05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 621–630

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

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अस्मिन् लोके परे चैव राजा स प्राप्नुते फलम् ॥ ४१ ॥

जिसमें निग्रह' और अनुग्रह- दोनों प्रतिष्ठित हों, वह राजा इहलोक और परलोकमें मनोवांछित फल पाता है ॥ ४१ ॥

यमो राजा धार्मिकाणां मान्धातः परमेश्वरः ।

संयच्छन् भवति प्राणानसंयच्छंस्तु पातुकः ॥ ४२ ॥

मान्धाता! राजा दुष्टोंको दण्ड देनेके कारण यम तथा धार्मिकोंपर अनुग्रह करनेके कारण उनके लिये परमेश्वरके समान है । जब वह अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखता है, तब शासनमें समर्थ होता है और जब संयममें नहीं रखता, तब मर्यादासे नीचे गिर जाता है ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् सत्कृत्यानवमन्य च ।

यदा सम्यक् प्रगृह्णाति स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ४३ ॥

जब राजा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यका बिना अवहेलनाके सत्कार करके उनको उचित बर्तावके साथ अपनाता है, तब वह राजाका धर्म कहलाता है ॥ ४३ ॥

यमो यच्छति भूतानि सर्वाण्येवाविशेषतः ।

तथा राज्ञानुकर्तव्यं यन्तव्या विधिवत् प्रजाः ॥ ४४ ॥

जैसे यमराज सभी प्राणियोंपर समानरूपसे शासन करते हैं, उसी प्रकार राजाको भी बिना किसी भेदभावके समस्त प्रजाओंपर विधिपूर्वक नियन्त्रण रखना चाहिये ॥ ४४ ॥

सहस्राक्षेण राजा हि सर्वथैवोपमीयते ।

स पश्यति च यं धर्मं स धर्मः पुरुषर्षभ ॥ ४५ ॥

पुरुषप्रवर! राजाकी उपमा सब प्रकारसे हजार नेत्रोंवाले इन्द्रसे दी जाती है; अतः राजा जिस धर्मको भलीभाँति समझकर निश्चित कर देता है वही श्रेष्ठ धर्म माना गया है ॥ ४५ ॥

अप्रमादेन शिक्षेथाः क्षमां बुद्धिं धृतिं मतिम् ।

भूतानां चैव जिज्ञासा साध्वसाधु च सर्वदा ॥ ४६ ॥

राजन्! तुम सावधान होकर क्षमा, विवेक, धृति और बुद्धिकी शिक्षा ग्रहण करो ।

समस्त प्राणियोंकी शक्ति तथा भलाई- बुराईको भी सदा जाननेकी इच्छा करो ॥

संग्रहः सर्वभूतानां दानं च मधुरं वचः ।

पौरजानपदाश्चैव गोप्तव्यास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥

समस्त प्राणियोंको अपने अनुकूल बनाये रखना, दान देना और मीठे वचन बोलना सीखो । नगर और बाहर गाँववाले लोगोंकी तुम्हें इस प्रकार रक्षा करनी चाहिये, जिससे उन्हें सुख मिले ॥ ४७

न जात्वदक्षो नृपतिः प्रजाः शक्नोति रक्षितुम् ।

भारो हि सुमहांस्तात राज्यं नाम सुदुष्करम् ॥ ४८ ॥

तात! जो दक्ष नहीं है, वह राजा कभी प्रजाकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि यह राज्यका संचालनरूप अत्यंत दुष्कर कार्य बहुत बड़ा भार है ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 622

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तद्दण्डविन्नृपः प्राज्ञः शूरः शक्नोति रक्षितुम् ।

न हि शक्यमदण्डेन क्लीबेनाबुद्धिनापि वा ॥ ४ ९ ॥

राज्यकी रक्षा तो वही राजा कर सकता है, जो बुद्धिमान् और शूरवीर होनेके साथ ही दण्ड देनेकी नीतिको भी जानता हो । जो दण्ड देनेसे हिचकता हो, वह नपुंसक और बुद्धिहीन नरेश कदापि राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता ॥ ४ ९ ॥

