श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1901–1910
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1901–1910
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अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अरिष्टनेमिका राजा सगरको वैराग्योत्पादक मोक्षविषयक उपदेश युधिष्ठिर उवाच
कथं नु युक्तः पृथिवीं चरेदस्मद्विधो नृपः ।
नित्यं कैश्च गुणैर्युक्तः संगपाशाद् विमुच्यते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — दादाजी! मेरे जैसा राजा कैसे साधन और व्यवहारसे युक्त होकर पृथ्वीपर विचरे और सदा किन गुणोंसे सम्पन्न होकर वह आसक्तिके बन्धनसे मुक्त हो? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
अरिष्टनेमिना प्रोक्तं सगरायानुपृच्छते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें राजा सगरके प्रश्न करनेपर अरिष्टनेमिने जो उत्तर दिया था, वह प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें बताऊँगा ॥ २ ॥
सगर उवाच
किं श्रेयः परमं ब्रह्मन् कृत्वेह सुखमश्नुते ।
कथं न शोचेन्न क्षुभ्येदेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
सगरने पूछा — ब्रह्मन्! इस जगत् में मनुष्य किस परम कल्याणकारी कर्मका अनुष्ठान करके सुखका भागी होता है? तथा किस उपायसे उसे शोक या क्षोभ प्राप्त नहीं होता? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तदा तार्क्ष्यः सर्वशास्त्रविदां वरः ।
विबुध्य सम्पदं चाग्र्यां सद्वाक्यमिदमब्रवीत् ॥ ४ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! राजा सगरके इस प्रकार पूछनेपर सम्पूर्ण शास्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ तार्क्ष्य ( अरिष्टनेमि ) -ने उनमें सर्वोत्तम दैवी सम्पत्तिके गुण जानकर उनको इस प्रकार उत्तम उपदेश दिया- ॥ ४ ॥
सुखं मोक्षसुखं लोके न च मूढोऽवगच्छति ।
प्रसक्तः पुत्रपशुषु धनधान्यसमाकुलः ॥ ५ ॥
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‘ सगर! संसारमें मोक्षका सुख ही वास्तविक सुख है, परंतु जो धनधान्यके उपार्जनमें व्यग्र तथा पुत्र और पशुओंमें आसक्त है, उस मूढ़ मनुष्यको उसका यथार्थ ज्ञान नहीं होता' ॥ ५ ॥
सक्तबुद्धिरशान्तात्मा न शक्यं तच्चिकित्सितुम् ।
स्नेहपाशसितो मूढो न स मोक्षाय कल्पते ॥ ६ ॥
‘ जिसकी बुद्धि विषयोंमें आसक्त है, जिसका मन अशान्त रहता है, ऐसे मनुष्यकी चिकित्सा करनी कठिन है; क्योंकि जो स्नेहके बन्धनमें बँधा हुआ है, वह मूढ़ मोक्ष पानेके लिये योग्य नहीं होता ' ॥ ६ ॥
स्नेहजानिह ते पाशान् वक्ष्यामि शृणु तान् मम ।
सकर्णकेन शिरसा शक्याः श्रोतुं विजानता ॥ ७ ॥
