श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 631–640

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा ज्ञानं तत् प्रतिपद्यते ।

आत्मनो'मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीयते ॥ २८ ॥

जो कल्याणकारी उपदेश सुनकर अपने मतका आग्रह छोड़ उस ज्ञानको ग्रहण कर लेता है, उसके पीछे यह सारा जगत् चलता है ॥ २८ ॥

योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते ।

शृणोति प्रतिकूलानि सर्वदा विमना इव ॥ २ ९ ॥

अग्राम्यचरितां वृत्तिं यो न सेवेत नित्यदा ।

जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥ ३० ॥

जो मनके प्रतिकूल होनेके कारण अपने ही प्रयोजनकी सिद्धि चाहनेवाले सुहृद्की बात नहीं सहन करता और अपनी अर्थसिद्धिके विरोधी वचनोंको भी सुनता है, सदा अनमना-सा रहता है, जो बुद्धिमान् शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए बर्तावका सदा सेवन नहीं करता एवं पराजित या अपराजित व्यक्तियोंको उनके परम्परागत आचारका पालन नहीं करने देता, वह क्षत्रिय धर्मसे गिर जाता है ॥ २ ९ -३० ॥ निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः ।

पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ।

एतेभ्यो नित्ययुक्तः सन् रक्षेदात्मानमेव तु ॥ ३१ ॥

जिसको कभी कैद किया गया हो ऐसे मन्त्रीसे, विशेषतः स्त्रियोंसे, विषम पर्वतसे, दुर्गम स्थानसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पसे सदा सावधान रहकर राजा अपनी रक्षा करे ॥ ३१ ॥

मुख्यानमात्यान् यो हित्वा निहीनान् कुरुते प्रियान् ।

स वै व्यसनमासाद्य गाधमार्तो न विन्दति ॥ ३२ ॥

जो प्रधान मन्त्रियोंका त्याग करके निम्नश्रेणीके मनुष्योंको अपना प्रिय बनाता है, वह संकटके घोर समुद्रमें पड़कर पीड़ित हो कहीं आश्रय नहीं पाता है ॥

यः कल्याणगुणान् ज्ञातीन् प्रद्वेषान्नो बुभूषति ।

अदृढात्मा दृढक्रोधः स मृत्योर्वसतेऽन्तिके ॥ ३३ ॥

जो द्वेषवश कल्याणकारी गुणोंवाले अपने सजातीय बन्धुओं एवं कुटुम्बीजनोंका सम्मान नहीं करता, जिसका चित्त चंचल है तथा जो क्रोधको दृढ़ता- पूर्वक पकड़े रहनेवाला है, वह सदा मृत्युके समीप निवास करता है ॥ ३३ ॥

अथ यो गुणसम्पन्नान् हृदयस्याप्रियानपि ।

प्रियेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति ॥ ३४ ॥

जो राजा हृदयको प्रिय लगनेवाले न होनेपर भी गुणवान् पुरुषोंको प्रीतिजनक बर्तावद्वारा अपने वशमें कर लेता है, वह दीर्घकालतक यशस्वी बना रहता है ॥ नाकाले प्रणयेदर्थान्नाप्रिये जातु संज्वरेत् ।

पृष्ठ 632

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प्रिये नातिभृशं तुष्येद् युज्येतारोग्यकर्मणि ॥ ३५ ॥

राजाको चाहिये कि वह असमयमें कर लगाकर धन- संग्रहकी चेष्टा न करे । कोई अप्रिय कार्य हो जानेपर कभी चिन्ताकी आगमें न जले और प्रिय कार्य बन जानेपर अत्यन्त हर्षसे फूल न उठे और अपने शरीरको नीरोग बनाये रखनेके कार्यमें तत्पर रहे ॥ ३५ ॥

