श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2141–2150

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2141–2150

पृष्ठ 2141

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बलगृध्रकुलपक्षिणां च संघाः ।

नरकदने रुधिरपा गुरुवचन- नुदमुपरतं विशसन्ति ॥ २ ९ ॥

परंतु जो गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करते हैं, उनके मरणके पश्चात् नरकमें स्थित भयानक शरीरवाले कुत्ते, लौहमुख पक्षी, कौए -गीध आदि पक्षियोंके समुदाय तथा रक्त पीनेवाले कीट उनके यातना- शरीरपर आक्रमण करके उसे नोचते और काटते हैं ॥ २ ९ ॥ मर्यादा नियताः स्वयम्भुवा य इहेमाः

प्रभिनत्ति दशगुणा मनोऽनुगत्वात् ।

निवसति भृशमसुखं पितृविषय- विपिनमवगाह्य स पापः ॥ ३० ॥

जो मनुष्य मनचाही करनेके कारण स्वायम्भुवमनुकी बाँधी हुई धर्मकी दस * प्रकारकी मर्यादाओंको तोड़ता है, वह पापात्मा पितृलोकके असिपत्रवनमें जाकर वहाँ अत्यन्त दुःख भोगता रहता है ॥ ३० ॥

यो लुब्धः सुभृशं प्रियानृतश्च मनुष्यः सततनिकृतिवञ्चनाभिरतिः स्यात् । उपनिधिभिरसुखकृत्स परमनिरयगो भृशमसुखमनुभवति दुष्कृतकर्मा ॥ ३१ ॥

जो पुरुष अत्यन्त लोभी, असत्यसे प्रेम करनेवाला और सर्वदा कपटभरी बातें बनानेवाला और ठगाईमें रत है तथा जो तरह- तरहके साधनोंसे दूसरोंको दुःख देता है, वह पापात्मा घोर नरकमें पड़कर अत्यन्त दुःख भोगता है ॥ ३१ ॥

उष्णां वैतरणीं महानदी - मवगाढोऽसिपत्रवनभिन्नगात्रः । परशुवनशयो निपतितो वसति च महानिरये भृशार्तः ॥ ३२ ॥

उसे अत्यन्त उष्ण महानदी वैतरणीमें गोता लगाना पड़ता है । असिपत्रवनमें उसका अंग - अंग छिन्न- भिन्न हो जाता है और परशुवनमें उसे शयन करना पड़ता है । इस प्रकार महानरकमें पड़कर वह अत्यन्त आतुर हो उठता है और विवश होकर उसीमें निवास करता है ॥ ३२ ॥

महापदानि कत्थसे न चाप्यवेक्षसे परम् ।

चिरस्य मृत्युकारिकामनागतां न बुध्यसे ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 2142

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तुम ब्रह्मलोक आदि बड़े -बड़े स्थानोंकी बातें तो बनाते हो, परंतु परमपदपर तुम्हारी दृष्टि नहीं है । भविष्यमें जो मृत्युकी परिचारिका वृद्धावस्था आनेवाली है, उसका तुम्हें पता ही नहीं है ॥ ३३ ॥

प्रयायतां किमास्यते समुत्थितं महद् भयम् ।

अतिप्रमाथि दारुणं सुखस्य संविधीयताम् ॥ ३४ ॥

वत्स! चुपचाप क्यों बैठे हो? जल्दीसे आगे बढ़ो । तुम्हारे ऊपर हृदयको अत्यन्त मथ डालनेवाला, भयंकर एवं महान् भय उठ खड़ा हुआ है; अतः परमानन्दकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करो ॥ ३४ ॥

पुरा मृतः प्रणीयते यमस्य राजशासनात् ।

त्वमन्तकाय दारुणैः प्रयत्नमार्जवे कुरु ॥ ३५ ॥

तुम्हें मरनेपर यमराजकी आज्ञासे भयानक यमदूतोंद्वारा उनके सामने उपस्थित किया जाय, इसके पहले ही सरलतारूप धर्मके सम्पादनके लिये प्रयत्न करो ॥ ३५ ॥

