श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1831–1840

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1831–1840

पृष्ठ 1831

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स्थापना वै सुमहती त्वया देव प्रवर्तिता ॥ २६ ॥

आपने सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये यह धर्मकी मर्यादा बाँधी है । देव! आपहीने इस महत्त्वपूर्ण मर्यादाकी स्थापना करके इसे चलाया है ॥ २६ ॥

प्रीते तु त्वयि धर्मज्ञ सर्वलोकेश्वर प्रभो ।

शक्रादपगमिष्यामि निवासं संविधत्स्व मे ॥ २७ ॥

धर्मके ज्ञाता सर्वलोकेश्वर प्रभो! जब आप प्रसन्न हैं तो मैं इन्द्रको छोड़कर हट जाऊँगी; परंतु आप मेरे लिये निवास - स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये ॥ २७ ॥

भीष्म उवाच

तथेति तां प्राह तदा ब्रह्मवध्यां पितामहः ।

उपायतः स शक्रस्य ब्रह्मवध्यां व्यपोहत ॥ २८ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तब ब्रह्माजीने ब्रह्महत्यासे कहा - ' बहुत अच्छा, मैं तुम्हारे रहनेकी व्यवस्था करता हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने उपायद्वारा इन्द्रकी ब्रह्महत्याको दूर किया ॥ २८ ॥

ततः स्वयम्भुवा ध्यातस्तत्र वह्निर्महात्मना ।

ब्रह्माणमुपसंगम्य ततो वचनमब्रवीत् ॥ २ ९ ॥

तदनन्तर महात्मा स्वयम्भूने वहाँ अग्निदेवका स्मरण किया । उनके स्मरण करते ही वे ब्रह्माजीके पास आ गये और इस प्रकार बोले- ॥ २ ९ ॥

प्राप्तोऽस्मि भगवन् देव त्वत्सकाशमनिन्दित ।

यत् कर्तव्यं मया देव तद् भवान् वक्तुमर्हसि ॥ ३० ॥

‘ भगवन्! अनिन्द्य देव! मैं आपके निकट आया हूँ। प्रभो! मुझे जो कार्य करना हो, उसके लिये आप मुझे आज्ञा दें ' ॥ ३० ॥

ब्रह्मोवाच

बहुधा विभजिष्यामि ब्रह्मवध्यामिमामहम् ।

शक्रस्याघविमोक्षार्थं चतुर्भागं प्रतीच्छ वै ॥ ३१ ॥

ब्रह्माजीने कहा — अग्निदेव! मैं इन्द्रको पापमुक्त करनेके लिये इस ब्रह्महत्याके कई भाग करूँगा । इसका एक चतुर्थांश तुम भी ग्रहण कर लो ॥ ३१ ॥

अग्निरुवाच

मम मोक्षस्य कोऽन्तो वै ब्रह्मन् ध्यायस्व वै प्रभो ।

एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वतो लोकपूजित ॥ ३२ ॥

अग्निने कहा —ब्रह्मन्! प्रभो! मेरे लिये आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, परंतु मैं भी इस ब्रह्महत्यासे मुक्त हो सकूँ, इसके लिये इसकी अन्तिम अवधि क्या होगी, इसपर आप विचार

पृष्ठ 1832

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करें । विश्ववन्द्य पितामह! मैं इस बातको ठीक - ठीक जानना चाहता हूँ ॥ ३२ ॥

ब्रह्मोवाच

यस्त्वां ज्वलन्तमासाद्य स्वयं वै मानवः क्वचित् ।

बीजौषधिरसैर्वह्ने न यक्ष्यति तमोवृतः ॥ ३३ ॥

तमेषा यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति ।

ब्रह्मवध्या हव्यवाह व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजीने कहा — अग्निदेव! यदि किसी स्थानपर तुम प्रज्वलित हो रहे हो, वहाँ पहुँचकर कोई अधिकारी मानव तमोगुणसे आवृत होनेके कारण बीज, ओषधि या रसोंसे स्वयं ही तुम्हारा पूजन नहीं करेगा तो उसीपर तुरंत यह ब्रह्महत्या चली जायगी और उसीके भीतर निवास करने लगेगी; अतः हव्यवाहन! तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ३३-३४ ॥

