05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2411–2420
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2411–2420
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द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नारदके द्वारा इन्द्रको उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम युधिष्ठिरउवाच
धर्माः पितामहेनोक्ता मोक्षधर्माश्रिताः शुभाः ।
धर्ममाश्रमिणां श्रेष्ठं वक्तुमर्हति मे भवान् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा — पितामह! आपके बतलाये हुए कल्याणमय मोक्षसम्बन्धी धर्मोंका मैंने श्रवण किया । अब आप आश्रमधर्मोंका पालन करनेवाले मनुष्योंके लिये जो सबसे उत्तम धर्म हो, उसका उपदेश करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गः सत्यफलं महत् ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! सभी आश्रमोंमें स्वधर्मपालनका विधान है, सबमें स्वर्गका तथा महान् सत्यफल - मोक्षका भी साधन है । धर्मके यज्ञ, दान, तप आदि बहुत- से द्वार हैं; अतः इस जगत्में धर्मकी कोई भी क्रिया निष्फल नहीं होती ॥ २ ॥
यस्मिन् यस्मिंश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो - जो मनुष्य जिस -जिस विषय -स्वर्ग या मोक्षके लिये साधन करके उसमें सुनिश्चित सफलताको प्राप्त कर लेता है, उसी साधन या धर्मको वह श्रेष्ठ समझता है, दूसरेको नहीं ॥ ३ ॥
इमां च त्वं नरव्याघ्र श्रोतुमर्हसि मे कथाम् ।
पुरा शक्रस्य कथितां नारदेन महर्षिणा ॥ ४ ॥
पुरुषसिंह! इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा सुना रहा हूँ, उसे सुनो । पूर्वकालमें महर्षि नारदने इन्द्रको यह कथा सुनायी थी ॥ ४ ॥
महर्षिर्नारदो राजन् सिद्धस्त्रैलोक्यसम्मतः ।
पर्येति क्रमशो लोकान् वायुरव्याहतो यथा ॥ ५
राजन्! महर्षि नारद तीनों लोकोंद्वारा सम्मानित सिद्ध पुरुष हैं । वायुके समान उनकी
सर्वत्र अबाधित गति है । वे क्रमशः सभी लोकोंमें घूमते रहते हैं ॥ ५ ॥
स कदाचिन्महेष्वास देवराजालयं गतः ।
सत्कृतश्च महेन्द्रेण प्रत्यासन्नगतोऽभवत् ॥ ६ ॥
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महाधनुर्धर नरेश! एक समय वे नारदजी देवराज इन्द्रके यहाँ पधारे । इन्द्रने उन्हें अपने समीप ही बिठाकर उनका बड़ा आदर- सत्कार किया ॥ ६ ॥
तं कृतक्षणमासीनं पर्यपृच्छच्छचीपतिः ।
महर्षे किंचिदाश्चर्यमस्ति दृष्टं त्वयानघ ॥ ७ ॥
जब नारदजी थोड़ी देर बैठकर विश्राम ले चुके, तब शचीपति इन्द्रने पूछा - ‘ निष्पाप महर्षे! इधर आपने कोई आश्चर्यजनक घटना देखी है क्या? ॥ ७ ॥
यदा त्वमपि विप्रर्षे त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
जातकौतूहलो नित्यं सिद्धश्चरसि साक्षिवत् ॥ ८ ॥
‘ब्रह्मर्षे! आप सिद्ध पुरुष हैं और कौतूहलवश चराचर प्राणियोंसे युक्त तीनों लोकोंमें सदा साक्षीकी भाँति विचरते रहते हैं ॥ ८ ॥
न ह्यस्त्यविदितं लोके देवर्षे तव किंचन ।
श्रुतं वाप्यनुभूतं वा दृष्टं वा कथयस्व मे ॥ ९ ॥
‘ देवर्षे! जगत्में कोई भी ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो । यदि आपने कोई अद्भुत बात देखी हो, सुनी हो अथवा अनुभव की हो तो वह मुझे बताइये' ॥ ९ ॥
