श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 681–690
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
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भरतनन्दन! युद्ध करके जो विजय प्राप्त होती है, उसे निकृष्ट ही माना गया है । युद्धसम्बन्धी विजय अचानक प्राप्त होती है या दैवेच्छासे; यह बात विचारणीय ही होती है । इसका पहलेसे कोई निश्चय नहीं रहता ॥ १७ ॥
अपामिव महावेगस्त्रस्ता इव महामृगाः ।
दुर्निवार्यतमा चैव प्रभग्ना महती चमूः ॥ १८ ॥
यदि विशाल सेनामें भगदड़ मच जाती है तो उसे जलके महान् वेगके समान तथा भयभीत हुए महामृगोंके समान रोकना अत्यन्त कठिन हो जाता है ॥ १८ ॥
भग्ना इत्येव भज्यन्ते विद्वांसोऽपि न कारणम् ।
उदारसारा महती रुरुसंघोपमा चमूः ॥ १ ९ ॥
विशाल सेना मृगोंके झुंडके समान होती है । उसमें कितने ही बलवान् वीर क्यों न भरे हों, कुछ लोग भाग रहे हैं - इतना ही देखकर सब भागने लगते हैं । यद्यपि उन्हें भागनेका कारण नहीं मालूम रहता है ॥ १ ९ ॥
परस्परज्ञाः संहृष्टास्त्यक्तप्राणाः सुनिश्चिताः ।
अपि पञ्चाशतं शूरा निघ्नन्ति परवाहिनीम् ॥ २० ॥
एक- दूसरेको जाननेवाले, हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण, प्राणोंका मोह छोड़ देनेवाले तथा मरने - मारनेके दृढ़ निश्चयसे युक्त पचास शूरवीर भी सारी शत्रु सेनाका संहार कर सकते ॥ २० ॥
अपि वा पञ्च षट् सप्त संहताः कृतनिश्चयाः ।
कुलीनाः पूजिताः सम्यग् विजयन्तीह शात्रवान् ॥ २१ ॥
अच्छे कुलमें उत्पन्न, परस्पर संगठित तथा राजाद्वारा सम्मानित पाँच, छः या सात वीर भी यदि दृढ़ निश्चयके साथ युद्धस्थलमें डटे रहें तो युद्धमें शत्रुओंपर भलीभाँति विजय पा सकते हैं ॥ २१ ॥
संनिपातो न मन्तव्यः शक्ये सति कथंचन ।
सान्त्वभेदप्रदानानां युद्धमुत्तरमुच्यते ॥ २२ ॥
जबतक किसी तरह सन्धि हो सकती हो, तबतक युद्धको स्वीकार नहीं करना चाहिये । पहले सामनीतिसे समझावे । इससे काम न चले तो भेदनीतिके अनुसार शत्रुओंमें फूट डाले । इसमें भी सफलता न मिले तो दाननीतिका प्रयोग करे – धन देकर शत्रुके सहायकोंको वशमें करनेकी चेष्टा करे । इन तीनों उपायोंके सफल न होनेपर अन्तमें युद्धका आश्रय लेना उचित बताया गया है ॥ २२ ॥
संदर्शेनैव सेनाया भयं भीरून् प्रबाधते ।
वज्रादिव प्रज्वलितादियं क्व नु पतिष्यति ॥ २३ ॥
शत्रुकी सेनाको देखते ही कायरोंको भय सताने लगता है, मानो उनके ऊपर प्रज्वलित वज्र गिरनेवाला हो । वे सोचते हैं, न जाने यह सेना किसके ऊपर पड़ेगी? ॥ २३ ॥
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अभिप्रयातां समितिं ज्ञात्वा ये प्रतियान्त्यथ ।
तेषां स्यन्दन्ति गात्राणि योधानां विजयस्य च ॥ २४ ॥
जो युद्धको उपस्थित हुआ जानकर उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं, उन वीरोंके शरीरमें विजयकी आशासे आनन्दजनित पसीनेके बिन्दु प्रकट हो जाते हैं ॥ २४ ॥
विषयो व्यथते राजन् सर्वः सस्थाणुजङ्गमः ।
अस्य प्रतापतप्तानां मज्जा सीदति देहिनाम् ॥ २५ ॥
राजन्! युद्ध उपस्थित होनेपर स्थावर - जंगम प्राणियोंसहित समस्त देश ही व्यथित हो उठता है और अस्त्रोंके प्रतापसे संतप्त हुए देहधारियोंकी मज्जा भी सूखने लगती है ॥ २५ ॥
