05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1841–1850
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1841–1850
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भगवन् क्व नु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः ।
ब्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशयो मे महानयम् ॥ २३ ॥
‘ भगवन्! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जा रहे हैं? तत्त्वज्ञ परमेश्वर! ठीक - ठीक बताइये । मेरे मनमें यह महान् संशय उत्पन्न हुआ है ' ॥ २३ ॥
महेश्वर उवाच
दक्षो नाम महाभागे प्रजानां पतिरुत्तमः ।
हयमेधेन यजते तत्र यान्ति दिवौकसः ॥ २४ ॥
- महेश्वरने कहा – महाभागे! श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष अश्वमेध यज्ञ करते हैं; उसीमें ये सब देवता जा रहे हैं ॥ उमोवाच
यज्ञमेतं महादेव किमर्थं नाधिगच्छसि ।
केन वा प्रतिषेधेन गमनं ते न विद्यते ॥ २५ ॥
उमा बोलीं- महादेव! इस यज्ञमें आप क्यों नहीं पधार रहे हैं? किस प्रतिबन्धके कारण आपका वहाँ जाना नहीं हो रहा है? ॥ २५ ॥
महेश्वर उवाच
सुरैरेव महाभागे पूर्वमेतदनुष्ठितम् ।
यज्ञेषु सर्वेषु मम न भाग उपकल्पितः ॥ २६ ॥
महेश्वरने कहा— महाभागे! देवताओंने ही पहले ऐसा निश्चय किया था । उन्होंने सभी यज्ञोंमेंसे किसीमें भी मेरे लिये भाग नियत नहीं किया ॥ २६ ॥
पूर्वोपायोपपन्नेन मार्गण वरवर्णिनि ।
न मे सुराः प्रयच्छन्ति भागं यज्ञस्य धर्मतः ॥ २७ ॥
सुन्दरि! पूर्वनिश्चित नियमके अनुसार धर्मकी दृष्टिसे ही देवतालोग यज्ञमें मुझे भाग नहीं अर्पित करते हैं ॥ २७ ॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेषु प्रभावाभ्यधिको गुणैः ।
अजय्यश्चाप्यधृष्यश्च तेजसा यशसा श्रिया ॥ २८ ॥
अनेन ते महाभाग प्रतिषेधेन भागतः ।
अतीव दुःखमुत्पन्नं वेपथुश्च ममानघ ॥ २ ९ ॥
उमाने कहा — भगवन्! आप समस्त प्राणियोंमें सबसे अधिक प्रभावशाली, गुणवान्, अजेय, अधृष्य, तेजस्वी, यशस्वी तथा श्रीसम्पन्न हैं । महाभाग! यज्ञमें जो इस प्रकार
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आपको भाग देनेका निषेध किया गया है, इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है । अनघ! इस अपमानसे मेरा सारा शरीर काँप रहा है ॥ २८-२९ ॥ भीष्म उवाच
एवमुकत्वा तु सा देवी तदा पशुपतिं पतिम् ।
तूष्णींभूताभवद् राजन् दह्यमानेन चेतसा ॥ ३० ॥
भीष्मजी कहते हैं — राजन्! अपने पति भगवान् पशुपतिसे ऐसा कहकर पार्वतीदेवी चुप हो गयीं, परंतु उनका हृदय शोकसे दग्ध हो रहा था ॥ ३० ॥
अथ देव्या मतं ज्ञात्वा हृद्गतं यच्चिकीर्षितम् ।
स समाज्ञापयामास तिष्ठ त्वमिति नन्दिनम् ॥ ३१ ॥
पार्वतीदेवीके मनमें क्या है और वे क्या करना चाहती हैं, इस बातको जानकर महादेवजीने नन्दीको आज्ञा दी कि तुम यहीं खड़े रहो ॥ ३१ ॥
ततो योगबलं कृत्वा सर्वयोगेश्वरेश्वरः ।
तं यज्ञं स महातेजा भीमैरनुचरैस्तदा ॥ ३२ ॥