पुरा समूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यदुःखवित् ।

तवेह जीवितं यमो न चास्ति तस्य वारकः ॥ ३६ ॥

यमराज सबके स्वामी हैं । वे किसीका दुःख -दर्द नहीं समझते हैं । वे मूल और बन्धु - बान्धवोंसहित तुम्हारे प्राण हर लेंगे । उन्हें रोकनेवाला कोई नहीं है । वह समय आनेके पहले ही तुम अपनी रक्षाके लिये प्रबन्ध कर लो ॥ ३६ ॥

पुराऽभिवाति मारुतो यमस्य यः पुरःसरः ।

पुरैक एव नीयसे कुरुष्व साम्परायिकम् ॥ ३७ ॥

जिस समय यमराजके आगे - आगे चलनेवाला प्रचण्ड कालरूपी पवन चल पड़ेगा, उस समय वह अकेले तुम्हींको वहाँ ले जायगा; अतः तुम पहलेसे ही परलोकमें सुख देनेवाले धर्मका आचरण करो ॥ ३७ ॥

पुरा स हि क्व एव ते प्रवाति मारुतोऽन्तकः ।

पुरा च विभ्रमन्ति ते दिशो महाभयागमे ॥ ३८ ॥

पूर्वजन्ममें तुम्हारे सामने जो प्राणनाशक पवन चल रहा था, आज वह कहाँ है? अब भी जब मृत्युरूप महान् भय उपस्थित होगा, तब तुम्हें सम्पूर्ण दिशाएँ घूमती दिखायी देंगी; अतः पहलेसे ही सावधान हो जाओ ॥ ३८ ॥

श्रुतिश्च संनिरुध्यते पुरा तवेह पुत्रक ।

समाकुलस्य गच्छतः समाधिमुत्तमं कुरु ॥ ३ ९ ॥

बेटा! जब तुम इस शरीरको छोड़कर चलने लगोगे, उस समय व्याकुलताके कारण तुम्हारी श्रवणशक्ति भी नष्ट हो जायगी । इसलिये तुम सुदृढ़ समाधि प्राप्त कर लो ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 2143

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शुभाशुभे पुरा कृते प्रमादकर्मविप्लुते ।

स्मरन् पुरा न तप्यसे निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ४० ॥

तुम पहले असावधानतावश जो अनुचितरूपसे शुभाशुभ कर्म कर चुके हो, उसे स्मरण करके उनके फलभोगसे संतप्त होनेके पहले ही अपने लिये केवल ज्ञानका भण्डार भर लो ॥ ४० ॥

पुरा जरा कलेवरं विजर्जरीकरोति ते ।

बलाङ्गरूपहारिणी निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ४१ ॥

देखो, बल, अंग और रूपका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था एक दिन तुम्हारे शरीरको जर्जर कर डालेगी, उसके पहले ही तुम अपने लिये ज्ञानका भण्डार भर लो ॥ ४१ ॥

पुरा शरीरमन्तको भिनत्ति रोगसारथिः ।

प्रसह्य जीवितक्षये तपो महत् समाचर ॥ ४२ ॥

रोग जिसका सारथि है, वह काल हठात् तुम्हारे शरीरको विदीर्ण कर डालेगा, इसलिये इस जीवनका नाश होनेसे पूर्व ही तुम महान् तपका अनुष्ठान कर लो ॥ ४२ ॥

पुरा वृका भयंकरा मनुष्यदेहगोचराः ।

अभिद्रवन्ति सर्वतो यतस्व पुण्यशीलने ॥ ४३ ॥

इस मानव- शरीरमें रहनेवाले काम-क्रोध आदि भयंकर व्याघ्र तुमपर चारों ओरसे आक्रमण कर रहे हैं, इसलिये पहलेसे ही तुम पुण्यसंचयके लिये प्रयत्न करो ॥

