श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1851–1860
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1851–1860
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दक्ष उवाच एतन्मखेशाय सुवर्णपात्रे हविः समस्तं विधिमन्त्रपूतम् । विष्णोर्नयाम्यप्रतिमस्य भागं प्रभुर्विभुश्चाहवनीय एषः ॥ २२ ॥
दक्षने कहा- महर्षे! देखो, विधिपूर्वक मन्त्रसे पवित्र की हुई यह सारी हवि सुवर्णके पात्रमें रखी हुई है । यह यज्ञेश्वर श्रीविष्णुको समर्पित है । भगवान् विष्णुकी कहीं समता नहीं है । मैं उन्हींको हविष्यका यह भाग अर्पित करूँगा । ये भगवान् विष्णु ही सर्वसमर्थ, व्यापक और यज्ञभाग अर्पित करनेके योग्य हैं ॥ २२ ॥
देव्युवाच किं नाम दानं नियमं तपो वा कुर्यामहं येन पतिर्ममाद्य । लभेत भागं भगवानचिन्त्यो ह्यर्धं तथा भागमथो तृतीयम् ॥ २३ ॥
( दूसरी ओर कैलास पर्वतपर) पार्वती देवी ( बहुत दुखी होकर ) कह रही थीं — आह, मैं कौन - सा व्रत, दान या तप करूँ, जिसके प्रभावसे आज मेरे पतिदेव अचिन्त्य भगवान् शंकरको यज्ञका आधा अथवा तिहाई भाग अवश्य प्राप्त हो? ' ॥ २३ ॥
एवं ब्रुवाणां भगवान् स पत्नीं प्रहृष्टरूपः क्षुभितामुवाच । न वेत्सि मां देवि कृशोदराङ्गि किं नाम युक्तं वचनं मखेशे ॥ २४ ॥
क्षोभमें भरकर इस प्रकार बोलती हुई पत्नीकी बात सुनकर भगवान् शंकर हर्षसे खिल उठे और इस प्रकार बोले— ' देवि! कृशोदराङ्गि! तू मुझे नहीं जानती, मैं सम्पूर्ण यज्ञोंका ईश्वर हूँ । मेरे विषयमें किस प्रकारके वचन कहना चाहिये, यह भी तुम नहीं जानती ॥ २४ ॥
अहं विजानामि विशालनेत्रे ध्यानेन हीना न विदन्त्यसन्तः । तवाद्य मोहेन च सेन्द्रदेवा लोकास्त्रयः सर्वत एव मूढाः ॥ २५ ॥
‘ पर मैं सब कुछ जानता हूँ। विशाललोचने! जिनका चित्त एकाग्र नहीं है, वे ध्यानशून्य असाधु पुरुष मेरे स्वरूपको नहीं जानते । आज तुम्हारे इस मोहसे इन्द्र आदि देवताओंसहित तीनों लोक सब ओरसे किंकर्तव्य - विमूढ हो गये हैं ॥ २५ ॥
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मामध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरं सामगाश्वोपगान्ति । मां ब्राह्मणा ब्रह्मविदो यजन्ते ममाध्वर्यवः कल्पयन्ते च भागम् ॥ २६ ॥
' यज्ञमें प्रस्तोतालोग मेरी स्तुति करते हैं । सामगान करनेवाले ब्राह्मण रथन्तर सामके रूपमें मेरी ही महिमाका गान करते हैं । वेदवेत्ता विप्र मेरा ही यजन करते और ऋत्विजलोग यज्ञमें मुझे ही भाग अर्पित करते हैं ' ॥ २६ ॥
देव्युवाच
सुप्राकृतोऽपि पुरुषः सर्वः स्त्रीजनसंसदि ।
स्तौति गर्वायते चापि स्वमात्मानं न संशयः ॥ २७ ॥
देवीने कहा- नाथ! अत्यन्त गँवार पुरुष भी क्यों न हो, प्रायः सभी स्त्रियोंके बीचमें अपनी प्रशंसाके गीत गाते और अपनी श्रेष्ठतापर गर्व करते हैं- इसमें तनिक भी संशय नहीं ॥ २७ ॥
श्रीभगवानुवाच
नात्मानं स्तौमि देवेशि पश्य मे तनुमध्यमे ।
यं स्रक्ष्यामि वरारोहे यागार्थे वरवर्णिनि ॥ २८ ॥
श्रीभगवान् शिव बोले- देवेश्वरि! तनुमध्यमे! वरारोहे! वरवर्णिनि! मैं अपनी प्रशंसा नहीं करता हूँ । मेरा प्रभाव देखो । जिसके कारण तुम्हें दुःख हुआ है, उस यज्ञको नष्ट करनेके लिये मैं जिस वीर पुरुषकी सृष्टि कर रहा हूँ' उसपर दृष्टिपात करो ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् पत्नीमुमां प्राणैरपि प्रियाम् ।