अभिरूपैः कुले जातैर्दक्षैर्भक्तैर्बहुश्रुतैः ।

सर्वा बुद्धीः परीक्षेथास्तापसाश्रमिणामपि ॥ ५० ॥

तुम्हें रूपवान्, कुलीन, कार्यदक्ष, राजभक्त एवं बहुज्ञ मन्त्रियोंके साथ रहकर तापसों और आश्रम-वासियोंकी भी सम्पूर्ण बुद्धियों ( सारे विचारों) की परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५० ॥

अतस्त्वं सर्वभूतानां धर्मं वेत्स्यसि वै `परम् ।

स्वदेशे परदेशे वा न ते धर्मो विनङ्क्ष्यति ॥ ५१ ॥

ऐसा करनेसे तुमको सम्पूर्ण भूतोंके परम धर्मका ज्ञान हो जायगा; फिर स्वदेशमें रहो या परदेशमें, कहीं भी तुम्हारा धर्म नष्ट नहीं होगा ॥ ५१ ॥

तस्मादर्थाच्च कामाच्च धर्म एवोत्तरो भवेत् ।

अस्मिँल्लोके परे चैव धर्मात्मा सुखमेधते ॥ ५२ ॥

इस तरह विचार करनेसे अर्थ और कामकी अपेक्षा धर्म ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है । धर्मात्मा पुरुष इहलोकमें और परलोकमें भी सुख भोगता है ॥ ५२ ॥

त्यजन्ति दारान् पुत्रांश्च मनुष्याः परिपूजिताः ।

संग्रहश्चैव भूतानां दानं च मधुरा च वाक् ॥ ५३ ॥

अप्रमादश्च शौचं च राज्ञो भूतिकरं महत् ।

एतेभ्यश्चैव मान्धातः सततं मा प्रमादिथाः ॥ ५४ ॥

यदि मनुष्योंका सम्मान किया जाय तो वे सम्मान- दाताके हितके लिये अपने पुत्रों और स्त्रियोंको भी छोड़ देते हैं । समस्त प्राणियोंको अपने पक्षमें मिलाये रखना, दान देना, मीठे वचन बोलना, प्रमादका त्याग करना तथा बाहर और भीतरसे पवित्र रहना - से राजाका ऐश्वर्य बढ़ानेवाले बहुत बड़े साधन हैं । मान्धाता! तुम इन सब बातोंकी ओरसे कभी प्रमाद न करना ॥

अप्रमत्तो भवेद् राजा छिद्रदर्शी परात्मनोः ।

नास्यच्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेषु परमन्वियात् ॥ ५५ ॥

राजाको सदा सावधान रहना चाहिये । वह शत्रुका तथा अपना भी छिद्र देखे और यह प्रयत्न करे कि शत्रु मेरा छिद्र अच्छी तरह न देखने पाये; परंतु यदि शत्रुके छिद्रों ( दुर्बलताओं ) का पता लग जाय तो वह उसपर चढ़ाई कर दे ॥ ५५ ॥

एतद् वृत्तं वासवस्य यमस्य वरुणस्य च ।

पृष्ठ 623

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राजर्षीणां च सर्वेषां तत् त्वमप्यनुपालय ॥ ५६ ॥

इन्द्र, यम, वरुण तथा सम्पूर्ण राजर्षियोंका यही बर्ताव है, तुम भी इसका निरन्तर पालन करो ॥ ५६ ॥

तत् कुरुष्व महाराज वृत्तं राजर्षिसेवितम् ।

आतिष्ठ दिव्यं पन्थानमह्नाय पुरुषर्षभ ॥ ५७ ॥

पुरुषप्रवर महाराज! राजर्षियोंद्वारा सेवित उस आचारका तुम पालन करो और शीघ्र ही प्रकाशयुक्त दिव्य मार्गका आश्रय लो ॥ ५७ ॥