पुरान्धकारमेककोऽनुपश्यसि त्वरस्व वै ।

पुरा हिरण्मयान् नगान् निरीक्षसेऽद्रिमूर्धनि ॥ ४४ ॥

मरनेके समय तुम्हें पहले घोर अन्धकार दिखलायी देगा । फिर पर्वतके शिखरपर सुनहरे वृक्ष दृष्टिगोचर होंगे । वह समय आनेसे पहले ही अपने कल्याणके लिये तुम शीघ्र प्रयत्न करो ॥ ४४ ॥

पुरा कुसङ्गतानि ते सुहृन्मुखाश्च शत्रवः ।

विचालयन्ति दर्शनाद् घटस्व पुत्र यत्परम् ॥ ४५ ॥

इस संसारमें दुष्ट पुरुषोंके संग तथा ऊपरसे मित्रभाव एवं भीतरसे शत्रुता रखनेवाले लोग दर्शनमात्रसे तुम्हें कर्तव्यपथसे विचलित कर देंगे, इसलिये तुम पहलेसे ही परम उत्तम पुण्यसंचयके लिये प्रयत्न करो ॥

धनस्य यस्य राजतो भयं न चास्ति चोरतः ।

मृतं च यन्न मुञ्चति समर्जयस्व तद् धनम् ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 2144

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जिस धनको न तो राजासे भय है और न चोरसे ही तथा जो मर जानेपर भी जीवका साथ नहीं छोड़ता है, उस धर्मरूपी धनका उपार्जन करो ॥ ४६ ॥

न तत्र संवियुज्यते स्वकर्मभिः परस्परम् ।

यदेव यस्य यौतकं तदेव तत्र सोऽश्नुते ॥ ४७ ॥

अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए उस धनको परलोकमें परस्पर बाँटना नहीं पड़ता है । वहाँ तो जो जिसकी निजी सम्पत्ति है, उसे ही वह भोगता है ॥ ४७ ॥

परत्र येन जीव्यते तदेव पुत्र दीयताम् ।

धनं यदक्षरं ध्रुवं समर्जयस्व तत् स्वयम् ॥ ४८ ॥

बेटा! जिससे परलोकमें भी जीवन निर्वाह हो सकता है तथा जो अविनाशी और अटल धन है, उसीका दान करो एवं उसीका स्वयं भी उपार्जन करते रहो ॥ ४८ ॥

न यावदेव पच्यते महाजनस्य यावकम् ।

अपक्व एव यावके पुरा प्रलीयसे त्वर ॥ ४ ९ ॥

बेटा! घरपर आये हुए किसी समादरणीय अतिथिके लिये जितनी देरमें यावक ( घृत और खाँड़ मिलाकर तैयार किया हुआ जौके आटेका पूआ ) पकाया जाता है, उसके पकनेसे भी पहले तुम्हारी मृत्यु हो सकती है; अतः तुम ज्ञानरूपी धनके उपार्जनके लिये शीघ्रता करो ॥ ४ ९ ॥

न मातृपुत्रबान्धवा न संस्तुतः प्रियो जनः ।

अनुव्रजन्ति संकटे व्रजन्तमेकपातिनम् ॥ ५० ॥

जीव जब अकेला ही परलोकके पथपर प्रस्थान करता है, उस संकटके समय माता, पुत्र, भाई- बन्धु तथा अन्यान्य प्रशंसित प्रियजन भी उसके साथ नहीं जाते हैं ॥ ५० ॥

यदेव कर्म केवलं पुरा कृतं शुभाशुभम् ।

तदेव पुत्र सार्थिकं भवत्यमुत्र गच्छतः ॥ ५१ ॥

पुत्र! परलोकमें जाते समय अपना पहलेका किया हुआ जो शुभाशुभ कर्म होता है, केवल वही साथ रहता है ॥ ५१ ॥

