श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1891–1900
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1891–1900
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हैं ॥ १६ ॥
प्रियं हि हर्षजननं हर्ष उत्सेकवर्धनः ।
उत्सेको नरकायैव तस्मात् तान् संत्यजाम्यहम् ॥ १७ ॥
प्रिय वस्तु हर्षजनक होती है । हर्ष अभिमानको बढ़ाता है और अभिमान नरकमें ही डुबानेवाला है । इसलिये मैं इन तीनोंका त्याग करता हूँ ॥ १७ ॥
एतान् शोकभयोत्सेकान् मोहनान् सुखदुःखयोः ।
पश्यामि साक्षिवल्लोके देहस्यास्य विचेष्टनात् ॥ १८ ॥
शोक, भय और अभिमान - ये प्राणियोंको सुख-दुःखमें डालकर मोहित करनेवाले हैं; इसलिये जबतक यह शरीर चेष्टा कर रहा है, तबतक मैं इन सबको साक्षीकी भाँति देखता हूँ ॥ १८ ॥
अर्थकामौ परित्यज्य विशोको विगतज्वरः ।
तृष्णामोहौ तु संत्यज्य चरामि पृथिवीमिमाम् ॥ १ ९ ॥
अर्थ और कामको त्यागकर एवं तृष्णा और मोहका सर्वथा परित्याग करके मैं शोक और संतापसे रहित हुआ इस पृथ्वीपर विचरता हूँ ॥ १ ९ ॥
न च मृत्योर्न चाधर्मान्न लोभान्न कुतश्चन ।
पीतामृतस्येवात्यन्तमिह वामुत्र वा भयम् ॥ २० ॥
जैसे अमृत पीनेवालेको मृत्युसे भय नहीं होता, उसी प्रकार मुझे भी इहलोक या परलोकमें मृत्यु, अधर्म, लोभ तथा दूसरे किसीसे भी भय नहीं है ॥ २० ॥
एतद् ब्रह्मन् विजानामि महत् कृत्वा तपोऽव्ययम् ।
तेन नारद सम्प्राप्तो न मां शोकः प्रबाधते ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! मैंने महान् और अक्षय तप करके यही ज्ञान पाया है; अतः नारदजी! शोककी परिस्थिति उपस्थित होकर भी मुझे व्याकुल नहीं कर सकती ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि समङ्गनारदसंवादे षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें समङ्ग और नारदजीका संवादविषयक दो सौछियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८६ ॥
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सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश युधिष्ठिर उवाच
अतत्त्वज्ञस्य शास्त्राणां सततं संशयात्मनः ।
अकृतव्यवसायस्य श्रेयो ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! जो शास्त्रोंके तत्त्वको नहीं जानता, जिसका मन सदा संशयमें ही पड़ा रहता है तथा जिसने परमार्थके लिये कोई निश्चित ध्येय नहीं बनाया है, उस पुरुषका कल्याण कैसे हो सकता है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
गुरुपूजा च सततं वृद्धानां पर्युपासनम् ।
श्रवणं चैव शास्त्राणां कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! सदा गुरुजनोंकी पूजा, वृद्ध पुरुषोंकी सेवा और शास्त्रोंका श्रवण — ये तीन कल्याणके अमोघ साधन बताये जाते हैं ॥ २ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गालवस्य च संवादं देवर्षेर्नारदस्य च ॥ ३ ॥
इस विषयमें भी जानकार मनुष्य देवर्षि नारद और महर्षि गालवके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥
स्वाश्रमं समनुप्राप्तं नारदं देववर्चसम् ।
वीतमोहक्लमं विप्रं ज्ञानतृप्तं जितेन्द्रियः ।