'मैं तुम्हें स्नेहजनित बन्धनोंका परिचय देता हूँ, उन्हें तुम मुझसे सुनो । श्रवणेन्द्रियसम्पन्न समझदार मनुष्य ही ऐसी बातोंको बुद्धिपूर्वक सुन सकता है ' ॥ ७ ॥
सम्भाव्य पुत्रान् कालेन यौवनस्थान् निवेश्य च ।
समर्थान् जीवने ज्ञात्वा मुक्तश्चर यथासुखम् ॥ ८ ॥
‘ समयानुसार पुत्रोंको उत्पन्न करके जब वे जवान हो जायँ, तब उनका विवाह कर दो और जब यह मालूम हो जाय कि अब ये दूसरेके सहयोगके बिना ही जीवन - निर्वाह करनेमें समर्थ हैं, तब उनके स्नेह- पाशसे मुक्त हो सुखपूर्वक विचरो ' ॥ ८ ॥
भार्यां पुत्रवतीं वृद्धां लालितां`पुत्रवत्सलाम् ।
ज्ञात्वा प्रजहि कालेन परार्थमनुदृश्य च ॥ ९ ॥
' पत्नी पुत्रवती होकर वृद्ध हो गयी । अब पुत्रगण उसका पालन करते हैं और वह भी पुत्रोंपर पूर्ण वात्सल्य रखती है, यह जानकर परम पुरुषार्थ मोक्षको अपना लक्ष्य बनाकर यथासमय उसका परित्याग कर दे ' ॥ ९ ॥
सापत्यो निरपत्यो वा मुक्तश्चर यथासुखम् ।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थांस्त्वमनुभूय यथाविधि ॥ १० ॥
कृतकौतूहलस्तेषु मुक्तश्चर यथासुखम् । ‘ शास्त्र - विधिके अनुसार इन्द्रियोंद्वारा इन्द्रियोंके विषयोंका अनुभव करके जब तुम उनके खेलको पूरा कर चुको, तब संतान हुई हो चाहे न हुई हो, उनसे मुक्त होकर सुखपूर्वक विचरो ' ॥ १०३ ॥
उपपत्त्योपलब्धेषु लोकेषु च समो भव ॥ ११ ॥
‘ दैवेच्छासे जो भी लौकिक पदार्थ उपलब्ध हों, उनमें समान भाव रखो –राग- द्वेष न करो ' ॥ ११ ॥
एष तावत् समासेन तव संकीर्तितो मया ।
मोक्षार्थो विस्तरेणाथ भूयो वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ १२ ॥
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' यह संक्षेपमें मैंने तुम्हें मोक्षका विषय बताया है । अब पुनः इसीको विस्तारके साथ बता रहा हूँ, सुनो ॥
मुक्ता वीतभया लोके चरन्ति सुखिनो नराः ।
सक्तभावा विनश्यन्ति नरास्तत्र न संशयः ॥ १३ ॥
आहारसंचयाश्चैव तथा कीटपिपीलिकाः ।
असक्ताः सुखिनो लोके सक्ताश्चैव विनाशिनः ॥ १४ ॥
'मुक्त पुरुष सुखी होते हैं और संसारमें निर्भय होकर विचरते हैं; किंतु जिनका चित्त विषयोंमें आसक्त होता है, वे कीड़े - मकोड़ोंकी भाँति आहारका संग्रह करते - करते ही नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है; अतः जो आसक्तिसे रहित हैं, वे ही इस संसारमें सुखी हैं । आसक्त मनुष्योंका तो नाश ही होता है ' ॥ १३-१४ ॥
स्वजने न च ते चिन्ता कर्तव्या मोक्षबुद्धिना ।
इमे मया विनाभूता भविष्यन्ति कथं त्विति ॥ १५ ॥
' यदि तुम्हारी बुद्धि मोक्षमें लगी हुई है तो तुम्हें स्वजनोंके विषयमें ऐसी चिन्ता नहीं करनी चाहिये कि ये मेरे बिना कैसे रहेंगे' ॥ १५ ॥
स्वयमुत्पद्यते जन्तुः स्वयमेव विवर्धते ।
सुखदुःखे तथा मृत्युं स्वयमेवाधिगच्छति ॥ १६ ॥
