्य शतक्रतुम् ।
वसिष्ठश्च महातेजाः सर्वे च परमर्षयः ॥ ३२ ॥
ते समासाद्य वरदं वासवं लोकपूजितम् ।
ऊचुरेकाग्रमनसो जहि वृत्रमिति प्रभो ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् बुद्धिमान् बृहस्पति, महातेस्वी वसिष्ठ तथा सम्पूर्ण महर्षि वरदायक, लोकपूजित शतक्रतु इन्द्रके पास जाकर एकाग्रचित्त हो इस प्रकार बोले— ' प्रभो! वृत्रासुरका वध करो ' ॥ ३२-३३ ॥ महेश्वर उवाच
एष वृत्रो महान् शक्र बलेन महता वृतः ।
विश्वात्मा सर्वगश्चैव बहुमायश्च विश्रुतः ॥ ३४ ॥
महेश्वर बोले – इन्द्र! यह महान् वृत्रासुर बड़ी भारी सेनासे घिरा हुआ तुम्हारे सामने खड़ा है । ज्ञाननिष्ठ होनेके कारण यह सम्पूर्ण विश्वका आत्मा है । इसमें सर्वत्र गमन करनेकी शक्ति है । यह अनेक प्रकारकी मायाओंका सुविख्यात ज्ञाता भी है ॥ ३४ ॥
तदेनमसुरश्रेष्ठं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् ।
जहि त्वं योगमास्थाय मावमंस्थाः सुरेश्वर ॥ ३५ ॥
सुरेश्वर! यह श्रेष्ठ असुर तीनों लोकोंके लिये भी दुर्जय है । तुम योगका आश्रय लेकर
इसका वध करो । इसकी अवहेलना न करो ॥ ३५ ॥
अनेन हि तपस्तप्तं बलार्थममराधिप ।
षष्टिं वर्षसहस्राणि ब्रह्मा चास्मै वरं ददौ ॥ ३६ ॥
अमरेश्वर! इस वृत्रासुरने बलकी प्राप्तिके लिये ही साठ हजार वर्षोंतक तप किया था और तब ब्रह्माजीने इसे मनोवाञ्छित वर दिया था ॥ ३६ ॥
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महत्त्वं योगिनां चैव महामायत्वमेव च ।
महाबलत्वं च तथा तेजश्चाग्र्यं सुरेश्वर ॥ ३७ ॥
सुरेन्द्र! उन्होंने इसे योगियोंकी महिमा, महा- मायावीपन, महान् बल- पराक्रम तथा सर्वश्रेष्ठ तेज प्रदान किया है ॥ ३७ ॥
एतत् त्वां मामकं तेजः समाविशति वासव ।
व्यग्रमेनं त्वमप्येनं वज्रेण जहि दानवम् ॥ ३८ ॥
वासव! लो, यह मेरा तेज तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करता है । इस समय दानव वृत्रज्वरके कारण बहुत व्यग्र हो रहा है; इसी अवस्थामें तुम वज्रसे इसे मार डालो ॥ ३८ ॥
शक्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन दितिजं सुदुरासदम् ।
वज्रेण निहनिष्यामि पश्यतस्ते सुरर्षभ ॥ ३ ९ ॥
इन्द्रने कहा— भगवन्! सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे इस दुर्धर्ष दैत्यको मैं आपके देखते-देखते वज्रसे मार डालूँगा ॥ भीष्म उवाच
आविश्यमाने दैत्ये तु ज्वरेणाथ महासुरे ।
देवतानामृषीणां च हर्षान्नादो महानभूत् ॥ ४० ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! जब महादैत्य वृत्रासुरके शरीरमें ज्वरने प्रवेश किया, तब देवता और ऋषियोंका महान् हर्षनाद वहाँ गूँज उठा ॥ ४० ॥
ततो दुन्दुभयश्चैव शङ्खाश्च सुमहास्वनाः ।
मुरजा डिण्डिमाश्चैव प्रावाद्यन्त सहस्रशः ॥ ४१ ॥
फिर तो दुन्दुभियाँ, जोर- जोरसे बजनेवाले शंख, ढोल और नगाड़े आदि सहस्रों बाजे बजाये जाने लगे ॥