इत्युक्तः प्रतिजग्राह तद् वचो हव्यकव्यभुक् ।

पितामहस्य भगवांस्तथा च तदभूत् प्रभो ॥ ३५ ॥

प्रभो! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर हव्य और कव्यके भोक्ता भगवान् अग्निदेवने उन पितामहकी वह आज्ञा स्वीकार कर ली । इस प्रकार ब्रह्महत्याका एक चौथाई भाग अग्निमें चला गया ॥ ३५ ॥

ततो वृक्षौषधितृणं समाहूय पितामहः ।

इममर्थं महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ॥ ३६ ॥

महाराज! इसके बाद पितामह वृक्ष, तृण और ओषधियोंको बुलाकर उनसे भी वही बात कहने लगे ॥ (ब्रह्मोवाच इयं वृत्रादनुप्राप्ता ब्रह्महत्या महाभया । पुरुहूतं चतुर्थांशमस्या यूयं प्रतीच्छथ ॥ ) ब्रह्माजी बोले- वृत्रासुरके वधसे यह महाभयंकर ब्रह्महत्या प्रकट होकर इन्द्रके पीछे लगी है । तुमलोग उसका एक चौथाई भाग स्वयं ग्रहण कर लो ॥

ततो वृक्षौषधितृणं तथैवोक्तं यथातथम् ।

व्यथितं वह्निवद् राजन् ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥ ३७ ॥

राजन्! ब्रह्माजीने जब उसी प्रकार सब बातें ठीक - ठीक सामने रख दीं, तब अग्निके ही समान वृक्ष, तृण और ओषधियोंका समुदाय भी व्यथित हो उठा और उन सबने ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ३७ ॥

अस्माकं ब्रह्मवध्यायाः कोऽन्तो लोकपितामह ।

दैवेनाभिहतानस्मान् न पुनर्हन्तुमर्हसि ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 1833

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‘ लोकपितामह! हमारी इस ब्रह्महत्याका अन्त क्या होगा? हम तो यों ही दैवके मारे हुए स्थावर योनिमें पड़े हैं; अतः अब आप पुनः हमें न मारें ॥ ३८ ॥

वयमग्निं तथा शीतं वर्षं च पवनेरितम् ।

सहामः सततं देव तथा च्छेदनभेदने ॥ ३ ९ ॥

ब्रह्मवध्यामिमामद्य भवतः शासनाद् वयम् ।

ग्रहीष्यामस्त्रिलोकेश मोक्षं चिन्तयतां भवान् ॥ ४० ॥

‘ देव! त्रिलोकीनाथ! हमलोग सदा अग्नि और धूपका ताप, सर्दी, वर्षा, आँधी और अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा भेदन-छेदनका कष्ट सहते रहते हैं । आज आपकी आज्ञासे इस ब्रह्महत्याको भी ग्रहण कर लेंगे; किंतु आप इनसे हमारे छुटकारेका उपाय भी तो सोचिये ' ॥ ब्रह्मोवाच

पर्वकाले तु सम्प्राप्ते यो वै च्छेदनभेदनम् ।

करिष्यति नरो मोहात् तमेषानुगमिष्यति ॥ ४१ ॥

ब्रह्माजीने कहा — संक्रान्ति, ग्रहण, पूर्णिमा, अमावास्या आदि पर्वकाल प्राप्त होनेपर जो मनुष्य मोहवश तुम्हारा भेदन-छेदन करेगा, उसीके पीछे तुम्हारी यह ब्रह्महत्या लग जायगी ॥ ४१ ॥

