श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2121–2130
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2121–2130
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यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदबिन्दवः ।
संश्लिष्टानि तथा राजन् प्राणिनामिह सम्भवः ॥ ९ ७ ॥
राजन्! जैसे काठके साथ लाह और धूलके साथ पानीकी बूंदें मिलकर एक हो जाती हैं, उसी प्रकार इस जगत् में प्राणियोंका जन्म कई तत्त्वोंके मेलसे होता है ॥
शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धः पञ्चेन्द्रियाणि च ।
पृथगात्मान आत्मानं संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत् ॥ ९ ८ ॥
न चैषां चोदना काचिदस्तीत्येष विनिश्चयः । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध तथा पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ— ये आत्मासे पृथक् होनेपर भी काष्ठमें सटे हुए लाहके समान आत्माके साथ जुड़े हुए हैं; परंतु इनमें स्वतन्त्र कोई प्रेरणा-शक्ति नहीं है । यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ ९८ ॥
एकैकस्येह विज्ञानं नास्त्यात्मनि तथा परे ॥ ९९ ॥
न वेद चक्षुश्चक्षुष्ट्वं श्रोत्रं नात्मनि वर्तते । इनमेंसे एक - एक इन्द्रियको न तो अपना ज्ञान है और न दूसरेका । नेत्र अपने नेत्रत्वको नहीं जानता । इसी प्रकार कान भी अपने विषयमें कुछ नहीं जानता ॥ ९९ ३ ॥ तथैव व्यभिचारेण न वर्तन्ते परस्परम् ॥ १०० ॥
प्रश्लिष्टं च न जानन्ति यथाऽऽप इव पांसवः । इसी तरह ये इन्द्रियाँ और विषय परस्पर एक- दूसरेसे मिल- जुलकर भी नहीं जान सकते । जैसे कि जल और धूल परस्पर मिलकर भी अपने सम्मिश्रणको नहीं जानते ॥ १०० ॥
बाह्यानन्यानपेक्षन्ते गुणांस्तानपि मे शृणु ॥ १०१ ॥
रूपं चक्षुः प्रकाशश्च दर्शने हेतवस्त्रयः । शरीरस्थ इन्द्रियाँ विषयोंका प्रत्यक्ष अनुभव करते समय अन्यान्य बाह्य गुणोंकी अपेक्षा -रखती हैं । उन गुणोंको आप मुझसे सुनिये । रूप, नेत्र और प्रकाश – ये तीन किसी वस्तुको प्रत्यक्ष देखनेमें हेतु हैं ॥ १०१ ॥
यथैवात्र तथान्येषु ज्ञानज्ञेयेषु हेतवः ॥ १०२ ॥
ज्ञानज्ञेयान्तरे तस्मिन् मनो नामापरो गुणः ।
विचारयति येनायं निश्चये साध्वसाधुनी ॥ १०३ ॥
जैसे प्रत्यक्ष दर्शनमें ये तीन हेतु हैं, उसी प्रकार अन्यान्य ज्ञान और ज्ञेयमें भी तीन - तीन हेतु जानने चाहिये । ज्ञान और ज्ञातव्य विषयोंके बीचमें किसी ज्ञानेन्द्रियके अतिरिक्त मन नामक एक दूसरा गुण भी रहता है, जिससे यह जीवात्मा किसी विषयमें भले - बुरेका निश्चय करनेके लिये विचार करता है ॥
द्वादशस्त्वपरस्तत्र बुद्धिर्नाम गुणः स्मृतः ।
येन संशयपूर्वेषु बोद्धव्येषु व्यवस्यति ॥ १०४ ॥
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वहीं एक और बारहवाँ गुण भी है, जिसका नाम है बुद्धि। जिससे किसी ज्ञातव्य विषयमें संशय उत्पन्न होनेपर मनुष्य एक निश्चयपर पहुँचता है ॥ १०४ ॥
अथ द्वादशके तस्मिन् सत्त्वं नामापरो गुणः ।
महासत्त्वोऽल्पसत्त्वो वा जन्तुर्येनानुमीयते ॥ १०५ ॥