' प्राणी स्वयं जन्म लेता है, स्वयं बढ़ता है और स्वयं ही सुख-दुःख तथा मृत्युको प्राप्त होता है ' ॥ १६ ॥
भोजनाच्छादने चैव मात्रा पित्रा च संग्रहम् ।
स्वकृतेनाधिगच्छन्ति लोके नास्त्यकृतं पुरा ॥ १७ ॥
'मनुष्य पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार ही भोजन, वस्त्र तथा अपने माता - पिताके द्वारा संग्रह किया हुआ धन प्राप्त करता है । संसारमें जो कुछ मिलता है, वह पूर्वकृत कर्मोंके फलके अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है ' ॥
धात्रा विहितभक्ष्याणि सर्वभूतानि मेदिनीम् ।
लोके विपरिधावन्ति रक्षितानि स्वकर्मभिः ॥ १८ ॥
‘ संसारमें सभी प्राणी अपने कर्मोंसे सुरक्षित हो सारी पृथ्वीकी दौड़ लगाते हैं और विधाताने उनके प्रारब्धके अनुसार जो आहार नियत कर दिया है, उसे प्राप्त करते हैं' ॥ १८ ॥
स्वयं मृत्पिण्डभूतस्य परतन्त्रस्य सर्वदा ।
को हेतुः स्वजनं पोष्टुं रक्षितुं वादृढात्मनः ॥ १ ९ ॥
‘जो स्वयं ही शरीरकी दृष्टिसे मिट्टीका लोंदामात्र है, सर्वदा परतन्त्र है, वह अदृढ़ मनवाला मनुष्य स्वजनोंका पोषण और रक्षण करनेमें कैसे समर्थ हो सकता है? ' ॥ १ ९ ॥ स्वजनं हि यदा मृत्युर्हन्त्येव तव पश्यतः ।
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कृतेऽपि यत्ने महति तत्र बोद्धव्यमात्मना ॥ २० ॥
‘ जब स्वजनोंको तुम्हारे देखते -देखते ही मौत मार ही डालती है और तुम उन्हें बचानेके लिये महान् प्रयत्न करनेपर भी सफल नहीं हो पाते, तब इस विषयमें तुम्हें स्वयं ही यह विचार करना चाहिये कि मेरी क्या शक्ति है? ' ॥ २० ॥
जीवन्तमपि चैवैनं भरणे रक्षणे तथा ।
असमाप्ते परित्यज्य पश्चादपि मरिष्यसि ॥ २१ ॥
' यदि वे स्वजन जीवित रह जायँ तो भी इनके भरण- पोषण और संरक्षणका कार्य समाप्त होनेसे पहले ही तुम इन्हें छोड़कर पीछे स्वयं भी तो मर जाओगे' ॥ २१ ॥
यदा मृतं च स्वजनं न ज्ञास्यसि कदाचन ।
सुखितं दुःखितं वापि ननु बोद्धव्यमात्मना ॥ २२ ॥
‘ अथवा जब कोई स्वजन मरकर इस लोकसे चला जायगा, तब उसके विषयमें यह कभी नहीं जान सकोगे कि वह सुखी है या दुखी, अतः इस विषयमें तुम्हें स्वयं ही विचार करना चाहिये ' ॥ २२ ॥
मृते वा त्वयि जीवे वा यदा भोक्ष्यति वै जनः ।
स्वकृतं ननु बुद्ध्यैवं कर्तव्यं हितमात्मनः ॥ २३ ॥
' तुम जीवित रहो या मर जाओ । तुम्हारा प्रत्येक स्वजन जब अपनी- अपनी करनीका ही फल भोगेगा, तब इस बातको जानकर तुम्हें भी अपने कल्याणके लिये साधनमें लग जाना चाहिये ' ॥ २३ ॥
एवं विजान् लोकेऽस्मिन् कः कस्येत्यभिनिश्चितः ।
मोक्षे निवेशय मनो भूयश्चाप्युपधारय ॥ २४ ॥
' ऐसा जानकर इस संसारमें कौन किसका है, इस बातका भलीभाँति विचार करके अपने मनको मोक्षमें लगा दो और साथ ही पुन: इस बातपर ध्यान दो ' ॥
क्षुत्पिपासादयो भावा जिता यस्येह देहिनः ।
