05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2131–2140
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2131–2140
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मैं समझती हूँ कि आपने पंचशिखाचार्यसे शास्त्रका श्रवण करके भी श्रवण नहीं किया है अथवा उनसे यदि कोई शास्त्र सुना है तो उसे सुनकर भी मिथ्या कर दिया है; या यह भी हो सकता है कि आपने वेदशास्त्र- जैसा प्रतीत होनेवाला कोई और ही शास्त्र उनसे सुना हो ॥ १६७ ॥
अथापीमासु संज्ञासु लौकिकीषु प्रतिष्ठसे ।
अभिषङ्गावरोधाभ्यां बद्धस्त्वं प्राकृतो यथा ॥ १६८ ॥
इतनेपर भी यदि आप ' विदेहराज' ' मिथिलापति' आदि इन लौकिक नामोंमें ही प्रतिष्ठित हो रहे हैं तो आप दूसरे साधारण मनुष्योंकी भाँति आसक्ति और अवरोधसे ही बँधे हुए हैं ॥ १६८ ॥
सत्त्वेनानुप्रवेशो हि योऽयं त्वयि कृतो मया ।
किं तवापकृतं तत्र यदि मुक्तोऽसि सर्वशः ॥ १६ ९ ॥
यदि आप सर्वथा मुक्त हैं तो मैंने जो बुद्धिके द्वारा आपके भीतर प्रवेश किया है, इसमें आपका क्या अपराध किया है? ॥ १६ ९ ॥
नियमो ह्येषु वर्णेषु यतीनां शून्यवासिता ।
शून्यमावेशयन्त्या च मया किं कस्य दूषितम् ॥ १७० ॥
इन सभी वर्णोंमें यह नियम प्रसिद्ध है कि संन्यासियोंको एकान्त स्थानमें रहना चाहिये । मैंने भी आपके शून्य शरीरमें निवास करके किसकी किस वस्तुको दूषित कर दिया है? ॥ १७० ॥
न पाणिभ्यां न बाहुभ्यां पादोरुभ्यां न चानघ ।
न गात्रावयवैरन्यैः स्पृशामि त्वां नराधिप ॥ १७१ ॥
निष्पाप नरेश! न तो हाथोंसे, न भुजाओंसे, न पैरोंसे, न जाँघोंसे और न शरीरके दूसरे ही अवयवोंसे मैं आपका स्पर्श कर रही हूँ ॥ १७१ ॥
कुले महति जातेन ह्रीमता दीर्घदर्शिना ।
नैतत्सदसि वक्तव्यं सद्वाऽसद्वा मिथः कृतम् ॥ १७२ ॥
आप महान् कुलमें उत्पन्न, लज्जाशील तथा दीर्घदर्शी पुरुष हैं । हम दोनोंने परस्पर भला या बुरा जो कुछ भी किया है, उसे आपको इस भरी सभामें नहीं कहना चाहिये ॥ १७२ ॥
ब्राह्मणा गुरवश्चेमे तथा मान्या गुरूत्तमाः ।
त्वं चाथ गुरुरप्येषामेवमन्योन्यगौरवम् ॥ १७३ ॥
यहाँ ये सभी वर्णोंके गुरु ब्राह्मण विद्यमान हैं । इन गुरुओंकी अपेक्षा भी उत्तम कितने ही माननीय महापुरुष यहाँ बैठे हैं तथा आप भी राजा होनेके कारण इन सबके लिये गुरुस्वरूप हैं । इस प्रकार आप सबका गौरव एक दूसरेपर अवलम्बित है ॥ १७३ ॥
तदेवमनुसंदृश्य वाच्यावाच्यं परीक्षता ।
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स्त्रीपुंसोः समवायोऽयं त्वया वाच्यो न संसदि ॥ १७४ ॥
अतः इस प्रकार विचार करके यहाँ क्या कहना चाहिये और क्या नहीं, इसको जाँच-बूझ लेना आवश्यक है । इस भरी सभामें आपको स्त्री- पुरुषोंके संयोगकी चर्चा कदापि नहीं करनी चाहिये ॥ १७४ ॥
यथा पुष्करपर्णस्थं जलं तत्पर्णमस्पृशत् ।
तिष्ठत्यस्पृशती तद्वत् त्वयि वत्स्यामि मैथिल ॥ १७५ ॥