के वानुरक्ताः राजानः के भयात् समुपाश्रिताः ।

मध्यस्थदोषाः के चैषामिति नित्यं विचिन्तयेत् ॥ ३६ ॥

इस बातका ध्यान रखे कि कौन राजा मुझसे प्रेम रखते हैं? कौन भयके कारण मेरा आश्रय लिये हुए हैं? इनमेंसे कौन मध्यस्थ हैं और कौन- कौन नरेश मेरे शत्रु बने हुए हैं? ॥ ३६ ॥

न जातु बलवान् भूत्वा दुर्बले विश्वसेत् क्वचित् ।

भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ॥ ३७ ॥

राजा स्वयं बलवान् होकर भी कभी अपने दुर्बल शत्रुका विश्वास न करे; क्योंकि ये असावधानीकी दशामें बाज पक्षीकी तरह झपट्टा मारते हैं ॥ ३७ ॥

अपि सर्वगुणैर्युक्तं भर्तारं प्रियवादिनम् ।

अभिद्रुह्यति पापात्मा न तस्माद् विश्वसेज्जनात् ॥ ३८ ॥

जो पापात्मा मनुष्य अपने सर्वगुणसम्पन्न और सर्वदा प्रिय वचन बोलनेवाले स्वामीसे भी अकारण द्रोह करता है, उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ ३८ ॥

एवं राजोपनिषदं ययातिः स्माह नाहुषः ।

मनुष्यविषये युक्तो हन्ति शत्रूननुत्तमान् ॥ ३ ९ ॥

नहुषपुत्र राजा ययातिने मानवमात्रके हितमें तत्पर हो इस राजोपनिषद्का वर्णन किया है । जो इसमें निष्ठा रखकर इसके अनुसार चलता है, वह बड़े- बड़े शत्रुओंका विनाश कर डालता है ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वामदेवगीतासु त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वामदेवगीताविषयक तिरानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

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पृष्ठ 633

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चतुर्नवतितमोऽध्यायः वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये हितकर बर्ताव वामदेव उवाच

अयुद्धेनैव विजयं वर्धयेद् वसुधाधिपः ।

जघन्यमाहुर्विजयं युद्धेन च नराधिप ॥ १ ॥

वामदेवजी कहते हैं- नरेश्वर! राजा युद्धके सिवा किसी और ही उपायसे पहले अपनी विजय- वृद्धिकी चेष्टा करे; युद्धसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे निम्न श्रेणीकी बताया गया है ॥ १ ॥

न चाप्यलब्धं लिप्सेत मूले नातिदृढे सति ।

न हि दुर्बलमूलस्य राज्ञो लाभो विधीयते ॥ २ ॥

यदि राज्यकी जड़ मजबूत न हो तो राजाको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति — अनधिकृत देशोंपर अधिकारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जिसके मूलमें ही दुर्बलता है, उस राजाको वैसा लाभ होना सम्भव नहीं है ॥ २ ॥

यस्य स्फीतो जनपदः सम्पन्नः प्रियराजकः ।

संतुष्टपुष्टसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः ॥ ३ ॥

जिस राजाका देश समृद्धिशाली, धनधान्यसे सम्पन्न, राजाको प्रिय माननेवाले मनुष्योंसे परिपूर्ण और हृष्ट- पुष्ट मन्त्रियोंसे सुशोभित है, उसीकी जड़ मजबूत समझनी चाहिये ॥ ३ ॥

यस्य योधाः सुसंतुष्टाः सान्त्विताः सूपधास्थिताः ।

अल्पेनापि स दण्डेन महीं जयति पार्थिवः ॥ ४ ॥

जिसके सैनिक संतुष्ट, राजाके द्वारा सान्त्वना प्राप्त और शत्रुओंको धोखा देनेमें चतुर हों, वह भूपाल थोड़ी - सी सेनाके द्वारा भी पृथ्वीपर विजय पा लेता है ॥

