श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2101–2110

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2101–2110

पृष्ठ 2101

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करके वे धर्म - अधर्म, पुण्य- पाप, सत्य- असत्य तथा जन्म और मृत्युको व्यक्त ( बुद्धि आदि ) और अव्यक्त ( प्रकृति ) का कार्य मानकर सबको प्राकृत (प्रकृतिजन्य एवं मिथ्या) समझते हुए प्रकृतिसंसर्गसे रहित अपने शुद्ध एवं नित्य स्वरूपका ही चिन्तन करने लगे ॥ ९८— १०० ॥

पश्यन्ति योगाः सांख्याश्च स्वशास्त्रकृतलक्षणाः ।

इष्टानिष्टविमुक्तं हि तस्थौ ब्रह्म परात्परम् ॥ १०१ ॥

युधिष्ठिर! सांख्य और योगके विद्वान् अपने - अपने शास्त्रोंमें वर्णित लक्षणोंके अनुसार ऐसा देखते और समझते हैं कि वह ब्रह्म इष्ट और अनिष्टसे मुक्त, अचल- भावसे स्थित एवं परात्पर है ॥ १०१ ॥

नित्यं तदाहुर्विद्वांसः शुचि तस्माच्छुचिर्भव ।

दीयते यच्च लभते दत्तं यच्चानुमन्यते ॥ १०२ ॥

ददाति च नरश्रेष्ठ प्रतिगृह्णाति यच्च ह ।

ददात्यव्यक्त इत्येतत् प्रतिगृह्णाति तच्च वै ॥ १०३ ॥

विद्वान् पुरुष उस ब्रह्मको नित्य एवं पवित्र बताते हैं; अतः तुम भी उसे जानकर पवित्र हो जाओ । नरश्रेष्ठ! जो कुछ दिया जाता है, जो दी हुई वस्तु किसीको प्राप्त होती है, जो दानका अनुमोदन करता है, जो देता है तथा जो उस दानको ग्रहण करता है, वह सब

अव्यक्त परमात्मा ही है । परमात्मा ही यह सब कुछ देता और लेता है ॥ १०२-१०३ ॥

आत्मा ह्येवात्मनो ह्येकः कोऽन्यस्तस्मात्परो भवेत् ।

एवं मन्यस्व सततमन्यथा मा विचिन्तय ॥ १०४ ॥

युधिष्ठिर! एकमात्र परमात्मा ही अपना है। उससे बढ़कर आत्मीय दूसरा कौन हो सकता है । तुम सदा ऐसा ही मानो और इसके विपरीत दूसरी किसी बातका चिन्तन न करो ॥ १०४ ॥

यस्याव्यक्तं न विदितं सगुणं निर्गुणं पुनः ।

तेन तीर्थानि यज्ञाश्च सेवितव्या विपश्चिता ॥ १०५ ॥

जिसे अव्यक्त प्रकृतिका ज्ञान न हुआ हो, सगुण-निर्गुण परमात्माकी पहचान न हुई हो, उस विद्वान्‌को तीर्थोंका सेवन और यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १०५ ॥

न स्वाध्यायैस्तपोभिर्वा यज्ञैर्वा कुरुनन्दन ।

लभतेऽव्यक्तिकं स्थानं ज्ञात्वा व्यक्तं महीयते ॥ १०६ ॥

कुरुनन्दन! स्वाध्याय, तप अथवा यज्ञोंद्वारा मोक्ष या परमात्मपदकी प्राप्ति नहीं होती ( ये तो उनके तत्त्वको जाननेमें सहायक होते हैं ) । इनके द्वारा परमात्माका स्पष्ट ( अपरोक्ष ) ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य महिमान्वित होता है ॥ १०६ ॥

तथैव महतः स्थानमाहङ्कारिकमेव च ।

अहङ्कारात् परं चापि स्थानानि समवाप्नुयात् ॥ १०७ ॥

पृष्ठ 2102

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महत्तत्त्वकी उपासना करनेवाले महत्तत्त्वको और अहंकारके उपासक अहंकारको प्राप्त होते हैं; परंतु महत्तत्त्व और अहंकारसे भी श्रेष्ठ जो स्थान हैं, उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥ १०७ ॥

