05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2381–2390

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2381–2390

पृष्ठ 2381

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केनैष धर्मः कथितो देवेन ऋषिणापि वा ॥ ६ ॥

एकान्तिनां च का चर्या कदा चोत्पादिता विभो ।

एतन्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ॥ ७ ॥

भगवन्! इस भक्तिरूप धर्मका किस देवता अथवा ऋषिने उपदेश किया है? अनन्य भक्तोंकी जीवनचर्या क्या है? और वह कबसे प्रचलित हुई? मेरे इस संशयका निवारण कीजिये । इस विषयको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ ६-७ ॥ वैशम्पायन उवाच

समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोर्मृधे ।

अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ॥ ८ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! जिस समय कौरव और पाण्डवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये आमने - सामने डटी हुई थीं और अर्जुन युद्धसे अनमने हो रहे थे, उस समय स्वयं भगवान्ने उन्हें गीतामें इस धर्मका उपदेश दिया ॥ ८ ॥

अगतिश्च गतिश्चैव पूर्वं ते कथिता मया ।

गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥ ९ ॥

मैंने पहले तुमसे गति और अगतिका स्वरूप भी बताया था। यह धर्म गहन तथा अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्गम है ॥ ९ ॥

सम्मितः सामवेदेन पुरैवादियुगे कृतः ।

धार्यते स्वयमीशेन राजन् नारायणेन च ॥ १० ॥

राजन्! यह धर्म सामवेदके समान है । प्राचीनकालके सत्ययुगसे ही यह प्रचलित हुआ है । स्वयं जगदीश्वर भगवान् नारायण ही इस धर्मको धारण करते हैं ॥ १० ॥

एतदर्थं महाराज पृष्टः पार्थेन नारदः ।

ऋषिमध्ये महाभागः शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ॥ ११ ॥

महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने ऋषियोंके बीचमें महाभाग नारदजीसे यही विषय पूछा था । उस समय श्रीकृष्ण और भीष्म भी इस विषयको सुन रहे थे ॥ ११ ॥

गुरुणा च मयाप्येष कथितो नृपसत्तम ।

यथा तत् कथितं तत्र नारदेन तथा शृणु ॥ १२ ॥

नृपश्रेष्ठ! मेरे गुरु व्यासजीने और मैंने भी यह विषय कहा था; परंतु वहाँ नारदजीने उस विषयका जैसा वर्णन किया था, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १२ ॥

यदासीन्मानसं जन्म नारायणमुखोद्गतम् ।

ब्रह्मणः पृथिवीपाल तदा नारायणः स्वयम् ॥ १३ ॥

तेन धर्मेण कृतवान् दैवं पित्र्यं च भारत ।

फेनपा ऋषयश्चैव तं धर्मं प्रतिपेदिरे ॥ १४ ॥

पृष्ठ 2382

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भूपाल! सृष्टिके आदिमें जब भगवान् नारायणके मुखसे ब्रह्माजीका मानसिक जन्म हुआ था, उस समय साक्षात् नारायणने उन्हें इस धर्मका उपदेश किया था । भरतनन्दन! नारायणने उस धर्मसे देवताओं और पितरोंका पूजनादि कर्म किया था । फिर फेनप ऋषियोंने उस धर्मको ग्रहण किया ॥ १३-१४ ॥

वैखानसाः फेनपेभ्यो धर्मं तं प्रतिपेदिरे ।

वैखानसेभ्यः सोमस्तु ततः सोऽन्तर्दधे पुनः ॥ १५ ॥

फेनपोंसे वैखानसोंने उस धर्मको उपलब्ध किया । उनसे सोमने उसे ग्रहण किया ।

तदनन्तर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ १५ ॥

यदासीच्चाक्षुषं जन्म द्वितीयं ब्रह्मणो नृप ।

तदा पितामहेनैव सोमाद् धर्मः परिश्रुतः ॥ १६ ॥

नारायणात्मको राजन् रुद्राय प्रददौ च तम् । नरेश्वर! जब ब्रह्माजीका नेत्रजनित द्वितीय जन्म हुआ, तब उन्होंने सोमसे उस नारायण - स्वरूप धर्मको सुना था । राजन्! ब्रह्माजीने रुद्रको इसका उपदेश दिया ॥ १६३ || ततो योगस्थितो रुद्रः पुरा कृतयुगे नृप ॥ १७ ॥