( दण्डो हि बलवान् यत्र तत्र साम प्रयुज्यते ।

प्रदानं सामपूर्वं च भेदमूलं प्रशस्यते ॥

जिस स्थानपर शत्रुपक्षकी सेना अधिक प्रबल हो, वहाँ पहले सामनीतिका ही प्रयोग करना उचित है । यदि उससे काम न चले तो धन या उपहार देनेकी नीतिको अपनाना चाहिये । इस दाननीतिके मूलमें भी यदि भेदनीतिका समावेश हो अर्थात् शत्रुओंमें फूट डालनेकी चेष्टा की जा रही हो तो उसे उत्तम माना गया है ॥ त्रयाणां विफलं कर्म यदा पश्येत भूमिपः । रन्ध्रं ज्ञात्वा ततो दण्डं प्रयुञ्जीताविचारयन् ॥ )

पृष्ठ 634

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जब राजा साम, दान और भेद- तीनोंका प्रयोग निष्फल देखे, तब शत्रुकी दुर्बलताका पता लगाकर दूसरा कोई विचार मनमें न लाते हुए दण्डनीतिका ही प्रयोग करे– शत्रुके साथ युद्ध छेड़ दे ॥

पौरजानपदा यस्य भूतेषु च दयालवः ।

सधना धान्यवन्तश्च दृढमूलः स पार्थिवः ॥ ५ ॥

जिसके नगर और जनपदमें रहनेवाले लोग समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाले और धन- धान्यसे सम्पन्न होते हैं, उस राजाकी जड़ मजबूत समझी जाती है ॥

( राष्ट्रकर्मकरा ह्येते राष्ट्रस्य च विरोधिनः ।

दुर्विनीता विनीताश्च सर्वे साध्याः प्रयत्नतः ॥

ये नगर और जनपदके लोग राष्ट्रके कार्यकी सिद्धि करनेवाले और उसके विरोधी भी होते हैं । उद्दण्ड और विनयशील भी होते हैं । उन सबको प्रयत्नपूर्वक अपने वशमें करना चाहिये ॥

चाण्डालम्लेच्छजात्याश्च पाषण्डाश्च विकर्मिणः ।

बलिनश्चाश्रमाश्चैव तथा गायकनर्तकाः ॥

यस्य राष्ट्रे वसन्त्येते धान्योपचयकारिणः । आयवृद्धौ सहायाश्च दृढमूलः स पार्थिवः ॥ ) चाण्डाल, म्लेच्छ, पाखण्डी, शास्त्र- विरुद्ध कर्म करनेवाले, बलवान्, सभी आश्रमोंके निवासी तथा गायक और नर्तक– इन सबको प्रयत्नपूर्वक वशमें करना चाहिये । जिसके राज्यमें ये सब लोग धन- धान्यकी वृद्धि करनेवाले और आय बढ़ानेमें सहायक होकर रहते हैं, उस राजाकी जड़ मजबूत समझी जाती है ॥

प्रतापकालमधिकं यदा मन्येत चात्मनः ।

तदा लिप्सेत मेधावी परभूमिधनान्युत ॥ ६ ॥

बुद्धिमान् राजा जब अपने प्रतापको प्रकाशित करनेका उपयुक्त अवसर समझे, तभी दूसरेका राज्य और धन लेनेकी चेष्टा करे ॥ ६ ॥

भोगेषूदयमानस्य भूतेषु च दयावतः ।

वर्धते त्वरमाणस्य विषयो रक्षितात्मनः ॥ ७ ॥

जिसके वैभव- भोग दिनोंदिन बढ़ रहे हों, जो सब प्राणियोंपर दया रखता हो, काम करनेमें फुर्तीला हो और अपने शरीरकी रक्षाका ध्यान रखता हो, उस राजाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ॥ ७ ॥

तक्षेदात्मानमेवं स वनं परशुना यथा ।

यः सम्यग् वर्तमानेषु स्वेषु मिथ्या प्रवर्तते ॥ ८ ॥

जो अच्छा बर्ताव करनेवाले स्वजनोंके प्रति मिथ्या व्यवहार करता है, वह इस बर्तावद्वारा कुल्हाड़ीसे जंगलकी भाँति अपने आपका ही उच्छेद कर डालता है ॥ ८ ॥

पृष्ठ 635

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नैव द्विषन्तो हीयन्ते राज्ञो नित्यमनिघ्नतः ।