तस्मै राजन् सुरेन्द्राय नारदो वदतां वरः ।
आसीनायोपपन्नाय प्रोक्तवान् विपुलां कथाम् ॥ १० ॥
राजन्! उनके इस प्रकार पूछनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने अपने पास ही बैठे हुए सुरेन्द्रको एक विस्तृत कथा सुनायी ॥ १० ॥
यथा येन च कल्पेन स तस्मै द्विजसत्तमः ।
कथां कथितवान् पृष्टस्तथा त्वमपि मे शृणु ॥ ११ ॥
इन्द्रके पूछनेपर द्विजश्रेष्ठ नारदने उन्हें जैसे और जिस ढंगसे वह कथा कही थी, वैसे ही मैं भी कहूँगा । तुम भी मेरी कही हुई उस कथाको ध्यान देकर सुनो ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ बावनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३५२ ॥
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त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन भीष्म उवाच
आसीत् किल नरश्रेष्ठ महापद्मे पुरोत्तमे ।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे कश्चिद् विप्रः समाहितः ॥ १ ॥
सौम्यः सोमान्वये वेदे गताध्वा छिन्नसंशयः ।
धर्मनित्यो जितक्रोधो नित्यतृप्तो जितेन्द्रियः ॥ २ ॥
तपःस्वाध्यायनिरतः सत्यः सज्जनसम्मतः ।
न्यायप्राप्तेन वित्तेन स्वेन शीलेन चान्वितः ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं — नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! ( नारदजीने जो कथा सुनायी, वह इस प्रकार है — ) गंगाके दक्षिणतटपर महापद्म नामक कोई श्रेष्ठ नगर है । वहाँ एक ब्राह्मण रहता था । वह एकाग्रचित्त और सौम्य स्वभावका मनुष्य था । उसका जन्म चन्द्रमाके कुलमें— अत्रिगोत्रमें हुआ था । वेदमें उसकी अच्छी गति थी और उसके मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं था । वह सदा धर्मपरायण, क्रोधरहित, नित्य संतुष्ट, जितेन्द्रिय, तप और स्वाध्यायमें संलग्न, सत्यवादी और सत्पुरुषोंके सम्मानका पात्र था । न्यायोपार्जित धन और अपने ब्राह्मणोचित शीलसे सम्पन्न था ॥ १–३ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिविपुले सत्त्वाद्याश्रयसम्मिते ।
कुले महति विख्याते विशिष्टां वृत्तिमास्थितः ॥ ४ ॥
उसके कुलमें सगे - सम्बन्धियोंकी संख्या अधिक थी । सभी लोग सत्त्वप्रधान सद्गुणोंका सहारा लेकर श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करते थे । उस महान् एवं विख्यात कुलमें रहकर वह उत्तम आजीविकाके सहारे जीवन - निर्वाह करता था ॥ ४ ॥
स पुत्रान् बहुलान् दृष्ट्वा विपुले कर्मणि स्थितः ।
कुलधर्माश्रितो राजन् धर्मचर्यास्थितोऽभवत् ॥ ५ ॥
राजन्! उसने देखा कि मेरे बहुत- से पुत्र हो गये, तब वह लौकिक कार्यसे विरक्त हो महान् कर्ममें संलग्न हो गया और अपने कुलधर्मका आश्रय ले धर्माचरणमें ही तत्पर रहने लगा ॥ ५ ॥
ततः स धर्मं वेदोक्तं तथा शास्त्रोक्तमेव च ।
शिष्टाचीर्णं च धर्मं च त्रिविधं चिन्त्य चेतसा ॥ ६ ॥
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तदनन्तर उसने वेदोक्त धर्म, शास्त्रोक्त धर्म तथा शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरित धर्म–इन धर्मोंपर मन - ही-मन-म विचार करना - ||तीन प्रकारके आरम्भ किया