धर्मवृत्तं हि राजानं प्रेत्य चेह च भारत ।

देवर्षिपितृगन्धर्वाः कीर्तयन्ति महौजसः ॥ ५८ ॥

भारत! * महातेजस्वी देवता, ऋषि, पितर और गन्धर्व इहलोक और परलोकमें भी धर्मपरायण राजाके यशका गान करते रहते हैं ॥ ५८ ॥

भीष्म उवाच

स एवमुक्तो मान्धाता तेनोतथ्येन भारत ।

कृतवानविशङ्कश्च एकः प्राप च मेदिनीम् ॥ ५ ९ ॥

भीष्मजी कहते हैं— भरतनन्दन! उतथ्यके इस प्रकार उपदेश देनेपर मान्धाताने निःशंक होकर उनकी आज्ञाका पालन किया और सारी पृथ्वीका एकछत्र राज्य पा लिया ॥ ५ ९ ॥

भवानपि तथा सम्यङ्मान्धातेव महीपते ।

धर्मं कृत्वा महीं रक्ष स्वर्गे स्थानमवाप्स्यसि ॥ ६० ॥

पृथ्वीनाथ! मान्धाताकी ही भाँति तुम भी अच्छी तरह धर्मका पालन करते हुए इस पृथ्वीकी रक्षा करो; फिर तुम भी स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लोगे ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उतथ्यगीतासु एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उतथ्यगीताविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९ १ ॥ 2. दुष्टोंको दण्ड देनेका स्वभाव । २. दीन- दुखियों तथा साधु पुरुषोंके प्रति दया एवं सहानुभूति । * उतथ्यने राजा मान्धाताको उपदेश दिया है और मान्धाता सूर्यवंशी नरेश थे, इसलिये उनके उद्देश्यसे ‘ भारत ’ सम्बोधन पद यद्यपि उचित नहीं है तथापि यह प्रसंग भीष्मजी युधिष्ठिरको सुनाते हैं; अतः यह समझना चाहिये कि युधिष्ठिरके उद्देश्यसे उन्होंने यहाँ ' भारत ' विशेषणका प्रयोग किया है ।

पृष्ठ 624

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द्विनवतितमोऽध्यायः राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश युधिष्ठिर उवाच

कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् राजा वर्तेत धार्मिकः ।

पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— कुरुश्रेष्ठ पितामह! धर्मात्मा राजा यदि धर्ममें स्थित रहना चाहे तो उसे किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये? यह मैं आपसे पूछता हूँ; आप मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

गीतं दृष्टार्थतत्त्वेन वामदेवेन धीमता ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें लोग तत्त्वज्ञानी महात्मा वामदेवजीद्वारा दिये हुए उपदेशरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

राजा वसुमना नाम ज्ञानवान् धृतिमान् शुचिः ।

महर्षि परिपप्रच्छ वामदेवं तपस्विनम् ॥ ३ ॥

वसुमना नामक एक प्रसिद्ध राजा हो गये हैं, जो ज्ञानवान्, धैर्यवान् और पवित्र आचार-विचारवाले थे । उन्होंने एक दिन तपस्वी महर्षि वामदेवजीसे पूछा— ॥

धर्मार्थसहितैर्वाक्यैर्भगवन्ननुशाधि माम् ।

येन वृत्तेन वै तिष्ठन् न हीयेयं स्वधर्मतः ॥ ४ ॥

‘ भगवन्! मैं किस बर्तावका पालन करता रहूँ, जिससे अपने धर्मसे कभी न गिरूँ ।

आप अपने अर्थ और धर्मयुक्त वचनोंद्वारा मुझे इसी बातका उपदेश दीजिये ' ॥ ४ ॥

तमब्रवीद् वामदेवस्तेजस्वी तपतां वरः ।

हेमवर्णं सुखासीनं ययातिमिव नाहुषम् ॥ ५ ॥

तब तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी महर्षि वामदेवने नहुषपुत्र ययातिके समान सुखपूर्वक बैठे हुए सुवर्णकी - सी कान्तिवाले राजा वसुमनासे कहा ॥ ५ ॥