मिथिलानरेश! जैसे कमलके पत्तेपर पड़ा हुआ जल उस पत्तेका स्पर्श नहीं करता है, उसी प्रकार मैं आपका स्पर्श न करती हुई आपके भीतर निवास करूँगी ॥ १७५ ॥
यदि वाप्यस्पृशन्त्या मे स्पर्शं जानासि कञ्चन ।
ज्ञानं कृतमबीजं ते कथं तेनेह भिक्षुणा ॥ १७६ ॥
यद्यपि मैं स्पर्श नहीं कर रही हूँ तो भी यदि आप मेरे स्पर्शका अनुभव करते हैं तो मुझे यह कहना पड़ता है कि उन संन्यासी महात्मा पंचशिखने आपको ज्ञानका उपदेश कैसे कर दिया? क्योंकि आपने उसे निर्बीज कर दिया? ॥ १७६ ॥
स गार्हस्थ्याच्च्युतश्च त्वं मोक्षं चानाप्य दुर्विदम् ।
उभयोरन्तराले वै वर्तसे मोक्षवार्तिकः ॥ १७७ ॥
परस्त्रीके स्पर्शका अनुभव करनेके कारण आप गार्हस्थ्यधर्मसे तो गिर गये और दुर्बोध एवं दुर्लभ मोक्ष भी नहीं पा सके, अतः केवल मोक्षकी बात करते हुए आप गार्हस्थ्य और मोक्ष दोनोंके बीचमें लटक रहे हैं ॥
न हि मुक्तस्य मुक्तेन ज्ञस्यैकत्वपृथक्त्वयोः ।
भावाभावसमायोगे जायते वर्णसंकरः ॥ १७८ ॥
जीवन्मुक्त ज्ञानीका जीवन्मुक्त ज्ञानीके साथ, एकत्वका पृथक्त्वके साथ तथा भाव (आत्मा) का अभाव ( प्रकृति) के साथ संयोग होनेपर वर्णसंकरताकी उत्पत्ति नहीं हो सकती ॥ १७८ ॥
वर्णाश्रमाः पृथक्त्वेन दृष्टार्थस्यापृथक्त्विनः ।
नान्यदन्यदिति ज्ञात्वा नान्यदन्यत्र वर्तते ॥ १७९ ॥
मैं मानती हूँ कि समस्त वर्ण और आश्रम पृथक् - पृथक् बताये गये हैं । तथापि जिसे ब्रह्मका साक्षात्कार हो गया है, जो अभेदज्ञानसे सम्पन्न है और यह जानकर सारा बर्ताव करता है कि आत्मासे भिन्न दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता नहीं है तथा अन्य वस्तु अपनेसे भिन्न दूसरी वस्तुमें विद्यमान नहीं है, उसका किसी अन्यके साथ संयोग होना सम्भव नहीं है; अतः वर्णसंकरता नहीं हो सकती ॥ १७ ९ ॥
पाणौ कुण्डं तथा कुण्डे पयः पयसि मक्षिका ।
आश्रिताश्रययोगेन पृथक्त्वेनाश्रिताः पुनः ॥ १८० ॥
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हाथमें कुंडी है, कुंडीमें दूध है और दूधमें मक्खी पड़ी हुई है । ये तीनों परस्पर पृथक् होते हुए भी आधाराधेय- भाव सम्बन्धसे एक दूसरेके आश्रित हो एक साथ हो गये हैं ॥ १८० ॥
न तु कुण्डे पयोभावः पयश्चापि न मक्षिका ।
स्वयमेवाप्नुवन्त्येते भावा ननु पराश्रयम् ॥ १८१ ॥
फिर भी कुंडीमें दुग्धत्व नहीं आया है और दूध भी मक्खी नहीं बन गया है । ये सारे आधेय पदार्थ स्वयं ही अपनेसे भिन्न आधारको प्राप्त होते हैं ॥ १८१ ॥
पृथक्त्वादाश्रमाणां च वर्णान्यत्वे तथैव च ।
परस्परपृथक्त्वाच्च कथं ते वर्णसंकरः ॥ १८२ ॥
सारे आश्रम पृथक् - पृथक् हैं तथा चारों वर्ण भी भिन्न हैं । जब इनमें परस्पर पार्थक्य बना हुआ है, तब पृथक्त्वको जाननेवाले आपके वर्णका संकर कैसे हो सकता है? ॥ १८२ ॥
नास्मि वर्णोत्तमा जात्या न वैश्या नावरा तथा ।
तव राजन् सवर्णास्मि शुद्धयोनिरविप्लुता ॥ १८३ ॥
राजन्! मैं जातिसे ब्राह्मणी नहीं हूँ और न वैश्या अथवा शूद्रा ही हूँ । मैं तो आपके समान वर्णवाली क्षत्रिया ही हूँ । मेरा जन्म शुद्ध वंशमें हुआ है और मैंने अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन किया है ॥ १८३ ॥