सहसा घातयामास देवदेवः पिनाकधृक् । तदनन्तर सम्पूर्ण योगेश्वरोंके भी ईश्वर महातेजस्वी देवाधिदेव पिनाकधारी शिवने योगबलका आश्रय ले अपने भयानक सेवकोंद्वारा उस यज्ञको सहसा नष्ट करा दिया ॥ ३२ ३ ॥ केचिन्नादानमुञ्चन्त केचिद्धासांश्च चक्रिरे ॥ ३३ ॥
रुधिरेणापरे राजंस्तत्राग्निं समवाकिरन् । राजन्! भगवान् शिवके अनुचरोंमें से कोई तो जोर- जोर से सिंहनाद करने लगे, किन्हींने अट्टहास करना आस्मभ कर दिया तथा दूसरे यज्ञाग्निको बुझानेके लिये उसपर रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ३३३ ॥
केचिद् यूपान् समुत्पाट्य बभ्रमुर्विकृताननाः ॥ ३४ ॥
आस्यैरन्ये चाग्रसन्त तथैव परिचारकान् । कोई विकराल मुखवाले पार्षद यज्ञके यूरोको उखाड़कर वहाँ चारों ओर चक्कर लगाने लगे । दूसरोंने यज्ञके परिचारकोंको अपने मुखका ग्रास बना लिया ॥ ३४ ॥
ततः स यज्ञो नृपते वध्यमानः समन्ततः ॥ ३५ ॥
आस्थाय मृगरूपं वै खमेवाभ्यगमत् तदा । नरेश्वर! इस प्रकार जब सब ओरसे आघात होने लगा, तब वह यज्ञ मृगका रूप धारण करके आकाशकी ओर ही भाग चला ॥ ३५३ ॥
तं तु यज्ञं तथारूपं गच्छन्तमुपलभ्य सः ॥ ३६ ॥
धनुरादाय बाणेन तदान्वसरत प्रभुः ।
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यज्ञको मृगका रूप धारण करके भागते देख भगवान् शिवने धनुष हाथमें लेकर अपने बाणके द्वारा उसका पीछा किया ॥ ३६३ ॥
ततस्तस्य सुरेशस्य क्रोधादमिततेजसः ॥ ३७ ॥
ललाटात् प्रसृतो घोरः स्वेदबिन्दुर्बभूव ह ।
तस्मिन् पतितमात्रे च स्वेदबिन्दौ तदा भुवि ॥ ३८ ॥
प्रादुर्बभूव सुमहानग्निः कालानलोपमः । तत्पश्चात् अमिततेजस्वी देवेश्वर महादेवजीके क्रोधके कारण उनके ललाटसे भयंकर पसीनेकी बूँद प्रकट हुई । उस पसीनेके बिन्दुके पृथ्वीपर पड़ते ही कालाग्निके समान विशाल अग्निपुंजका प्रादुर्भाव हुआ ॥ तत्र चाजायत तदा पुरुषः पुरुषर्षभ ॥ ३ ९ ॥ ह्रस्वोऽतिमात्रं रक्ताक्षो हरिश्मश्रुर्विभीषणः । पुरुषप्रवर! उस समय उस आगसे एक नाटा-सा पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसकी आँखें बहुत ही लाल थीं। दाढ़ी और मूँछके बाल भूरे रंगके थे । वह देखनेमें बड़ा डरावना जान पड़ता था ॥ ३ ९ ॥ ऊर्ध्वकेशोऽतिरोमाङ्गः श्येनोलूकस्तथैव च ॥ ४० ॥
करालकृष्णवर्णश्च रक्तवासास्तथैव च ।
तं यज्ञं सुमहासत्त्वोऽदहत् कक्षमिवानलः ॥ ४१ ॥
उसके केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे । उसके सारे अंग बाज और उल्लूके समान अतिशय रोमावलियोंसे भरे थे । शरीरका रंग काला और विकराल था । उसके वस्त्र लाल रंगके थे । उस महान् शक्तिशाली पुरुषने उस यज्ञको उसी प्रकार दग्ध कर दिया, जैसे आग सूखे काठ या घास फूसके ढेरको जलाकर भस्म कर डालती है ॥ ४०-४१ ॥
व्यचरत् सर्वतो देवान् प्राद्रवत् स ऋषींस्तथा ।
देवाश्चाप्याद्रवन् सर्वे ततो भीता दिशो दश ॥ ४२ ॥
तत्पश्चात् वह पुरुष सब ओर विचरने लगा और देवताओं तथा ऋषियोंकी ओर दौड़ा ।