श्रेयस्कामो यतात्मानं नारदं गालवोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
एक समयकी बात है, कल्याणकी इच्छा रखनेवाले जितेन्द्रिय गालव मुनिने अपने आश्रमपर पधारे हुए देवोपम तेजस्वी ब्राह्मण, मोह और क्लान्तिसे रहित, ज्ञानानन्दसे परिपूर्ण एवं मनको वशमें रखनेवाले देवर्षि नारदजीसे इस प्रकार पूछा— ॥ ४ ॥
यैः कश्चित् सम्मतो लोके गुणैश्च पुरुषो मुने ।
भवत्यनपगान् सर्वांस्तान् गुणान् लक्षयामहे ॥ ५ ॥
‘ मुने! संसारमें कोई भी पुरुष जिन गुणोंद्वारा सम्मानित होता है, उन समस्त गुणोंका मैं आपमें कभी अभाव नहीं देखता हूँ ॥ ५ ॥
भवानेवंविधोऽस्माकं संशयं छेत्तुमर्हति ।
अमूढश्चिरमूढानां लोकतत्त्वमजानताम् ॥ ६ ॥
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‘ लोक- तत्त्वके ज्ञानसे शून्य और चिरकालसे अज्ञानमें पड़े हुए हम जैसे लोगोंके संशयका निवारण सर्वगुणसम्पन्न आप जैसा ज्ञानी महात्मा ही कर सकता है ॥ ६ ॥
ज्ञाने ह्येवं प्रवृत्तिः स्यात् कार्याणामविशेषतः ।
यत् कार्यं न व्यवस्यामस्तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ७ ॥
' मुने! शास्त्रोंमें बहुत- से कर्तव्यकर्म बताये गये हैं, उनमेंसे अमुक कर्मके इस प्रकार करनेसे ज्ञानमार्गमें प्रवृत्ति हो सकती है, इसका विशेषरूपसे हमें निश्चय नहीं हो पाता है; अतः हमारे लिये जो कर्तव्य हो और जिसका निर्धारण हम न कर पाते हों, उसे आप ही हमें बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥
भगवन्नाश्रमाः सर्वे पृथगाचारदर्शिनः ।
इदं श्रेय इदं श्रेय इति सर्वे प्रबोधिताः ॥ ८ ॥
‘ भगवन्! सभी आश्रमोंवाले पृथक् - पृथक् आचारका दर्शन कराते हैं तथा ‘ यह श्रेष्ठ है ’ यह श्रेष्ठ है ' ऐसा उपदेश देते हुए वे ( अपने ही सिद्धान्तोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं और) सभी मनुष्योंकी बुद्धिमें यही बात जमा देते हैं ॥ ८ ॥
तांस्तु विप्रस्थितान् दृष्ट्वा शास्त्रैः शास्त्राभिनन्दिनः ।
स्वशास्त्रैः परितुष्टाश्च श्रेयो नोपलभामहे ॥ ९ ॥
'जिनके मनमें वह बात बैठ गयी है, उन सबको उन शास्त्रोंके उपदेशके अनुसार नाना प्रकारके आचार- मार्गसे चलते और अपने - अपने शास्त्रोंका अभिनन्दन करते देखकर जैसे हम अपनी मान्यतामें संतुष्ट हैं, वैसे ही उन्हें भी संतुष्ट पाकर हमारे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है । हम यह ठीक-ठीक निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि परम कल्याणकी प्राप्तिका सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है? ॥ ९ ॥
शास्त्रं यदि भवेदेकं श्रेयो व्यक्तं भवेत् तदा ।
शास्त्रैश्च बहुभिर्भूयः श्रेयो गुह्यं प्रवेशितम् ॥ १० ॥
' यदि शास्त्र एक होता तो श्रेयकी प्राप्तिका उपाय भी एक ही होनेके कारण वह स्पष्टरूपसे समझमें आ जाता, परंतु बहुत- से शास्त्रोंने नाना प्रकारसे वर्णन करके श्रेयको गुह्य अवस्थामें पहुँचा दिया है— उसे अत्यन्त गूढ़ बना डाला है ॥ १० ॥
एतस्मात् कारणाच्छ्रेयः कलिलं प्रतिभाति मे ।
ब्रवीतु भगवांस्तन्मे उपसन्नोऽस्म्यधीहि भोः ॥ ११ ॥