बालखिल्यानृषीन् सर्वान् धर्ममेतदपाठयत् ।

अन्तर्दधे ततो भूयस्तस्य देवस्य मायया ॥ १८ ॥

नरेश्वर! तत्पश्चात् योगनिष्ठ रुद्रने पूर्वकालके कृतयुगमें सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषियोंको इस धर्मसे अवगत कराया; तदनन्तर भगवान् विष्णुकी मायासे वह धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ १७-१८ ॥

तृतीयं ब्रह्मणो जन्म यदासीद् वाचिकं महत् ।

तत्रैष धर्मः सम्भूतः स्वयं नारायणान्नृप ॥ १ ९ ॥

राजन्! जब भगवान्की वाणीसे ब्रह्माजीका तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, तब फिर साक्षात् नारायणसे ही यह धर्म प्रकट हुआ ॥ १ ९ ॥

सुपर्णो नाम तमृषिः प्राप्तवान् पुरुषोत्तमात् ।

तपसा वै सुतप्तेन दमेन नियमेन च ॥ २० ॥

सुपर्ण नामक ऋषिने इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह - पूर्वक भलीभाँति तपस्या करके भगवान् पुरुषोत्तमसे इस धर्मको प्राप्त किया ॥ २० ॥

त्रिःपरिक्रान्तवानेतत् सुपर्णो धर्ममुत्तमम् ।

यस्मात् तस्माद् व्रतं ह्येतत् त्रिसौपर्णमिहोच्यते ॥ २१ ॥

सुपर्णने प्रतिदिन इस उत्तम धर्मकी तीन आवृत्ति की थी, इसलिये इस व्रत या धर्मको यहाँ ‘ त्रिसौपर्ण' कहते हैं ॥ २१ ॥

ऋग्वेदपाठपठितं व्रतमेतद्धि दुश्चरम् ।

पृष्ठ 2383

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सुपर्णाच्चाप्यधिगतो धर्म एष सनातनः ॥ २२ ॥

वायुना द्विपदां श्रेष्ठ कथितो जगदायुषा । यह दुष्कर धर्म ऋग्वेदके पाठमें स्पष्टरूपसे पढ़ा गया है । नरश्रेष्ठ! सुपर्णसे उस सनातन धर्मको इस जगत्के प्राणस्वरूप वायुने प्राप्त किया ॥ २२३ ॥

वायोः सकाशात् प्राप्तश्च ऋषिभिर्विघसाशिभिः ॥ २३ ॥

ततो महोदधिश्चैव प्राप्तवान् धर्ममुत्तमम् ।

अन्तर्दधे ततो भूयो नारायणसमाहितः ॥ २४ ॥

वायुसे विघसाशी ऋषियोंने इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया । उनसे महोदधिको इस उत्तम धर्मकी प्राप्ति हुई । तत्पश्चात् यह धर्म फिर लुप्त होकर भगवान् नारायणमें विलीन हो गया ॥ २३-२४ ॥

यदा भूयः श्रवणजा सृष्टिरासीन्महात्मनः ।

ब्रह्मणः पुरुषव्याघ्र तत्र कीर्तयतः शृणु ॥ २५ ॥

पुरुषसिंह! जब पुनः भगवान्‌के कानोंसे महात्मा ब्रह्माजीकी चौथी बार उत्पत्ति हुई, तब जिस प्रकार इस धर्मका प्रादुर्भाव हुआ था, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २५ ॥

जगत्स्रष्टुमना देवो हरिर्नारायणः स्वयम् ।

चिन्तयामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुम् ॥ २६ ॥

साक्षात् भगवान् नारायण हरिने जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे एक ऐसे पुरुषका चिन्तन किया, जो संसारकी सृष्टि करनेमें पूर्णतः समर्थ हो ॥ २६ ॥