वामदेव उवाच

धर्ममेवानुवर्तस्व न धर्माद् विद्यते परम् ।

धर्मे स्थिता हि राजानो जयन्ति पृथिवीमिमाम् ॥ ६ ॥

वामदेवजी बोले — राजन्! तुम धर्मका ही अनुसरण करो । धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि धर्ममें स्थित रहनेवाले राजा इस सारी पृथ्वीको जीत लेते हैं ॥ ६ ॥

पृष्ठ 625

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अर्थसिद्धेः परं धर्मं मन्यते यो महीपतिः ।

वृद्धयां च कुरुते बुद्धिं स धर्मेण विराजते ॥ ७ ॥

जो भूपाल धर्मको अर्थ-सिद्धिकी अपेक्षा भी बड़ा मानता है और उसीको बढ़ानेमें अपने मन और बुद्धिका उपयोग करता है, वह धर्मके कारण बड़ी शोभा पाता है ॥ ७ ॥

अधर्मदर्शी यो राजा बलादेव प्रवर्तते ।

क्षिप्रमेवापयातोऽस्मादुभौ प्रथममध्यमौ ॥ ८ ॥

इसके विपरीत जो राजा अधर्मपर ही दृष्टि रखकर बलपूर्वक उसमें प्रवृत्त होता है, उसे धर्म और अर्थ दोनों पुरुषार्थ शीघ्र छोड़कर चल देते हैं ॥ ८ ॥

असत्पापिष्ठसचिवो वध्यो लोकस्य धर्महा ।

सहैव परिवारेण क्षिप्रमेवावसीदति ॥ ९ ॥

जो दुष्ट एवं पापिष्ठ मन्त्रियोंकी सहायतासे धर्मको हानि पहुँचाता है, वह सब लोगोंका वध्य हो जाता है और अपने परिवारके साथ ही शीघ्र संकटमें पड़ जाता है ॥

अर्थानामननुष्ठाता कामचारी विकत्थनः ।

अपि सर्वां महीं लब्ध्वा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १० ॥

जो राजा अर्थ- सिद्धिकी चेष्टा नहीं करता और स्वेच्छाचारी हो बढ़ - बढ़कर बातें बनाता है, वह सारी पृथ्वीका राज्य पाकर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥

अथाददानः कल्याणमनसूयुर्जितेन्द्रियः ।

वर्धते मतिमान् राजा स्रोतोभिरिव सागरः ॥ ११ ॥

परंतु जो कल्याणकारी गुणोंको ग्रहण करनेवाला, अनिन्दक, जितेन्द्रिय और बुद्धिमान् होता है, वह राजा उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त होता है, जैसे नदियोंके प्रवाहसे समुद्र ॥ ११ ॥

न पूर्णोऽस्मीति मन्येत धर्मतः कामतोऽर्थतः ।

बुद्धितो मित्रतश्चापि सततं वसुधाधिपः ॥ १२ ॥

राजाको चाहिये कि वह सदा धर्म, अर्थ, काम, बुद्धि और मित्रोंसे सम्पन्न होनेपर भी कभी अपनेको पूर्ण न माने - सदा उन सबके संग्रहको बढ़ानेकी ही चेष्टा करे ॥ १२ ॥

एतेष्वेव हि सर्वेषु लोकयात्रा प्रतिष्ठिता ।

एतानि शृण्वँल्लभते यशः कीर्तिं श्रियं प्रजाः ॥ १३ ॥

राजाकी जीवनयात्रा इन्हीं सबोंपर अवलम्बित है । इन सबको सुनने और ग्रहण करनेसे राजाको यश, कीर्ति, लक्ष्मी और प्रजाकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥

एवं यो धर्मसंरम्भी धर्मार्थपरिचिन्तकः ।

अर्थान् समीक्ष्य भजते स ध्रुवं महदश्नुते ॥ १४ ॥

जो इस प्रकार धर्मके प्रति आग्रह रखनेवाला एवं धर्म और अर्थका चिन्तन करनेवाला है तथा अर्थपर भलीभाँति विचार करके उसका सेवन करता है, वह निश्चय ही महान्

