05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2401–2410
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2401–2410
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सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा ।
ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ ६४ ॥
राजर्षे! सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत- शास्त्र - इन ज्ञानोंको तुम नाना प्रकारके मत समझो ||
सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वेत्ता नान्यः पुरातनः ॥ ६५ ॥
सांख्यशास्त्रके वक्ता कपिल हैं । वे परम ऋषि कहलाते हैं । योगशास्त्रके पुरातन ज्ञाता हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी ही हैं, दूसरा नहीं ॥ ६५ ॥
अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ।
प्राचीनगर्भं तमृषिं प्रवदन्तीह केचन ॥ ६६ ॥
मुनिवर अपान्तरतमा वेदोंके आचार्य बताये जाते हैं । यहाँ कुछ लोग उन महर्षिको प्राचीनगर्भ कहते हैं ॥
उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः ।
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ॥ ६७ ॥
ब्रह्माजीके पुत्र भूतनाथ श्रीकण्ठ उमापति भगवान् शिवने शान्तचित्त होकर पाशुपतज्ञानका उपदेश किया है ॥
पाञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वेत्ता तु भगवान् स्वयम् ।
सर्वेषु च नृपश्रेष्ठ ज्ञानेष्वेतेषु दृश्यते ॥ ६८ ॥
यथागमं यथाज्ञानं निष्ठा नारायणः प्रभुः ।
न चैनमेवं जानन्ति तमोभूता विशाम्पते ॥ ६ ९ ॥
नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण पाञ्चरात्रके ज्ञाता तो साक्षात् भगवान् नारायण ही हैं । यदि वेदशास्त्र और अनुभवके अनुसार विचार किया जाय तो इन सभी ज्ञानोंमें इनके परम तात्पर्यरूपसे भगवान् नारायण ही स्थित दिखायी देते हैं । प्रजानाथ! जो अज्ञानमें डूबे हुए हैं, वे लोग भगवान् श्रीहरिको इस रूपमें नहीं जानते हैं ॥ ६८-६९ ॥
तमेव शास्त्रकर्तारः प्रवदन्ति मनीषिणः ।
निष्ठां नारायणमृषिं नान्योऽस्तीति वचो मम ॥ ७० ॥
शास्त्रके रचयिता ज्ञानीजन उन नारायण ऋषिको ही समस्त शास्त्रोंका परम लक्ष्य बताते हैं; दूसरा कोई उनके समान नहीं है - यह मेरा कथन है ॥ ७० ॥
निःसंशयेषु सर्वेषु नित्यं वसति वै हरिः ।
ससंशयान् हेतुबलान् नाध्यावसति माधवः ॥ ७१ ॥
ज्ञानके बलसे जिनके संशयका निवारण हो गया है, उन सबके भीतर सदा श्रीहरि निवास करते हैं; परंतु कुतर्कके बलसे जो संशयमें पड़े हुए हैं, उनके भीतर भगवान् माधवका निवास नहीं है ॥ ७१ ॥
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पाञ्चरात्रविदो ये तु यथाक्रमपरा नृप ।
एकान्तभावोपगतास्ते हरिं प्रविशन्ति वै ॥ ७२ ॥
नरेश्वर! जो पाञ्चरात्रके ज्ञाता हैं और उसमें बताये हुए क्रमके अनुसार सेवापरायण हो अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें प्राप्त हैं, वे उन भगवान् श्रीहरिमें ही प्रवेश करते हैं ॥ ७२ ॥
सांख्यं च योगं च सनातने द्वे वेदाश्च सर्वे निखिलेन राजन् । सर्वैः समस्तैर्ऋषिभिर्निरुक्तो नारायणो विश्वमिदं पुराणम् ॥ ७३ ॥