उस बारहवें गुण बुद्धिमें सत्त्वनामक एक ( तेरहवाँ ) गुण है, जिससे महासत्त्व और अल्पसत्त्व प्राणीका अनुमान किया जाता है ॥ १०५ ॥
अहं कर्तेति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दशः ।
ममायमिति येनायं मन्यते न ममेति च ॥ १०६ ॥
उस सत्त्वमें ‘ मैं कर्ता हूँ ' ऐसे अभिमानसे युक्त अहंकार नामक एक अन्य चौदहवाँ गुण है, जिससे जीवात्मा ' यह वस्तु मेरी है और यह वस्तु मेरी नहीं है ' ऐसा मानता है ॥ १०६ ॥
अथ पञ्चदशो राजन् गुणस्तत्रापरः स्मृतः ।
पृथक्कलासमूहस्य सामग्र्यं तदिहोच्यते ॥ १०७ ॥
गुणस्त्वेवापरस्तत्र संघात इव षोडशः । राजन्! उस अहंकारमें वासना नामक एक गुण और माना गया है, जो पंद्रहवाँ है । वहाँ पृथक् - पृथक् कलाओंके समूहकी जो समग्रता है, वह एक अन्य गुण है । वह संघातकी भाँति यहाँ सोलहवाँ कहा जाता है ॥ १०७३ ॥
प्रकृतिर्व्यक्तिरित्येतौ गुणौ यस्मिन् समाश्रितौ ॥ १०८ ॥
जिसमें प्रकृति ( माया ) और व्यक्ति ( प्रकाश ) –ये दो गुण आश्रित हैं ( यहाँतक सब अठारह हुए ) ॥ १०८ ॥
सुखासुखे जरामृत्यू लाभालाभौ प्रियाप्रिये ।
इति चैकोनविंशोऽयं द्वन्द्वयोग इति स्मृतः ॥ १० ९ ॥
सुख और दुःख, जरा और मृत्यु, लाभ और हानि तथा प्रिय और अप्रिय इत्यादि द्वन्द्वोंका जो योग है, यह उन्नीसवाँ गुण माना गया है ॥ १० ९ ॥
ऊर्ध्वं चैकोनविंशत्या कालो नामापरो गुणः ।
इतीमं विद्धि विंशत्या भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥ ११० ॥
इस उन्नीसवें गुणसे परे काल नामक दूसरा गुण और है । इसे बीसवाँ गुण समझिये ।
इसीसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और लय होते हैं ॥ ११० ॥
विंशकश्चैष संघातो महाभूतानि पञ्च च ।
सदसद्भावयोगौ तु गुणावन्यौ प्रकाशकौ ॥ १११ ॥
इन बीस गुणोंका समुदाय एवं पाँच महाभूत तथा सद्भावयोग और असद्भावयोगे-ये दो अन्य प्रकाशक गुण, ये सब मिलकर सत्ताईस हैं ॥ १११ ॥
'ये' इत्येवं विंशकश्चैव गुणाः सप्त च ये स्मृताः ।
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विधिः शुक्रं बलं चेति त्रय एते गुणाः परे ॥ ११२ ॥
ये जो बीस और सात गुण बताये गये हैं, इनके सिवा तीन गुण और हैं – विधिः, शुक्र और बल ॥
विंशतिर्दश चैवं हि गुणाः संख्यानतः स्मृताः ।
समग्रा यत्र वर्तते तच्छरीरमिति स्मृतम् ॥ ११३ ॥
इस प्रकार गणना करनेसे बीस और दस तीस गुण होते हैं । ये सारे - के - सारे गुण जहाँ विद्यमान हैं, उसको शरीर कहा गया है ॥ ११३ ॥
अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति ।
व्यक्तं चासां तथा चान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति ॥ ११४ ॥
कोई- कोई विद्वान् अव्यक्त प्रकृतिको इन तीस कलाओंका उपादान कारण मानते हैं । दूसरे स्थूलदर्शी विचारक व्यक्त अर्थात् परमाणुओंको कारण मानते हैं तथा कोई- कोई अव्यक्त और व्यक्तको अर्थात् प्रकृति और परमाणु –इन दोनोंको उनका उपादान कारण समझते हैं ॥ ११४ ॥
अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वयीमथ चतुष्टयीम् ।
