05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2421–2430
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2421–2430
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विद्वन्! आप मुझे जैसी सलाह दे रहे हैं, अवश्य ऐसा ही करूँगा । साधो! वे भगवान् सूर्य अस्ताचलकी ओर जा रहे हैं । उनकी किरणें मन्द हो गयी हैं; अतः आप इस रातमें मेरे साथ यहीं रहिये और सुखपूर्वक विश्राम करके भलीभाँति अपनी थकावट दूर कीजिये; फिर सबेरे अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइयेगा ॥ ६-७ ॥ भीष्म उवाच
ततस्तेन कृतातिथ्यः सोऽतिथिः शत्रुसूदन ।
उवास किल तां रात्रिं सह तेन द्विजेन वै ॥ ८ ॥
भीष्मजी कहते हैं – शत्रुसूदन! तदनन्तर वह अतिथि उस ब्राह्मणका आतिथ्य ग्रहण करके रातभर वहीं उस ब्राह्मणके साथ रहा ॥ ८ ॥
चतुर्थधर्मसंयुक्तं तयोः कथयतोस्तदा ।
व्यतीता सा निशा कृत्स्ना सुखेन दिवसोपमा ॥ ९ ॥
मोक्षधर्मके सम्बन्धमें बातें करते हुए उन दोनोंकी वह सारी रात दिनके समान ही बड़े
सुखी ॥ ९ ॥ ततः प्रभातसमये सोऽतिथिस्तेन पूजितः ।
ब्राह्मणेन यथाशक्त्या स्वकार्यमभिकाङ्क्षता ॥ १० ॥
फिर सबेरा होनेपर अपने कार्यकी सिद्धि चाहने वाले उस ब्राह्मणद्वारा यथाशक्ति सम्मानित हो वह अतिथि चला गया ॥ १० ॥
ततः स विप्रः कृतकर्मनिश्चयः कृताभ्यनुज्ञः स्वजनेन धर्मकृत् । यथोपदिष्टं भुजगेन्द्रसंश्रयं जगाम काले सुकृतैकनिश्चयः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् वह धर्मात्मा ब्राह्मण अपने अभीष्ट कार्यको पूर्ण करनेका निश्चय करके स्वजनोंकी अनुमति ले अतिथिके बताये अनुसार यथासमय नागराजके घरकी ओर चल दिया । उसने अपने शुभ कार्यको सिद्ध करनेका एक दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५६ ॥
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सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नागपत्नीके द्वारा ब्राह्मणका सत्कार और वार्तालापके बाद ब्राह्मणके द्वारा नागराजके आगमनकी प्रतीक्षा भीष्म उवाच
स वनानि विचित्राणि तीर्थानि च सरांसि च ।
अभिगच्छन् क्रमेण स्म कंचिन्मुनिमुपस्थितः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं — राजन्! वह ब्राह्मण क्रमशः अनेकानेक विचित्र वनों, तीर्थों और सरोवरोंको लाँघता हुआ किसी मुनिके आश्रमपर उपस्थित हुआ ॥ १ ॥
तं स तेन यथोद्दिष्टं नागं विप्रेण ब्राह्मणः ।
पर्यपृच्छद् यथान्यायं श्रुत्वैव च जगाम सः ॥ २ ॥
उस मुनिसे ब्राह्मणने अपने अतिथिके बताये हुए नागका पता पूछा । मुनिने जो कुछ बताया, उसे यथावत्रूपसे सुनकर वह पुनः आगे बढ़ा ॥ २ ॥
सोऽभिगम्य यथान्यायं नागायतनमर्थवित् ।
प्रोक्तवानहमस्मीति भोःशब्दालंकृतं वचः ॥ ३ ॥
अपने उद्देश्यको ठीक- ठीक समझनेवाला वह ब्राह्मण विधिपूर्वक यात्रा करके नागके घरपर जा पहुँचा । घरके द्वारपर पहुँचकर उसने ' भोः' शब्दसे विभूषित वचन बोलते हुए पुकार लगायी —‘कोई है? मैं यहाँ द्वारपर आया हूँ' ॥ ३ ॥
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा रूपिणी धर्मवत्सला ।