भीष्म उवाच

ततो वृक्षौषधितृणमेवमुक्तं महात्मना ।

ब्रह्माणमभिसम्पूज्य जगामाशु यथागतम् ॥ ४२ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! महात्मा ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वृक्ष, ओषधि और तृणका समुदाय उनकी पूजा करके जैसे आया था, वैसे ही शीघ्र लौट गया ॥

आहूयाप्सरसो देवस्ततो लोकपितामहः ।

वाचा मधुरया प्राह सान्त्वयन्निव भारत ॥ ४३ ॥

भारत! तत्पश्चात् लोकपितामह ब्रह्माजीने अप्सराओंको बुलाकर उन्हें मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए - से कहा— ॥ ४३ ॥

इयमिन्द्रादनुप्राप्ता ब्रह्मवध्या वराङ्गनाः ।

चतुर्थमस्या भागांशं मयोक्ताः सम्प्रतीच्छत ॥ ४४ ॥

‘ सुन्दरियो! यह ब्रह्महत्या इन्द्रके पाससे आयी है । तुमलोग मेरे कहनेसे इसका एक चतुर्थांश ग्रहण कर लो' ॥ अप्सरस ऊचुः ग्रहणे कृतबुद्धीनां देवेश तव शासनात् ।

पृष्ठ 1834

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मोक्षं समयतोऽस्माकं चिन्तयस्व पितामह ॥ ४५ ॥

अप्सराएँ बोलीं – देवेश पितामह! आपकी आज्ञासे हमने इस ब्रह्महत्याको ग्रहण कर लेनेका विचार किया है, किंतु इससे हमारे छुटकारे के समयका भी विचार करनेकी कृपा करें ॥ ४५ ॥

ब्रह्मोवाच

रजस्वलासु नारीषु यो वै मैथुनमाचरेत् ।

तमेषा यास्यति क्षिप्रं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥ ४६ ॥

ब्रह्माजीने कहा-जो पुरुष रजस्वला स्त्रियोंके साथ मैथुन करेगा, उसपर यह ब्रह्महत्या शीघ्र चली जायगी; अतः तुम्हारी यह मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ४६ ॥

भीष्म उवाच

तथेति हृष्टमनस इत्युक्त्वाप्सरसां गणाः ।

स्वानि स्थानानि सम्प्राप्य रेमिरे भरतर्षभ ॥ ४७ ॥

भीष्मजी कहते हैं — भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर अप्सराओंका मन प्रसन्न हो गया । वे ' बहुत अच्छा ' कहकर अपने - अपने स्थानोंमें जाकर विहार करने लगीं ॥

ततस्त्रिलोककृद् देवः पुनरेव महातपाः ।

अपःसंचिन्तयामास ध्यातास्ताश्चाप्यथागमन् ॥ ४८ ॥

तब त्रिभुवनकी सृष्टि करनेवाले महातपस्वी भगवान् ब्रह्माने पुनः जलका चिन्तन किया । उनके स्मरण करते ही तुरंत जलदेवता वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ४८ ॥

तास्तु सर्वाः समागम्य ब्रह्माणममितौजसम् ।

इदमूचुर्वचो राजन् प्रणिपत्य पितामहम् ॥ ४ ९ ॥

राजन्! वे सब अमित तेजस्वी पितामह ब्रह्माजीके पास पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोले— ॥

इमाः स्म देव सम्प्राप्तास्त्वत्सकाशमरिंदम ।

शासनात् तव लोकेश समाज्ञापय नः प्रभो ॥ ५० ॥

' शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रभो! देव! लोकनाथ! हम आपकी आज्ञासे सेवामें उपस्थित हुए हैं । हमें आज्ञा दीजिये, हम कौन- सी सेवा करें? ' ॥ ५० ॥