ये त्वव्यक्तात् परं नित्यं जानते शास्त्रतत्पराः ।

जन्ममृत्युविमुक्तं च विमुक्तं सदसच्च यत् ॥ १०८ ॥

जो शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर होते हैं, वे ही प्रकृतिसे पर, नित्य, जन्म - मृत्युसे रहित, मुक्त एवं सदसत्स्वरूप परमात्माका ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १०८ ॥

एतन्मयाऽऽप्तं जनकात् पुरस्तात् तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् । ज्ञानं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञैः ॥ १० ९ ॥ युधिष्ठिर! यह ज्ञान मुझे पूर्वकालमें राजा जनकसे मिला था और जनकको याज्ञवल्क्यजीसे प्राप्त हुआ था । ज्ञान सबसे उत्तम साधन है । यज्ञ इसकी समानता नहीं कर सकते । ज्ञानसे ही मनुष्य इस दुर्गम संसार- सागरसे पार हो सकता है; यज्ञोंद्वारा नहीं ॥ १० ९ ॥ दुर्गं जन्म निधनं चापि राजन् न भौतिकं ज्ञानविदो वदन्ति । यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्व्रतैश्च दिवं समासाद्य पतन्ति भूमौ ॥ ११० ॥

राजन्! ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि भौतिक जन्म और मृत्युको पार करना अत्यन्त कठिन है । यज्ञ आदिके द्वारा भी मनुष्य उस दुर्गम संकटसे पार नहीं हो सकता । यज्ञ, तप, नियम और व्रतोंद्वारा तो लोग स्वर्गलोकमें जाते और पुण्य क्षीण होनेपर फिर इस पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं ॥ ११० ॥

तस्मादुपासस्व परं महच्छुचि

शिवं विमोक्षं विमलं पवित्रम् ।

क्षेत्रं ज्ञात्वा पार्थिव ज्ञानयज्ञ- मुपास्य वै तत्त्वमृषिर्भविष्यसि ॥ १११ ॥

इसलिये तुम प्रकृतिसे पर, महत्, पवित्र, कल्याणमय, निर्मल, शुद्ध तथा मोक्षस्वरूप ब्रह्मकी उपासना करो । पृथ्वीनाथ! क्षेत्रको जानकर और ज्ञानयज्ञका आश्रय लेकर तुम निश्चय ही तत्त्वज्ञानी ऋषि बन जाओगे ॥ १११ ॥

यदुपनिषदमुपाकरोत् तथासौ जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः । यदुपगणितशाश्वताव्ययं त-

पृष्ठ 2103

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च्छुभममृतत्वमशोकमर्च्छति ॥ ११२ ॥

पूर्वकालमें याज्ञवल्क्य मुनिने राजा जनकको जिस उपनिषद् ( ज्ञान) का उपदेश दिया था, उसका मनन करनेसे मनुष्य पूर्वकथित सनातन अविनाशी, शुभ, अमृतमय तथा शोकरहित परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ११२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादसमाप्तौ अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१८ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य- जनक- संवादकी समाप्तिविषयक तीन सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 2104

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एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः जरा - मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पञ्चशिख और राजा जनकका संवाद युधिष्ठिर उवाच

ऐश्वर्यं वा महत् प्राप्य धनं वा भरतर्षभ ।

दीर्घमायुरवाप्याथ कथं मृत्युमतिक्रमेत् ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! महान् ऐश्वर्य या प्रचुर धन अथवा बहुत बड़ी आयु पाकर मनुष्य किस तरह मृत्युका उल्लंघन कर सकता है? ॥ १ ॥

तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा ।

रसायनप्रयोगैर्वा कैर्नाप्नोति जरान्तकौ ॥ २ ॥

वह गुरुतर तपस्या करके, महान् कर्मोंका अनुष्ठान करके, वेद-शास्त्रोंका अध्ययन करके अथवा नाना प्रकारके रसायनोंका प्रयोग करके किन उपायोंद्वारा जरा और मृत्युको प्राप्त नहीं होता है? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

भिक्षोः पञ्चशिखस्येह संवादं जनकस्य च ॥ ३ ॥

भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष संन्यासी पंचशिख तथा राजा जनकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

वैदेहो जनको राजा महर्षि वेदवित्तमम् ।

पर्यपृच्छत् पञ्चशिखं छिन्नधर्मार्थसंशयम् ॥ ४ ॥

एक समयकी बात है, विदेहदेशके राजा जनकने वेद - वेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि पंचशिखसे, जिनके धर्म और अर्थ - विषयक संदेह नष्ट हो गये थे, इस प्रकार प्रश्न किया– ॥

केन वृत्तेन भगवन्नतिक्रामेज्जरान्तकौ ।

तपसा वाथ बुद्ध्या वा कर्मणा वा श्रुतेन वा ॥ ५ ॥

‘ भगवन्! किस आचार, तपस्या, बुद्धि, कर्म अथवा शास्त्रज्ञानके द्वारा मनुष्य जरा और मृत्युको लाँघ सकता है? ' ॥ ५ ॥

एवमुक्तः स वैदेहं प्रत्युवाचापरोक्षवित् ।

निवृत्तिर्न तयोरस्ति नानिवृत्तिः कथञ्चन ॥ ६ ॥

उनके इस प्रकार पूछनेपर अपरोक्ष ज्ञानसे सम्पन्न महर्षि पंचशिखने विदेहराजको इस प्रकार उत्तर दिया — ‘ जरा और मृत्युकी निवृत्ति नहीं होती है, परंतु ऐसा भी नहीं है कि

पृष्ठ 2105

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किसी प्रकार उनकी निवृत्ति हो ही नहीं सकती ( धन और ऐश्वर्य आदिसे उनकी निवृत्ति नहीं होती, परंतु ज्ञानसे तो पुनर्जन्मकी भी निवृत्ति हो जाती है; फिर जरा और मृत्युकी तो बात ही क्या? ) ॥ ६ ॥

न ह्यानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः ।

सोऽयं प्रपद्यतेऽध्वानं चिराय ध्रुवमध्रुवः ॥ ७ ॥

दिन, रात और महीनोंके जो चक्र चल रहे हैं, वे किसीके टाले नहीं टलते हैं । इसी प्रकार जन्म, मृत्यु और जरा आदिके क्रम प्रायः चलते ही रहते हैं । जिसके जीवनका कुछ ठिकाना नहीं, वह मरणधर्मा मानव कभी दीर्घ कालके पश्चात् नित्यपथ ( मोक्षमार्ग ) का आश्रय लेता है ॥

सर्वभूतसमुच्छेदः स्रोतसेवोह्यते सदा ।

ऊह्यमानं निमज्जन्तमप्लवे कालसागरे ॥। ८ ॥

जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदभिपद्यते । काल समस्त प्राणियोंका उच्छेद कर डालता है। जैसे जलका प्रवाह किसी वस्तुको बहाये लिये जाता है, उसी प्रकार काल सदा ही प्राणियोंको अपने वेगसे बहाया करता है । यह काल बिना नौकाके समुद्रकी भाँति लहरा रहा है । जरा और मृत्यु विशाल ग्राहका रूप धारण करके उसमें बैठे हुए हैं । उस काल- सागरमें बहते और डूबते हुए जीवको कोई भी बचा नहीं सकता ॥ ८३ ॥