राजन्! सांख्य और योग – ये दो सनातन शास्त्र तथा सम्पूर्ण वेद सर्वथा यही कहते हैं और समस्त ऋषियोंने भी यही बताया है कि यह पुरातन विश्व भगवान् नारायण ही हैं ॥ ७२ ॥
शुभाशुभं कर्म समीरितं यत् प्रवर्तते सर्वलोकेषु किञ्चित् । तस्मादृषेस्तद्भवतीति विद्याद् दिव्यन्तरिक्षे भुवि चाप्सु चेति ॥ ७४ ॥
स्वर्ग, अन्तरिक्ष, भूतल और जल- इन सभी स्थानोंमें और सम्पूर्ण लोकोंमें जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म होता बताया गया है, वह सब नारायणकी सत्तासे ही हो रहा है — ऐसा जानना चाहिये ॥ ७४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्वैपायनोत्पत्तौ एकोनपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें द्वैपायनकी उत्पत्तिविषयक तीन सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४९ ॥
* १. नारायण, २. ब्रह्मा, ३. वसिष्ठ, ४. शक्ति, ५. पराशर, ६. व्यास- इस प्रकार व्यासजी छठी पीढ़ीमें उत्पन्न हुए हैं ।
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पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन जनमेजय उवाच
बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।
को ह्यत्र पुरुषः श्रेष्ठः को वा योनिरिहोच्यते ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! पुरुष अनेक हैं या एक? इस जगत्में कौन पुरुष सबसे श्रेष्ठ है? अथवा किसे यहाँ सबकी उत्पत्तिका स्थान बताया जाता है? ॥ वैशम्पायन उवाच
बहवः पुरुषा लोके सांख्ययोगविचारणे ।
नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—कुरुकुलका भार वहन करनेवाले नरेश! सांख्य और योगकी विचारधाराके अनुसार इस जगत्में पुरुष अनेक हैं । वे ' एकपुरुषवाद' नहीं स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥
बहूनां पुरुषाणां च यथैका योनिरुच्यते ।
तथा तं पुरुषं विश्वं व्याख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥ ३ ॥
नमस्कृत्वा च गुरवे व्यासाय विदितात्मने ।
तपोयुक्ताय दान्ताय वन्द्याय परमर्षये ॥। ४ ॥
बहुत - से पुरुषोंकी उत्पत्तिका स्थान एक ही पुरुष कैसे बताया जाता है? यह समझानेके लिये आत्मज्ञानी, तपस्वी, जितेन्द्रिय एवं वन्दनीय परमर्षि गुरु व्यासजीको नमस्कार करके मैं तुम्हारे सामने अधिक गुणशाली विश्वात्मा पुरुषकी व्याख्या करूँगा ॥ ३-४ ॥
इदं पुरुषसूक्तं हि सर्ववेदेषु पार्थिव ।
ऋतं सत्यं च विख्यातमृषिसिंहेन चिन्तितम् ॥ ५ ॥
राजन्! यह पुरुषसम्बन्धी सूक्त तथा ऋत और सत्य सम्पूर्ण वेदोंमें विख्यात है ।
ऋषिसिंह व्यासने इसका भलीभाँति चिन्तन किया है ॥ ५ ॥
उत्सर्गेणापवादेन ऋषिभिः कपिलादिभिः ।
अध्यात्मचिन्तामाश्रित्य शास्त्राण्युक्तानि भारत ॥ ६ ॥
भारत! कपिल आदि ऋषियोंने सामान्य और विशेषरूपमें अध्यात्म- तत्त्वका चिन्तन करके विभिन्न शास्त्रोंका प्रतिपादन किया है ॥ ६ ॥
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समासतस्तु यद् व्यासः पुरुषैकत्वमुक्तवान् ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि प्रसादादमितौजसः ॥ ७ ॥