क्रोधं निहन्तुं यो वेद तस्य द्वेष्टा न विद्यते ॥ ९ ॥

यदि राजा कभी किसी द्वेष करनेवालेको दण्ड न दे तो उससे द्वेष करनेवालोंकी कमी नहीं होती है; परंतु जो क्रोधको मारनेकी कला जानता है, उसका कोई द्वेषी नहीं रहता है ॥ ९ ॥

यदार्यजनविद्विष्टं कर्म तन्नाचरेद् बुधः ।

यत् कल्याणमभिध्यायेत् तत्रात्मानं नियोजयेत् ॥ १० ॥

जिसे श्रेष्ठ पुरुष बुरा समझते हों, बुद्धिमान् राजा वैसा कर्म कभी न करे । जिस कार्यको सबके लिये कल्याणकारी समझे, उसीमें अपने आपको लगावे ॥

नैनमन्येऽवजानन्ति नात्मना परितप्यते ।

कृत्यशेषेण यो राजा सुखान्यनुबुभूषति ॥ ११ ॥

जो राजा अपना कर्तव्य पूर्ण करके ही सुखका अनुभव करना चाहता है, उसका न तो दूसरे लोग अनादर करते हैं और न वह स्वयं ही संतप्त होता है ॥ ११ ॥

इदं वृत्तं मनुष्येषु वर्तते यो महीपतिः ।

उभौ लोकौ विनिर्जित्य विजये सम्प्रतिष्ठते ॥ १२ ॥

जो राजा प्रजाके प्रति ऐसा बर्ताव करता है, वह इहलोक और परलोक दोनोंको जीतकर विजयमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तो वामदेवेन सर्वं तत् कृतवान् नृपः ।

तथा कुर्वंस्त्वमप्येतौ लोकौ जेता न संशयः ॥ १३ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! वामदेवजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर राजा वसुमना सब कार्य उसी प्रकार करने लगे । यदि तुम भी ऐसा ही आचरण करोगे तो निःसंदेह लोक और परलोक दोनों सुधार लोगे ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वामदेवगीतासु चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वामदेवगीताविषयक चौरानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥

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पृष्ठ 636

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन युधिष्ठिरउवाच

अथ यो विजिगीषेत क्षत्रियः क्षत्रियं युधि ।

कस्तस्य विजये धर्मो ह्येतं पृष्टो वदस्व मे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! यदि कोई क्षत्रिय राजा दूसरे क्षत्रिय नरेशपर युद्धमें विजय पाना चाहे तो उसे अपनी जीतके लिये किस धर्मका पालन करना चाहिये? इस समय यही मेरा आपसे प्रश्न है, आप मुझे इसका उत्तर दीजिये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ससहायोऽसहायो वा राष्ट्रमागम्य भूमिपः ।

ब्रूयादहं वो राजेति रक्षिष्यामि च वः सदा ॥ २ ॥

मम धर्मबलिं दत्त किं वा मां प्रतिपत्स्यथ ।

ते चेत् तमागतं तत्र वृणुयुः कुशलं भवेत् ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! पहले राजा सहायकोंके साथ अथवा बिना सहायकोंके ही जिसपर विजय पाना चाहता हो, उस राज्यमें जाकर वहाँके लोगोंसे कहे कि मैं तुम्हारा राजा हूँ और सदा तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा, मुझे धर्मके अनुसार कर दो अथवा मेरे साथ युद्ध करो । उसके ऐसा कहनेपर यदि वे उस समागत नरेशका अपने राजाके रूपमें वरण कर लें तो सबकी कुशल हो ॥ २-३ ॥

ते चेदक्षत्रियाः सन्तो विरुध्येरन् कथंचन ।

सर्वोपायैर्नियन्तव्या विकर्मस्था नराधिप ॥ ४ ॥

नरेश्वर! यदि वे क्षत्रिय न होकर भी किसी प्रकार विरोध करें तो वर्ण- विपरीत कर्ममें लगे हुए उन सब मनुष्योंका सभी उपायोंसे दमन करना चाहिये ॥ ४ ॥