तेषां सान्त्वं क्रूरमिश्रं प्रणेतव्यं पुनः पुनः ।
सम्पीड्यमाना हि परैर्योगमायान्ति सर्वतः ॥ २६ ॥
उन देशवासियोंके प्रति कठोरताके साथ- साथ सान्त्वनापूर्ण मधुर वचनोंका बारंबार प्रयोग करना चाहिये; अन्यथा केवल कठोर वचनोंसे पीड़ित हो वे सब ओरसे जाकर शत्रुओंके साथ मिल जाते हैं ॥ २६ ॥
आन्तराणां च भेदार्थं चरानभ्यवचारयेत् ।
यश्च तस्मात् परो राजा तेन सन्धिः प्रशस्यते ॥ २७ ॥
शत्रुके मित्रोंमें फूट डालनेके लिये गुप्तचरोंको भेजना चाहिये और जो शत्रुसे भी बलवान् राजा हो, उसके साथ सन्धि करना श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
न हि तस्यान्यथा पीडा शक्या कर्तुं तथाविधा ।
यथा सार्धममित्रेण सर्वतः प्रतिबाधनम् ॥ २८ ॥
अन्यथा उसको वैसी पीड़ा नहीं दी जा सकती, जैसी कि उसके शत्रुके साथ सन्धि करके दी जा सकती है । युद्ध इस प्रकार करना चाहिये, जिससे शत्रुपक्ष सब ओरसे संकटमें पड़ जाय ॥ २८ ॥
क्षमा वै साधुमायाति न ह्यसाधून्क्षमा सदा ।
क्षमायाश्चाक्षमायाश्च पार्थ विद्धि प्रयोजनम् ॥ २ ९ ॥
कुन्तीनन्दन! सत्पुरुषोंको ही सदा क्षमा करना आता है, दुष्टोंको नहीं । क्षमा करने और न करनेका प्रयोजन बताता हूँ; इसे सुनो और समझो ॥ २ ९ ॥
विजित्य क्षममाणस्य यशो राज्ञो विवर्धते ।
महापराधे ह्यप्यस्मिन् विश्वसन्त्यपि शत्रवः ॥ ३० ॥
जो राजा शत्रुओंको जीत लेनेके बाद उनके अपराध क्षमा कर देता है, उसका यश बढ़ता है । उसके प्रति महान् अपराध करनेपर भी शत्रु उसपर विश्वास करते हैं ॥ ३० ॥
मन्यते कर्षयित्वा तु क्षमा साध्वीति शम्बरः ।
असंतप्तं तु यद् दारु प्रत्येति प्रकृतिं पुनः ॥ ३१ ॥
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शम्बरासुरका मत है कि पहले शत्रुको पीड़ाद्वारा अत्यन्त दुर्बल करके फिर उसके प्रति क्षमाका प्रयोग करना ठीक है; क्योंकि यदि टेढ़ी लकड़ीको बिना गर्म किये ही सीधी किया जाय तो वह फिर ज्यों- की- त्यों हो जाती है ॥ ३१ ॥
नैतत् प्रशंसन्त्याचार्या न च साधुनिदर्शनम् ।
अक्रोधेनाविनाशेन नियन्तव्याः स्वपुत्रवत् ॥ ३२ ॥
परंतु आचार्यगण इस बातकी प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि यह साधु पुरुषोंका दृष्टान्त नहीं है। राजाको चाहिये कि वह पुत्रकी ही भाँति अपने शत्रुको भी बिना क्रोध किये ही वशमें करे; उसका विनाश न करे ॥ ३२ ॥
द्वेष्यो भवति भूतानामुग्रो राजा युधिष्ठिर ।
मृदुमप्यवमन्यन्ते तस्मादुभयमाचरेत् ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर! राजा यदि उग्रस्वभावका हो जाय तो वह समस्त प्राणियोंके द्वेषका पात्र बन जाता है और यदि सर्वथा कोमल हो जाय तो सभी उसकी अवहेलना करने लगते हैं; इसलिये उसे आवश्यकतानुसार उग्रता और कोमलता दोनोंसे काम लेना चाहिये ॥ ३३ ॥
प्रहरिष्यन् प्रियं ब्रूयात् प्रहरन्नपि भारत ।
प्रहृत्य च कृपायीत शोचन्निव रुदन्निव ॥ ३४ ॥
भरतनन्दन! राजा शत्रुपर प्रहार करनेसे पहले और प्रहार करते समय भी उससे प्रिय वचन ही बोले । प्रहारके बाद भी शोक प्रकट करते और रोते हुए- से उसके प्रति दया दिखावे ॥ ३४ ॥
न मे प्रियं यन्निहताः संग्रामे मामकैर्नरैः ।