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महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 626 का मूल पृष्ठ
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फलका भागी होता है ॥ १४ ॥

अदाता ह्यनतिस्नेहो दण्डेनावर्तयन् प्रजाः ।

साहसप्रकृती राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १५ ॥

जो दुःसाहसी, दान न देनेवाला और स्नेहशून्य तथा दण्डके द्वारा प्रजाको बार- बार सताता है, वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥

अथ पापकृतं बुद्धया न च पश्यत्यबुद्धिमान् ।

अकीर्त्याभिसमायुक्तो भूयो नरकमश्नुते ॥ १६ ॥

जो बुद्धिहीन राजा पाप करके भी अपनी बुद्धिके द्वारा अपनेको पापी नहीं समझता, वह इस लोकमें अपकीर्तिसे कलंकित हो परलोकमें नरकका भागी होता है ॥ १६ ॥

अथ मानयितुर्दाम्नः श्लक्ष्णस्य वशवर्तिनः ।

व्यसनं स्वमिवोत्पन्नं विजिघांसन्ति मानवाः ॥ १७ ॥

जो सबका मान करनेवाला, दानी, स्नेहयुक्त तथा दूसरोंके वशवर्ती होकर रहता है, उसपर यदि कोई संकट आ जाय तो सब लोग उसे अपना ही संकट मानकर उसको मिटानेकी चेष्टा करते हैं ॥ १७ ॥

यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्यानपि पृच्छति ।

सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं सुखमश्नुते ॥ १८ ॥

जिसको धर्मके विषयमें शिक्षा देनेवाला कोई गुरु नहीं है और जो दूसरोंसे भी कुछ नहीं पूछता है तथा धन मिल जानेपर सुखभोगमें आसक्त हो जाता है, वह दीर्घकालतक सुख नहीं भोग पाता है ॥ १८ ॥

गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता ।

धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्नुते ॥ १ ९ ॥

जो धर्मके विषयमें गुरुको प्रधान मानकर उनके उपदेशके अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ - सम्बन्धी सारे कार्योंको देखता है तथा सब प्रकारके लाभोंमें धर्मको ही प्रधान लाभ समझता है, वह चिरकालतक सुखका उपभोग करता है ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वामदेवगीतासु द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वामदेवजीकी गीताविषयक बानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९ २ ॥ Face

पृष्ठ 627

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त्रिनवतितमोऽध्यायः वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन वामदेव उवाच

यत्राधर्मं प्रणयते दुबले बलवत्तरः ।

तां वृत्तिमुपजीवन्ति ये भवन्ति तदन्वयाः ॥ १ ॥

वामदेवजी कहते हैं - राजन्! जिस राज्यमें अत्यन्त बलवान् राजा दुर्बल प्रजापर अधर्म या अत्याचार करने लगता है, वहाँ उसके अनुचर भी उसी बर्तावको अपनी जीविकाका साधन बना लेते हैं ॥ १ ॥

राजानमनुवर्तन्ते तं पापाभिप्रवर्तकम् ।

अविनीतमनुष्यं तत् क्षिप्रं राष्ट्रं विनश्यति ॥ २ ॥

वे उस पापप्रवर्तक राजाका ही अनुसरण करते हैं; अतः उद्दण्ड मनुष्योंसे भरा हुआ वह राष्ट्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ २ ॥

यद् वृत्तमुपजीवन्ति प्रकृतिस्थस्य मानवाः ।

तदेव विषमस्थस्य स्वजनोऽपि न मृष्यते ॥ ३ ॥

अच्छी अवस्थामें रहनेपर मनुष्यके जिस बर्तावका दूसरे लोग भी आश्रय लेते हैं, संकटमें पड़ जानेपर उसी मनुष्यके उसी बर्तावको उसके स्वजन भी नहीं सहन करते हैं ॥ ३ ॥

