05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1861–1870

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1861–1870

पृष्ठ 1861

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त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्नाय वै नमः ॥ ७८ ॥

आप तीन जटा और तीन मस्तक धारण करनेवाले हैं । आपके हाथमें श्रेष्ठ त्रिशूल शोभा पाता है । आप त्र्यम्बक, त्रिनेत्रधारी तथा त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले हैं । आपको नमस्कार है ॥ ७८ ॥

नमश्चण्डाय कुण्डाय अण्डायाण्डधराय च ।

दण्डिने समकर्णाय दण्डिमुण्डाय वै नमः ॥ ७९ ॥

आप दुष्टोंपर अत्यन्त क्रोध करनेके कारण चण्ड हैं । कुण्डमें जलकी भाँति आपके उदरमें सम्पूर्ण जगत् स्थित है, इसलिये आपको कुण्ड कहते हैं । आप अण्ड (ब्रह्माण्ड स्वरूप ) और अण्डधर (ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले ) हैं । आप दण्डधारी ( सबको दण्ड देनेवाले) और समकर्ण ( सबकी समान रूपसे सुननेवाले ) हैं । दण्डधारण करके मूँड़ मुँड़ानेवाले संन्यासी भी आपके ही स्वरूप हैं, इसलिये आपका नाम दण्डिमुण्ड है । आपको नमस्कार है ॥ ७ ९ ॥

नमोर्ध्वदंष्ट्रकेशाय शुक्लायावतताय च ।

विलोहिताय धूम्राय नीलग्रीवाय वै नमः ॥ ८० ॥

आपकी दाढें बड़ी -बड़ी और सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए हैं, इसलिये आप ऊर्ध्वदंष्ट्र तथा ऊर्ध्वकेश कहलाते हैं । आप ही शुक्ल ( विशुद्ध ब्रह्म) और आप ही अवतत ( जगत्के रूपमें विस्तृत) हैं । आप रजोगुणको अपनानेपर विलोहित और तमोगुणका आश्रय लेनेपर धूम्र कहलाते हैं । आपकी ग्रीवामें नीले रंगका चिह्न है, इसलिये आपको

नीलग्रीव कहते हैं । आपको नमस्कार है ॥ ८० ॥

नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।

सूर्याय सूर्यमालाय सूर्यध्वजपताकिने ॥ ८१ ॥

आपके रूपकी कहीं भी समता नहीं है, इसलिये आप अप्रतिरूप हैं । विविध रूप धारण करनेके कारण आपका नाम विरूप है । आप ही परम कल्याणकारी शिव हैं । आप ही सूर्य हैं, आप ही सूर्यमण्डलके भीतर सुशोभित होते हैं। आप अपनी ध्वजा और

पताकापर सूर्यका चिह्न धारण करते हैं । आपको नमस्कार है ॥

नमः प्रमथनाथाय वृषस्कन्धाय धन्विने ।

शत्रुंदमाय दण्डाय पर्णचीरपटाय च ॥ ८२ ॥

आप प्रमथगणोंके अधीश्वर हैं । वृषभके कंधोंके समान आपके कंधे भरे हुए हैं । आप पिनाक धनुष धारण करते हैं । शत्रुओंका दमन करनेवाले और दण्डस्वरूप हैं । किरात या तपस्वीके रूपमें विचरते समय आप भोजपत्र और वल्कलवस्त्र धारण करते हैं । आपको नमस्कार है ॥

नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च ।

हिरण्यकृतचूडाय हिरण्यपतये नमः ॥ ८३ ॥

पृष्ठ 1862

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हिरण्य ( सुवर्ण) को उत्पन्न करनेके कारण हिरण्यगर्भ कहलाते हैं । सुवर्णके ही कवच और मुकुट धारण करनेसे आपको हिरण्यकवच और हिरण्यचूड कहा गया है । आप

सुवर्णके अधिपति हैं । आपको सादर नमस्कार है ॥ ८३ ॥

नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय वैवै नमः ।

सर्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतान्तरात्मने ॥ ८४ ॥

जिनकी स्तुति हो चुकी है, वे आप हैं । जो स्तुतिके योग्य हैं, वे भी आप हैं और जिनकी स्तुति हो रही है, वे भी आप ही हैं । आप सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी और सम्पूर्ण भूतोंके