दर्शयामास तं विप्रं नागपत्नी पतिव्रता ॥ ४ ॥
उसकी वह बात सुनकर धर्मके प्रति अनुराग रखनेवाली नागराजकी परम सुन्दरी पतिव्रता पत्नीने उस ब्राह्मणको दर्शन दिया ॥ ४ ॥
सा तस्मै विधिवत् पूजां चक्रे धर्मपरायणा ।
स्वागतेनागतं कृत्वा किं करोमीति चाब्रवीत् ॥ ५ ॥
उस धर्मपरायणा सतीने ब्राह्मणका विधिपूर्वक पूजन किया और स्वागत करते हुए कहा— ' ब्राह्मणदेव! आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ' ॥ ५ ॥
ब्राह्मणउवाच
विश्रान्तोऽभ्यर्चितश्चास्मि भवत्या श्लक्ष्णया गिरा ।
द्रष्टुमिच्छामि भवति देवं नागमनुत्तमम् ॥ ६ ॥
ब्राह्मणने कहा- देवि! आपने मधुर वाणीसे मेरा स्वागत और पूजन किया । इससे मेरी सारी थकावट दूर हो गयी। अब मैं परम उत्तम नागदेवका दर्शन करना चाहता
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हूँ ॥ ६ ॥
एतद्धि परमं कार्यमेतन्मे परमेप्सितम् ।
अनेन चार्थेनास्म्यद्य सम्प्राप्तः पन्नगाश्रमम् ॥ ७ ॥
यही मेरा सबसे बड़ा कार्य है और यही मेरा महान् मनोरथ है, मैं इसी उद्देश्यसे आज नागराजके इस आश्रमपर आया हूँ ॥ ७ ॥
नागभार्योवाच
आर्यः सूर्यरथं वोढुं गतोऽसौ मासचारिकः ।
सप्ताष्टभिर्दिनैर्विप्र दर्शयिष्यत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
नागपत्नीने कहा – विप्रवर! मेरे माननीय पतिदेव सूर्यदेवका रथ ढोनेके लिये गये हुए हैं । वर्षमें एक बार एक मासतक उन्हें यह कार्य करना पड़ता है । पंद्रह दिनोंमें ही वे यहाँ दर्शन देंगे — इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
एतद्विदितमार्यस्य विवासकरणं तव ।
भर्तुर्भवतु किं चान्यत् क्रियतां तद् वदस्व मे ॥ ९ ॥
मेरे पतिदेव- आर्यपुत्रके प्रवासका यह कारण आपको विदित हो । उनके दर्शनके सिवा और क्या काम है? यह मुझे बताइये; जिससे वह पूर्ण किया जाय ॥ ९ ॥
ब्राह्मणउवाच
अनेन निश्चयेनाहं साध्वि सम्प्राप्तवानिह ।
प्रतीक्षन्नागमं देवि वत्स्याम्यस्मिन् महावने ॥ १० ॥
ब्राह्मणने कहा— सती- साध्वी देवि! मैं उनके दर्शन करनेका निश्चय करके ही यहाँ आया हूँ; अतः उनके आगमनकी प्रतीक्षा करता हुआ मैं इस महान् वनमें निवास करूँगा ॥ १० ॥
सम्प्राप्तस्यैव चाव्यग्रमावेद्योऽहमिहागतः ।
ममाभिगमनं प्राप्तो वाच्यश्च वचनं त्वया ॥ ११ ॥
जब नागराज यहाँ आ जायँ, तब उन्हें शान्तभावसे यह बतला देना चाहिये कि मैं यहाँ आया हूँ । तुम्हें ऐसी बात उनसे कहनी चाहिये, जिससे वे मेरे निकट आकर मुझे दर्शन दें ॥ ११ ॥
अहमप्यत्र वत्स्यामि गोमत्याः पुलिने शुभे ।
कालं परिमिताहारो यथोक्तं परिपालयन् ॥ १२ ॥
मैं भी यहाँ गोमतीके सुन्दर तटपर परिमित आहार करके तुम्हारे बताये हुए समयकी प्रतीक्षा करता हुआ निवास करूँगा ॥ १२ ॥
ततः स विप्रस्तां नागीं समाधाय पुनः पुनः ।
तदेव पुलिनं नद्याः प्रययौ ब्राह्मणर्षभः ॥ १३ ॥
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तदनन्तर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण नागपत्नीको बारंबार ( नागराजको भेजनेके लिये ) ज् गोमती नदीके तटपर ही चला गया ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५७ ॥