अशस्त्रं क्षत्रियं मत्वा शस्त्रं गृह्णाद् यथापरः ।

त्राणायाप्यसमर्थं तं मन्यमानमतीव च ॥ ५ ॥

यदि उस देशका क्षत्रिय शस्त्रहीन हो और अपनी रक्षा करनेमें भी अपनेको अत्यन्त असमर्थ मानता हो तो वहाँका क्षत्रियेतर मनुष्य भी देशकी रक्षाके लिये शस्त्र ग्रहण कर सकता है ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरउवाच अथः यः क्षत्रियो राजा क्षत्रियं प्रत्युपाव्रजेत् ।

पृष्ठ 637

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कथं सम्प्रति योद्धव्यस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! यदि कोई क्षत्रिय राजा दूसरे क्षत्रिय राजापर चढ़ाई कर दे तो उस समय उसे उसके साथ किस प्रकार युद्ध करना चाहिये यह मुझे बताइये ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

नैवासन्नद्धकवचो योद्धव्यः क्षत्रियो रणे ।

एक एकेन वाच्यश्च विसृजेति क्षिपामि च ॥ ७ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! जो कवच बाँधे हुए न हो, उस क्षत्रियके साथ रणभूमिमें युद्ध नहीं करना चाहिये । एक योद्धा दूसरे एकाकी योद्धासे कहे ' तुम मुझपर शस्त्र छोड़ो । मैं भी तुमपर प्रहार करता हूँ' ॥ ७ ॥

स चेत् सन्नद्ध आगच्छेत् सन्नद्धव्यं ततो भवेत् ।

स चेत् ससैन्य आगच्छेत् ससैन्यस्तमथाह्वयेत् ॥ ८ ॥

यदि वह कवच बाँधकर सामने आ जाय तो स्वयं भी कवच धारण कर ले । यदि विपक्षी सेनाके साथ आवे तो स्वयं भी सेनाके साथ आकर शत्रुको ललकारे ॥ ८ ॥

स चेन्निकृत्या युद्धयेत निकृत्या प्रतियोधयेत् ।

अथ चेद् धर्मतो युद्धयेद् धर्मेणैव निवारयेत् ॥ ९ ॥

यदि वह छलसे युद्ध करे तो स्वयं भी उसी रीतिसे उसका सामना करे और यदि वह धर्मसे युद्ध आरम्भ करे तो धर्मसे ही उसका सामना करना चाहिये ॥

नाश्वेन रथिनं यायादुदियाद् रथिनं रथी ।

व्यसने न प्रहर्तव्यं न भीताय जिताय च ॥ १० ॥

घोड़ेके द्वारा रथीपर आक्रमण न करे । रथीका सामना रथीको ही करना चाहिये । यदि शत्रु किसी संकटमें पड़ जाय तो उसपर प्रहार न करे। डरे और पराजित हुए शत्रुपर भी कभी प्रहार नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥

इषुर्लिप्तो न कर्णी स्यादसतामेतदायुधम् ।

यथार्थमेव योद्धव्यं न क्रुद्धयेत जिघांसतः ॥ ११ ॥

युद्धमें विषलिप्त और कर्णी बाणका प्रयोग नहीं करना चाहिये । ये दुष्टोंके अस्त्र हैं । यथार्थ रीतिसे ही युद्ध करना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति युद्धमें किसीका वध करना चाहता हो तो उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये ( किंतु यथायोग्य प्रतीकार करना चाहिये ) ॥ ११ ॥

साधूनां तु मिथो भेदात् साधुश्चेद् व्यसनी भवेत् ।

निष्प्राणो नाभिहन्तव्यो नानपत्यः कथंचन ॥ १२ ॥

जब श्रेष्ठ पुरुषोंमें परस्पर भेद होनेसे कोई श्रेष्ठ पुरुष संकटमें पड़ जाय, तब उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये । जो बलहीन और संतानहीन हो, उसपर तो किसी प्रकार भी आघात न करे ॥ १२ ॥