परंतु व्यासजीने संक्षेपसे पुरुषकी एकताका जिस तरह प्रतिपादन किया है, उसीको मैं भी उन अमिततेजस्वी गुरुके कृपा-प्रसादसे तुम्हें बताऊँगा ॥ ७ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ब्रह्मणा सह संवादं त्र्यम्बकस्य विशाम्पते ॥ ८ ॥
प्रजानाथ! इस विषयमें जानकार मनुष्य ब्रह्माजीके साथ रुद्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ८ ॥
क्षीरोदस्य समुद्रस्य मध्ये हाटकसप्रभः ।
वैजयन्त इति ख्यातः पर्वतप्रवरो नृप ॥ ९ ॥
नरेश्वर! क्षीरसागरके मध्यभागमें वैजयन्त नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ पर्वत है, जो सुवर्णकी - सी कान्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ९ ॥
तत्राध्यात्मगतिं देव एकाकी प्रविचिन्तयन् ।
वैराजसदनान्नित्यं वैजयन्तं निषेवते ॥ १० ॥
वहाँ एकाकी ब्रह्मा अध्यात्मगतिका चिन्तन करनेके लिये ब्रह्मलोकसे प्रतिदिन आते और उस वैजयन्त पर्वतका सेवन करते थे ॥ १० ॥
अथ तत्रासतस्तस्य चतुर्वक्त्रस्य धीमतः ।
ललाटप्रभवः पुत्रः शिव आगाद् यदृच्छया ॥ ११ ॥
आकाशेन महायोगी पुरा त्रिनयनः प्रभुः ।
ततः खान्निपपाताशु धरणीधरमूर्धनि ॥ १२ ॥
पहले एक दिन बुद्धिमान् चतुर्मुख ब्रह्माजी जब वहाँ बैठे हुए थे, उसी समय उनके ललाटसे उत्पन्न हुए पुत्र महायोगी त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव अनायास ही आकाशमार्गसे घूमते हुए वैजयन्तपर्वतके सामने आये और शीघ्र ही आकाशसे उस पर्वतशिखरपर उतर पड़े ॥ ११-१२ ॥
अग्रतश्चाभवत् प्रीतो ववन्दे चापि पादयोः ।
तं पादयोर्निपतितं दृष्ट्वा सव्येन पाणिना ॥ १३ ॥
उत्थापयामास तदा प्रभुरेकः प्रजापतिः ।
उवाच चैनं भगवांश्चिरस्यागतमात्मजम् ॥ १४ ॥
सामने ब्रह्माजीको देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनके दोनों चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया । भगवान् शिवको अपने चरणोंमें पड़ा देख उस समय एकमात्र सर्वसमर्थ भगवान् प्रजापतिने दाहिने हाथसे उन्हें उठाया और दीर्घकालके पश्चात् अपने निकट आये हुए पुत्रसे इस प्रकार कहा ॥ १३-१४ ॥ पितामह उवाच
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स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मेऽन्तिकम् ।
कच्चित् ते कुशलं पुत्र स्वाध्यायतपसोः सदा ॥ १५ ॥
नित्यमुग्रतपास्त्वं हि ततः पृच्छामि ते पुनः ॥ १६ ॥
ब्रह्माजी बोले – महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है । सौभाग्यसे मेरे निकट आये हो । बेटा! तुम्हारा स्वाध्याय और तप सदा सकुशल चल रहा है न? तुम सर्वदा कठोर तपस्यामें ही लगे रहते हो; इसलिये मैं तुमसे बारंबार तपके विषयमें पूछता हूँ ॥ १५-१६ ॥ रुद्र उवाच
त्वत्प्रसादेन भगवन् स्वाध्यायतपसोर्मम ।
कुशलं चाव्ययं चैव सर्वस्य जगतस्त्वथ ॥ १७ ॥
रुद्रने कहा — भगवन्! आपकी कृपासे मेरे स्वाध्याय और तप सकुशल चल रहे हैं;
कभी भंग नहीं हुए हैं । सम्पूर्ण जगत् भी कुशल- क्षेमसे है ॥ १७ ॥