ब्रह्मोवाच

इयं वृत्रादनुप्राप्ता पुरुहूतं महाभया ।

ब्रह्मवध्या चतुर्थांशमस्या यूयं प्रतीच्छत ॥ ५१ ॥

पृष्ठ 1835

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ब्रह्माजीने कहा – वृत्रासुरके वधसे इन्द्रको यह महाभयंकर ब्रह्महत्या प्राप्त हुई है । तुमलोग इसका एक चौथाई भाग ग्रहण कर लो ॥ ५१ ॥

आप ऊचुः

एवं भवतु लोकेश यथा वदसि नः प्रभो ।

मोक्षं समयतोऽस्माकं संचिन्तयितुमर्हसि ॥ ५२ ॥

जलदेवताने कहा — लोकेश्वर! प्रभो! आप जैसा कहते हैं, ऐसा ही होगा; परंतु हम इस ब्रह्महत्यासे किस समय छुटकारा पायेंगे, इसका भी विचार कर लें ॥ ५२ ॥

त्वं हि देवेश सर्वस्य जगतः परमा गतिः ।

कोऽन्यः प्रसादो हि भवेद् यन्नः कृच्छ्रात् समुद्धरेत् ॥ ५३ ॥

देवेश्वर! आप ही इस सम्पूर्ण जगत्के परम आश्रय हैं। आप हमारा इस संकटसे उद्धार कर दें, इससे बढ़कर हम लोगोंपर दूसरा कौन अनुग्रह होगा ॥ ५३ ॥

ब्रह्मोवाच

अल्पा इति मतिं कृत्वा यो नरो बुद्धिमोहितः ।

श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि युष्मासु प्रतिमोक्ष्यति ॥ ५४ ॥

तमियं यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति ।

तथा वो भविता मोक्ष इति सत्यं ब्रवीमि वः ॥ ५५ ॥

ब्रह्माजीने कहा-जो मनुष्य अपनी बुद्धिकी मन्दतासे मोहित होकर जलमें तुच्छ बुद्धि करके तुम्हारे भीतर थूक, खँखार या मल- मूत्र डालेगा, तुम्हें छोड़कर यह ब्रह्महत्या तुरंत उसीपर चली जायगी और उसीके भीतर निवास करेगी। इस प्रकार तुमलोगोंका ब्रह्महत्यासे उद्धार हो जायगा, यह मैं सत्य कहता हूँ ॥ ५४-५५ ॥

ततो विमुच्य देवेन्द्रं ब्रह्मवध्या युधिष्ठिर ।

यथा विसृष्टं तं वासमगमद् देवशासनात् ॥ ५६ ॥

युधिष्ठिर! तदनन्तर देवराज इन्द्रको छोड़कर वह ब्रह्महत्या ब्रह्माजीकी आज्ञासे उनके दिये हुए पूर्वोक्त निवास- स्थानोंको चली गयी ॥ ५६ ॥

एवं शक्रेण सम्प्राप्ता ब्रह्मवध्या जनाधिप ।

पितामहमनुज्ञाप्य सोऽश्वमेधमकल्पयत् ॥ ५७ ॥

नरेश्वर! इस प्रकार इन्द्रको ब्रह्महत्या प्राप्त हुई थी, फिर उन्होंने ब्रह्माजीकी आज्ञा लेकर अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ५७ ॥

श्रूयते च महाराज सम्प्राप्ता वासवेन वै ।

ब्रह्मवध्या ततः शुद्धिं हयमेधेन लब्धवान् ॥ ५८ ॥

महाराज! सुननेमें आता है कि इन्द्रको जो ब्रह्महत्या लगी थी, उससे उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करके ही शुद्धि लाभ की थी ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 1836

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समवाप्य श्रियं देवो हत्वारींश्च सहस्रशः ।

प्रहर्षमतुलं लेभे वासवः पृथिवीपते ॥ ५ ९ ॥

पृथ्वीनाथ! देवराज इन्द्रने सहस्रों शत्रुओंका वध करके अपनी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पाकर अनुपम आनन्द प्राप्त किया ॥ ५ ९ ॥

