श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 611–620
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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असृजन् सुमहद् भूतमयं धर्मो भविष्यति ॥ १४ ॥
लोक और परलोक दोनोंको दृष्टिमें रखकर महर्षियोंने स्वयं ही राजा नामक एक महान् शक्तिशाली मनुष्यकी सृष्टि की । उन्होंने सोचा था कि ' यह साक्षात् धर्मस्वरूप होगा' ॥ १४ ॥
यस्मिन् धर्मो विराजेत तं राजानं प्रचक्षते ।
यस्मिन् विलीयते धर्मस्तं देवा वृषलं विदुः ॥ १५ ॥
अतः जिसमें धर्म विराज रहा हो, उसीको राजा कहते हैं और जिसमें धर्म ( वृष ) का लय हो गया हो, उसे देवतालोग ' वृषल ' मानते हैं ॥ १५ ॥
वृषो ही भगवान् धर्मो यस्तस्य कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥ १६ ॥
वृष नाम है भगवान् धर्मका । जो धर्मके विषयमें ' अलम्' ( बस ) कह देता है, उसे देवता ‘ वृषल' समझते हैं; अतः धर्मकी सदा ही वृद्धि करनी चाहिये ॥ १६ ॥
धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभूतानि सर्वदा ।
तस्मिन् ह्रसति ह्रीयन्ते तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ॥ १७ ॥
धर्मकी वृद्धि होनेपर सदा समस्त प्राणियोंका अभ्युदय होता है और उसका ह्रास होनेपर सबका ह्रास हो जाता है; अतः धर्मका कभी लोप नहीं होने देना चाहिये ॥ १७ ॥
धनात् स्रवति धर्मो हि धारणाद् वेति निश्चयः ।
अकार्याणां मनुष्येन्द्र स सीमान्तकरः स्मृतः ॥ १८ ॥
नरेन्द्र! धनसे धर्मकी उत्पत्ति होती है । सबको धारण करनेके कारण वह निश्चितरूपसे धर्म कहा गया है । वह धर्म अकर्तव्य ( पाप ) की सीमाका अन्त करनेवाला माना गया है ॥ १८ ॥
प्रभवार्थं हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वयम्भुवा ।
तस्मात् प्रवर्तयेद् धर्मं प्रजानुग्रहकारणात् ॥ १९ ॥
ब्रह्माजीने प्राणियोंके कल्याणार्थ ही धर्मकी सृष्टि की है, इसलिये राजाको चाहिये कि अपने देशमें प्रजा- जनोंपर अनुग्रह करनेके लिये धर्मका प्रचार करे ॥ १ ९ ॥
तस्माद्धि राजशार्दूल धर्मः श्रेष्ठतरः स्मृतः ।
स राजा यः प्रजाः शास्ति साधुकृत् पुरुषर्षभ ॥ २० ॥
राजसिंह! इसी कारणसे धर्मको सबसे श्रेष्ठ माना गया है । पुरुषप्रवर! जो सद्धर्मके पालनपूर्वक प्रजाका शासन करता है, वही राजा है ॥ २० ॥
कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालय ।
धर्मः श्रेयस्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ॥ २१ ॥
भरतभूषण! तुम भी काम और क्रोधकी अवहेलना करके निरन्तर धर्मका ही पालन करो । धर्म ही राजाओंके लिये सबसे बढ़कर कल्याण करनेवाला है ॥ २१ ॥
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धर्मस्य ब्राह्मणो योनिस्तस्मात् तान् पूजयेत् सदा ।
ब्राह्मणानां च मान्धातः कुर्यात् कामानमत्सरी ॥ २२ ॥