' इस कारणसे मुझे श्रेयका स्वरूप संशयाच्छन्न जान पड़ता है । भगवान्! अब आप ही मुझे उसका उपदेश दें । मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझ शिष्यको श्रेयोमार्गका बोध करायें' ॥ ११ ॥
नारद उवाच आश्रमास्तात चत्वारो यथासंकल्पिताः पृथक् ।
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तान् सर्वाननुपश्य त्वं समाश्रित्येति गालव ॥ १२ ॥
नारदजीने कहा — तात! आश्रम चार हैं और शास्त्रोंमें उनकी पृथक् - पृथक् व्यवस्था की गयी है । गालव! तुम ज्ञानका आश्रय लेकर उन सबको यथार्थरूपसे जानो ॥ १२ ॥
तेषां तेषां यथा हि त्वमाश्रमाणां ततस्ततः ।
नानारूपगुणोद्देशं पश्य विप्र स्थितं पृथक् ॥ १३ ॥
विप्रवर! उन- उन आश्रमोंके जो नाना प्रकारसे गुण- सम्पन्न धर्म बताये गये हैं, उनकी
पृथक् - पृथक् स्थिति है । इस बातको तुम देखो और समझो ॥ १३ ॥
न यान्ति चैव ते सम्यगभिप्रेतमसंशयम् ।
अन्येऽपश्यंस्तथा सम्यगाश्रमाणां परां गतिम् ॥ १४ ॥
जो साधारण मनुष्य हैं, वे उन आश्रमोंके वास्तविक अभिप्रायको भलीभाँति संशयरहित नहीं जान पाते, किंतु उनसे भिन्न जो तत्त्वज्ञ हैं, वे इन आश्रमोंके परमतत्त्वको ठीक - ठीक समझते हैं ॥ १४ ॥
यत् तु निश्रेयसं सम्यक् तच्चैवासंशयात्मकम् ॥ १५ ॥
अनुग्रहं च मित्राणाममित्राणां च निग्रहम् ।
संग्रहं च त्रिवर्गस्य श्रेय आहुर्मनीषिणः ॥ १६ ॥
जो अच्छी तरह कल्याण करनेवाला साधन होता है, वह सर्वथा संशयरहित होता है । सुहृदोंपर अनुग्रह करना, शत्रुभाव रखनेवाले दुष्टोंको दण्ड देना तथा धर्म, अर्थ और कामका संग्रह करना — इसे मनीषी पुरुष श्रेय कहते हैं ॥ १५-१६ ॥
निवृत्तिः कर्मणः पापात् सततं पुण्यशीलता ।
सद्भिश्च समुदाचारः श्रेय एतदसंशयम् ॥ १७ ॥
पापकर्मसे दूर रहना, निरन्तर पुण्यकर्मोंमें लगे रहना और सत्पुरुषोंके साथ रहकर सदाचारका ठीक - ठीक पालन करना — यह संशयरहित कल्याणका मार्ग है ॥
मार्दवं सर्वभूतेषु व्यवहारेषु चार्जवम् ।
वाक् चैव मधुरा प्रोक्ता श्रेय एतदसंशयम् ॥ १८ ॥
सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति कोमलताका बर्ताव करना, व्यवहारमें सरल होना तथा मीठे वचन बोलना - यह भी कल्याणका संदेहरहित मार्ग है ॥ १८ ॥
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च संविभागोऽतिथिष्वपि ।
असंत्यागश्च भृत्यानां श्रेय एतदसंशयम् ॥ १९ ॥
देवताओं, पितरों और अतिथियोंको उनका भाग देना तथा भरण - पोषण करनेयोग्य व्यक्तियोंका त्याग न करना - यह कल्याणका निश्चित साधन है ॥ १ ९ ॥
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् ।
यद् भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ २० ॥
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सत्य बोलना भी श्रेयस्कर है; परंतु सत्यको यथार्थरूपसे जानना कठिन है । मैं तो उसीको सत्य कहता हूँ, जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो ॥
अहंकारस्य च त्यागः प्रमादस्य च निग्रहः ।
संतोषश्चैकचर्या च कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥ २१ ॥