प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तकाः ॥ ११५ ॥
अव्यक्त हो, व्यक्त हो, दोनों हों अथवा चारों ( ब्रह्म, माया, जीव और अविद्या ) कारण हों, अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले विद्वान् प्रकृतिको ही सम्पूर्ण भूतोंका उपादान कारण समझते हैं ॥ ११५ ॥
येयं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता ।
अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः ॥ ११६ ॥
राजेन्द्र! यह जो अव्यक्त प्रकृति सबका उपादान कारण है, यही पूर्वोक्त तीस कलाओंके रूपमें व्यक्तभावको प्राप्त हुई है । मैं, आप तथा जो अन्य शरीरधारी हैं, उन सबके शरीरोंकी उत्पत्ति प्रकृतिसे ही हुई है ॥ ११६ ॥
बिन्दुन्यासादयोऽवस्थाः शुक्रशोणितसम्भवाः ।
यासामेव निपातेन कललं नाम जायते ॥ ११७ ॥
प्राणियोंकी वीर्यस्थापनासे लेकर रजोवीर्यसंयोग- सम्भूत कुछ ऐसी अवस्थाएँ हैं, जिनके सम्मिश्रणसे ही ' कलल ' नामक एक पदार्थ उत्पन्न होता है ॥ ११७ ॥
कललाद् बुबुदोत्पत्तिः पेशी च बुद्बुदात् स्मृता ।
पेश्यास्त्वङ्गाभिनिर्वृत्तिर्नखरोमाणि चाङ्गतः ॥ ११८ ॥
कललसे बुबुदकी उत्पत्ति होती है । बुदबुदसे मांसपेशीका प्रादुर्भाव माना गया है । पेशीसे विभिन्न अंगोंका निर्माण होता है और अंगोंसे रोमावलियाँ तथा नख प्रकट होते हैं ॥ ११८ ॥
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सम्पूर्णे नवमे मासि जन्तोर्जातस्य मैथिल ।
जायते नामरूपत्वं स्त्री पुमान् वेति लिङ्गतः ॥ ११ ९ ॥
मिथिलानरेश! गर्भमें नौ मास पूर्ण हो जानेपर जीव जन्म ग्रहण करता है । उस समय उसे नाम और रूप प्राप्त होता है तथा वह विशेष प्रकारके चिह्नसे स्त्री अथवा पुरुष समझा जाता है ॥ ११ ९ ॥
जातमात्रं तु तद्रूपं दृष्ट्वा ताम्रनखाङ्गुलि ।
कौमारं रूपमापन्नं रूपतो नोपलभ्यते ॥ १२० ॥
जिस समय बालकका जन्म होता है, उस समय उसका जो रूप देखनेमें आता है, उसके नख और अंगुलियाँ ताँबेके समान लाल- लाल होती हैं, फिर जब वह कुमारावस्थाको प्राप्त होता है तो उस समय उसका पहलेका वह रूप नहीं उपलब्ध होता है ॥ १२० ॥
कौमाराद् यौवनं चापि स्थावीर्यं चापि यौवनात् ।
अनेन क्रमयोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते ॥ १२१ ॥
इसी प्रकार कुमारावस्थासे जवानीको और जवानीसे बुढ़ापेको वह प्राप्त होता है । इस क्रमसे उत्तरोत्तर अवस्थामें पहुँचनेपर पूर्व पूर्व अवस्थाका रूप नहीं देखनेमें आता है ॥
कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे ।
वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात् तु न विभाव्यते ॥ १२२ ॥
सभी प्राणियोंमें विभिन्न प्रयोजनकी सिद्धिके लिये जो पूर्वोक्त कलाएँ हैं, उनके स्वरूपमें प्रतिक्षण भेद या परिवर्तन हो रहा है; परंतु वह इतना सूक्ष्म है कि जान नहीं पड़ता ॥ १२२ ॥
न चैषामत्ययो राजन् लक्ष्यते प्रभवो न च ।
अवस्थायामवस्थायां दीपस्येवार्चिषो गतिः ॥ १२३ ॥
