05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2091–2100
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2091–2100
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गन्धर्वपते! आपने जो विश्वा और अविश्व इत्यादि कहकर यह प्रश्नावली उपस्थित की है, उसमें विश्वा अव्यक्त प्रकृतिका नाम है। यह संसार- बन्धनमें डालनेवाली होनेके कारण भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें भयंकर है - इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ॥
त्रिगुणं गुणकर्तृत्वादविश्वो निष्कलस्तथा ।
अश्वश्चाश्वा च मिथुनमेवमेवानुदृश्यते ॥ ३८ ॥
इस प्रकार विश्वा नामसे प्रसिद्ध जो अव्यक्त प्रकृति है, वह त्रिगुणमयी है; क्योंकि वही त्रिगुणात्मक जगत्को उत्पन्न करनेवाली है । उससे भिन्न जो निष्कल ( कलाओंसे रहित ) आत्मा है, वही अविश्व कहलाता है । इसी तरह अश्व और अश्वाकी जोड़ी भी देखी जाती है ( अर्थात् अश्वा अव्यक्त प्रकृति है और अश्व पुरुष ) ॥
अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः पुरुषेति च निर्गुणम् ।
तथैव मित्रं पुरुषं वरुणं प्रकृतिं तथा ॥ ३ ९ ॥
अव्यक्त प्रकृतिको सगुण बताया गया है और पुरुषको निर्गुण । इसी प्रकार वरुणको प्रकृति समझना चाहिये और मित्रको पुरुष ॥ ३ ९ ॥
ज्ञानं तु प्रकृतिं प्राहुर्ज्ञेयं निष्कलमेव च ।
अज्ञश्च ज्ञश्च पुरुषस्तस्मान्निष्कल उच्यते ॥ ४० ॥
( भौतिक) ज्ञान शब्दसे प्रकृतिका प्रतिपादन किया गया है और निष्कल आत्माको ज्ञेय बताया गया है । इसी तरह अज्ञ प्रकृति है और उससे भिन्न निष्कल पुरुषको ' ज्ञाता ' बताया गया है ॥ ४० ॥
कस्तपा अतपाः प्रोक्तः कोऽसौ पुरुष उच्यते ।
तपास्तु प्रकृतिं प्राहुरतपा निष्कलः स्मृतः ॥ ४१ ॥
क, तपा और अतपाके विषयमें जो प्रश्न उपस्थित किया गया है, उसके विषयमें बताया जाता है । पुरुषको ही ' क ' कहते हैं । प्रकृतिका ही नाम तपा है और निष्कल पुरुषको अतपा नाम दिया गया है ॥ ४१ ॥
( सूर्यमव्यक्तमित्युक्तमतिसूर्यस्तु निष्कलः । अविद्या प्रकृतिर्ज्ञेया विद्या पुरुष उच्यते ॥ ) अव्यक्त प्रकृतिको ही सूर्य और निष्कल पुरुषको अतिसूर्य कहा गया है । प्रकृतिको अविद्या जानना चाहिये और पुरुष विद्या कहलाता है ॥
तथैवावेद्यमव्यक्तं वेद्यः पुरुष उच्यते ।
चलाचलमिति प्रोक्तं त्वया तदपि मे शृणु ॥ ४२ ॥
इसी तरह अवेद्य नामसे अव्यक्त प्रकृतिका और वेद्य नामसे पुरुषका प्रतिपादन किया जाता है । आपने जो चल और अचलके विषयमें प्रश्न किया है, उसका भी उत्तर सुनिये ॥ ४२ ॥
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चलां तु प्रकृतिं प्राहुः कारणं क्षयसर्गयोः ।
आक्षेपसर्गयोः कर्ता निश्चलः पुरुषः स्मृतः ॥ ४३ ॥
सृष्टि और संहारकी कारणभूता प्रकृतिको ' चला ' कहा गया है और सृष्टि तथा प्रलयका कर्ता पुरुष ही निश्चल पुरुष माना गया है ॥ ४३ ॥
तथैव वेद्यमव्यक्तमवेद्यः पुरुषस्तथा ।
अज्ञावुभौ ध्रुवौ चैव अक्षयौ चाप्युभावपि ॥ ४४ ॥
