05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2081–2090
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2081–2090
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सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः विभिन्न अंगोंसे प्राणोंके उत्क्रमणका फल तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका वर्णन और मृत्युको जीतनेका उपाय याज्ञवल्क्य उवाच
तथैवोत्क्रममाणं तु शृणुष्वावहितो नृप ।
पद्भ्यामुत्क्रममाणस्य वैष्णवं स्थानमुच्यते ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - नरेश्वर! देह त्यागके समय मनुष्यके जिन-जिन अंगोंसे निकलकर प्राण जिन -जिन ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, उनके विषयमें बता रहा हूँ; तुम सावधान होकर सुनो । पैरोंके मार्गसे प्राणोंके उत्क्रमण करनेपर मनुष्यको भगवान् विष्णुके परमधामकी प्राप्ति होती बतायी जाती है ॥ १ ॥
जङ्घाभ्यां तु वसून् देवानाप्नुयादिति नः श्रुतम् ।
जानुभ्यां च महाभागान् साध्यान् देवानवाप्नुयात् ॥ २ ॥
जिसके प्राण दोनों पिण्डलियोंके मार्गसे बाहर निकलते हैं, वह वसु नामक देवताओंके लोकमें जाता है; ऐसा हमने सुन रक्खा है। घुटनोंसे प्राणत्याग करनेपर महाभाग साध्य -देवताओंके लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥
पायुनोत्क्रममाणस्तु मैत्रं स्थानमवाप्नुयात् ।
पृथिवीं जघनेनाथ ऊरुभ्यां च प्रजापतिम् ॥ ३ ॥
जिसके प्राण गुदामार्गसे निकलकर ऊपरकी ओर जाते हैं, वह मित्रदेवताके उत्तम स्थानको पाता है । कटिके अग्रभागसे प्राण निकलनेपर पृथ्वीलोककी और दोनों जाँघोंसे निकलनेपर प्रजापतिलोककी प्राप्ति होती है ॥
पार्श्वाभ्यां मरुतो देवान् नाभ्यामिन्द्रत्वमेव च ।
बाहुभ्यामिन्द्रमेवाहुरुरसा रुद्रमेव च ॥ ४ ॥
दोनों पसलियोंसे प्राणोंका निष्क्रमण हो तो मरुत् नामक देवताओंकी, नाभिसे हो तो इन्द्रपदकी, दोनों भुजाओंसे हो तो भी इन्द्रपदकी ही और वक्षःस्थलसे हो तो रुद्रलोककी प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥
ग्रीवया तु मुनिश्रेष्ठं नरमाप्नोत्यनुत्तमम् ।
विश्वेदेवान् मुखेनाथ दिशः श्रोत्रेण चाप्नुयात् ॥ ५ ॥
ग्रीवासे प्राणोंका निष्क्रमण होनेपर मनुष्य मुनियोंमें श्रेष्ठ परम उत्तम नरका सांनिध्य प्राप्त करता है । मुखसे प्राणत्याग करनेपर वह विश्वेदेवोंको और श्रोत्रसे
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प्राण त्यागनेपर दिशाओंकी अधिष्ठात्री देवियोंको प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
घ्राणेन गन्धवहनं नेत्राभ्यामग्निमेव च ।
भ्रूभ्यां चैवाश्विनौ देवौ ललाटेन पितॄनथ ॥ ६ ॥
नासिकासे प्राणोंका उत्क्रमण हो तो मनुष्य वायुदेवताको, दोनों नेत्रोंसे हो तो अग्निदेवताको, दोनों भौंहोंसे हो तो अश्विनीकुमारोंको और ललाटसे हो तो पितरोंको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
ब्रह्माणमाप्नोति विभुं मूर्ध्ना देवाग्रजं तथा ।
एतान्युत्क्रमणस्थानान्युक्तानि मिथिलेश्वर ॥ ७ ॥
मस्तकसे प्राणोंका परित्याग करनेपर मनुष्य देवताओंके अग्रज भगवान् ब्रह्माजीके लोकको जाता है । मिथिलेश्वर! ये प्राणोंके निष्क्रमणके स्थान बताये गये हैं ॥ ७ ॥
अरिष्टानि प्रवक्ष्यामि विहितानि मनीषिभिः ।
संवत्सरवियोगस्य सम्भवन्ति शरीरिणः ॥ ८ ॥
अब मैं ज्ञानी पुरुषोंद्वारा नियत किये हुए अमंगल अथवा मृत्युको सूचित करनेवाले उन चिह्नोंका वर्णन करता हूँ, जो देहधारीके शरीर छूटने में केवल एक वर्ष शेष रह जानेपर उसके सामने प्रकट होते हैं ॥ ८ ॥