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अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना भीष्मउवाच
अथ तेन नरश्रेष्ठ ब्राह्मणेन तपस्विना ।
निराहारेण वसता दुःखितास्ते भुजङ्गमाः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— नरश्रेष्ठ! तदनन्तर गोमतीके तटपर रहता हुआ वह ब्राह्मण निराहार रहकर तपस्या करने लगा । उसके भोजन न करनेसे वहाँ रहनेवाले नागोंको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ॥
सर्वे सम्भूय सहिता ह्यस्य नागस्य बान्धवाः ।
भ्रातरस्तनया भार्या ययुस्तं ब्राह्मणं प्रति ॥ २ ॥
तब नागराजके भाई- बन्धु, स्त्री- पुत्र सब मिलकर उस ब्राह्मणके पास गये ॥ २ ॥
तेऽपश्यन् पुलिने तं वै विविक्ते नियतव्रतम् ।
समासीनं निराहारं द्विजं जप्यपरायणम् ३ ॥
उन्होंने देखा, ब्राह्मण गोमतीके तटपर एकान्त प्रदेशमें व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो निराहार बैठा हुआ है और मन्त्रका जप कर रहा है ॥ ३ ॥
ते सर्वे समतिक्रम्य विप्रमभ्यर्च्य चासकृत् ।
ऊचुर्वाक्यमसंदिग्धमातिथेयस्य बान्धवाः ॥ ४ ॥
अतिथि- सत्कारके लिये प्रसिद्ध हुए नागराजके सब भाई- बन्धु ब्राह्मणके पास जा उसकी बारंबार पूजा करके संदेहरहित वाणीमें बोले— ॥ ४ ॥
षष्ठो हि दिवसस्तेऽद्य प्राप्तस्येह तपोधन ।
न चाभिभाषसे किंचिदाहारं धर्मवत्सल ॥ ५ ॥
‘ धर्मवत्सल तपोधन! आपको यहाँ आये आज छः दिन हो गये; किंतु अभीतक आप कुछ भोजन लानेके लिये हमें आज्ञा नहीं दे रहे हैं ॥ ५ ॥
अस्मानभिगतश्चासि वयं च त्वामुपस्थिताः ।
कार्यं चातिथ्यमस्माभिर्वयं सर्वे कुटुम्बिनः ॥ ६ ॥
‘ आप हमारे घर अतिथिके रूपमें आये हैं और हम आपकी सेवामें उपस्थित हुए हैं ।
आपका आतिथ्य करना हमारा कर्तव्य है; क्योंकि हम सब लोग गृहस्थ हैं ॥
मूलं फलं वा पर्णं वा पयो वा द्विजसत्तम ।
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आहारहेतोरन्नं वा भोक्तुमर्हसि ब्राह्मण ॥ ७ ॥
' द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! आप क्षुधाकी निवृत्तिके लिये हमारे लाये हुए फल - मूल, साग, दूध अथवा अन्नको अवश्य ग्रहण करनेकी कृपा करें ॥ ७ ॥
त्यक्ताहारेण भवता वने निवसता त्वया ।
बालवृद्धमिदं सर्वं पीड्यते धर्मसंकटात् ॥ ८ ॥
‘इस वनमें रहकर आपने भोजन छोड़ दिया है । इससे हमारे धर्ममें बाधा आती है ।
बालकसे लेकर वृद्धतक हम सब लोगोंको इस बातसे बड़ा कष्ट हो रहा है ॥ ८ ॥
न हि नो भ्रूणहा कश्चिज्जातापद्यनृतोऽपि वा ।
पूर्वाशी वा कुले ह्यस्मिन् देवतातिथिबन्धुषु ॥ ९ ॥
' हमारे इस कुलमें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसने कभी भ्रूणहत्या की हो, जिसकी संतान पैदा होकर मर गयी हो, जिसने मिथ्या भाषण किया हो अथवा जो देवता, अतिथि एवं बन्धुओंकों अन्न देनेके पहले ही भोजन कर लेता हो ' ॥ ९ ॥
ब्राह्मणउवाच
उपदेशेन युष्माकमाहारोऽयं कृतो मया ।
द्विरूनं दशरात्रं वै नागस्यागमनं प्रति ॥ १० ॥
ब्राह्मणने कहा –नागगण! आपलोगोंके इस उपदेशसे ही मैं तृप्त हो गया । आपलोग ऐसा समझें कि मैंने यह आहार ही प्राप्त कर लिया । नागराजके आनेमें केवल आठ रातें बाकी हैं ॥ १० ॥