किन्नु मे स्याच्छुभं कृत्वा किं कृतं किं परायणम् ।
इत्येवं खिद्यते नित्यं न च याति विनिश्चयम् ॥ ७ ॥
‘ क्या करनेसे मेरा कल्याण होगा? मेरा क्या कर्तव्य है तथा कौन मेरे लिये परम आश्रय है? ' इस प्रकार वह सदा सोचते - सोचते खिन्न हो जाता था; परंतु किसी निर्णयपर नहीं पहुँच पाता था ॥ ७ ॥
तस्यैवं खिद्यमानस्य धर्मं परममास्थितः ।
कदाचिदतिथिः प्राप्तो ब्राह्मणः सुसमाहितः ॥ ८ ॥
एक दिन जब वह इसी तरह सोच -विचार में पड़ा हुआ कष्ट पा रहा था, उसके यहाँ एक परम धर्मात्मा तथा एकाग्रचित्त ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आ पहुँचा ॥ ८ ॥
स तस्मै सत्क्रियां चक्रे क्रियायुक्तेन हेतुना ।
विश्रान्तं सुसमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
ब्राह्मणने उस अतिथिका क्रियायुक्त हेतु ( शास्त्रोक्त विधि) से आदर- सत्कार किया और जब वह सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करने लगा, तब उससे इस प्रकार कहा ॥ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५३ ॥
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चतुःपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन ब्राह्मणउवाच
समुत्पन्नाभिधानोऽस्मि वाङ्माधुर्येण तेऽनघ ।
मित्रत्वमभिपन्नस्त्वं किंचिद् वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ १ ॥
ब्राह्मण बोला - निष्पाप! आपकी मीठी बातें सुनकर ही मैं आपके प्रति स्नेह-बन्धनसे बँध गया हूँ। आपके ऊपर मेरा मित्रभाव हो गया है; अतः आपसे कुछ कह रहा हूँ, मेरी बात सुनिये ॥ १ ॥
गृहस्थधर्मं विप्रेन्द्र कृत्वा पुत्रगतं त्वहम् ।
धर्मं परमकं कुर्यां को हि मार्गो भवेद् द्विज ॥ २ ॥
विप्रवर! मैं गृहस्थ- धर्मको अपने पुत्रोंके अधीन करके सर्वश्रेष्ठ धर्मका पालन करना चाहता हूँ । ब्रह्मन्! बताइये, मेरे लिये कौन - सा मार्ग श्रेयस्कर होगा? ॥ २ ॥
अहमात्मानमास्थाय एक एवात्मनि स्थितिम् ।
कर्तुं काङ्क्षामि नेच्छामि बद्धः साधारणैर्गुणैः ॥ ३ ॥
कभी मेरी इच्छा होती है कि अकेला ही रहूँ और आत्माका आश्रय लेकर उसीमें स्थित हो जाऊँ? परंतु इन तुच्छ विषयोंसे बँधा होनेके कारण वह इच्छा नष्ट हो जाती है ॥ ३ ॥
यावदेतदतीतं मे वयः पुत्रफलाश्रितम् ।
तावदिच्छामि पाथेयमादातुं पारलौकिकम् ॥ ४ ॥
अबतककी सारी आयु पुत्रसे फल पानेकी कामनामें ही बीत गयी । अब ऐसे धर्ममय धनका संग्रह करना चाहता हूँ, जो परलोकके मार्गमें पाथेय ( राहखर्च) का काम दे सके ॥ ४ ॥
अस्मिन् हि लोकसम्भारे परं पारमभीप्सतः ।
उत्पन्ना मे मतिरियं कुतो धर्ममयः प्लवः ॥ ५ ॥
मुझे इस संसारसागरसे पार जानेकी इच्छा हुई है, अतः मेरे मनमें यह जिज्ञासा हो रही है कि मुझे धर्ममयी नौका कहाँसे प्राप्त होगी? ॥ ५ ॥
संयुज्यमानानि निशम्य लोके निर्यात्यमानानि च सात्त्विकानि । दृष्ट्वा तु धर्मध्वजकेतुमालां प्रकीर्यमाणामुपरि प्रजानाम् ॥ ६ ॥
न मे मनो रज्यति भोगकाले दृष्ट्वा यतीन् प्रार्थयतः परत्र ।