योऽरुन्धतीं न पश्येत दृष्टपूर्वां कदाचन ।
तथैव ध्रुवमित्याहुः पूर्णेन्दुं दीपमेव च ॥ ९ ॥
खण्डाभासं दक्षिणतस्तेऽपि संवत्सरायुषः । जो कभी पहलेकी देखी हुई अरुन्धती और ध्रुवको न देख पाता हो तथा पूर्णचन्द्रमाका मण्डल और दीपककी शिखा जिसे दाहिने भागसे खण्डित जान पड़े, ऐसे लोग केवल एक वर्षतक जीवित रहनेवाले होते हैं ॥ ९ ३ ॥ परचक्षुषि चात्मानं ये न पश्यन्ति पार्थिव ॥ १० ॥
आत्मच्छायाकृतीभूतं तेऽपि संवत्सरायुषः । पृथ्वीनाथ! जो लोग दूसरेके नेत्रोंमें अपनी परछाईं न देख सकें, उनकी आयु भी एक ही वर्षतक शेष समझनी चाहिये ॥ १०३ ॥
अतिद्युतिरतिप्रज्ञा अप्रज्ञा चाद्युतिस्तथा ॥ ११ ॥
प्रकृतेर्विक्रियापत्तिः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् । यदि मनुष्यकी बहुत बढ़ी -चढ़ी कान्ति भी अत्यन्त फीकी पड़ जाय, अधिक बुद्धिमत्ता भी बुद्धिहीनतामें परिणत हो जाय और स्वभावमें भी भारी उलट-फेर हो जाय तो यह उसके छः महीनेके भीतर ही होनेवाली मृत्युका सूचक है ॥ ११ || दैवतान्यवजानाति ब्राह्मणैश्च विरुद्ध्यते ॥ १२ ॥
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कृष्णश्यावच्छविच्छायः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् । जो काले रंगका होकर भी पीला पड़ने लगे, देवताओंका अनादर करे और ब्राह्मणोंके साथ विरोध करे, वह भी छः महीनेसे अधिक नहीं जी सकता, यह उक्त लक्षणोंसे सूचित होता है ॥ १२३ ॥
ऊर्णनाभेर्यथा चक्रं छिद्रं सोमं प्रपश्यति ॥ १३ ॥
तथैव च सहस्रांशुं सप्तरात्रेण मृत्युभाक् । जो मनुष्य सूर्य और चन्द्रमाके मण्डलको मकड़ीके जालेके समान छिद्रयुक्त देखता है, वह सात रातमें ही मृत्युका भागी होता है ॥ १३३ ॥
शवगन्धमुपाघ्राति सुरभिं प्राप्य यो नरः ॥ १४ ॥
देवतायतनस्थस्तु सप्तरात्रेण मृत्युभाक् । जो देवमन्दिरमें बैठकर वहाँकी सुगन्धित वस्तुमें सड़े मुर्देकी - सी दुर्गन्धका अनुभव करता है, वह सात दिनमें ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है ॥ १४३ ॥
कर्णनासावनमनं दन्तदृष्टिविरागिता ॥ १५ ॥
संज्ञालोपो निरूष्मत्वं सद्योमृत्युनिदर्शनम् ।
अकस्माच्च स्रवेद् यस्य वाममक्षि नराधिप ॥ १६ ॥
मूर्धतश्चोत्पतेद् धूमः सद्यो मृत्युनिदर्शनम् । नरेश्वर! जिसके नाक और कान टेढ़े हो जायँ, दाँत और नेत्रोंका रंग बिगड़ जाय, जिसे बेहोशी होने लगे, जिसका शरीर ठंडा पड़ जाय तथा जिसकी बायीं आँखसे अकस्मात् आँसू बहने और मस्तकसे धुआँ उठने लगे, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है । उपर्युक्त लक्षण तत्काल होनेवाली मृत्युके सूचक हैं ॥ एतावन्ति त्वरिष्टानि विदित्वा मानवोऽऽत्मवान् ॥ १७ ॥
निशि चाहनि चात्मानं योजयेत् परमात्मनि ।
प्रतीक्षमाणस्तत्कालं यत्कालं प्रेतता भवेत् ॥ १८ ॥
इन मृत्युसूचक लक्षणोंको जानकर मनको वशमें रखनेवाला साधक रात-दिन परमात्माका ध्यान करे और जिस समय मृत्यु होनेवाली हो, उस कालकी प्रतीक्षा करता रहे ॥ १७-१८ ॥
अथास्य नेष्टं मरणं स्थातुमिच्छेदिमां क्रियाम् ।
सर्वगन्धान् रसांश्चैव धारयीत नराधिप ॥ १ ९ ॥
नरेश्वर! यदि योगीको मृत्यु अभीष्ट न हो, अभी वह इस जगत् में रहना चाहे तो यह क्रिया करे । पूर्वोक्त रीतिसे पंचभूतविषयक धारणा करके पृथ्वी आदि तत्त्वोंपर विजय प्राप्त करते हुए सम्पूर्ण गन्धों, रसों तथा रूप आदि विषयोंको अपने वशमें करें* ॥ १ ९ ॥