चिरदृष्टो हि भगवान् वैराजसदने मया ।
ततोऽहं पर्वतं प्राप्तस्त्विमं त्वत्पादसेवितम् ॥ १८ ॥
प्रभो! बहुत दिन हुए, मैंने ब्रह्मलोकमें आपका दर्शन किया था । इसीलिये आज आपके चरणोंद्वारा सेवित इस पर्वतपर पुनः दर्शनके लिये आया हूँ ॥ १८ ॥
कौतूहलं चापि हि मे एकान्तगमनेन ते ।
नैतत् कारणमल्पं हि भविष्यति पितामह ॥ १ ९ ॥
पितामह! आपके एकान्तमें जानेसे मेरे मनमें बड़ा कौतूहल पैदा हुआ । मैंने सोचा, इसका कोई छोटा - मोटा कारण नहीं होगा ॥ १ ९ ॥
किं नु तत्सदनं श्रेष्ठं क्षुत्पिपासाविवर्जितम् ।
सुरासुरैरध्युषितं ऋषिभिश्चामितप्रभैः ॥ २० ॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सततं संनिषेवितम् ।
उत्सृज्येमं गिरिवरमेकाकी प्राप्तवानसि ॥ २१ ॥
क्या कारण है कि क्षुधा - पिपासासे रहित उस श्रेष्ठ धामको, जहाँ निरन्तर देवता, असुर, अमिततेजस्वी ऋषि, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपकी सेवामें उपस्थित रहते हैं, छोड़कर आप अकेले इस श्रेष्ठ पर्वतपर चले आये हैं? ॥ २०-२१ ॥ ब्रह्मोवाच
वैजयन्तो गिरिवरः सततं सेव्यते मया ।
अत्रैकाग्रेण मनसा पुरुषश्चिन्त्यते विराट् ॥ २२ ॥
ब्रह्माजीने कहा - वत्स! मैं इन दिनों गिरिवर वैजयन्तका जो निरन्तर सेवन कर रहा हूँ, इसका कारण यह है कि यहाँ एकाग्रचित्तसे विराट् पुरुषका चिन्तन किया करता ॥ २२ ॥
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रुद्र उवाच
बहवः पुरुषा ब्रह्मंस्त्वया सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
सृज्यन्ते चापरे ब्रह्मन् स चैकः पुरुषो विराट् ॥ २३ ॥
रुद्र बोले- ब्रह्मन्! आप स्वयम्भू हैं । आपने बहुत से पुरुषोंकी सृष्टि की है और अभी दूसरे- दूसरे पुरुषोंकी सृष्टि करते जा रहे हैं । वह विराट् भी तो एक पुरुष ही है, फिर उसमें क्या विशेषता है? ॥ २३ ॥
को हासौ चिन्त्यते ब्रह्मंस्त्वयैकः पुरुषोत्तमः ।
एतन्मे संशयं ब्रूहि महत् कौतूहलं हि मे ॥ २४ ॥
प्रभो! आप जिन एक पुरुषोत्तमका चिन्तन करते हैं, वे कौन हैं? मेरे इस संशयका समाधान कीजिये । इस विषयको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ २४ ॥
ब्रह्मोवाच
बहवः पुरुषाः पुत्र त्वया ये समुदाहृताः ।
एवमेतदतिक्रान्तं द्रष्टव्यं नैवमित्यपि ॥ २५ ॥
- ब्रह्माजीने कहा – बेटा! तुमने जिन बहुत-से पुरुषोंका उल्लेख किया है, उनके विषयमें तुम्हारा यह कथन ठीक ही है । जिनकी सृष्टि मैं करता हूँ, उनका चिन्तन मैं क्यों करूँगा? ॥ २५ । |
आधारं तु प्रवक्ष्यामि एकस्य पुरुषस्य ।
बहूनां पुरुषाणां स यथैका योनिरुच्यते ॥ २६ ॥
मैं तुम्हें उस एक पुरुषके सम्बन्धमें बताऊँगा, जो सबका आधार है और जिस प्रकार वह बहुत - से पुरुषोंका एकमात्र कारण बताया जाता है ॥ २६ ॥
तथा तं पुरुषं विश्वं परमं सुमहत्तमम् ।
निर्गुणं निर्गुणा भूत्वा प्रविशन्ति सनातनम् ॥ २७ ॥