वृत्रस्य रुधिराच्चैव शिखण्डाः पार्थ जज्ञिरे ।

द्विजातिभिरभक्ष्यास्ते दीक्षितैश्च तपोधनैः ॥ ६० ॥

कुन्तीनन्दन! वृत्रासुरके रक्तसे बहुतेरे छत्रक उत्पन्न हुए थे, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके लिये तथा यज्ञकी दीक्षा लेनेवालोंके लिये और तपस्वियोंके लिये अभक्षणीय हैं ॥ ६० ॥

सर्वावस्थं त्वमप्येषां द्विजातीनां प्रियं कुरु ।

इमे हि भूतले देवाः प्रथिताः कुरुनन्दन ॥ ६१ ॥

कुरुनन्दन! तुम भी इन ब्राह्मणोंका सभी अवस्थाओंमें प्रिय करो । ये इस पृथ्वीपर देवताके रूपमें विख्यात हैं ॥

एवं शक्रेण कौरव्य बुद्धिसौक्ष्म्यान्महासुरः ।

उपायपूर्वं निहतो वृत्रो ह्यमिततेजसा ॥ ६२ ॥

कुरुकुलभूषण! इस तरह अमित तेजस्वी देवराज इन्द्रने अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे काम लेकर उपायपूर्वक महान् असुर वृत्रका वध किया था ॥ ६२ ॥

एवं त्वमपि कौन्तेय पृथिव्यामपराजितः ।

भविष्यसि यथा देवः शतक्रतुरमित्रहा ॥ ६३ ॥

कुन्तीकुमार! जैसे स्वर्गलोकमें शत्रुसूदन इन्द्रदेव विजयी हुए थे, उसी प्रकार तुम भी इस पृथ्वीपर किसीसे पराजित होनेवाले नहीं हो ॥ ६३ ॥

ये तु शक्रकथां दिव्यामिमां पर्वसु पर्वसु ।

विप्रमध्ये वदिष्यन्ति न ते प्राप्स्यन्ति किल्बिषम् ॥ ६४ ॥

जो प्रत्येक पर्वके दिन ब्राह्मणोंकी सभामें इस दिव्य कथाका प्रवचन करेंगे, उन्हें किसी प्रकारका पाप नहीं प्राप्त होगा ॥ ६४ ॥

इत्येतद् वृत्रमाश्रित्य शक्रस्यात्यद्भुतं महत् ।

कथितं कर्म ते तात किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ६५ ॥

तात! इस प्रकार वृत्रासुरके प्रसंगसे मैंने तुम्हें यह इन्द्रका अत्यन्त अद्भुत चरित्र सुना दिया । अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ६५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ब्रह्महत्याविभागे द्वयशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८२ ॥

पृष्ठ 1837

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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ब्रह्महत्याका विभाजनविषयक दो सौ बयासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६६ श्लोक हैं) Fard * अध्याय २८० के ५ ९ वें श्लोकमें आया है कि ' वृत्रासुरने अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर उन्हींका चिन्तन करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वरके परम धामको प्राप्त कर लिया' – यहाँ भी इतनी बात और समझ लेनी चाहिये ।

पृष्ठ 1838

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त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।

अस्मिन् वृत्रवधे देव विवक्षा मम जायते ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! देव! इस वृत्रवधके प्रसंगमें मुझे कुछ पूछनेकी इच्छा हो रही है ॥ १ ॥

ज्वरेण मोहितो वृत्रः कथितस्ते जनाधिप ।

निहतो वासवेनेह वज्रेणेति तदानघ ॥ २ ॥

निष्पाप जनेश्वर! आपने कहा है कि वृत्रासुर ज्वरसे मोहित हो गया था, उसी अवस्थामें इन्द्रने अपने वज्रसे उसे मार डाला ॥ २ ॥

कथमेष महाप्राज्ञ ज्वरः प्रादुर्बभौ कुतः ।

ज्वरोत्पत्तिं निपुणतः श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ ३ ॥

महामते! प्रभो! यह ज्वर कैसे और कहाँसे उत्पन्न हुआ? मैं ज्वरकी उत्पत्तिका प्रसंग भलीभाँति सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