प्रधानो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः ।
कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम् ॥ १८४ ॥
आपने प्रधान नामक राजर्षिका नाम अवश्य सुना होगा । मैं उन्हींके कुलमें उत्पन्न हुई हूँ । आपको मालूम होना चाहिये कि मेरा नाम सुलभा है ॥ १८४ ॥
द्रोणश्च शतशृङ्गश्च चक्रद्वारश्च पर्वतः ।
मम सत्रेषु पूर्वेषां चिता मघवता सह ॥ १८५ ॥
मेरे पूर्वजोंके यज्ञोंमें देवराज इन्द्रके सहयोगसे द्रोण, शतशृंग और चक्रद्वार नामक पर्वत यज्ञवेदीमें ईंटोंकी जगह चुने गये थे ॥ १८५ ॥
साहं तस्मिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे ।
विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम् ॥ १८६ ॥
मेरा जन्म उसी महान् कुलमें हुआ है । मैंने अपने योग्य पतिके न मिलनेपर मोक्षधर्मकी शिक्षा ली तथा मुनिव्रत धारण करके मैं अकेली विचरती रहती हूँ ॥
नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वापहारिणी ।
न धर्मसंकरकरी स्वधर्मेऽस्मि धृतव्रता ॥ १८७ ॥
मैंने संन्यासिनीका छद्मवेष नहीं धारण किया है । मैं पराये धनका अपहरण नहीं करती हूँ और न धर्मसंकरता ही फैलाती हूँ। मैं दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हुई अपने
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धर्ममें स्थित रहती हूँ ॥ १८७ ॥
नास्थिरा स्वप्रतिज्ञायां नासमीक्ष्य प्रवादिनी ।
नासमीक्ष्यागता चेह त्वत्सकाशं जनाधिप ॥ १८८ ॥
जनेश्वर! मैं अपनी प्रतिज्ञासे कभी विचलित नहीं होती हूँ। बिना सोचे- समझे कोई बात नहीं बोलती हूँ और आपके पास भी यहाँ खूब सोच - विचारकर ही आयी हूँ ॥ १८८ ॥
मोक्षे ते भावितां बुद्धिं श्रुत्वाहं कुशलैषिणी ।
तव मोक्षस्य चाप्यस्य जिज्ञासार्थमिहागता ॥ १८ ९ ॥
मैंने सुना था कि आपकी बुद्धि मोक्षधर्ममें लगी हुई है, अतः आपकी मंगलाकांक्षिणी होकर आपके इस मोक्षज्ञानका मर्म जाननेके लिये मैं यहाँ आयी हूँ ॥ १८ ९ ॥
न वर्गस्था ब्रवीम्येतत् स्वपक्षपरपक्षयोः ।
मुक्तो व्यायच्छते यश्च शान्तौ यश्च न शाम्याति ॥ १ ९ ० ॥
मैं स्वपक्ष और परपक्षमेंसे अपने पक्षमें स्थित हो पक्षपातपूर्वक यह बात नहीं कह रही हूँ, आपके हितको दृष्टिमें रखकर बोलती हूँ; क्योंकि जो वाणीका व्यायाम नहीं करता और जो शान्त परब्रह्ममें निमग्न रहता है, वही मुक्त है ॥ १ ९० ॥
यथा शून्ये पुरागारे भिक्षुरेकां निशां वसेत् ।
तथाहं त्वच्छरीरेऽस्मिन्निमां वत्स्यामि शर्वरीम् ॥ १ ९ १ ॥
जैसे नगरके किसी सूने घरमें संन्यासी एक रात निवास कर लेता है, इसी तरह आपके इस शरीरमें मैं आजकी रात रहूँगी ॥ १ ९ १ ॥
साहं मानप्रदानेन वागातिथ्येन चार्चिता ।
सुता सुशरणं प्रीता श्वो गमिष्यामि मैथिल ॥ १ ९ २ ॥