न च कुर्वन्ति मे वाक्यमुच्यमानाः पुनः पुनः ॥ ३५ ॥
वह शत्रुको सुनाकर इस प्रकार कहे — ' ओह! इस युद्धमें मेरे सिपाहियोंने जो इतने वीरोंको मार डाला है, यह मुझे अच्छा नहीं लगा है; परंतु क्या करूँ? बारंबार कहनेपर भी ये मेरी बात नहीं मानते हैं ॥ ३५ ॥
अहो जीवितमाकाङ्क्षेन्नेदृशो वधमर्हति ।
सुदुर्लभाः सुपुरुषाः संग्रामेष्वपलायिनः ॥ ३६ ॥
कृतं ममाप्रियं तेन तेनायं निहतो मृधे ।
इति वाचा बदन् इन्तॄन् पूजयेत रहोगतः ॥ ३७ ॥
' अहो! सभी लोग अपने प्राणोंकी रक्षा करना चाहते हैं; अतः ऐसे पुरुषका वध करना उचित नहीं है । संग्राममें पीठ न दिखानेवाले सत्पुरुष इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ हैं । मेरे जिन सैनिकोंने युद्धमें इस श्रेष्ठ वीरका वध किया है, उनके द्वारा मेरा बड़ा अप्रिय कार्य हुआ है । शत्रुपक्षके सामने वाणीद्वारा इस प्रकार खेद प्रकट करके राजा एकान्तमें जानेपर अपने उन बहादुर सिपाहियोंकी प्रशंसा करे, जिन्होंने शत्रुपक्षके प्रमुख वीरोंका वध किया हो ॥ ३६-३७ ॥
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हन्तॄणामाहतानां च यत् कुर्युरपराधिनः ।
क्रोशे बाहुं प्रगृह्यापि चिकीर्षन् जनसंग्रहम् ॥ ३८ ॥
इसी तरह शत्रुओंको मारनेवाले अपने पक्षके वीरोंमेंसे जो हताहत हुए हों, उनकी हानिके लिये इस प्रकार दुःख प्रकट करे, जैसे अपराधी किया करते हैं । जनमतको अपने अनुकूल करनेकी इच्छासे जिसकी हानि हुई हो, उसकी बाँह पकड़कर सहानुभूति प्रकट करते हुए जोर- जोरसे रोवे और विलाप करे ॥ ३८ ॥
एवं सर्वास्ववस्थासु सान्त्वपूर्वं समाचरेत् ।
प्रियो भवति भूतानां धर्मज्ञो वीतभीर्नृपः ॥ ३ ९ ॥
इस प्रकार सब अवस्थाओंमें जो सान्त्वनापूर्ण बर्ताव करता है, वह धर्मज्ञ राजा सब लोगोंका प्रिय एवं निर्भय हो जाता है ॥ ३ ९ ॥
विश्वासं चात्र गच्छन्ति सर्वभूतानि भारत ।
विश्वस्तः शक्यते भोक्तुं यथाकाममुपस्थितः ॥ ४० ॥
भरतनन्दन! उसके ऊपर सब प्राणी विश्वास करने लगते हैं । विश्वासपात्र हो जानेपर वह सबके निकट रहकर इच्छानुसार सारे राष्ट्रका उपभोग कर सकता है ॥ ४० ॥
तस्माद् विश्वासयेद् राजा सर्वभूतान्यमायया ।
सर्वतः परिरक्षेच्च यो महीं भोक्तुमिच्छति । ४१ ॥
अतः जो राजा इस पृथ्वीका राज्य भोगना चाहता है, उसे चाहिये कि छल - कपट छोड़कर अपने ऊपर समस्त प्राणियोंका विश्वास उत्पन्न करे और इस भूमण्डलकी सब ओरसे पूर्णरूपसे रक्षा करे ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सेनानीतिकथने द्वयधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सेनानीतिका वर्णनविषयक एक सौ दोवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥
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त्र्यधिकशततमोऽध्यायः शत्रुको वशमें करनेके लिये राजाको किस नीतिसे काम लेना चाहिये और दुष्टोंको कैसे पहचानना चाहिये - इसके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद युधिष्ठिरउवाच
कथं मृदौ कथं तीक्ष्णे महापक्षे च पार्थिव ।