अन्तरात्मा हैं । आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ८४ ॥

मोऽथ मन्त्राय शुक्लध्वजपताकिने ।

नमो नाभाय नाभ्याय नमः कटकटाय च ॥ ८५ ॥

आप ही होता और मन्त्र हैं । आपको नमस्कार है । आपकी ध्वजा और पताकाका रंग श्वेत है । आपको नमस्कार है । आप नाभ ( नाभिमें सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले ), नाभ्य ( संसार- चक्रके नाभि- स्थान ) तथा कट-कट ( आवरणके भी आवरण) हैं । आपको नमस्कार है ॥ ८५ ॥

नमोऽस्तु कृशनासाय कृशाङ्गाय कृशाय च ।

संहृष्टाय विहृष्टाय नमः किलकिलाय च ॥ ८६ ॥

आपकी नासिका कृश ( पतली ) है, इसलिये आप कृशनस कहलाते हैं । आपके अवयव कृश होनेसे आपको कृशांग तथा शरीर दुबला होनेसे कृश कहते हैं । आप अत्यन्त हर्षोल्लाससे परिपूर्ण, विशेष हर्षका अनुभव करनेवाले और हर्षकी किल - किल ध्वनि हैं । आपको नमस्कार है ॥ ८६ ॥

नमोऽस्तु शयमानाय शयितायोत्थिताय च ।

स्थिताय धावमानाय मुण्डाय जटिलाय च ॥ ८७ ॥

आप समस्त प्राणियोंके भीतर शयन करनेवाले अन्तर्यामी पुरुष हैं । प्रलयकालमें योगनिद्राका आश्रय लेकर सोते और सृष्टिके प्रारम्भकालमें कल्पान्त निद्रासे जागते हैं । आप ब्रह्मरूपसे सर्वत्र स्थित और कालरूपसे सदा दौड़नेवाले हैं । मूँड़ मुँड़ानेवाले संन्यासी

और जटाधारी तपस्वी भी आपके ही स्वरूप हैं । आपको नमस्कार है ॥ ८७ ॥

नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रवादिने ।

नाद्योपहारलुब्धाय गतिवादित्रशालिने ॥ ८८ ॥

आपका ताण्डव- नृत्य बराबर चलता रहता है । आप मुखसे शृंगी आदि बाजे बजानेमें कुशल हैं । कमलपुष्पकी भेंट लेनेके लिये सदा उत्सुक रहते हैं । गाने और बजानेकी कलामें

तत्पर रहकर आप बड़ी शोभा पाते हैं । आपको प्रणाम है ॥ ८८ ॥

नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलप्रमथनाय च ।

कालनाथाय कल्याय क्षयायोपक्षयाय च ॥ ८ ९ ॥

पृष्ठ 1863

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आप अवस्थामें सबसे ज्येष्ठ और गुणोंमें भी सबसे श्रेष्ठ हैं । आपने बल नामक दैत्यको इन्द्ररूपसे मथ डाला था । आप कालके भी नियन्ता और सर्वशक्तिमान् हैं । महाप्रलय और

अवान्तर- प्रलय भी आप ही हैं । आपको नमस्कार है ॥ ८ ९ ॥

भीमदुन्दुभिहासाय भीमव्रतधराय च ।

उग्राय च नमो नित्यं नमोऽस्तु दशबाहवे ॥ ९० ॥

प्रभो! आपका अट्टहास भयंकर शब्द करनेवाली दुन्दुभिके समान जान पड़ता है । आप भीषण व्रतको धारण करनेवाले हैं । दस भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले उग्ररूपधारी आपको मेरा नित्य बारंबार नमस्कार है ॥

नमःकपालहस्ताय चितिभस्मप्रियाय च ।

विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च ॥ ९ १ ॥

आपके हाथमें कपाल है । चिताका भस्म आपको बहुत प्रिय है । आप सबको भयभीत करनेवाले और स्वयं निर्भय हैं तथा शम- दम आदि तीक्ष्ण व्रतोंको धारण करते हैं । आपको नमस्कार है ॥ ९ १ ॥