अजो नित्यावुभौ प्राहुरध्यात्मगतिनिश्चयाः ॥ ४५ ॥
उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृति वेद्य ( जाननेमें आनेवाली ) है और पुरुष अवेद्य ( जाननेमें न आनेवाला) । अध्यात्मतत्त्वका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अज्ञ हैं, दोनों ही निश्चल हैं और दोनों ही अक्षय, अजन्मा तथा नित्य हैं ॥ ४४-४५ ॥
अक्षयत्वात् प्रजनने अजमत्राहुरव्ययम् ।
अक्षयं पुरुषं प्राहुः क्षयो ह्यस्य न विद्यते ॥ ४६ ॥
ज्ञानी पुरुषोंका कथन है कि जन्म ग्रहण करनेपर भी क्षयरहित होनेके कारण यहाँ पुरुषको अजन्मा, अविनाशी और अक्षय कहा गया है; क्योंकि उसका कभी क्षय नहीं होता है ॥ ४६ ॥
गुणक्षयत्वात् प्रकृतिः कर्तृत्वादक्षयं बुधाः ।
एषा तेऽऽन्वीक्षिकी विद्या चतुर्थी साम्परायिकी ॥ ४७ ॥
गुणोंका क्षय होनेके कारण प्रकृति क्षयशील मानी गयी है और उसका प्रेरक होनेके कारण पुरुषको विद्वानोंने अक्षय कहा है । गन्धर्वराज! यह मैंने आपको चौथी आन्वीक्षिकी विद्या, जो मोक्षमें सहायक है, बतायी है ॥ ४७ ॥
विद्योपेतं धनं कृत्वा कर्मणा नित्यकर्मणि ।
एकान्तदर्शना वेदाः सर्वे विश्वावसो स्मृताः ॥ ४८ ॥
विश्वावसो! आन्वीक्षिकी विद्यासहित वेद- विद्यारूपी धनका उपार्जन करके प्रयत्नपूर्वक नित्यकर्ममें संलग्न रहना चाहिये । सभी वेद एकान्ततः स्वाध्याय और मनन करनेके योग्य माने गये हैं ॥ ४८ ॥
जायन्ते च म्रियन्ते च यस्मिन्नेते यतश्च्युताः ।
वेदार्थं ये न जानन्ति वेद्यं गन्धर्वसत्तम ॥ ४ ९ ॥
गन्धर्वराज! समस्त भूत जिसमें स्थित हैं, जिससे उत्पन्न होते और जिसमें लीन हो जाते हैं, उस वेदप्रतिपाद्य ज्ञेय परमात्माको जो नहीं जानते हैं, वे परमार्थसे भ्रष्ट होकर जन्मते और मरते रहते हैं ॥ ४ ९ ॥
साङ्गोपाङ्गानपि यदि यश्च वेदानधीयते ।
वेदवेद्यं न जानीते वेद भारवहो हि सः ॥ ५० ॥
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सांगोपांग वेद पढ़कर भी जो वेदोंके द्वारा जाननेके योग्य परमेश्वरको नहीं जानता, वह मूढ़ केवल वेदोंका बोझ ढोनेवाला है ॥ ५० ॥
यो घृतार्थी खरीक्षीरं मथेद् गन्धर्वसत्तम ।
विष्ठां तत्रानुपश्येत न मण्डं न च वै घृतम् ॥ ५१ ॥
गन्धर्वशिरोमणे! जो घी पानेकी इच्छा रखकर गधीके दूधको मथता है, उसे वहाँ विष्ठा ही दिखायी देती है । उसे न तो वहाँ मक्खन ही मिलता है और न घी ही ॥ ५१ ॥
तथा वेद्यमवेद्यं च वेदविद्यो न विन्दति ।
स केवलं मूढमतिर्ज्ञानभारवहः स्मृतः ॥ ५२ ॥
इसी प्रकार जो वेदोंका अध्ययन करके भी वेद्य और अवेद्यका तत्त्व नहीं जानता, वह मूढबुद्धि मानव केवल ज्ञानका बोझ ढोनेवाला माना गया है ॥ ५२ ॥
द्रष्टव्यौ नित्यमेवैतौ तत्परेणान्तरात्मना ।
तथास्य जन्मनिधने न भवेतां पुनः पुनः ॥ ५३ ॥
मनुष्यको सदा ही तत्पर होकर अन्तरात्माके द्वारा इन दोनों प्रकृति और पुरुषका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । जिससे बारंबार उसे जन्म- मृत्युके चक्करमें न पड़ना पड़े ॥ ५३ ॥