उसे देखकर सब देवता भयभीत हो दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ४२ ॥
तेन तस्मिन् विचरता पुरुषेण विशाम्पते ।
पृथिवी ह्यचलद् राजन्नतीव भरतर्षभ ॥ ४३ ॥
राजन्! भरतभूषण! प्रजानाथ! उस यज्ञमें विचरते हुए उस पुरुषके पैरोंकी धमकसे यह पृथ्वी बड़े जोर-जोर से काँपने लगी ॥ ४३ ॥
हाहाभूतं जगत् सर्वमुपलक्ष्य तदा प्रभुः ।
पितामहो महादेवं दर्शयन् प्रत्यभाषत ॥ ४४ ॥
उस समय सारे जगत्में हाहाकार मच गया । यह सब देखकर भगवान् ब्रह्माने महादेवजीको जगत्की यह दुर्दशा दिखाते हुए उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४४ ॥
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ब्रह्मोवाच
भवतोऽपि सुराः सर्वे भागं दास्यन्ति वै प्रभो ।
क्रियतां प्रतिसंहारः सर्वदेवेश्वर त्वया ॥ ४५ ॥
ब्रह्माजी बोले – सर्वदेवेश्वर! प्रभो! अब आप अपने बढ़े हुए उस क्रोधको शान्त कीजिये । आजसे सब देवता आपको भी यज्ञका भाग दिया करेंगे ॥ ४५ ॥
इमा हि देवताः सर्वा ऋषयश्च परंतप ।
तव क्रोधान्महादेव न शान्तिमुपलेभिरे ॥ ४६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले महादेव! ये सब देवता और ऋषि आपके क्रोधसे संतप्त होकर कहीं शान्ति नहीं पा रहे हैं ॥ ४६ ॥
यश्चैष पुरुषो जातः स्वेदात् ते विबुधोत्तम ।
ज्वरो नामैष धर्मज्ञ लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ ४७ ॥
धर्मज्ञ देवेश्वर! आपके पसीनेसे जो यह पुरुष प्रकट हुआ है, इसका नाम होगा ज्वर ।
यह समस्त लोकोंमें विचरण करेगा ॥ ४७ ॥
एकीभूतस्य न त्वस्य धारणे तेजसः प्रभो ।
समर्था सकला पृथ्वी बहुधा सृज्यतामयम् ॥ ४८ ॥
प्रभो! आपका तेजरूप यह ज्वर जबतक एक रूपमें रहेगा, तबतक यह सारी पृथ्वी इसे धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी । अतः इसे अनेक रूपोंमें विभक्त कर दीजिये ॥ ४८ ॥
इत्युक्तो ब्रह्मणा देवो भागे चापि प्रकल्पिते ।
भगवन्तं तथेत्याह ब्रह्माणममितौजसम् ॥ ४९ ॥
जब ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा और यज्ञमें भाग मिलनेकी भी व्यवस्था हो गयी, तब महादेवजी अमिततेजस्वी भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार बोले- ' तथास्तु' ऐसा ही हो ॥
परां च प्रीतिमगमदुत्स्मयंश्च पिनाकधृक् ।
अवाप च तदा भागं यथोक्तं ब्रह्मणा भवः ॥ ५० ॥
पिनाकधारी शिवको उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई और वे मुस्कराने लगे । जैसा कि ब्रह्माजीने कहा था, उसके अनुसार उन्होंने यज्ञमें भाग प्राप्त कर लिया ॥
ज्वरं च सर्वधर्मज्ञो बहुधा व्यसृजत् तदा ।
शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ॥ ५१ ॥
वत्स युधिष्ठिर! उस समय समस्त धर्मोंके ज्ञाता भगवान् शिवने सम्पूर्ण प्राणियोंकी शान्तिके लिये ज्वरको अनेक रूपोंमें बाँट दिया, उसे भी सुन लो ॥ ५१ ॥
शीर्षाभितापो नागानां पर्वतानां शिलाजतु ।
अपां तु नीलिकां विद्यान्निर्मोकं भुजगेषु च ॥ ५२ ॥