आपने मुझे बड़ा सम्मान दिया । अपनी वाणीरूप आतिथ्यके द्वारा मेरा भलीभाँति सत्कार किया । मिथिलानरेश! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके शरीररूपी सुन्दर गृहमें सोकर कल सबेरे यहाँसे चली जाऊँगी ॥ १ ९ २ ॥ भीष्म उवाच
इत्येतानि स वाक्यानि हेतुमन्त्यर्थवन्ति च ।
श्रुत्वा नाधिजगौ राजा किञ्चिदन्यदतः परम् ॥ १ ९ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! सुलभाके ये युक्तियुक्त और सार्थक वचन सुनकर राजा जनक इसके बाद और कोई बात नहीं बोले ॥ १ ९ ३ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सुलभाजनकसंवादे विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सुलभा और जनकका संवादविषयक तीन सौ बीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३२० ॥
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3. ‘ इह घटो अस्ति ( यहाँ घड़ा है ) ' – इत्यादि रूपसे जो सत्तासूचक व्यवहार होता है, उसका नाम 'सद्भावयोग' है । २. ‘ इह घटो नास्ति ( यहाँ घड़ा नहीं है ) ' – इत्यादि रूपसे जो असत्तासूचक व्यवहार होता है, वही ' असद्भावयोग’ है । ३. यहाँ ‘ विधि ' शब्दसे वासनाके बीजभूत धर्म और अधर्म समझने चाहिये । ४. वासनाका उद्बोधक संस्कार ही ' शुक्र ' है । ५. वासनाके अनुसार विषयकी प्राप्तिके अनुकूल जो यत्न है, वही ' बल ' है ।
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एकविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना युधिष्ठिर उवाच
कथं निर्वेदमापन्नः शुको वैयासकिः पुरा ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! पूर्वकालमें व्यासपुत्र शुकदेवको किस प्रकार वैराग्य प्राप्त हुआ था? मैं यह सुनना चाहता हूँ । इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥
अव्यक्तव्यक्ततत्त्वानां निश्चयं बुद्धिनिश्चयम् ।
वक्तुमर्हसि कौरव्य देवस्याजस्य या कृतिः ॥ २ ॥
कुरुनन्दन! इसके सिवा आप मुझे व्यक्त और अव्यक्त तत्त्वोंका बुद्धिद्वारा निश्चित किया हुआ स्वरूप बतलाइये तथा अजन्मा भगवान् नारायणका जो चरित्र है, उसे भी सुनानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
प्राकृतेन सुवृत्तेन चरन्तमकुतोभयम् ।
अध्याप्य कृत्स्नं स्वाध्यायमन्वशाद् वै पिता सुतम् ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! पुत्र शुकदेवको साधारण लोगोंकी भाँति आचरण करते और सर्वथा निर्भय विचरते देख पिता श्रीव्यासजीने उन्हें सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कराया और फिर यह उपदेश दिया ॥ ३ ॥
व्यास उवाच
धर्मं पुत्र निषेवस्व सुतीक्ष्णौ च हिमातपौ ।
क्षुत्पिपासे च वायुं च जय नित्यं जितेन्द्रियः ॥ ४ ॥
व्यासजीने कहा — बेटा! तुम सदा धर्मका सेवन करते रहो और जितेन्द्रिय होकर कड़ीसे कड़ी सर्दी, गर्मी, भूख- प्यासको सहन करते हुए प्राणवायुपर विजय प्राप्त करो ॥ ४ ॥
सत्यमार्जवमक्रोधमनसूयां दमं तपः ।
अहिंसां चानृशंस्यं च विधिवत् परिपालय ॥ ५ ॥