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तेनातिथे बुद्धिबलाश्रयेण धर्मेण धर्मे विनियुङ्क्ष्व मां त्वम् ॥ ७ ॥
जब मैं सुनता हूँ कि संसारमें विषयोंके सम्पर्कमें आये हुए सात्त्विक पुरुष भी तरह-तरहकी यातनाएँ भोगते हैं तथा जब देखता हूँ कि समस्त प्रजाके ऊपर यमराजकी ध्वजाएँ फहरा रही हैं, तब भोगकालमें भोगोंके प्राप्त होनेपर भी उन्हें भोगनेकी रुचि मेरे मनमें नहीं होती है । जब संन्यासियोंको भी दूसरोंके दरवाजोंपर अन्न -वस्त्रकी भीख माँगते देखता हूँ, तब उस संन्यास- धर्ममें भी मेरा मन नहीं लगता है; अतः अतिथिदेव! आप अपनी ही बुद्धिके बलसे अब मुझे धर्मद्वारा धर्ममें लगाइये ॥ ६-७ ॥
सोऽतिथिर्वचनं तस्य श्रुत्वा धर्माभिभाषिणः ।
प्रोवाच वचनं श्लक्ष्णं प्राज्ञो मधुरया गिरा ॥ ८ ॥
धर्मयुक्त वचन बोलनेवाले उस ब्राह्मणकी बात सुनकर उस विद्वान् अतिथिने मधुर वाणीमें यह उत्तम वचन कहा ॥ ८ ॥
अतिथिरुवाच
अहमप्यत्र मुह्यामि ममाप्येष मनोरथः ।
न च संनिश्चयं यामि बहुद्वारे त्रिविष्टपे ॥ ९ ॥
अतिथिने कहा – विप्रवर! मेरा भी ऐसा ही मनोरथ है । मैं भी आपकी ही भाँति श्रेष्ठ धर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ, परंतु मुझे भी इस विषयमें मोह ही बना हुआ है । स्वर्गके अनेक द्वार ( साधन ) हैं, अतः किसका आश्रय लिया जाय? इसका निश्चय मैं भी नहीं कर पाता हूँ ॥ ९ ॥
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद् यज्ञफलं द्विजाः ।
वानप्रस्थाश्रयाः केचिद् गार्हस्थ्यं केचिदास्थिताः ॥ १० ॥
कोई द्विज मोक्षकी प्रशंसा करते हैं तो कोई यज्ञफलकी । कोई वानप्रस्थ - धर्मका आश्रय लेते हैं तो कोई गार्हस्थ्य- धर्मका ॥ १० ॥
राजधर्माश्रयं केचित् केचिदात्मफलाश्रयम् ।
गुरुधर्माश्रयं केचित्केचिद् वाक्संयमाश्रयम् ॥ ११ ॥
कोई राजधर्म, कोई आत्मज्ञान, कोई गुरुशुश्रुषा और कोई मौनव्रतका ही आश्रय लिये बैठे हैं ॥ ११ ॥
मातरं पितरं केचिच्छुश्रूषन्तो दिवं गताः ।
अहिंसया परे स्वर्गं सत्येन च तथा परे ॥ १२ ॥
कुछ लोग माता- पिताकी सेवा करके ही स्वर्गमें चले गये । कोई अहिंसासे और कोई सत्यसे ही स्वर्गलोकके भागी हुए हैं ॥ १२ ॥
आहवेऽभिमुखाः केचिन्निहतास्त्रिदिवं गताः ।
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केचिदुञ्छव्रतैः सिद्धाः स्वर्गमार्गं समाश्रिताः ॥ १३ ॥
कुछ वीर पुरुष युद्धमें शत्रुओंका सामना करते हुए मारे जाकर स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं । कितने ही मनुष्य उञ्छवृत्तिके द्वारा सिद्धि प्राप्त करके स्वर्गगामी हुए हैं ॥ १३ ॥
केचिदध्ययने युक्ता वेदव्रतपराः शुभाः ।
बुद्धिमन्तो गताः स्वर्गं तुष्टात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ १४ ॥
कुछ बुद्धिमान् पुरुष संतुष्टचित्त और जितेन्द्रिय हो वेदोक्त व्रतका पालन तथा स्वाध्याय करते हुए शुभसम्पन्न हो स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर चुके हैं ॥ १४ ॥
आर्जवेनापरे युक्ता निहतानार्जवैर्जनैः ।
ऋजवो नाकपृष्ठे वै शुद्धात्मानः प्रतिष्ठिताः ॥ १५ ॥
कितने ही सरल और शुद्धात्मा पुरुष सरलतासे ही संयुक्त हो कुटिल मनुष्योंद्वारा मारे गये और स्वर्ग - लोकमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ १५ ॥