मान्धाता! धर्मका मूल है ब्राह्मण; इसलिये ब्राह्मणोंका सदा सम्मान करना चाहिये, ब्राह्मणोंकी प्रत्येक कामनाको ईर्ष्यारहित होकर पूर्ण करना उचित है ॥ २२ ॥
तेषां ह्यकामकरणाद् राज्ञः संजायते भयम् ।
मित्राणि न च वर्धन्ते तथामित्रीभवन्त्यपि ॥ २३ ॥
उनकी इच्छा पूर्ण न करनेसे राजाओंके ऊपर भय आता है । राजाके मित्रोंकी वृद्धि नहीं होती, उलटे शत्रु बनते जाते हैं ॥ २३ ॥
ब्राह्मणानां सदासूयाद् बाल्याद् वैरोचनो बलिः ।
अथास्माच्छ्रीरपाक्रामद् याऽस्मिन्नासीत् प्रतापिनी ॥ २४ ॥
विरोचनकुमार बलि बाल्यकालसे ही सदा ब्राह्मणोंपर दोषारोपण करते थे; इसलिये उनकी राजलक्ष्मी, जो शत्रुओंको संताप देनेवाली थी, उनके पाससे हट गयी ॥ २४ ॥
ततस्तस्मादपाक्रम्य सागच्छत् पाकशासनम् ।
अथ सोऽन्वतपत् पश्चाच्छ्रियं दृष्ट्वा पुरन्दरे ॥ २५ ॥
बलिसे हटकर वह राजलक्ष्मी देवराज इन्द्रके पास चली गयी । फिर इन्द्रके पास उस लक्ष्मीको देखकर राजा बलिको बड़ा पश्चात्ताप होने लगा ॥ २५ ॥
एतत् फलमसूयाया अभिमानस्य वा विभो ।
तस्माद् बुध्यस्व मान्धातर्मा त्वां जह्यात् प्रतापिनी ॥ २६ ॥
प्रभो! यह अभिमान और असूयाका फल है, अतः मान्धाता! तुम सचेत हो जाओ, कहीं तुम्हारी भी शत्रुतापिनी लक्ष्मी तुमको छोड़ न दे ॥ २६ ॥
दर्पो नाम श्रियः पुत्रो जज्ञेऽधर्मादिति श्रुतिः ।
तेन देवासुरा राजन् नीताः सुबहवो व्ययम् ॥ २७ ॥
राजर्षयश्च बहवस्तथा बुध्यस्व पार्थिव ।
राजा भवति तं जित्वा दासस्तेन पराजितः ॥ २८ ॥
राजन्! सम्पत्तिका पुत्र है दर्प, जो अधर्मके अंशसे उत्पन्न हुआ है, यह श्रुतिका कथन है । उस दर्पने बहुतसे देवताओं, असुरों और राजर्षियोंका विनाश कर डाला है । अतः भूपाल! अब भी चेतो । जो दर्पको जीत लेता है, वह राजा होता है और जो उससे पराजित हो जाता है, वह दास बन जाता है ॥ २७-२८ ॥
स यथा दर्पसहितमधर्मं नानुसेवते ।
तथा वर्तस्व मान्धातश्चिरं चेत् स्थातुमिच्छसि ॥ २ ९ ॥
मान्धाता! यदि तुम चिरकालतक राजसिंहासनपर विराजमान रहना चाहते हो तो ऐसा बर्ताव करो, जिससे तुम्हारे द्वारा दर्प और अधर्मका सेवन न हो ॥ २ ९ ॥ मत्तात्प्रमत्तात् पौगण्डादुन्मत्ताच्च विशेषतः ।
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तदभ्यासादुपावर्त संहितानां च सेवनात् ॥ ३० ॥
मतवाले, प्रमादी, बालक तथा विशेषतः पागलोंसे बचो । उनके निकट- सम्पर्कसे भी दूर रहो और यदि वे एक साथ रहकर सेवा करना चाहें तो उनकी उस सेवासे भी सर्वथा बचे रहो ॥ ३० ॥
निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः ।
पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ॥ ३१ ॥
एतेभ्यो नित्ययत्तः स्यान्नक्तंचर्यां च वर्जयेत् ।
अत्यागं चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत् ॥ ३२ ॥