राजन्! प्रत्येक अवस्थामें इन कलाओंका लय और उद्भव होता रहता है, किंतु दिखायी नहीं देता है; ठीक उसी तरह जैसे दीपककी लौ क्षण- क्षणमें मिटती और उत्पन्न होती रहती है, पर दिखायी नहीं देती ॥ १२३ ॥
तस्याप्येवंप्रभावस्य सदश्वस्येव धावतः ।
अजस्रं सर्वलोकस्य कः कुतो वा न वा कुतः ॥ १२४ ॥
कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेदं न वा कुतः ।
सम्बन्धः कोऽस्ति भूतानां स्वैरप्यवयवैरिह ॥ १२५ ॥
जैसे दौड़ता हुआ अच्छा घोड़ा इतनी तीव्र गति से एक स्थानको छोड़कर दूसरे स्थानपर पहुँच जाता है कि कुछ कहते नहीं बनता, उसी प्रकार यह प्रभावशाली लोक निरन्तर वेगपूर्वक एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें जा रहा है, अतः उसके विषयमें यह प्रश्न नहीं बन सकता कि ‘ कौन कहाँसे आता है और कौन कहाँसे नहीं आता है, यह किसका है? किसका
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नहीं है? किससे उत्पन्न हुआ है और किससे नहीं हुआ है? प्राणियोंका अपने अंगोंके साथ भी यहाँ क्या सम्बन्ध है?' अर्थात् कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ॥ १२४-१२५ ॥
यथाऽऽदित्यान्मणेश्चापि वीरुद्भयश्चैव पावकः ।
जायन्त्येवं समुदयात् कलानामिव जन्तवः ॥ १२६ ॥
जैसे सूर्यकी किरणोंका सम्पर्क पाकर सूर्यकान्त- मणिसे आग प्रकट हो जाती है, परस्पर रगड़ खानेपर काठसे अग्निका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसी प्रकार पूर्वोक्त कलाओंके समुदायसे जीव जन्म ग्रहण करते हैं ॥ १२६ ॥
आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं यथा त्वमनुपश्यसि ।
एवमेवात्मनाऽऽत्मानमन्यस्मिन् किं न पश्यसि ॥ १२७ ॥
जैसे आप स्वयं अपने द्वारा अपनेहीमें आत्माका दर्शन करते हैं, उसी प्रकार अपने द्वारा दूसरोंमें आत्माका दर्शन क्यों नहीं करते हैं? ॥ १२७ ॥
यद्यात्मनि परस्मिंश्च समतामध्यवस्यसि ।
अथ मां कासि कस्येति किमर्थमनुपृच्छसि ॥ १२८ ॥
यदि आप अपनेमें और दूसरेमें भी समभाव रखते हैं तो मुझसे बारंबार क्यों पूछते हैं कि ' आप कौन हैं और किसकी हैं? ' ॥ १२८
इदं मे स्यादिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य मैथिल ।
कासि कस्य कुतो वेति वचनैः किं प्रयोजनम् ॥ १२ ९ ॥
मिथिलानरेश! ‘ यह मुझे प्राप्त हो जाय, यह न हो । ' इत्यादि रूपसे जो द्वन्द्वविषयक चिन्ता प्राप्त होती है, उससे यदि आप मुक्त हैं तो 'आप कौन हैं? किसकी हैं? अथवा कहाँसे आयी हैं? ' इन वचनोंद्वारा प्रश्न करनेसे आपका क्या प्रयोजन है? ॥ १२ ९ ॥
रिपौ मित्रेऽथ मध्यस्थे विजये संधिविग्रहे ।
कृतवान् यो महीपालः किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ॥ १३० ॥
शत्रु - मित्र और मध्यस्थके विषयमें, विजय, संधि और विग्रहके अवसरोंपर जिस भूपालने यथोचित कार्य किये हैं, उसमें जीवन्मुक्तका क्या लक्षण है? ॥ १३० ॥
त्रिवर्गं सप्तधा व्यक्तं यो न वेदेह कर्मसु ।
सङ्गवान् यस्त्रिवर्गेण किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ॥ १३१ ॥