हिरण्यरत्नसंचयाः शुभाशुभेन संचिताः ।

न तस्य देहसंक्षये भवन्ति कार्यसाधकाः ॥ ५२ ॥

मनुष्यके द्वारा अच्छे- बुरे सभी तरहके कर्म करके जो सुवर्ण और रत्नोंके ढेर इकट्ठे किये जाते हैं, वे भी उस मनुष्यके शरीरका नाश होनेपर उसके किसी काम नहीं आते हैं ( क्योंकि वे सब यहीं रह जाते हैं ) ॥ ५२ ॥

परत्रगामिकस्य ते कृताकृतस्य कर्मणः ।

न साक्षि आत्मना समो नृणामिहास्ति कश्चन ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 2145

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परलोककी यात्रा करते समय तुम्हारे किये और न किये हुए कर्मका साक्षी आत्माके समान मनुष्योंमें दूसरा कोई नहीं है ॥ ५३ ॥

मनुष्यदेहशून्यकं भवत्यमुत्र गच्छतः ।

प्रविश्य बुद्धिचक्षुषा प्रदृश्यते हि सर्वशः ॥ ५४ ॥

परलोकमें जाते समय इस मनुष्य शरीरका अभाव हो जाता है अर्थात् यह यहीं छूट जाता है । जीव सूक्ष्म शरीरसे लोकान्तरमें प्रवेश करके अपने बुद्धिरूपी नेत्रसे वहाँ सब कुछ देखता है ॥ ५४ ॥

इहाग्निसूर्यवायवः शरीरमाश्रितास्त्रयः ।

त एव तस्य साक्षिणो भवन्ति धर्मदर्शिनः ॥ ५५ ॥

इस लोकमें अग्नि, वायु और सूर्य– ये तीन देवता जीवके शरीरका आश्रय करके रहते हैं । वे ही उसके धर्माचरणको देखनेवाले हैं और वे ही परलोकमें उसके साक्षी होते हैं ॥ ५५ ॥

अहर्निशेषु सर्वतः स्पृशत्सु सर्वचारिषु ।

प्रकाशगूढवृत्तिषु स्वधर्ममेव पालय ॥ ५६ ॥

दिन सब पदार्थोंको प्रकाशित करता है और रात्रि उन्हें छिपा लेती है । ये सर्वत्र व्याप्त हैं और सभी वस्तुओंका स्पर्श करते हैं, अतः तुम इनकी वेलामें सर्वदा अपने धर्मका ही पालन करो ॥ ५६ ॥

अनेकपारिपन्थिके विरूपरौद्रमक्षिके ।

स्वमेव कर्म रक्ष्यतां स्वकर्म तत्र गच्छति ॥ ५७ ॥

परलोकके मार्गपर बहुत- से लुटेरे और बटमार रहते हैं तथा विकराल एवं भयंकर डाँस एवं मक्खियाँ होती हैं । वहाँ केवल अपना किया हुआ कर्म ही साथ जाता है; अतः तुम्हें अपने सत्कर्मकी ही रक्षा करनी चाहिये ॥ ५७ ॥

न तत्र संविभज्यते स्वकर्मणा परस्परम् ।

तथा कृतं स्वकर्मजं तदेव भुज्यते फलम् ॥ ५८ ॥

वहाँ अपने कर्मके अनुसार जो फल प्राप्त होता है, उसका किसीके साथ बँटवारा नहीं होता । वहाँ तो अपने किये हुए कर्मोंका ही फल भोगना होता है ॥ ५८ ॥

यथाप्सरोगणाः फलं सुखं महर्षिभिः सह ।

तथाऽऽप्नुवन्ति कर्मजं विमानकामगामिनः ॥ ५ ९ ॥

जैसे महर्षियोंके साथ झुंड- करी -झुंड अप्सराएँ होती हैं और वे सब पुण्यके फलस्वरूप सुख भोगते हैं, उसी प्रकार वहाँ पुण्यात्मा लोग विमानोंपर चढ़कर इच्छानुसार विचरते और पुण्यकर्मजनित सुख भोगते हैं ॥ ५ ९ ॥ यथेह यत् कृतं शुभं विपाप्मभिः कृतात्मभिः ।

