05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1871–1880
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1871–1880
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स्वाहा स्वधा वषट्कारो नमस्कारो नमो नमः ।
गूढव्रतो गुह्यतपास्तारकस्तारकामयः ॥ १४४ ॥
स्वाहा, स्वधा, वषट्- नमस्कार और नमो नमः आदि पद आपके ही नाम हैं । आप गूढ़ व्रतधारी, गुप्त तपस्या करनेवाले, तारकमन्त्र और ताराओंसे भरे हुए आकाश हैं ॥ १४४ ॥
धाता विधाता संधाता विधाता धारणोऽधरः ।
ब्रह्मा तपश्च सत्यं च ब्रह्मचर्यमथार्जवम् ॥ १४५ ॥
भूतात्मा भूतकृद्भूतो भूतभव्यभवोद्भवः ।
भूर्भुवः स्वरितश्चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वरः ॥ १४६ ॥
धाता ( धारण करनेवाले ), विधाता ( सृष्टि करनेवाले ), संधाता ( जोड़नेवाले ), विधाता, धारण और अधर ( आधाररहित) भी आपहीके नाम हैं। आप ब्रह्मा, तप, सत्य, ब्रह्मचर्य आर्जव ( सरलता ), भूतात्मा (प्राणियोंके आत्मा), भूतोंकी सृष्टि करनेवाले, भूत ( नित्यसिद्ध ), भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिके कारण, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, ध्रुव ( स्थिर), दान्त ( दमनशील) और महेश्वर हैं ॥ १४५-१४६ ॥
दीक्षितोऽदीक्षितः क्षान्तो दुर्दान्तोऽदान्तनाशनः ।
चन्द्रावर्तो युगावर्तः संवर्तः सम्प्रवर्तकः ॥ १४७ ॥
दीक्षित ( यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले), अदीक्षित, क्षमावान्, दुर्दान्त, उद्दण्ड प्राणियोंका नाश करनेवाले, चन्द्रमाकी आवृत्ति करनेवाले ( मास ), युगोंकी आवृत्ति करनेवाले ( कल्प), संवर्त ( प्रलय ) तथा सम्प्रवर्तक ( पुनः सृष्टि- संचालन करनेवाले ) भी आप ही हैं ॥ १४७ ॥
कामो बिन्दुरणुः स्थूलः कर्णिकारस्रजप्रियः ।
नन्दीमुखो भीममुखः सुमुखो दुर्मुखोऽमुखः ॥ १४८ ॥
चतुर्मुखो बहुमुखो रणेष्वग्निमुखस्तथा ।
हिरण्यगर्भः शकुनिर्महोरगपतिर्विराट् ॥ १४ ९ ॥
आप ही काम, बिन्दु, अणु ( सूक्ष्म) और स्थूलरूप हैं । आप कनेरके फूलकी माला अधिक पसंद करते हैं । आप ही नन्दीमुख, भीममुख ( भयंकर मुखवाले ), सुमुख, दुर्मुख, अमुख ( मुखरहित ), चतुर्मुख, बहुमुख तथा युद्धके समय शत्रुका संहार करनेके कारण अग्निमुख ( अग्निके समान मुखवाले) हैं । हिरण्यगर्भ ( ब्रह्मा ), शकुनि ( पक्षीके समान असंग), महान् सर्पोंके स्वामी ( शेषनाग) और विराट् भी आप ही हैं ॥ १४८-१४९ ॥
अधर्महा महापार्श्वश्चण्डधारो गणाधिपः ।
गोनर्दो गोप्रतारश्च गोवृषेश्वरवाहनः ॥ १५० ॥
त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गोऽमार्ग एव च ।
श्रेष्ठः स्थिरश्च स्थाणुश्च निष्कम्पः कम्प एव च ॥ १५१ ॥
दुर्वारणो दुर्विषहो दुःसहो दुरतिक्रमः ।
दुर्धर्षो दुष्प्रकम्पश्च दुर्विषो दुर्जयो जयः ॥ १५२ ॥
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शशः शशाङ्कः शमनः शीतोष्णक्षुज्जराधिकृत् ।
आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा व्याधिरेव च ॥ १५३ ॥