एवं बहुविधैर्लोकैर्धर्मद्वारैरनावृतैः ।
ममापि मतिराविग्ना मेघलेखेव वायुना ॥ १६ ॥
इस प्रकार लोकमें धर्मके विविध एवं बहुत- से दरवाजे खुले हुए हैं, उनसे मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार उद्विग्न एवं चंचल हो उठी है, जैसे वायुसे मेघोंकी घटा ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने चतुःपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५४ ॥
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पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः अतिथिद्वारा नागराज पद्मनाभके सदाचार और सद्गुणोंका वर्णन तथा ब्राह्मणको उसके पास जानेके लिये प्रेरणा अतिथिरुवाच
उपदेशं तु ते विप्र करिष्येऽहं यथाक्रमम् ।
गुरुणा मे यथाख्यातमर्थतत्त्वं तु मे शृणु ॥ १ ॥
अतिथिने कहा — विप्रवर! मेरे गुरुने इस विषयमें जो तात्त्विक बात बतलायी है,
उसीका मैं तुमको क्रमशः उपदेश करूँगा । तुम मेरे इस कथनको सुनो ॥ १ ॥
यत्र पूर्वाभिसर्गे वै धर्मचक्रं प्रवर्तितम् ।
नैमिषे गोमतीतीरे तत्र नागाह्वयं पुरम् ॥२ ॥
समग्रैस्त्रिदशैस्तत्र इष्टमासीद् द्विजर्षभ ।
यत्रेन्द्रातिक्रमं चक्रे मान्धाता राजसत्तमः ॥ ३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! पूर्वकल्पमें जहाँ प्रजापतिने धर्मचक्र प्रवर्तित किया था, सम्पूर्ण देवताओंने जहाँ यज्ञ किया था तथा जहाँ राजाओंमें श्रेष्ठ मान्धाता यज्ञ करनेमें इन्द्रसे भी आगे बढ़ गये थे, उस नैमिषारण्यमें गोमतीके तटपर नागपुर नामक एक नगर है ॥ २-३ ॥
कृताधिवासो धर्मात्मा तत्र चक्षुःश्रवा महान् ।
पद्मनाभो महानागः पद्म इत्येव विश्रुतः ॥ ४ ॥
वहाँ एक महान् धर्मात्मा सर्प निवास करता है । उस महानागका नाम तो है पद्मनाभ; परंतु पद्म नामसे ही उसकी प्रसिद्धि है ॥ ४ ॥
स वाचा कर्मणा चैव मनसा च द्विजर्षभ ।
प्रसादयति भूतानि त्रिविधे वर्त्मनि स्थितः ॥ ५ ॥
द्विजश्रेष्ठ! पद्म मन, वाणी और क्रियाद्वारा कर्म, उपासना और ज्ञान–इन तीनों मार्गोंका आश्रय लेकर रहता और सम्पूर्ण भूतोंको प्रसन्न रखता है ॥ ५ ॥
साम्ना भेदेन दानेन दण्डेनेति चतुर्विधम् ।
विषमस्थं समस्थं च चक्षुर्ध्यानेन रक्षति ॥ ६ ॥
वह विषमतापूर्ण बर्ताव करनेवाले पुरुषको साम, दान, दण्ड और भेद- नीतिके द्वारा राहपर लाता है, समदर्शीकी रक्षा करता है और नेत्र आदि इन्द्रियोंको विचारके द्वारा कुमार्गमें जानेसे बचाता है ॥ ६ ॥
तमतिक्रम्य विधिना प्रष्टुमर्हसि काङ्क्षितम् ।
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ते परमकं धर्मं न मिथ्या दर्शयिष्यति ॥ ७ ॥
तुम उसीके पास जाकर विधिपूर्वक अपना मनोवांछित प्रश्न पूछो । वह तुम्हें परम उत्तम धर्मका दर्शन करायेगा; मिथ्या धर्मका उपदेश नहीं करेगा ॥ ७ ॥
स हि सर्वातिथिर्नागो बुद्धिशास्त्रविशारदः ।
गुणैरनुपमैर्युक्तः समस्तैराभिकामिकैः ॥ ८ ॥
वह नाग बड़ा बुद्धिमान् और शास्त्रोंका पण्डित है । सबका अतिथि सत्कार करता है ।
समस्त अनुपम तथा वाञ्छनीय सद्गुणोंसे सम्पन्न है ॥ ८ ॥