असुराणां तु सर्वेषां स्मृतिलोपो महानभूत् ।
मायानाशश्च बलवान् क्षणेन समपद्यत ॥ ४२ ॥
समस्त असुरोंकी स्मरण शक्तिका बड़ा भारी लोप हो गया । क्षणभरमें उनकी सारी मायाओंका पूर्णरूपसे विनाश हो गया ॥ ४२ ॥
तथाविष्टमथो ज्ञात्वा ऋषयो देवतास्तथा ।
स्तुवन्तः शक्रमीशानं तथा प्राचोदयन्नपि ॥ ४३ ॥
इस प्रकार वृत्रासुरमें महादेवजीके ज्वरका आवेश हुआ जान देवता और ऋषि देवेश्वर इन्द्रकी स्तुति करते हुए उन्हें वृत्रवधके लिये प्रेरणा देने लगे ॥ ४३ ॥
रथस्थस्य हि शक्रस्य युद्धकाले महात्मनः ।
ऋषिभः स्तूयमानस्य रूपमासीत् सुदुर्दृशम् ॥ ४४ ॥
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युद्धके समय रथपर बैठकर ऋषियोंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए महामना इन्द्रका रूप ऐसा तेजस्वी प्रतीत होता था कि उसकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन जान पड़ता था ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रवधे एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्रासुरका वधविषयक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २८१ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुछ ४४३ श्लोक हैं ) PO
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द्वयशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन भीष्म उवाच
वृत्रस्य तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वशः ।
अभवन् यानि लिङ्गानि शरीरे तानि मे शृणु ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं — महाराज! ज्वरसे आविष्ट हुए वृत्रासुरके शरीरमें जो लक्षण प्रकट हुए थे, उन्हें मुझसे सुनो ॥ १ ॥
ज्वलितास्योऽभवद् घोरो वैवर्ण्यं चागमत् परम् ।
गात्रकम्पश्च सुमहान् श्वासश्चाप्यभवन्महान् ॥ २ ॥
उसके मुखमें विशेष जलन होने लगी । उसकी आकृति बड़ी भयानक हो गयी । अंगकान्ति बहुत फीकी पड़ गयी । शरीर जोर- जोरसे काँपने लगा तथा बड़े वेगसे साँस चलने लगी ॥ २ ॥
रोमहर्षश्च तीव्रोऽभून्निःश्वासश्च महान् नृप ।
शिवा चाशिवसंकाशा तस्य वक्त्रात् सुदारुणा ॥ ३ ॥
निष्पपात महाघोरा स्मृतिः सा तस्य भारत । नरेश्वर! उसके सारे शरीरमें तीव्र रोमांच हो आया । वह लंबी साँस खींचने लगा । भरतनन्दन! वृत्रासुरके मुखसे अत्यन्त भयंकर अकल्याणस्वरूपा महाघोर गीदड़ीके रूपमें उसकी स्मरणशक्ति ही बाहर निकल पड़ी ॥ ३३ ॥
उल्काश्च ज्वलितास्तस्य दीप्ताः पार्श्वे प्रपेदिरे ॥ ४ ॥
गृध्राः कङ्का बलाकाश्च वाचोऽमुञ्चन् सुदारुणाः ।
वृत्रस्योपरि संसृष्टाश्चक्रवत् परिबभ्रमुः ॥ ५ ॥
उसके पार्श्वभागमें प्रज्वलित एवं प्रकाशित उल्काएँ गिरने लगीं। गीध, कंक, बगले आदि भयंकर पक्षी अपनी बोली सुनाने लगे और एक- दूसरेसे सटकर वृत्रासुरके ऊपर चक्रकी भाँति घूमने लगे ॥ ४-५ ॥
