05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1881–1890
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1881–1890
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जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंके शरीर आकाश आदि पाँच महाभूतोंसे उत्पन्न होते और फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं ॥ ६ ॥
आकाशात् खलु यो घोषः संघातस्तु महीगुणः ।
वायोःप्राणो रसस्त्वद्भ्यो रूपं तेजस उच्यते ॥ ७ ॥
शरीरमें जो शब्द होता है, वह आकाशका गुण है । यह स्थूल शरीर पृथ्वीका गुण या कार्य है । प्राण वायुका, रस जलका तथा रूप तेजका गुण बताया जाता है ॥ ७ ॥
इत्येतन्मयमेवैतत् सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।
प्रलये च तमभ्येति तस्मादुद्दिश्यते पुनः ॥ ८ ॥
इस प्रकार यह समस्त स्थावर-जङ्गम शरीर पञ्चभूतमय ही है । प्रलयकालमें यह परमात्मामें ही लीन होता है और सृष्टिके आरम्भमें पुनः उन्हींसे प्रकट हो जाता है ॥
महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् ।
विषयान् कल्पयामास यस्मिन् यदनुपश्यति ॥ ९ ॥
सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले ईश्वरने समस्त प्राणियोंमें पञ्चमहाभूतोंका ही विभागपूर्वक समावेश किया है । देहके भीतर जिस भूतके स्थित होनेसे मनुष्य जो कार्य देखता है, वह बताता हूँ; सुनो ॥ ९ ॥
शब्दश्रोत्रे तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम् ।
रसः स्नेहश्च जिह्वा च अपामेते गुणाः स्मृताः ॥ १० ॥
शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय और सम्पूर्ण छिद्र – ये तीन आकाशके कार्य हैं । रस, स्नेह तथा जिह्वा – ये तीनों जलके गुण या कार्य माने गये हैं ॥ १० ॥
रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिविधं ज्योतिरुच्यते ।
प्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणाः स्मृताः ॥ ११ ॥
रूप, नेत्र और परिपाक –इन तीन गुणोंके रूपमें तेजकी ही स्थिति बतायी जाती है ।
गन्ध, घ्राण तथा शरीर- ये तीनों भूमिके गुण माने गये हैं ॥ ११ ॥
प्राणः स्पर्शश्च चेष्टा च वायोरेते गुणाः स्मृताः ।
इति सर्वगुणा राजन् व्याख्याताः पाञ्चभौतिकाः ॥ १२ ॥
प्राण, स्पर्श और चेष्टा– ये तीनों वायुके गुण बताये गये हैं । राजन्! इस प्रकार मैंने समस्त पाञ्चभौतिक गुणोंकी व्याख्या कर दी ॥ १२ ॥
सत्त्वं रजस्तमः कालः कर्म बुद्धिश्च भारत ।
मनःषष्ठानि चैतेषु ईश्वरः समकल्पयत् ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! ईश्वरने इन प्राणियोंके शरीरोंमें सत्त्व, रज, तम, काल, कर्म, बुद्धि तथा मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंकी कल्पना की है ॥ १३ ॥
यदूर्ध्वं पादतलयोरवाङ् मूर्ध्नश्च पश्यसि ।
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एतस्मिन्नेव कृत्स्नेयं वर्तते बुद्धिरन्तरे ॥ १४ ॥
पैरोंके तलुओंसे लेकर ऊपरकी ओर और मस्तकसे नीचेकी ओर जितना भी शरीर है, इसके भीतर यह बुद्धि पूर्णरूपसे व्याप्त हो रही है ॥ १४ ॥