प्रकृत्या नित्यसलिलो नित्यमध्ययने रतः ।
तपोदमाभ्यां संयुक्तो वृत्तेनानवरेण च ॥ ९ ॥
स्वभाव तो उसका पानीके समान है । वह सदा स्वाध्यायमें लगा रहता है । तप, इन्द्रिय-संयम तथा उत्तम आचार- विचारसे संयुक्त है ॥ ९ ॥
यज्वा दानपतिः क्षान्तो वृत्ते च परमे स्थितः ।
सत्यवागनसूयुश्च शीलवान्नियतेन्द्रियः ॥ १० ॥
वह यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला, दानियोंका शिरोमणि, क्षमाशील, श्रेष्ठ सदाचारमें संलग्न, सत्यवादी, दोषदृष्टिसे रहित, शीलवान् और जितेन्द्रिय है ॥ १० ॥
शेषान्नभोक्ता वचनानुकूलो हितार्जवोत्कृष्टकृताकृतज्ञः । अवैरकृद् भूतहिते नियुक्तो गङ्गाह्रदाम्भोऽभिजनोपपन्नः ॥ ११ ॥
यज्ञशेष अन्नका वह भोजन करता है, अनुकूल वचन बोलता है, हित और सरलभावसे रहता है । उत्कृष्ट कर्तव्य और अकर्तव्यको जानता है, किसीसे भी वैर नहीं करता है । समस्त प्राणियोंके हितमें लगा रहता है तथा वह गंगाजीके समान पवित्र एवं निर्मल कुलमें उत्पन्न हुआ है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५५ ॥
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षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः अतिथिके वचनोंसे संतुष्ट होकर ब्राह्मणका उसके कथनानुसार नागराजके घरकी ओर प्रस्थान ब्राह्मणउवाच
अतिभारोऽद्य तस्यैव भारावतरणं महत् ।
पराश्वासकरं वाक्यमिदं मे भवतः श्रुतम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा — अतिथिदेव! मुझपर बड़ा भारी बोझ सा लदा हुआ था, उसे आज आपने उतार दिया । यह बहुत बड़ा कार्य हो गया । आपकी यह बात जो मैंने सुनी है, दूसरोंको पूर्ण सान्त्वना प्रदान करनेवाली है ॥ १ ॥
अध्वक्लान्तस्य शयनं स्थानक्लान्तस्य चासनम् ।
तृषितस्य च पानीयं क्षुधार्तस्य च भोजनम् ॥ २ ॥
राह चलनेसे थके हुए बटोहीको शय्या, खड़े- खड़े जिसके पैर दुख रहे हों, उसके लिये बैठनेका आसन, प्यासेको पानी और भूखसे पीड़ित मनुष्यको भोजन मिलनेसे जितना संतोष होता है, उतनी ही प्रसन्नता मुझे आपकी यह बात सुनकर हुई है ॥ २ ॥
ईप्सितस्येव सम्प्राप्तिरन्नस्य समयेऽतिथेः ।
एषितस्यात्मनः काले वृद्धस्यैव सुतो यथा ॥ ३ ॥
मनसा चिन्तितस्येव प्रीतिस्निग्धस्य दर्शनम् ।
प्रह्लादयति मां वाक्यं भवता यदुदीरितम् ॥ ४ ॥
भोजनके समय मनोवाञ्छित अन्नकी प्राप्ति होनेसे अतिथिको, समयपर अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे अपने मनको, पुत्रकी प्राप्ति होनेसे वृद्धको तथा मनसे जिसका चिन्तन हो रहा हो, उसी प्रेमी मित्रका दर्शन होनेसे मित्रको जितना आनन्द प्राप्त होता है, आज आपने जो बात कही है, वह मुझे उतना ही आनन्द दे रही है ॥ ३-४ ॥
दत्तचक्षुरिवाकाशे पश्यामि विमृशामि च ।
प्रज्ञानवचनाद्योऽयमुपदेशो हि मे कृतः ॥ ५ ॥
आपने मुझे यह उपदेश क्या दिया, अन्धेको आँख दे दी । आपके इस ज्ञानमय वचनको सुनकर मैं आकाशकी ओर देखता और कर्तव्यका विचार करता हूँ ॥ ५ ॥
बाढमेवं करिष्यामि यथा मे भाषते भवान् ।
इमां हि रजनीं साधो निवसस्व मया सह ॥ ६ ॥
प्रभाते यास्यति भवान् पर्याश्वस्तः सुखोषितः ।
असौ हि भगवान् सूर्यो मन्दरश्मिरवाङ्मुखः ॥ ७ ॥