अथ चिन्तयतस्तस्य कर्णाभ्यां पुरुषः स्मृतः ।

प्रजासर्गकरो ब्रह्मा तमुवाच जगत्पतिः ॥ २७ ॥

सृज प्रजाः पुत्र सर्वा मुखतः पादतस्तथा । कहा जाता है, चिन्तन करते समय भगवान्‌के दोनों कानोंसे एक पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। वही प्रजाकी सृष्टि करनेवाला ब्रह्मा हुआ । जगदीश्वर नारायणने ब्रह्मासे कहा — ' बेटा! तुम अपने मुखसे लेकर पैरतकके अंगोंसे समस्त प्रजाकी सृष्टि करो ॥ २७३ ॥

श्रेयस्तव विधास्यामि बलं तेजश्च सुव्रत ॥ २८ ॥

धर्मं च मत्तो गृह्णीष्व सात्वतं नाम नामतः ।

तेन सृष्टं कृतयुगं स्थापयस्व यथाविधि ॥ २ ९ ॥

‘ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुत्र! मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा और तुम्हारे भीतर तेज एवं बलकी वृद्धि करता रहूँगा । तुम मुझसे इस सात्वत नामक धर्मको ग्रहण करो और उसके द्वारा विधिपूर्वक सत्ययुगकी सृष्टि करके उसकी स्थापना करो ' ॥ २८-२९ ॥

ततो ब्रह्मा नमश्चक्रे देवाय हरिमेधसे ।

धर्मं चाग्यं स जग्राह सरहस्यं ससंग्रहम् ॥ ३० ॥

आरण्यकेन सहितं नारायणमुखोद्भवम् ।

पृष्ठ 2384

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तदनन्तर ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिको नमस्कार किया और उन्हीं नारायणदेवके मुखसे प्रकट आरण्यक, रहस्य तथा संग्रहसहित उस श्रेष्ठ धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ३० ॥

उपदिश्य ततो धर्मं ब्रह्मणेऽमिततेजसे ॥ ३१ ॥

त्वं कर्ता युगधर्माणां निराशीः कर्मसंज्ञितम् । अमिततेजस्वी ब्रह्माको इस धर्मका उपदेश देकर उस समय भगवान्‌ने उनसे कहा —'तुम निष्कामभावसे सारे कर्म करते हुए युगधर्मोंके प्रवर्तक बनो ' ॥ ३१३ ॥

जगाम तमसः पारं यत्राव्यक्तं व्यवस्थितम् ॥ ३२ ॥

ततोऽथ वरदो देवो ब्रह्मा लोकपितामहः ।

असृजत् स ततो लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ॥ ३३ ॥

यह आदेश देकर वे अज्ञानान्धकारसे परे विराजमान अपने परम अव्यक्त धामको चले गये । तदनन्तर वरदायक देवता लोकपितामह ब्रह्माने सम्पूर्ण चराचर लोकोंकी सृष्टि की ॥ ३२-३३ ॥

ततः प्रावर्तत तदा आदौ कृतयुगं शुभम् ।

ततो हि सात्वतो धर्मो व्याप्य लोकानवस्थितः ॥ ३४ ॥

फिर तो सृष्टिके आरम्भमें कल्याणकारी कृतयुगकी प्रवृत्ति हुई और तबसे सात्वतधर्म सारे संसारमें व्याप्त हो गया ॥ ३४ ॥

तेनैवाद्येन धर्मेण ब्रह्मा लोकविसर्गकृत् ।

पूजयामास देवेशं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ ३५ ॥

लोकस्रष्टा ब्रह्माने उसी आदिधर्मके द्वारा देवेश्वर भगवान् नारायण हरिकी आराधना की ॥ ३५ ॥

धर्मप्रतिष्ठाहेतोश्च मनुं स्वारोचिषं ततः ।

अध्यापयामास तदा लोकानां हितकाम्यया ॥ ३६ ॥

फिर इस धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उन्होंने स्वारोचिषमनुको उस समय इस धर्मका उपदेश किया ॥ ३६ ॥