खोरकः सौरभेयाणामूषरं पृथिवीतले ।
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पशूनामपि धर्मज्ञ दृष्टिप्रत्यवरोधनम् ॥ ५३ ॥
हाथियोंके मस्तकमें जो ताप या पीड़ा होती है, वही उनका ज्वर है । पर्वतोंका ज्वर शिलाजीतके रूपमें प्रकट होता है । सेवारको पानीका ज्वर समझना चाहिये । सर्पोंका ज्वर केंचुल है । गाय- बैलोंके खुरोंमें जो खोरक नामवाला रोग होता है, वही उनका ज्वर है । पृथ्वीका ज्वर ऊसरके रूपमें प्रकट होता है । धर्मज्ञ युधिष्ठिर! पशुओंकी दृष्टि- शक्तिका जो अवरोध होता है, वह भी उनका ज्वर ही है ॥ ५२-५३ ॥
रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च बर्हिणाम् ।
नेत्ररोगः कोकिलस्य ज्वरः प्रोक्तो महात्मना ॥ ५४ ॥
घोड़ोंके गलेके छेदमें जो मांसखण्ड बढ़ जाता है, वही उनका ज्वर है । मोरोंकी शिखाका निकलना ही उनके लिये ज्वर है । कोकिलका जो नेत्ररोग है, उसे भी महात्मा शिवने ज्वर बताया है ॥ ५४ ॥
अवीनां पित्तभेदश्च सर्वेषामिति नः श्रुतम् ।
शुकानामपि सर्वेषां हिक्किका प्रोच्यते ज्वरः ॥ ५५ ॥
समस्त भेड़ोंका पित्तभेद भी ज्वर ही है - यह हमारे सुननेमें आया है । समस्त तोतोंके लिये हिचकीको ही ज्वर बताया गया है ॥ ५५ ॥
शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते ।
मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष भारत ॥ ५६ ॥
धर्मज्ञ भरतनन्दन! सिंहोंमें थकावटका होना ही ज्वर कहलाता है; परंतु मनुष्योंमें यह ज्वरके नामसे ही प्रसिद्ध है ॥
मरणे जन्मनि तथा मध्ये चाविशते नरम् ।
एतन्माहेश्वरं तेजो ज्वरो नाम सुदारुणः ॥ ५७ ॥
नमस्यश्चैव मान्यश्च सर्वप्राणिभिरीश्वरः ।
अनेन हि समाविष्टो वृत्रो धर्मभृतां वरः ॥ ५८ ॥
भगवान् महेश्वरका तेजरूप यह ज्वर अत्यन्त दारुण है । यह मृत्युकालमें, जन्मके समय तथा बीचमें भी मनुष्योंके शरीरमें प्रवेश कर जाता है । यह सर्वसमर्थ माहेश्वर ज्वर समस्त प्राणियोंके लिये वन्दनीय और माननीय है। इसीने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरके शरीरमें प्रवेश किया था ॥ ५७-५८ ॥
व्यजृम्भत ततः शक्रस्तस्मै वज्रमवासृजत् ।
प्रविश्य वज्रं वृत्रं च दारयामास भारत ॥ ५ ९ ॥
भारत! उस ज्वरसे पीड़ित होकर जब वह जँभाई लेने लगा, उसी समय इन्द्रने उसपर वज्रका प्रहार किया । वज्रने उसके शरीरमें घुसकर उसे चीर डाला ॥ ५ ९ ॥
दारितश्च स वज्रेण महायोगी महासुरः ।
जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ॥ ६० ॥
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वज्रसे विदीर्ण हुआ महायोगी एवं महान् असुर वृत्र अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके परम धामको चला गया ॥ ६० ॥
विष्णुभक्त्या हि तेनेदं जगद् व्याप्तमभूत् तदा ।
तस्माच्च निहतो युद्धे विष्णोः स्थानमवाप्तवान् ॥ ६१ ॥
भगवान् विष्णुकी भक्तिके प्रभावसे ही उसने अपनी विशाल कायाद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर लिया था। अतः युद्धमें मारे जानेपर उसने विष्णुधाम प्राप्त कर लिया ॥ ६१ ॥