इसी तरह जिसको एक बार कैद किया हो, उस मन्त्रीसे, विशेषतः परायी स्त्रियोंसे, ऊँचे - नीचे और दुर्गम पर्वतसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पोंसे राजाको बचकर रहना चाहिये । इनकी ओरसे सदा सावधान रहे और रातमें घूमना-फिरना छोड़ दे । कृपणता, अभिमान, दम्भ और क्रोधका भी सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१-३२ ॥
अविज्ञातासु च स्त्रीषु क्लीबासु स्वैरिणीषु च ।
परभार्यासु कन्यासु नाचरेन्मैथुनं नृपः ॥ ३३ ॥
अपरिचित स्त्रियों, बाँझ स्त्रियों, वेश्याओं, परायी स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंके साथ राजा मैथुन न करे ॥
कुलेषु पापरक्षांसि जायन्ते वर्णसंकरात् ।
अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ॥ ३४ ॥
एते चान्ये च जायन्ते यदा राजा प्रमाद्यति ।
तस्माद् राज्ञा विशेषण वर्तितव्यं प्रजाहिते ॥ ३५ ॥
जब राजा धर्मकी ओरसे प्रमाद करता है, तब वर्णसंकरताके कारण उत्तम कुलोंमें पापी और राक्षस जन्म लेते हैं । नपुंसक, काने, लँगड़े, लूले, गूँगे तथा बुद्धिहीन बालकोंकी उत्पत्ति होती है । ये तथा और भी बहुत -सी कुत्सित संतानें जन्म लेती हैं । इसलिये राजाको विशेषरूपसे धर्मपरायण एवं सावधान होकर प्रजाके हितसाधनमें तत्पर रहना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥
क्षत्रियस्य प्रमत्तस्य दोषः संजायते महान् ।
अधर्माः सम्प्रवर्धन्ते प्रजासंकरकारकाः ॥ ३६ ॥
क्षत्रियके प्रमादसे बड़े-बड़े दोष प्रकट होते हैं । वर्णसंकरोंको जन्म देनेवाले पापकर्मोंकी वृद्धि होती है ॥
अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते ।
अवृष्टिरतिवृष्टिश्च व्याधिश्चाप्याविशेत् प्रजाः ॥ ३७ ॥
गर्मीके मौसममें सर्दी और सर्दीके मौसममें गर्मी पड़ने लगती है । कभी सूखा पड़ जाता है, कभी अधिक वर्षा होती है तथा प्रजामें नाना प्रकारके रोग फैल जाते हैं ॥ ३७ ॥
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नक्षत्राण्युपतिष्ठन्ति ग्रहा घोरास्तथागते ।
उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते बहवो राजनाशनाः ॥ ३८ ॥
आकाशमें भयानक ग्रह और धूमकेतु आदि तारे उगते हैं तथा राष्ट्रके विनाशकी सूचना देनेवाले बहुतसे उत्पात दिखायी देने लगते हैं ॥ ३८ ॥
अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चापि न रक्षति ।
प्रजाश्च तस्य क्षीयन्ते ततः सोऽनुविनश्यति ॥ ३ ९ ॥
जो राजा अपनी रक्षा नहीं करता, वह प्रजाकी भी रक्षा नहीं कर सकता । पहले उसकी प्रजाएँ क्षीण होती हैं; फिर वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ॥ ३ ९ ॥
द्वावाददाते ह्येकस्य द्वयोः सुबहवोऽपरे ।
कुमार्यः सम्प्रलुप्यन्ते तदाहुर्नृपदूषणम् ॥ ४० ॥
जब दो मनुष्य मिलकर एककी वस्तु छीन लेते हैं, बहुत - से मिलकर दोको लूटते हैं तथा कुमारी कन्याओंपर बलात्कार होने लगता है, उस समय इन सारे अपराधोंका कारण राजाको ही बताया जाता है ॥ ४० ॥
ममेदमिति नैकस्य मनुष्येष्ववतिष्ठति ।