शृणु राजन् ज्वरस्येमं सम्भवं लोकविश्रुतम् ।

विस्तरं चास्य वक्ष्यामि यादृशश्चैव भारत ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! ज्वरकी उत्पत्तिका यह वृत्तान्त सम्पूर्ण लोकोंमें प्रसिद्ध है, सुनो । भारत! यह प्रसंग जैसा है, उसे मैं विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ ॥ ४ ॥

पुरा मेरोर्महाराज शृङ्गं त्रैलोक्यपूजितम् ।

ज्योतिष्कं नाम सावित्रं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ ५ ॥

अप्रमेयमनाधृष्यं सर्वलोकेषु भारत । भरतनन्दन! महाराज! पूर्वकालमें सुमेरु पर्वतका ज्योतिष्क नामसे प्रसिद्ध एक शिखर था, जो सविता ( सूर्य ) देवतासे सम्बन्ध रखनेके कारण सावित्र कहलाता था । वह सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, अप्रमेय, समस्त लोकोंके लिये अगम्य और तीनों लोकोंद्वारा पूजित था ॥ तत्र देवो गिरितटे हेमधातुविभूषिते ॥ ६ ॥

पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो बभूव ह ।

पृष्ठ 1839

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1839 का मूल पृष्ठ
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शैलराजसुता चास्य नित्यं पार्श्वे स्थिता बभौ ॥ ७ ॥

सुवर्णमय धातुसे विभूषित उस पर्वतशिखरके तटपर बैठे हुए महादेवजी उसी प्रकार अपूर्व शोभा पाते थे मानो किसी सुन्दर पर्यङ्कपर बैठे हों । वहीं प्रतिदिन उनके वामपार्श्वमें रहकर गिरिराजनन्दिनी भगवती पार्वती भी अनुपम शोभा पाती थीं ॥ ६-७ ॥ तथा देवा महात्मानो वसवश्चामितौजसः ।

तथैव च महात्मानावश्विनौ भिषजां वरौ ।

तथा वैश्रवणो राजा गुह्यकैरभिसंवृतः ॥ ८ ॥

यक्षाणामीश्वरः श्रीमान् कैलासनिलयःप्रभुः । ( शङ्खपद्मनिधिभ्यां च ऋद्ध्या परमया सह । ) उपासन्त महात्मानमुशना च महामुनिः ॥ ९ ॥

इसी प्रकार वहाँ बहुत - से महामनस्वी देवता, अमित तेजस्वी वसुगण, चिकित्सकोंमें श्रेष्ठ महामना अश्विनीकुमार, शंखनिधि, पद्मनिधि तथा उत्तम ऋद्धिके साथ गुह्यकोंसे घिरे हुए कैलासवासी यक्षपति प्रभुतासम्पन्न श्रीमान् राजा कुबेर तथा महामुनि शुक्राचार्य — ये सभी परमात्मा महादेवजीकी उपासना किया करते थे ॥ ८ - ९ ॥

सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव च महर्षयः ।

अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा देवर्षयोऽपरे ॥ १० ॥

विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा नारदपर्वतौ ।

अप्सरोगणसंघाश्च समाजग्मुरनेकशः ॥ ११ ॥

सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि तथा अन्य देवर्षि, विश्वावसु गन्धर्व, नारद, पर्वत और अप्सराओंके अनेक समुदाय उस पर्वतपर महादेवजीकी आराधनाके लिये आया करते थे ॥ १०-११ ॥

ववौ सुखः शिवो वायुर्नानागन्धवहः शुचिः ।

सर्वर्तुकुसुमोपेताः पुष्पवन्तो द्रुमास्तथा ॥ १२ ॥

वहाँ नाना प्रकारकी सुगन्धको फैलानेवाली, पवित्र, सुखद एवं मंगलमयी वायु चलती रहती थी । सभी ऋतुओंके फूलोंसे सुशोभित होनेवाले खिले हुए वृक्ष उस शिखरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १२ ॥