आप अधर्मके नाशक, महापार्श्व, चण्डधार, गणाधिप, गोनर्द, गौओंको आपत्तिसे बचानेवाले, नन्दीकी सवारी करनेवाले, त्रैलोक्यरक्षक, गोविन्द ( श्रीकृष्णरूप), गोमार्ग ( इन्द्रियोंके संचालक ), अमार्ग ( इन्द्रियोंके अगोचर ), श्रेष्ठ, स्थिर, स्थाणु, निष्कम्प, कम्प, दुर्वारण (जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे ), दुर्विषह ( असह्य वेगवाले ), दुःसह, दुर्लङ्घ्य, दुर्द्धर्ष, दुष्प्रकम्प, दुर्विष, दुर्जय, जय, शश ( शीघ्रगामी ), शशांक ( चन्द्रमा ) तथा शमन ( यमराज ) हैं । सर्दी -गर्मी, क्षुधा, वृद्धावस्था तथा मानसिक चिन्ताको दूर करनेवाले भी आप ही हैं । आप ही आधि- व्याधि तथा उसे दूर करनेवाले हैं ॥ १५०–१५३ ॥
मम यज्ञमृगव्याधो व्याधीनामागमो गमः ।
शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः ॥ १५४ ॥
दण्डधारस्त्र्यम्बकश्च उग्रदण्डोऽण्डनाशनः ।
विषाग्निपाः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरुत्पतिः ॥ १५५ ॥
मेरे यज्ञरूपी मृगके वधिक तथा व्याधियोंको लाने और मिटानेवाले भी आप ही हैं । ( कृष्णरूपमें ) मस्तकपर शिखण्ड ( मोरपंख) धारण करनेके कारण आप शिखण्डी हैं । आप कमलके समान नेत्रोंवाले, कमलके वनमें निवास करनेवाले, दण्ड धारण करनेवाले, त्र्यम्बक, उग्रदण्ड और ब्रह्माण्डके संहारक हैं। विषाग्निको पी जानेवाले, देवश्रेष्ठ, सोमरसका पान करनेवाले और मरुद्गणोंके स्वामी हैं ॥ १५४-१५५ ॥ अमृतपास्त्वं जगन्नाथ देवदेव गणेश्वरः ।
विषाग्निपा मृत्युपाश्च क्षीरपाः सोमपास्तथा ।
मधुश्च्युतानामग्रपास्त्वमेव तुषिताद्यपाः ॥ १५६ ॥
देवाधिदेव! जगन्नाथ! आप अमृत पान करनेवाले और गणोंके स्वामी हैं । विषाग्नि तथा मृत्युसे रक्षा करनेवाले और दूध एवं सोमरसका पान करनेवाले हैं। आप सुखसे भ्रष्ट हुए जीवोंके प्रधान रक्षक तथा तुषितनामक देवताओंके आदिभूत ब्रह्माजीका भी पालन करनेवाले हैं ॥ १५६ ॥
हिरण्यरेताः पुरुषस्त्वमेव त्वं स्त्री पुमांस्त्वं च नपुंसकं च । बालो युवा स्थविरो जीर्णदंष्ट्र- स्त्वं नागेन्द्र शक्रस्त्वं विश्वकृद्विश्वकर्ता ॥ १५७ ॥
विश्वकृद् विश्वकृतां वरेण्यस्त्वं विश्ववाहो
विश्वरूपस्तेजस्वी विश्वतोमुखः ।
चन्द्रादित्यौ चक्षुषी ते हृदयं च पितामहः ॥ १५८ ॥
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आप ही हिरण्यरेता (अग्नि), पुरुष ( अन्तर्यामी ) तथा आप ही स्त्री, पुरुष और नपुंसक हैं । बालक - युवा और वृद्ध भी आप ही हैं । नागेश्वर! आप जीर्ण दाढ़ोंवाले और इन्द्र हैं । आप विश्वकृत् ( जगत्के संहारक ), विश्वकर्ता ( प्रजापति), विश्वकृत् (ब्रह्माजी ), विश्वकी रचना करनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, विश्वका भार वहन करनेवाले, विश्वरूप, तेजस्वी और सब ओर मुखवाले हैं । चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र तथा पितामह ब्रह्मा आपके हृदय ॥ १५७-१५८ ॥ महोदधिः सरस्वती वाग् बलमनलो- ऽनिलः अहोरात्रं निमेषोन्मेषकर्म ॥ १५ ९ ॥ आप ही समुद्र हैं, सरस्वती आपकी वाणी हैं, अग्नि और वायु बल हैं तथा आपके नेत्रोंका खुलना और बंद होना ही दिन और रात्रि है ॥ १५ ९ ॥
न ब्रह्मा न च गोविन्दः पौराणा ऋषयो न ते ।
माहात्म्यं वेदितुं शक्ता याथातथ्येन ते शिव ॥ १६० ॥
शिव! आपके माहात्म्यको ठीक-ठीक जाननेमें ब्रह्मा, विष्णु तथा प्राचीन ऋषि भी समर्थ नहीं हैं ॥ १६० ॥
या मूर्तयः सुसूक्ष्मास्ते न मह्यं यान्ति दर्शनम् ।
त्राहि मां सततं रक्ष पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १६१ ॥