धर्म, अर्थ और कामको त्रिवर्ग कहते हैं । यह सात रूपोंमें अभिव्यक्त होता है । जो कर्मोंमें इस त्रिवर्गको नहीं जानता तथा जो सदा त्रिवर्गसे सम्बन्ध रखता है, ऐसे पुरुषमें जीवन्मुक्तका क्या लक्षण है? ॥ १३१ ॥
प्रिये वाप्यप्रिये वापि दुर्बले बलवत्यपि ।
यस्य नास्ति समं चक्षुः किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ॥ १३२ ॥
प्रिय अथवा अप्रियमें, दुर्बल अथवा बलवान्में जिसकी समदृष्टि नहीं है, उसमें मुक्तका क्या लक्षण है? ॥
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तदयुक्तस्य ते मोक्षे योऽभिमानो भवेन्नृप ।
सुहृद्भिः संनिवार्यस्तेऽविरक्तस्येव भेषजम् ॥ १३३ ॥
नरेश्वर! वास्तवमें आप योगयुक्त नहीं हैं तथापि आपको जो जीवन्मुक्तिका अभिमान हो रहा है, वह आपके सुहृदोंको दूर कर देना चाहिये अर्थात् यह नहीं मानना चाहिये कि आप जीवन्मुक्त हैं, ठीक उसी तरह जैसे अपथ्यशील रोगीको दवा देना बंद कर दिया जाता ॥ १३३ ॥
तानि तानि तु संचिन्त्य सङ्गस्थानान्यरिंदम ।
आत्मनाऽऽत्मनि सम्पश्येत् किमन्यन्मुक्तलक्षणम् ॥ १३४ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! नाना प्रकारके जो-जो पदार्थ हैं, उन सबको आसक्तिके स्थान समझकर अपने द्वारा अपनेहीमें अपनेको देखे । इसके सिवा मुक्तका और क्या लक्षण हो सकता है? ॥ १३४ ॥
इमान्यन्यानि सूक्ष्माणि मोक्षमाश्रित्य कानिचित् ।
चतुरङ्गप्रवृत्तानि सङ्गस्थानानि मे शृणु ॥ १३५ ॥
राजन्! अपने मोक्षका आश्रय लेकर भी ये और दूसरे जो कुछ चार अंगोंमें प्रवृत्त आसक्तिके जो सूक्ष्म स्थान हैं, उनको भी अपना रखा है, उन्हें बताती हूँ, आप मुझसे सुनें ॥ १३५ ॥
य इमां पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छ्त्रां प्रशास्ति ह ।
एक एव स वै राजा पुरमध्यावसत्युत ॥ १३६ ॥
जो इस सारी पृथ्वीका एकच्छत्र शासन करता है, वह एक ही सार्वभौम नरेश भी एकमात्र नगरमें ही निवास करता है ॥ १३६ ॥
तत्पुरे चैकमेवास्य गृहं यदधितिष्ठति ।
गृहे शयनमप्येकं निशायां यत्र लीयते ॥ १३७ ॥
उस नगरमें भी उसके लिये एक ही महल होता है, जिसमें वह निवास करता है । उस महलमें भी उसके लिये एक ही शय्या होती है, जिसपर वह रातमें सोता है ॥ १३७ ॥
शय्यार्धं तस्य चाप्यत्र स्त्रीपूर्वमधितिष्ठति ।
तदनेन प्रसङ्गेन फलेनैवेह युज्यते ॥ १३८ ॥
उस शय्याके भी आधे भागपर राजाकी स्त्रीका अधिकार होता है; अतः इस प्रसंगसे वह बहुत अल्प फलका ही भागी होता है ॥ १३८ ॥
एवमेवोपभोगेषु भोजनाच्छादनेषु च ।
गुणेषु परिमेयेषु निग्रहानुग्रहं प्रति ॥ १३ ९ ॥
परतन्त्रः सदा राजा स्वल्पेष्वपि प्रसज्जते ।
संधिविग्रहयोगे च कुतो राज्ञः स्वतन्त्रता ॥ १४० ॥
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इसी प्रकार उपभोग, भोजन, आच्छादन तथा अन्यान्य परिमित विषयोंके सेवनमें और दुष्टोंके दमन एवं शिष्ट पुरुषोंके प्रति अनुग्रहके विषयमें भी राजा सदा ही परतन्त्र है । इसी प्रकार वह बहुत थोड़े कार्योंमें भी स्वतन्त्र नहीं है तो भी उनमें आसक्त रहता है । संधि और विग्रह करनेमें भी राजाको कहाँ स्वतन्त्रता प्राप्त है? ॥ १३ ९ -१४० ॥