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ससांख्यधारणं चैव विदितात्मा नरर्षभ ।
जयेच्च मृत्युं योगेन तत्परेणान्तरात्मना ॥ २० ॥
नरश्रेष्ठ! सांख्य और योगके अनुसार धारणा - पूर्वक आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करके ध्यानयोगके द्वारा अन्तरात्माको परमात्मामें लगा देनेसे योगी मृत्युको जीत लेता है ॥ २० ॥
गच्छेत् प्राप्याक्षयं कृत्स्नमजन्म शिवमव्ययम् ।
शाश्वतं स्थानमचलं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ २१ ॥
ऐसा करनेसे वह उस सनातन पदको प्राप्त करता है, जो अशुद्ध चित्तवाले पुरुषोंको दुर्लभ है तथा जो अक्षय, अजन्मा, अचल, अविकारी, पूर्ण एवं कल्याणमय है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ सतरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१७ ॥
O * धारणाद्वारा पंचभूतोंपर विजय या अधिकार प्राप्त करके योगी जन्म, जरा, मृत्यु आदिको जीत लेता है; इस विषयमें यह सूत्र भी प्रमाण है- पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पंचात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥ ‘ ध्यानयोगका साधन करते- करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश –इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्निमय शरीरको प्राप्त कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमें न तो रोग होता है, न बुढ़ापा आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है । अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता ( योगद ० ३।४६, ४७ ) ।
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अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फल मुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तस्थं परं यत् तत् पृष्टस्तेऽहं नराधिप ।
परं गुह्यमिमं प्रश्नं शृणुष्वावहितो नृप ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - नरेश्वर! तुमने जो मुझसे अव्यक्तमें स्थित परब्रह्मके
विषयमें प्रश्न किया है, वह अत्यन्त गूढ़ है । उसके विषयमें ध्यान देकर सुनो ॥
यथाऽऽर्षेणेह विधिना चरताऽवनतेन ह ।
मयाऽऽदित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप ॥ २ ॥
मिथिलापते! पूर्वकालमें मैंने शास्त्रोक्त विधिसे व्रतका आचरण करते हुए नतमस्तक होकर भगवान् सूर्यसे जिस प्रकार शुक्लयजुर्वेदके मन्त्र उपलब्ध किये थे, वह सब प्रसंग सुनो ॥ २ ॥
महता तपसा देवस्तपिष्णुः सेवितो मया ।
प्रीतेन चाहं विभुना सूर्येणोक्तस्तदानघ ॥ ३ ॥
निष्पाप नरेश! पहलेकी बात है, मैंने बड़ी भारी तपस्या करके तपनेवाले भगवान्
सूर्यकी आराधना की थी । उससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने मुझसे कहा– ॥
वरं वृणीष्व विप्रर्षे यदिष्टं ते सुदुर्लभम् ।
तत् ते दास्यामि प्रीतात्मा मत्प्रसादो हि दुर्लभः ॥ ४ ॥
'ब्रह्मर्षे! तुम्हारी जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगी । वह अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें दे दूँगा; क्योंकि मेरा मन तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट है। मेरा कृपा-प्रसाद प्रायः दुर्लभ है ' ॥ ४ ॥
ततः प्रणम्य शिरसा मयोक्तस्तपतां वरः ।
यजूंषि नोपयुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ॥५ ॥