नमो विकृतवक्त्राय खड्गजिह्वाय दंष्ट्रिणे ।

पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बीवीणाप्रियाय च ॥ ९२ ॥

आपका मुख विकृत है । जिह्वा खड्गके समान है । आपका मुख दाढ़ोंसे सुशोभित होता है । आप कच्चे - पक्के फलोंके गुद्देके लिये लुभायमान रहते हैं । तुम्बी और वीणा

आपको विशेष प्रिय हैं । आपको प्रणाम है ॥

नमो वृषाय वृष्याय गोवृषाय वृषाय च ।

कटंकटाय दण्डाय नमः पचपचाय च ॥ ९ ३ ॥

आप वृष ( वृष्टिकर्ता ), वृष्य ( धर्मकी वृद्धि करनेवाले), गोवृष ( नन्दी ) और वृष ( धर्म ) आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं । कटंकट ( नित्य गतिशील), दण्ड ( शासक ) और पचपच ( सम्पूर्ण

भूतोंको पचानेवाला काल) भी आपके ही नाम हैं । आपको नमस्कार है ॥

नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदाय च ।

वरमाल्यगन्धवस्त्राय वरातिवरदे नमः ॥ ९ ४ ॥

आप सबसे श्रेष्ठ वरस्वरूप और वरदाता हैं । उत्तम वस्त्र, माल्य और गन्ध धारण करते हैं तथा भक्तको इच्छानुसार एवं उससे भी अधिक वर देनेवाले हैं । आपको प्रणाम है ॥ ९ ४ ॥

नमो रक्तविरक्ताय भावनायाक्षमालिने ।

सम्भिन्नाय विभिन्नाय छायायातपनाय च ॥ ९ ५ ॥

रागी और विरागी-दोनों जिनके स्वरूप हैं, जो ध्यानपरायण, रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले, कारण - रूपसे सबमें व्याप्त और कार्यरूपसे पृथक् - पृथक् दिखायी देनेवाले हैं

पृष्ठ 1864

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तथा जो सम्पूर्ण जगत्को छाया और धूप प्रदान करते हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है ॥

अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च ।

नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च ॥ ९ ६ ।

जो अघोर, घोर और घोरसे भी घोरतर रूप धारण करनेवाले हैं तथा जो शिव, शान्त एवं परमशान्तरूप हैं, उन भगवान् शंकरको मेरा बारंबार नमस्कार है ॥ ९ ६ ॥

एकपाद्बहुनेत्राय एकशीर्णे नमोऽस्तु ते ।

रुद्राय क्षुद्रलुब्धाय संविभागप्रियाय च ॥ ९ ७ ॥

एक पाद, अनेक नेत्र और एक मस्तकवाले आपको प्रणाम है । भक्तोंकी दी हुई छोटी-से - छोटी वस्तुके लिये भी लालायित रहनेवाले और उसके बदलेमें उन्हें अपार धनराशि बाँट देनेकी रुचि रखनेवाले आप भगवान् रुद्रको नमस्कार है ॥ ९ ७ ॥

पञ्चालाय सिताङ्गाय नमः शमशमाय च ।

नमश्चण्डिकघण्टाय घण्टायाघण्टघण्टिने ॥ ९ ८ ॥

जो इस विश्वका निर्माण करनेवाले कारीगर, गौरवर्णके शरीरवाले तथा सदा शान्तरूपसे रहनेवाले हैं, जिनकी घण्टाध्वनि शत्रुओंको भयभीत कर देती है तथा जो स्वयं ही घण्टानाद और अनाहतध्वनिके रूपमें श्रवण्गोचर होते हैं उन महेश्वरको प्रणाम है ॥ ९ ८ ॥

सहस्राध्मातघण्टाय घण्टामालाप्रियाय च ।

प्राणघण्टाय गन्धाय नमः कलकलाय च ॥ ९९ ॥

जिनके मन्दिरमें लगे हुए घण्टोंको सहस्रों आदमी बजाते हैं, घण्टोंकी माला जिन्हें प्रिय है, जिनके प्राण ही घण्टाके समान ध्वनि करते हैं, जो ग्रन्थ और कोलाहलरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है ॥