आपके जो सूक्ष्म रूप हैं वे हमलोगोंकी दृष्टिमें नहीं आते । भगवन्! जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है, उसी तरह आप सर्वदा मेरी रक्षा करें ॥ १६१ ॥
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते ।
भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि ॥ १६२ ॥
अनघ! मैं आपके द्वारा रक्षित होने योग्य हूँ, आप अवश्य मेरी रक्षा करें, मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप भक्तोंपर दया करनेवाले भगवान् हैं और मैं सदाके लिये आपका भक्त हूँ ॥ १६२ ॥
यः सहस्राण्यनेकानि पुंसामावृत्य दुर्दृशः ।
तिष्ठत्येकः समुद्रान्ते स मे गोप्तास्तु नित्यशः ॥ १६३ ॥
जो हजारों मनुष्योंपर मायाका परदा डालकर सबके लिये दुर्बोध हो रहे हैं, अद्वितीय हैं तथा समुद्रके समान कामनाओंका अन्त होनेपर प्रकाशमें आते हैं, वे परमेश्वर नित्य मेरी रक्षा करें ॥ १६३ ॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः ।
ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥ १६४ ॥
जो निद्राके वशीभूत न होकर प्राणोंपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको जीतकर सत्त्वगुणमें स्थित हैं, ऐसे योगीलोग ध्यानमें जिस ज्योतिर्मय तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं, उस योगात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥ १६४ ॥
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जटिले दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे ।
कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ १६५ ॥
जो सदा जटा और दण्ड धारण किये रहते हैं, जिनका उदर और शरीर विशाल है तथा कमण्डलु ही जिनके लिये तरकसका काम देता है, ऐसे ब्रह्माजीके रूपमें विराजमान भगवान् शिवको प्रणाम है ॥ १६५ ॥
यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसंधिषु ।
कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥ १६६ ॥
जिनके केशोंमें बादल, शरीरकी संधियोंमें नदियाँ और उदरमें चारों समुद्र हैं, उन जलस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ १६६ ॥
सम्भक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते ।
यः शेते जलमध्यस्थस्तं प्रपद्येऽम्बुशायिनम् ॥ १६७ ॥
जो प्रलयकाल उपस्थित होनेपर सब प्राणियोंका संहार करके एकार्णवके जलमें शयन करते हैं, उन जलशायी भगवान्की मैं शरण लेता हूँ ॥ १६७ ॥
प्रविश्य वदनं राहोर्यः सोमं पिबते निशि ।
ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानुर्भूत्वा मां सोऽभिरक्षतु ॥ १६८ ॥
जो रातमें राहुके मुखमें प्रवेश करके स्वयं चन्द्रमाके अमृतका पान करते हैं; तथा स्वयं ही राहु बनकर सूर्यपर ग्रहण लगाते हैं, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें ॥
ये चानुपतिता गर्भा यथा भागानुपासते ।
नमस्तेभ्यः स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्तु मुदन्तु ते ॥ १६ ९ ॥
ब्रह्माजीके बाद उत्पन्न होनेवाले जो देवता और पितर बालककी भाँति यज्ञमें अपने-अपने भाग ग्रहण करते हैं, उन्हें नमस्कार है । वे ' स्वाहा और स्वधा' के द्वारा अपने भाग प्राप्त करके प्रसन्न हों ॥ १६ ९ ॥
येऽङ्गुष्ठमात्राः पुरुषा देहस्थाः सर्वदेहिनाम् ।