सत्य, सरलता, अक्रोध, दोषदर्शनका अभाव, इन्द्रिय- संयम, तप, अहिंसा और दया आदि धर्मोंका विधिपूर्वक पालन करो ॥ ५ ॥
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सत्ये तिष्ठ रतो धर्मे हित्वा सर्वमनार्जवम् ।
देवतातिथिशेषेण मात्रां प्राणस्य संलिह ॥ ६ ॥
सत्यपर डटे रहो तथा सब प्रकारकी वक्रता छोड़कर धर्ममें अनुराग करो । देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करके जो अन्न बचे, उसीका प्राणरक्षाके लिये आस्वादन करो ॥ ६ ॥
फेनमात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवत् स्थिते ।
अनित्ये प्रियसंवासे कथं स्वपिषि पुत्रक ॥ ७ ॥
बेटा! यह शरीर जलके फेनकी तरह क्षणभंगुर है । इसमें जीव पक्षीकी तरह बसा हुआ है और यह प्रियजनोंका सहवास भी सदा रहनेवाला नहीं है । फिर भी तुम क्यों सोये पड़े हो? ॥ ७ ॥
अप्रमत्तेषु जाग्रत्सु नित्ययुक्तेषु शत्रुषु ।
अन्तरं लिप्समानेषु बालस्त्वं नावबुध्यसे ॥ ८ ॥
तुम्हारे शत्रु सर्वदा सावधान, जो हुए, सर्वथा उद्यत और तुम्हारे छिद्रोंको देखनेमें लगे हुए हैं; परंतु तुम अभी बालक हो, इसलिये समझ नहीं रहे हो ॥ ८ ॥
अहःसु गण्यमानेषु क्षीयमाणे तथाऽऽयुषि ।
जीविते लिख्यमाने च किमुत्थाय न धावसि ॥ ९ ॥
तुम्हारी आयुके दिन गिने जा रहे हैं । आयु क्षीण होती जा रही है और जीवन मानो कहीं लिखा जा रहा है ( समाप्त हो रहा है ) । फिर तुम उठकर भागते क्यों नहीं हो? ( शीघ्रतापूर्वक कर्तव्यपालनमें लग क्यों नहीं जाते हो? ) ॥ ९ ॥
ऐहलौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ।
पारलौकिककार्येषु प्रसुप्ता भृशनास्तिकाः ॥ १० ॥
अत्यन्त नास्तिक मनुष्य केवल इस लोकके स्वार्थको चाहते हुए शरीरमें मांस और रक्तको बढ़ाने वाली चेष्टा ही करते रहते हैं । पारलौकिक कार्योंकी ओरसे तो वे सदा सोये ही रहते हैं ॥ १० ॥
धर्माय येऽभ्यसूयन्ति बुद्धिमोहान्विता नराः ।
अपथा गच्छतां तेषामनुयाताऽपि पीड्यते ॥ ११ ॥
जो बुद्धिके व्यामोहमें डूबे हुए मनुष्य धर्मसे द्वेष करते हैं, वे सदा कुमार्गसे ही चलते हैं । उनकी तो बात ही क्या है, उनके अनुयायियोंको भी कष्ट भोगना पड़ता है ॥ ११ ॥
ये'तु तुष्टाः श्रुतिपरा महात्मानो महाबलाः ।
धर्म्यं पन्थानमारूढास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ॥ १२ ॥
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इसलिये जो महान् धर्मबलसे सम्पन्न महात्मा पुरुष संतुष्ट और श्रुतिपरायण होकर सर्वदा धर्मपथपर ही आरूढ़ रहते हैं, तुम उन्हींकी सेवामें रहो और उन्हींसे अपना कर्तव्य पूछो ॥ १२ ॥
उपधार्य मतं तेषां बुधानां धर्मदर्शिनाम् ।
नियच्छ परया बुद्धया चित्तमुत्पथगामि वै ॥ १३ ॥
उन धर्मदर्शी विद्वानोंका मत जानकर तुम अपनी श्रेष्ठ बुद्धिके द्वारा अपने कुपथगामी मनको काबूमें करो ॥ १३ ॥
आद्यकालिकया बुद्धया दूरे श्व इति निर्भयाः ।
सर्वभक्ष्या न पश्यन्ति कर्मभूमिमचेतसः ॥ १४ ॥