त्यक्त्वा धर्मं यदा राजा प्रमादमनुतिष्ठति ॥ ४१ ॥
जब राजा धर्म छोड़कर प्रमादमें पड़ जाता है, तब मनुष्योंमेंसे एक भी अपने धनको ' यह मेरा है ' ऐसा समझकर स्थिर नहीं रह सकता ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उतथ्यगीतासु नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ० ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उतथ्यगीताविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥
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एकनवतितमोऽध्यायः उतथ्यके उपदेशमें धर्माचरणका महत्त्व और राजाके धर्मका वर्णन उतथ्य उवाच
कालवर्षी च पर्जन्यो धर्मचारी च पार्थिवः ।
सम्पद् यदेषा भवति सा बिभर्ति सुखं प्रजाः ॥ १ ॥
उतथ्य कहते हैं — राजन्! राजा धर्मका आचरण करे और मेघ समयपर वर्षा करता रहे । इस प्रकार जो सम्पत्ति बढ़ती है, वह प्रजावर्गका सुखपूर्वक भरण- पोषण करती ॥ १ ॥
यो न जानाति हर्तुं वा वस्त्राणां रजको मलम् ।
रक्तानां वा शोधयितुं यथा नास्ति तथैव सः ॥ २ ॥
यदि धोबी कपड़ोंकी मैल उतारना नहीं जानता अथवा रँगे हुए वस्त्रोंको धोकर शुद्ध एवं उज्ज्वल बनानेकी कला उसे नहीं ज्ञात है तो उसका होना न होना बराबर है ॥ २ ॥
एवमेतद् द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां विशां तथा ।
शूद्रश्चतुर्थो वर्णानां नानाकर्मस्ववस्थितः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा चौथे शूद्र वर्णके मनुष्य यदि अपने - अपने पृथक् - पृथक् कर्मोंको जानकर उनमें संलग्न नहीं रहते हैं, तो उनका होना न होना एक- सा ही है ॥ ३ ॥
कर्म शूद्रे कृषिर्वैश्ये दण्डनीतिश्च राजनि ।
ब्रह्मचर्यं तपो मन्त्राः सत्यं चापि द्विजातिषु ॥ ४ ॥
शूद्रमें द्विजोंकी सेवा, वैश्यमें कृषि, राजा या क्षत्रियमें दण्डनीति तथा ब्राह्मणोंमें ब्रह्मचर्य, तपस्या, वेदमन्त्र और सत्यकी प्रधानता है ॥ ४ ॥
तेषां यः क्षत्रियो वेद वस्त्राणामिव शोधनम् ।
शीलदोषान् विनिर्हर्तुं स पिता स प्रजापतिः ॥ ५ ॥
इनमें जो क्षत्रिय वस्त्रोंकी मैल दूर करनेवाले धोबीके समान चरित्रदोषको दूर करना जानता है, वही प्रजावर्गका पिता और वही प्रजाका अधिपति है ॥ ५ ॥
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्च भरतर्षभ ।
राजवृत्तानि सर्वाणि राजैव युगमुच्यते ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग – ये सब - के - सब राजाके आचरणोंमें स्थित हैं । राजा ही युगोंका प्रवर्तक होनेके कारण युग कहलाता है ॥ ६ ॥
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चातुर्वर्ण्य तथा वेदाश्चातुराश्रम्यमेव च ।
सर्वं प्रमुह्यते ह्येतद् यदा राजा प्रमाद्यति ॥ ७ ॥
जब राजा प्रमाद करता है, तब चारों वर्ण, चारों वेद और चारों आश्रम सभी मोहमें पड़ जाते हैं ॥ ७ ॥
अग्नित्रेता त्रयी विद्या यज्ञाश्च सहदक्षिणाः ।