रक्षन्तु ते हि मां नित्यं नित्यं चाप्याययन्तु माम् ॥ १७० ॥
जो अंगुष्ठमात्र जीवके रूपमें सम्पूर्ण देहधारियोंके भीतर विराजमान हैं, वे सदा मेरी रक्षा और वृद्धि करें ॥
ये न रोदन्ति देहस्था देहिनो रोदयन्ति च ।
हर्षयन्ति न हृष्यन्ति नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १७१ ॥
जो देहके भीतर रहते हुए स्वयं न रोकर देहधारियोंको ही रुलाते हैं, स्वयं हर्षित न होकर उन्हें ही हर्षित करते हैं, उन सब रुद्रोंको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ॥ १७१ ॥
ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च ।
वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारे गहनेषु च ॥ १७२ ॥
चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु तटेषु च ।
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हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च ॥ १७३ ॥
येषु पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च ।
चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु ॥ १७४ ॥
रसातलगता ये च ये च तस्मै परं गताः ।
नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १७५ ॥
नदी, समुद्र, पर्वत, गुहा, वृक्षोंकी जड़, गोशाला, दुर्गम पथ, वन, चौराहे, सड़क, चौतरे, किनारे, हस्तिशाला, अश्वशाला, रथशाला, पुराने बगीचे, जीर्ण गृह, पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य तथा उन- उनकी किरणोंमें, रसातलमें और उससे भिन्न स्थानोंमें भी जो अधिष्ठातृ देवताके रूपमें व्याप्त हैं, उन सबको सदा नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १७२–१७५ ॥
येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च ।
असंख्येयगुणा रुद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १७६ ॥
जिनकी संख्या, प्रमाण और रूपकी सीमा नहीं है, जिनके गुणोंकी गिनती नहीं हो सकती, उन रुद्रोंको मैं सदा नमस्कार करता हूँ ॥ १७६ ॥
सर्वभूतकरो यस्मात् सर्वभूतपतिर्हरः ।
सर्वभूतान्तरात्मा च तेन त्वं न निमन्त्रितः ॥ १७७ ॥
आप सम्पूर्ण भूतोंके जन्मदाता, सबके पालक और संहारक हैं; तथा आप ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं । इसीलिये मैंने आपको पृथक् निमन्त्रण नहीं दिया ॥ १७७ ॥
त्वमेव हीज्यसे यस्माद् यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
त्वमेव कर्ता सर्वस्य तेन त्वं न निमन्त्रितः ॥ १७८ ॥
नाना प्रकारकी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंद्वारा आपहीका यजन किया जाता है और आप ही सबके कर्ता हैं, इसीलिये मैंने आपको अलग निमन्त्रण नहीं दिया ॥
अथवा मायया देव सूक्ष्मया तव मोहितः ।
एतस्मात् कारणाद् वापि तेन त्वं न निमन्त्रितः ॥ १७ ९ ॥
अथवा देव! आपकी सूक्ष्म मायासे मैं मोहमें पड़ गया था, इस कारणसे भी मैंने आपको निमन्त्रण नहीं दिया ॥ १७ ९ ॥
प्रसीद मम भद्रं ते भव भावगतस्य मे ।
त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिर्मनस्त्वयि ॥ १८० ॥
भगवन् भव! आपका भला हो, मैं भक्तिभावके साथ आपकी शरणमें आया हूँ, इसलिये अब मुझपर प्रसन्न होइये । मेरा हृदय, मेरी बुद्धि और मेरा मन सब आपमें समर्पित हैं ॥ १८० ॥
स्तुत्वैवं स महादेवं विरराम प्रजापतिः ।
भगवानपि सुप्रीतः पुनर्दक्षमभाषत ॥ १८१ ॥