साहसप्रकृतिर्यत्र किंचिदुल्बणमाचरेत् ।

अशास्त्रलक्षणो राजा क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ४ ॥

दुःसाहसी प्रकृतिवाला जो राजा जहाँ कुछ उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव करता है, वहाँ शास्त्रोक्त मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥

योऽत्यन्ताचरितां वृत्तिं क्षत्रियो नानुवर्तते ।

जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ५ ॥

जो क्षत्रिय राज्यमें रहनेवाले विजित या अविजित मनुष्योंकी अत्यन्त आचरणमें लायी हुई वृत्तिका अनुवर्तन नहीं करता ( अर्थात् उन लोगोंको अपने परम्परागत आचार- विचारका पालन नहीं करने देता ) वह क्षत्रिय धर्मसे गिर जाता है ॥ ५ ॥

द्विषन्तं कृतकल्याणं गृहीत्वा नृपतिं रणे ।

यो न मानयते द्वेषात् क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ६ ॥

यदि कोई राजा पहलेका उपकारी हो और किसी कारणवश वर्तमानकालमें द्वेष करने लगा हो तो उस समय जो भूपाल उसे युद्धमें बंदी बनाकर द्वेषवश उसका सम्मान नहीं करता, वह भी क्षत्रियधर्मसे गिर जाता है ॥

पृष्ठ 628

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शक्तः स्यात् सुसुखो राजा कुर्यात् करणमापदि ।

प्रियो भवति भूतानां न च विभ्रश्यते श्रियः ॥ ७ ॥

राजा यदि समर्थ हो तो उत्तम सुखका अनुभव करे और करावे तथा आपत्तिमें पड़ जाय तो उसके निवारणका प्रयत्न करे । ऐसा करनेसे वह सब प्राणियोंका प्रिय होता है और कभी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट नहीं होता ॥

अप्रियं यस्य कुर्वीत भूयस्तस्य प्रियं चरेत् ।

नचिरेण प्रियः स स्याद् योऽप्रियः प्रियमाचरेत् ॥ ८ ॥

राजाको चाहिये कि यदि किसीका अप्रिय किया हो तो फिर उसका प्रिय भी करे । इस प्रकार यदि अप्रिय पुरुष भी प्रिय करने लगता है तो थोड़े ही समयमें वह प्रिय हो जाता है ॥ ८ ॥

मृषावादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।

न कामान्न च संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥ ९ ॥

मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किये ही दूसरोंका प्रिय करे ।

किसी कामनासे, क्रोधसे तथा द्वेषसे भी धर्मका त्याग न करे ॥ ९ ॥

( अमाययैव वर्तेत न च सत्यं त्यजेद् बुधः । दमं धर्मं च शीलं च क्षत्रधर्मं प्रजाहितम् ॥ )

नापत्रपेत प्रश्नेषु नाविभाव्यां गिरं सृजेत् ।

न त्वरेत न चासूयेत् तथा संगृह्यते परः ॥ १० ॥

विद्वान् राजा छल - कपट छोड़कर ही बर्ताव करे । सत्यको कभी न छोड़े । इन्द्रिय- संयम, धर्माचरण, सुशीलता, क्षत्रियधर्म तथा प्रजाके हितका कभी परित्याग न करे । यदि कोई कुछ पूछे तो उसका उत्तर देनेमें संकोच न करे, बिना विचारे कोई बात मुँहसे न निकाले, किसी काममें जल्दबाजी न करे और किसीकी निन्दा न करे, ऐसा बर्ताव करनेसे शत्रु भी अपने वशमें हो जाता है ॥ १० ॥

प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् ।

न तप्येदर्थकृच्छ्रेषु प्रजाहितमनुस्मरन् ॥ ११ ॥

यदि अपना प्रिय हो जाय तो बहुत प्रसन्न न हो और अप्रिय हो जाय तो अत्यन्त चिन्ता न करे । यदि आर्थिक संकट आ पड़े तो प्रजाके हितका चिन्तन करते हुए तनिक भी संतप्त न हो ॥ ११ ॥