सोऽसृजद् भगवान् वक्त्राद् भूतं घोरं प्रहर्षणम् ॥ २ ९ ॥
अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी पत्नी उमासे ऐसी बात कहकर भगवान् महेश्वरने अपने मुखसे एक अद्भुत एवं भयंकर प्राणीको प्रकट किया, जो उनका हर्ष बढ़ानेवाला था ॥ २ ९ ॥
तमुवाचाक्षिप मखं दक्षस्येति महेश्वरः ।
ततो वक्त्राद् विमुक्तेन सिंहेनैकेन लीलया ॥ ३० ॥
देव्या मन्युव्यपोहार्थं हतो दक्षस्य वै क्रतुः । महेश्वरने उस पुरुषको आज्ञा दी - ' वीर! तुम दक्षके यज्ञका नाश कर दो । ' फिर तो भगवान्के मुखसे निकले हुए उस सिंहके समान पराक्रमी एक ही वीरने पार्वतीदेवीके दुःख और क्रोधका निवारण करनेके लिये खेलही खेलमें प्रजापति दक्षके उस यज्ञका विध्वंस कर डाला ॥ ३० ॥
मन्युना च महाभीमा महाकाली महेश्वरी ॥ ३१ ॥
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आत्मनः कर्मसाक्षित्वे तेन सार्धं सहानुगा । उस समय भवानीके क्रोधसे प्रकट हुई अत्यन्त भयंकर रूपवाली महाकाली महेश्वरीने भी अपना पराक्रम दिखानेके लिये सेवकोंसहित उस वीरके साथ प्रस्थान किया था ॥ ३१ ॥ देवस्यानुमतं मत्वा प्रणम्य शिरसा ततः ॥ ३२ ॥
आत्मनः सदृशः शौर्याद् बलरूपसमन्वितः ।
स एव भगवान् क्रोधः प्रतिरूपसमन्वितः ॥ ३३ ॥
अनन्तबलवीर्यश्च अनन्तबलपौरुषः ।
वीरभद्र इति ख्यातो देव्या मन्युप्रमार्जकः ॥ ३४ ॥
( वीरभद्रने किस प्रकार उस यज्ञका विध्वंस किया, यह प्रसंग आगे बताया जाता है-महादेवजीकी अनुमति जानकर उसने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया । वह वीर अपने ही समान शौर्य, रूप और बलसे सम्पन्न था (उसकी कहीं उपमा नहीं थी ) । भगवान् शिवका वह सब कुछ करनेमें समर्थ क्रोध ही मूर्तिमान् होकर उस वीरके रूपमें प्रकट हुआ था । उसके बल, वीर्य, शक्ति और पुरुषार्थका कहीं अन्त नहीं था । पार्वतीदेवीके क्रोध और खेदका निवारण करनेवाला वह पुरुष वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ ॥ ३२–३४ ॥
सोऽसृजद् रोमकूपेभ्यो रौम्यान् नाम गणेश्वरान् ।
रुद्रतुल्या गणा रौद्रा रुद्रवीर्यपराक्रमाः ॥ ३५ ॥
उसने अपने रोमकूपोंसे सैन्य नामवाले गणेश्वरोंको प्रकट किया, जो रुद्रके समान ही
होनेके कारण रौद्रगण कहलाये । उन सबके बल पराक्रम भी रुद्रके ही समान थे ॥ ३५ ॥
ते निपेतुस्ततस्तूर्णं दक्षयज्ञविहिंसया ।
भीमरूपा महाकायाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३६ ॥
ततः किलकिलाशब्दैसकाशं पूरयन्निव । वे भयंकर रूपधारी विशालकाय रुद्रगण सैकड़ों और हजारोंकी टोलियाँ बनाकर अपनी किलकारियोंसे आकाशको गुँजाते हुए- से दक्षयज्ञका विध्वंस करनेके लिये बड़ी तेजीके साथ टूट पड़े ॥ ३६३ ॥
तेन शब्देन महता त्रस्तास्तत्र दिवौकसः ॥ ३७ ॥
पर्वताश्च व्यशीर्यन्त चकम्पे च वसुंधरा ।
मारुताश्चैव घूर्णन्ते चुक्षुभे वरुणालयः ॥ ३८ ॥
उस महाभयंकर कोलाहलसे उस यज्ञमें पधारे हुए समस्त देवता व्याकुल हो उठे । पर्वत टूक - टूक होकर बिखर गये । धरती डोलने लगी, आँधी चलने लगी और समुद्रमें तूफान आ गया ॥ ३७-३८ ॥
अग्नयो नैव दीप्यन्ते नैव दीप्यति भास्करः ।
ग्रहा नैव प्रकाशन्ते नक्षत्राणि न चन्द्रमाः ॥ ३ ९ ॥
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ऋषयो न प्रकाशन्ते न देवा न च मानुषाः ।