ततः स्वरोचिषः पुत्रं स्वयं शङ्खपदं नृप ।

अध्यापयत् पुराव्यग्रः सर्वलोकपतिर्विभुः ॥ ३७ ॥

नरेश्वर! उन दिनों स्वारोचिष मनु ही सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति एवं प्रभु थे । उन्होंने शान्तभावसे पहले अपने पुत्र शंखपदको स्वयं इस धर्मका ज्ञान प्रदान किया ॥ ३७ ॥

ततः शङ्खपदश्चापि पुत्रमात्मजमौरसम् ।

दिशां पालं सुवर्णाभमध्यापयत भारत ।

सोऽन्तर्दधे ततो भूयः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ॥ ३८ ॥

भारत! फिर शंखपदने भी अपने औरस पुत्र दिक्पाल सुवर्णाभको इस धर्मका अध्ययन कराया । इसके बाद त्रेतायुग प्राप्त होनेपर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 2385

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नासिक्ये जन्मनि पुरा ब्रह्मणः पार्थिवोत्तम ।

धर्ममेतं स्वयं देवो हरिर्नारायणः प्रभुः ॥ ३ ९ ॥

तज्जगादारविन्दाक्षो ब्रह्मणः पश्यतस्तदा । नृपश्रेष्ठ! फिर पूर्वकालमें ब्रह्माजीने नासिकाके द्वारा जब पाँचवाँ जन्म ग्रहण किया, तब स्वयं कमलनयन भगवान् नारायण हरिने ब्रह्माजीके सामने इस धर्मका उपदेश दिया ॥ ३ ९ ॥ सनत्कुमारो भगवांस्ततः प्राधीतवान् नृप ॥ ४० ॥

सनत्कुमारादपि च वीरणो वै प्रजापतिः ।

कृतादौ कुरुशार्दूल धर्ममेतदधीतवान् ॥ ४१ ॥

नरेश्वर! तत्पश्चात् भगवान् सनत्कुमारने उनसे उस सात्वत - धर्मका उपदेश ग्रहण किया । कुरुश्रेष्ठ! सनत्कुमारसे वीरण प्रजापतिने कृतयुगके आदिमें इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ४०-४१ ॥

वीरणश्चाप्यधीत्यैनं रैभ्याय मुनये ददौ ।

रैभ्यः पुत्राय शुद्धाय सुव्रताय सुमेधसे ॥ ४२ ॥

कुक्षिनाम्ने स प्रददौ दिशां पालाय धर्मिणे ।

ततोऽप्यन्तर्दधे भूयो नारायणमुखोद्भवः ॥ ४३ ॥

वीरणने इसका अध्ययन करके रैभ्यमुनिको उपदेश दिया । रैभ्यने उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ बुद्धिसे युक्त धर्मात्मा एवं शुद्ध आचार-विचारवाले अपने पुत्र दिक्पाल कुक्षिको इसका उपदेश दिया । तदनन्तर नारायणके मुखसे निकला हुआ यह सात्वत धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ४२-४३ ॥

अण्डजे जन्मनि पुनर्ब्रह्मणे हरियोनये ।

एष धर्मः समुद्भूतो नारायणमुखात् पुनः ॥ ४४ ॥

इसके बाद जब ब्रह्माजीका अण्डसे छठा जन्म हुआ, तब भगवान् से उत्पन्न हुए ब्रह्माजीके लिये पुनः भगवान् नारायणके मुखसे यह धर्म प्रकट हुआ ॥ ४४ ॥

गृहीतो ब्रह्मणा राजन् प्रयुक्तश्च यथाविधि ।

अध्यापिताश्च मुनयो नाम्ना बर्हिषदो नृप ॥ ४५ ॥

राजन्! ब्रह्माजीने इस धर्मको ग्रहण किया और वे विधिपूर्वक उसे अपने उपयोगमें लाये । नरेश्वर! फिर उन्होंने बर्हिषद् नामवाले मुनियोंको इसका अध्ययन कराया ॥ ४५ ॥

बर्हिषद्भयश्च सम्प्राप्तः सामवेदान्तगं द्विजम् ।

ज्येष्ठं नामाभिविख्यातं ज्येष्ठसामव्रतो हरिः ॥ ४६ ॥

बर्हिषद् नामक ऋषियोंसे इस धर्मका उपदेश ज्येष्ठ नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मणको मिला, जो सामवेदके पारंगत विद्वान् थे । ज्येष्ठसामकी उपासनाका उन्होंने व्रत ले रखा था । इसलिये वे ज्येष्ठसामव्रती हरि कहलाते थे ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 2386