नैवास्य कश्चिद् भवति नासौ भवति कस्यचित् ॥ ९ ॥

पथि सङ्गतमेवेदं दारैरन्यैश्च बन्धुभिः ।

नायमत्यन्तसंवासो लब्धपूर्वो हि केनचित् ॥ १० ॥

यहाँ इस जीवका कोई भी अपना नहीं है और वह भी किसीका अपना नहीं है । रास्तेमें मिले हुए राहगीरोंके समान यहाँ पत्नी तथा अन्य बन्धु बान्धवोंका साथ हो जाता है, परंतु यहाँ पहले कभी किसीने किसीके साथ चिरकालतक सहवासका सुख नहीं उठाया है ॥

क्षिप्यन्ते तेन तेनैव निष्टनन्तः पुनः पुनः ।

कालेन जाता याता हि वायुनेवाभ्रसंचयाः ॥ ११ ॥

जैसे गर्जते हुए बादलोंको हवा बारंबार उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार काल यहाँ जन्म लेनेवाले प्राणियोंको उनके रोने -चिल्लानेपर भी विनाशकी आगमें झोंक देता है ॥ ११ ॥

जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव ।

बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ॥ १२ ॥

कोई बलवान् हों या दुर्बल, बड़ा हों या छोटा, उन सब प्राणियोंको बुढ़ापा और मौत व्याघ्रकी भाँति खा जाती है ॥ १२ ॥

एवं भूतेषु भूतात्मा नित्यभूतोऽध्रुवेषु च ।

पृष्ठ 2106

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कथं हि हृष्येज्जातेषु मृतेषु च कथं ज्वरेत् ॥ १३ ॥

इस प्रकार जब सभी प्राणी विनाशशील ही हैं, तब नित्य- स्वरूप जीवात्मा उन प्राणियोंके लिये जन्म लेनेपर हर्ष किसलिये माने और मर जानेपर शोक क्यों करे? ॥ १३ ॥

कुतोऽहमागतः कोऽस्मि क्व गमिष्यामि कस्य वा ।

कस्मिन् स्थितः क्व भविता कस्मात्किमनुशोचसि ॥ १४ ॥

मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? कहाँ जाऊँगा? किसके साथ मेरा क्या सम्बन्ध है? किस स्थानमें स्थित होकर कहाँ फिर जन्म लूँगा? इन सब बातोंको लेकर तुम किसलिये क्या शोक कर रहे हो? ॥ १४ ॥

द्रष्टा स्वर्गस्य कोऽन्योऽस्ति तथैव नरकस्य च ।

आगमांस्त्वनतिक्रम्य दद्याच्चैव यजेत च ॥ १५ ॥

जो शुभ और अशुभ कर्म करता है, उसके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उन कर्मोंके फलस्वरूप स्वर्ग और नरकका दर्शन एवं उपभोग करेगा; अतः शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए सब लोगोंको दान और यज्ञ आदि सत्कर्म करते रहना चाहिये ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चशिखजनकसंवादे एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पंचशिख और जनकका संवादविषयक तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ९ ॥

पृष्ठ 2107

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2107 का मूल पृष्ठ
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विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना युधिष्ठिर उवाच

अपरित्यज्य गार्हस्थ्यं कुरुराजर्षिसत्तम ।

कः प्राप्तो विनयं बुद्ध्या मोक्षतत्त्वं वदस्व मे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- कुरुकुलराजर्षिशिरोमणि! जहाँ बुद्धिका लय हो जाता है, उस मोक्षतत्त्वको गृहस्थाश्रमका त्याग बिना किये कौन पुरुष प्राप्त हुआ है, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

संन्यस्यते यथाऽऽत्मायं व्यक्तस्यात्मा यथा च यत् ।

परं मोक्षस्य यच्चापि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥

पितामह! यह मनुष्यशरीर जिस प्रकार स्थूल शरीरका त्याग करता है और जिस प्रकार स्थूल शरीरका आत्मा सूक्ष्म शरीरका त्याग करता है अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म- इन दोनों शरीरोंके अभिमानसे जिस प्रकार रहित हो सकता है एवं उनके त्यागका जो स्वरूप है और जो मोक्षका तत्त्व है, वह मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

जनकस्य च संवादं सुलभायाश्च भारत ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें जानकार मनुष्य जनक और सुलभाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