हूंहूंहूंकारपाराय हूंहूंकारप्रियाय च ।

नमः शमशमे नित्यं गिरिवृक्षालयाय च ॥ १०० ॥

आप हूं ( क्रोध), हूं ( हिंकार ), हूं ( आकाश, सूर्य और ईश्वर) – इन सबसे परे विद्यमान शान्तस्वरूप परब्रह्म हैं, ' हूं' हूं' करना आपको प्रिय लगता है, आप ' शान्त रहो ' शान्त रहो ' ऐसा कहकर सदा सबको आश्वासन देनेवाले हैं तथा पर्वतोंपर और वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं । आपको प्रणाम है ॥ १०० ॥

गर्भमांससृगालाय तारकाय तराय च ।

नमो यज्ञाय यजिने हुताय प्रहुताय च ॥ १०१ ॥

आप फलके भीतरके गुद्देरूप मांसके प्रलोभी शृगालरूप हैं। आप ही सबको तारनेवाले तथा तरण - तारणके साधन हैं । आप ही यज्ञ और आप ही यजमान हैं । आप ही

हुत ( हवन ) और आप ही प्रहुत (अग्नि ) हैं। आपको नमस्कार है ॥ १०१ ॥

पृष्ठ 1865

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यज्ञवाहाय दान्ताय तप्यायातपनाय च ।

नमस्तटाय तट्याय तटानां पतये नमः ॥ १०२ ॥

आप ही यज्ञके निर्वाहक अथवा उसे सब देवताओंतक पहुँचानेवाले अग्निदेव हैं । आप मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं । आप ही भक्तोंका कष्ट देखकर संतप्त होनेवाले तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले हैं । आप ही तट हैं । आप ही तटवर्ती नदी आदि हैं तथा आप

ही तटोंके पालक हैं । आपको नमस्कार है ॥

अन्नदायान्नपतये नमस्त्वन्नभुजे तथा ।

नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च ॥ १०३ ॥

आप ही अन्नदाता, अन्नपति और अन्नके भोक्ता हैं । आपके सहस्रों मस्तक और सहस्रों चरण हैं । आपको बारंबार प्रणाम है ॥ १०३ ॥

सहस्रोद्यतशूलाय सहस्रनयनाय च ।

नमो बालार्कवर्णाय बालरूपधराय च ॥ १०४ ॥

आप अपने सहस्रों हाथोंमें सहस्रों शूल लिये रहते हैं । आपके सहस्रों नेत्र हैं । आपकी अंगकान्ति प्रातःकालीन सूर्यके समान देदीप्यमान है । आप बालकरूप धारण करनेवाले हैं । आपको नमस्कार है ॥ १०४ ॥

बालानुचरगोप्ताय बालक्रीडनकाय च ।

नमो वृद्धाय लुब्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च ॥ १०५ ॥

आप श्रीकृष्णरूपसे संगी - साथी बालकोंके रक्षक तथा बालकोंके साथ खेल करनेवाले हैं । आप सबकी अपेक्षा वृद्ध हैं । भक्ति और प्रेमके लोभी हैं। दुष्टोंके पापाचारसे क्षुब्ध हो

उठते है और दुराचारियोंको क्षोभमें डालनेवाले हैं । आपको नमस्कार है ॥ १०५ ॥

तरङ्गाङ्कितकेशाय मुञ्जकेशाय वै नमः ।

नमः षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च ॥ १०६ ॥

आपके केश गंगाके तरंगोंसे अंकित तथा मुञ्जके समान हैं । आपको नमस्कार है । आप ब्राह्मणोंके छः कर्म– अध्ययन- अध्यापन, यजनयाजन तथा दान और प्रतिग्रहसे संतुष्ट रहते हैं; स्वयं यजन, अध्ययन और दानरूप तीन कर्मोंमें ही तत्पर रहते हैं । आपको मेरा प्रणाम है ॥