पृष्ठ 2146

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तदाप्नुवन्ति मानवास्तथा विशुद्धयोनयः ॥ ६० ॥

निष्पाप पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा इस लोकमें जो शुभ कर्म सम्पादित होता है, जन्मान्तरमें विशुद्ध योनिमें जन्म लेकर उसका वैसा ही फल पाते हैं ॥ ६० ॥

प्रजापतेः सलोकतां बृहस्पतेः शतक्रतोः ।

व्रजन्ति ते परां गतिं गृहस्थधर्मसेतुभिः ॥ ६१ ॥

गृहस्थ- धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले लोग प्रजापति, बृहस्पति अथवा इन्द्रके लोकमें उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१ ॥

सहस्रशोऽप्यनेकशः प्रवक्तुमुत्सहाम ते ।

अबुद्धिमोहनं पुनः प्रभुर्निनाय पावकः ॥ ६२ ॥

वत्स! मैं तुम्हारे सामने हजारों तथा उससे भी अधिक बार यह बात जोर देकर कह सकता हूँ कि सर्वशक्तिमान् तथा सबको पवित्र करनेवाले धर्मने, जिसकी बुद्धिपर मोह नहीं छा गया है, उस धर्मात्मा पुरुषको सदा ही पुण्यलोकमें पहुँचाया है ॥ ६२ ॥

गता त्रिरष्टवर्षता ध्रुवोऽसि पञ्चविंशकः ।

कुरुष्व धर्मसंचयं वयो हि तेऽतिवर्तते ॥ ६३ ॥

बेटा! तुम्हारी आयुके चौबीस वर्ष बीत गये । अब निश्चय ही तुम पचीस सालके हो गये; अतः धर्मका संचय करो । तुम्हारी सारी आयु यों ही बीती जा रही है ॥ ६३ ॥

पुरा करोति सोऽन्तकः प्रमादगोमुखां चमूम् ।

यथागृहीतमुत्थितस्त्वरस्व धर्मपालने ॥ ६४ ॥

देखो, तुम्हारा जो प्रमाद है, उसमें निवास करनेवाला काल तुम्हारी इन्द्रियोंके समुदायको मुखरहित ( भोगशक्तिसे हीन) कर रहा है । इनके असमर्थ हो जानेके पहले ही तुम खड़े हो जाओ और अपने शरीरसे धर्मका पालन करनेके लिये जल्दी करो ॥ ६४ ॥

यथा त्वमेव पृष्ठतस्त्वमग्रतो गमिष्यसि ।

तथा गतिं गमिष्यतः किमात्मना परेण वा ॥ ६५ ॥

जिस समय तुम शरीर छोड़कर परलोककी राह लोगे, उस समय तुम्हीं पीछे रहोगे और तुम्हीं आगे चलोगे- तुम्हारे सिवा दूसरा कोई वहाँ आगे - पीछे चलनेवाला न होगा । ऐसी दशामें किसी अपने या पराये व्यक्तिसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? ॥ ६५ ॥

यदेकपातिनां सतां भवत्यमुत्र गच्छताम् ।

भयेषु साम्परायिकं निधत्स्व केवलं निधिम् ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 2147

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भय उपस्थित होनेपर अकेले यात्रा करनेवाले सत्पुरुषोंके लिये परलोकमें जो हितकर होता है, उस धर्म या ज्ञानकी निधिको शुद्धभावसे संचित करो ॥ ६६ ॥

सकूलमूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यसङ्गवान् ।

न सन्ति यस्य वारकाः कुरुष्व धर्मसंनिधिम् ॥ ६७ ॥

सर्वसमर्थ काल किसीके प्रति भी स्नेह नहीं करता । वह कूल और मूल अर्थात् आदि- अन्तसहित समस्त बन्धु - बान्धवोंको हर ले जाता है । उसको रोकनेवाले कोई नहीं हैं; इसलिये तुम धर्मका संचय करो ॥ ६७ ॥