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इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके प्रजापति दक्ष चुप हो गये । तब भगवान् शिवने भी बहुत प्रसन्न होकर दक्षसे कहा- ॥ १८१ ॥
परितुष्टोऽस्मि ते दक्ष स्तवेनानेन सुव्रत ।
बहुनात्र किमुक्तेन मत्समीपे भविष्यसि ॥ १८२ ॥
‘ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्ष! तुम्हारे द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ । यहाँ अधिक क्या कहूँ, तुम मेरे निकट निवास करोगे ॥ १८२ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च ।
प्रजापते मत्प्रसादात् फलभागी भविष्यसि ॥ १८३ ॥
‘प्रजापते! मेरे प्रसादसे तुम्हें एक हजार अश्वमेध तथा एक सौ वाजपेय यज्ञका फल मिलेगा ' ॥ १८३ ॥
अथैनमब्रवीद् वाक्यं लोकस्याधिपतिर्भवः ।
आश्वासनकरं वाक्यं वाक्यविवाक्य सम्मतम् ॥ १८४ ॥
तदनन्तर वाक्यविशारद, लोकनाथ भगवान् शिवने प्रजापतिको सान्त्वना देनेवाला युक्तियुक्त एवं उत्तम वचन कहा— ॥ १८४ ॥
दक्ष दक्ष न कर्तव्यो मन्युर्विघ्नमिमं प्रति ।
अहं यज्ञहरस्तुभ्यं दृष्टमेतत् पुरातनम् ॥ १८५ ॥
‘दक्ष! दक्ष! इस यज्ञमें जो विघ्न डाला गया है, इसके लिये तुम खेद न करना । मैंने पहले कल्पमें भी तुम्हारे यज्ञका विध्वंस किया था । यह घटना भी पूर्वकल्पके अनुसार ही हुई है ॥ १८५ ॥
भूयश्च ते वरं दद्मि तं त्वं गृह्णीष्व सुव्रत ।
प्रसन्नवदनो भूत्वा तदिहैकमनाः शृणु ॥ १८६ ॥
' सुव्रत! मैं पुनः तुम्हें वरदान देता हूँ, तुम इसे स्वीकार करो और प्रसन्नवदन तथा एकाग्रचित्त होकर यहाँ मेरी यह बात सुनो ॥ १८६ ॥
वेदात् षडङ्गादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च युक्तितः ।
तपः सुतप्तं विपुलं दुश्चरं देवदानवैः ॥ १८७ ॥
' पूर्वकालमें षडङ्ग वेद, सांख्ययोग और तर्कसे निश्चित करके देवताओं और दानवोंने जिस विशाल एवं दुष्कर तपका अनुष्ठान किया था ( उससे भी उत्तम व्रत मैं तुम्हें बता रहा हूँ) ॥ १८७ ॥
अपूर्वं सर्वतोभद्रं सर्वतोमुखमव्ययम् ।
अब्दैर्दशाहसंयुक्तं गूढमप्राज्ञनिन्दितम् ॥ १८८ ॥
वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ।
गतान्तैरध्यवसितमत्याश्रममिदं व्रतम् ॥ १८ ९ ॥
मया पाशुपतं दक्ष शुभमुत्पादितं पुरा ।
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तस्य चीर्णस्य तत् सम्यक् फलं भवति पुष्कलम् ।
तच्चास्तु ते महाभाग त्यज्यतां मानसो ज्वरः ॥ १ ९ ० ॥
'दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो अपूर्व है । साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी ( सभी वर्गों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है । वर्षोंतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी उपलब्धि होती है । वह गूढ़ है । मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं । वह समस्त वर्णधर्म और आश्रम- धर्मके अनुकूल, सम और किसी - किसी अंशमें विपरीत भी है । जिन्हें सिद्धान्तका ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है । यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है । इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है । महाभाग! उस पाशुपत व्रतके अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो । अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो' ॥ १८८–१९ ० ॥