अजस्रं जन्मनिधनं चिन्तयित्वा त्रयीमिमाम् ।
परित्यज्य क्षयमिह अक्षयं धर्ममास्थितः ॥ ५४ ॥
संसारमें जन्म और मरणकी परम्परा निरन्तर चलती रहती है - ऐसा सोचकर वैदिक कर्मकाण्डमें बताये हुए सभी कर्मों और उनके फलोंको विनाशशील जानकर उनका परित्याग करके मनुष्यको यहाँ अक्षय धर्मका आश्रय लेना चाहिये ॥ ५४ ॥
यदानुपश्यतेऽत्यन्तमहन्यहनि काश्यप ।
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ॥ ५५ ॥
कश्यपनन्दन! जब साधक प्रतिदिन परमात्माके स्वरूपका विचार एवं चिन्तन करने लगता है, तब वह प्रकृतिके संसर्गसे रहित होकर छब्बीसवें तत्त्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ ५५ ॥
अन्यश्च शाश्वतोऽव्यक्तस्तथान्यः पञ्चविंशकः ।
तस्य द्वावनुपश्येतां तमेकमिति साधवः ॥ ५६ ॥
मूढ़बुद्धि मानव उस आत्माके सम्बन्धमें द्वैतभावसे युक्त धारणा रखते हुए कहते हैं —‘सनातन अव्यक्त परमात्मा दूसरा है और पचीसवाँ तत्त्वरूप जीवात्मा दूसरा, परंतु साधु पुरुष उन दोनोंको एक मानते हैं ॥
ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् ।
जन्ममृत्युभयाद् योगाः सांख्याश्च परमैषिणः ॥ ५७ ॥
वे जन्म और मृत्युके भयसे रहित होकर परमपद पानेकी इच्छा रखनेवाले सांख्यवेत्ता और योगी जीवात्मा और परमात्माको एक- दूसरे से भिन्न नहीं मानते हैं । जीव और ईश्वरका
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अभेद बतानेवाला जो यह पूर्वोक्त दर्शन अथवा साधुमत है, उसका वे भी अभिनन्दन करते ही हैं ॥ ५७ ॥
विश्वावसुरुवाच
पञ्चविंशं यदेतत् ते प्रोक्तं ब्राह्मणसत्तम ।
तथा तन्न तथा चेति तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ५८ ॥
विश्वावसुने कहा – ब्राह्मणशिरोमणे! आपने जो यह पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको परमात्मासे अभिन्न बताया है, उसमें यह संदेह उठता है कि जीवात्मा वास्तवमें परमात्मासे अभिन्न है या नहीं? अतः आप इस बातका स्पष्टरूपसे वर्णन करें ॥ ५८ ॥
जैगीषव्यस्यासितस्य देवलस्य मया श्रुतम् ।
पराशरस्य विप्रर्षेर्वार्षगण्यस्य धीमतः ॥ ५ ९ ॥
भृगोः पञ्चशिखस्यास्य कपिलस्य शुकस्य च ।
गौतमस्यार्ष्टिषेणस्य गर्गस्य च महात्मनः ॥ ६० ॥
नारदस्यासुरेश्चैव पुलस्त्यस्य च धीमतः ।
सनत्कुमारस्य ततः शुक्रस्य च महात्मनः ॥ ६१ ॥
कश्यपस्य पितुश्चैव पूर्वमेव मया श्रुतम् । मैंने मुनिवर जैगीषव्य, असित, देवल, ब्रह्मर्षि पराशर, बुद्धिमान् वार्षगण्य, भृगु, पञ्चशिख, कपिल, शुक, गौतम, आर्ष्टिषेण, महात्मा गर्ग, नारद, आसुरि, बुद्धिमान् पुलस्त्य, सनत्कुमार, महात्मा शुक्र तथा अपने पिता कश्यपजीके मुखसे भी पहले इस विषयका प्रतिपादन सुना था ॥ ५ ९ –६१३ ॥ तदनन्तरं च रुद्रस्य विश्वरूपस्य धीमतः ॥ ६२ ॥
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च दैतेयेभ्यस्ततस्ततः ।
प्राप्तमेतन्मया कृत्स्नं वेद्यं नित्यं वदन्त्युत ॥ ६३ ॥
