05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 701–710
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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देखो, उनकी दीनता और देख लो उनकी मूर्खता, जो इस अनित्य जीवनके लिये मोहवश धनमें ही दृष्टि गड़ाये रहते हैं ॥ ४३ ॥
संचये च विनाशान्ते मरणान्ते च जीविते ।
संयोगे च वियोगान्ते को नु विप्रणयेन्मनः ॥ ४४ ॥
जब संग्रहका अन्त विनाश ही है, जब जीवनका अन्त मृत्यु ही है और जब संयोगका अन्त वियोग ही है, तब इनकी ओर कौन अपना मन लगायेगा? ॥ ४४ ॥
धनं वा पुरुषो राजन् पुरुषं वा पुनर्धनम् ।
अवश्यं प्रजहात्येव तद् विद्वान् कोऽनुसंज्वरेत् ॥ ४५ ॥
राजन्! चाहे मनुष्य धनको छोड़ता है, चाहे धन ही मनुष्यको छोड़ देता है । एक दिन अवश्य ऐसा होता है । इस बातको जाननेवाला कौन मनुष्य धनके लिये चिन्ता करेगा? ॥ ४५ ॥
(अन्यत्रोपनता ह्यापत् पुरुषं तोषयत्युत । तेन शान्तिं न लभते नाहमेवेति कारणात् ॥ ) दूसरोंपर पड़ी हुई आपत्ति मूर्ख मनुष्यको संतोष प्रदान करती है । वह समझता है कि मैं उस संकटमें नहीं पड़ा हूँ । इस भेददृष्टिके कारण ही उसे कभी शान्ति नहीं मिलती ॥
अन्येषामपि नश्यन्ति सुहृदश्च धनानि च ।
पश्य बुद्धया मनुष्याणां राजन्नापदमात्मनः ॥ ४६ ॥
राजन्! दूसरोंके भी धन और सुहृद् नष्ट होते हैं; अतः तुम बुद्धिसे विचारकर देखो कि दूसरे मनुष्योंके समान ही तुम्हारी अपनी आपत्ति भी है ॥ ४६ ॥
नियच्छ यच्छ संयच्छ इन्द्रियाणि मनो गिरम् ।
प्रतिषेद्धा न चाप्येषु दुर्बलेष्वहितेष्वपि ॥ ४७ ॥
इन्द्रियोंको संयममें रखो, मनको वशमें करो और वाणीका संयम करके मौन रहा करो । ये मन, वाणी और इन्द्रियाँ दुर्बल हों या अहितकारक, इन्हें विषयोंकी ओर जानेसे रोकनेवाला अपने सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥
प्राप्तिसृष्टेषु भावेषु व्यपकृष्टेष्वसम्भवे ।
प्रज्ञानतृप्तो विक्रान्तस्त्वद्विधो नानुशोचति ॥ ४८ ॥
सारे पदार्थ जब संसर्गमें आते हैं, तभी दृष्टिगोचर होते हैं । दूर हो जानेपर उनका दर्शन सम्भव नहीं हो पाता । ऐसी स्थितिमें ज्ञान और विज्ञानसे तृप्त तथा पराक्रमसे सम्पन्न तुम्हारे- जैसा पुरुष शोक नहीं करता है ॥
अल्पमिच्छन्नचपलो मृदुर्दान्तः सुनिश्चितः ।
ब्रह्मचर्योपपन्नश्च त्वद्विधो नैव शोचति ॥ ४ ९ ॥
तुम्हारी इच्छा तो बहुत थोड़ी है । तुममें चपलताका दोष भी नहीं है । तुम्हारा हृदय कोमल और बुद्धि एक निश्चयपर डटी रहनेवाली है तथा तुम जितेन्द्रिय होनेके साथ ही
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ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न भी हो; अतः तुम्हारे - जैसे पुरुषको शोक नहीं करना चाहिये ॥ ४ ९ ॥
न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि ।
नृशंसवृत्तिं पापिष्ठां दुष्टां कापुरुषोचिताम् ॥ ५० ॥
तुमको हाथमें कपाल लेकर भीख माँगनेवालोंकी तथा निर्दय पुरुषोंकी उस कपटभरी वृत्तिकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, जो अत्यन्त पापपूर्ण, अनेक दोषोंसे दूषित तथा कायरोंके ही योग्य है ॥ ५० ॥