यः प्रियं कुरुते नित्यं गुणतो वसुधाधिपः ।

तस्य कर्माणि सिद्धयन्ति न च संत्यज्यते श्रिया ॥ १२ ॥

जो भूपाल अपने गुणोंसे सदा सबका प्रिय करता है, उसके सभी कर्म सफल होते हैं और सम्पत्ति कभी उसका साथ नहीं छोड़ती ॥ १२ ॥

निवृत्तं प्रतिकूलेषु वर्तमानमनुप्रिये ।

पृष्ठ 629

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 629 का मूल पृष्ठ
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भक्तं भजेत नृपतिः सदैव सुसमाहितः ॥ १३ ॥

राजा सदा सावधान रहकर अपने उस सेवकको हर तहरसे अपनावे, जो प्रतिकूल कार्योंसे अलग रहता हो और राजाका निरन्तर प्रिय करनेमें ही संलग्न हो ॥ १३ ॥

अप्रकीर्णेन्द्रियग्राममत्यन्तानुगतं शुचिम् ।

शक्तं चैवानुरक्तं च युञ्ज्यान्महति कर्मणि ॥ १४ ॥

जो बड़े -बड़े काम हों, उनपर जितेन्द्रिय, अत्यन्त अनुगत, पवित्र आचार- विचारवाले, शक्तिशाली और अनुरक्त पुरुषको नियुक्त करे ॥ १४ ॥

एवमेतैर्गुणैर्युक्तो योऽनुरज्यति भूमिपम् ।

भर्तुरर्थेष्वप्रमत्तं नियुज्यादर्थकर्मणि ॥ १५ ॥

इसी प्रकार जिसमें वे सब गुण मौजूद हों, जो राजाको प्रसन्न भी रख सकता हो तथा स्वामीका कार्य सिद्ध करनेके लिये सतत सावधान रहता हो, उसको धनकी व्यवस्थाके कार्यमें लगावे ॥ १५ ॥

मूढमैन्द्रियकं लुब्धमनार्यचरितं शठम् ।

अनतीतोपधं हिंस्रं दुर्बुद्धिमबहुश्रुतम् ॥ १६ ॥

त्यक्तोदात्तं मद्यरतं द्यूतस्त्रीमृगयापरम् ।

कार्ये महति युञ्जानो हीयते नृपतिः श्रिया ॥ १७ ॥

मूर्ख, इन्द्रियलोलुप, लोभी, दुराचारी, शठ, कपटी, हिंसक, दुर्बद्धि, अनेक शास्त्रोंके ज्ञानसे शून्य, उच्चभावनासे रहित, शराबी, जुआरी, स्त्रीलम्पट और मृगयासक्त पुरुषको जो राजा महत्त्वपूर्ण कार्योंपर नियुक्त करता है, वह लक्ष्मीसे हीन हो जाता है ॥ १६-१७ ॥

रक्षितात्मा च यो राजा रक्ष्यान् यश्चानुरक्षति ।

प्रजाश्च तस्य वर्धन्ते ध्रुवं च महदश्नुते ॥ १८ ॥

जो नरेश अपने शरीरकी रक्षा करके रक्षणीय पुरुषोंकी भी सदा रक्षा करता है, उसकी प्रजा अभ्युदयशील होती है और वह राजा भी निश्चय ही महान् फलका भागी होता है ॥ १८ ॥

ये केचित् भूमिपतयः सर्वांस्तानन्ववेक्षयेत् ।

सुहृद्भिरनभिख्यातैस्तेन राजातिरिच्यते ॥ १९ ॥

जो राजा अपने अप्रसिद्ध सुहृदोंके द्वारा गुप्तरूपसे समस्त भूपतियोंकी अवस्थाका निरीक्षण कराता है, वह अपने इस बर्तावके द्वारा सर्वश्रेष्ठ हो जाता है ॥ १ ९ ॥