पृष्ठ 638

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भग्नशस्त्रो विपन्नश्च कृत्तज्यो हतवाहनः ।

चिकित्स्यः स्यात् स्वविषये प्राप्यो वा स्वगृहे भवेत् ॥ १३ ॥

जिसके शस्त्र टूट गये हों, जो विपत्तिमें पड़ गया हो, जिसके धनुषकी डोरी कट गयी हो तथा जिसके वाहन मार डाले गये हों, ऐसे मनुष्यपर भी प्रहार न करे । ऐसा पुरुष यदि अपने राज्यमें या अधिकारमें आ जाय तो उसके घावोंकी चिकित्सा करानी चाहिये अथवा उसे उसके घर पहुँचा देना चाहिये ॥ १३ ॥

निर्व्रणश्च स मोक्तव्य एष धर्मः सनातनः ।

तस्माद् धर्मेण योद्धव्यमिति स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ १४ ॥

किंतु जिसके कोई घाव न हो, उसे न छोड़े । यह सनातनधर्म है । अतः धर्मके अनुसार युद्ध करना चाहिये, यह स्वायम्भुव मनुका कथन है ॥ १४ ॥

सत्सु नित्यः सतां धर्मस्तमास्थाय न नाशयेत् ।

यो वै जयत्यधर्मेण क्षत्रियो धर्मसंगरः ॥ १५ ॥

आत्मानमात्मना हन्ति पापो निकृतिजीवनः । सज्जनोंका धर्म सदा सत्पुरुषोंमें ही रहा है । अतः उसका आश्रय लेकर उसे नष्ट न करे । धर्मयुद्धमें तत्पर हुआ जो क्षत्रिय अधर्मसे विजय पाता है, छल - कपटको जीविकाका साधन बनानेवाला वह पापी स्वयं ही अपना नाश करता है ॥ १५३ ॥

कर्म चैतदसाधूनामसाधून् साधुना जयेत् ॥ १६ ॥

धर्मेण निधनं श्रेयो न जयः पापकर्मणा । यह तो दुष्टोंका काम है । श्रेष्ठ पुरुषको तो दुष्टोंपर भी धर्मसे ही विजय पानी चाहिये । धर्मपूर्वक युद्ध करते हुए मर जाना भी अच्छा है; परंतु पापकर्मके द्वारा विजय पाना अच्छा नहीं है ॥ १६ ॥

नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव ॥ १७ ॥

मूलानि च प्रशाखाश्च दहन् समधिगच्छति । राजन्! जैसे पृथ्वीमें बोये हुए बीजका फल तत्काल नहीं मिलता, उसी प्रकार किये हुए पापका भी फल तुरंत नहीं मिलता है; परंतु जब वह फल प्राप्त होता है, तब मूल और शाखा दोनोंको जलाकर भस्म कर देता है ॥ पापेन कर्मणा वित्तं लब्ध्वा पापः प्रहृष्यति ॥ १८ ॥

स वर्धमानः स्तेयेन पापः पापे प्रसज्जति ।

न धर्मोऽस्तीति मन्वानः शुचीनवहसन्निव ॥ १ ९ ॥

अश्रद्दधानश्च भवेद् विनाशमुपगच्छति ।

सम्बद्धो वारुणैः पाशैरमर्त्य इव मन्यते ॥ २० ॥

पापी मनुष्य पापकर्मके द्वारा धन पाकर हर्षसे खिल उठता है । वह पापी चोरीसे ही बढ़ता हुआ पापमें आसक्त हो जाता है और यह समझकर कि धर्म है ही नहीं, पवित्रात्मा

पृष्ठ 639

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पुरुषोंकी हँसी उड़ाता है । धर्ममें उसकी तनिक भी श्रद्धा नहीं रह जाती और पापके ही द्वारा वह विनाशके मुखमें जा पड़ता है । वह अपनेको देवताओं-सा अजर- अमर मानता है; परंतु उसे वरुणके पाशोंमें बँधना पड़ता है ॥ १८–२० ॥