सर्व एव प्रमाद्यन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥ ८ ॥
जब राजा प्रमादी हो जाता है, तब गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि-ये तीन अग्नि; ऋक्, साम और यजु — ये तीन वेद एवं दक्षिणाओंके साथ सम्पूर्ण यज्ञ भी विकृत हो जाते हैं ॥ ८ ॥
राजैव कर्ता भूतानां राजैव च विनाशकः ।
धर्मात्मा यः स कर्तास्यादधर्मात्मा विनाशकः ॥ ९ ॥
राजा ही प्राणियोंका कर्ता ( जीवनदाता ) और राजा ही उनका विनाश करनेवाला है । जो धर्मात्मा है, वह प्रजाका जीवनदाता है और जो पापात्मा है, वह उसका विनाश करनेवाला है ॥ ९ ॥
राज्ञो भार्याश्च पुत्राश्च बान्धवाः सुहृदस्तथा ।
समेत्य सर्वे शोचन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥ १० ॥
जब राजा प्रमाद करने लगता है, तब उसकी स्त्री, पुत्र, बान्धव तथा सुहृद् सब मिलकर शोक करते हैं ॥
हस्तिनोऽश्वाश्च गावश्चाप्युष्ट्राश्वतरगर्दभाः ।
अधर्मभूते नृपतौ सर्वे सीदन्ति जन्तवः ॥ ११ ॥
राजाके पापपरायण हो जानेपर उसके हाथी, घोड़े, गौ, ऊँट, खच्चर और गदहे आदि सभी पशु दुःख पाते हैं ॥ ११ ॥
दुर्बलार्थं बलं सृष्टं धात्रा मान्धातरुच्यते ।
अबलं तु महद्भूतं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १२ ॥
मान्धाता! कहते हैं कि विधाताने दुर्बल प्राणियोंकी रक्षाके लिये ही बलसम्पन्न राजाकी सृष्टि की है । निर्बल प्राणियोंका महान् समुदाय राजाके बलपर टिका हुआ है ॥ १२ ॥
यच्च भूतं सम्भजते ये च भूतास्तदन्वयाः ।
अधर्मस्थे हि नृपतौ सर्वे शोचन्ति पार्थिव ॥ १३ ॥
भूपाल! राजा जिन प्राणियोंको अन्न आदि देकर उनकी सेवा करता है और जो प्राणी राजासे सम्बन्ध रखते हैं, वे सब- के - सब उस राजाके अधर्मपरायण होनेपर शोक प्रकट करने लगते हैं ॥ १३ ॥
दुर्बलस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च ।
अविषह्यतमं मन्ये मा स्म दुर्बलमासदः ॥ १४ ॥
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दुर्बल मनुष्य, मुनि और विषधर सर्प– इन सबकी दृष्टिको मैं अत्यन्त दुःसह मानता हूँ; इसलिये तुम किसी दुर्बल प्राणीको न सताना ॥ १४ ॥
दुर्बलांस्तात बृध्येथा नित्यमेवाविमानितान् ।
मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि प्रदहेयुः सबान्धवम् ॥ १५ ॥
तात! तुम दुर्बल प्राणियोंको सदा ही अपमानका पात्र न समझना, दुर्बलोंकी आँखें तुम्हें बन्धु - बान्धवों - सहित जलाकर भस्म न कर डालें, इसके लिये सदा सावधान रहना ॥ १५ ॥
हि दुर्बलदग्धस्य कुले किंचित् प्ररोहति ।
आमूलं निर्दहन्त्येव मा स्म दुर्बलमासदः ॥ १६ ॥
दुर्बल मनुष्य जिसको अपनी क्रोधाग्निसे जला डालते हैं, उसके कुलमें फिर कोई अंकुर नहीं जमता । वे जड़मूलसहित दग्ध कर देते हैं; अतः तुम दुर्बलोंको कभी न सताना ॥ १६ ॥
अबलं वै बलाच्छ्रेयो यच्चातिबलवद्बलम् ।
बलस्याबलदग्धस्य न किंचिदवशिष्यते ॥ १७ ॥