इत्येष वृत्रमाश्रित्य ज्वरस्य महतो मया ।
विस्तरः कथितः पुत्र किमन्यत् प्रब्रवीमि ते ॥ ६२ ॥
बेटा! इस प्रकार वृत्रासुरके वधके प्रसंगसे मैंने महान् माहेश्वर ज्वरकी उत्पत्तिका
वृत्तान्त विस्सारपूर्वक कह सुनाया । अब तुमसे और क्या कहूँ? ॥ ६२ ॥
इमां ज्वरोत्पत्तिमदीनमानसः पठेत् सदा यः सुसमाहितो नरः । विमुक्तरोगः स सुखी मुदा युतो लभेत कामान् स यथामनीषितान् ॥ ६३ ॥
जो उदारचित्त एवं एकाग्र होकर ज्वरकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको सदा पढ़ता है, वह मनुष्य रोगमुक्त, सुखी एवं प्रसन्न होकर मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ज्वरोत्पत्तिर्नाम त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ज्वरकी उत्पत्तिविषयक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ६३३ श्लोक हैं ) 0
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चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए. शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा जनमेजय उवाच
प्राचेतसस्य दक्षस्य कथं वैवस्वतेऽन्तरे ।
विनाशमगमद् ब्रह्मन् हयमेधः प्रजापतेः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! वैवस्वत मन्वन्तरमें प्रचेताओंके पुत्र दक्षप्रजापतिका अश्वमेध यज्ञ कैसे नष्ट हो गया? ॥ १ ॥
देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्धः सर्वात्मकः प्रभुः ।
प्रसादात् तस्य दक्षेण स यज्ञः संधितः कथम् ।
एतद् वेदितुमिच्छेयं तन्मे ब्रूहि यथातथम् ॥ २ ॥
दक्षके यज्ञमें मेरा आवाहन न होना पार्वतीके दुःखका कारण बन गया है — यह जानकर भगवान् शंकर, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा हैं, जब कुपित हो उठे, तब फिर उन्हींकी कृपापूर्ण प्रसन्नतासे दक्ष प्रजापतिका यह यज्ञ कैसे सम्पन्न हुआ? मैं यह वृत्तान्त जानना चाहता हूँ, आप इसे यथार्थ रूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
पुरा हिमवतः पृष्ठे दक्षो वै यज्ञमाहरत् ।
गङ्गाद्वारे शुभे देशे ऋषिसिद्धनिषेविते ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा - प्राचीन कालकी बात है— हिमालयके पार्श्ववर्ती गंगाद्वार ( हरिद्वार ) के शुभ देशमें, जहाँ ऋषियों तथा सिद्ध पुरुषोंका निवास है, प्रजापति दक्षने अपने यज्ञका आयोजन किया था ॥ ३ ॥
गन्धर्वाप्सरसाकीर्णे नानाद्रुमलतावृते ।
ऋषिसङ्घैः परिवृतं दक्षं धर्मभृतां वरम् ॥ ४ ॥
पृथिव्यामन्तरिक्षे च ये च स्वर्लोकवासिनः ।
सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा उपतस्थुः प्रजापतिम् ॥ ५ ॥
वह स्थान गन्धर्वों और अप्सराओंसे भरा था। भाँति- भाँतिके वृक्षसमूह और लताएँ वहाँ सब ओर छा रही थीं । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष ऋषिसमुदायसे घिरे हुए बैठे ।