महादृतिरिवाध्मातः सुकृते नैव वर्तते ।

ततः समूलो ह्रियते नदीं कूलादिव द्रुमः ॥ २१ ॥

जैसे चमड़ेकी थैली हवा भरनेसे फूल जाती है, वैसे ही पापी भी पापसे फूल उठता है । वह पुण्यकर्ममें कभी प्रवृत्त ही नहीं होता है, तदनन्तर जैसे नदीके तटपर खड़ा हुआ वृक्ष वहाँसे जड़सहित उखड़कर नदीमें बह जाता है, उसी प्रकार वह पापी भी समूल नष्ट हो जाता है ॥ २१ ॥

अथैनमभिनिन्दन्ति भिन्नं कुम्भमिवाश्मनि ।

तस्माद् धर्मेण विजयं कोशं लिप्सेत भूमिपः ॥ २२ ॥

पत्थरपर पटके हुए घड़ेके समान उसके टूक - टूक हो जाते हैं और सभी लोग उसकी निन्दा करते हैं; अतः राजाको चाहिये कि वह धर्मपूर्वक ही धन और विजय प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥

पृष्ठ 640

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षण्णवतितमोऽध्यायः राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा भीष्मउवाच

नाधर्मेण महीं जेतुं लिप्सेत जगतीपतिः ।

अधर्मविजयं लब्ध्वा को नु मन्येत भूमिपः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! किसी भी भूपालको अधर्मके द्वारा पृथ्वीपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा कभी नहीं करनी चाहिये । अधर्मसे विजय पाकर कौन राजा सम्मानित हो सकता है? ॥ १ ॥

अधर्मयुक्तो विजयो ह्यध्रुवोऽस्वर्ग्य एव च ।

सादयत्येष राजानं महीं च भरतर्षभ ॥ २ ॥

अधर्मसे पायी हुई विजय स्वर्गसे गिरानेवाली और अस्थायी होती है । भरतश्रेष्ठ! ऐसी विजय राजा और राज्य दोनोंका पतन कर देती है ॥ २ ॥

विशीर्णकवचं चैव तवास्मीति च वादिनम् ।

कृताञ्जलिं न्यस्तशस्त्रं गृहीत्वा न हि हिंसयेत् ॥ ३ ॥

जिसका कवच छिन्न- भिन्न हो गया हो, जो ' मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहा हो और हाथ जोड़े खड़ा हो अथवा जिसने हथियार रख दिये हों, ऐसे विपक्षी योद्धाको कैद करके मारे नहीं ॥ ३ ॥

बलेन विजितो यश्च न तं युध्येत भूमिपः ।

संवत्सरं विप्रणयेत् तस्माज्जातः पुनर्भवेत् ॥ ४ ॥

जो बलके द्वारा पराजित कर दिया गया हो, उसके साथ राजा कदापि युद्ध न करे । उसे कैद करके एक सालतक अनुकूल रहनेकी शिक्षा दे; फिर उसका नया जन्म होता है । वह विजयी राजाके लिये पुत्रके समान हो जाता है ( इसलिये एक साल बाद उसे छोड़ देना चाहिये ॥

नार्वाक्संवत्सरात् कन्या प्रष्टव्या विक्रमाहृता ।

एवमेव धनं सर्वं यच्चान्यत्सहसाऽऽहृतम् ॥ ५ ॥

यदि राजा किसी कन्याको अपने पराक्रमसे हरकर ले आवे तो एक सालतक उससे कोई प्रश्न न करे (एक सालके बाद पूछनेपर यदि वह कन्या किसी दूसरेको वरण करना चाहे तो उसे लौटा देना चाहिये ) । इसी प्रकार सहसा छलसे अपहरण करके लाये हुए सम्पूर्ण धनके विषयमें भी समझना चाहिये ( उसे भी एक सालके बाद उसके स्वामीको लौटा देना चाहिये ) ॥ ५ ॥

न तु वध्यधनं तिष्ठेत् पिबेयुर्ब्राह्मणाः पयः ।