एवमुक्त्वा महादेवः सपत्नीकः सहानुगः ।
अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्यामितविक्रमः ॥ १ ९ १ ॥
दक्षसे ऐसा कहकर पत्नी और पार्षदोंसहित अमित पराक्रमी महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये ॥
दक्षप्रोक्तं स्तवमिमं कीर्तयेद् यः शृणोति वा ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ १ ९ २ ॥
जो मनुष्य दक्षके द्वारा कहे हुए इस स्तोत्रका कीर्तन अथवा श्रवण करेगा, उसे कोई
अमंगल नहीं प्राप्त होगा । वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है ॥ १ ९ २ ॥
यथा सर्वेषु देवेषु वरिष्ठो भगवान् शिवः ।
तथा स्तवो वरिष्ठोऽयं स्तवानां ब्रह्मसम्मितः ॥ १ ९ ३ ॥
जैसे भगवान् शिव सब देवताओंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार यह वेदतुल्य स्तोत्र सभी स्तुतियोंमें श्रेष्ठ है ॥
यशोराज्यसुखैश्वर्यकामार्थधनकांक्षिभिः ।
श्रोतव्यो भक्तिमास्थाय विद्याकामैश्च यत्नतः ॥ १ ९ ४ ॥
यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, काम, अर्थ, धन और विद्याकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको भक्तिभावका आश्रय लेकर यत्नपूर्वक इस स्तोत्रका श्रवण करना चाहिये ॥
व्याधितो दुःखितो दीनश्चोरग्रस्तो भयार्दितः ।
राजकार्याभियुक्तो वा मुच्यते महतो भयात् ॥ १ ९ ५ ॥
रोगी, दुखी, दीन, चोरके हाथमें पड़ा हुआ, भयभीत तथा राजकार्यका अपराधी मनुष्य भी इस स्तोत्रका पाठ करनेसे महान् भयसे छुटकारा पा जाता है ॥ १ ९ ५ ॥ अनेनैव तु देहेन गणानां समतां व्रजेत् ।
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तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मलः ॥। १ ९ ६ ॥ इतना ही नहीं, वह इसी शरीरसे भगवान् शिवके गणोंकी समानता प्राप्त कर लेता है तथा तेज और यशसे सम्पन्न होकर निर्मल हो जाता है ॥ १ ९ ६ ॥
न राक्षसाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः ।
विघ्नं कुर्युर्गृहे तस्य यत्रायं पठ्यते स्तवः ॥ १ ९ ७ ॥
जिसके यहाँ इस स्तोत्रका पाठ होता है, उसके घरमें राक्षस, पिशाच, भूत और विनायक कभी कोई विघ्न नहीं करते हैं ॥ १ ९ ७ ॥
शृणुयाच्चैव या नारी तद्भक्ता ब्रह्मचारिणी ।
पितृपक्षे भर्तृपक्षे पूज्या भवति देववत् ॥ १ ९ ८ ॥
जो नारी भगवान् शंकरमें भक्तिभाव रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करती हुई इस स्तोत्रको सुनती है, वह पितृकुल और पतिकुलमें देवताके समान आदरणीय होती है ॥ १ ९ ८ ॥
शृणुयाद् यः स्तवं कृत्स्नं कीर्तयेद् वा समाहितः ।
तस्य सर्वाणि कर्माणि सिद्धिं गच्छन्त्यभीक्ष्णशः ॥ १ ९९ ॥
जो एकाग्रचित्त होकर इस सम्पूर्ण स्तोत्रको सुनता अथवा पढ़ता है, उसके सारे कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते हैं ॥ १ ९९ ॥
मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचानुकीर्तितम् ।
सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवस्यास्यानुकीर्तनात् ॥ २०० ॥
वह मनसे जिस वस्तुके लिये चिन्तन करता है अथवा वाणीसे जिस मनोरथकी याचना करता है, उसका वह सारा अभीष्ट इस स्तोत्रके बार- बार पाठसे सिद्ध हो जाता है ॥ २०० ॥