स्त्रीषु क्रीडाविहारेषु नित्यमस्यास्वतन्त्रता ।
मन्त्रे चामात्यसमितौ कुतस्तस्य स्वतन्त्रता ॥ १४१ ॥
स्त्री--सहवास, क्रीड़ा और विहारमें भी उसे सदा परतन्त्रता रहती है । मन्त्रियोंकी सभामें बैठकर मन्त्रणा करते समय भी उसे कहाँ स्वतन्त्रता रहती है ॥ १४१ ॥
यदा ह्याज्ञापयत्यन्यांस्तत्रास्योक्ता स्वतन्त्रता ।
अवशः कार्य ते तत्र तस्मिंस्तस्मिन् क्षणे स्थितः ॥ १४२ ॥
राजा जिस समय दूसरोंको कुछ करनेकी आज्ञा देता है, उस समय वहाँ उसकी स्वतन्त्रता बतायी जाती है; परंतु ऐसे अवसरोंपर भी भिन्न-भिन्न क्षणोंमें राजासनपर बैठा हुआ नरेश सलाह देनेवाले मन्त्रियोंद्वारा अपनी इच्छाके विपरीत करनेके लिये विवश कर दिया जाता है ॥ १४२ ॥
स्वप्नकामो न लभते स्वप्तुं कार्यार्थिभिर्जनैः ।
शयने चाप्यनुज्ञातः सुप्त उत्थाप्यतेऽवशः ॥ १४३ ॥
वह सोना चाहता है, परंतु कार्यार्थी मनुष्योंद्वारा घिरा रहनेके कारण सोने नहीं पाता । शय्यापर सोये हुए राजाको भी लोगोंके अनुरोधसे विवश होकर उठना पड़ता है ॥ १४३ ॥
स्नाह्यालभ पिब प्राश जुहुध्यग्नीन् यजेत्यपि ।
ब्रवीहि शृणु चापीति विवशः कार्यते परैः ॥ १४४ ॥
' महाराज! स्नान कीजिये, तेल लगवाइये, पानी पीजिये, भोजन कीजिये, आहुति दीजिये, अग्निहोत्रमें संलग्न होइये, अपनी कहिये और दूसरोंकी सुनिये । ' इत्यादि बातें कह-कहकर दूसरे लोग राजाको वैसा करनेके लिये विवश कर देते हैं ॥ १४४ ॥
अभिगम्याभिगम्यैवं याचन्ते सततं नराः ।
न चाप्युत्सहते दातुं वित्तरक्षी महाजनान् ॥ १४५ ॥
याचक मनुष्य सदा निकट आ आकर राजासे धनकी याचना करते हैं; किंतु जो लोग दानके श्रेष्ठ पात्र हैं, उनके लिये भी वह कुछ देनेका साहस नहीं करता । अपने धनको सर्वथा सुरक्षित रखना चाहता है ॥ १४५ ॥
दाने कोषक्षयोऽप्यस्य वैरं चास्याप्रयच्छतः ।
क्षणेनास्योपवर्तन्ते दोषा वैराग्यकारकाः ॥ १४६ ॥
यदि सबको धनका दान करे तो उसका खजाना ही खाली हो जाय और किसीको कुछ न दे तो सबके साथ वैर बढ़ जाय । उसके सामने क्षण- क्षणमें ऐसे दोष उपस्थित होते हैं, जो उसे राज - काजसे विरक्त कर देते हैं ॥ १४६ ॥
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प्राज्ञान् शूरांस्तथैवाढ्यानेकस्थानपि शङ्कते ।
भयमप्यभये राज्ञो यैश्च नित्यमुपास्यते ॥ १४७ ॥
विद्वानों, शूरवीरों तथा धनियोंको भी जब वह एक स्थानपर जुटा हुआ देख लेता है, तब उसके मनमें उनके प्रति शंका उत्पन्न हो जाती है । जहाँ भयका कोई कारण नहीं है, वहाँ भी राजाको भय होता है । जो लोग सदा उसके पास उठते - बैठते या सेवामें रहते हैं, उनसे भी वह सशंक बना रहता है ॥ १४७ ॥
तथा चैते प्रदुष्यन्ति राजन् ये कीर्तिता मया ।
तथैवास्य भयं तेभ्यो जायते पश्य यादृशम् ॥ १४८ ॥
राजन्! मैंने जिनका नाम लिया है, वे विद्वान् और शूरवीर आदि अपने प्रति राजाकी आशंका देखकर सचमुच ही उसके प्रति दुर्भाव रखने लगते हैं और फिर उनसे राजाको जैसा भय प्राप्त होता है, उसको आप स्वयं ही समझ लें ॥ १४८ ॥
सर्वः स्वे स्वे गृहे राजा सर्वः स्वे स्वे गृहे गृही ।