जिसकी केवल वर्तमान सुखपर ही दृष्टि रहती है, उस बुद्धिके द्वारा भावी परिणामको बहुत दूर जानकर जो निर्भय रहते और सब प्रकारके अभक्ष्य पदार्थोंको खाते रहते हैं, वे बुद्धिहीन मनुष्य इस कर्मभूमिके महत्त्वको नहीं देख पाते हैं ॥ १४ ॥
धर्मं निःश्रेणिमास्थाय किंचित् किंचित् समारुह ।
कोषकारवदात्मानं वेष्टयन्नानुबुध्यसे ॥ १५ ॥
तुम धर्मरूपी सीढ़ीको पाकर धीरे- धीरे उसपर चढ़ते जाओ । अभी तो तुम रेशमके कीड़ेकी तरह अपने- आपको वासनाओंके जालसे ही लपेटते जा रहे हो, तुम्हें चेत नहीं हो रहा है ॥ १५ ॥
नास्तिकं भिन्नमर्यादं कूलपातमिव स्थितम् ।
वामतः कुरु विस्रब्धो नरं वेणुमिवोद्धृतम् ॥ १६ ॥
जो नास्तिक हो, धर्मकी मर्यादा भंग कर रहा हो और किनारेको तोड़-फोड़कर गिरा देनेवाले नदीके महान् जल-प्रवाहकी भाँति स्थित हो, ऐसे मनुष्यको उखाड़े हुए बाँसकी तरह बिना किसी हिचकके त्याग दो ॥ १६ ॥
कामं क्रोधं च मृत्युं च पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् ।
नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ॥ १७ ॥
काम, क्रोध, मृत्यु और जिसमें पाँच इन्द्रियरूपी जल भरा हुआ है, ऐसी विषयासक्तिरूपी नदीको तुम सात्त्विकी धृतिरूप नौकाका आश्रय ले पार कर लो और इस प्रकार जन्म- मृत्युरूपी दुर्गम संकटसे पार हो जाओ ॥ १७ ॥
मृत्युनाभ्याहते लोके जरया परिपीडिते ।
अमोघासु पतन्तीषु धर्मपोतेन संतर ॥ १८ ॥
सारा संसार मृत्युके थपेड़े खाता हुआ वृद्धावस्थासे पीड़ित हो रहा है । ये रातें प्राणियोंकी आयुका अपहरण करके अपनेको सफल बनाती हुई बीत रही हैं । तुम धर्मरूपी नौकापर चढ़कर भवसागरसे पार हो जाओ ॥
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तिष्ठन्तं च शयानं च मृत्युरन्वेषते यदा ।
निर्वृत्तिं लभते कस्मादकस्मान्मृत्युनाशितः ॥ १ ९ ॥
मनुष्य खड़ा हो या सो रहा हो, मृत्यु निरन्तर उसे खोजती फिरती है । जब इस प्रकार तुम अकस्मात् मृत्युके ग्रास बन जानेवाले हो, तब इस तरह निश्चिन्त एवं शान्त कैसे बैठे हो? ॥ १ ९ ॥
संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् ।
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ॥ २० ॥
मनुष्य भोगसामग्रियोंके संचयमें लगा ही रहता है और उनसे तृप्त भी नहीं होने पाता है कि भेड़के बच्चेको उठा ले जानेवाली बाघिनकी भाँति मौत उसे अपनी दाढ़में दबाकर चल देती है ॥ २० ॥
क्रमशः संचितशिखो धर्मबुद्धिमयो महान् ।
अन्धकारे प्रवेष्टव्यं दीपो यत्नेन धार्यताम् ॥ २१ ॥
यदि तुम्हें इस संसाररूपी अन्धकारमें प्रवेश करना है तो हाथमें उस धर्म-बुद्धिमय महान् दीपकको यत्नपूर्वक धारण कर लो, जिसकी शिखा क्रमशः प्रज्वलित हो रही हो ॥ २१ ॥
सम्पतन् देहजालानि कदाचिदिह मानुषे ।
ब्राह्मण्यं लभते जन्तुस्तत् पुत्र परिपालय ॥ २२ ॥
बेटा! जीव अनेक प्रकारके शरीरोंमें जन्मता-मरता हुआ कभी इस मानव-योनिमें आकर ब्राह्मणका शरीर पाता है, अतः तुम ब्राह्मणोचित कर्तव्यका पालन करो ॥
ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न कामार्थाय जायते ।
इह क्लेशाय तपसे प्रेत्य त्वनुपमं सुखम् ॥ २३ ॥
ब्राह्मणका यह शरीर भोग भोगनेके लिये नहीं पैदा होता है । यह तो यहाँ क्लेश उठाकर तपस्या करने और मृत्युके पश्चात् अनुपम सुख भोगनेके लिये रचा गया है ॥ २३ ॥
ब्राह्मण्यं बहुभिरवाप्यते तपोभि- स्तल्लब्ध्वा न रतिपरेण हेलितव्यम् । स्वाध्याये तपसि दमे च नित्ययुक्तः क्षेमार्थी कुशलपरः सदा यतस्व ॥ २४ ॥
बहुत समयतक बड़ी भारी तपस्या करनेसे ब्राह्मणका शरीर मिलता है । उसे पाकर विषयानुरागमें फँसकर बरबाद नहीं करना चाहिये । अतः यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो कुशलप्रद कर्ममें संलग्न हो सदा स्वाध्याय, तपस्या और इन्द्रियसंयममें पूर्णतः तत्पर रहनेका प्रयत्न करो ॥ २४ ॥
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अव्यक्तप्रकृतिरयं कलाशरीरः सूक्ष्मात्मा क्षणत्रुटिशो निमेषरोमा । ऋत्वास्यः समबलशुक्लकृष्णनेत्रो मासाङ्गो द्रवति वयोहयो नराणाम् ॥ २५ ॥
तं दृष्ट्वा प्रसूतमजस्रमुग्रवेगं गच्छन्तं सततमिहाव्यपेक्षमाणम् । चक्षुस्ते यदि न परप्रणेतृनेयं धर्मे ते भवतु मनः परं निशाम्य ॥ २६ ॥
मनुष्योंका आयुरूप अश्व बड़े वेगसे दौड़ा जा रहा है । इसका स्वभाव अव्यक्त है । कला - काष्ठा आदि इसके शरीर हैं । इसका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है । क्षण, त्रुटि ( चुटकी ) और निमेष आदि इसके रोम हैं । ऋतुएँ मुख हैं। समान बलवाले शुक्ल और कृष्णपक्ष नेत्र हैं तथा महीने इसके विभिन्न अंग हैं । वह भयंकर वेगशाली अश्व यहाँकी किसी वस्तुकी अपेक्षा न रखकर निरन्तर अविराम गतिसे वेगपूर्वक भागा जा रहा है । उसे देखकर यदि तुम्हारी ज्ञानदृष्टि दूसरेके द्वारा चलानेपर चलनेवाली नहीं है; तो तुम्हारा मन धर्ममें ही लगना चाहिये । तुम दूसरे धर्मात्माओंपर भी दृष्टि डालो ॥ २५-२६ ॥ ये चात्र प्रचलितधर्मकामवृत्ताः क्रोशन्तः सततमनिष्टसम्प्रयोगाः । क्लिश्यन्तः परिगतवेदना शरीरा बह्वीभिः सुभृशमधर्मकारणाभिः ॥ २७ ॥
जो लोग यहाँ धर्मसे विचलित हो स्वेच्छाचारमें लगे हुए हैं, दूसरोंको बुरा-भला कहते हुए सदा अनिष्टकारी अशुभ कर्मोंमें ही लगे हुए हैं, वे मरनेके बाद यातनादेह पाकर अपने अनेक पापकर्मोंके कारण अत्यन्त क्लेश भोगते हैं ॥ २७ ॥
राजा सदा धर्मपरः शुभाशुभस्य गोप्ता समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान् । बहुविधमपि चरति प्रविशति सुखमनुपगतं निरवद्यम् ॥ २८ ॥
जो राजा सर्वदा धर्मपरायण रहकर उत्तम और अधम प्रजाका यथायोग्य विचारपूर्वक पालन करता है, वह पुण्यात्माओंके लोकोंको प्राप्त होता है । यदि वह स्वयं भी नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका आचरण करता है तो उसके फलस्वरूप उसे अप्राप्त एवं निर्दोष सुख प्राप्त होता है ॥ २८ ॥
श्वानो भीषणकाया अयोमुखानि वयांसि