यद्यष्टरात्रेऽतिक्रान्ते नागमिष्यति पन्नगः ।
तदाहारं करिष्यामि तन्निमित्तमिदं व्रतम् ॥ ११ ॥
यदि आठ रात बीत जानेपर भी नागराज नहीं आयेंगे तो मैं भोजन कर लूँगा । उनके आगमनके लिये ही मैंने यह व्रत लिया है ॥ ११ ॥
कर्तव्यो न च संतापो गम्यतां च यथागतम् ।
तन्निमित्तमिदं सर्वं नैतद् भेत्तुमिहार्हथ ॥ १२ ॥
आपलोगोंको इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये । आप जैसे आये हैं, वैसे ही घर लौट जाइये । नागराजके दर्शनके लिये ही मेरा यह सारा व्रत और नियम है । अतः आपलोग इसे भंग न करें ॥ १२ ॥
ते तेन समनुज्ञाता ब्राह्मणेन भुजङ्गमाः ।
स्वमेव भवनं जग्मुरकृतार्था नरर्षभ ॥ १३ ॥
नरश्रेष्ठ! उस ब्राह्मणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे नाग अपने प्रयत्नमें असफल हो घरको ही लौट गये ॥ १३ ॥
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५८ ॥
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एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध भीष्म उवाच
अथ काले बहुतिथे पूर्णे प्राप्तो भुजङ्गमः ।
दत्ताभ्यनुज्ञः स्वं वेश्म कृतकर्मा विवस्वता ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! तदनन्तर कई दिनोंका समय पूरा होनेपर जब नागराजका काम पूरा हो गया, तब सूर्यदेवकी आज्ञा पाकर वे अपने घरको लौटे ॥ १ ॥
तं भार्याप्युपचक्राम पादशौचादिभिर्गुणैः ।
उपपन्नां च तां साध्वीं पन्नगः पर्यपृच्छत ॥ २ ॥
वहाँ नागराजकी पत्नी पैर धोनेके लिये जल - पाद्य आदि उत्तम सामग्रियोंके साथ पतिकी सेवामें उपस्थित हुई । अपनी साध्वी पत्नीको समीप आयी देख नागराजने पूछा ॥ २ ॥
अथ त्वमसि कल्याणि देवतातिथिपूजने ।
पूर्वमुक्तेन विधिना युक्ता युक्तेन मत्समम् ॥ ३ ॥
‘ कल्याणि! मेरे द्वारा बतायी हुई उपयुक्त विधिसे युक्त हो तुम मेरे ही समान देवताओं और अतिथियोंके पूजनमें तत्पर तो रही हो न? ॥ ३ ॥
न खल्वस्यकृतार्थेन स्त्रीबुद्धया मार्दवीकृता ।
मद्वियोगेन सुश्रोणि विमुक्ता धर्मसेतुना ॥ ४ ॥
' सुन्दरि! मेरे वियोगने तुम्हें शिथिल तो नहीं कर दिया था? तुम्हारी स्त्री- बुद्धिके कारण कहीं धर्मकी मर्यादा असफल या अरक्षित तो नहीं रह गयी और उसके कारण तुम धर्म-पालनसे विमुख या दूर तो नहीं हो गयी? ॥ ४ ॥
नागभार्योवाच
शिष्याणां गुरुशुश्रूषा विप्राणां वेदधारणम् ।
भृत्यानां स्वामिवचनं राज्ञो लोकानुपालनम् ॥ ५ ॥
नागपत्नीने कहा- शिष्योंका धर्म है गुरुकी सेवा करना, ब्राह्मणोंका धर्म है वेदोंको धारण करना, सेवकोंका धर्म है स्वामीकी आज्ञाका पालन तथा राजाका धर्म है प्रजावर्गका सतत संरक्षण ॥ ५ ॥
सर्वभूतपरित्राणं क्षत्रधर्म इहोच्यते ।
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वैश्यानां यज्ञसंवृत्तिरातिथेयसमन्विता ॥ ६ ॥
इस जगत्में समस्त प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रिय धर्म बताया जाता है । अतिथि-सत्कारके साथ - साथ यज्ञोंका अनुष्ठान करना वैश्योंका धर्म कहा गया है ॥ ६ ॥