वर्णाश्रमाणां विधिवत् पृथक्कर्मनिवर्तिने ।

नमो घुष्याय घोषाय नमः कलकलाय च ॥ १०७ ॥

आप वर्ण और आश्रमोंके भिन्न-भिन्न कर्मोंका विधिवत् विभाग करनेवाले, जपनीय

मन्त्ररूप, घोषस्वरूप तथा कोलाहलमय हैं । आपको बारंबार नमस्कार है ॥

श्वेतपिङ्गलनेत्राय कृष्णरक्तेक्षणाय च ।

प्राणभग्नाय दण्डाय स्फोटनाय कृशाय च ॥ १०८ ॥

पृष्ठ 1866

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1866 का मूल पृष्ठ
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आपके नेत्र श्वेत पिङ्गलवर्णके हैं, काले और लाल रंगके हैं । आप प्राणवायु (श्वास ) को जीतनेवाले, दण्ड ( आयुध) रूप, ब्रह्माण्डरूपी घटको फोड़नेवाले तथा कृश- शरीरधारी हैं । आपको नमस्कार है ॥ १०८ ॥

धर्मकामार्थमोक्षाणां कथनीयकथाय च ।

सांख्याय सांख्यमुख्याय सांख्ययोगप्रवर्तिने ॥ १० ९ ॥

धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष देनेके विषयमें आपकी कीर्तिकथा वर्णन करनेके योग्य है । आप सांख्यस्वरूप, सांख्ययोगियोंमें प्रधान तथा सांख्यशास्त्रको प्रवृत्त करनेवाले हैं । आपको प्रणाम है ॥ १० ९ ॥

नमो रथ्यविरथ्याय चतुष्पथरथाय च ।

कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने ॥ ११० ॥

आप रथपर बैठकर तथा बिना रथके भी घूमनेवाले हैं । जल, अग्नि, वायु तथा आकाश -इन चारों मार्गोंपर आपकी गति है । आप काले मृगचर्मको दुपट्टेकी भाँति ओढ़नेवाले तथा

सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले हैं । आपको प्रणाम है ॥ ११० ॥

ईशान वज्रसंघात हरिकेश नमोऽस्तु ते ।

त्र्यम्बकाम्बिकनाथाय व्यक्ताव्यक्त नमोऽस्तु ते ॥ १११ ॥

ईशान! आपका शरीर वज्रके समान कठोर है । हरिकेश! आपको नमस्कार है । व्यक्ताव्यक्तस्वरूप परमेश्वर! आप त्रिनेत्रधारी तथा अम्बिकाके स्वामी हैं । आपको नमस्कार है ॥ १११ ॥

काम कामद कामघ्न तृप्तातृप्तविचारिणे ।

सर्व सर्वद सर्वघ्न संध्याराग नमोऽस्तु ते ॥ ११२ ॥

आप कामस्वरूप, कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, कामदेवके नाशक, तृप्त और अतृप्तका विचार करनेवाले, सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले, सबके संहारक और

संध्याकालके समान रंगवाले हैं । आपको प्रणाम है ॥

महाबल महाबाहो महासत्त्व महाद्युते ।

महामेघचयप्रख्य महाकाल नमोऽस्तु ते ॥ ११३ ॥

महाबल! महाबाहो! महासत्त्व! महाद्युते! आप महान् मेघोंकी घटाके समान रंगवाले

महाकालस्वरूप हैं । आपको नमस्कार है ॥ ११३ ॥

स्थूल जीर्णाङ्ग जटिले वल्कलाजिनधारिणे ।

दीप्तसूर्याग्निजटिले वल्कलाजिनवाससे ।

सहस्रसूर्यप्रतिम तपोनित्य नमोऽस्तु ते ॥ ११४ ॥

आपका श्रीविग्रह स्थूल और जीर्ण है । आप जटाधारी हैं । वल्कल और मृगचर्म धारण करते हैं । देदीप्यमान सूर्य और अग्निके समान ज्योतिर्मयी जटासे सुशोभित हैं । वल्कल और

पृष्ठ 1867

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मृगचर्म ही आपके वस्त्र हैं। आप सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान और सदा तपस्यामें