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2386 का मूल पृष्ठ
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ज्येष्ठाच्चाप्यनुसंक्रान्तो राजानमविकम्पनम् ।

अन्तर्दधे ततो राजन्नेष धर्मः प्रभो हरेः ॥ ४७ ॥

राजन्! ज्येष्ठसे राजा अविकम्पनको इस धर्मका उपदेश प्राप्त हुआ । प्रभो! तदनन्तर यह भागवत - धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ४७ ॥

यदिदं सप्तमं जन्म पद्मजं ब्रह्मणो नृप ।

तत्रैष धर्मः कथितः स्वयं नारायणेन ह ॥ ४८ ॥

पितामहाय शुद्धाय युगादौ लोकधारिणे ।

पितामहश्च दक्षाय धर्ममेतं पुरा ददौ ॥ ४ ९ ॥

नरेश्वर! यह जो ब्रह्माजीका भगवान्‌के नाभिकमलसे सातवाँ जन्म हुआ है, इसमें स्वयं नारायणने ही कल्पके आरम्भमें जगद्धाता शुद्धस्वरूप ब्रह्माको इस धर्मका उपदेश दिया; फिर ब्रह्माजीने सबसे पहले प्रजापति दक्षको इस धर्मकी शिक्षा दी ॥ ४८-४९ ॥

ततो ज्येष्ठे तु दौहित्रे प्रादाद् दक्षो नृपोत्तम ।

आदित्ये सवितुर्ज्येष्ठे विवस्वाञ्जगृहे ततः ॥ ५० ॥

नृपश्रेष्ठ! इसके बाद दक्षने अपने ज्येष्ठ दौहित्र - अदिति सवितासे भी बड़े पुत्रको इस धर्मका उपदेश दिया । उन्हींसे विवस्वान् ( सूर्य) ने इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ५० ॥

त्रेतायुगादी च ततो विवस्वान् मनवे ददौ ।

मनुश्च लोकभूत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ ॥ ५१ ॥

फिर त्रेतायुग आरम्भमें सूर्यने मनुको और मनुने सम्पूर्ण जगत्के कल्याणके लिये अपने पुत्र इक्ष्वाकुको इसका उपदेश दिया ॥ ५१ ॥

इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः ।

गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नारायणं नृप ॥ ५२ ॥

इक्ष्वाकुके उपदेशसे इस सात्वत धर्मका सम्पूर्ण जगत्में प्रचार और प्रसार हो गया ।

नरेश्वर! कल्पान्तमें यह धर्म फिर भगवान् नारायणको ही प्राप्त हो जायगा ॥

यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।

कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ ५३ ॥

नृपश्रेष्ठ! यतियोंका जो धर्म है, वह मैंने पहले ही तुम्हें हरिगीतामें संक्षेप शैलीसे बता दिया है ॥ ५३ ॥

नारदेन सुसम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।

एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ॥ ५४ ॥

महाराज! नारदजीने रहस्य और संग्रहसहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे भलीभाँति प्राप्त किया था ॥ ५४ ॥

एवमेष महान् धर्म आद्यो राजन् सनातनः ।

दुर्विज्ञेयो दुष्करश्च सात्वतैर्धार्यते सदा ॥ ५५ ॥

पृष्ठ 2387

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राजन्! इस प्रकार यह आदि एवं महान् धर्म सनातनकालसे चला आ रहा है । यह दूसरोंके लिये दुर्ज्ञेय और दुष्कर है। भगवान्‌के भक्त सदा ही इस धर्मको धारण करते हैं ॥ ५५ ॥

धर्मज्ञानेन चैतेन सुप्रयुक्तेन कर्मणा ।

अहिंसाधर्मयुक्तेन प्रीयते हरिरीश्वरः ॥ ५६ ॥

इस धर्मको जाननेसे और अहिंसाभावसे युक्त इस सात्वतधर्मको क्रियारूपसे आचरणमें लानेसे जगदीश्वर श्रीहरि प्रसन्न होते हैं ॥ ५६ ॥