तदनन्तर रुद्र, बुद्धिमान् विश्वरूप, अन्यान्य देवता, पितर तथा दैत्योंसे भी जहाँ- तहाँसे यह सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया । वे सब लोग ज्ञेय तत्त्वको पूर्ण और नित्य बतलाते हैं ॥ ६२-६३ ॥
तस्मात् तद् वै भवबुद्ध्या श्रोतुमिच्छामि ब्राह्मण ।
भवान् प्रबर्हः शास्त्राणां प्रगल्भश्चातिबुद्धिमान् ॥ ६४ ॥
ब्राह्मणदेव! अब मैं इस विषयमें आपकी बुद्धिसे किये गये निर्णयको सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप विद्वानोंमें श्रेष्ठ, शास्त्रोंके प्रगल्भ पण्डित ओर अत्यन्त बुद्धिमान् हैं ॥ ६४ ॥
न तवाविदितं किंचिद् भवान् श्रुतिनिधिः स्मृतः ।
कथ्यते देवलोके च पितृलोके च ब्राह्मण ॥ ६५ ॥
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ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसे आप न जानते हों । वैदिक ज्ञानके तो आप भण्डार ही माने जाते हैं । ब्रह्मन्! देवलोक और पितृलोकमें भी आपकी ख्याति है ॥ ६५ ॥
ब्रह्मलोकगताश्चैव कथयन्ति महर्षयः ।
पतिश्च तपतां शश्वदादित्यस्तव भाषिता ॥ ६६ ॥
ब्रह्मलोकमें गये हुए महर्षि भी आपकी महिमाका वर्णन करते हैं । तपनेवाले तेजस्वी ग्रहोंके पति अदितिनन्दन सनातन भगवान् सूर्यने आपको वेदका उपदेश किया है ॥
सांख्यज्ञानं त्वया ब्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च ।
तथैव योगशास्त्रं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ॥ ६७ ॥
ब्रह्मन्! याज्ञवल्क्य! आपने सम्पूर्ण सांख्य तथा योगशास्त्रका भी विशेष ज्ञान प्राप्त किया है ॥ ६७ ॥
निःसंदिग्धं प्रबुद्धस्त्वं बुध्यमानश्चराचरम् ।
श्रोतुमिच्छामि तज्ज्ञानं घृतं मण्डमयं यथा ॥ ६८ ॥
इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि आप पूर्ण ज्ञानी हैं और सम्पूर्ण चराचर जगत्को जानते हैं; अतः मैं माखनमय घीके समान स्वादिष्ट एवं सारभूत वह तत्त्वज्ञान आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६८ ॥
याज्ञवल्क्यउवाच
कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम ।
जिज्ञाससे च मां राजंस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥ ६ ९ ॥
याज्ञवल्क्यजीने कहा - अर्थात् मैंने उत्तर दिया– गन्धर्वशिरोमणे! आपको मैं निःसंदेह सम्पूर्ण ज्ञानोंको धारण करनेवाली मेधाशक्तिसे सम्पन्न मानता हूँ । राजन्! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझसे प्रश्न करते और मेरे विचारको जानना चाहते हैं; इसलिये मैंने जैसा सुना है, वह बताता हूँ सुनिये ॥ ६ ९ ॥
अबुध्यमानां प्रकृतिं बुध्यते पञ्चविंशकः ।
न तु बुध्यति गन्धर्व प्रकृतिः पञ्चविंशकम् ॥ ७० ॥
गन्धर्व! प्रकृति जड है, इसलिये उसे पचीसवाँ तत्त्व- जीवात्मा तो जानता है; किंतु प्रकृति जीवात्माको नहीं जानती ॥ ७० ॥
अनेन प्रतिबोधेन प्रधानं प्रवदन्ति तत् ।
सांख्ययोगाश्च तत्त्वज्ञा यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥ ७१ ॥