क्रोधो लोभस्तथा मोहः सत्त्ववान् मुक्त एव सः ॥ २५ ॥
'जिसने क्षुधा, पिपासा, क्रोध, लोभ और मोह आदि भावोंपर विजय पा ली है, वह सत्त्वसम्पन्न पुरुष सदा मुक्त ही है ' ॥ २५ ॥
द्यूते पाने तथा स्त्रीषु मृगयायां च यो नरः ।
न प्रमाद्यति सम्मोहात् सततं मुक्त एव सः ॥ २६ ॥
‘ जो मोहवश जूआ, मद्यपान, परस्त्रीसंसर्ग तथा मृगया आदि व्यसनोंमें आसक्त होनेका प्रमाद नहीं करता है, वह भी सदा मुक्त ही है ' ॥ २६ ॥
दिवसे दिवसे नाम रात्रौ रात्रौ पुमान् सदा ।
भोक्तव्यमिति यः खिन्नो दोषबुद्धिः स उच्यते ॥ २७ ॥
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'जो पुरुष सदा प्रत्येक दिन और प्रत्येक रात्रिमें भोग भोगने या भोजन करनेकी ही चिन्तामें पड़कर दुःखी रहता है, वह दोषबुद्धिसे युक्त कहलाता है ' ॥ २७ ॥
आत्मभावं तथा स्त्रीषु मुक्तमेव पुनः पुनः ।
यः पश्यति सदा युक्तो यथावन्मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
जो सदा योगयुक्त रहकर स्त्रियोंके प्रति अपने भाव ( अनुराग या आसक्ति) -को निवृत्त हुआ ही देखता है अर्थात् जिसकी स्त्रियोंके प्रति भोग्यबुद्धि नहीं होती, वही वास्तवमें मुक्त है ' ॥ २८ ॥
सम्भवं च विनाशं च भूतानां चेष्टितं तथा ।
यस्तत्त्वतो विजानाति लोकेऽस्मिन् मुक्त एव सः ॥ २ ९ ॥
' जो प्राणियोंके जन्म, मृत्यु और चेष्टाओंको ठीक-ठीक जानता है, वह भी इस संसारमें मुक्त ही है' ॥
प्रस्थं वाहसहस्रेषु यात्रार्थं चैव कोटिषु ।
प्रासादे मञ्चकं स्थानं यः पश्यति स मुच्यते ॥ ३० ॥
'जो हजारों और करोड़ों गाड़ी अन्नमेंसे केवल एक प्रस्थ ( पेट भरने लायक ) - को ही अपने जीवन- निर्वाहके लिये पर्याप्त समझता है ( उससे अधिकका संग्रह करना नहीं चाहता ) तथा बड़े- से- बड़े महलमें मञ्च बिछाने भरकी जगहको ही अपने लिये पर्याप्त समझता है, वह मुक्त हो जाता है ' ॥ ३० ॥
मृत्युनाभ्याहतं लोकं व्याधिभिश्चोपपीडितम् ।
अवृत्तिकर्शितं चैव यः पश्यति स मुच्यते ॥ ३१ ॥
' जो इस जगत्को रोगोंसे पीड़ित, जीविकाके अभावसे दुर्बल और मृत्युके आघातसे नष्ट हुआ देखता है, वह मुक्त हो जाता है ' ॥ ३१ ॥
यः पश्यति स संतुष्टो न पश्यंश्च विहन्यते ।
यश्चाप्यल्पेन संतुष्टो लोकेऽस्मिन् मुक्त एव सः ॥ ३२ ॥
' जो ऐसा देखता है, वह संतुष्ट एवं मुक्त होता है; किंतु जो ऐसा नहीं देखता, वह मारा जाता है— जन्म, मृत्युके चक्रमें पड़ा रहता है । जो थोड़ेसे लाभमें ही संतुष्ट रहता है, वह इस जगत्में मुक्त ही है ' ॥ ३२ ॥
अग्नीषोमाविदं सर्वमिति यश्चानुपश्यति ।
न च संस्पृश्यते भावैरद्भुतैर्मुक्त एव सः ॥ ३३ ॥
‘ जो इस सम्पूर्ण जगत्को अग्नि और सोम ( भोक्ता और भोज्य) रूप ही देखता है और स्वयंको उनसे भिन्न समझता है, उसे मायाके अद्भुत भाव---सुख -दुःख आदि छू नहीं सकते । वह सर्वथा मुक्त ही है ' ॥ ३३ ॥