जो लोग साधन करते - करते गुणातीत हो जाते हैं, वे ही उस विश्वरूप, अत्यन्त महान्, सनातन एवं निर्गुण परम पुरुषमें प्रवेश करते हैं ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये ब्रह्मरुद्रसंवादे पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाके प्रसंगमें ब्रह्मा तथा रुद्रका संवादविषयक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५० ॥
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एकपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ब्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन ब्रह्मोवाच
शृणु पुत्र यथा ह्येष पुरुषः शाश्वतोऽव्ययः ।
अक्षयश्चाप्रमेयश्च सर्वगश्च निरुच्यते ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा- बेटा! यह विराट् पुरुष जिस प्रकार सनातन, अविकारी, अविनाशी, अप्रमेय और सर्वव्यापी बताया जाता है, वह सुनो ॥ १ ॥
न स शक्यस्त्वया द्रष्टुं मयान्यैर्वापि सत्तम ।
सगुण निर्गुणो विश्व ज्ञानदृश्यो ह्यसौ स्मृतः ॥ २ ॥
साधुशिरोमणे! तुम, मैं अथवा दूसरे लोग भी उस सगुण- निर्गुण विश्वात्मा पुरुषको इन
चर्म-चक्षुओंसे नहीं देख सकते । वे ज्ञानसे ही देखने योग्य माने गये हैं ॥ २ ॥
अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ ।
वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ॥३ ॥
वे स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे रहित होकर भी सम्पूर्ण शरीरोंमें निवास करते हैं और उन शरीरोंमें रहते हुए भी कभी उनके कर्मोंसे लिप्त नहीं होते हैं ॥ ३ ॥
ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहिसंज्ञिताः ।
सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित् क्वचित् ॥ ४ ॥
वे मेरे, तुम्हारे तथा दूसरे जो देहधारी संज्ञावाले जीव हैं, उनके भी अन्तरात्मा हैं । सबके साक्षी वे पुरुषोत्तम श्रीहरि कहीं किसीके द्वारा भी पकड़में नहीं आते ॥ ४ ॥
विश्वमूर्धा विश्वभुजो विश्वपादाक्षिनासिकः ।
एकश्चरति क्षेत्रेषु स्वैरचारी यथासुखम् ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण विश्व ही उनका मस्तक, भुजा, पैर, नेत्र और नासिका है । वे स्वच्छन्द विचरनेवाले एकमात्र पुरुषोत्तम सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें सुखपूर्वक विचरण करते हैं ॥
क्षेत्राणि हि शरीराणि बीजं चापि शुभाशुभम् ।
तानि वेत्तिस योगात्मा ततः क्षेत्रज्ञ उच्यते ॥ ६ ॥
वे योगात्मा श्रीहरि क्षेत्रसंज्ञक शरीरोंको और शुभाशुभ कर्मरूप उनके कारणको भी जानते हैं, इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाते हैं ॥ ६ ॥
नागतिर्न गतिस्तस्य ज्ञेया भूतेषु केनचित् ।
सांख्येन विधिना चैव योगेन च यथाक्रमम् ॥ ७ ॥
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चिन्तयामि गतिं चास्य न गतिं वेद्मि चोत्तराम् ।
यथाज्ञानं तु वक्ष्यामि पुरुषं तु सनातनम् ॥ ८ ॥
समस्त प्राणियोंमेंसे कोई भी यह नहीं जान पाता कि वे किस तरह शरीरोंमें आते और जाते हैं? मैं क्रमशः सांख्य और योगकी विधिसे उनकी गतिका चिन्तन करता हूँ; परंतु उस उत्कृष्ट गतिको समझ नहीं पाता । तथापि मुझे जैसा अनुभव है, उसके अनुसार उस सनातन पुरुषका वर्णन करता हूँ ॥ ७-८ ॥