अपकृत्य बलस्थस्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् ।

श्येनाभिपतनैरेते निपतन्ति प्रमाद्यतः ॥ २० ॥

किसी बलवान् शत्रुका अपकार करके हम दूर जाकर रहेंगे, ऐसा समझकर निश्चिन्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि जैसे बाज पक्षी झपट्टा मारता है, उसी प्रकार ये दूरस्थ शत्रु भी असावधानीकी अवस्थामें टूट पड़ते हैं ॥

पृष्ठ 630

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दृढमूलस्त्वदुष्टात्मा विदित्वा बलमात्मनः ।

अबलानभियुञ्जीत न तु ये बलवत्तराः ॥ २१ ॥

राजा अपनेको दृढ़मूल ( अपनी राजधानीको सुरक्षित) करके विरोधी लोगोंको दूर रखकर अपनी शक्तिको समझ ले; फिर अपनेसे दुर्बल शत्रुपर ही आक्रमण करे । जो अपनेसे प्रबल हों, उनपर आक्रमण न करे ॥ २१ ॥

विक्रमेण महीं लब्ध्वा प्रजा धर्मेण पालयेत् ।

आहवे निधनं कुर्याद् राजा धर्मपरायणः ॥ २२ ॥

पराक्रमसे इस पृथ्वीको प्राप्त करके धर्मपरायण राजा अपनी प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करे तथा युद्धमें शत्रुओंका संहार कर डाले ॥ २२ ॥

मरणान्तमिदं सर्वं नेह किञ्चिदनामयम् ।

तस्माद् धर्मे स्थितो राजा प्रजा धर्मेण पालयेत् ॥ २३ ॥

राजन्! इस जगत्के सभी पदार्थ अन्तमें नष्ट होनेवाले हैं; यहाँ कोई भी वस्तु नीरोग या अविनाशी नहीं है । इसलिये राजाको धर्मपर स्थित रहकर प्रजाका धर्मके अनुसार ही पालन करना चाहिये ॥ २३ ॥

रक्षाधिकरणं युद्धं तथा धर्मानुशासनम् ।

मन्त्रचिन्ता सुखं काले पञ्चभिर्वर्धते मही ॥ २४ ॥

रक्षाके स्थान दुर्ग आदि, युद्ध, धर्मके अनुसार राज्यका शासन, मन्त्र- चिन्तन तथा -यथासमय सबको सुख प्रदान करना – इन पाँचोंके द्वारा राज्यकी वृद्धि होती है ॥ २४ ॥

एतानि यस्य गुप्तानि स राजा राजसत्तमः ।

सततं वर्तमानोऽत्र राजा धत्ते महीमिमाम् ॥ २५ ॥

जिसकी ये सब बातें गुप्त या सुरक्षित रहती हैं, वह राजा समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ माना जाता है । इनके पालनमें सदा संलग्न रहनेवाला नरेश ही इस पृथ्वीकी रक्षा कर सकता है ॥ २५ ॥

नैतान्येकेन शक्यानि सातत्येनानुवीक्षितुम् ।

तेषु सर्वं प्रतिष्ठाप्य राजा भुङ्क्ते चिरं महीम् ॥ २६ ॥

एक ही पुरुष इन सभी बातोंपर सदा ध्यान नहीं रख सकता, इसलिये इन सबका भार सुयोग्य अधिकारियोंको सौंपकर राजा चिरकालतक इस भूतलका राज्य भोग सकता है ॥ २६ ॥

दातारं संविभक्तारं मार्दवोपगतं शुचिम् ।

असंत्यक्तमनुष्यं च तं जनाः कुर्वते नृपम् ॥ २७ ॥

जो पुरुष दानशील, सबके लिये सम्यक् विभागपूर्वक आवश्यक वस्तुओंका वितरण करनेवाला, मृदुलस्वभाव, शुद्ध आचार- विचारवाला तथा मनुष्योंका त्याग न करनेवाला होता है, उसीको लोग राजा बनाते हैं ॥ २७ ॥