संन्यासफलिकः कश्चिद् बभूव नृपतिः पुरा ।

मैथिलो जनको नाम धर्मध्वज इति श्रुतः ॥ ४ ॥

प्राचीन कालमें मिथिलापुरीके कोई एक राजा जनक हो गये हैं, जो धर्मध्वज नामसे प्रसिद्ध थे । उन्हें ( गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी ) संन्यासका जो सम्यग्ज्ञानरूप फल है, वह प्राप्त हो गया था ॥ ४ ॥

स वेदे मोक्षशास्त्रे च स्वे च शास्त्रे कृतश्रमः ।

इन्द्रियाणि समाधाय शशास वसुधामिमाम् ॥ ५ ॥

पृष्ठ 2108

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2108 का मूल पृष्ठ
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उन्होंने वेदमें, मोक्षशास्त्रमें तथा अपने शास्त्र ( दण्डनीति ) - में भी बड़ा परिश्रम किया था । वे इन्द्रियोंको एकाग्र करके इस वसुन्धराका शासन करते थे ॥ ५ ॥

तस्य वेदविदः प्राज्ञाः श्रुत्वा तां साधुवृत्तताम् लोकेषु स्पृहयन्त्यन्ये पुरुषाः पुरुषेश्वर ॥ ६ ॥

नरेश्वर! वेदोंके ज्ञाता विद्वान् पुरुष उनकी उस साधुवृत्तिका समाचार सुनकर उन्हींके समान सज्जन होनेकी इच्छा करते थे ॥ ६ ॥

अथ धर्मयुगे तस्मिन् योगधर्ममनुष्ठिता ।

महीमनुचचारैका सुलभा नाम भिक्षुकी ॥ ७ ॥

वह धर्मप्रधान युगका समय था । उन दिनों सुलभा नामवाली एक संन्यासिनी योगधर्मके अनुष्ठानद्वारा सिद्धि प्राप्त करके अकेली ही इस पृथ्वीपर विचरण करती थी ॥ ७ ॥

तया जगदिदं कृत्स्नमटन्त्या मिथिलेश्वरः ।

तत्र तत्र श्रुतो मोक्षे कथ्यमानस्त्रिदण्डिभिः ॥ ८ ॥

इस सम्पूर्ण जगत्में घूमती हुई सुलभाने यत्र- तत्र अनेक स्थानोंमें त्रिदण्डी संन्यासियोंके मुखसे मोक्षतत्त्वकी जानकारीके विषयमें मिथिलापति राजा जनककी प्रशंसा सुनी ॥ ८ ॥

सातिसूक्ष्मां कथां श्रुत्वा तथ्यं नेति ससंशया ।

दर्शने जातसंकल्पा जनकस्य बभूव ह ॥ ९ ॥

उनके द्वारा कही जानेवाली अत्यन्त सूक्ष्म परब्रह्म- विषयक वार्ता दूसरोंके मुखसे सुनकर सुलभाके मनमें यह संदेह हुआ कि पता नहीं जनकके सम्बन्धमें जो बातें सुनी जाती हैं, वे सत्य हैं या नहीं । यह संशय उत्पन्न होनेपर उसके हृदयमें राजा जनकके दर्शनका संकल्प उदित हुआ ॥ ९ ॥

तत्र सा विप्रहायाथ पूर्वरूपं हि योगतः ।

अबिभ्रदनवद्याङ्गी रूपमन्यदनुत्तमम् ॥ १० ॥

चक्षुर्निमेषमात्रेण लघ्वस्त्रगतिगामिनी ।

विदेहानां पुरीं सुभ्रूर्जगाम कमलेक्षणा ॥ ११ ॥

उसने योगशक्तिसे अपना पहला शरीर छोड़कर दूसरा परम सुन्दर रूप धारण कर लिया । अब उसका प्रत्येक अंग अनिन्द्य सौन्दर्यसे प्रकाशित होने लगा । सुन्दर भौंहोंवाली वह कमलनयनी बाला बाणोंके समान तीव्र गतिसे चलकर पलभरमें विदेहदेशकी राजधानी मिथिलामें जा पहुँची ॥ १०-११ ॥