सांख्य और योगके तत्त्वज्ञानी विद्वान् श्रुतिमें किये हुए निरूपणके अनुसार जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाके समान प्रकृतिमें ज्ञानस्वरूप जीवात्माके बोधका प्रतिबिम्ब पड़नेसे उस प्रकृतिको प्रधान कहते हैं ॥ ७१ ॥
पश्यंस्तथैव चापश्यन् पश्यत्यन्यः सदानघ ।
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षड्विंशं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं च पश्यति ॥ ७२ ॥
निष्पाप गन्धर्व! जीवात्मा जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें सब कुछ देखता है । सुषुप्ति और समाधि अवस्थामें कुछ भी नहीं देखता है तथा परमात्मा सदा ही छब्बीसवें तत्त्वरूप अपने-आपको, पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको और चौबीसवें तत्त्वरूप प्रकृतिको भी देखता रहता है ॥
न तु पश्यति पश्यंस्तु यश्चैनमनुपश्यति ।
पञ्चविंशोऽभिमन्येत नान्योऽस्ति परतो मम ॥ ७३ ॥
किंतु यदि जीवात्मा यह अभिमान करता है कि मुझसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है तो जो परमात्मा उसे निरन्तर देखता है, उसे वह समझता हुआ भी नहीं समझता ॥ ७३ ॥
न चतुर्विंशको ग्राह्यो मनुजैर्ज्ञानदर्शिभिः ।
मत्स्यश्चोदकमन्वेति प्रवर्तेत प्रवर्तनात् ॥ ७४ ॥
तत्त्वज्ञानी मनुष्योंको चाहिये कि वे प्रकृतिको आत्मभावसे ग्रहण न करें । जैसे मत्स्य जलका अनुसरण करता है, परंतु अपनेको उससे भिन्न ही मानता है, उसी प्रकार मनुष्य उसकी प्रवृत्तिके अनुसार स्वयं भी प्रवृत्त होवे; परंतु प्रकृतिको अपना स्वरूप न माने ॥ ७४ ॥
यथैव बुध्यते मत्स्यस्तथैषोऽप्यनुबुध्यते ।
स स्नेहात् सहवासाच्च साभिमानाच्च नित्यशः ॥ ७५ ॥
स निमज्जति कालस्य यदैकत्वं न बुध्यते ।
उन्मज्जति हि कालस्य समत्वेनाभिसंवृतः ॥ ७६ ॥
जैसे मछली जलमें रहती हुई भी उस जलको अपनेसे भिन्न समझती है, उसी प्रकार यह जीवात्मा प्राकृत शरीरमें रहकर भी प्रकृतिसे अपनेको भिन्न समझता है तथापि वह शरीरके प्रति स्नेह, सहवास और अभिमानके कारण जब परमात्माके साथ अपनी एकताका अनुभव नहीं करता है, तब कालके समुद्रमें डूब जाता है । परंतु जब वह समत्वबुद्धिसे युक्त हो अपनी और परमात्माकी एकताको समझ लेता है, तब उस काल-समुद्रसे उसका उद्धार हो जाता है ॥ ७५-७६ ॥
यदा तु मन्यतेऽन्योऽहमन्य एष इति द्विजः ।
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ॥ ७७ ॥
जब द्विज इस बातको समझ लेता है कि मैं अन्य हूँ और यह प्राकृत शरीर अथवा अनात्म- जगत् मुझसे सर्वथा भिन्न है, तब वह प्रकृतिके संसर्गसे रहित हो छब्बीसवें तत्त्व परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥
अन्यश्च राजन्नवरस्तथान्यः पञ्चविंशकः ।
तत्स्थानाच्चानुपश्यन्ति एक एवेति साधवः ॥ ७८ ॥
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राजन्! परमात्मा भिन्न है और जीवात्मा भिन्न; क्योंकि परमात्मा जीवात्माका आश्रय है; परंतु ज्ञानी संत- महात्मा उन दोनोंको एक ही देखते और समझते हैं ॥ ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् ।