निर्बल प्राणी बलवान्से श्रेष्ठ है, क्योंकि जो अत्यन्त बलवान् है, उसके बलसे भी निर्बलका बल अधिक है । निर्बलके द्वारा दग्ध किये गये बलवान्का कुछ भी शेष नहीं रह जाता ॥ १७ ॥
विमानितो हतः क्रुष्टस्त्रातारं चेन्न विन्दति ।
अमानुषकृतस्तत्र दण्डो हन्ति नराधिपम् ॥ १८ ॥
यदि अपमानित, हताहत तथा गाली-गलौजसे तिरस्कृत होनेवाला दुर्बल मनुष्य राजाको अपने रक्षकके रूपमें नहीं उपलब्ध कर पाता तो वहाँ दैवका दिया हुआ दण्ड राजाको मार डालता है ॥ १८ ॥
मा स्म तात रणे स्थित्वा भुञ्जीथा दुर्बलं जनम् ।
मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि दहन्त्वग्निरिवाश्रयम् ॥ १ ९ ॥
तात! तुम युद्धमें संलग्न होकर दुर्बल मनुष्यको कर लेनेके द्वारा अपने उपभोगका विषय न बनाना । जैसे आग अपने आश्रयभूत काष्ठको जला देती है, उसी प्रकार दुर्बलोंकी दृष्टि तुम्हें दग्ध न कर डाले ॥ १ ९ ॥
यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि रोदताम् ।
तानि पुत्रान् पशून् घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशंसनात् ॥ २० ॥
झूठे अपराध लगाये जानेपर रोते हुए दीन- दुर्बल मनुष्योंके नेत्रोंसे जो आँसू गिरते हैं, वे मिथ्या कलंक लगानेके कारण उन अपराधियोंके पुत्रों और पशुओंका नाश कर डालते हैं ॥ २० ॥
यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पौत्रेषु नप्तृषु ।
न हि पापं कृतं कर्म सद्यः फलति गौरिव ॥ २१ ॥
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यदि पापका फल अपनेको नहीं मिला तो वह पुत्रों तथा नाती- पोतोंको अवश्य मिलता है । जैसे पृथ्वीमें बोया हुआ बीज तुरंत फल नहीं देता, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी तत्काल फल नहीं देता ( समय आनेपर ही उसका फल मिलता है ) ॥ २१ ॥
यत्राबलो वध्यमानस्त्रातारं नाधिगच्छति ।
महान् दैवकृतस्तत्र दण्डः पतति दारुणः ॥ २२ ॥
सताया जानेवाला दुर्बल मनुष्य जहाँ अपने लिये कोई रक्षक नहीं पाता है, वहाँ सतानेवाले पापीको दैवकी ओरसे भयंकर दण्ड प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
युक्ता यदा जानपदा भिक्षन्ते ब्राह्मणा इव ।
अभीक्ष्णं भिक्षुरूपेण राजानं घ्नन्ति तादृशाः ॥ २३ ॥
जब बाहर गावोंके लोग एक समूह बनाकर भिक्षुकरूपसे ब्राह्मणोंके समान भिक्षा माँगने लगते हैं, तब वैसे लोग एक दिन राजाका विनाश कर डालते हैं ॥ २३ ॥
राज्ञो यदा जनपदे बहवो राजपूरुषाः ।
अनयेनोपवर्तन्ते तद् राज्ञः किल्बिषं महत् ॥ २४ ॥
जब राजाके बहुत - से कर्मचारी देशमें अन्यायपूर्ण बर्ताव करने लगते हैं, तब वह महान् पाप राजाको ही लगता है ॥ २४ ॥
यदा युक्त्या नयेदर्थान् कामादर्थवशेन वा ।
कृपणं याचमानानां तद् राज्ञो वैशसं महत् ॥ २५ ॥