अपि मूलफलाजीवो रमस्वैको महावने वाग्यतः संगृहीतात्मा सर्वभूतदयान्वितः ॥ ५१ ॥
तुम मूल-फलसे जीवन -निर्वाह करते हुए विशाल वनमें अकेले ही विचरण करो । वाणीको संयममें रखकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें करो और सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति दयाभाव बनाये रखो ॥ ५१ ॥
सदृशं पण्डितस्यै तदीषादन्तेन दन्तिना ।
यदेको रमतेऽरण्येष्वारण्ये नैव तुष्यति ॥ ५२ ॥
तुम- जैसे विद्वान् पुरुषके योग्य कार्य तो यह है कि वनमें ईषाके समान बड़े - बड़े दाँतवाले जंगली हाथीके साथ अकेला विचरे और जंगलके ही पत्र, पुष्प तथा फल- मूल खाकर संतुष्ट रहे ॥ ५२ ॥
महाह्रदः संक्षुभित आत्मनैव प्रसीदति । ( इत्थं नरोऽप्यात्मनैव कृतप्रज्ञः प्रसीदति । ) एतदेवंगतस्याहं सुखं पश्यामि जीवितुम् ॥ ५३ ॥
जैसे क्षुब्ध हुआ महान् सरोवर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार विशुद्ध बुद्धिवाला मनुष्य क्षुब्ध होनेपर भी निर्मल हो जाता है । अतः राजकुमार! इस अवस्थामें तुम्हारा इस रूपमें आ जाना; अर्थात् तुम्हारे मनमें ऐसे विशुद्ध भावका उदय होना शुभ है । इस प्रकारके जीवनको ही मैं सुखमय समझता हूँ ॥ ५३ ॥
असम्भवे श्रियो राजन् हीनस्य सचिवादिभिः ।
दैवे प्रतिनिविष्टे च किं श्रेयो मन्यते भवान् ॥ ५४ ॥
राजन्! तुम्हारे लिये अब धन - सम्पत्तिकी कोई सम्भावना नहीं है । तुम मन्त्री आदिसे भी रहित हो गये हो तथा दैव भी तुम्हारे प्रतिकूल ही है, ऐसी अवस्थामें तुम अपने लिये किस मार्गका अवलम्बन अच्छा समझते हो? ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हआ ॥ १०४ ॥
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( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल ५८३ श्लोक हैं )
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पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन मुनिरुवाच
अथ चेत् पौरुषं किंचित् क्षत्रियात्मनि पश्यसि ।
ब्रवीमि तां तु ते नीतिं राज्यस्य प्रतिपत्तये ॥ १ ॥
मुनिने कहा – राजकुमार! यदि तुम अपनेमें कुछ पुरुषार्थ देखते हो तो मैं तुम्हें राज्यकी प्राप्तिके लिये एक नीति बता रहा हूँ ॥ १ ॥
तां चेच्छक्नोषि निर्मातुं कर्म चैव करिष्यसि ।
शृणु सर्वमशेषेण यत् त्वां वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ २ ॥
यदि तुम उसे कार्यरूपमें परिणत कर सको, उसके अनुसार ही सारा कार्य करो तो मैं
उस नीतिका यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ। तुम वह सब पूर्णरूपसे सुनो ॥ २ ॥
आचरिष्यसि चेत् कर्म महतोऽर्थानवाप्स्यसि ।
राज्यं राज्यस्य मन्त्रं वा महतीं वा पुनः श्रियम् ॥ ३ ॥
अथैतद् रोचते राजन् पुनर्ब्रूहि ब्रवीमि ते । यदि तुम मेरी बतायी हुई नीतिके अनुसार कार्य करोगे तो तुम्हें पुनः महान् वैभव, राज्य, राज्यकी मन्त्रणा और विशाल सम्पत्तिकी प्राप्ति होगी । राजन्! यदि मेरी यह बात तुम्हें रुचती हो तो फिरसे कहो, क्या मैं तुमसे इस विषयका वर्णन करूँ? ॥ ३३ ॥
राजोवाच ब्रवीतु भगवान्नीतिमुपपन्नोऽस्म्यहं प्रभो ॥ ४ ॥
अमोघोऽयं भवत्वद्य त्वया सह समागमः । राजाने कहा — प्रभो! आप अवश्य उस नीतिका वर्णन करें । मैं आपकी शरणमें आया हूँ । आपके साथ जो समागम प्राप्त हुआ है, यह आज व्यर्थ न हो ॥ ४३ ॥
मुनिरुवाच हित्वा दम्भं च कामं च क्रोधं हर्षं भयं तथा ॥ ५ ॥
अप्यमित्राणि सेवस्व प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । मुनिने कहा- राजन्! तुम दम्भ, काम, क्रोध, हर्ष और भयको त्यागकर हाथ जोड़, मस्तक झुकाकर शत्रुओंकी भी सेवा करो ॥ ५३ ॥
तमुत्तमेन शौचेन कर्मणा चाभिधारय ॥ ६ ॥
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दातुमर्हति ते वित्तं वैदेहः सत्यसंगरः ।
प्रमाणं सर्वभूतेषु प्रग्रहं च भविष्यसि ॥ ७ ॥
तुम पवित्र व्यवहार और उत्तम कर्मद्वारा अपने प्रति विदेहराजका विश्वास उत्पन्न करो । विदेहराज सत्यप्रतिज्ञ हैं; अतः वे तुम्हें अवश्य धन प्रदान करेंगे । यदि ऐसा हुआ तो तुम समस्त प्राणियोंके लिये प्रमाणभूत ( विश्वासपात्र ) तथा राजाकी दाहिनी बाँह हो जाओगे ॥ ६-७ ॥
ततः सहायान् सोत्साहाँल्लप्स्यसेऽव्यसनान् शुचीन् ।
वर्तमानः स्वशास्त्रेण संयतात्मा जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
अभ्युद्धरति चात्मानं प्रसादयति च प्रजाः । फिर तो तुम्हें बहुत- से शुद्ध हृदयवाले, दुर्व्यसनोंसे रहित तथा उत्साही सहायक मिल जायँगे । जो मनुष्य शास्त्रके अनुकूल आचरण करता हुआ अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखता है, वह अपना तो उद्धार करता ही है, प्रजाको भी प्रसन्न कर लेता है ॥ ८३ ॥
तेनैव त्वं धृतिमता श्रीमता चाभिसत्कृतः ॥ ९ ॥
प्रमाणं सर्वभूतेषु गत्वा च ग्रहणं महत् ।
ततः सुहृद्बलं लब्ध्वा मन्त्रयित्वा सुमन्त्रिभिः ॥ १० ॥
आन्तरैर्भेदयित्वारीन् बिल्वं बिल्वेन भेदय । राजा जनक बड़े धीर और श्रीसम्पन्न हैं । जब वे तुम्हारा सत्कार करेंगे, तब सभी लोगोंके विश्वास- पात्र होकर तुम अत्यन्त गौरवान्वित हो जाओगे । उस अवस्थामें तुम मित्रोंकी सेना इकट्ठी करके अच्छे मन्त्रियोंके साथ सलाह लेकर अन्तरंग व्यक्तियों - द्वारा शत्रुदलमें फूट डलवाकर बेलको बेलसे ही फोड़ो ( शत्रुके सहयोगसे ही शत्रुका विध्वंस कर डालना) ॥ ९ -१० परैर्वा संविदं कृत्वा बलमप्यस्य घातय ॥ ११ ॥
अलभ्या ये शुभा भावाः स्त्रियश्चाच्छादनानि च ।
शय्यासनानि यानानि महार्हाणि गृहाणि च ॥ १२ ॥
पक्षिणो मृगजातानि रसगन्धाः फलानि च ।
तेष्वेव सज्जयेथास्त्वं यथा नश्यत्वयं परः ॥ १३ ॥
अथवा दूसरोंसे मेल करके उन्हींके द्वारा शत्रुके बलका भी नाश कराओ । राजकुमार! जो शुभ पदार्थ अलभ्य हैं, उनमें तथा स्त्री, ओढ़ने- बिछानेके सुन्दर वस्त्र, अच्छे - अच्छे पलंग, आसन, वाहन, बहुमूल्य गृह, तरह- तरहके रस, गन्ध और फल –इन्हीं वस्तुओंमें शत्रुको आसक्त करो । भाँति- भाँतिके पक्षियों और विभिन्न जातिके पशुओंके पालनकी भी आसक्ति शत्रुके मनमें पैदा करो, जिससे यह शत्रु धीरे- धीरे धनहीन होकर स्वतः नष्ट हो जाय ॥ ११–१३ ॥ यद्येवं प्रतिषेद्धव्यो यद्युपेक्षणमर्हति ।
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न जातु विवृतः कार्यः शत्रुः सुनयमिच्छता ॥ १४ ॥
यदि ऐसा करते समय कभी शत्रुको उस व्यसनकी ओर जानेसे रोकने या मना करनेकी आवश्यकता पड़े तो वह भी करना चाहिये, अथवा वह उपेक्षाके योग्य हो तो उपेक्षा ही कर देनी चाहिये; किंतु उत्तम नीतिका फल चाहनेवाले राजाको चाहिये कि वह किसी भी दशामें शत्रुपर अपना गुप्त मनोभाव प्रकट न होने दे ॥ १४ ॥
रमस्व परमामित्रे विषये प्राज्ञसम्मतः ।
भजस्व श्वेतकाकीयैर्मित्रधर्ममनर्थकैः ॥ १५ ॥
तुम बुद्धिमानोंके विश्वासभाजन बनकर अपने महाशत्रुके राज्यमें सानन्द विचरण करो और कुत्ते, हिरन, तथा कौओंकी तरह* चौकन्ने रहकर निरर्थक बर्तावोंद्वारा विदेहराजके प्रति मित्रधर्मका पालन करो ॥
आरम्भांश्चास्य महतो दुश्चरांश्च प्रयोजय ।
नदीवच्च विरोधांश्च बलवद्भिर्विरुध्यताम् ॥ १६ ॥
शत्रुको इतने बड़े - बड़े कार्य करनेकी प्रेरणा दो, जिनका पूरा होना अत्यन्त कठिन हो और बलवान् राजाओंके साथ शत्रुका ऐसा विरोध करा दो, जो किसी विशाल नदीके समान अत्यन्त दुस्तर हो ॥ १६ ॥
उद्यानानि महार्हाणि शयनान्यासनानि च ।
प्रतिभोगसुखेनैव कोशमस्य विरेचय ॥ १७ ॥
बड़े - बड़े बगीचे लगवाकर, बहुमूल्य पलंग - बिछौने तथा भोग- विलासके अन्य साधनोंमें खर्च कराकर उसका सारा खजाना खाली करा दो ॥ १७ ॥
यज्ञदाने प्रशाध्यस्मै ब्राह्मणाननुवर्ण्य तान् ।
ते त्वां प्रतिकरिष्यन्ति तं भोक्ष्यन्ति वृका इव ॥ १८ ॥
तुम मिथिलाके प्रसिद्ध ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करके उनके द्वारा विदेहराजको बड़े - बड़े यज्ञ और दान करनेका उपदेश दिलाओ । नित्य ही वे ब्राह्मण तुम्हारा उपकार करेंगे और विदेहराजको भेड़ियोंके समान नोच खायेंगे ॥ १८ ॥
असंशयं पुण्यशीलः प्राप्नोति परमां गतिम् ।
त्रिविष्टपे पुण्यतमं स्थानं प्राप्नोति मानवः ॥ १ ९ ॥
इसमें संदेह नहीं कि पुण्यशील मानव परम गतिको प्राप्त होता है । उसे स्वर्गलोकमें परम पवित्र स्थानकी प्राप्ति होती है ॥ १ ९ ॥
कोशक्षये त्वमित्राणां वशं कौसल्य गच्छति ।
उभयत्र प्रयुक्तस्य धर्मेणाधर्म एव च ॥ २० ॥
कोसलराज! धर्म अथवा अधर्म या उन दोनोंमें ही प्रवृत्त रहनेवाले राजाका कोष निश्चय ही खाली हो जाता है । खजाना खाली होते ही राजा अपने शत्रुओंके वशमें आ जाता है ॥ २० ॥
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फलार्थमूलं व्युच्छिद्येत् तेन नन्दन्ति शत्रवः ।
न चास्मै मानुषं कर्म दैवमस्योपवर्णय ॥ २१ ॥
शत्रुके राज्यमें जो फल- मूल और खेती आदि हो, उसे गुप्तरूपसे नष्ट करा दे । इससे उसके शत्रु प्रसन्न होते हैं। यह कार्य किसी मनुष्यका किया हुआ न बतावे । दैवी घटना कहकर इसका वर्णन करे ॥ २१ ॥
असंशयं दैवपरः क्षिप्रमेव विनश्यति ।
याजयैनं विश्वजिता सर्वस्वेन वियुज्य तम् ॥ २२ ॥
इसमें संदेह नहीं कि दैवका मारा हुआ मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । हो सके तो शत्रुको विश्वजित् नामक यज्ञमें लगा दो और उसके द्वारा दक्षिणारूपमें सर्वस्वदान कराकर उसे निर्धन बना दो ॥ २२ ॥
ततो गच्छसि सिद्धार्थःपीड्यमानं महाजनम् ।
योगधर्मविदं पुण्यं कंचिदस्योपवर्णयेत् ॥ २३ ॥
अपि त्यागं बुभूषेत कच्चिद् गच्छेदनामयम् ।
सिद्धेनौषधियोगेन सर्वशत्रुविनाशिना ।
नागानश्वान् मनुष्यांश्च कृतकैरुपघातयेत् ॥ २४ ॥
इससे तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा। तदनन्तर तुम्हें कष्ट पाते हुए किसी श्रेष्ठपुरुषकी दुरवस्थाका और किसी योगधर्मके ज्ञाता पुण्यात्मा पुरुषकी महिमाका राजाके सामने वर्णन करना चाहिये, जिससे शत्रु राजा अपने राज्यको त्याग देनेकी इच्छा करने लगे । यदि कदाचित् वह प्रकृतिस्थ ही रह जाय, उसके ऊपर वैराग्यका प्रभाव न पड़े, तब अपने नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा सर्वशत्रुविनाशक सिद्ध औषधके प्रयोगसे शत्रुके हाथी, घोड़े और मनुष्योंको मरवा डालना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
एते चान्ये च बहवो दम्भयोगाः सुचिन्तिताः ।
शक्या विषहता कर्तुं पुरुषेण कृतात्मना ॥ २५ ॥
राजकुमार! अपने मनको वशमें रखनेवाला पुरुष यदि धर्मविरुद्ध आचरण करना सह सके तो ये तथा और भी बहुत -से भलीभाँति सोचे हुए कपटपूर्ण प्रयोग हैं, जो उसके द्वारा किये जा सकते हैं ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हआ ॥ १०५ ॥
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* जैसे कुत्ते बहुत जागते हैं, उसी तरह शत्रुकी गतिविधिको देखनेके लिये बराबर जागता रहे । जिस प्रकार हिरन बहुत चौकन्ने होते हैं, जरा भी भयकी आशंका होते ही भाग जाते हैं, उसी तरह हर समय सावधान रहे । भय आनेके पहले ही वहाँसे खिसक जाय । जैसे कौए प्रत्येक मनुष्यकी चेष्टा देखते रहते हैं, किसीको हाथ उठाते देख तुरंत उड़ जाते हैं; इसी प्रकार शत्रुकी चेष्टापर सदा दृष्टि रखे ।
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षडधिकशततमोऽध्यायः कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना राजोवाच
न निकृत्या न दम्भेन ब्रह्मन्निच्छामि जीवितुम् ।
नाधर्मयुक्तानिच्छेयमर्थान् सुमहतोऽप्यहम् ॥ १ ॥
राजाने कहा — ब्रह्मन्! मैं कपट और दम्भका आश्रय लेकर जीवित नहीं रहना चाहता । अधर्मके सहयोगसे मुझे बहुत बड़ी सम्पत्ति मिलती हो तो भी मैं उसकी इच्छा नहीं करता ॥ १ ॥
पुरस्तादेव भगवन् मयैतदपवर्जितम् ।
येन मां नाभिशङ्केत येन कृत्स्नं हितं भवेत् ॥ २ ॥
भगवन्! मैंने तो पहलेसे ही इन सब दुर्गुणोंका परित्याग कर दिया है, जिससे किसीका मुझपर संदेह न हो और सबका सम्पूर्णरूपसे हित हो ॥ २ ॥
आनृशंस्येन धर्मेण लोके ह्यस्मिन् जिजीविषुः ।
नाहमेतदलं कर्तुं नैतत् त्वय्युपपद्यते ॥ ३ ॥
मैं दया - धर्मका आश्रय लेकर ही इस जगत्में जीना चाहता हूँ । मुझसे यह अधर्माचरण कदापि नहीं हो सकता, और ऐसा उपदेश देना आपको भी शोभा नहीं देता ॥ ३ ॥
मुनिरुवाच
उपपन्नस्त्वमेतेन यथा क्षत्रिय भाषसे ।
प्रकृत्या ह्युपपन्नोऽसि बुद्धया वा बहुदर्शनः ॥ ४ ॥
मुनिने कहा – राजकुमार! तुम जैसा कहते हो, वैसे ही गुणोंसे सम्पन्न भी हो । तुम धार्मिक स्वभावसे युक्त हो और अपनी बुद्धिके द्वारा बहुत कुछ देखने तथा समझनेकी शक्ति रखते हो ॥ ४ ॥
उभयोरेव वामर्थे यतिष्ये तव तस्य च ।
संश्लेषं वा करिष्यामि शाश्वतं ह्यनपायिनम् ॥ ५ ॥
मैं तुम्हारे और राजा जनक— दोनोंके ही हितके लिये अब स्वयं ही प्रयत्न करूँगा और तुम दोनोंमें ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करा दूँगा, जो अमिट और चिरस्थायी हो ॥ ५ ॥
त्वादृशं हि कुले जातमनृशंसं बहुश्रुतम् ।
अमात्यं को न कुर्वीत राज्यप्रणयकोविदम् ॥ ६ ॥
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तुम्हारा जन्म उच्चकुलमें हुआ है । तुम दयालु, अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता तथा राज्यसंचालनकी कलामें कुशल हो । तुम्हारे- जैसे योग्य पुरुषको कौन अपना मन्त्री नहीं बनायेगा? ॥ ६ ॥
यस्त्वं प्रच्यावितो राज्याद् व्यसनं चोत्तमं गतः ।
आनृशंस्येन वृत्तेन क्षत्रियेच्छसि जीवितुम् ॥ ७ ॥
राजकुमार! तुम्हें राज्यसे भ्रष्ट कर दिया गया है । तुम बड़ी भारी विपत्तिमें पड़ गये हो तथापि तुमने क्रूरताको नहीं अपनाया, तुम दयायुक्त बर्तावसे ही जीवन बिताना चाहते हो ॥ ७ ॥
आगन्ता मद्गृहं तात वैदेहः सत्यसंगरः ।
अथाहं तं नियोक्ष्यामि तत् करिष्यत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
तात! सत्यप्रतिज्ञ विदेहराज जनक जब मेरे आश्रमपर पधारेंगे, उस समय मैं उन्हें जो भी आज्ञा दूँगा, उसे वे निःसंदेह पूर्ण करेंगे ॥ ८ ॥
तत आहूय वैदेहं मुनिर्वचनमब्रवीत् ।
अयं राजकुले जातो विदिताभ्यन्तरो मम ॥ ९ ॥
तदनन्तर मुनिने विदेहराज जनकको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहा-' राजन्! यह राजकुमार राज - वंशमें उत्पन्न हुआ है, इसकी आन्तरिक बातोंको भी मैं जानता हूँ ॥ ९ ॥
आदर्श इव शुद्धात्मा शारदश्चन्द्रमा यथा ।
नास्मिन् पश्यामि वृजिनं सर्वतो मे परीक्षितः ॥ १० ॥
‘ इसका हृदय दर्पणके समान शुद्ध और शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल है । मैंने इसकी सब प्रकारसे परीक्षा कर ली है । इसमें मैं कोई पाप या दोष नहीं देख रहा हूँ ॥ १० ॥
तेन ते संधिरेवास्तु विश्वसास्मिन् यथा मयि ।
न राज्यमनमात्येन शक्यं शास्तुमपि त्र्यहम् ॥ ११ ॥
‘ अतः इसके साथ अवश्य ही तुम्हारी संधि हो जानी चाहिये । तुम जैसा मुझपर विश्वास करते हो, वैसा ही इसपर भी करो । कोई भी राज्य बिना मन्त्रीके तीन दिन भी नहीं चलाया जा सकता ॥ ११ ॥
अमात्यः शूर एव स्याद् बुद्धिसम्पन्न एव वा ।
ताभ्यां चैवोभयं राजन् पश्य राज्यप्रयोजनम् ॥ १२ ॥
' मन्त्री वही हो सकता है, जो शूरवीर अथवा बुद्धिमान् हो । शौर्य और बुद्धिसे ही लोक
और परलोक दोनोंका सुधार होता है । राजन्! उभयलोककी सिद्धि ही राज्यका प्रयोजन है ।
इसे अच्छी तरह देखो और समझो ॥ १२ ॥