ततस्तं रथमास्थाय देवाप्यायित आहवे ।
वज्रोद्यतकरः शक्रस्तं दैत्यं समवैक्षत ॥ ६ ॥
तदनन्तर महादेवजीके तेजसे युद्धमें उस दैत्यकी ओर देखा ॥ ||परिपुष्ट हो वज्र हाथमें लिये हुए इन्द्रने रथपर बैठकर अमानुषमथो नादं स मुमोच महासुरः ।
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व्यजृम्भच्चैव राजेन्द्र तीव्रज्वरसमन्वितः ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! इसी समय तीव्र ज्वरसे पीड़ित हो उस महान् असुरने अमानुषी गर्जना की और बारंबार जँभाई ली ॥ ७ ॥
अथास्य जृम्भतः शक्रस्ततो वज्रमवासृजत् ।
स वज्रः सुमहातेजाः कालाग्निसदृशोपमः ॥ ८ ॥
जँभाई लेते समय ही इन्द्रने उसके ऊपर वज्रका प्रहार किया । वह महातेजस्वी वज्र कालाग्निके समान जान पड़ता था ॥ ८ ॥
क्षिप्रमेव महाकायं वृत्रं दैत्यमपातयत् ।
ततो नादः समभवत् पुनरेव समन्ततः ॥ ९ ॥
वृत्रं विनिहतं दृष्ट्वा देवानां भरतर्षभः । उसने उस महाकाय दैत्य वृत्रासुरको तुरंत ही धराशायी कर दिया । भरतश्रेष्ठ! फिर तो वृत्रासुरको मारा गया देख चारों ओरसे देवताओंका सिंहनाद वहाँ ' बारबार गूँजने लगा ॥ ९ वृत्रं तु हत्वा मघवा दानवारिर्महायशाः ॥ १० ॥
वज्रेण विष्णुयुक्तेन दिवमेव समाविशत् । दानवशत्रु महायशस्वी इन्द्रने विष्णुके तेजसे व्याप्त हुए वज्रके द्वारा वृत्रासुरका वध करके पुनः स्वर्गलोकमें ही प्रवेश किया ॥ १०३ ॥
अथ वृत्रस्य कौरव्य शरीरादभिनिःसृता ॥ ११ ॥
ब्रह्मवध्या महाघोरा रौद्रा लोकभयावहा ।
करालदशना भीमा विकृता कृष्णपिङ्गला ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर वृत्रासुरके मृत शरीरसे सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली महाघोर एवं क्रूर स्वभाववाली ब्रह्महत्या प्रकट हुई । उसके दाँत बड़े विकराल थे । उसकी आकृति
कृष्ण और पिंगल वर्णकी थी । वह देखनेमें बड़ी भयानक और विकृत रूपवाली थी ॥
प्रकीर्णमूर्धजा चैव घोरनेत्रा च भारत ।
कपालमालिनी चैव कृत्येव भरतर्षभ ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! उसके बाल बिखरे हुए थे, नेत्र बड़े भयावने थे । उसके गलेमें नरमुण्डोंकी माला थी । भरतश्रेष्ठ! वह कृत्या- सी जान पड़ती थी ॥ १३ ॥
रुधिरार्द्रा च धर्मज्ञ चीरवल्कलवासिनी ।
साभिनिष्क्रम्य राजेन्द्र तादृग्रूपा भयावहा ॥ १४ ॥
वज्रिणं मृगयामास तदा भरतसत्तम । धर्मज्ञ राजेन्द्र! भरतसत्तम! उसके सारे अंग रक्तसे भींगे हुए थे । उसने चीर और वल्कल पहन रखे थे । ऐसे विकराल रूपवाली वह भयानक ब्रह्महत्या वृत्रके शरीरसे
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निकलकर तत्काल ही वज्रधारी इन्द्रको खोजने लगी ॥ १४२ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य वृत्रहा कुरुनन्दन ॥ १५ ॥
स्वर्गायाभिमुखः प्रायाल्लोकानां हितकाम्यया ।
सा विनिःसरमाणं तु दृष्ट्वा शक्रं महौजसम् ॥ १६ ॥