निग्रहानुग्रहान् कुर्वंस्तुल्यो जनक राजभिः ॥ १४ ९ ॥
जनक! सब लोग अपने - अपने घरमें राजा हैं और सभी अपने - अपने घरमें गृहस्वामी हैं, सभी किसीको दण्ड देते और किसीपर अनुग्रह करते हैं; अतः वे सब लोग राजाओंके समान ही हैं ॥ १४ ९ ॥
पुत्रा दारास्तथैवात्मा कोशी मित्राणि संचयाः ।
परैः साधारणा ह्येते तैस्तैरेवास्य हेतुभिः ॥ १५० ॥
- स्त्री, पुत्र, शरीर, कोष, मित्र तथा संग्रह – ये सब वस्तुएँ राजाओंकी भाँति दूसरोंके पास भी साधारणतया रहते ही हैं । जिन कारणोंसे वह राजा कहलाता है, उन्हीं युक्तियोंसे दूसरे लोग भी उसके समान ही कहे जा सकते हैं ॥ १५० ॥
हतो देशः पुरं दग्धं प्रधानः कुञ्जरो मृतः ।
लोकसाधारणेष्वेषु मिथ्याज्ञानेन तप्यते ॥ १५१ ॥
'हाय! देश नष्ट हो गया, सारा नगर आगसे जल गया और वह प्रधान हाथी मर गया । ' यद्यपि ये सब बातें सब लोगोंके लिये साधारण हैं— सबपर समान रूपसे ये कष्ट प्राप्त होते हैं तथापि राजा अपने मिथ्याज्ञानके कारण केवल अपनी ही हानि समझकर संतप्त होता रहता है ॥ १५१ ॥
अमुक्तो मानसैर्दुःखैरिच्छाद्वेषभयोद्भवैः ।
शिरोरोगादिभी रोगैस्तथैवाभिनियन्तृभिः ॥ १५२ ॥
इच्छा, द्वेष और भयजनित मानसिक दुःख राजाको कभी नहीं छोड़ते हैं । सिरदर्द आदि शारीरिक रोग भी उसे सब ओरसे नियन्त्रणमें रखकर व्याकुल किये रहते ॥ १५२ ॥
द्वन्द्वैस्तैस्तैस्त्वपहतः सर्वतः परिशङ्कितः ।
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बहुप्रत्यर्थिकं राज्यमुपास्ते गणयन्निशाः ॥ १५३ ॥
वह नाना प्रकारके द्वन्द्वोंसे आहत और सब ओरसे शंकित हो रातें गिनता हुआ अनेक शत्रुओंसे भरे हुए राज्यका सेवन करता है ॥ १५३ ॥
तदल्पसुखमत्यर्थं बहुदुःखमसारवत् ।
तृणाग्निज्वलनप्रख्यं फेनबुद्बुदसंनिभम् ॥ १५४ ॥
को राज्यमभिपद्येत प्राप्य चोपशमं लभेत् । जिसमें सुख तो बहुत थोड़ा, किंतु दुःख बहुत अधिक है, जो सर्वथा सारहीन है, जो घास - फूसमें लगी आगके समान क्षणस्थायी और फेन तथा बुद्बुदके समान क्षणभंगुर है, ऐसे राज्यको कौन ग्रहण करेगा? और ग्रहण कर लेनेपर कौन शान्ति पा सकता है? ॥ ममेदमिति यच्चेदं पुरं राष्ट्रं च मन्यसे ॥ १५५ ॥
बलं कोशममात्यांश्च कस्यैतानि न वा नृप । नरेश्वर! आप जो इस नगरको, राष्ट्रको, सेनाको तथा कोष और मन्त्रियोंको भी ‘ ये सब मेरे हैं ' ऐसा कहते हुए अपना मानते हैं, वह आपका भ्रम ही है । मैं पूछती हूँ, ये सब किसके हैं और किसके नहीं हैं? ॥ मित्रामात्यपुरं राष्ट्रं दण्डः कोशो महीपतिः ॥ १५६ ॥
सप्ताङ्गस्यास्य राज्यस्य त्रिदण्ड्यस्येव तिष्ठतः अन्योन्यगुणयुक्तस्य कः केन गुणतोऽधिकः ॥ १५७ ॥
मित्र, मन्त्री, नगर, राष्ट्र, दण्ड, कोष और राजा- ये राज्यके सात अंग हैं । जैसे मेरे हाथमें त्रिदण्ड है, वैसे आपके हाथमें यह राज्य स्थित है । आपका सात अंगोंवाला राज्य और मेरा त्रिदण्ड- ये दोनों परस्पर उत्कृष्ट गुणोंसे युक्त हैं। फिर इनमें से कौन किस गुणके कारण अधिक है? ॥ १५६-१५७ ॥
तेषु तेषु हि कालेषु तत्तदङ्गं विशिष्यते ।
येन यत् सिध्यते कार्यं तत् प्राधान्याय कल्पते ॥ १५८ ॥