तब मैंने मस्तक झुकाकर तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यको प्रणाम किया और उनसे कहा— ' प्रभो! मैं शीघ्र ही ऐसे यजुर्मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ ' जो आजसे पहले
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दूसरे किसीके उपयोगमें नहीं आये हैं ' ॥ ५ ॥
ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज ।
सरस्वतीह वाग्भूता शरीरं ते प्रवेक्ष्यति ॥ ६ ॥
ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु ।
विवृतं च ततो मेऽऽस्यं प्रविष्टा च सरस्वती ॥ ७ ॥
तब भगवान् सूर्यने मुझसे कहा– ' ब्रह्मन्! मैं तुम्हें यजुर्वेद प्रदान करता हूँ । तुम अपना मुँह खोलो । वाङ्मयी सरस्वती देवी तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करेंगी । ' यह सुनकर मैंने मुँह खोल दिया और सरस्वती देवी उसमें प्रविष्ट हो गयीं ॥ ६-७ ॥
ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ ।
अविज्ञानादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ॥ ८ ॥
निष्पाप नरेश! सरस्वतीके प्रवेश करते ही मैं तापसे जलने लगा और जलमें घुस गया । महात्मा भास्करकी महिमाको न जानने तथा अपनेमें सहनशीलता न होनेके कारण मुझे उस समय विशेष कष्ट हुआ था ॥ ८ ॥
ततो विदह्यमानं मामुवाच भगवान् रविः ।
मुहूर्तं सह्यतां दाहस्ततः शीतीभविष्यति ॥ ९ ॥
तदनन्तर मुझे तापसे दग्ध होता देख भगवान् सूर्यने कहा- ' तात! तुम दो घड़ीतक इस तापको सहन करो । फिर यह स्वयं ही शीतल एवं शान्त हो जायगा' ॥
शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः ।
प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज ॥ १० ॥
जब मैं पूर्ण शीतल हो गया, तब मुझे देखकर भगवान् भास्करने कहा — ‘ विप्रवर! खिल और उपनिषदों - सहित सम्पूर्ण वेद तुम्हारे भीतर प्रतिष्ठित होंगे ॥ १० ॥
कृत्स्नं शतपथं चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ ।
तस्यान्ते चापुनर्भावे बुद्धिस्तव भविष्यति ॥ ११ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! तुम सम्पूर्ण शतपथका भी प्रणयन ( सम्पादन) करोगे । इसके बाद तुम्हारी बुद्धि मोक्षमें स्थिर होगी ॥ ११ ॥
प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत् सांख्ययोगेप्सितं पदम् ।
एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्तत ॥ १२ ॥
' तुम उस अभीष्ट पदको प्राप्त करोगे, जिसे सांख्यवेत्ता तथा योगी भी पाना चाहते हैं । ' इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अदृश्य हो गये ॥ १२ ॥
ततोऽनुव्याहृतं श्रुत्वा गते देवे विभावसौ ।
गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तयं वै सरस्वतीम् ॥ १३ ॥
मैंने सूर्यदेवका वह कथन सुना । फिर जब वे चले गये, तब मैंने घर आकर प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका चिन्तन किया ॥ १३ ॥
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ततः प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता ।
ओङ्कारमादितः कृत्वा मम देवी सरस्वती ॥ १४ ॥
मेरे स्मरण करते ही स्वर और व्यंजन - वर्णोंसे विभूषित अत्यन्त मंगलमयी सरस्वतीदेवी ॐकारको आगे करके मेरे सम्मुख प्रकट हुईं ॥ १४ ॥
ततोऽहमर्घ्यं विधिवत् सरस्वत्यै न्यवेदयम् ।
तपतां च वरिष्ठाय निषण्णस्तत्परायणः ॥ १५ ॥
तब मैंने सरस्वतीदेवी तथा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् भास्करको अर्घ्य निवेदन किया और उन्हींका चिन्तन करता हुआ बैठ गया ॥ १५ ॥
ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् ।
चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥ १६ ॥
उस समय बड़े हर्षके साथ मैंने रहस्य, संग्रह और परिशिष्टभागसहित समस्त शतपथका संकलन किया ॥ १६ ॥
कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् ।
विप्रियार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ॥ १७ ॥
ततः सशिष्येण मया सूर्येणेव गभस्तिभिः ।
व्यस्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ॥ १८ ॥
महाराज! तदनन्तर मैंने अपने सौ उत्तम शिष्योंको शतपथका अध्ययन कराया । इसके बाद शिष्यसहित अपने महामनस्वी मामाका ( जो पहले मुझे तिरस्कृत कर चुके थे ) अप्रिय करनेके लिये किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यकी भाँति शिष्योंसे सुशोभित हो मैंने तुम्हारे पिता महात्मा राजा जनकके यज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ १७-१८ ॥
मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्थं हृतवानहम् ।
स्ववेददक्षिणायार्थे विमर्दे मातुलेन ह ॥ १ ९ ॥
उस समय अपने वेदकी दक्षिणाके लिये मामाके द्वारा विशेष आग्रह होनेपर महर्षि देवलके सामने ही मैंने आधी दक्षिणा उन्हें दे दी और आधी स्वयं ग्रहण की ॥ १ ९ ॥
सुमन्तुनाथ पैलेन तथा जैमिनिना च वै ।
पित्रा ते मुनिभिश्चैव ततोऽहमनुमानितः ॥ २० ॥
तदनन्तर सुमन्तु, पैल, जैमिनि, तुम्हारे पिता तथा अन्य ऋषि- मुनियोंने मेरा बड़ा आदर- सत्कार किया ॥ २० ॥
दश पञ्च च प्राप्तानि यजूंष्यर्कान्मयानघ ।
तथैव रोमहर्षेण पुराणमवधारितम् ॥ २१ ॥
निष्पाप नरेश! इस प्रकार मैंने सूर्यदेवसे शुक्लयजुर्वेदकी पंद्रह शाखाएँ प्राप्त की । इसी तरह रोमहर्षण सूतसे मैंने पुराणोंका अध्ययन किया ॥ २१ ॥
बीजमेतत् पुरस्कृत्य देवीं चैव सरस्वतीम् ।
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सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप ॥ २२ ॥
कर्तुं शतपथं चेदमपूर्वं च कृतं मया ।
यथाभिलषितं मार्गं तथा तच्चोपपादितम् ॥ २३ ॥
नरेश्वर! तदन्तर मैंने बीजरूप प्रणव और सरस्वती देवीको सामने करके भगवान् सूर्यकी कृपासे शतपथकी रचना आरम्भ की और इस अपूर्व ग्रन्थको पूर्ण कर लिया और जो मोक्षका मार्ग मुझे अभीष्ट था, उसका भी भलीभाँति सम्पादन किया ॥ २२-२३ ॥
शिष्याणामखिलं कृत्स्नमनुज्ञातं ससंग्रहम् ।
सर्वे च शिष्याः शुचयो गताः परमहर्षिताः ॥ २४ ॥
फिर मैंने शिष्योंको वह सारा ग्रन्थ रहस्य और संग्रह- सहित पढ़ाया और उन्हें घर जानेकी अनुमति दे दी । फिर वे सभी शुद्ध आचार- विचारवाले शिष्य अत्यन्त हर्षित हो अपने - अपने घरको चले गये ॥ २४ ॥
शाखाः पञ्चदशेमास्तु विद्या भास्करदेशिताः ।
प्रतिष्ठाप्य यथाकामं वेद्यं तदनुचिन्तयम् ॥ २५ ॥
इस प्रकार सूर्यदेवके द्वारा उपदेश की हुई शुक्लयजुर्वेद विद्याकी इन पंद्रह शाखाओंका ज्ञान प्राप्त करके मैंने इच्छानुसार वेद्यतत्त्वका चिन्तन किया है ॥ २५ ॥
किमत्र ब्रह्मण्यमृतं किं च वेद्यमनुत्तमम् ।
चिन्तयंस्तत्र चागत्य गन्धर्वो मामपृच्छत ॥ २६ ॥
विश्वावसुस्ततो राजन् वेदान्तज्ञानकोविदः । राजन्! एक समय वेदान्तज्ञानमें कुशल विश्वावसु नामक गन्धर्व मेरे पास आया एवं इस बातका विचार करते हुए कि यहाँ ब्राह्मण जातिके लिये हितकर क्या है? सत्य और सर्वोत्तम ज्ञातव्य वस्तु क्या है? मुझसे पूछने लगा ॥ २६३ ॥
चतुर्विंशांस्ततोऽपृच्छत् प्रश्नान् वेदस्य पार्थिव ॥ २७ ॥
पञ्चविंशतिमं प्रश्नं पप्रच्छान्वीक्षिकीं तदा ।