देवस्य च गुहस्यापि देव्या नन्दीश्वरस्य च ।
बलिं सुविहितं कृत्वा दमेन नियमेन च ॥ २०१ ॥
ततस्तु युक्तो गृह्णीयान्नामान्याशु यथाक्रमम् ।
ईप्सितान् लभते सोऽर्थान् भोगान् कामांश्च मानवः ॥ २०२ ॥
मृतश्च स्वर्गमाप्नोति तिर्यक्षु च न जायते ।
इत्याह भगवान् व्यासः पराशरसुतः प्रभुः ॥ २०३ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह इन्द्रियोंको संयममें रखकर शौच - संतोष आदि नियमोंका पालन करते हुए महादेवजी, कार्तिकेय, पार्वतीदेवी और नन्दिकेश्वरको विधिपूर्वक पूजोपहार समर्पित करे, फिर एकाग्रचित्त होकर क्रमशः इन सहस्र नामोंका पाठ करे । ऐसा करनेसे मनुष्य शीघ्र ही मनोवाञ्छित पदार्थों, भोगों और कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा मृत्युके पश्चात् स्वर्गमें जाता है । उसे पशु - पक्षी आदिकी योनिमें जन्म नहीं लेना पड़ता है । इस प्रकार सर्वसमर्थ पराशरनन्दन भगवान् व्यासजीने इस स्तोत्रका माहात्म्य बतलाया है ॥
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दक्षप्रोक्तशिवसहस्रनामस्तवे चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनामस्तोत्रविषयक दो सौचौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८४ ॥
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पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन युधिष्ठिरउवाच
अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह विद्यते ।
यदध्यात्मं यतश्चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! शास्त्रमें पुरुषके लिये जो यह अध्यात्मतत्त्व बताया गया है, वह अध्यात्म क्या है और उसकी उत्पत्ति कहाँसे हुई है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वज्ञानं परं बुद्ध्या यन्मां त्वमनुपृच्छसि ।
तद् व्याख्यास्यामि ते तात तस्य व्याख्यामिमां शृणु ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा — तात! तुम मुझसे जिस अध्यात्मतत्त्वको पूछ रहे हो, वह बुद्धिके द्वारा सभी विषयोंका उत्तम ज्ञान प्रदान करनेवाला है । मैं तुमसे उसकी व्याख्या करूँगा, तुम उस व्याख्याको ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्व पञ्चमम् ।
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ॥ ३ ॥
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज- ये पाँच महाभूत समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ॥ ३ ॥
स तेषां गुणसंघातः शरीरं भरतर्षभ ।
सततं हि प्रलीयन्ते गुणास्ते प्रभवन्ति च ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्राणियोंका शरीर उन्हीं पाँचों महाभूतोंका कार्यसमूह है । वे कार्यरूपमें परिणत भूतगण सदा लीन होते और प्रकट होते रहते हैं ॥ ४ ॥
ततः सृष्टानि भूतानि तानि यान्ति पुनः पुनः ।
महाभूतानि भूतेभ्य ऊर्मयः सागरे यथा ॥ ५ ॥
जैसे महाभूत सूक्ष्म भूतोंसे प्रकट होते और उन्हींमें लयको प्राप्त होते हैं; तथा जैसे लहरें समुद्रसे प्रकट होकर फिर उसीमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार परमात्मासे समस्त प्राणी उत्पन्न होते और पुनः उसीमें लीन हो जाते हैं ॥ ५ ॥
प्रसारयित्वेहाङ्गानि कूर्मः संहरते यथा ।
तद्वद् भूतानि भूतानामल्पीयांसि स्थवीयसाम् ॥ ६ ॥