पर्यङ्कशय्या भूमिश्च समाने यस्य देहिनः ।
शालयश्च कदन्नं च यस्य स्यान्मुक्त एव सः ॥ ३४ ॥
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‘जिस देहधारीके लिये पलंगकी सेज और भूमि—दोनों समान है; जो अगहनीके चावल और कोदो आदिको एक- सा समझता है, वह मुक्त ही है ' ॥ ३४ ॥
क्षौमं च कुशचीरं च कौशेयं वल्कलानि च ।
आविकं चर्म च समं यस्य स्यान्मुक्त एव सः ॥ ३५ ॥
‘ जिसके लिये सनके वस्त्र, कुशके चीर, रेशमी वस्त्र, वल्कल, ऊनी वस्त्र और मृगचर्म – सब समान हैं, वह भी मुक्त ही है ' ॥ ३५ ॥
पञ्चभूतसमुद्भूतं लोकं यश्चानुपश्यति ।
तथा च वर्तते दृष्ट्वा लोकेऽस्मिन् मुक्त एव सः ॥ ३६ ॥
‘ जो संसारको पाञ्चभौतिक देखता और उस दृष्टिके अनुसार ही बर्ताव करता है, वह भी इस जगत्में मुक्त ही है ' ॥ ३६ ॥
सुखदुःखे समे यस्य लाभालाभौ जयाजयौ ।
इच्छाद्वेषौ भयोद्वेगौ सर्वथा मुक्त एव सः ॥ ३७ ॥
‘जिसकी दृष्टिमें सुख - दुःख, लाभ-हानि, जय- पराजय सम है तथा जिसके इच्छा- द्वेष, भय और उद्वेग सर्वथा नष्ट हो गये हैं, वही मुक्त है ' ॥ ३७ ॥
रक्तमूत्रपुरीषाणां दोषाणां संचयांस्तथा ।
शरीरं दोषबहुलं दृष्ट्वा चैव विमुच्यते ॥ ३८ ॥
‘ यह शरीर क्या है, बहुत- से दोषोंका भण्डार । इसमें रक्त, मल- मूत्र तथा और भी अनेक दोषोंका संचय हुआ है । जो इस बातको देखता और समझता है, वह मुक्त हो जाता है ' ॥ ३८ ॥
वलीपलितसंयोगे कार्थ्यं वैवर्ण्यमेव च ।
कुब्जभावं च जरया यः पश्यति स मुच्यते ॥ ३ ९ ॥
' बुढ़ापा आनेपर इस शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं । सिरके बाल सफेद हो जाते हैं । देह दुबली- पतली एवं कान्तिहीन हो जाती है तथा कमर झुक जानेके कारण मुनष्य कुबड़ा- सा हो जाता है । इन सब बातोंकी ओर जिसकी सदा ही दृष्टि रहती है, वह मुक्त हो जाता है ' ॥ ३ ९ ॥
पुंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोपरमं तथा ।
बाधिर्यं प्राणमन्दत्वं यः पश्यति स मुच्यते ॥ ४० ॥
‘ समय आनेपर पुरुषत्व नष्ट हो जाता है, आँखोंसे दिखायी नहीं देता है, कान बहरे हो जाते हैं और प्राणशक्ति अत्यन्त क्षीण हो जाती है । इन सब बातोंको जो सदा देखता और इनपर विचार करता रहता है, वह संसार- बन्धनसे मुक्त हो जाता है ' ॥ ४० ॥
गतानृषींस्तथा देवानसुरांश्च तथा गतान् ।
लोकादस्मात् परं लोकं यः पश्यति स मुच्यते ॥ ४१ ॥
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‘ कितने ही ऋषि देवता तथा असुर इस लोकसे परलोकको चले गये । जो सदा यह देखता और स्मरण रखता है वह मुक्त हो जाता है ' ॥ ४१ ॥
प्रभावैरन्वितास्तैस्तैः पार्थिवेन्द्राः सहस्रशः ।
ये गताः पृथिवीं त्यक्त्वा इति ज्ञात्वा विमुच्यते ॥ ४२ ॥