संलग्न रहनेवाले हैं । आपको नमस्कार है ॥ ११४ ॥

उन्मादन शतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज ।

चन्द्रावर्त युगावर्त मेघावर्त नमोऽस्तु ते ॥ ११५ ॥

आप जगत्को उन्माद ( मोह ) - में डालनेवाले हैं । आपके मस्तकपर गंगाजीकी सैकड़ों लहरें और भँवरें उठती रहती हैं । आपके केश सदा गंगाजलसे भीगे रहते हैं । आप चन्द्रमाको क्षय- वृद्धिके चक्करमें डालनेवाले हैं । आप ही युगोंकी पुनरावृत्ति करनेवाले और

मेघोंके प्रवर्तक हैं । आपको नमस्कार है ॥ ११५ ॥

त्वमन्नमन्नभोक्ता च अन्नदोऽन्नभुगेव च ।

अन्नस्रष्टा च पक्ता च पक्वभुक्पवनोऽनलः ॥ ११६ ॥

आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, अन्नदाता, अन्नका पालन करनेवाले, अन्नस्रष्टा, पाचक, पक्वान्नभोजी, प्राणवायु तथा जठरानलरूप हैं ॥ ११६ ॥

जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजाश्च तथोद्भिजाः ।

त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः ॥ ११७ ॥

देवदेवेश्वर! जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज– ये चार प्रकारके प्राणिसमूह आप ही हैं ॥

चराचरस्य स्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता तथैव च ।

त्वामाहुर्ब्रह्मविदुषो ब्रह्म ब्रह्मविदां वर ॥ ११८ ॥

ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! आप ही चराचर जीवोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं । ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपहीको ब्रह्म कहते हैं ॥ ११८ ॥

मनसः परमा योनिः खं वायुर्ज्योतिषां निधिः ।

ऋक्सामानि तथोङ्कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः ॥ ११ ९ ॥

वेदवादी विद्वान् आपको ही मनका परम कारण, आकाश, वायु, तेजकी निधि, ऋक्, साम तथा ॐकार बताते हैं ॥ ११ ९ ॥

हायिहायिहुवाहायिहावुहायि तथाऽसकृत् ।

गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठ सामगा ब्रह्मवादिनः ॥ १२० ॥

सुरश्रेष्ठ! सामगान करनेवाले वेदवेत्ता पुरुष ' हा ३ यि, हा ३ यि, हू ३ वा, हा ३ यि, ३ वु, हा ३ यि' आदिका बारंबार उच्चारण करके निरन्तर आपकी ही महिमाका गान करते हैं ॥ १२० ॥

यजुर्मयो ऋङ्मयश्च त्वमाहुतिमयस्तथा ।

पठ्यसे स्तुतिभिश्चैव वेदोपनिषदां गणैः ॥ १२१ ॥

यजुर्वेद और ऋग्वेद आपके ही स्वरूप हैं । आप ही हविष्य हैं । वेदों और उपनिषदोंके समूह अपनी स्तुतियोंद्वारा आपकी ही महिमाका प्रतिपादन करते हैं ॥ १२१ ॥

पृष्ठ 1868

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ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराश्च ये ।

त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युत्स्तनितगर्जितः ॥ १२२ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्त्यज –ये आपके ही स्वरूप हैं । मेघोंकी घटा, बिजली, गर्जना और गड़गड़ाहट भी आप ही हैं ॥ १२२ ॥

संवत्सरस्त्वमृतवो मासो मासार्धमेव च ।

युगं निमेषाः काष्ठास्त्वं नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः ॥ १२३ ॥

संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, युग, निमेष, काष्ठा, नक्षत्र, ग्रह और कला भी आप ही हैं ॥ १२३ ॥

वृक्षाणां ककुदोऽसि त्वं गिरीणां शिखराणि च ।

व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योऽनन्तश्च भोगिनाम् ॥ १२४ ॥

वृक्षोंमें प्रधान वट- पीपल आदि, पर्वतोंमें उनके शिखर, वन-जन्तुओंमें व्याघ्र, पक्षियोंमें गरुड़ तथा सर्पोंमें अनन्त आप ही हैं ॥ १२४ ॥

क्षीरोदो ह्युदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च ।

वज्रः प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च ॥ १२५ ॥

समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रों ( अस्त्रों ) में धनुष, चलाये जानेवाले आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य भी आप ही हैं ॥ १२५ ॥