एकव्यूहविभागो वा क्वचिद् द्विर्व्यूहसंज्ञितः ।

त्रिर्व्यूहश्चापि संख्यातश्चतुर्व्यूहश्च दृश्यते ॥ ५७ ॥

भगवान्के भक्तोंद्वारा कभी केवल एक व्यूह- भगवान् वासुदेवकी, कभी दो व्यूह— वासुदेव और संकर्षणकी, कभी प्रद्युम्नसहित तीन व्यूहोंकी और कभी अनिरुद्धसहित चार व्यूहोंकी उपासना देखी जाती है ॥

हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा ।

जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिगः ॥ ५८ ॥

भगवान् श्रीहरि ही क्षेत्रज्ञ हैं, ममतारहित और निष्कल हैं । ये ही सम्पूर्ण भूतोंमें पाञ्चभौतिक गुणोंसे अतीत जीवात्मारूपसे विराजमान हैं ॥ ५८ ॥

मनश्च प्रथितं राजन् पञ्चेन्द्रियसमीरणम् ।

एष लोकविधिर्धीमानेष लोकविसर्गकृत् ॥ ५ ९ ॥

राजन्! पाँचों इन्द्रियोंका प्रेरक जो विख्यात मन है, वह भी श्रीहरि ही हैं । ये बुद्धिमान् श्रीहरि ही सम्पूर्ण जगत्के प्रेरक और स्रष्टा हैं ॥ ५ ९ ॥

अकर्ता चैव कर्ता च कार्यं कारणमेव च ।

यथेच्छति तथा राजन् क्रीडते पुरुषोऽव्ययः ॥ ६० ॥

नरेश्वर! ये अविनाशी पुरुष नारायण ही अकर्ता, कर्ता, कार्य तथा कारण हैं । ये जैसा चाहते हैं, वैसे ही क्रीड़ा करते हैं ॥ ६० ॥

एष एकान्तधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम ।

मया गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥ ६१ ॥

नृपश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे गुरुकृपासे ज्ञात हुए अनन्य भक्तिरूप धर्मका वर्णन किया है । जिनका अन्तःकरण पवित्र नहीं है, ऐसे लोगोंके लिये इस धर्मका ज्ञान होना बहुत ही कठिन है ॥ ६१ ॥

एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप ।

यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात् कुरुनन्दन ॥ ६२ ॥

अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः ।

भवेत् कृतयुगप्राप्तिराशीःकर्मविवर्जिता ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 2388

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2388 का मूल पृष्ठ
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नरेश्वर! भगवान्‌के अनन्य भक्त दुर्लभ हैं, क्योंकि ऐसे पुरुष बहुत नहीं हुआ करते । कुरुनन्दन! यदि सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, आत्मज्ञानी, अहिंसक एवं अनन्य भक्तोंसे जगत् भर जाय तो यहाँ सर्वत्र सत्ययुग ही छा जाय और कहीं भी सकाम कर्मोंका अनुष्ठान न हो ॥ ६२-६३ ॥

एवं स भगवान् व्यासो गुरुर्मम विशाम्पते ।

कथयामास धर्मज्ञो धर्मराज्ञे द्विजोत्तमः ॥ ६४ ॥

ऋषीणां संनिधौ राजन् शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः । प्रजानाथ! इस प्रकार मेरे धर्मज्ञ गुरु द्विजश्रेष्ठ भगवान् व्यासने श्रीकृष्ण और भीष्मके सुनते हुए ऋषि- मुनियोंके समीप धर्मराजको इस धर्मका उपदेश किया था ॥ ६४ ॥

तस्याप्यकथयत् पूर्वं नारदः सुमहातपाः ॥ ६५ ॥

देवं परमकं ब्रह्म श्वेतं चन्द्राभमच्युतम् ।

यत्र चैकान्तिनो यान्ति नारायणपरायणाः ॥ ६६ ॥

राजन्! उनसे भी प्राचीनकालमें महातपस्वी नारदजीने इसका प्रतिपादन किया था । नारायणकी आराधनामें लगे हुए अनन्य भक्त चन्द्रमाके समान गौरवर्णवाले उन्हीं परब्रह्मस्वरूप भगवान् अच्युतको प्राप्त होते हैं ॥ ६५-६६ ॥ जनमेजय उवाच