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उस समय पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकके निवासी भी वहाँ जुटे हुए थे और वे सब - के-सब हाथ जोड़कर प्रजापतिको प्रणाम करके उनकी सेवामें खड़े थे ॥ ४-५ ॥
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ।
हाहाहूहूश्च गन्धर्वौ तुम्बुरुर्नारदस्तथा ॥ ६ ॥
विश्वावसुर्विश्वसेनो गन्धर्वाप्सरसस्तथा । देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस, हाहा और हूहू नामक गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, विश्वसेन तथा दूसरे दूसरे गन्धर्व और अप्सराएँ वहाँ उपस्थित थीं ॥ ६३ || आदित्या वसवो रुद्राः साध्याः सह मरुद्गणैः ॥ ७ ॥
इन्द्रेण सहिताः सर्वे आगता यज्ञभागिनः । आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य और मरुद्गण – ये सब- के - सब इन्द्रके साथ यज्ञमें भाग लेनेके लिये वहाँ पधारे थे ॥ ७३ ॥
ऊष्मपाः सोमपाश्चैव धूमपा आज्यपास्तथा ॥ ८ ॥
ऋषयः पितरश्चैव आगता ब्रह्मणा सह । ऊष्मपा ( सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले), सोमपा ( सोमरस पीनेवाले ), धूमपा ( यज्ञमें धूम-पान करनेवाले ) और आज्यपा ( घृत-पान करनेवाले ) पितर और ऋषि भी ब्रह्माजीके साथ उस यज्ञमें पधारे थे ॥ एते चान्ये च बहवो भूतग्रामाश्चतुर्विधाः ॥ ९ ॥
जरायुजाण्डजाश्चैव सहसा स्वेदजोद्भिजैः । ये तथा और भी बहुत- से चतुर्विध प्राणिसमुदाय जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज वहाँ उपस्थित हुए थे ॥ ९३ ॥
आहूता मन्त्रिताः सर्वे देवाश्च सह पत्निभिः ॥ १० ॥
विराजन्ते विमानस्था दीप्यमाना इवाग्नयः । जिन्हें निमन्त्रित करके बुलाया गया था, वे सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ विमानपर बैठकर आते समय प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ तान् दृष्ट्वा मत्युनाऽऽविष्टो दधीचिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥
यं यज्ञो न वा धर्मो यत्र रुद्रो न इज्यते ।
वधबन्धं प्रपन्ना वै किं नु कालस्य पर्ययः ॥ १२ ॥
(महामुनि दधीचि भी उस यज्ञमण्डपमें उपस्थित थे । उन्होंने देखा कि देवता और दानव आदिका समाज तो खूब जुटा हुआ है; परंतु भगवान् शंकर दिखायी नहीं देते हैं । जान पड़ता है उनका आवाहन नहीं किया गया है । इससे उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ । ) उन सब देवताओंको वहाँ उपस्थित देख दधीचि क्रोधमें भर गये और बोले— ' सज्जनो! जिसमें भगवान् शिवकी पूजा नहीं होती है, वह न यज्ञ है और न धर्म । यह यज्ञ भी भगवान् शिवके
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बिना यज्ञ कहनेयोग्य नहीं रहा । इसका आयोजन करनेवाले लोग वध और बन्धनकी
दुर्दशामें पड़नेवाले हैं । अहो! कालका कैसा उलट- फेर है ॥ ११-१२ ॥
किंनु मोहान्न पश्यन्ति विनाशं पर्युपस्थितम् ।
उपस्थितं महाघोरं न बुध्यन्ति महाध्वरे ॥ १३ ॥