आदौ वर्तेत नृपतिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! पृथ्वीपते! जिसका पक्ष प्रबल और महान् हो, वह शत्रु यदि कोमल स्वभावका हो तो उसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये और यदि वह तीक्ष्ण स्वभावका हो तो उसके साथ पहले किस तरहका बर्ताव करना राजाके लिये उचित है, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा — ' युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष बृहस्पति और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
बृहस्पतिं देवपतिरभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
उपसंगम्य पप्रच्छ वासवः परवीरहा ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले देवराज इन्द्रने बृहस्पतिजीके पास जा उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा ॥ ३ ॥
इन्द्र उवाच
अहितेषु कथं ब्रह्मन् प्रवर्तेयमतन्द्रितः ।
असमुच्छिद्य चैवैतान् नियच्छेयमुपायतः ॥ ४ ॥
इन्द्र बोले — ब्रह्मन्! मैं आलस्यरहित हो अपने शत्रुओंके प्रति कैसा बर्ताव करूँ? उन सबका समूलोच्छेद किये बिना ही उन्हें किस उपायसे वशमें करूँ? ॥ ४ ॥
सेनयोर्व्यतिषङ्गेण जयः साधारणो भवेत् ।
किंकुर्वाणं न मां जह्याज्ज्वलिता श्रीः प्रतापिनी ॥ ५ ॥
दो सेनाओंमें परस्पर भिड़न्त हो जानेपर विजय दोनों पक्षोंके लिये साधारण - सी वस्तु हो जाती है ( अमुक पक्षकी ही जीत होगी, यह नियम नहीं रह जाता ) । अतः मुझे क्या
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करना चाहिये, जिससे शत्रुओंको संताप देनेवाली यह समुज्ज्वल राज्यलक्ष्मी मुझे कभी न छोड़े ॥ ५ ॥
ततो धर्मार्थकामानां कुशलः प्रतिभानवान् ।
राजधर्मविधानज्ञः प्रत्युवाच पुरंदरम् ॥ ६ ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्म, अर्थ और कामके प्रतिपादनमें कुशल, प्रतिभाशाली तथा राजधर्मके विधानको जाननेवाले बृहस्पतिने इन्द्रको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ६ ॥
बृहस्पतिरुवाच
न जातु कलहेनेच्छेन्नियन्तुमपकारिणः ।
बालैरासेवितं ह्येतद् यदमर्षो यदक्षमा ॥ ७ ॥
बृहस्पतिजी बोले – राजन्! कोई भी राजा कभी कलह या युद्धके द्वारा शत्रुओंको वशमें करनेकी इच्छा न करे । असहनशीलता अथवा क्षमाको छोड़ना, यह बालकों या मूर्खोंद्वारा सेवित मार्ग है ॥ ७ ॥
न शत्रुर्विवृतः कार्यो वधमस्याभिकाङ्क्षता ।
क्रोधं भयं च हर्षं च नियम्य स्वयमात्मनि ॥ ८ ॥
शत्रुके वधकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह क्रोध, भय और हर्षको अपने मनमें ही रोक ले तथा शत्रुको सावधान न करे ॥ ८ ॥
अमित्रमुपसेवेत विश्वस्तवदविश्वसन् ।
प्रियमेव वदेन्नित्यं नाप्रियं किंचिदाचरेत् ॥ ९ ॥
भीतरसे विश्वास न करते हुए भी बाहरसे विश्वस्त पुरुषकी भाँति अपना भाव प्रदर्शित करते हुए शत्रुकी सेवा करे। सदा उससे प्रिय वचन ही बोले, कभी कोई अप्रिय बर्ताव न करे ॥ ९ ॥
विरमेच्छुष्कवैरेभ्यः कण्ठायासांश्च वर्जयेत् ।
यथा वैतंसिको युक्तो द्विजानां सदृशस्वनः ॥ १० ॥
तान् द्विजान् कुरुते वश्यांस्तथा युक्तो महीपतिः ।
वश चोपनयेच्छत्रून् निहन्याच्च पुरंदर ॥ ११ ॥
पुरंदर! सूखे वैरसे अलग रहे, कण्ठको पीड़ा देनेवाले वाद -विवादको त्याग दे । जैसे व्याध अपने कार्यमें सावधानीके साथ संलग्न हो पक्षियोंको फँसानेके लिये उन्हींके समान बोली बोलता है और मौका पाकर उन पक्षियोंको वशमें कर लेता है, उसी प्रकार उद्योगशील