एवं बहुविधं धर्मं प्रतिबुद्धैर्निषेवितम् ।

न कुर्वन्ति कथं विप्रा अन्ये नानाव्रते स्थिताः ॥ ६७ ॥

जनमेजयने पूछा—मुने! इस प्रकार ज्ञानी पुरुषोंद्वारा सेवित जो यह अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न धर्म है, इसे नाना प्रकारके व्रतोंमें लगे हुए दूसरे ब्राह्मण क्यों आचरणमें नहीं लाते हैं? ॥ ६७ || वैशम्पायन उवाच

तिस्रः प्रकृतयो राजन् देहबन्धेषु निर्मिताः ।

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चैव भारत ॥ ६८ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- भरतनन्दन! शरीरके बन्धनमें बँधे हुए जो जीव हैं, उनके लिये ईश्वरने तीन प्रकारकी प्रकृतियाँ बनायी हैं - सात्त्विकी, राजसी और तामसी ॥ ६८ ॥

देहबन्धेषु पुरुषः श्रेष्ठः कुरुकुलोद्वह ।

सात्त्विकःकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षाय निश्चितः ॥ ६ ९ ॥

पुरुषसिंह! कुरुकुलधुरंधर वीर! इन तीन प्रकृतियोंवाले जीवोंमें जो सात्त्विकी प्रकृतिसे युक्त सात्त्विक पुरुष है, वही श्रेष्ठ है; क्योंकि वही मोक्षका निश्चित अधिकारी है ॥ ६ ९ ॥

अत्रापि स विजानाति पुरुषं ब्रह्मवित्तमम् ।

नारायणपरो मोक्षस्ततो वै सात्त्विकः स्मृतः ॥ ७० ॥

पृष्ठ 2389

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यहाँ भी वह इस बातको अच्छी तरह जानता है कि परमपुरुष नारायण सर्वोत्तम वेदवेत्ता हैं और मोक्षके परम आश्रय भगवान् नारायण ही हैं, इसीलिये वह मनुष्य सात्त्विक माना गया है ॥ ७० ||

मनीषितं च प्राप्नोति चिन्तयन् पुरुषोत्तमम् ।

एकान्तभक्तिः सततं नारायणपरायणः ॥ ७१ ॥

भगवान् नारायणके आश्रित उनका अनन्य भक्त अपने मनके अभीष्ट भगवान् पुरुषोत्तमका निरन्तर चिन्तन करता हुआ उनको प्राप्त कर लेता है ॥ ७१ ॥

मनीषिणो हि ये केचिद् यतयो मोक्षधर्मिणः ।

तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ॥ ७२ ॥

मोक्षधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो कोई भी मनीषी यति हैं तथा जिनकी तृष्णाका सर्वथा नाश हो गया है, उनके योग- क्षेमका भार स्वयं भगवान् नारायण वहन करते हैं ॥ ७२ ॥

जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः ।

सात्त्विकस्तु स विज्ञेयो भवेन्मोक्षे च निश्चितः ॥ ७३ ॥

जन्म - मरणके चक्करमें पड़े हुए जिस पुरुषको भगवान् मधुसूदन अपनी कृपा- दृष्टिसे देख लेते हैं, उसे सात्त्विक जानना चाहिये । वह मोक्षका सुनिश्चित अधिकारी हो जाता है ॥ ७३ ॥

सांख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवितः ।

नारायणात्मके मोक्षे ततो यान्ति परां गतिम् ॥ ७४ ॥

एकान्त भक्तोंद्वारा सेवित धर्म सांख्य और योगके तुल्य है । उसके सेवनसे मनुष्य नारायणस्वरूप मोक्षमें ही परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ७४ ॥