त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे ।

व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ ॥ १२६ ॥

आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय तथा पराजय हैं ॥

त्वं गदी त्वं शरी चापी खट्वाङ्गी झर्झरी तथा ।

छेत्ता भेत्ता प्रहर्ता त्वं नेता मन्ता पिता मतः ॥ १२७ ॥

आप गदा, बाण, धनुष, खाटका अंग तथा झर्झर नामक अस्त्र धारण करनेवाले हैं । आप छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं । सत्पथपर ले जानेवाले, शुभका मनन करनेवाले तथा पिता माने गये हैं ॥ १२७ ॥

दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च ।

गङ्गा समुद्राः सरितः पल्वलानि सरांसि च ॥ १२८ ॥

लता वल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः ।

द्रव्यकर्मसमारम्भः कालः पुष्पफलप्रदः ॥ १२ ९ ॥

दस लक्षणोंवाला धर्म तथा अर्थ और काम भी आप ही हैं । गंगा, समुद्र, नदियाँ, गड़हे, तालाब, लता, वल्ली, तृण, ओषधि, पशु, मृग, पक्षी, द्रव्य और कर्मोंके आरम्भ तथा फूल और फल देनेवाला काल भी आप ही हैं ॥ १२८-१२९ ॥ आदिश्चान्तश्च देवानां गायत्र्योंकार एव च ।

पृष्ठ 1869

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हरितो रोहितो नीलः कृष्णो रक्तस्तथारुणः ।

कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा ॥ १३० ॥

आप देवताओंके आदि और अन्त हैं । गायत्री मन्त्र और ॐकार भी आप ही हैं । हरित, लोहित, नील, कृष्ण, रक्त, अरुण, कटु, कपिल, कबूतरके समान तथा मेचक ( श्याम मेघके समान) —ये दस प्रकारके रंग भी आपके ही स्वरूप हैं ॥ १३० ॥

अवर्णश्च सुवर्णश्च वर्णकारो घनोपमः ।

सुवर्णनामा च तथा सुवर्णप्रिय एव च ॥ १३१ ॥

आप वर्णरहित होनेके कारण अवर्ण और अच्छे वर्णवाले होनेसे सुवर्ण कहलाते हैं । आप वर्णोंके निर्माता और मेघके समान हैं । आपके नाममें सुन्दर वर्णों ( अक्षरों ) -का उपयोग हुआ है, इसलिये आप सुवर्णनामा हैं तथा आपको श्रेष्ठ वर्ण प्रिय है ॥ १३१ ॥

त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनलः ।

उपप्लवश्चित्रभानुः स्वर्भानुर्भानुरेव च ॥ १३२ ॥

आप ही इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, अग्नि, सूर्य-चन्द्रका ग्रहण, चित्रभानु ( सूर्य), राहु और भानु हैं ॥ १३२ ॥

हो होताच होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभुः ।

त्रिसौपर्णं तथा ब्रह्म यजुषां शतरुद्रियम् ॥ १३३ ॥

होत्र (स्रुवा ), होता, हवनीय पदार्थ, हवन-क्रिया तथा ( उसके फल देनेवाले ) परमेश्वर भी आप ही हैं। वेदकी त्रिसौपर्ण नामक श्रुतियोंमें तथा यजुर्वेदके शतरुद्रिय- प्रकरणमें जो बहुत - से वैदिक नाम हैं, वे सब आपहीके नाम हैं ॥ १३३ ॥

पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् ।

गिरिको हिंडुको वृक्षो जीवः पुद्गल एव च ॥ १३४ ॥

प्राणः सत्त्वं रजश्चैव तमश्चाप्रमदस्तथा ।

प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ १३५ ॥

उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च ।

लोहितान्तर्गता दृष्टिर्महावक्त्रो महोदरः ॥ १३६ ॥

आप पवित्रोंके भी पवित्र और मंगलोंके भी मंगल हैं । आप ही गिरिक ( अचेतनको भी चेतन करनेवाले ), हिंडुक ( गमनागमन करनेवाले ), संसार-वृक्ष, जीव, शरीर, प्राण, सत्त्व, रज, तम, अप्रमद ( स्त्रीरहित - ऊर्ध्वरेता ), प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष ( आँखोंका खोलना- मींचना ), छींकना और जँभाई लेना आदि चेष्टाएँ भी आप ही हैं । आपकी अग्निमयी लाल रंगकी दृष्टि भीतर छिपी हुई है । आपके मुख और उदर महान् हैं ॥ १३४—१३६ ॥