अहंकारका त्याग, प्रमादको रोकना, संतोष और एकान्तवास - यह सुनिश्चित श्रेय कहलाता है ॥ २१ ॥
धर्मेण वेदाध्ययनं वेदान्तानां तथैव च ।
ज्ञानार्थानां च जिज्ञासा श्रेय एतदसंशयम् ॥ २२ ॥
धर्माचरणपूर्वक वेद और वेदाङ्गोंका स्वाध्याय करना तथा उनके सिद्धान्तको जाननेकी इच्छाको जगाये रखना निस्संदेह कल्याणका साधन है ॥ २२ ॥
शब्दरूपरसस्पर्शान् सह गन्धेन केवलान् ।
नात्यर्थमुपसेवेत श्रेयसोऽर्थी कथंचन ॥ २३ ॥
जिसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छा हो, उस मनुष्यको किसी तरह भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध– इन विषयोंका अधिक सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥
नक्तंचर्यां दिवास्वप्नमालस्यं पैशुनं मदम् ।
अतियोगमयोगं च श्रेयसोऽर्थी परित्यजेत् ॥ २४ ॥
कल्याण चाहनेवाला पुरुष रातमें घूमना, दिनमें सोना, आलस्य, चुगली, मादक वस्तुका सेवन, आहार - विहारका अधिक मात्रामें सेवन और उसका सर्वथा त्याग – ये सब बातें त्याग दे ॥ २४ ॥
आत्मोत्कर्षं न मार्गेत परेषां परिनिन्दया ।
स्वगुणैरेव मार्गेत विप्रकर्षं पृथग्जनात् ॥ २५ ॥
निर्गुणास्त्वेव भूयिष्ठमात्मसम्भाविता नराः ।
दोषैरन्यान् गुणवतः क्षिपन्त्यात्मगुणक्षयात् ॥ २६ ॥
दूसरोंकी निन्दा करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेका प्रयत्न न करे । साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा जो अपनी उत्कृष्टता है, उसे अपने गुणोंद्वारा ही सिद्ध करे ( बातोंसे नहीं) । गुणहीन मनुष्य ही अधिकतर अपनी प्रशंसा किया करते हैं । वे अपनेमें गुणोंकी कमी देखकर दूसरे गुणवान् पुरुषोंके गुणोंमें दोष बताकर उनपर आक्षेप किया करते हैं ॥ २५-२६ ॥
अनूच्यमानास्तु पुनस्ते मन्यन्तु महाजनात् ।
गुणवत्तरमात्मानं स्वेन मानेन दर्पिताः ॥ २७ ॥
यदि उनको उत्तर दिया जाय तो फिर वे घमंडमें भरकर अपने - आपको महापुरुषोंसे भी अधिक गुणवान् मानने लगें ॥ २७ ॥
अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन् ।
विपश्चिद् गुणसम्पन्नः प्राप्नोत्येव महद्यशः ॥ २८ ॥
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परंतु जो दूसरे किसीकी निन्दा तथा अपनी प्रशंसा नहीं करता, ऐसा उत्तम गुणसम्पन्न विद्वान् पुरुष ही महान् यशका भागी होता है ॥ २८ ॥
अब्रुवन् वाति सुरभिर्गन्धः सुमनसां शुचिः ।
तथैवाव्याहरन् भाति विमलो भानुरम्बरे ॥ २ ९ ॥
फूलोंकी पवित्र एवं मनोरम सुगन्ध बिना कुछ बोले ही महक उठती है । निर्मल सूर्य अपनी प्रशंसा किये बिना ही आकाशमें प्रकाशित होने लगते हैं ॥ २ ९ ॥
एवमादीनि चान्यानि परित्यक्तानि मेधया ।
ज्वलन्ति यशसा लोके यानि न व्याहरन्ति च ॥ ३० ॥
इस प्रकार संसारमें और भी बहुत - सी ऐसी बुद्धिसे रहित वस्तुएँ हैं, जो अपनी प्रशंसा नहीं करती हैं, किंतु अपने यशसे जगमगाती रहती हैं ॥ ३० ॥
न लोके दीप्यते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया ।
अपि चापिहितः श्वभ्रे कृतविद्यः प्रकाशते ॥ ३१ ॥
मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसा करनेसे ही जगत्में ख्याति नहीं पा सकता । विद्वान् पुरुष गुफामें छिपा रहे तो भी उसकी सर्वत्र प्रसिद्धि हो जाती है ॥
असदुच्चैरपि प्रोक्तः शब्दः समुपशाम्यति ।
दीप्यते त्वेव लोकेषु शनैरपि सुभाषितम् ॥ ३२ ॥
बुरी बात जोर- जोरसे कही गयी हो तो भी वह शून्यमें विलीन हो जाती है, लोकमें उसका आदर नहीं होता है; किंतु अच्छी बात धीरेसे कही जाय तो भी वह संसारमें प्रकाशित होती है— उसका आदर होता और प्रभाव बढ़ता है ॥ ३२ ॥
मूढानामवलिप्तानामसारं भाषितं बहु ।
दर्शयत्यन्तरात्मानमग्निरूपमिवांशुमान् ॥ ३३ ॥
घमंडी मूर्खोंकी कही हुई असार बातें उनके दूषित अन्तःकरणका ही प्रदर्शन कराती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य सूर्यकान्तमणिके योगसे अपने दाहक अग्निरूपको ही प्रकट करता है ॥ ३३ ॥
एतस्मात् कारणात् प्रज्ञां मृगयन्ते पृथग्विधाम् ।
प्रज्ञालाभो हि भूतानामुत्तमः प्रतिभाति मे ॥ ३४ ॥
इस कारण कल्याणकी इच्छा रखनेवाले साधु पुरुष अनेक शास्त्रोंके अध्ययनसे नाना प्रकारकी प्रज्ञा (उत्तम बुद्धि) का ही अनुसंधान करते हैं । मुझे तो सभी प्राणियोंके लिये प्रज्ञाका लाभ ही उत्तम जान पड़ता है ॥
नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्नाप्यन्यायेन पृच्छतः ।
ज्ञानवानपि मेधावी जडवत् समुपाविशेत् ॥ ३५ ॥
बुद्धिमान् पुरुष ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूछे किसीको कोई उपदेश न करे । अन्यायपूर्वक पूछनेपर भी किसीके प्रश्नका उत्तर न दे । जडकी भाँति चुपचाप बैठा
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रहे ॥ ३५ ॥
ततो वासं परीक्षेत धर्मनित्येषु साधुषु ।
मनुष्येषु वदान्येषु स्वधर्मनिरतेषु च ॥ ३६ ॥
मनुष्यको सदा धर्ममें लगे रहनेवाले साधु- महात्माओं तथा स्वधर्मपरायण उदार पुरुषोंके समीप निवास करनेकी इच्छा रखनी चाहिये ॥ ३६ ॥
चतुर्णां यत्र वर्णानां धर्मव्यतिकरो भवेत् ।
न तत्र वासं कुर्वीत श्रेयोऽर्थी वै कथंचन ॥ ३७ ॥
जहाँ चारों वर्णोंके धर्मोंका उल्लङ्घन होता हो, वहाँ कल्याणकी इच्छावाले पुरुषको किसी तरह भी नहीं रहना चाहिये ॥ ३७ ॥
निरारम्भोऽप्ययमिह यथालब्धोपजीवनः ।
पुण्यं पुण्येषु विमलं पापं पापेषु चाप्नुयात् ॥ ३८ ॥
किसी कर्मका आरम्भ न करनेवाला और जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन -निर्वाह करनेवाला पुरुष भी यदि पुण्यात्माओंके समाजमें रहे तो उसे निर्मल पुण्यकी प्राप्ति होती है और पापियोंके संसर्गमें रहे तो वह पापका ही भागी होता है ॥ ३८ ॥
अपामग्नेस्तथेन्दोश्च स्पर्शं वेदयते यथा ।
तथा पश्यामहे स्पर्शमुभयोः पुण्यपापयोः ॥ ३ ९ ॥
जैसे जल, अग्नि और चन्द्रमाकी किरणोंके संसर्गमें आनेपर मनुष्य क्रमशः शीत, उष्ण और सुखदायी स्पर्शका अनुभव करता है, उसी प्रकार हम पुण्यात्मा और पापियोंके संगसे पुण्य और पाप दोनोंके स्पर्शका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं ॥ ३ ९ ॥
अपश्यन्तोऽनुविषयं भुञ्जते विघसाशिनः ।
भुञ्जानाश्चात्मविषयान् विषयान् विद्धि कर्मणाम् ॥ ४० ॥