तथा विद्याधराश्चैव सिद्धाश्चैव तपोधनाः ।

महादेवं पशुपतिं पर्युपासन्त भारत ॥ १३ ॥

भारत! तपस्याके धनी सिद्ध और विद्याधर भी वहाँ पशुपति महादेवजीकी उपासनामें तत्पर रहते थे ॥

भूतानि च महाराज नानारूपधराण्यथ ।

राक्षसाश्च महारौद्राः पिशाचाश्च महाबलाः ॥ १४ ॥

बहुरूपधरा हृष्टा नानाप्रहरणोद्यताः ।

पृष्ठ 1840

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देवस्यानुचरास्तत्र तस्थिरे चानलोपमाः ॥ १५ ॥

महाराज! अनेक रूप धारण करनेवाले भूत, महाभयंकर राक्षस, महाबली और बहुत-से रूप धारण करनेवाले पिशाच, जो महादेवजीके अनुचर थे, वहाँ हर्षमें भरकर नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र लिये खड़े रहते थे । वे सब- के--सब अग्निके समान तेजस्वी थे ॥

नन्दी च भगवांस्तत्र देवस्यानुमते स्थितः ।

प्रगृह्य ज्वलितं शूलं दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ १६ ॥

महादेवजीकी आज्ञासे भगवान् नन्दी अपने तेजसे देदीप्यमान हो हाथमें प्रज्वलित शूल लेकर वहाँ खड़े रहते थे ॥ १६ ॥

गङ्गा च सरितां श्रेष्ठा सर्वतीर्थजलोद्भवा ।

पर्युपासत तं देवं रूपिणी कुरुनन्दन ॥ १७ ॥

कुरुनन्दन! समस्त तीर्थोंके जलोंको लेकर प्रकट हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजी वहाँ दिव्यरूप धारण करके देवाधिदेव महादेवजीकी आराधना करती थीं ॥ १७ ॥

स एवं भगवांस्तत्र पूज्यमानः सुरर्षिभिः ।

देवैश्च सुमहातेजा महादेवो व्यतिष्ठत ॥ १८ ॥

इस प्रकार देवताओं और देवर्षियोंसे पूजित होते हुए महातेजस्वी भगवान् महादेव वहाँ नित्य विराजमान थे ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य दक्षो नाम प्रजापतिः ।

पूर्वोक्तेन विधानेन यक्ष्यमाणोऽन्वपद्यत ॥ १ ९ ॥

कुछ कालके अनन्तर दक्ष नामसे प्रसिद्ध प्रजापतिने पूर्वोक्त शास्त्रीय विधानके अनुसार यज्ञ करनेका संकल्प लेकर उसके लिये तैयारी आरम्भ कर दी ॥ १ ९ ॥

ततस्तस्य मखं देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।

गमनाय समागम्य बुद्धिमापेदिरे तदा ॥ २० ॥

उस समय इन्द्र आदि सब देवताओंने दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें जानेके लिये परस्पर मिलकर निश्चय किया ॥

ते विमानैर्महात्मानो ज्वलनार्कसमप्रभैः ।

देवस्यानुमतेऽगच्छन् गङ्गाद्वारमिति श्रुतिः ॥ २१ ॥

वे महामनस्वी देवता सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी विमानोंपर बैठकर महादेवजीकी आज्ञा ले गंगाद्वार ( हरिद्वार ) को गये - यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ २१ ॥

प्रस्थिता देवता दृष्ट्वा शैलराजसुता तदा ।

उवाच वचनं साध्वी देवं पशुपतिं पतिम् ॥ २२ ॥

देवताओंको प्रस्थित हुआ देख सती साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमाने अपने स्वामी पशुपति महादेवजीसे पूछा— ॥ २२ ॥