कुरुनन्दन! उस समय वृत्रविनाशक इन्द्र लोक-हितकी कामनासे स्वर्गकी ओर जा रहे थे । महातेजस्वी इन्द्रको युद्धभूमिसे निकलकर जाते देख ब्रह्महत्या कुछ ही कालमें उनके पास जा पहुँची ॥ १५-१६ ॥
जग्राह वध्या देवेन्द्रं सुलग्ना चाभवत् तदा ।
स हि तस्मिन् समुत्पन्ने ब्रह्मवध्याकृते भये ॥ १७ ॥
नलिन्या बिसमध्यस्थ उवासाब्दगणान् बहून् । उस ब्रह्महत्याने देवेन्द्रको पकड़ लिया और वह तुरंत ही उनके शरीरसे सट गयी । वह ब्रह्महत्याजनित भय उपस्थित होनेपर इन्द्र उससे पिण्ड छुड़ानेके लिये भागे और कमलकी नालके भीतर घुसकर उसीमें बहुत वर्षोंतक छिपे रहे ॥ १७३ ॥
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अनुसृत्य तु यत्नात् स तथा वै ब्रह्महत्यया ॥ १८ ॥
तदा गृहीतः कौरव्य निस्तेजाः समपद्यत ।
परंतु उस ब्रह्महत्याने यत्नपूर्वक उनका पीछा करके वहाँ भी उन्हें जा पकड़ा ।
कुरुनन्दन! ब्रह्महत्याद्वारा पकड़ लिये जानेपर इन्द्र निस्तेज हो गये ॥ १८३ ॥
तस्या व्यपोहने शक्रः परं यत्नं चकार ह ॥ १ ९ ॥
न चाशकत् तां देवेन्द्रो ब्रह्मवध्यां व्यपोहितुम् । देवेन्द्रने उसके निवारणके लिये महान् प्रयत्न किया; परंतु किसी तरह भी वे उसे दूर न कर सके ॥ गृहीत एव तु तया देवेन्द्रो भरतर्षभ ॥ २० ॥
पितामहमुपागम्य शिरसा प्रत्यपूजयत् । भरतभूषण! ब्रह्महत्याने देवराज इन्द्रको अपना बंदी बना ही लिया । वे उसी अवस्थामें ब्रह्माजीके पास गये और मस्तक झुकाकर उन्होंने ब्रह्माजीको प्रणाम किया ॥ ज्ञात्वा गृहीतं शक्रं स द्विजप्रवरवध्यया ॥ २१ ॥
ब्रह्मा स चिन्तयामास तदा भरतसत्तम । भरतसत्तम! एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके वधसे पैदा हुई ब्रह्महत्याने इन्द्रको पकड़ लिया है-यह जानकर ब्रह्माजी विचार करने लगे ॥ २१३ ॥
तामुवाच महाबाहो ब्रह्मवध्यां पितामहः ॥ २२ ॥
स्वरेण मधुरेणाथ सान्त्वयन्निव भारत । महाबाहु भारत! तब ब्रह्माजीने उस ब्रह्महत्याको अपनी मीठी वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए- से उससे कहा- ॥ २२ ॥
मुच्यतां त्रिदशेन्द्रोऽयं मत्प्रियं कुरु भाविनि ॥ २३ ॥
ब्रूहि किं ते करोम्यद्य कामं किं त्वमिहेच्छसि ॥ २४ ॥
‘ भाविनि! ये देवताओंके राजा इन्द्र हैं, इन्हें छोड़ दो । मेरा यह प्रिय कार्य करो । बोलो, मैं तुम्हारी कौन- सी अभिलाषा पूर्ण करूँ । तुम जिस किसी मनोरथको पाना चाहो उसे बताओ ' ॥ २३-२४ ॥ ब्रह्मवध्योवाच
त्रिलोकपूजिते देवे प्रीते त्रैलोक्यकर्तरि ।
कृतमेव हि मन्यामि निवासं तु विधत्स्व मे ॥ २५ ॥
ब्रह्महत्या बोली – तीनों लोकोंकी सृष्टि करने वाले त्रिभुवनपूजित आप परमदेवके प्रसन्न हो जानेपर मैं अपने सारे मनोरथोंको पूर्ण हुआ ही मानती हूँ । अब आप मेरे लिये केवल निवासस्थानका प्रबन्ध कर दीजिये ॥ २५ ॥
त्वया कृतेयं मर्यादा लोकसंरक्षणार्थिना ।