इदं निदर्शनं मया तवेह पुत्र साम्प्रतम् ।

स्वदर्शनानुमानतः प्रवर्णितं कुरुष्व तत् ॥ ६८ ॥

बेटा! मैंने अपने शास्त्रज्ञान और अनुमानके द्वारा इस समय तुम्हें जिस ज्ञानका उपदेश किया है, तुम उसीके अनुसार आचरण करो ॥ ६८ ॥

दधाति यः स्वकर्मणा ददाति यस्य कस्यचित् ।

अबुद्धिमोहजैर्गुणैः स एक एव युज्यते ॥ ६ ९ ॥

जो पुरुष अपने सत्कर्मोंद्वारा धर्मको धारण करता है और जिस किसीको भी निष्कामभावसे दान देता है, वह अकेला ही मोहरहित बुद्धिसे प्राप्त होनेवाले गुणोंसे संयुक्त होता है ॥ ६ ९ ॥

श्रुतं समस्तमश्नुते प्रकुर्वतः शुभाः क्रियाः ।

तदेतदर्थदर्शनं कृतज्ञमर्थसंहितम् ॥ ७० ॥

जो समस्त शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करता और तदनुसार शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें लगा रहता है, उसीके लिये इस ज्ञानका उपदेश किया गया है; क्योंकि कृतज्ञ पुरुषको जो भी उपदेश दिया जाता है, वही सफल होता है ॥ ७० ॥

निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः ।

छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ॥ ७१ ॥

मनुष्य जब गाँवमें रहकर वहींके पदार्थोंसे प्रेम करने लगता है, वह उसे बाँधनेवाली रस्सी ही है । पुण्यात्मा लोग इसे काटकर उत्तम लोकोंमें चले जाते हैं, परंतु पापात्मा पुरुष इसे नहीं काट पाते हैं ॥ ७१ ॥

किं ते धनेन किं बन्धुभिस्ते किं ते पुत्रैः पुत्रक यो मरिष्यसि । आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं पितामहास्ते क्व गताश्च सर्वे ॥ ७२ ॥

बेटा! जब तुम्हें एक दिन मरना ही है, तब धन, बन्धु और पुत्र आदिसे तुम्हें क्या लेना है; अतः तुम हृदयरूपी गुफामें छिपे हुए आत्मतत्त्वका अनुसंधान

पृष्ठ 2148

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करो । सोचो तो सही; आज तुम्हारे सारे पूर्वज - पितामह कहाँ चले गये? ॥ ७२ ॥

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्निकम् ।

न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वाकृतम् ॥ ७३ ॥

जो काम कल करना हो, उसे आज ही कर लेना चाहिये और जो दोपहर-बाद करना हो, उसे पहले ही पहरमें पूरा कर डालना चाहिये; क्योंकि मौत यह नहीं देखती कि इसका काम पूरा हुआ है या नहीं ॥ ७३ ॥

अनुगम्य विनाशान्ते निवर्तन्ते ह बान्धवाः ।

अग्नौ प्रक्षिप्य पुरुषं ज्ञातयः सुहृदस्तथा ॥ ७४ ॥

मृत्युके बाद भाई- बन्धु, कुटुम्बी और सुहृद् श्मशान- भूमितक पीछे - पीछे जाते हैं और मृत पुरुषके शरीरको चिताकी आगमें डालकर लौट आते हैं ॥ ७४ ॥

नास्तिकान् निरनुक्रोशान् नरान् पापमते स्थितान् ।

वामतः कुरु विस्रब्धं परं प्रेप्सुरतन्द्रितः ॥ ७५ ॥

अतः तुम परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके इच्छुक हो आलस्य छोड़कर नास्तिक, निर्दय तथा पापबुद्धि मनुष्योंको बिना किसी हिचकके बायें कर दो —कभी भूलकर भी उनका साथ न दो ॥ ७५ ॥