एवं तु तिमिरीभूते निर्दहन्त्यपमानिताः ॥ ४० ॥
उस समय आग नहीं जलती थी, सूर्यका प्रकाश फीका पड़ गया; ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा भी निस्तेज हो गये । इस प्रकार वहाँ चारों ओर अँधेरा छा गया । देवता, ऋषि और मनुष्य – सभी छिप गये – कोई दिखायी नहीं देते थे । दक्षसे अपमानित हुए रुद्रगण यज्ञशालामें सब ओर आग लगाने लगे ॥ ३ ९ -४० ॥
प्रहरन्त्यपरे घोरा यूपानुत्पाटयन्ति च ।
प्रमर्दन्ति तथा चान्ये विमर्दन्ति तथा परे ॥ ४१ ॥
दूसरे भयंकर भूत उसी यज्ञके सदस्योंको पीटने लगे । कुछ यूप उखाड़ने लगे । बहुतेरे रुद्रगण यज्ञकी सामग्रीको कुचलने और रौंदने लगे ॥ ४१ ॥
आधावन्ति प्रधावन्ति वायुवेगा मनोजवाः ।
चूर्ण्यन्ते यज्ञपात्राणि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ४२ ॥
वायु और मनके समान वेगशाली कितने ही पार्षद इधर- उधर दौड़ लगाने लगे । कुछ लोग यज्ञके उपयोगमें आनेवाले पात्रों तथा दिव्य आभूषणोंको चूर- चूर कर रहे थे ॥ ४२ ॥
विशीर्यमाणा दृश्यन्ते तारा इव नभस्तले ।
दिव्यान्नपानभक्ष्याणां राशयः पर्वतोपमाः ॥ ४३ ॥
उनके बिखरकर गिरते हुए टुकड़े आकाशमें छिटके हुए तारोंके समान दिखायी देते थे । उस यज्ञभूमिमें जहाँ - तहाँ दिव्य अन्न, पान और भक्ष्य पदार्थोंके पर्वतों-जैसे ढेर दिखायी देते थे ॥ ४३ ॥
क्षीरनद्योऽथ दृश्यते घृतपायसकर्दमाः ।
दधिमण्डोदका दिव्याः खण्डशर्करवालुकाः ॥ ४४ ॥
दूधकी दिव्य नदियाँ वहाँ बहती दीखती थीं, घी और खीरकी कीच जम गयी थी, दही और मट्ठा पानीकी तरह बह रहे थे तथा खाँड़ और शक्कर वहाँ बालूकी भाँति बिछ गये थे ॥ ४४ ॥
षड् रसान् निवहन्त्येता गुडकुल्या मनोरमाः ।
उच्चावचानि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च ॥ ४५ ॥
ये सब नदियाँ षट्रस भोजन प्रवाहित कर रही थीं । गुड़के रसकी छोटी- छोटी मनोरम नहरें दृष्टिगोचर होती थीं। नाना प्रकारके फलोंके गूदे और भाँति- भाँतिके भक्ष्य- पदार्थ प्रस्तुत किये गये थे ॥ ४५ ॥
पानकानि च दिव्यानि लेह्यचोष्याणि यानि च ।
भुञ्जते विविधैर्वक्त्रैर्विलुम्पन्त्याक्षिपन्ति च ॥ ४६ ॥
दिव्य पेय पदार्थ, लेह्य और चोष्य आदि जो - जो भोजन वहाँ उपलब्ध हुए, उन सबको वे रुद्रगण अपने विविध मुखोंद्वारा खाने, नष्ट करने और चारों ओर छींटने तथा फेंकने
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लगे ॥ ४६ ॥
रुद्रकोपान्महाकायाः कालाग्निसदृशोपमाः ।
क्षोभयन् सुरसैन्यानि भीषयन्तः समन्ततः ॥ ४७ ॥
वे विशालकाय भूत रुद्रदेवके क्रोधसे कालाग्निके समान होकर देवताओंकी सेनाओंको चारों ओरसे डराने और क्षुब्ध करने लगे ॥ ४७ ॥
क्रीडन्ति विविधाकाराश्चिक्षिपुः सुरयोषितः ।
रुद्रक्रोधात् प्रयत्नेन सर्वदेवैः सुरक्षितम् ॥ ४८ ॥
तं यज्ञमदहच्छीघ्रं रुद्रकर्मा समन्ततः । अनेक प्रकारकी आकृतिवाले वे रुद्रगण खेलते - कूदते और देवांगनाओंको दूर फेंक देते थे । यद्यपि सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर प्रयत्नपूर्वक उस यज्ञकी रक्षा की थी तथापि रुद्रकर्मा वीरभद्रने रुद्रदेवके क्रोधसे प्रेरित हो सब ओरसे शीघ्र ही उसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४८ ॥