सा प्राप्य मिथिलां रम्यां प्रभूतजनसंकुलाम् ।

भैक्ष्यचर्यापदेशेन ददर्श मिथिलेश्वरम् ॥ १२ ॥

प्रचुर जनसमुदायसे भरी हुई उस रमणीय मिथिलानगरीमें पहुँचकर संन्यासिनी सुलभाने भिक्षा लेनेके बहाने मिथिलानरेशका दर्शन किया ॥ १२ ॥

राजा तस्याः परं दृष्ट्वा सौकुमार्यं वपुस्तदा ।

पृष्ठ 2109

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केयं कस्य कुतो वेति बभूवागतविस्मयः ॥ १३ ॥

उसके परम सुकुमार शरीर और सौन्दर्यको देखकर राजा जनक आश्चर्यसे चकित हो उठे और मन-ही-मन सोचने लगे, ' यह कौन है, किसकी है अथवा कहाँसे आयी है? ' ॥ १३ ॥

ततोऽस्याः स्वागतं कृत्वा व्यादिश्य च वरासनम् ।

पूजितां पादशौचेन वरान्नेनाप्यतर्पयत् ॥ १४ ॥

तदनन्तर उसका स्वागत करके राजाने उसे सुन्दर आसन समर्पित किया और पैर धुलाकर उसका यथोचित पूजन करनेके पश्चात् उत्तमोत्तम अन्न देकर उसे तृप्त किया ॥ १४ ॥

अथ भुक्तवती प्रीता राजानं मन्त्रिभिर्वृतम् ।

सर्वभाष्यविदां मध्ये चोदयामास भिक्षुकी ॥ १५ ॥

भोजन करके संतुष्ट हुई संन्यासिनी सुलभाने सम्पूर्ण भाष्यवेत्ता विद्वानोंके बीचमें मन्त्रियोंसे घिरकर बैठे हुए राजा जनकसे कुछ प्रश्न करनेका विचार किया ॥ १५ ॥

सुलभा त्वस्य धर्मेषु मुक्तो नेति ससंशया ।

सत्त्वं सत्त्वेन योगज्ञा प्रविवेश महीपतेः ॥ १६ ॥

सुलभा मोक्षधर्मके विषयमें राजासे कुछ पूछना चाहती थी । उसके मनमें यह संदेह था कि राजा जनक जीवन्मुक्त हैं या नहीं । वह योगशक्तियोंकी जानकार तो थी ही, अपनी सूक्ष्म बुद्धिद्वारा राजाकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो गयी ॥ १६ ॥

नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्य रश्मीन् संयम्य रश्मिभिः ।

सा स्म तं चोदयिष्यन्ती योगबन्धैर्बबन्ध ह ॥ १७ ॥

राजा जनकसे प्रश्न करनेके लिये उद्यत हो उसने अपने नेत्रोंकी किरणोंद्वारा उनके नेत्रोंकी किरणोंको संयत करके योगबलसे उनके चित्तको बाँधकर उन्हें वशमें कर लिया ॥ १७ ॥

जनकोऽप्युत्स्मयन् राजा भावमस्या विशेषयन् ।

प्रतिजग्राह भावेन भावमस्या नृपोत्तम ॥ १८ ॥

नृपश्रेष्ठ! तब राजा जनकने सुलभाके अभिप्रायको जानकर उसका आदर करते हुए मुस्कराकर अपने भावद्वारा उसके भावको ग्रहण कर लिया ॥ १८ ॥

तदेकस्मिन्नधिष्ठाने संवादः श्रूयतामयम् ।

छत्रादिषु विमुक्तस्य मुक्तायाश्च त्रिदण्डके ॥ १ ९ ॥

फिर छत्र आदि राजचिह्नोंसे रहित हुए राजा जनक और त्रिदण्डरूप संन्यास - चिह्नसे मुक्त हुई सुलभाका एक ही शरीरमें रहकर जो संवाद हुआ था, उसे सुनो ॥ १ ९ ॥ जनक उवाच