एवमभ्याहते लोके कालेनोपनिपीडिते ।

सुमहद् धैर्यमालम्ब्य धर्मं सर्वात्मना कुरु ॥ ७६ ॥

इस प्रकार जब सारा संसार कालसे आहत और पीड़ित हो रहा है, तब तुम महान् धैर्यका आश्रय ले सम्पूर्ण हृदयसे धर्मका आचरण करो ॥ ७६ ॥

अथेमं दर्शनोपायं सम्यग् यो वेत्ति मानवः ।

सम्यक् स्वधर्मं कृत्वेह परत्र सुखमश्नुते ॥ ७७ ॥

जो मनुष्य परमात्माके साक्षात्कारके इस साधनको भलीभाँति जानता है, वह इस लोकमें स्वधर्मका ठीक-ठीक पालन करके परलोकमें सुख भोगता है ॥ ७७ ॥

न देहभेदे मरणं विजानतां न च प्रणाशः स्वनुपालिते पथि । धर्मं हि यो वर्धयते स पण्डितो य एव धर्माच्च्यवते स मुह्यति ॥ ७८ ॥

जो ऐसा जानते हैं कि शरीरका नाश हो जानेपर भी अपनी मृत्यु नहीं होती है और शिष्ट पुरुषोंद्वारा पालित धर्म- मार्गपर चलनेवालोंका कभी नाश नहीं होता

पृष्ठ 2149

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है, वे ही बुद्धिमान् हैं । जो इन सब बातोंको सोच -विचारकर धर्मको बढ़ाता रहता है, वह विद्वान् है । जो धर्मसे गिर जाता है, वही मोहग्रस्त अथवा मूढ़ है ॥ प्रयुक्तयोः कर्मपथि स्वकर्मणोः फलं प्रयोक्ता लभते यथाकृतम् । निहीनकर्मा निरयं प्रपद्यते त्रिविष्टपं गच्छति धर्मपारगः ॥ ७९ ॥

कर्मके मार्गपर प्रयोग ( आचरण ) में लाये गये जो अपने शुभाशुभ कर्म हैं, उनका फल कर्ताको उस कर्मके अनुसार प्राप्त होता है । नीच कर्म करनेवाला नरकमें पड़ता है और धर्माचरणमें पारङ्गत पुरुष स्वर्गलोकको जाता है ॥ ७ ९ ॥

सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ।

तथाऽऽत्मानं समादध्याद् भ्रश्यते न पुनर्यथा ॥ ८० ॥

यह दुर्लभ मानव- शरीर स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये सीढ़ीके समान है । इसे पाकर अपने - आपको इस प्रकार धर्ममें एकाग्र करे, जिससे फिर उसे स्वर्गसे नीचे न गिरना पड़े ॥ ८० ॥

यस्य नोत्क्रामति मतिः स्वर्गमार्गानुसारिणी ।

तमाहुः पुण्यकर्माणमशोच्यं पुत्रबान्धवैः ॥ ८१ ॥

स्वर्गलोकके मार्गका अनुसरण करनेवाली जिसकी बुद्धि धर्मका कभी उल्लंघन नहीं करती, उसको पुण्यात्मा कहते हैं। वह पुत्रों और बन्धु बान्धवोंके लिये कदापि शोचनीय नहीं है ॥ ८१ ॥

यस्य नोपहता बुद्धिर्निश्चये ह्यवलम्बते ।

स्वर्गे कृतावकाशस्य नास्ति तस्य महद् भयम् ॥ ८२ ॥

जिसकी बुद्धि दूषित न होकर दृढ़ निश्चयका सहारा लेती है, उसने स्वर्गमें अपने लिये स्थान बना लिया है । उसे नरकका महान् भय नहीं प्राप्त होता ॥ ८२ ॥