चकार भैरवं नादं सर्वभूतभयंकरम् ॥ ४ ९ ॥ छित्त्वा शिरो वै यज्ञस्य ननाद च मुमोद च । तत्पश्चात् उसने ऐसी भीषण गर्जना की, जो समस्त प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली थी । फिर उसने यज्ञका सिर काटकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया और मन- ही - मन आनन्दका अनुभव किया ॥ ४ ९ ॥ ततो ब्रह्मादयो देवा दक्षश्चैव प्रजापतिः ॥ ५० ॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कथ्यतां को भवानिति । तब ब्रह्मा आदि देवता तथा प्रजापति दक्ष –ये सब के सब हाथ जोड़कर बोले —‘देवदेव! कहिये, आप कौन हैं? ' ॥ ५० ३३ ॥ वीरभद्र उवाच नाहं रुद्रो न वा देवी नैव भोक्तुमिहागतः ॥ ५१ ॥
देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्धः सर्वात्मकः प्रभुः । वीरभद्रने कहा – ब्रह्मन्! मैं न तो रुद्र हूँ, न देवी हूँ और न यहाँ भोजन करनेके लिये ही आया हूँ । तुम्हारा यह यज्ञ देवी पार्वतीके रोषका कारण बन गया है — ऐसा जानकर सर्वात्मा भगवान् शिव कुपित हो उठे हैं ॥ ५१ ॥
द्रष्टुं वा नैव विप्रेन्द्रान् नैव कौतूहलेन वा ॥ ५२ ॥
तव यज्ञविघातार्थं सम्प्राप्तं विद्धि मामिह । मैं यहाँ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका दर्शन करने या कौतूहलवश इस यज्ञका तमाशा देखनेके लिये नहीं आया हूँ । तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैं तुम्हारे इस यज्ञका विनाश करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥
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वीरभद्र इति ख्यातों रुद्रकोपाद् विनिःसृतः ॥ ५३ ॥
भद्रकालीति विख्याता देव्याः कोपाद् विनिःसृता ।
प्रेषितौ देवदेवेन यज्ञान्तिकमिहागतौ ॥ ५४ ॥
मेरा नाम वीरभद्र है । रुद्रदेवके क्रोधसे मेरा प्राकटय हुआ है। यह नारी भद्रकालीके नामसे विख्यात है और देवी पार्वतीके कोपसे प्रकट हुई है । देवाधिदेव महादेवने हम दोनोंको यहाँ भेजा है । इसलिये हम दोनों इस यज्ञके निकट आये हैं ॥ ५३-५४ ॥
शरणं गच्छ विप्रेन्द्र देवदेवमुमापतिम् ।
वरं क्रोधोऽपि देवस्य वरदानं न चान्यतः ॥ ५५ ॥
विप्रवर! तुम देवाधिदेव उमावल्लभ भगवान् शिवकी शरणमें जाओ । महादेवजीका क्रोध भी परम मंगलमय है और दूसरोंसे मिला हुआ वरदान भी मंगलकारक नहीं होता ॥ ५५ ॥
वीरभद्रवचः श्रुत्वा दक्षो धर्मभृतां वरः ।
तोषयामास स्तोत्रेण प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ ५६ ॥
वीरभद्रकी यह बात सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दक्षने भगवान् शिवके उद्देश्यसे प्रणाम करके निम्नांकित स्तोत्रके द्वारा उनकी स्तुति की— ॥ ५६ ॥
प्रपद्ये देवमीशानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ५७ ॥
‘ जो सम्पूर्ण जगत्के शासक, पालक, महान् आत्मा, नित्य, सनातन, अविकारी और आराध्यदेव हैं, उन महादेवजीकी आज मैं शरण लेता हूँ' ॥ ५७ ॥
प्राणापानौ संनिरुध्य वक्त्रस्थानेन यत्नतः ।
विचार्य सर्वतो दृष्टिं बहुदृष्टिरमित्रजित् ॥ ५८ ॥
सहसा देवदेवेशो ह्यग्निकुण्डात् समुत्थितः ।
बिभ्रत्सूर्यसहस्रस्य तेजः संवर्तकोपमः ॥ ५ ९ ॥