इन्द्रियाणि नरे पञ्च षष्ठं तु मन उच्यते ।
सप्तमीं बुद्धिमेवाहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः ॥ १५ ॥
मानव- शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और छठा मन बताया जाता है। बुद्धिको सातवीं और क्षेत्रज्ञको आठवाँ कहते हैं ॥ १५ ॥
इन्द्रियाणि च कर्ता च विचेतव्यानि भागशः ।
तमः सत्त्वं रजश्चैव तेऽपि भावास्तदाश्रयाः ॥ १६ ॥
पाँच इन्द्रियाँ और जीवात्मा–इन सबको कार्य- विभागके अनुसार अलग- अलग समझना चाहिये । सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण तथा उनके सात्त्विक, राजस और तामस भाव जीवात्माके ही आश्रित हैं ॥ १६ ॥
चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः ।
बुद्धिरध्यवसानाय साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते ।
तमः सत्त्वं रजश्चेति कालः कर्म च भारत ॥ १७ ॥
गुणैीयते बुद्धिर्बुद्धिरेवेन्द्रियाणि च ।
मनःषष्ठानि सर्वाणि बुद्ध्यभावे कुतो गुणाः ॥ १८ ॥
नेत्र आदि इन्द्रियाँ दर्शन आदि कार्योंके लिये हैं । मन संशय करता है और बुद्धि उस विषयका ठीक - ठीक निश्चय करनेके लिये है । क्षेत्रज्ञ ( आत्मा) - को साक्षी बताया जाता है । -भरतनन्दन! सत्त्व, रज, तम, काल और कर्म – इन पाँच गुणोंद्वारा बुद्धि बार- बार विभिन्न विषयोंकी ओर ले जायी जाती है। बुद्धि मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका संचालन करती है । यदि बुद्धि न हो तो ये गुण- इन्द्रिय आदि कैसे कोई कार्य कर सकते हैं ॥
येन पश्यति तच्चक्षुः शृण्वती श्रोत्रमुच्यते ।
जिघ्रती भवति घ्राणं रसती रसना रसान् ॥ १ ९ ॥
स्पर्शनं स्पर्शती स्पर्शान् बुद्धिर्विक्रियतेऽसकृत् ।
यदा प्रार्थयते किञ्चित् तदा भवति सा मनः ॥ २० ॥
बुद्धि जिसके द्वारा देखती है, उस इन्द्रियका नाम दृष्टि या नेत्र है । वही अपने वृत्तिविशेषके द्वारा जब सुनने लगती है, तब श्रोत्र कहलाती है। गन्धको ग्रहण करते समय वह घ्राण बन जाती है । रसास्वादन करते समय रसना कहलाती है और स्पर्शोका अनुभव करते समय वही स्पर्शेन्द्रिय ( त्वचा ) नाम धारण करती है । इस प्रकार बुद्धि बार- बार विकृत होती है । जब वह कुछ प्रार्थना ( याचना ) करती है, तब मन बन जाती है ॥
अधिष्ठानानि बुद्ध्या हि पृथगेतानि पञ्चधा ।
इन्द्रियाणीति तान्याहुस्तेषु दुष्टेषु दुष्यति ॥ २१ ॥
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बुद्धिके ये जो पृथक् - पृथक् पाँच अधिष्ठान हैं, इन्हींको इन्द्रिय कहते हैं । इन इन्द्रियोंके दूषित होनेपर बुद्धि भी दूषित हो जाती है ॥ २१
पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ।
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदपि शोचति ॥ २२ ॥
साक्षी आत्माके आश्रित रहनेवाली बुद्धि सात्त्विक, राजस और तामस तीन भावोंमें ( जो सुख- दुःख और मोहरूप हैं ) स्थित होती है, इसीलिये कभी ( सत्त्वगुणका उद्रेक होनेपर) उसे आनन्द प्राप्त होता है और कभी ( रजोगुणकी अधिकता होनेपर) वह दुःख-शोकका अनुभव करती है ॥ २२ ॥
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते ।
सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतान् परिवर्तते ॥ २३ ॥
कभी ( तमोगुणकी अधिकतासे मोहाच्छन्न होनेपर ) उसका न सुखसे संयोग होता है न दुःखसे ( वह निद्रा और आलस्य आदिमें मग्न रहती है ) । इस प्रकार यह भावात्मिका बुद्धि इन तीन भावोंका अनुसरण करती है ॥ २३ ॥
सरितां सागरो भर्ता यथा वेलामिवोर्मिवान् ।
इति भावगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते ॥ २४ ॥
जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र उत्ताल तरंगोंसे युक्त होनेपर भी अपनी तटभूमिका उल्लंघन नहीं करता है, उसी प्रकार सात्त्विक आदि भावोंसे युक्त बुद्धि तीनों गुणोंका उल्लंघन नहीं करती । भावनामय मनमें ही चक्कर लगाती रहती है ॥ २४ ॥
प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावेनानुवर्तते ।
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता ॥ २५ ॥
कथंचिदुपपद्यन्ते पुरुषे सात्त्विका गुणाः । जब रजोगुणकी प्रवृत्ति होती है तब बुद्धि राजसिक भावका अनुसरण करती है । यदि पुरुषमें किसी प्रकार अधिक हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्तमें शान्ति उपलब्ध हो तो ये सात्त्विक गुण हैं ॥ २५३ ॥
परिदाहस्तथा शोकः संतापोऽपूर्तिरक्षमा ॥ २६ ॥
लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः । जब शरीर या मनमें किसी कारणसे या अकारण ही दाह, शोक, संताप, अपूर्णता ( लोभ- लिप्सा ) और असहनशीलताके भाव दिखायी देते हों तो उन्हें रजोगुणके चिह्न समझना चाहिये ॥ २६३ ॥
अविद्या रागमोहौ च प्रमादः स्तब्धता भयम् ॥ २७ ॥
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोहः स्वप्नतन्द्रिता ।
कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ २८ ॥
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यदि किसी प्रकार अविद्या, राग, मोह, प्रमाद, स्तब्धता, भय, दरिद्रता, दीनता, प्रमोह ( मूर्च्छा), स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष आ घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप जाने ॥ २७-२८ ॥
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।
वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तथा ॥ २ ९ ॥
ऐसी स्थितिमें शरीर अथवा मनके भीतर यदि कोई प्रसन्नताका भाव हो तो वह सात्त्विक भाव है, ऐसा विचार करना चाहिये ॥ २ ९ ॥
अथ यद् दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ।
प्रवृत्तं रज इत्येव तदसंरभ्य चिन्तयेत् ॥ ३० ॥
जब अपने लिये अप्रसन्नताका हेतु और दुःखयुक्त भाव अनुभवमें आये तब रजोगुणकी प्रवृत्ति हुई है — ऐसा अपने मनमें विचार करे तथा वैसे किसी कार्यका आरम्भ न करके उसकी ओरसे अपना ध्यान हटा ले ॥
अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ ३१ ॥
इसी प्रकार शरीर या मनमें जो मोहयुक्त भाव अतर्कित या अविज्ञातरूपसे उपस्थित हो गया हो, उसके विषयमें यही निश्चय करे कि यह तमोगुण है ॥ ३१ ॥
इति बुद्धिगतीः सर्वा व्याख्याता यावतीरिह ।
एतद् बुद्ध्वा भवेद् बुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार बुद्धिकी जितनी अवस्थाएँ हैं उनकी व्याख्या यहाँ कर दी गयी । यह सब जानकर मनुष्य ज्ञानी हो जाता है । इसके सिवा ज्ञानीका और क्या लक्षण हो सकता है? ॥ ३२ ॥
सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मयोः ।
सृजतेऽत्र गुणानेक एको न सृजते गुणान् ॥ ३३ ॥
बुद्धि और क्षेत्रज्ञ ( आत्मा) – ये दोनों सूक्ष्मतत्त्व हैं । इन दोनोंमें जो अन्तर है, उसे समझो । इनमेंसे एक अर्थात् बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और दूसरा ( आत्मा) गुणोंकी सृष्टि नहीं करता — केवल साक्षीभावसे देखता रहता है ॥ ३३ ॥
पृथग्भूतौ प्रकृत्या तु सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा ।
यथा मत्स्योऽद्भिरन्यः स्यात् सम्प्रयुक्तो भवेत् तथा ॥ ३४ ॥
वे दोनों बुद्धि और क्षेत्रज्ञ स्वभावतः एक- दूसरेसे भिन्न हैं, परंतु सदा परस्पर मिलेहुए- से प्रतीत होते हैं । जैसे मछली जलसे भिन्न है तो भी उससे सदा संयुक्त रहती है, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा परस्पर भिन्न होते हुए भी अभिन्न रहते हैं ॥ ३४ ॥
न गुणा विदुरात्मानं स गुणान् वेद सर्वतः ।
परिद्रष्टा गुणानां तु संस्रष्टा मन्यते यथा ॥ ३५ ॥
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सत्त्व आदि गुण जड होनेके कारण आत्माको नहीं जानते; परंतु आत्मा चेतन है, इसलिये गुणोंको पूर्णरूपसे जानता है । वह गुणोंका साक्षी है तथापि मूढ़ मनुष्य उसे गुणोंसे संश्लिष्ट या संयुक्त समझते हैं ॥ ३५ ॥
आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य गुणसर्गेण चेतना ।
सत्त्वमस्य सृजन्त्यन्ये गुणान् वेद कदाचन ॥ ३६ ॥
बुद्धि जब सत्त्वादि गुणोंकी सृष्टि करती है, उस समय जीवात्मा उसका आश्रय नहीं होता । अन्य गुणोंकी रचना बुद्धि ही करती है और उन गुणोंको जीव कभी जानता है ॥ ३६ ॥
सृजते हि गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ।
सम्प्रयोगस्तयोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवः ॥ ३७ ॥
बुद्धि गुणोंको उत्पन्न करती है और आत्मा केवल देखता है । बुद्धि और आत्माका यह सम्बन्ध अनादि है ॥ ३७ ॥
इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं क्रियते बुद्धिरन्तरा ।
निश्चक्षुर्भिरजानद्भिरिन्द्रियाणि प्रदीपवत् ॥ ३८ ॥
ज्ञानशक्तिरहित न जाननेवाली इन्द्रियाँ वस्तुओंको प्रकाशित करनेके लिये बुद्धिको बीचमें करती हैं । इन्द्रियाँ तो वस्तुको प्रकट करनेमें दीपककी भाँति केवल सहायक हैं ॥ ३८ ॥
एवं स्वभावमेवैतत् तद् बुद्ध्वा विहरेन्नरः ।
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च स वै विगतमत्सरः ॥ ३ ९ ॥
इस प्रकार ‘ आत्मा असंग एवं निर्लेप है ' इस बातको जानकर मनुष्य शोक, हर्ष और द्वेषका परित्याग करके विचरण करे ॥ ३ ९ ॥
स्वभावसिद्धमेवैतद् यदिमान् सृजते गुणान् ।
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तुवद् गुणाः ॥ ४० ॥
जैसे मकड़ी जाला बुनती है, उसी प्रकार बुद्धि गुणोंकी सृष्टि करती है — यह स्वभावसिद्ध है । अतएव गुणोंको जालेके समान और बुद्धिको मकड़ीके समान जानना चाहिये ॥ ४० ॥
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते ।
एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे ॥ ४१ ॥
वे गुण नष्ट होनेपर पुनः वापस नहीं आते; क्योंकि फिर उनकी प्रवृत्ति उपलब्ध नहीं होती । एक श्रेणीके विद्वानोंका ऐसा ही निश्चय है । दूसरी श्रेणीके लोग उन नष्ट हुए गुणोंकी पुनरावृत्ति भी मानते हैं ॥ ४१ ॥
इतीदं हृदयग्रन्थिं बुद्धिचिन्तामयं दृढम् ।
विमुच्य सुखमासीत विशोकश्छिन्नसंशयः ॥ ४२ ॥
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इस प्रकार बुद्धिकी चिन्तास्वरूप इस सुदृढ़ हृदयग्रन्थिको त्यागकर शोक और संशयसे रहित हो सुखपूर्वक रहना चाहिये ॥ ४२ ॥
ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्वीं मोहपूर्णां नदीं नराः ।
यथा गाधमविद्वांसो बुद्धियोगमयं तथा ॥ ४३ ॥
जलकी गहराईको न जाननेवाले मनुष्य जैसे नदीके तल- प्रदेशमें जाकर दुःखका अनुभव करते हैं, उसी प्रकार बुद्धियोग ( ज्ञान ) -से अनभिज्ञ सभी मनुष्य इस मोहपूर्ण विशाल संसारनदीमें पड़कर क्लेश भोगते हैं ॥ ४३ ॥
नैव ताम्यन्ति विद्वांसः प्लवन्तः पारमम्भसः ।
अध्यात्मविदुषो धीरा ज्ञानं तु परमं प्लवः ॥ ४४ ॥
जो तैरनेकी कला जानते हैं, वे तैरकर अगाध जलसे पार हो जाते हैं । उन्हें कष्ट नहीं भोगना पड़ता । उसी प्रकार अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता धीर पुरुष अनायास संसार- सागरको पार कर जाते हैं । उनके लिये परम ज्ञान ही जहाज बन जाता है ॥ ४४ ॥
न भवति विदुषां महद्भयं यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत् । न हि गतिरधिकास्ति कस्यचित् सकृदुपदर्शयतीह तुल्यताम् ॥ ४५ ॥
अज्ञानियोंको जिस संसारसे महान् भय बना रहता है, उससे ज्ञानियोंको वह गुरुतर भय तनिक भी नहीं प्राप्त होता है । ज्ञानी पुरुषोंमेंसे किसीको भी अधिक या न्यून गति नहीं प्राप्त होती – वे सब समान गतिके भागी होते हैं । ' सकृद्विभातो ह्येष ब्रह्मलोकः ' इत्यादि श्रुति यहाँ ज्ञानियोंकी गतिकी समानता दिखाती है ॥ ४५ ॥
यत् करोति बहुदोषमेकत- स्तच्च दूषयति यत्पुरा कृतम् । नाप्रियं तदुभयं करोत्यसौ यच्च दूषयति यत् करोति च ॥ ४६ ॥
अज्ञानावस्थामें मनुष्य जो अनेक दोषसे युक्त कर्म करता है और वह पहलेके जो कर्म कर चुका है, उनके लिये शोक करता है । इसके सिवा अज्ञानावस्थामें जो वह दूसरेके किये हुए अप्रिय कर्मको दोषरूपमें देखता है और राग आदि दोषके कारण स्वयं जो दूषित कर्म करता है, वह दोनों ही प्रकारका कार्य वह ज्ञान होनेके बाद नहीं करता है ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पाञ्चभौतिके पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पाञ्चभौतिक तत्त्वोंका वर्णनविषयक दो सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८५ ॥
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षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन युधिष्ठिरउवाच
शोकाद् दुःखाच्च मृत्योश्च त्रसन्ते प्राणिनः सदा ।
उभयं नो यथा न स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा - पितामह! संसारके सभी प्राणी सदा शोक, दुःख और मृत्युसे डरते रहते हैं; अतः आप हमें ऐसा उपदेश दें, जिससे हमलोगोंको उन दोनोंका भय न रहे ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादं समङ्गस्य च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें विद्वान् पुरुष देवर्षि नारद और समङ्गके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
नारद उवाच
उरसेव प्रणमसे बाहुभ्यां तरसीव च ।
सम्प्रहृष्टमना नित्यं विशोक इव लक्ष्यसे ॥ ३ ॥
नारदजीने पूछा — समङ्गजी! दूसरे लोग तो सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं; परंतु आप हृदयसे प्रणाम करते जान पड़ते हैं । मालूम होता है, आप इस संसारसागरको अपनी इन दोनों भुजाओंसे ही तैरकर पार हो जायँगे । आपका मन नित्य प्रसन्न रहता है तथा आप सदा शोकशून्य- से दिखायी देते हैं ॥ ३ ॥
उद्वेगं न हि ते किंचित् सुसूक्ष्ममपि लक्षये ।
नित्यतृप्त इव स्वस्थो बालवच्च विचेष्टसे ॥ ४ ॥
मैं आपके चित्तमें कभी कोई थोड़ा- सा भी उद्वेग नहीं देख पाता हूँ । आप नित्य तृप्तकी भाँति अपने - आपमें ही स्थित रहकर बालकोंके समान चेष्टा करते हैं ( इसका क्या कारण है? ) ॥ ४ ॥
समङ्ग उवाच
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वमेतत् तु मानद ।
तेषां तत्त्वानि जानामि ततो न विमना ह्यहम् ॥ ५ ॥
समङ्गजीने कहा — दूसरोंको मान देनेवाले देवर्षे! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य इन सबका स्वरूप तथा तत्त्व जानता हूँ; इसलिये मेरे मनमें कभी विषाद नहीं होता ॥ ५ ॥
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उपक्रमानहं वेद पुनरेव फलोदयान् ।
लोके फलानि चित्राणि ततो न विमना ह्यहम् ॥ ६ ॥
मुझे कर्मोंके आरम्भका तथा उनके फलोदयकालका भी ज्ञान है और लोकमें जो भाँति- भाँतिके कर्मफल प्राप्त होते हैं, उनको भी मैं जानता हूँ; इसीलिये मेरे मनमें कभी खेद नहीं होता ॥ ६ ॥
अगाधाश्चाप्रतिष्ठाश्च गतिमन्तश्च नारद ।
अन्धा जडाश्च जीवन्ति पश्यास्मानपि जीवतः ॥ ७ ॥
नारदजी! देखिये, जैसे जगत्में गम्भीर, अप्रतिष्ठित, प्रगतिशील, अन्धे और जड मनुष्य भी जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जी रहे हैं ॥ ७ ॥
विहितेनैव जीवन्ति अरोगाङ्गा दिवौकसः ।
बलवन्तोऽबलाश्चैव तस्मादस्मान् सभाजय ॥ ८ ॥
नीरोग शरीरवाले देवता, बलवान् और निर्बल सभी अपने प्रारब्ध- विधानके अनुसार जीवन धारण करते हैं; अतः हम भी प्रारब्धपर ही अवलम्बित रहकर किसी कर्मका आरम्भ नहीं करते हैं, इसलिये हमारे प्रति भी आप आदर बुद्धि रखें ( अकर्मण्य समझकर हमारा निरादर न करें ) ॥ ८ ॥
सहस्रिणोऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा ।
शाकेन चान्ये जीवन्ति पश्यास्मानपि जीवतः ॥ ९ ॥
जिनके पास हजारों रुपये हैं, वे भी जीते हैं । जिनके पास सैकड़ों रुपयोंका संग्रह है, वे भी जीवन धारण करते हैं । दूसरे लोग सागसे ही जीवन- निर्वाह करते हैं । उसी तरह हमें भी जीवित समझिये ॥ ९ ॥
यदा न शोचेमहि किं नु नः स्याद् धर्मेण वा नारद कर्मणा वा । कृतान्तवश्यानि यदा सुखानि दुःखानि वा यन्न विधर्षयन्ति ॥ १० ॥
नारदजी! जब अज्ञान दूर हो जानेके कारण हम शोक ही नहीं करते हैं तो धर्म अथवा लौकिक कर्मसे हमारा क्या प्रयोजन है । सारे सुख और दुःख कालके अधीन होनेके कारण क्षणभंगुर हैं, अतः वे ज्ञानी पुरुषको पराभूत नहीं कर सकते हैं ॥ १० ॥
यस्मै प्राज्ञाः कथयन्ते मनुष्याः प्रज्ञामूलं हीन्द्रियाणां प्रसादः । मुह्यन्ति शोचन्ति तथेन्द्रियाणि प्रज्ञालाभो नास्ति मूढेन्द्रियस्य ॥ ११ ॥
ज्ञानी पुरुष जिसके लिये कहा करते हैं, उस प्रज्ञाकी जड़ है इन्द्रियोंकी निर्मलता । जिसकी इन्द्रियाँ मोह और शोकमें मग्न हैं, उस मोहाच्छन्न इन्द्रियवाले पुरुषको कभी
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प्रज्ञाका लाभ नहीं मिल सकता ॥ ११ ॥
मूढस्य दर्पः स पुनर्मोह एव मूढस्य नायं न परोऽस्ति लोकः । न ह्येव दुःखानि सदा भवन्ति सुखस्य वा नित्यशो लाभ एव ॥ १२ ॥
मूढ़ मनुष्यको गर्व होता है । उसका वह गर्व मोहरूप ही है । मूढ़के लिये न तो यह लोक सुखद होता है ओर न परलोक ही । किसीको भी न तो सदा दुःख ही उठाने पड़ते हैं और न नित्य, निरन्तर सुखका ही लाभ होता है ॥ १२ ॥
भवात्मकं सम्परिवर्तमानं न मादृशः संज्वरं जातु कुर्यात् । इष्टान् भोगान् नानुरुध्येत् सुखं वा न चिन्तयेद् दुःखमभ्यागतं वा ॥ १३ ॥
संसारके स्वरूपको परिवर्तित होता देख मेरे जैसा मनुष्य कभी संताप नहीं करता है । अभीष्ट भोग अथवा सुखका भी अनुसरण नहीं करता तथा दुःख आ जाय तो उसके लिये चिन्तित नहीं होता ॥ १३ ॥
समाहितो न स्पृहयेत् परेषां नानागतं चाभिनन्देच्च लाभम् । न चापि हृष्येद् विपुलेऽर्थलाभे तथार्थनाशे च न वै विषीदेत् ॥ १४ ॥
सब प्रकारसे उपरत महापुरुष दूसरोंसे कुछ भी नहीं चाहता । भविष्यमें होनेवाले अर्थलाभका भी अभिनन्दन नहीं करता। बहुत - सी सम्पत्ति पाकर हर्षित नहीं होता तथा धनका नाश हो जानेपर भी खेद नहीं करता ॥ १४ ॥
न बान्धवा न च वित्तं न कौल्यं न च श्रुतं न च मन्त्रा न वीर्यम् । दुःखात् त्रातुं सर्व एवोत्सहन्ते परत्र शीलेन तु यान्ति शान्तिम् ॥ १५ ॥
बन्धु - बान्धव, धन, उत्तम कुल, शास्त्राध्ययन, मन्त्र तथा पराक्रम– ये सब - के - सब मिलकर भी किसीको दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते हैं । परलोकमें मनुष्य उत्तम स्वभावके कारण ही शान्ति पाते हैं ॥ १५ ॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य नायोगाद् विन्दते सुखम् ।
धृतिश्च दुःखत्यागश्चेत्युभयं तु सुखं नृप ॥ १६ ॥
जिसका चित्त योगयुक्त नहीं है, उसे समत्व बुद्धि नहीं प्राप्त होती । योगके बिना कोई -सुख नहीं पाता है । नरेश्वर! दुःखोंके सम्बन्धका त्याग और धैर्य – ये ही दोनों सुखके कारण