तस्यैकत्वं महत्त्वं च स चैकः पुरुषः स्मृतः ।
महापुरुषशब्दं स बिभर्त्येकः सनातनः ॥ ९ ॥
उनमें एकत्व भी है और महत्त्व भी; अतः एकमात्र वे ही पुरुष माने गये हैं । एक सनातन श्रीहरि ही महापुरुष नाम धारण करते हैं ॥ ९ ॥
एको हुताशो बहुधा समिध्यते एकः सूर्यस्तपसो योनिरेका । एको वायुर्बहुधा वाति लोके
महोदधिश्चाम्भसां योनिरेकः ।
पुरुषश्चैको निर्गुणो विश्वरूप- स्तं निर्गुणं पुरुषं चाविशन्ति ॥ १० ॥
अग्नि एक ही है; परंतु वह अनेक रूपोंमें प्रज्वलित एवं प्रकाशित होती है । एक ही सूर्य सारे जगत्को ताप एवं प्रकाश देते हैं । तप अनेक प्रकारका है; परंतु उसका मूल एक ही है । एक ही वायु इस जगत् में विविध रूपसे प्रवाहित होती है तथा समस्त जलोंकी उत्पत्ति और लयका स्थान समुद्र भी एक ही है । उसी प्रकार वह निर्गुण विश्वरूप पुरुष भी एक ही है । उसी निर्गुण पुरुषमें सबका लय होता है ॥ १० ॥
हित्वा गुणमयं सर्वं कर्म हित्वा शुभाशुभम् ।
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा एवं भवति निर्गुणः ॥ ११ ॥
देह, इन्द्रिय आदि समस्त गुणमय पदार्थोंकी ममता छोड़कर शुभाशुभ कर्मको त्यागकर तथा सत्य और मिथ्या दोनोंका परित्याग करके ही कोई साधक निर्गुण हो सकता है ॥ ११ ॥
अचिन्त्यं चापि तं ज्ञात्वा भावसूक्ष्मं चतुष्टयम् ।
विचरेद् योऽसमुन्नद्धः स गच्छेत् पुरुषं शुभम् ॥ १२ ॥
जो चारों सूक्ष्म भावोंसे युक्त उस निर्गुण पुरुषको अचिन्त्य जानकर अहंकारशून्य होकर विचरण करता है, वही कल्याणमय परम पुरुषको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥
एवं हि परमात्मानं केचिदिच्छन्ति पण्डिताः ।
एकात्मानं तथाऽऽत्मानमपरे ज्ञानचिन्तकाः ॥ १३ ॥
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इस प्रकार कुछ विद्वान् ( अपनेसे भिन्न ) परमात्माको पाना चाहते हैं । कुछ अपनेसे अभिन्न परमात्मा — एकात्माको पानेकी इच्छा रखते हैं तथा दूसरे विचारक केवल आत्माको ही जानना या पाना चाहते हैं ॥ १३ ॥
तत्र यः परमात्मा हि स नित्यं निर्गुणः स्मृतः ।
स हि नारायणो ज्ञेयः सर्वात्मा पुरुषो हि सः ॥ १४ ॥
इनमें जो परमात्मा है, वह नित्य निर्गुण माना गया है । उसीको नारायण नामसे जानना चाहिये । वही सर्वात्मा पुरुष है ॥ १४ ॥
न लिप्यते फलैश्चापि पद्मपत्रमिवाम्भसा ।
कर्मात्मा त्वपरो योऽसौ मोक्षबन्धैः स युज्यते ॥ १५ ॥
जैसे कमलका पत्ता पानीमें रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा कर्मफलोंसे निर्लिप्त रहता है । परंतु जो कर्मोंका कर्ता है एवं बन्धन और मोक्षसे सम्बन्ध जोड़ता है, वह जीवात्मा उससे भिन्न है ॥ १५ ॥
स सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते च सः ।
एवं बहुविधः प्रोक्तः पुरुषस्ते यथाक्रमम् ॥ १६ ॥
उसीका पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच भूत, मन और बुद्धि– इन सत्रह तत्त्वोंके राशिभूत सूक्ष्म शरीरसे संयोग होता है । वही कर्मभेदसे देव- तिर्यक् आदि भावोंको प्राप्त होनेके कारण बहुविध बताया गया है । इस प्रकार तुम्हें क्रमशः पुरुषकी एकता और अनेकताकी बात बतायी गयी ॥ १६ ॥