पृष्ठ 2110

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भगवत्याः क्व चर्येयं कृता क्व च गमिष्यसि ।

कस्य च त्वं कुतो वेति पप्रच्छैनां महीपतिः ॥ २० ॥

जनकने पूछा — भगवति! आपको यह संन्यासकी दीक्षा कहाँसे प्राप्त हुई है, आप कहाँ जायँगी? किसकी हैं और कहाँसे यहाँ आपका शुभागमन हुआ है? ये सब बातें राजा जनकने सुलभासे पूछीं ॥ २० ॥

श्रुते वयसि जातौ च सद्भावो नाधिगम्यते ।

एष्वर्थेषूत्तरं तस्मात् प्रवेद्यं मत्समागमे ॥ २१ ॥

वे बोले, किसीसे पूछे बिना उसके शास्त्रज्ञान, अवस्था और जातिके विषयमें सच्ची बात नहीं मालूम होती; अतः मेरे साथ जो तुम्हारा समागम हुआ है, इस अवसरपर इन सब विषयोंकी जानकारीके लिये यथार्थ उत्तर जानना आवश्यक है ॥ २१ ॥

छत्रादिषु विशेषेषु मुक्तं मां विद्धि तत्त्वतः ।

स त्वां सम्मन्तुमिच्छामि मानार्हा हि मतासि मे ॥ २२ ॥

छत्र आदि जो विशेष राजोचित चिह्न हैं, उन्हें इस समय मैं त्याग चुका हूँ; अतः अब आप मुझे यथार्थरूपसे जान लें । मैं आपका सम्मान करना चाहता हूँ; क्योंकि आप मुझे सम्मानके योग्य जान पड़ती हैं ॥ २२ ॥

यस्माच्चैतन्मया प्राप्तं ज्ञानं वैशेषिकं पुरा ।

यस्य नान्यः प्रवक्तास्ति मोक्षं तमपि मे शृणु ॥ २३ ॥

मैंने पूर्वकालमें सर्वश्रेष्ठ मोक्षविषयक ज्ञान जिनसे प्राप्त किया था, जिसका उनके सिवा दूसरा कोई प्रतिपादन करनेवाला नहीं है, उस ज्ञान और ज्ञानदाता गुरुका भी परिचय आप मुझसे सुनो ॥ २३ ॥

पराशरसगोत्रस्य वृद्धस्य सुमहात्मनः ।

भिक्षोः पञ्चशिखस्याहं शिष्यः परमसम्मतः ॥ २४ ॥

पराशरगोत्री संन्यास - धर्मावलम्बी वृद्ध महात्मा पंचशिख मेरे गुरु हैं । मैं उनका परम प्रिय शिष्य हूँ ॥

सांख्यज्ञाने च योगे च महीपालविधौ तथा ।

त्रिविधे मोक्षधर्मेऽस्मिन् गताध्वा छिन्नसंशयः ॥ २५ ॥

सांख्यज्ञान, योगविद्या तथा राजधर्म -इन तीन प्रकारके मोक्षधर्ममें मुझे गन्तव्य मार्ग

गुरुदेवसे प्राप्त हो चुका है । इन विषयोंके मेरे सारे संशय दूर हो गये हैं ॥

स यथाशास्त्रदृष्टेन मार्गेणेह परिभ्रमन् ।

वार्षिकांश्चतुरो मासान् पुरा मयि सुखोषितः ॥ २६ ॥

पहलेकी बात है, वे आचार्यचरण शास्त्रोक्त मार्गसे चलते हुए घूमते - घामते इधर आ निकले और वर्षा -ऋतुके चार महीने मेरे यहाँ सुखपूर्वक रहे ॥ २६ ॥

तेनाहं सांख्यमुख्येन सुदृष्टार्थेन तत्त्वतः ।