स्मितं कृत्वाब्रवीद् वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । तब अनेक नेत्रोंवाले, शत्रुविजयी, महादेव अपने मुखोंद्वारा यत्नपूर्वक प्राण और अपान वायुको अवरुद्ध करके सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिपात करते हुए सहसा अग्निकुण्डसे निकल पड़े। प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी स्वरूपसे सहस्रों सूर्योकी प्रभा धारण किये वे दक्षके सामने खड़े हो गये और मुसकराकर बोले— ' प्रजापते! बोलो, मैं आज तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ' ॥ ५८-५९ ॥ श्राविते च मखाध्याये देवानां गुरुणा ततः ॥ ६० ॥
तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा दक्षो देवं प्रजापतिः ।
भीतशङ्कितवित्रस्तः सबाष्पवदनेक्षणः ॥ ६१ ॥
यदि प्रसन्नो भगवान् यदि चाहं भवत्प्रियः ।
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यदि वाहमनुग्राह्यो यदि वा वरदो मम ॥ ६२ ॥
यद् दग्धं भक्षितं पीतमशितं यच्च नाशितम् ।
चूर्णीकृतापविद्धं च यज्ञसम्भारमीदृशम् ॥ ६३ ॥
दीर्घकालेन महता प्रयत्नेन सुसंचितम् ।
तन्न मिथ्या भवेन्मह्यं वरमेतमहं वृणे ॥ ६४ ॥
उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया । तत्पश्चात् प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए - से बोले — ' भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान् प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ- सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो चला दिया गया, खा - पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो ' ॥ ६०–६४ ॥
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1628 दक्षके यज्ञमें शिवजीका प्राकट्य
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तथास्त्वित्याह भगवान् भगनेत्रहरो हरः ।
धर्माध्यक्षो विरूपाक्षस्त्र्यक्षो देवः प्रजापतिः ॥ ६५ ॥
तब धर्मके अध्यक्ष, प्रजापालक, विरूपाक्ष, त्रिनेत्रधारी, भगनेत्रहारी देवेश्वर भगवान् हरने ' तथास्तु ' कहकर दक्षको मनोवांछित वर दे दिया ॥ ६५ ॥
जानुभ्यामवनीं गत्वा दक्षो लब्ध्या भवाद् वरम् ।
नाम्नामष्टसहस्रेण स्तुतवान् वृषभध्वजम् ॥ ६६ ॥
महादेवजीसे वर पाकर दक्षने धरतीपर घुटने टेककर उन्हें प्रणाम किया और एक हजार आठ नामोंद्वारा उन भगवान् वृषभध्वजका स्तवन किया ॥ ६६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यैर्नामधेयैः स्तुतवान् दक्षो देवं प्रजापतिः ।
वक्तुमर्हसि मे तात श्रीतुं श्रद्धा ममानघ ॥ ६७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- तात! निष्पाप पितामह! प्रजापति दक्षने जिन नामोंद्वारा महादेवजीकी स्तुति की थी, उनका मुझसे वर्णन कीजिये । उन्हें सुननेके लिये मेरे हृदयमें बड़ी श्रद्धा है ॥ ६७ ॥
भीष्म उवाच
श्रूयतां देवदेवस्य नामान्यद्भुतकर्मणः ।
गूढव्रतस्य गुह्यानि प्रकाशानि च भारत ॥ ६८ ॥
भीष्मजी कहते हैं - भरतनन्दन! अद्भुत कर्म करनेवाले गूढ व्रतधारी देवाधिदेव
महादेवजीके कुछ नाम गोपनीय हैं और कुछ प्रकाशित हैं । तुम उन सबको सुनो ॥ ६८ ॥
नमस्ते देवदेवेश देवारिबलसूदन ।
देवेन्द्रबलविष्टम्भ देवदानवपूजित ॥ ६ ९ ॥
( दक्ष बोले) – देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है । आप देववैरी दानवोंकी सेनाके संहारक और देवराज इन्द्रकी शक्तिको भी स्तम्भित करनेवाले हैं । देवता और दानव - सबने आपकी पूजा की है ॥ ६ ९ ॥
सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय ।
सर्वतःपाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख ॥ ७० ॥
आप सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण सहस्राक्ष हैं। आपकी इन्द्रियाँ सबसे विलक्षण अर्थात् परोक्ष विषयको भी प्रत्यक्ष करनेवाली हैं, इसलिये आपको विरूपाक्ष कहते हैं । आप त्रिनेत्रधारी होनेके कारण त्र्यक्ष कहलाते हैं । यक्षराज कुबेरके भी आप प्रिय ( इष्टदेव ) हैं । आपके सब ओर हाथ और पैर हैं तथा सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं ॥ ७० ॥
सर्वतः श्रुतिमँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ।
शंकुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय ॥ ७१ ॥
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गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते । आपके कान भी सब ओर हैं । संसारमें जो कुछ है, सबको व्याप्त करके आप स्थित हैं । शंकुकर्ण, महाकर्ण, कुम्भकर्ण, अर्णवालय, गजेन्द्रकर्ण, गोकर्ण और पाणिकर्ण- ये सात
पार्षद् आपके ही स्वरूप हैं । इन सबके रूपमें आपको नमस्कार है ॥ ७१ ॥
शतोदर शतावर्त शतजिह्व नमोऽस्तु ते ॥ ७२ ॥
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः ।
ब्रह्माणं त्वा शतक्रतुमूर्ध्वं खमिव मेनिरे ॥ ७३ ॥
आपके सैकड़ों उदर, सैकड़ों आवर्त और सैकड़ों जिह्वाएँ होनेके कारण आप क्रमशः शतोदर, शतावर्त और शतजिह्व नामसे प्रसिद्ध हैं । आपको प्रणाम है । गायत्री - मन्त्रका जप करनेवाले द्विज आपकी ही महिमाका गान करते हैं और सूर्योपासक सूर्यके रूपमें आपकी ही आराधना करते हैं । ऋषिगण आपको ही ब्रह्मा, शतक्रतु इन्द्र और आकाशके समान सर्वोच्च पद मानते हैं ॥
मूर्ती हि ते महामूर्ते समुद्राम्बरसंनिभ ।
सर्वा वै देवता ह्यस्मिन् गावो गोष्ठ इवासते ॥ ७४ ॥
समुद्र और आकाशके समान अपार, अनन्त रूप धारण करनेवाले महामूर्तिधारी महेश्वर! जैसे गोशालामें गौएँ निवास करती हैं, उसी प्रकार आपकी भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं यजमानरूप आठ प्रकारकी मूर्तियोंमें सम्पूर्ण देवताओंका निवास है ॥
भवच्छरीरे पश्यामि सोममग्निं जलेश्वरम् ।
आदित्यमथ वै विष्णुं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् ॥ ७५ ॥
मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पतिको भी देख रहा हूँ ॥ ७५ ॥
भगवान् कारणं कार्यं क्रिया करणमेव च ।
असतश्च सतश्चैव तथैव प्रभवाप्ययौ ॥ ७६ ॥
आप ही कारण, कार्य, क्रिया (प्रयत्न ) और करण हैं । सत् और असत् पदार्थोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान भी आप ही हैं ॥ ७६ ॥
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च ।
पशूनां पतये नित्यं नमोऽस्त्वन्धकघातिने ॥ ७७ ॥
आप सबके उद्भवका स्थान होनेसे भव, संहार करनेके कारण शर्व, ‘ रु ' अर्थात् पाप एवं दुःखको दूर करनेसे रुद्र, वरदाता होनेसे वरद तथा पशुओं ( जीवों ) के पालक होनेके कारण सदा पशुपति कहलाते हैं । आपने ही अन्धकासुरका वध किया है, इसलिये आपका
नाम अन्धकघाती है । आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ७७ ॥
त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलवरपाणिने ।