05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 691–700
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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न चापि भूयः प्रकृतेर्विचारणा ॥ ४० ॥
शत्रुके प्रति सामनीतिका प्रयोग अच्छा नहीं माना जाता, बल्कि गुप्तरूपसे दण्डनीतिका प्रयोग ही श्रेष्ठ समझा जाता है । शत्रुओंके प्रति न तो कोमलता और न उनपर आक्रमण करना ही सदा ठीक माना जाता है । उनकी खेतीको चौपट करना तथा वहाँके जल आदिमें विष मिला देना भी अच्छा नहीं है । इसके सिवा, सात प्रकृतियोंपर विचार करना भी उपयोगी नहीं है ( उसके लिये तो गुप्त दण्डका प्रयोग ही श्रेष्ठ है ) ॥ ४० ॥
मायाविभेदानुपसर्जनानि तथैव पापं न यशःप्रयोगात् । आप्तैर्मनुष्यैरुपचारयेत पुरेषु राष्ट्रेषु च सम्प्रयुक्तान् ॥ ४१ ॥
राजा विश्वस्त मनुष्योंद्वारा शत्रुके नगर और राज्यमें नाना प्रकारके छल और परस्पर वैर- विरोधकी सृष्टि कर दे । इसी तरह छद्मवेषमें वहाँ अपने गुप्तचर नियुक्त कर दे; परंतु अपने यशकी रक्षाके लिये वहाँ अपनी ओरसे चोरी या गुप्त हत्या आदि कोई पापकर्म न होने दे ॥ ४१ ॥
पुरापि चैषामनुसृत्य भूमिपाः पुरेषु भोगानखिलान् जयन्ति । पुरेषु नीतिं विहितां यथाविधि प्रयोजयन्तो बलवृत्रसूदन ॥ ४२ ॥
बल और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्र! पृथ्वीका पालन करनेवाले राजालोग पहले इन शत्रुओंके नगरोंमें विधिपूर्वक व्यवहारमें लायी हुई नीतिका प्रयोग करके दिखावें । इस प्रकार उनके अनुकूल व्यवहार करके वे उनकी राजधानीमें सारे भोगोंपर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४२ ॥
प्रदाय गूढानि वसूनि राजन् प्रच्छिद्य भोगानवधाय च स्वान् । दुष्टान् स्वदोषैरिति कीर्तयित्वा पुरेषु राष्ट्रेषु च योजयन्ति ॥ ४३ ॥
देवराज! राजा अपने ही आदमियोंके विषयमें यह प्रचार कर देते हैं कि ' ये लोग दोषसे दूषित हो गये हैं; अतः मैंने इन दुष्टोंको राज्यसे बाहर निकाल दिया है । ये दूसरे देशमें चले गये हैं । ऐसा करके उन्हें वह शत्रुओंके राज्यों और नगरोंका भेद लेनेके कार्यमें नियुक्त कर देते हैं । ऊपरसे तो वे उनकी सारी भोग- सामग्री छीन लेते हैं; परंतु गुप्तरूपसे उन्हें प्रचुर धन अर्पित करके उनके साथ कुछ अन्य आत्मीय जनोंको भी लगा देते हैं ॥ ४३ ॥
तथैव चान्यैरपि शास्त्रवेदिभिः स्वलंकृतैः शास्त्रविधानदृष्टिभिः ।
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सुशिक्षितैर्भाष्यकथाविशारदैः परेषु कृत्यामुपधारयेच्च ॥ ४४ ॥
इसी तरह अन्यान्य शास्त्रज्ञ शास्त्रीय विधिके ज्ञाता सुशिक्षित तथा भाष्यकथाविशारद विद्वानोंको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके उनके द्वारा शत्रुओंपर कृत्याका प्रयोग करावे ॥ ४४ ॥
इन्द्र उवाच
कानि लिङ्गानि दुष्टस्य भवन्ति द्विजसत्तम ।
कथं दुष्टं विजानीयामेतत् पृष्टो वदस्व मे ॥ ४५ ॥
इन्द्रने पूछा — ' द्विजश्रेष्ठ! दुष्टके कौन -कौन- से लक्षण हैं? मैं दुष्टको कैसे पहचानूँ? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये ॥ ४५ ॥
बृहस्पतिरुवाच
परोक्षमगुणानाह सद्गुणानभ्यसूयते ।
परैर्वा कीर्त्यमानेषु तूष्णीमास्ते पराङ्मुखः ॥ ४६ ॥
बृहस्पतिजीने कहा — देवराज! जो परोक्षमें किसी व्यक्तिके दोष -ही - दोष बताता है, उसके सद्गुणोंमें भी दोषारोपण करता रहता है और यदि दूसरे लोग उसके गुणोंका वर्णन करते हैं तो जो मुँह फेरकर चुप बैठ जाता है, वही दुष्ट माना जाता है ॥ ४६ ॥
तूष्णीम्भावेऽपि विज्ञेयं न भेद् भवति कारणम् ।
निःश्वासं चोष्ठसंदंशं शिरसश्च प्रकम्पनम् ॥ ४७ ॥
चुप बैठनेपर भी उस व्यक्तिकी दुष्टताको इस प्रकार जाना जा सकता है । निःश्वास छोड़नेका कोई कारण न होनेपर भी जो किसीके गुणोंका वर्णन होते समय लंबी - लंबी साँस छोड़े, ओठ चबाये और सिर हिलाये, वह दुष्ट है ॥ ४७ ॥
करोत्यभीक्ष्णं संसृष्टमसंसृष्टश्च भाषते ।
अदृष्टितो न कुरुते दृष्टो नैवाभिभाषते ॥ ४८ ॥
जो बारंबार आकर संसर्ग स्थापित करता है, दूर जानेपर दोष बताता है, कोई कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके भी आँखसे ओझल होनेपर उस कार्यको नहीं करता है और आँखके सामने होनेपर भी कोई बातचीत नहीं करता, उसके मनमें भी दुष्टता भरी है, ऐसा जानना चाहिये ॥ ४८ ॥
पृथगेत्य समश्नाति नेदमद्य यथाविधि ।
आसने शयने याने भावा लक्ष्या विशेषतः ॥ ४ ९ ॥
जो कहींसे आकर साथ नहीं, अलग बैठकर खाता है और कहता है, आजका जैसा भोजन चाहिये, वैसा नहीं बना है ( वह भी दुष्ट है ) । इस प्रकार बैठने, सोने और चलने - फिरने आदिमें दुष्ट व्यक्तिके दुष्टतापूर्ण भाव विशेषरूपसे देखे जाते हैं ॥ ४ ९ ॥
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आर्तिरार्ते प्रिये प्रीतिरेतावन्मित्रलक्षणम् ।
विपरीतं तु बोद्धव्यमरिलक्षणमेव तत् ॥ ५० ॥
यदि मित्रके पीड़ित होनेपर किसीको स्वयं भी पीड़ा होती हो और मित्रके प्रसन्न रहनेपर उसके मनमें भी प्रसन्नता छायी रहती हो तो यही मित्रके लक्षण हैं । इसके विपरीत जो किसीको पीड़ित देखकर प्रसन्न होता और प्रसन्न देखकर पीड़ाका अनुभव करता है तो समझना चाहिये कि यह शत्रुके लक्षण हैं ॥ ५० ॥
एतान्येव यथोक्तानि बुध्येथास्त्रिदशाधिप ।
पुरुषाणां प्रदुष्टानां स्वभावो बलवत्तरः ॥ ५१ ॥
देवेश्वर! इस प्रकार जो मनुष्योंके लक्षण बताये गये हैं, उनको समझना चाहिये । दुष्ट पुरुषोंका स्वभाव अत्यन्त प्रबल होता है ॥ ५१ ॥
इति दुष्टस्य विज्ञानमुक्तं ते सुरसत्तम ।
निशम्य शास्त्रतत्त्वार्थं यथावदमरेश्वर ॥ ५२ ॥
सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! शास्त्रके सिद्धान्तका यथावत् रूपसे विचार करके ये मैंने तुमसे दुष्ट पुरुषकी पहचान करानेवाले लक्षण बताये हैं ॥ ५२ ॥
भीष्म उवाच स तद्वचः शत्रुनिबर्हणे रत- स्तथा चकारावितथं बृहस्पतेः । चचार काले विजयाय चारिहा वशं च शत्रूननयत् पुरंदरः ॥ ५३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! शत्रुओंके संहारमें तत्पर रहनेवाले शत्रुनाशक इन्द्रने बृहस्पतिजीका वह यथार्थ वचन सुनकर वैसा ही किया । उन्होंने उपयुक्त समयपर विजयके लिये यात्रा की और समस्त शत्रुओंको अपने अधीन कर लिया ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥
Fard * हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, कोश और धनी वैश्य – ये सेनाके छः अंग हैं ।
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चतुरधिकशततमोऽध्यायः राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश युधिष्ठिर उवाच
धार्मिकोऽर्थानसम्प्राप्य राजामात्यैः प्रबाधितः ।
च्युतः कोशाच्च दण्डाच्च सुखमिच्छन् कथं चरेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! यदि राजा धर्मात्मा हो और उद्योग करते रहनेपर भी धन न पा सके, उस अवस्थामें यदि मन्त्री उसे कष्ट देने लगें और उसके पास खजाना तथा सेना भी न रह जाय तो सुख चाहनेवाले उस राजाको कैसे काम चलाना चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्रायं क्षेमदर्शीय इतिहासोऽनुगीयते ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषयमें यह क्षेमदर्शीका इतिहास जगत्में बार- बार
कहा जाता है । उसीको मैं तुमसे कहूँगा। तुम ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
क्षेमदर्शी नृपसुतो यत्र क्षीणबलः पुरा ।
मुनिं कालकवृक्षीयमाजगामेति नः श्रुतम् ।
तं पप्रच्छानुसंगृह्य कृच्छ्रामापदमास्थितः ॥ ३ ॥
हमने सुना है कि प्राचीनकालमें एक बार कोसलराजकुमार क्षेमदर्शीको बड़ी कठिन विपत्तिका सामना करना पड़ा। उसकी सारी सैनिक शक्ति नष्ट हो गयी । उस समय वह कालकवृक्षीय मुनिके पास गया और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उसने उस विपत्तिसे छुटकारा पानेका उपाय पूछा ॥ ३ ॥
राजोवाच
अर्थेषु भागी पुरुष ईहमानः पुनः पुनः ।
अलब्ध्वा मद्विधो राज्यं ब्रह्मन् किं कर्तुमर्हति ॥ ४ ॥
राजाने इस प्रकार प्रश्न किया-ब्रह्मन्! मुनष्य धनका भागीदार समझा जाता है; किंतु मेरे जैसा पुरुष बार- बार उद्योग करनेपर भी यदि राज्य न पा सके तो उसे क्या करना चाहिये? ॥ ४ ॥
अन्यत्र मरणाद् दैन्यादन्यत्र परसंश्रयात् ।
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क्षुद्रादन्यत्र चाचारात् तन्ममाचक्ष्व सत्तम ॥ ५ ॥
साधुशिरोमणे! आत्मघात करने, दीनता दिखाने, दूसरोंकी शरणमें जाने तथा इसी तरहके और भी नीच कर्म करनेकी बात छोड़कर दूसरा कोई उपाय हो तो वह मुझे बताइये ॥ ५ ॥
व्याधिना चाभिपन्नस्य मानसेनेतरेण वा ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च त्वद्विधः शरणं भवेत् ॥ ६ ॥
जो मानसिक अथवा शारीरिक रोगसे पीड़ित है, ऐसे मनुष्यको आप जैसे धर्मज्ञ और कृतज्ञ महात्मा ही शरण देनेवाले होते हैं ॥ ६ ॥
निर्विद्यति नरः कामान्निर्विद्य सुखमेधते ।
त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लब्ध्वा बुद्धिमयं वसु ॥ ७ ॥
मनुष्यको जब कभी विषय - भोगोंसे वैराग्य होता है, तब विरक्त होनेपर वह हर्ष और शोकको त्याग देता है तथा ज्ञानमय धन पाकर नित्य सुखका अनुभव करने लगता है ॥ ७ ॥
सुखमर्थाश्रयं येषामनुशोचामि तानहम् ।
मम ह्यर्थाः सुबहवो नष्टाः स्वप्न इवागताः ॥ ८ ॥
जिनके सुखका आधार धन है, अर्थात् जो धनसे ही सुख मानते हैं, उन मनुष्योंके लिये मैं निरन्तर शोक करता हूँ; क्योंकि मेरे पास धन बहुत था, परंतु वह सब सपनेमें मिली हुई सम्पत्तिकी तरह नष्ट हो गया ॥ ८ ॥
दुष्करं बत कुर्वन्ति महतोऽर्थांस्त्यजन्ति ये ।
वयं त्वेतान् परित्यक्तुमसतोऽपि न शक्नुमः ॥ ९ ॥
मेरी समझमें जो अपनी विशाल सम्पत्तिको त्याग देते हैं वे अत्यन्त दुष्कर कार्य करते हैं । मेरे पास तो अब धनके नामपर कुछ नहीं है, तो भी मैं उसका मोह नहीं छोड़ पाता हूँ ॥ ९ ॥
इमामवस्थां सम्प्राप्तं दीनमार्तं श्रिया च्युतम् ।
यदन्यत् सुखमस्तीह तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ॥ १० ॥
ब्रह्मन्! मैं राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट, दीन और आर्त होकर इस शोचनीय अवस्थामें आ पड़ा हूँ । इस जगत्में धनके अतिरिक्त जो सुख हो, उसीका मुझे उपदेश कीजिये ॥ १० ॥
कौसल्येनैवमुक्तस्तु राजपुत्रेण धीमता ।
मुनिः कालकवृक्षीयः प्रत्युवाच महाद्युतिः ॥ ११ ॥
बुद्धिमान् कोसलराजकुमारके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी कालकवृक्षीय मुनिने इस तरह उत्तर दिया ॥ ११ ॥
मुनिरुवाच
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पुरस्तादेव ते बुद्धिरियं कार्या विजानता ।
अनित्यं सर्वमेवैतदहं च मम चास्ति यत् ॥ १२ ॥
मुनि बोले- राजकुमार! तुम समझदार हो; अतः तुम्हें पहलेसे ही अपनी बुद्धिके द्वारा ऐसा ही निश्चय कर लेना उचित था । इस जगत्में ' मैं' और ' मेरा' कहकर जो कुछ भी समझा या ग्रहण किया जाता है, वह सब अनित्य ही है ॥ १२ ॥
यत् किंचिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत् ।
एवं न व्यथते प्राज्ञः कृच्छ्रामप्यापदं गतः ॥ १३ ॥
तुम जिस किसी वस्तुको ऐसा मानते हो कि ' यह है ' वह सब पहलेसे ही समझ लो कि ' नहीं है ' ऐसा समझनेवाला विद्वान् पुरुष कठिन से कठिन विपत्तिमें पड़नेपर भी व्यथित नहीं होता ॥ १३ ॥
यद्धि भूतं भविष्यं च सर्वं तन्न भविष्यति ।
एवं विदितवेद्यस्त्वमधर्मेभ्यः प्रमोक्ष्यसे ॥ १४ ॥
जो वस्तु पहले थी और होगी, वह सब न तो थी और न होगी ही । इस प्रकार जानने योग्य तत्त्वको जान लेनेपर तुम सम्पूर्ण अधर्मोंसे छुटकारा पा जाओगे ॥ १४ ॥
यच्च पूर्वं समाहारे यच्च पूर्वं परे परे ।
सर्वं तन्नास्ति ते चैव तज्ज्ञात्वा कोऽनुसंज्वरेत् ॥ १५ ॥
जो वस्तु पहले बहुत बड़े समुदायके अधीन ( गणतन्त्र) रह चुकी है तथा जो एकके बाद दूसरेकी होती आयी है, वह सबकी सब तुम्हारी भी नहीं है; इस बातको भलीभाँति समझ लेनेपर किसको बारंबार चिन्ता होगी? ॥ १५ ॥
भूत्वा च न भवत्येतदभूत्वा च भविष्यति ।
शोके न ह्यस्ति सामर्थ्यं शोकं कुर्यात् कथंचन ॥ १६ ॥
यह राजलक्ष्मी होकर भी नहीं रहती और जिनके पास नहीं होती, उनके पास आ जाती है; परंतु शोककी सामर्थ्य नहीं है कि वह गयी हुई सम्पत्तिको लौटा लावे; अतः किसी तरह भी शोक नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
क्व नु तेऽद्य पिता राजन् क्व नु तेऽद्य पितामहः ।
न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽपि च ॥ १७ ॥
राजन्! बताओ तो सही, तुम्हारे पिता आज कहाँ हैं? तुम्हारे पितामह अब कहाँ चले गये? आज न तो तुम उन्हें देखते हो और न वे तुम्हें देख पाते हैं ॥ १७ ॥
आत्मनोऽध्रुवतां पश्यंस्तांस्त्वं किमनुशोचसि ।
बुद्धया चैवानुबुद्धयस्व ध्रुवं हि न भविष्यसि ॥ १८ ॥
यह शरीर अनित्य है, इस बातको तुम देखते और समझते हो, फिर उन पूर्वजोंके लिये क्यों निरन्तर शोक करते हो? जरा बुद्धि लगाकर विचार तो करो, निश्चय ही एक दिन तुम भी नहीं रहोगे ॥ १८ ॥
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अहं च त्वं च नृपते सुहृदः शत्रवश्च ते ।
अवश्यं न भविष्यामः सर्वं च न भविष्यति ॥ १ ९ ॥
नरेश्वर! मैं, तुम, तुम्हारे मित्र और शत्रु - ये हम सब लोग एक दिन नहीं रहेंगे । यह सब कुछ नष्ट हो जायेगा ॥ १ ९ ॥
ये तु विंशतिवर्षा वै त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः ।
अर्वागेव हि ते सर्वे मरिष्यन्ति शरच्छतात् ॥ २० ॥
इस समय जो बीस या तीस वर्षकी अवस्थावाले मनुष्य हैं, ये सभी सौ वर्षके पहले ही मर जायँगे ॥ २० ॥
अपि चेन्महतो वित्तान्न प्रमुच्येत पूरुषः ।
नैतन्ममेति तन्मत्वा कुर्वीत प्रियमात्मनः ॥ २१ ॥
ऐसी दशामें यदि मनुष्य बहुत बड़ी सम्पत्तिसे न बिछुड़ जाय तो भी उसे ' यह मेरा नहीं है ' ऐसा समझकर अपना कल्याण अवश्य करना चाहिये ॥ २१ ॥
अनागतं यन्न ममेति विद्या- दतिक्रान्तं यन्न ममेति विद्यात् । दिष्टं बलीय इति मन्यमाना- स्ते पण्डितास्तत्सतां स्थानमाहुः ॥ २२ ॥
जो वस्तु भविष्यमें मिलनेवाली है, उसे यही माने कि ' वह मेरी नहीं है ' तथा जो मिलकर नष्ट हो चुकी हो, उसके विषयमें भी यही भाव रखे कि ' वह मेरी नहीं थी । ' जो ऐसा मानते हैं कि ‘ प्रारब्ध ही सबसे प्रबल है, ' वे ही विद्वान् हैं और उन्हें सत्पुरुषोंका आश्रय कहा गया है ॥ २२ ॥
अनाढ्याश्चापि जीवन्ति राज्यं चाप्यनुशासति ।
बुद्धिपौरुषसम्पन्नास्त्वया तुल्याधिका जनाः ॥ २३ ॥
न च त्वमिव शोचन्ति तस्मात् त्वमपि मा शुचः ।
किं न त्वं तैर्नरैः श्रेयांस्तुल्यो वा बुद्धिपौरुषैः ॥ २४ ॥
जो धनाढ्य नहीं हैं, वे भी जीते हैं और कोई राज्यका शासन भी करते हैं उनमेंसे कुछ तुम्हारे समान ही बुद्धि और पौरुषसे सम्पन्न हैं तथा कुछ तुमसे बढ़कर भी हो सकते हैं; परंतु वे भी तुम्हारी तरह शोक नहीं करते । अतः तुम भी शोक न करो । क्या तुम बुद्धि और पुरुषार्थमें उन मनुष्योंसे श्रेष्ठ या उनके समान नहीं हो? ॥ २३-२४ ॥ राजोवाच
यादृच्छिकं सर्वमासीत् तद् राज्यमिति चिन्तये ।
ह्रियते सर्वमेवेदं कालेन महता द्विज ॥ २५ ॥
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राजाने कहा— ब्रह्मन्! मैं तो यही समझता हूँ कि वह सारा राज्य मुझे स्वतः अनायास ही प्राप्त हो गया था और अब महान् शक्तिशाली कालने यह सब कुछ छीन लिया है ॥ २५ ॥
तस्यैव ह्रियमाणस्य स्रोतसेव तपोधन ।
फलमेतत् प्रपश्यामि यथालब्धेन वर्तयन् ॥ २६ ॥
तपोधन! जैसे जलका प्रवाह किसी वस्तुको बहा ले जाता है, उसी प्रकार कालके वेगसे मेरे राज्यका अपहरण हो गया । उसीके फलस्वरूप मैं इस शोकका अनुभव करता हूँ, और जैसे - तैसे जो कुछ मिल जाता है, उसीसे जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥ २६ ॥
मुनिरुवाच
अनागतमतीतं च याथातथ्यविनिश्चयात् ।
नानुशोचेत कौसल्य सर्वार्थेषु तथा भव ॥ २७ ॥
मुनिने कहा — कोसलराजकुमार! यथार्थ तत्त्वका निश्चय हो जानेपर मनुष्य भविष्य और भूतकालकी किसी भी वस्तुके लिये शोक नहीं करता । इसलिये तुम भी सभी पदार्थोंके विषयमें उसी तरह शोकरहित हो जाओ ॥ २७ ॥
अवाप्यान् कामयन्नर्थान् नानवाप्यान् कदाचन ।
प्रत्युत्पन्नाननुभवन् मा शुचस्त्वमनागतान् ॥ २८ ॥
मनुष्य पानेयोग्य पदार्थोंकी ही कामना करता है । अप्राप्य वस्तुओंकी कदापि नहीं । अतः तुम्हें भी जो कुछ प्राप्त है, उसीका उपभोग करते हुए अप्राप्त वस्तुके लिये कभी चिन्तन नहीं करना चाहिये ॥ २८ ॥
यथालब्धोपपन्नार्थैस्तथा कौसल्य रंस्यसे ।
कच्चिच्छुद्धस्वभावेन श्रिया हीनो न शोचसि ॥ २ ९ ॥
कोसलनरेश! क्या तुम दैववश जो कुछ मिल जाय, उसीसे उतने ही आनन्दके साथ रह सकोगे, जैसे पहले रहते थे । आज राजलक्ष्मीसे वंचित होनेपर भी क्या तुम शुद्ध हृदयसे शोकको छोड़ चुके हो? ॥ २ ९ ॥
पुरस्ताद् भूतपूर्वत्वाद्धीनभाग्यो हि दुर्मतिः ।
धातारं गर्हते नित्यं लब्धार्थश्च न मृष्यते ॥ ३० ॥
जब पहले सम्पत्ति प्राप्त होकर नष्ट हो जाती है, तब उसीके कारण अपनेको भाग्यहीन माननेवाला दुर्बुद्धि मनुष्य सदा विधाताकी निन्दा करता है और प्रारब्धवश प्राप्त हुए पदार्थोंसे उसे संतोष नहीं होता है ॥ ३० ॥
अनर्हानपि चैवान्यान्मन्यते श्रीमतो जनान् ।
एतस्मात् कारणादेतद् दुःखं भूयोऽनुवर्तते ॥ ३१ ॥
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वह दूसरे धनी मनुष्योंको धनके अयोग्य मानता है । इसी कारण उसका यह ईर्ष्याजनक दुःख सदा उसके पीछे लगा रहता है ॥ ३१ ॥
ईर्ष्याभिमानसम्पन्ना राजन् पुरुषमानिनः ।
कच्चित् त्वं न तथा राजन् मत्सरी कोसलाधिप ॥ ३२ ॥
राजन्! अपनेको पुरुष माननेवाले बहुत - से मनुष्य ईर्ष्या और अहंकारसे भरे होते हैं । कोसलनरेश! क्या तुम ऐसे ईर्ष्यालु तो नहीं हो? ॥ ३२ ॥
सहस्व श्रियमन्येषां यद्यपि त्वयि नास्ति सा ।
अन्यत्रापि सतीं लक्ष्मीं कुशला भुञ्जते सदा ॥ ३३ ॥
अभिनिष्यन्दते श्रीर्हि सत्यपि द्विषतो जनम् । यद्यपि तुम्हारे पास लक्ष्मी नहीं है तो भी तुम दूसरोंकी सम्पत्ति देखकर सहन करो; क्योंकि चतुर मनुष्य दूसरोंके यहाँ रहनेवाली सम्पत्तिका भी सदा उपभोग करते हैं और जो लोगोंसे द्वेष रखता है, उसके पास सम्पत्ति हो तो भी वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥
श्रियं च पुत्रपौत्रं च मनुष्या धर्मचारिणः ।
योगधर्मविदो धीराः स्वयमेव त्यजन्त्युत ॥ ३४ ॥
योगधर्मको जाननेवाले धर्मात्मा धीर मनुष्य अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र -पौत्रोंका भी स्वयं ही त्याग कर देते हैं ॥
( त्यक्तं स्वायम्भुवे वंशे शुभेन भरतेन च ।
नानारत्नसमाकीर्णं राज्यं स्फीतमिति श्रुतम् ॥
तथान्यैर्भूमिपालैश्च त्यक्तं राज्यं महोदयम् ।
त्यक्त्वा राज्यानि सर्वे च वने वन्यफलाशनाः ॥
गताश्च तपसः पारं दुःखस्यान्तं च भूमिपाः । )
बहुसंकुसुकं दृष्ट्वा विधित्सासाधनेन च ।
तथान्ये संत्यजन्त्येव मत्वा परमदुर्लभम् ॥ ३५ ॥
स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न हुए शुभ आचार - विचारवाले राजा भरतने नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न अपने समृद्धिशाली राज्यको त्याग दिया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है इसी प्रकार अन्य भूमिपालोंने भी महान् अभ्युदयशाली राज्यका परित्याग किया है । राज्य छोड़कर वे सब- के - सब भूपाल वनमें जंगली फल- मूल खाकर रहते थे । वहीं वे तपस्या और दुःखके पार पहुँच गये । धनकी प्राप्ति निरन्तर प्रयत्नमें लगे रहनेसे होती है, फिर भी वह अत्यन्त अस्थिर है, यह देखकर तथा इसे परम दुर्लभ मानकर भी दूसरे लोग उसका परित्याग कर देते हैं ॥ ३५ ॥