जन्ममृत्युभयाद् भीता योगाः सांख्याश्च काश्यप ।
षड्विंशमनुपश्यन्तः शुचयस्तत्परायणाः ॥ ७९ ॥
कश्यपनन्दन! जन्म और मृत्युके भयसे डरे हुए योग और सांख्यके साधक भगवत्परायण हो शुद्ध भावसे छब्बीसवें तत्त्व परमात्माका दर्शन करते हुए जीवात्मा और परमात्माको एक समझते हैं और इस अभेद - दर्शनका सदा अभिनन्दन ही करते हैं ॥ ७९ ॥
यदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ।
तदा स सर्वविद् विद्वान् न पुनर्जन्म विन्दति ॥ ८० ॥
जब जीवात्मा प्रकृतिके संसर्गसे रहित हो परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह सर्वज्ञ विद्वान् होकर इस संसारमें पुनर्जन्म नहीं पाता है ॥ ८० ॥
एवमप्रतिबुद्धश्च बुध्यमानश्च तेऽनघ ।
बुद्धश्चोक्तो यथातत्त्वं मया श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ८१ ॥
निष्पाप गन्धर्वराज! इस प्रकार मैंने तुमसे जड प्रकृति, चेतन जीवात्मा और बोधस्वरूप परमात्माका श्रुतिके अनुसार यथावत्रूपसे निरूपण किया है ॥ ८१ ॥
पश्यापश्यं यो न पश्येत् क्षेम्यं तत्त्वं च काश्यप ।
केवलाकेवलं चाद्यं पञ्चविंशं परं च यत् ॥ ८२ ॥
कश्यपनन्दन! जो मनुष्य जीवात्माको और प्रकृति आदि जडवर्गको पृथक् - पृथक् नहीं जानता, मंगलकारी तत्त्वपर दृष्टि नहीं रखता, केवल ( प्रकृति- संसर्गसे रहित ), अकेवल ( प्रकृति- संसर्गसे युक्त ), सबके आदिकारण जीवात्मा तथा परब्रह्म परमात्माको भी यथार्थरूपसे नहीं जानता ( वह आवागमनके चक्कर में पड़ा रहता है ) ॥ ८२ ॥
विश्वावसुरुवाच तथ्यं शुभं चैतदुक्तं त्वया विभो सम्यक् क्षेम्यं दैवताद्यं यथावत् । स्वस्त्यक्षयं भवतश्चास्तु नित्यं बुद्ध्या सदा बुद्धियुक्तं मनस्ते ॥ ८३ ॥
विश्वावसुने कहा –प्रभो! आपने सब देवताओंके आदिकारण ब्रह्मके विषयमें जो यथावत् वर्णन किया है, वह सत्य, शुभ, सुन्दर तथा परम मंगलकारी है । आपका मन सदा ही इसी प्रकार ज्ञानमें स्थित रहे तथा आपको नित्य अक्षय कल्याणकी प्राप्ति हो ( अच्छा, अब मैं जाता हूँ) ॥ ८३ ॥
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याज्ञवल्क्य उवाच एवमुक्त्वा सम्प्रयातो दिवं स विभ्राजन् वै श्रीमता दर्शनेन । दृष्टश्च तुष्ट्या परयाभिनन्द्य प्रदक्षिणं मम कृत्वा महात्मा ॥ ८४ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर महामना गन्धर्वराज विश्वावसु अपने कान्तिमान् दर्शनसे प्रकाशित होते हुए मेरी परिक्रमा और अभिनन्दन करके स्वर्गलोकको चले गये । उस समय मैंने भी बड़े संतोषसे उनकी ओर देखा था ॥ ८४ ॥
ब्रह्मादीनां खेचराणां क्षितौ च ये चाधस्तात् संवसन्ते नरेन्द्र । तत्रैव तद्दर्शनं दर्शयन् वै सम्यक् क्षेम्यं ये पथं संश्रिता वै ॥ ८५ ॥
राजा जनक! आकाशमें विचरनेवाले जो ब्रह्मा आदि देवता हैं, पृथ्वीपर निवास करनेवाले जो मनुष्य हैं तथा जो पृथ्वीसे नीचेके लोकोंमें रहते हैं, उनमेंसे जो लोग कल्याणमय मोक्षमार्गका आश्रय लिये हुए थे, उन सबको उन्हीं स्थानोंमें जाकर विश्वावसुने मेरे बताये हुए इस सम्यक् दर्शनका उपदेश दिया था ॥ ८५ ॥
सांख्याः सर्वे सांख्यधर्मे रताश्च तद्वद् योगा योगधर्मे रताश्च । ये चाप्यन्ये मोक्षकामा मनुष्या- स्तेषामेतद् दर्शनं ज्ञानदृष्टम् ॥ ८६ ॥
सांख्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले सम्पूर्ण सांख्यवेत्ता, योग- धर्मपरायण योगी तथा दूसरे जो मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्य हैं, उन सबको यह उपदेश ज्ञानका प्रत्यक्ष फल देनेवाला है ॥ ८६ ॥
ज्ञानान्मोक्षो जायते राजसिंह नास्त्यज्ञानादेवमाहुर्नरेन्द्र । तस्माज्ज्ञानं तत्त्वतोऽन्वेषितव्यं येनात्मानं मोक्षयेज्जन्ममृत्योः ॥ ८७ ॥
राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी नरेन्द्र! ज्ञानसे ही मोक्ष होता है, अज्ञानसे नहीं— ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं । इसलिये यथार्थ ज्ञानका अनुसंधान करना चाहिये, जिससे अपने - आपको जन्म- मृत्युके बन्धनसे छुड़ाया जा सके ॥ ८७ ॥
प्राप्य ज्ञानं ब्राह्मणात् क्षत्रियाद् वा वैश्याच्छूद्रादपि नीचादभीक्ष्णम् । श्रद्धातव्यं श्रद्दधानेन नित्यं
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न श्रद्धिनं जन्ममृत्यू विशेताम् ॥ ८८ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा नीच वर्णमें उत्पन्न हुए पुरुषसे भी यदि ज्ञान मिलता हो तो उसे प्राप्त करके श्रद्धालु मनुष्यको सदा उसपर श्रद्धा रखनी चाहिये । जिसके भीतर श्रद्धा है, उस मनुष्यमें जन्म- मृत्युका प्रवेश नहीं हो सकता ॥ ८८ ॥
सर्वे वर्णा ब्राह्मणा ब्रह्मजाश्च सर्वे नित्यं व्याहरन्ते च ब्रह्म । तत्त्वं शास्त्रं ब्रह्मबुद्ध्या ब्रवीमि सर्वं विश्वं ब्रह्म चैतत् समस्तम् ॥ ८ ९ ॥ ब्रह्मसे उत्पन्न होनेके कारण सभी वर्ण ब्राह्मण हैं । सभी सदा ब्रह्मका उच्चारण करते हैं । मैं ब्रह्मबुद्धिसे यथार्थ शास्त्रका सिद्धान्त बता रहा हूँ। यह सम्पूर्ण जगत्, यह सारा दृश्यप्रपंच ब्रह्म ही है ॥ ८ ९ ॥ ब्रह्मास्यतो ब्राह्मणाः सम्प्रसूता बाहुभ्यां वै क्षत्रियाः सम्प्रसूताः । नाभ्यां वैश्याः पादतश्चापि शूद्राः सर्वे वर्णा नान्यथा वेदितव्याः ॥ ९ ० ॥ ब्रह्मके मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए हैं, ब्रह्मकी ही भुजाओंसे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है, ब्रह्मकी ही नाभिसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र प्रकट हुए हैं, अतः सभी वर्णके लोग ब्रह्मरूप ही हैं । किसी भी वर्णको ब्रह्मसे भिन्न नहीं समझना चाहिये ॥ ९ ० ॥ अज्ञानतः कर्मयोनिं भजन्ते तां तां राजंस्ते तथा यान्त्यभावम् । तथा वर्णा ज्ञानहीनाः पतन्ते घोरादज्ञानात् प्राकृतं योनिजालम् ॥ ९ १ ॥ राजन्! मनुष्य अज्ञानके कारण ही कर्मानुष्ठानसे भिन्न - भिन्न योनियोंमें जन्म लेते और मरते हैं । ज्ञानहीन मनुष्य ही अपने भयंकर अज्ञानके कारण नाना प्रकारकी प्राकृत योनियोंमें गिरते हैं ॥ ९ १ ॥ तस्माज्ज्ञानं सर्वतो मार्गितव्यं