यत् तत्कृत्स्नं लोकतन्त्रस्य धाम वेद्यं परं बोधनीयं स बोद्धा । मन्ता मन्तव्यं प्राशिता प्राशनीयं घ्राता प्रेयं स्पर्शिता स्पर्शनीयम् ॥ १७ ॥
जो लोकतन्त्रका सम्पूर्ण धाम या प्रकाशक है, वह परम पुरुष ही वेदनीय ( जाननेयोग्य ) परम तत्त्व है । वही ज्ञाता और वही ज्ञातव्य है । वही मनन करनेवाला और वही मननीय वस्तु है । वही भोक्ता और वही भोज्य पदार्थ है । वही सूँघनेवाला और वही सूँघनेयोग्य वस्तु है । वही स्पर्श करनेवाला तथा वही स्पर्शके योग्य वस्तु है ॥ १७ ॥
द्रष्टा द्रष्टव्यं श्राविता श्रवणीयं ज्ञाता ज्ञेयं सगुणं निर्गुणं च । यद् वै प्रोक्तं तात सम्यक् प्रधानं नित्यं चैतच्छाश्वतं चाव्ययं च ॥ १८ ॥
वही द्रष्टा और द्रष्टव्य है । वही सुनानेवाला और सुनानेयोग्य वस्तु है । वही ज्ञाता और ज्ञेय है तथा वही सगुण और निर्गुण है । तात! जिसे सम्यक् प्रधान तत्त्व कहा गया है, वह भी यह पुरुष ही है । यह नित्य सनातन और अविनाशी तत्त्व है ॥ १८ ॥
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यद् वै सूते धातुराद्यं विधानं तद् वै विप्राः प्रवदन्तेऽनिरुद्धम् । यद् वै लोके वैदिकं कर्म साधु आशीर्युक्तं तद्धि तस्यैव भाव्यम् ॥ १ ९ ॥ वही मुझ विधाताके आदि विधानको उत्पन्न करता है । विद्वान् ब्राह्मण उसीको अनिरुद्ध कहते हैं । लोकमें सकाम भावसे जो वैदिक सत्कर्म किये जाते हैं, वे उस अनिरुद्धात्मा पुरुषकी प्रसन्नताके लिये ही होते हैं - ऐसा चिन्तन करना चाहिये ॥ १ ९ ॥ देवाः सर्वे मुनयः साधु शान्ता- स्तं प्राग्वंशे यज्ञभागैर्यजन्ते । अहं ब्रह्मा आद्य ईशः प्रजानां तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः ॥ २० ॥
सम्पूर्ण देवता और शान्त स्वभाववाले मुनि यज्ञशालामें यज्ञभागोंद्वारा उसीका यजन करते हैं । मैं प्रजाओंका आदि ईश्वर ब्रह्मा उसी परम पुरुषसे उत्पन्न हुआ हूँ और मुझसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है ॥ २० ॥
मत्तो जगज्जङ्गमं स्थावरं च सर्वे वेदाः सरहस्या हि पुत्र ॥ २१ ॥
पुत्र! मुझसे यह चराचर जगत् तथा रहस्यसहित सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं ॥ २१ ॥
चतुर्विभक्तः पुरुषः स क्रीडति यथेच्छति ।
एवं स भगवान् स्वेन ज्ञानेन प्रतिबोधितः ॥ २२ ॥
वासुदेव आदि चार व्यूहोंमें विभक्त हुए वे परम पुरुष ही जैसी इच्छा होती है, वैसी क्रीड़ा करते हैं । इसी तरह वे भगवान् अपने ही ज्ञानसे जाननेमें आते हैं ॥ २२ ॥
एतत् ते कथितं पुत्र यथावदनुपृच्छतः ।
सांख्यज्ञाने तथा योगे यथावदनुवर्णितम् ॥ २३ ॥
पुत्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यथावत्रूपसे ये सब बातें बतायी हैं । सांख्य और योगमें इस विषयका यथार्थरूपसे वर्णन किया गया है ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीयसमाप्तौ एकपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाका उपसंहारविषयक तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३५१ ॥