विप्रक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् ।
गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ॥ ७ ॥
नागराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - तीनों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका कर्तव्य बताया गया है और समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखना गृहस्थका धर्म है ॥ ७ ॥
नियताहारता नित्यं व्रतचर्या यथाक्रमम् ।
धर्मो हि धर्मसम्बन्धादिन्द्रियाणां विशेषतः ॥ ८ ॥
नियमित आहारका सेवन और विधिवत् व्रतका पालन सबका धर्म है । धर्म- पालनके सम्बन्धसे इन्द्रियोंकी विशेषरूपसे शुद्धि होती है ॥ ८ ॥
अहं कस्य कुतो वापि कः को मे ह भवेदिति ।
प्रयोजनमतिर्नित्यमेवं मोक्षाश्रमे वसेत् ॥ ९ ॥
‘ मैं किसका हूँ? कहाँसे आया हूँ, मेरा कौन है? तथा इस जीवनका प्रयोजन क्या है? ' इत्यादि बातोंका सदा विचार करते हुए ही संन्यासीको संन्यास- आश्रममें रहना चाहिये ॥ ९ ॥
पतिव्रतात्वं भार्यायाः परमो धर्म उच्यते ।
तवोपदेशान्नागेन्द्र तच्च तत्त्वेन वेद्मि वै ॥ १० ॥
नागराज! पत्नीके लिये पातिव्रत्य ही सबसे बड़ा धर्म कहा जाता है । आपके उपदेशसे अपने उस धर्मको मैं अच्छी तरह समझती हूँ ॥ १० ॥
साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये त्वयि स्थिते ।
सत्पथं कथमुत्सृज्य यास्यामि विपथं पथः ॥ ११ ॥
जब आप — मेरे पतिदेव सदा धर्मपर स्थित रहते हैं, तब धर्मको जानती हुई भी मैं कैसे सन्मार्गका त्याग करके कुमार्गपर पैर रखूँगी? ॥ ११ ॥
देवतानां महाभाग धर्मचर्या न हीयते ।
अतिथीनां च सत्कारे नित्ययुक्तास्म्यतन्द्रिता ॥ १२ ॥
महाभाग! देवताओंकी आराधनारूप धर्मचर्यामें कोई कमी नहीं आयी है, अतिथियोंके सत्कारमें भी मैं सदा आलस्य छोड़कर लगी रही हूँ ॥ १२ ॥
सप्ताष्टदिवसास्त्वद्य विप्रस्येहागतस्य वै ।
तच्च कार्यं न मे ख्याति दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ १३ ॥
परंतु आज पंद्रह दिनसे एक ब्राह्मणदेवता यहाँ पधारे हुए हैं । वे मुझसे अपना कोई
कार्य नहीं बता रहे हैं । केवल आपका दर्शन चाहते हैं ॥ १३ ॥
गोमत्यास्त्वेष पुलिने त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ।
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आसीनो वर्तयन् ब्रह्म ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ १४ ॥
वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण वेदोंका पारायण करते हुए आपके दर्शनके लिये उत्सुक हो गोमतीके किनारे बैठे हुए हैं ॥ १४ ॥
अहं त्वनेन नागेन्द्र सत्यपूर्व समाहिता ।
प्रस्थाप्यो मत्सकाशं स सम्प्राप्तो भुजगोत्तमः ॥ १५ ॥
नागराज! उन्होंने मुझसे पहले सच्ची प्रतिज्ञा करा ली है कि नागराजके आते ही तुम उन्हें मेरे पास भेज देना ॥ १५ ॥
एतच्छ्रुत्वा महाप्राज्ञ तत्र गन्तुं त्वमर्हसि ।
दातुमर्हसि वा तस्य दर्शनं दर्शनश्रवः ॥ १६ ॥
महाप्राज्ञ नागराज! मेरी यह बात सुनकर अब आपको वहाँ जाना चाहिये और ब्राह्मणदेवताको दर्शन देना चाहिये ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ९ ॥