राज्यके जो सात अंग हैं, उनमें सभी समय- समयपर अपनी विशिष्टता सिद्ध करते हैं । जिस अंगसे जो कार्य सिद्ध होता है, उसके लिये उसीकी प्रधानता मानी जाती है ॥ १५८ ॥
सप्ताङ्गश्चैव संघातस्त्रयश्चान्ये नृपोत्तम ।
सम्भूय दशवर्गोऽयं भुङ्क्ते राज्यं हि राजवत् ॥ १५ ९ ॥
नृपश्रेष्ठ! उक्त सात अंगोंका समुदाय और तीन अन्य शक्तियाँ ( प्रभु - शक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति) —ये सब मिलकर राज्यके दस वर्ग हैं । ये दसों वर्ग संगठित होकर राजाके समान ही राज्यका उपभोग करते हैं ॥ १५ ९ ॥
यश्च राजा महोत्साहः क्षत्रधर्मे रतो भवेत् ।
सतुष्येद् दशभागेन ततस्त्वन्यो दशावरैः ॥ १६० ॥
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जो राजा महान् उत्साही और क्षत्रिय धर्ममें तत्पर होता है, वह ' कर' के रूपमें प्रजाकी आयका दसवाँ भाग लेकर संतुष्ट हो जाता है तथा उससे भिन्न साधारण भूपाल दसवें भागसे कम लेकर भी संतोष कर लेते हैं ॥ १६० ॥
नास्त्यसाधारणो राजा नास्ति राज्यमराजकम् ।
राज्येऽसति कुतो धर्मो धर्मेऽसति कुतः परम् ॥ १६१ ॥
साधारण प्रजा न हो तो कोई राजा नहीं हो सकता । राजा न हो तो राज्य नहीं टिक सकता । राज्य न हो तो धर्म कैसे रह सकता है और धर्म न हो तो परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? ॥ १६१ ॥
योऽप्यत्र परमो धर्मः पवित्रं राजराज्ययोः ।
पृथिवी दक्षिणा यस्य सोऽश्वमेधेन युज्यते ॥ १६२ ॥
यहाँ राजा और राज्यके लिये जो परम धर्म और परम पवित्र वस्तु है, उसे सुनिये । जिसकी पृथ्वी दक्षिणा- रूपमें दे दी जाती है अर्थात् जो अपनी राज्यभूमिका दान कर देता है, वह अश्वमेध यज्ञके पुण्यफलका भागी होता है ॥
साहमेतानि कर्माणि राजदुःखानि मैथिल ।
समर्था शतशो वक्तुमथवापि सहस्रशः ॥ १६३ ॥
मिथिलानरेश! जो राजाको दुःख देनेवाले हैं, ऐसे सैकड़ों और हजारों कर्म मैं यहाँ बता सकती हूँ ॥ १६३ ॥
स्वदेहेनाभिषङ्गो मे कुतः परपरिग्रहे ।
न मामेवंविधां युक्तामीदृशं वक्तुमर्हसि ॥ १६४ ॥
मेरी तो अपने ही शरीरमें आसक्ति नहीं है, फिर दूसरेके शरीरमें कैसे हो सकती है? इस प्रकार योगयुक्त रहनेवाली मुझ संन्यासिनीके प्रति आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ १६४ ॥
ननु नाम त्वया मोक्षः कृत्स्नः पञ्चशिखाच्छ्रुतः ।
सोपायः सोपनिषदः सोपासङ्गः सनिश्चयः ॥ १६५ ॥
तस्य ते मुक्तसङ्गस्य पाशानाक्रम्य तिष्ठतः ।
छत्रादिषु विशेषेषु पुनः सङ्गः कथं नृप ॥ १६६ ॥
नरेश्वर! जब आपने महर्षि पंचशिखाचार्यसे उपाय ( निदिध्यासन ), उपनिषद् ( उसके श्रवण- मनन ), उपासंग ( यम- नियम आदि योगाङ्ग ) और निश्चय ( ब्रह्म और जीवात्माकी एकताका अनुभव) –इन सबके सहित सम्पूर्ण मोक्षशास्त्रका श्रवण किया है, आप आसक्तियोंसे मुक्त हो गये हैं और सम्पूर्ण बन्धनोंको काटकर खड़े हैं, तब आपकी छत्र-चवँर आदि विशेष - विशेष वस्तुओंमें आसक्ति कैसे हो रही है? ॥ १६५-१६६ ॥
श्रुतं ते न श्रुतं मन्ये मृषा वापि श्रुतं श्रुतम् ।
अथवा श्रुतसंकाशं श्रुतमन्यच्छ्रुतं त्वया ॥ १६७ ॥