जो विघसाशी ( भृत्यवर्ग ओर अतिथि आदिको भोजन करानेके बाद बचा हुआ भोजन करनेवाले ) हैं, वे तिक्त- मधुर रस या स्वादकी आलोचना न करते हुए अन्न ग्रहण करते हैं; किंतु जो अपनी रसनाका विषय समझकर स्वादु और अस्वादुका विचार रखते हुए भोजन करते हैं, उन्हें कर्मपाशमें बँधा हुआ ही समझना चाहिये ॥ ४० ॥
यत्रागमयमानानामसत्कारेण पृच्छताम् ।
प्रब्रूयाद्ब्रह्मणो धर्मं त्यजेत् तं देशमात्मवान् ॥ ४१ ॥
जहाँ ब्राह्मण अनादर एवं अन्यायपूर्वक धर्म- शास्त्रविषयक प्रश्न करनेवाले पुरुषोंको धर्मका उपदेश करता हो, आत्मपरायण साधकको उस देशका परित्याग कर देना चाहिये ॥ ४१ ॥
शिष्योपाध्यायिकावृत्तिर्यत्र स्यात् सुसमाहिता ।
यथावच्छास्त्रसम्पन्ना कस्तं देशं परित्यजेत् ॥ ४२ ॥
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जहाँ गुरु और शिष्यका व्यवहार सुव्यवस्थित, शास्त्र- सम्मत एवं यथावत् रूपसे चलता है, कौन उस देशका परित्याग करेगा? ॥ ४२ ॥
आकाशस्था ध्रुवं यत्र दोषं ब्रूयुर्विपश्चिताम् ।
आत्मपूजाभिकामो वै को वसेत् तत्र पण्डितः ॥ ४३ ॥
जहाँके लोग बिना किसी आधारके ही विद्वान् पुरुषोंपर निश्चितरूपसे दोषारोपण करते हों, उस देशमें आत्मसम्मानकी इच्छा रखनेवाला कौन मनुष्य निवास करेगा? ॥ ४३ ॥
यत्र संलोडिता लुब्धैः प्रायशो धर्मसेतवः ।
प्रदीप्तमिव चैलान्तं कस्तं देशं न संत्यजेत् ॥ ४४ ॥
जहाँ लालची मनुष्योंने प्रायः धर्मकी मर्यादाएँ तोड़ डाली हों, जलते हुए कपड़ेकी भाँति उस देशको कौन नहीं त्याग देगा? ॥ ४४ ॥
यत्र धर्ममनाशङ्काश्चरेयुर्वीतमत्सराः ।
भवेत् तत्र वसेच्चैव पुण्यशीलेषु साधुषु ॥ ४५ ॥
परंतु जहाँके लोग मात्सर्य और शंकासे रहित होकर धर्मका आचरण करते हों, वहाँ पुण्यशील साधु पुरुषोंके पास अवश्य निवास करे ॥ ४५ ॥
धर्ममर्थनिमित्तं च चरेयुर्यत्र मानवाः ।
न ताननुवसेज्जातु ते हि पापकृतो जनाः ॥ ४६ ॥
जहाँके मनुष्य धनके लिये धर्मका अनुष्ठान करते हों, वहाँ उनके पास कदापि न रहे; क्योंकि वे सब - के सब पापाचारी होते हैं ॥ ४६ ॥
कर्मणा यत्र पापेन वर्तन्ते जीवितेप्सवः ।
व्यवधावेत् ततस्तूर्णं ससर्पाच्छरणादिव ॥ ४७ ॥
जहाँ जीवनकी रक्षाके लिये लोग पापकर्मसे जीविका चलाते हों, सर्पयुक्त घरके समान उस स्थानसे तुरंत दूर हट जाना चाहिये ॥ ४७ ॥
येन खट्वां समारूढः कर्मणानुशयी भवेत् ।
आदितस्तन्न कर्तव्यमिच्छता भवमात्मनः ॥ ४८ ॥
अपनी उन्नति चाहनेवाले साधकको चाहिये कि जिस पापकर्मके संस्कारोंसे युक्त हुआ मनुष्य खाटपर पड़कर दुःख भोगता है, उस कर्मको पहलेसे ही न करे ॥
यत्र राजा च राज्ञश्च पुरुषाः प्रत्यनन्तराः ।
कुटुम्बिनामग्रभुजस्त्यजेत् तद् राष्ट्रमात्मवान् ॥ ४ ९ ॥
जहाँ राजा और राजाके निकटवर्ती अन्य पुरुष कुटुम्बी -जनोंसे पहले ही भोजन कर लेते हैं, उस राष्ट्रको मनस्वी पुरुष अवश्य त्याग दे ॥ ४ ९ ॥
श्रोत्रियास्त्वग्रभोक्तारो धर्मनित्याः सनातनाः ।
याजनाध्यापने युक्ता यत्र तद् राष्ट्रमावसेत् ॥ ५० ॥
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जिस देशमें सदा धर्मपरायण, यज्ञ कराने और पढ़ानेके कार्यमें संलग्न सनातनधर्मी श्रोत्रिय ब्राह्मण ही सबसे पहले भोजन पाते हों, उस राष्ट्रमें अवश्य निवास करे ॥