‘ सहस्रों प्रभावशाली नरेश इस पृथ्वीको छोड़कर कालके गालमें चले गये । इस बातको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है ' ॥ ४२ ॥
अर्थांश्च दुर्लभाँल्लोके क्लेशांश्च सुलभांस्तथा ।
दुःखं चैव कुटुम्बार्थे यः पश्यति स मुच्यते ॥ ४३ ॥
‘ संसारमें धन दुर्लभ है और क्लेश सुलभ । कुटुम्बके पालन- पोषणके लिये भी जहाँ बहुत दुःख उठाना पड़ता है, यह सब जिसकी दृष्टिमें है, वह मुक्त हो जाता है ' ॥ ४३ ॥
अपत्यानां च वैगुण्यं जनं विगुणमेव च ।
पश्यन् भूयिष्ठशो लोके को मोक्षं नाभिपूजयेत् ॥ ४४ ॥
‘ इतना ही नहीं, इस जगत् में अपनी संतानोंकी गुणहीनताका दुःख भी देखना पड़ता है । विपरीत गुणवाले मनुष्योंसे भी सम्बन्ध हो जाता है । इस प्रकार जो यहाँ अधिकांश कष्ट ही देखता है, ऐसा कौन मनुष्य मोक्षका आदर नहीं करेगा? ' ॥ ४४ ॥
शास्त्राल्लोकाच्च यो बुद्धः सर्वं पश्यति मानवः ।
असारमिव मानुष्यं सर्वथा मुक्त एव सः ॥ ४५ ॥
' जो मनुष्य शास्त्रोंके अध्ययन तथा लौकिक अनुभवसे भी ज्ञानसम्पन्न होकर समस्त मानव- जगत्को सारहीन - सा देखता है, वह सब प्रकारसे मुक्त ही है ' ॥
एतत् श्रुत्वा मम वचो भवांश्चरतु मुक्तवत् ।
गार्हस्थ्ये यदि वा मोक्षे कृता बुद्धिरविक्लवा ॥ ४६ ॥
‘ मेरे इस वचनको सुनकर तुम अपनी बुद्धिको व्याकुलतासे रहित बनाकर गृहस्थाश्रममें या संन्यास- आश्रममें चाहे जहाँ रहकर मुक्तकी भाँति आचरण करो ' ॥
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा सम्यक् स पृथिवीपतिः ।
मोक्षजैश्च गुणैर्युक्तः पालयामास च प्रजाः ॥ ४७ ॥
राजा सगर अरिष्टनेमिके उपर्युक्त उपदेशको भलीभाँति सुनकर मोक्षोपयोगी गुणोंसे सम्पन्न हो प्रजाका पालन करने लगे ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सगरारिष्टनेमिसंवादेऽष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सगर और अरिष्टनेमिका संवादविषयक दो सौ अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८८ ॥
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एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः भृगुपुत्र उशनाका चरित्र और उन्हें शुक्र नामकी प्राप्ति युधिष्ठिर उवाच
तिष्ठते मे सदा तात कौतूहलमिदं हृदि ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुपितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- तात! कुरुकुलके पितामह! मेरे हृदयमें चिरकालसे यह एक कौतूहलपूर्ण प्रश्न खड़ा है, जिसका समाधान मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
कथं देवर्षिरुशना सदा काव्यो महामतिः ।
असुराणां प्रियकरः सुराणामप्रिये रतः ॥ २ ॥
परम बुद्धिमान् कवित्वसम्पन्न देवर्षि उशना क्यों सदा ही असुरोंका प्रिय तथा देवताओंका अप्रिय करनेमें लगे रहते हैं? ॥ २ ॥