यदि कोई राजा या राजकीय कर्मचारी दीनतापूर्ण याचना करती हुई प्रजाओंकी उस प्रार्थनाको ठुकराकर स्वेच्छासे अथवा धनके लोभवश कोई-न- कोई युक्ति करके उनके धनका अपहरण कर ले तो वह राजाके महान् विनाशका सूचक है ॥ २५ ॥
महान् वृक्षो जायते वर्धते च तं चैव भूतानि समाश्रयन्ति । यदा वृक्षश्छिद्यते दह्यते च तदाश्रया अनिकेता भवन्ति ॥ २६ ॥
जब कोई महान् वृक्ष पैदा होता और क्रमशः बढ़ता है, तब बहुत से प्राणी (पक्षी ) आकर उसपर बसेरे लेते हैं और जब उस वृक्षको काटा या जला दिया जाता है, तब उसपर रहनेवाले सभी जीव निराश्रय हो जाते हैं ॥ २६ ॥
यदा राष्ट्रे धर्ममग्र्यं चरन्ति संस्कारं वा राजगुणं ब्रुवाणाः । तैरेवाधर्मश्चरितो धर्ममोहात् तूर्णं जह्यात् सुकृतं दुष्कृतं च ॥ २७ ॥
जब राज्यमें रहनेवाले लोग राजाके गुणोंका बखान करते हुए वैदिक संस्कारोंके साथ उत्तम धर्मका आचरण करते हैं, उस समय राजा पापमुक्त हो जाता है तथा जब वे ही लोग
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धर्मके विषयमें मोहित हो जानेके कारण अधर्माचरण करने लगते हैं, उस समय राजा शीघ्र ही पुण्यसे हीन हो जाता है ॥ २७ ॥
यत्र पापा ज्ञायमानाश्चरन्ति
सतां कलिर्विन्दते तत्र राज्ञः ।
यदा राजा शास्ति नरानशिष्टां- स्तदा राज्यं वर्धते भूमिपस्य ॥ २८ ॥
जहाँ पापी मनुष्य प्रकटरूपसे निर्भय विचरते हैं, वहाँ सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें समझा जाता है कि राजाको कलियुगने घेर लिया है; किंतु जब राजा दुष्ट मनुष्योंको दण्ड देता है, तब उसका राज्य सब ओरसे उन्नत होने लगता है ॥ २८ ॥
यश्चामात्यान् मानयित्वा यथार्थं मन्त्रे च युद्धे च नृपो नियुञ्ज्यात् । विवर्धते तस्य राष्ट्रं नृपस्य भुङ्क्ते महीं चाप्यखिलां चिराय ॥ २ ९ ॥ जो राजा अपने मन्त्रियोंका यथार्थरूपसे सम्मान करके उन्हें मन्त्रणा अथवा युद्धके काममें नियुक्त करता है, उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता है और वह चिरकालतक समूची पृथ्वीका राज्य भोगता है ॥ २ ९ ॥
यच्चापि सुकृतं कर्म वाचं चैव सुभाषिताम् ।
समीक्ष्य पूजयन् राजा धर्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ३० ॥
जो राजा अपने कर्मचारी अथवा प्रजाका पुण्यकर्म देखकर तथा उनकी सुन्दर वाणी सुनकर उन सबका यथायोग्य सम्मान करता है, वह परम उत्तम धर्मको प्राप्त कर लेता है ॥ ३० ॥
संविभज्य यदा भुङ्क्ते नामात्यानवमन्यते ।
निहन्ति बलिनं दृप्तं स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३१ ॥
राजा जब उसको यथायोग्य विभाग देकर स्वयं उपभोग करता है, मन्त्रियोंका अनादर नहीं करता है और बलके घमंडमें चूर रहनेवाले दुष्ट पुरुष या शत्रुको मार डालता है, तब उसका यह सब कार्य राजधर्म कहलाता है ॥ ३१ ॥
त्रायते हि यदा सर्वं वाचा कायेन कर्मणा ।
पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३२ ॥