सूचीरोमा हरिश्मश्रुरूर्ध्वकेशश्चलाचलः ।

गीतवादित्रतत्त्वज्ञो गीतवादनकप्रियः ॥ १३७ ॥

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रोएँ सूईके समान हैं । दाढ़ी- मूछ काली है । सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए हैं । आप चराचर- स्वरूप हैं। गाने - बजानेके तत्त्वको जाननेवाले हैं । गाना- बजाना आपको अधिक प्रिय है ॥ १३७ ॥

मत्स्यो जलचरो जाल्योऽकलः केलिकलः कलिः ।

अकालश्चातिकालश्च दुष्कालः काल एव च ॥ १३८ ॥

आप मत्स्य, जलचर और जालधारी घड़ियाल हैं । फिर भी अकल ( बन्धनसे परे ) हैं । आप केलिकलासे युक्त और कलहरूप हैं । आपही अकाल, अतिकाल, दुष्काल तथा काल हैं ॥ १३८ ॥

मृत्युः क्षुरश्च कृत्यश्च पक्षोऽपक्षक्षयंकरः ।

मेघकालो महादंष्ट्रः संवर्तकबलाहकः ॥ १३ ९ ॥

मृत्यु, क्षुर ( छेदन करनेका शस्त्र ), कृत्य ( छेदन करने योग्य), पक्ष ( मित्र ) तथा अपक्ष-क्षयंकर ( शत्रुपक्षका नाश करनेवाले ) भी आप ही हैं । आप मेघके समान काले, बड़ी - बड़ी दाढ़ोंवाले और प्रलयकालीन मेघ हैं ॥

घण्टोऽघण्टो घटी घण्टी चरुचेली मिलीमिली ।

ब्रह्मकायिकमग्नीनां दण्डी मुण्डस्त्रिदण्डधृक् ॥ १४० ॥

घण्ट ( प्रकाशवान्), अघण्ट ( अव्यक्त प्रकाशवाले ), घटी ( कर्मफलसे युक्त करनेवाले ), घण्टी ( घण्टावाले ), चरुचेली (जीवोंके साथ क्रीडा करनेवाले ) तथा मिली - मिली ( कारणरूपसे सबमें व्याप्त) – ये सब आप ही हैं । आप ही ब्रह्म, अग्नियोंके स्वरूप, दण्डी, मुण्ड तथा त्रिदण्डधारी हैं ॥ १४० ॥

चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुर्होत्रप्रवर्तकः ।

चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरश्च यः ॥ १४१ ॥

चार युग और चार वेद आपके ही स्वरूप हैं तथा चार प्रकारके होतृ- कर्मोंके प्रवर्तक आप ही हैं । आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोंकी सृष्टि करनेवाले हैं ॥ १४१ ॥

सदा चाक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिपः ।

रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिशो गिरिकप्रियः ॥ १४२ ॥

आप ही अक्षप्रिय, धूर्त, गणाध्यक्ष और गणाधिप आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं । आप रक्त वस्त्र तथा लाल फूलोंकी माला पहनते हैं, पर्वतपर शयन करते और गेरुए वस्त्रसे प्रेम रखते हैं ॥ १४२ ॥

शिल्पिकः शिल्पिनां श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्तकः ।

भगनेत्राङ्कुशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः ॥ १४३ ॥

आप ही शिल्पियोंमें सर्वश्रेष्ठ शिल्पी ( कारीगर) तथा सब प्रकारकी शिल्पकलाके प्रवर्तक हैं । आप भगदेवताकी आँख फोड़नेके लिये अंकुश, चण्ड ( अत्यन्त कोप करनेवाले ) और पूषाके दाँत नष्ट करनेवाले हैं ॥