विश्वाविश्वं तथाश्वाश्वं मित्रं वरुणमेव च ॥ २८ ॥
पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् उन्होंने वेदके सम्बन्धमें चौबीस प्रश्न पूछे । फिर आन्वीक्षिकी विद्याके सम्बन्धमें पचीसवाँ प्रश्न उपस्थित किया । वे चौबीस प्रश्न इस प्रकार हैं— १. विश्वा क्या है? २. अविश्व क्या है? ३. अश्वा क्या है? ४. अश्व क्या है? ५. मित्र क्या है? ६. वरुण क्या है? ॥ २७-२८ ॥
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञोऽज्ञः कस्तपा अतपास्तथा ।
सूर्याति सूर्य इति च विद्याविद्ये तथैव च ॥ २९ ॥
७. ज्ञान क्या है? ८. ज्ञेय क्या है? ९. ज्ञाता क्या है? १०. अज्ञ क्या है? ११. क कौन है? १२. कौन तपस्वी है? १३. और कौन अतपस्वी है? १४. कौन सूर्य है? १५. तथा कौन अतिसूर्य? १६. और विद्या क्या है? १७. तथा अविद्या क्या है? ॥ २ ९ ॥
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महर्षि याज्ञवल्क्यके स्मरणसे देवी सरस्वतीका प्राकट्य
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वेद्यावेद्यं तथा राजन्नचलं चलमेव च ।
अपूर्वमक्षयं क्षय्यमेतत् प्रश्नमनुत्तमम् ॥ ३० ॥
१८. राजन्! वेद्य क्या है? १ ९. अवेद्य क्या है? २०. चल क्या है? २१. अचल क्या है? २२. अपूर्व क्या है? २३. अक्षय क्या है? २४. और विनाशशील क्या है? ये ही उनके परम उत्तम प्रश्न हैं ॥ ३० ॥
अथोक्तश्च महाराज राजा गन्धर्वसत्तमः ।
पृष्टवाननुपूर्वेण प्रश्नमर्थविदुत्तमम् ॥ ३१ ॥
मुहूर्तमुष्यतां तावद् यावदेवं विचिन्तये ।
बाढमित्येव कृत्वा च तूष्णीं गन्धर्व आस्थितः ॥ ३२ ॥
महाराज! इन प्रश्नोंको सुनकर मैंने गन्धर्वशिरोमणि राजा विश्वावसुसे कहा — ' राजन्! आपने क्रमशः बड़े उत्तम प्रश्न उपस्थित किये हैं । आप अर्थके ज्ञाता हैं । थोड़ी देर ठहर जाइये, तबतक मैं आपके इन प्रश्नोंपर विचार कर लेता हूँ। ' तब ' बहुत अच्छा ' कहकर गन्धर्वराज चुपचाप बैठे रहे ॥ ३१-३२ ॥
ततोऽनुचिन्तयमहं भूयो देवीं सरस्वतीम् ।
मनसा स च मे प्रश्नो दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ॥ ३३ ॥
तदनन्तर मैंने पुनः सरस्वतीदेवीका मन- ही - मन चिन्तन किया । फिर तो जैसे दहीसे घी निकल आता है, उसी प्रकार उन प्रश्नोंका उत्तर निकल आया ॥ ३३ ॥
तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव ।
मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥ ३४ ॥
राजन्! तात! उस समय मैं वहाँ उपनिषद्, उसके परिशिष्ट भाग और परम उत्तम आन्वीक्षिकी विद्यापर दृष्टिपात करके मनके द्वारा उन सबका मन्थन करने लगा ॥ ३४ ॥
चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी ।
उदीरिता मया तुभ्यं पञ्चविंशादधिष्ठिता ॥ ३५ ॥
नृपश्रेष्ठ! यह आन्वीक्षिकीविद्या ( त्रयी, वार्ता और दण्डनीति- इन तीन विद्याओंकी अपेक्षासे ) चौथी बतायी गयी है । यह मोक्षमें सहायक है । पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे अधिष्ठित उस विद्याका मैंने तुमसे प्रतिपादन किया था ( वही विश्वावसुके निकट भी कही गयी ॥
अथोक्तस्तु मया राजन् राजा विश्वावसुस्तदा ।
श्रूयतां यद् भवानस्मान् प्रश्नं सम्पृष्टवानिह ॥ ३६ ॥
राजन्! उस समय मैंने राजा विश्वावसुसे कहा– ' गन्धर्वराज! आपने यहाँ मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर सुनिये ॥ ३६ ॥
विश्वाविश्वेति यदिदं गन्धर्वेन्द्रानुपृच्छसि ।
विश्वाव्यक्तं परं विद्याद् भूतभव्यभयंकरम् ॥ ३७ ॥