स्वाहास्वधावषट्कारा यत्र सम्यगनुष्ठिताः ।
अजस्रं चैव वर्तन्ते वसेत् तत्राविचारयन् ॥ ५१ ॥
जहाँ स्वाहा ( अग्निहोत्र ), स्वधा ( श्राद्धकर्म) तथा वषट्कारका भलीभाँति अनुष्ठान होता हो और निरन्तर ये सभी कर्म किये जाते हों, वहाँ बिना विचारे ही निवास करना चाहिये ॥ ५१ ॥
अशुचीन् यत्र पश्येत ब्राह्मणान् वृत्तिकर्शितान् ।
त्यजेत् तद् राष्ट्रमासन्नमुपसृष्टमिवामिषम् ॥ ५२ ॥
जहाँ ब्राह्मणोंको जीविकाके लिये कष्ट पाते तथा अपवित्र अवस्थामें रहते देखे, उस राष्ट्रको निकटवर्ती होनेपर भी विषमिश्रित भोग्यवस्तुकी भाँति त्याग दे ॥ ५२ ॥
प्रीयमाणा नरा यत्र प्रयच्छेयुरयाचिताः ।
स्वस्थचित्तो वसेत् तत्र कृतकृत्य इवात्मवान् ॥ ५३ ॥
जहाँके लोग प्रसन्नतापूर्वक बिना माँगे ही भिक्षा देते हों, वहाँ मनको वशमें करनेवाला पुरुष कृतकृत्यकी भाँति स्वस्थचित्त होकर निवास करे ॥ ५३ ॥
दण्डो यत्राविनीतेषु सत्कारश्च कृतात्मसु ।
चरेत् तत्र वसेच्चैव पुण्यशीलेषु साधुषु ॥ ५४ ॥
जहाँ उद्दण्ड पुरुषोंको दण्ड दिया जाता हो और जितात्मा पुरुषोंका सत्कार किया जाता हो, वहाँ पुण्यशील श्रेष्ठ पुरुषोंके बीच विचरना और निवास करना चाहिये ॥ ५४ ॥
उपसृष्टेषु दान्तेषु दुराचारेषु साधुषु ।
अविनीतेषु लुब्धेषु सुमहद् दण्डधारणम् ॥ ५५ ॥
जो जितेन्द्रिय पुरुषोंपर क्रोध और श्रेष्ठ पुरुषोंपर अत्याचार करते हों, उद्दण्ड और लोभी हों, ऐसे लोगोंको जहाँ अत्यन्त कठोर और महान् दण्ड दिया जाता हो, उस देशमें बिना विचारे निवास करना चाहिये ॥ ५५ ॥
यत्र राजा धर्मनित्यो राज्यं धर्मेण पालयेत् ।
अपास्य कामान् कामेशो वसेत् तत्राविचारयन् ॥ ५६ ॥
जहाँका राजा सदा धर्मपरायण रहकर धर्मानुसार ही राज्यका पालन करता हो और सम्पूर्ण कामनाओंका स्वामी होकर भी विषयभोगसे विमुख रहता हो, वहाँ बिना कुछ सोचे-विचारे निवास करना चाहिये ॥ ५६ ॥
यथाशीला हि राजानः सर्वान् विषयवासिनः ।
श्रेयसा योजयत्याशु श्रेयसि प्रत्युपस्थिते ॥ ५७ ॥
क्योंकि राजाके शील- स्वभाव जैसे होते हैं वैसे ही प्रजाके भी हो जाते हैं । वह अपने कल्याणका अवसर उपस्थित होनेपर समस्त प्रजाको भी शीघ्र ही कल्याणका भागी बना
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देता है ॥ ५७ ॥
पृच्छतस्ते मया तात श्रेय एतदुदाहृतम् ।
न हि शक्यं प्रधानेन श्रेयः संख्यातुमात्मनः ॥ ५८ ॥
तात! मैंने तुम्हारे प्रश्नके अनुसार यह श्रेयोमार्गका वर्णन किया है। पूर्णतया तो आत्मकल्याणकी परिगणना हो ही नहीं सकती ॥ ५८ ॥
एवं प्रवर्तमानस्य वृत्तिं प्राणिहितात्मनः ।
तपसैवेह बहुलं श्रेयो व्यक्तं भविष्यति ॥ ५ ९ ॥
जो इस प्रकारकी वृत्तिसे रहकर जीविका चलाता है और प्राणियोंके हितमें मन लगाये रहता है, उस पुरुषको स्वधर्मरूप तपके अनुष्ठानसे इस लोकमें ही परम कल्याणकी प्रत्यक्ष उपलब्धि हो जायगी ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि श्रेयोवाचिको नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रेयोमार्गका प्रतिपादन नामक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८७ ॥