सर्वत्रस्थं चैतदुक्तं मया ते ।
तत्स्थो ब्रह्मा तस्थिवांश्चापरो य- स्तस्मै नित्यं मोक्षमाहुर्नरेन्द्र ॥ ९ २ ॥
नरेन्द्र! अतः सब ओरसे ज्ञान प्राप्त करनेका ही प्रयत्न करना चाहिये । यह तो मैं तुमसे बता ही चुका हूँ कि सभी वर्णोंके लोग अपने - अपने आश्रममें रहते हुए ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं; अतः जो ब्राह्मण ज्ञानमें स्थित है अथवा जो दूसरे वर्णका मनुष्य भी ज्ञाननिष्ठ है, उसके लिये नित्य मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है ॥
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यत् ते पृष्टं तन्मया चोपदिष्टं याथातथ्यं तद्विशोको भवस्व । राजन् गच्छस्वैतदर्थस्य पारं सम्यक् प्रोक्तं स्वस्ति ते त्वस्तु नित्यम् ॥ ९ ३ ॥ राजन्! तुमने जो पूछा था उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें यथार्थ ज्ञानका उपदेश किया है; अतः अब तुम शोकरहित हो जाओ और इस तत्त्वज्ञानमें पारंगत बनो । मैंने तुम्हें ज्ञानका
भलीभाँति उपदेश कर दिया है । जाओ, तुम्हारा सदा कल्याण हो ॥ ९ ३ ॥
भीष्म उवाच
स एवमनुशास्तस्तु याज्ञवल्क्येन धीमता ।
प्रीतिमानभवद्राजा मिथिलाधिपतिस्तदा ॥ ९ ४ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! बुद्धिमान् याज्ञवल्क्यजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर मिथिलापति राजा जनक उस समय बहुत प्रसन्न हुए ॥ ९ ४ ॥
गते मुनिवरे तस्मिन् कृते चापि प्रदक्षिणम् ।
दैवरातिर्नरपतिरासीनस्तत्र मोक्षवित् ॥ ९ ५ ॥
गोकोटिं स्पर्शयामास हिरण्यं तु तथैव च ।
रत्नाञ्जलिमथैकं च ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा ॥ ९ ६ ॥
उन्होंने सत्कारपूर्वक मुनिकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा किया । जब वे मुनिवर याज्ञवल्क्य चले गये, तब मोक्षके ज्ञाता देवरातनन्दन राजा जनकने वहीं बैठे -बैठे एक करोड़ गौएँ छूकर ब्राह्मणोंको दान कर दीं तथा प्रत्येक ब्राह्मणको एक -एक अंजलि रत्न और सुवर्ण प्रदान किये ॥ ९ ५- ९ ६ ॥ विदेहराज्यं च तदा प्रतिष्ठाप्य सुतस्य वै I यतिधर्ममुपासंश्चाप्यवसन्मिथिलाधिपः ॥ ९ ७ ॥ इसके बाद मिथिलानरेशने विदेहदेशका राज्य अपने पुत्रको सौंप दिया और स्वयं वे यति- धर्मका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ ९ ७ ॥
सांख्यज्ञानमधीयानो योगशास्त्रं च कृत्स्नशः ।
धर्माधर्मं च राजेन्द्र प्राकृतं परिगर्हयन् ॥ ९ ८ ॥
अनन्त इति कृत्वा स नित्यं केवलमेव च ।
धर्माधर्मौ पुण्यपापे सत्यासत्ये तथैव च ॥ ९९ ॥
जन्ममृत्यू च राजेन्द्र प्राकृतं तदचिन्तयत् ।
व्यक्ताव्यक्तस्य कर्मेदमिति नित्यं नराधिप ॥ १०० ॥
राजेन्द्र! नरेश्वर! उन्होंने सम्पूर्ण सांख्य, ज्ञान और योगशास्त्रका स्वाध्याय करके प्राकृत धर्म और अधर्मको त्याज्य मानते हुए यह निश्चय किया कि ' मैं अनन्त हूँ। ' ऐसा निश्चय