त्वं पुनः प्राज्ञरूपः सन् कृपणं परितप्यसे ।
अकाम्यान् कामयानोऽर्थान् पराधीनानुपद्रवान् ॥ ३६ ॥
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परंतु तुम तो समझदार हो, तुम्हें मालूम है, भोग प्रारब्धके अधीन और अस्थिर हैं, तो भी नहीं चाहनेयोग्य विषयोंको चाहते हो और उनके लिये दीनता दिखाते हुए शोक कर रहे हो ॥ ३६ ॥
तां बुद्धिमुपजिज्ञासुस्त्वमेवैतान् परित्यज ।
अनर्थाश्चार्थरूपेण ह्यर्थाश्चानर्थरूपिणः ॥ ३७ ॥
तुम पूर्वोक्त बुद्धिको समझनेकी चेष्टा करो और इन भोगोंको छोड़ो, जो तुम्हें अर्थके रूपमें प्रतीत होनेवाले अनर्थ हैं; क्योंकि वास्तवमें समस्त भोग अनर्थस्वरूप ही हैं ॥ ३७ ॥
अर्थायैव हि केषांचिद् धननाशो भवत्युत ।
आनन्त्यं तत्सुखं मत्वा श्रियमन्यः परीप्सति ॥ ३८ ॥
इस अर्थ या भोगके लिये ही कितने ही लोगोंके धनका नाश हो जाता है । दूसरे लोग सम्पत्तिको अक्षय सुख मानकर उसे पानेकी इच्छा करते हैं ॥ ३८ ॥
रममाणः श्रिया कश्चिन्नान्यच्छ्रेयोऽभिमन्यते ।
तथा तस्येहमानस्य समारम्भो विनश्यति ॥ ३ ९ ॥
कोई- कोई मनुष्य तो धन- सम्पत्तिमें इस तरह रम जाता है कि उसे उससे बढ़कर सुखका साधन और कुछ जान ही नहीं पड़ता है। अतः वह धनोपार्जनकी ही चेष्टामें लगा रहता है । परंतु दैववश उस मनुष्यका वह सारा उद्योग सहसा नष्ट हो जाता है ॥ ३ ९ ॥
कृच्छ्राल्लब्धमभिप्रेतं यदि कौसल्य नश्यति ।
तदा निर्विद्यते सोऽर्थात् परिभग्नक्रमो नरः ॥ ४० ॥
( अनित्यां तां श्रियं मत्वा श्रियं वा कः परीप्सति । ) कोसलनरेश! बड़े कष्टसे प्राप्त किया हुआ वह अभीष्ट धन यदि नष्ट हो जाता है तो उसके उद्योगका सिलसिला टूट जाता है और वह धनसे विरक्त हो जाता है । इस प्रकार उस सम्पत्तिको अनित्य समझकर भी भला कौन उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करेगा? ॥ ४० ॥
धर्ममेकेऽभिपद्यन्ते कल्याणाभिजना नराः ।
परत्र सुखमिच्छन्तो निर्विद्येयुश्च लौकिकात् ॥ ४१ ॥
उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए कुछ ही मनुष्य ऐसे हैं, जो धर्मकी शरण लेते हैं और परलोकमें सुखकी इच्छा रखकर समस्त लौकिक व्यापारसे उपरत हो जाते हैं ॥ ४१ ॥
जीवितं संत्यजन्त्येके धनलोभपरा जनाः ।
न जीवितार्थं मन्यन्ते पुरुषा हि धनादृते ॥ ४२ ॥
कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो धनके लोभमें पड़कर अपने प्राणतक गँवा देते हैं । ऐसे मनुष्य धनके सिवा जीवनका दूसरा कोई प्रयोजन ही नहीं समझते ॥ ४२ ॥
पश्य तेषां कृपणतां पश्य तेषामबुद्धिताम् ।
अध्रुवे जीविते मोहादर्थदृष्टिमुपाश्रिताः ॥ ४३ ॥