तपोवनेषु ये जातास्तत्रैव निधनं गताः ।

तेषामल्पतरो धर्मः कामभोगानजानताम् ॥ ८३ ॥

जो लोग तपोवनोंमें पैदा हुए और वहीं मृत्युको प्राप्त हो गये, उन्हें थोड़े - से ही धर्मकी प्राप्ति होती है; क्योंकि वे काम- भोगोंको जानते ही नहीं थे ( अतः उन्हें त्यागनेके लिये उनको कष्ट सहन नहीं करना पड़ता) ॥

यस्तु भोगान् परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत् ।

न तेन किंचिन्न प्राप्तं तन्मे बहु मतं फलम् ॥ ८४ ॥

जो भोगोंका परित्याग करके तपोवनमें जाकर शरीरसे तपस्या करता है, उसके लिये कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो प्राप्त न हो। वही फल मुझे अधिक जान

पृष्ठ 2150

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पड़ता है ॥ ८४ ॥

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।

अनागतान्यतीतानि कस्य ते कस्य वा वयम् ॥ ८५ ॥

हजारों माता- पिता और सैकड़ों स्त्री- पुत्र पहले जन्मोंमें हो चुके हैं और भविष्यमें होंगे । वे हममें से किसके हैं और हम उनमेंसे किसके हैं? ॥ ८५ ॥

अहमेको न मे कश्चिन्नाहमन्यस्य कस्यचित् ।

न तं पश्यामि यस्याहं तन्न पश्यामि यो मम ॥ ८६ ॥

मैं अकेला हूँ। न तो दूसरा कोई मेरा है और न मैं दूसरे किसीका हूँ । मैं ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जिसका मैं होऊँ तथा ऐसा भी कोई नहीं दिखायी देता, जो मेरा हो ॥ ८६ ॥

न तेषां भवता कार्यं न कार्यं तव तैरपि ।

स्वकृतैस्तानि यातानि भवांश्चैव गमिष्यति ॥ ८७ ॥

न उनका तुम कुछ कर सकते हो और न वे तुम्हारे किसी काम आ सकते हैं । वे अपने कर्मोंके साथ चले गये और तुम भी चले जाओगे ॥ ८७ ॥

इह लोके हि धनिनां स्वजनः स्वजनायते ।

स्वजनस्तु दरिद्राणां जीवतामपि नश्यति ॥ ८८ ॥

इस संसारमें जो धनवान् हैं, उन्हींके स्वजन उनके साथ स्वजनोचित बर्ताव करते हैं; दरिद्रोंके स्वजन तो उनके जीते -जी ही उन्हें छोड़कर उनकी आँखसे ओझल हो जाते हैं ॥ ८८ ॥

संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः ।

ततः क्लेशमवाप्नोति परत्रेह तथैव च ॥ ८९ ॥

मनुष्य अपनी स्त्रीके लिये अशुभ कर्मका संचय करता है, फिर उसके फलरूपमें इहलोक और परलोकमें भी कष्ट उठाता है ॥ ८ ९ ॥

पश्यति च्छिन्नभूतं हि जीवलोकं स्वकर्मणा ।

तत् कुरुष्व तथा पुत्र कृत्स्नं यत् समुदाहृतम् ॥ ९० ॥

मनुष्य अपने - अपने कर्मोंके अनुसार ही इस जीव जगत्को छिन्न-भिन्न हुआ देखता है, अतः बेटा! मैंने जो कुछ कहा है, वह सब काममें लाओ ॥ ९ ० ॥

तदेतत् सम्प्रदृश्यैव कर्मभूमिं प्रपश्यतः ।

शुभान्याचरितव्यानि परलोकमभीप्सता ॥ ९ १ ॥

इहलोक कर्मभूमि है - ऐसा समझकर इसकी ओर देखते हुए दिव्य लोकोंकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको शुभ कर्मोंका ही आचरण करना चाहिये ॥ ९ १ ॥ मासर्तुसंज्ञापरिवर्तकेण