जब वह मन, वाणी और शरीरके द्वारा सबकी रक्षा करता है और पुत्रके भी अपराधको क्षमा नहीं करता, तब उसका वह बर्ताव भी ' राजाका धर्म' कहा जाता है ॥ ३२ ॥
संविभज्य यदा भुङ्क्ते नृपतिर्दुर्बलान् नरान् ।
तदा भवन्ति बलिनः स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३३ ॥
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जब राजा दुर्बल मनुष्योंको यथावश्यक वस्तुएँ देकर पीछे स्वयं भोजन करता है, तब वे
दुर्बल मनुष्य बलवान् हो जाते हैं । वह त्याग राजाका धर्म कहा गया है ॥ ३३ ॥
यदा रक्षति राष्ट्राणि यदा दस्यूनपोहति ।
यदा जयति संग्रामे स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३४ ॥
जब राजा समूचे राष्ट्रकी रक्षा करता है, डाकू और लुटेरोंको मार भगाता है तथा संग्राममें विजयी होता है, तब वह सब राजाका धर्म कहा जाता है ॥ ३४ ॥
पापमाचरतो यत्र कर्मणा व्याहृतेन वा ।
प्रियस्यापि न मृष्येत स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३५ ॥
प्रिय- से - प्रिय व्यक्ति भी यदि क्रिया अथवा वाणीद्वारा पाप करे तो राजाको चाहिये कि उसे भी क्षमा न करे अर्थात् उसे भी यथायोग्य दण्ड दे । जो ऐसा बर्ताव है, वह राजाका धर्म कहलाता है ॥ ३५ ॥
यदा शारणिकान् राजा पुत्रवत् परिरक्षति ।
भिनत्ति च न मर्यादां स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३६ ॥
जब राजा व्यापारियोंकी पुत्रके समान रक्षा करता है और धर्मकी मर्यादाको भंग नहीं करता, तब वह भी राजाका धर्म कहलाता है ॥ ३६ ॥
यदाऽऽप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धयान्वितः ।
कामद्वेषावनादृत्य स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३७ ॥
जब वह राग और द्वेषका अनादर करके पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा श्रद्धापूर्वक यजन करता है, तब वह राजाका धर्म कहा जाता है ॥ ३७ ॥
कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु परिमार्जति ।
हर्षं संजनयन् नॄणां स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३८ ॥
जब वह दीन, अनाथ और वृद्धोंके आँसू पोंछता है और इस बर्तावद्वारा सब लोगोंके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करता है, तब उसका वह सद्भाव राजाका धर्म कहलाता है ॥ ३८ ॥
विवर्धयति मित्राणि तथारींश्चापि कर्षति ।
सम्पूजयति साधूंश्च स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ३ ९ ॥
वह जो मित्रोंकी वृद्धि, शत्रुओंका नाश और साधु पुरुषोंका समादर करता है, उसे राजाका धर्म कहते हैं ॥ ३ ९ ॥
सत्यं पालयति प्रीत्या नित्यं भूमिं प्रयच्छति ।
पूजयेदतिथीन् भृत्यान् स राज्ञो धर्म उच्यते ॥ ४० ॥
राजा जो प्रेमपूर्वक सत्यका पालन करता है, प्रतिदिन भूदान देता है और अतिथियों तथा भरण- पोषणके योग्य व्यक्तियोंका सत्कार करता है, वह राजाका धर्म कहलाता है ॥ ४० ॥
निग्रहानुग्रहौ चोभौ यत्र स्यातां प्रतिष्ठितौ ।