वर्धयामास तेजश्च किमर्थममितौजसाम् ।
नित्यं वैरनिबद्धाश्च दानवाः सुरसत्तमैः ॥ ३ ॥
उन्होंने अमित तेजस्वी दानवोंका तेज किसलिये बढ़ाया? दानव तो सदा श्रेष्ठ देवताओंके साथ वैर ही बाँधे रहते हैं ॥ ३ ॥
कथं चाप्युशना प्राप शुक्रत्वममरद्युतिः ।
ऋद्धिं च स कथं प्राप्तः सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ४ ॥
देवोपम तेजस्वी मुनिवर उशनाका नाम शुक्र क्यों हो गया? उन्हें ऋद्धि कैसे प्राप्त हुई? यह सब मुझे बताइये ॥ ४ ॥
न याति च स तेजस्वी मध्येन नभसः कथम् ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं निखिलेन पितामह ॥ ५ ॥
पितामह! देवर्षि उशना हैं तो बड़े तेजस्वी; परंतु वे आकाशके बीचसे होकर क्यों नहीं जाते? इन सब बातोंको मैं पूर्णरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितः सर्वमेतद् यथातथम् ।
यथामति यथा चैतच्छ्रुतपूर्वं मयानघ ॥ ६ ॥
भीष्मजीने कहा – निष्पाप नरेश! मैंने इन सब बातोंको पहले जिस तरह सुन रखा है, वह सारा वृत्तान्त अपनी बुद्धिके अनुसार यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६ ॥
एष भार्गवदायादो मुनिर्मान्यो दृढव्रतः ।
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सुराणां विप्रियकरो निमित्ते कारणात्मके ॥ ७ ॥
ये भृगुपुत्र मुनिवर उशना सबके लिये माननीय तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं । एक विशेष कारण बन जानेसे रुष्ट होकर ये देवताओंके विरोधी हो गये * ॥ ७ ॥
इन्द्रोऽथ धनदो राजा यक्षरक्षोऽधिपः सदा ।
प्रभविष्णुश्च कोशस्य जगतश्च तथा प्रभुः ॥ ८ ॥
उस समय इन्द्र तीनों लोकोंके अधीश्वर थे और सदा यक्षों तथा राक्षसोंके अधिपति प्रभावशाली जगत्पति राजा कुबेर उनके कोषाध्यक्ष बनाये गये थे ॥ ८ ॥
तस्यात्मानमथाविश्य योगसिद्धो महामुनिः ।
रुद्ध्वा धनपतिं देवं योगेन हृतवान् वसु ॥ ९ ॥
योगसिद्ध महामुनि उशनाने योगबलसे धनाध्यक्ष कुबेरके भीतर प्रवेश करके उन्हें अपने काबूमें कर लिया और उनके सारे धनका अपहरण कर लिया ॥ ९ ॥
हृते धने ततः शर्म न लेभे धनदस्तथा ।
आपन्नमन्युः संविग्नः सोऽभ्यगात् सुरसत्तमम् ॥ १० ॥
धनका अपहरण हो जानेपर कुबेरको चैन नहीं पड़ा । वे कुपित और उद्विग्न होकर देवेश्वर महादेवजीके पास गये ॥ १० ॥
निवेदयामास तदा शिवायामिततेजसे ।
देवश्रेष्ठाय रुद्राय सौम्याय बहुरूपिणे ॥ ११ ॥
उस समय उन्होंने अमित तेजस्वी अनेक रूपधारी सौम्य एवं शिवस्वरूप देवेश्वर रुद्रसे इस प्रकार निवेदन किया ॥ ११ ॥
योगात्मकेनोशनसा रुद्ध्वा मम हृतं वसु ।
योगेनात्मगतं कृत्वा निःसृतश्च महातपाः ॥ १२ ॥
‘ प्रभो! महर्षि उशना योगबलसे सम्पन्न हैं । उन्होंने अपनी शक्तिसे मुझे बंदी बनाकर मेरा सारा धन हर लिया । वे महान् तपस्वी तो हैं ही, योगबलसे मुझे अपने अधीन करके अपना काम बनाकर निकल गये ' ॥ १२ ॥