नारायणेन दृष्टस्तु प्रतिबुद्धो भवेत् पुमान् ।

एवमात्मेच्छया राजन् प्रतिबुद्धो न जायते ॥ ७५ ॥

राजन्! जिसपर भगवान् नारायणकी कृपादृष्टि हो जाती है, वह पुरुष ही ज्ञानवान् होता है । इस तरह अपनी इच्छामात्रसे कोई ज्ञानी नहीं होता ॥ ७५ ॥

राजसी तामसी चैव व्यामिश्रे प्रकृती स्मृते ।

तदात्मकं हि पुरुषं जायमानं विशाम्पते ॥ ७६ ॥

प्रवृत्तिलक्षणैर्युक्तं नावेक्षति हरिः स्वयम् । प्रजानाथ! राजसी और तामसी - ये दो प्रकृतियाँ दोषोंसे मिश्रित होती हैं । जो पुरुष राजस और तामस प्रकृतिसे युक्त होकर जन्म धारण करता है, वह प्रायः सकाम कर्ममें प्रवृत्तिके लक्षणोंसे युक्त होता है । अतः भगवान् श्रीहरि उसकी ओर नहीं देखते ॥ ७६३ ॥

पश्यत्येनं जायमानं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ७७ ॥

रजसा तमसा चैव मानसं समभिप्लुतम् ।

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महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2390 का मूल पृष्ठ
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ऐसा पुरुष जब जन्म लेता है, तब उसपर लोकपितामह ब्रह्माकी कृपादृष्टि होती है ( और वे उसे प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त कर देते हैं ) । उसका मन रजोगुण और तमोगुणके प्रवाहमें डूबा रहता है ॥ ७७ ॥

कामं देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम ॥ ७८ ॥

हीनाः सत्त्वेन शुद्धेन ततो वैकारिकाः स्मृताः । नृपश्रेष्ठ! देवता और ऋषि कामनायुक्त सत्त्वगुणमें स्थित होते हैं । उनमें भी शुद्ध सत्त्वगुणकी कमी होती है, इसलिये वे वैकारिक माने जाते हैं ॥ ७८३ ॥

जनमेजय उवाच कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ॥ ७९ ॥

वद सर्वं यथादृष्टं प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् । जनमेजयने पूछा — मुने! वैकारिक पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमको कैसे प्राप्त कर सकता है? यह सब आप अपने अनुभवके अनुसार बताइये और उसकी प्रवृत्तिका भी क्रमशः वर्णन कीजिये ॥ ७ ९ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच सुसुक्ष्मं सत्त्वसंयुक्तं संयुक्तं त्रिभिरक्षरैः ॥ ८० ॥

पुरुषः पुरुषं गच्छेन्निष्क्रियः पञ्चविंशकः । वैशम्पायनजीने कहा- जो अत्यन्त सूक्ष्म, सत्त्वगुणसे संयुक्त तथा अकार, उकार और मकार— इन तीन अक्षरोंसे युक्त प्रणवस्वरूप है, उस परम पुरुष परमात्माको पचीसवाँ तत्त्वरूप पुरुष ( जीवात्मा) कर्तृत्वके अहंकारसे शून्य होनेपर प्राप्त करता है ॥ ८०३३ ॥

एवमेकं सांख्ययोगं वेदारण्यकमेव च ॥ ८१ ॥

परस्पराङ्गान्येतानि पाञ्चरात्रं च कथ्यते ।

एष एकान्तिनां धर्मो नारायणपरात्मकः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार आत्मा और अनात्माका विवेक करानेवाला सांख्य, चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपदेश देनेवाला योग, जीव और ब्रह्मके अभेदका बोध करानेवाला वेदोंका आरण्यकभाग ( उपनिषद्) तथा भक्तिमार्गका प्रतिपादन करनेवाला पाञ्चरात्र आगम — ये सब शास्त्र एक लक्ष्यके साधक होनेके कारण एक बताये जाते हैं । ये सब एक- दूसरेके अंग हैं । सारे कर्मोंको भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंमें समर्पित कर देना यह एकान्त भक्तोंका धर्म है ॥ ८१-८२ ॥ यथा समुद्रात् प्रसृता जलौघा- स्तमेव राजन् पुनराविशन्ति । इमे तथा ज्ञानमहाजलौघा नारायणं वै पुनराविशन्ति ॥ ८३ ॥