‘ इस महायज्ञमें अत्यन्त घोर विनाश उपस्थित होनेवाला है; किंतु मोहवश कोई देख नहीं रहे हैं— समझ नहीं पाते हैं ' ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वा स महायोगी पश्यति ध्यानचक्षुषा ।
स पश्यति महादेवं देवीं च वरदां शुभाम् ॥ १४ ॥
नारदं च महात्मानं तस्या देव्याः समीपतः ।
संतोषं परमं लेभे इति निश्चित्य योगवित् ॥ १५ ॥
एकमन्त्रास्तु ते सर्वे येनेशो न निमन्त्रितः । ऐसा कहकर महायोगी दधीचिने जब ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हें भगवान् शंकर और मंगलमयी वरदायिनी देवी पार्वतीजीका दर्शन हुआ । उनके पास ही महात्मा नारदजी
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भी दिखायी दिये, इससे उनको बड़ा संतोष हुआ । योगवेत्ता दधीचिको यह निश्चय हो गया कि ये सब देवता एकमत हो गये हैं । इसीलिये इन्होंने महेश्वरको यहाँ निमन्त्रित नहीं किया है ॥ तस्माद् देशादपक्रम्य दधीचिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १६ ॥
अपूज्यपूजनाच्चैव पूज्यानां चाप्यपूजनात् ।
नृघातकसमं पापं शश्वत् प्राप्नोति मानवः ॥ १७ ॥
यह बात ध्यानमें आते ही दधीचि यज्ञशालासे अलग हो गये और दूर जाकर कहने लगे - ' सज्जनो! अपूजनीय पुरुषकी पूजा करनेसे और पूजनीय महापुरुषकी पूजा न करनेसे मनुष्य सदा ही नरहत्याके समान पापका भागी होता है ॥ १६-१७ ॥
अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन ।
देवतानामृषीणां च मध्ये सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ १८ ॥
‘ मैंने पहले कभी झूठ नहीं कहा है और आगे भी कभी झूठ नहीं कहूँगा। इन देवताओं तथा ऋषियोंके बीचमें मैं सच्ची बात कह रहा हूँ' ॥ १८ ॥
आगतं पशुभर्तारं स्रष्टारं जगतः पतिम् ।
अध्वरे ह्यग्रभोक्तारं सर्वेषां पश्यत प्रभुम ॥ १९ ॥
‘ भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेवाले, सम्पूर्ण जीवोंके रक्षक, स्वामी तथा सबके प्रभु हैं । तुम सब लोग देख लेना, वे इस यज्ञमें प्रधान भोक्ताके रूपमें उपस्थित होंगे ' ॥ १ ९ ॥ दक्ष उवाच
सन्ति नो बहवो रुद्राः शूलहस्ताः कपर्दिनः ।
एकादशस्थानगता नाहं वेद्मि महेश्वरम् ॥ २० ॥
दक्षने कहा- हाथोंमें शूल और मस्तकपर जटाजूट धारण करनेवाले बहुत - से रुद्र हमारे यहाँ रहते हैं । वे ग्यारह हैं और ग्यारह स्थानोंमें निवास करते हैं । उनके सिवा दूसरे किसी महेश्वरको मैं नहीं जानता ॥ २० ॥
दधीचिरुवाच सर्वेषामेव मन्त्रोऽयं येनासौ न निमन्त्रितः ।
यथाह शंकरादूर्ध्वं नान्यं पश्यामि दैवतम् ।
तथा दक्षस्य विपुलो यज्ञोऽयं न भविष्यति ॥ २१ ॥
दधीचि बोले — मैं जानता हूँ, आप सब लोगोंका ही यह मिल--जुलकर किया हुआ निश्चय है । इसीलिये उन महादेवजीको निमन्त्रित नहीं किया गया है; परंतु मैं भगवान् शंकरसे बढ़कर दूसरे किसी देवताको नहीं देखता। यदि यह सत्य है तो प्रजापति दक्षका यह विशाल यज्ञ निश्चय ही नष्ट हो जायगा ॥ २१ ॥