एतच्छ्रुत्वा ततः क्रुद्धो महायोगी महेश्वरः ।
संरक्तनयनो राजन् शूलमादाय तस्थिवान् ॥ १३ ॥
राजन्! यह सुनकर महायोगी महेश्वर कुपित हो गये और लाल आँखें किये हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हो गये ॥ १३ ॥
क्वासौ क्वासाविति प्राह गृहीत्वा परमायुधम् ।
उशना दूरतस्तस्य बभौ ज्ञात्वा चिकीर्षितम् ॥ १४ ॥
उस उत्तम अस्त्रको लेकर वे सहसा बोल उठे - ' कहाँ है, कहाँ है वह उशना? ' महादेवजी क्या करना चाहते हैं, यह जानकर उशना उनसे दूर हो गये ॥ १४ ॥
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स महायोगिनो बुद्ध्वा तं रोषं वै महात्मनः ।
गतिमागमनं वेत्ति स्थानं चैव ततः प्रभुः ॥ १५ ॥
महायोगी महात्मा भगवान् शिवके उस रोषको समझकर वे उनसे दूर हट गये थे, योगसिद्ध उशना, गमन, आगमन और स्थानको जानते थे । अर्थात् कब हटना चाहिये, कब आना चाहिये, तथा किस अवस्थामें कहीं अन्यत्र न जाकर अपने स्थानपर ही ठहरे रहना चाहिये, इन सब बातोंको वे अच्छी तरह समझते थे ॥
संचिन्त्योग्रेण तपसा महात्मानं महेश्वरम् ।
उशना योगसिद्धात्मा शूलाग्रे प्रत्यदृश्यत ॥ १६ ॥
योगसिद्धात्मा उशना अपनी उग्र तपस्याद्वारा महात्मा महेश्वरका चिन्तन करके उनके त्रिशूलके अग्रभागमें दिखायी दिये ॥ १६ ॥
विज्ञातरूपः स तदा तपःसिद्धोऽथ धन्विना ।
ज्ञात्वा शूलं च देवेशः पाणिना समनामयत् ॥ १७ ॥
तपःसिद्ध शुक्राचार्यको उस रूपमें पहचानकर देवेश्वर शिवने उन्हें शूलपर स्थित जानकर अपने अनुषयुक्त हाथसे उस शूलको झुका दिया ॥ १७ ॥
आनतेनाथ शूलेन पाणिनामिततेजसा ।
पिनाकमिति चोवाच शूलमुग्रायुधः प्रभुः ॥ १८ ॥
जब अमित तेजस्वी शूल उनके हाथसे मुड़कर धनुषके रूपमें परिणत हो गया, तब उग्र धनुर्धर भगवान् शिवने पाणिसे आनत होनेके कारण उस शूलको ' पिनाक ' कहा ॥ १८ ॥
पाणिमध्यगतं दृष्ट्वा भार्गवं तमुमापतिः ।
आस्यं विवृत्य ककुदी पाणिना प्राक्षिपच्छनैः ॥ १ ९ ॥
उसके मुड़नेके साथ ही भृगुपुत्र उशना उनके हाथमें आ गये, उशनाको हाथमें आया देख देवेश्वर उमावल्लभ भगवान् शिवने मुँह फैला लिया और धीरेसे हाथका धक्का देकर उशनाको मुखके भीतर डाल दिया ॥ १ ९ ॥
स तु प्रविष्ट उशना कोष्ठं माहेश्वरं प्रभुः ।
व्यचरच्चापि तत्रासौ महात्मा भृगुनन्दनः ॥ २० ॥
महादेवजीके पेटमें घुसकर प्रभावशाली महामना भृगुनन्दन उशना उसके भीतर सब ओर विचरने लगे || युधिष्ठिरउवाच
किमर्थं व्यचरद् राजन्नुशना तस्य धीमतः ।
जठरे देवदेवस्य किं चाकार्षीन्महाद्युतिः ॥ २१ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- राजन्! महातेजस्वी उशनाने बुद्धिमान् देवाधिदेव महादेवजीके उदरमें किसलिये विचरण किया और वहाँ क्या किया? ॥ २१ ॥