राजा धीरे - धीरे शत्रुओंको वशमें कर ले । तत्पश्चात् उन्हें मार डाले ॥ १०-११ ॥
न नित्यं परिभूयारीन् सुखं स्वपिति वासव ।
जागर्त्येव हि दुष्टात्मा संकरेऽग्निरिवोत्थितः ॥ १२ ॥
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इन्द्र! जो सदा शत्रुओंका तिरस्कार ही करता है, वह सुखसे सोने नहीं पाता । वह दुष्टात्मा नरेश बाँस और घास-फूसमें प्रज्वलित हो चट- चट शब्द करनेवाली आगके समान सदा जागता ही रहता है ॥ १२ ॥
न संनिपातः कर्तव्यः सामान्ये विजये सति ।
विश्वास्यैवोपसन्नार्थो वशे कृत्वा रिपुः प्रभो ॥ १३ ॥
प्रभो! जब युद्धमें विजय एक सामान्य वस्तु है ( किसीको भी वह मिल सकती है ), तब उसके लिये पहले ही युद्ध नहीं करना चाहिये, अपितु शत्रुको अच्छी तरह विश्वास दिलाकर वशमें कर लेनेके पश्चात् अवसर देखकर उसके सारे मनसूबेको नष्ट कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
सम्प्रधार्य सहामात्यैर्मन्त्रविद्भिर्महात्मभिः ।
उपेक्ष्यमाणोऽवज्ञातो हृदयेनापराजितः ॥ १४ ॥
अथास्य प्रहरेत् काले किंचिद्विचलिते पदे ।
दण्डं च दूषयेदस्य पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ १५ ॥
शत्रुके द्वारा उपेक्षा अथवा अवहेलना की जानेपर भी राजा अपने मनमें हिम्मत न हारे । वह मन्त्रियोंसहित मन्त्रवेत्ता महापुरुषोंके साथ कर्त्तव्यका निश्चय करके समय आनेपर जब शत्रुकी स्थिति कुछ डाँवाडोल हो जाय, तब उसपर प्रहार करे और विश्वासपात्र पुरुषोंको भेजकर उनके द्वारा शत्रुकी सेनामें फूट डलवा दे ॥
आदिमध्यावसानज्ञः प्रच्छन्नं च विधारयेत् ।
बलानि दूषयेदस्य जानन्नेव प्रमाणतः ॥ १६ ॥
राजा शत्रुके राज्यकी आदि, मध्य और अन्तिम सीमाको जानकर गुप्तरूपसे मन्त्रियोंके साथ बैठकर अपने कर्तव्यका निश्चय कर तथा शत्रुकी सेनाकी संख्या कितनी है, इसको अच्छी तरह जानते हुए ही उसमें फूट डलवानेकी चेष्टा करे ॥ १६ ॥
भेदेनोपप्रदानेन संसृजेदौषधैस्तथा ।
न त्वेवं खलु संसर्गं रोचयेदरिभिः सह ॥ १७ ॥
राजाको चाहिये कि वह दूर रहकर गुप्तचरोंद्वारा शत्रुकी सेनामें मतभेद पैदा करे । घूस देकर लोगोंको अपने पक्षमें करनेकी चेष्टा करे अथवा उनके ऊपर विभिन्न औषधोंका प्रयोग करे; परंतु किसी तरह भी शत्रुओंके साथ प्रकटरूपसे साक्षात् सम्बन्ध स्थापित करनेकी इच्छा न करे ॥ १७ ॥
दीर्घकालमपीक्षेत निहन्यादेव शात्रवान् ।
कालाकाङ्क्षी हि क्षपयेद् यथा विश्रम्भमाप्नुयुः ॥ १८ ॥
अनुकूल अवसर पानेके लिये कालक्षेप ही करता रहे । उसके लिये दीर्घ कालतक भी प्रतीक्षा करनी पड़े तो करे, जिससे शत्रुओंको भलीभाँति विश्वास हो जाय । तदनन्तर मौका पाकर उन्हें मार ही डाले ॥ १८ ॥
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न सद्योऽरीन् विहन्याच्च द्रष्टव्यो विजयो ध्रुवः ।
न शल्यं वा घटयति न वाचा कुरुते व्रणम् ॥ १ ९ ॥
राजा शत्रुओंपर तत्काल आक्रमण न करे । अवश्यम्भावी विजयके उपायपर विचार करे । न तो उसपर विषका प्रयोग करे और न उसे कठोर वचनोंद्वारा ही घायल करे ॥ १ ९ ॥
प्राप्ते च प्रहरेत् काले न च संवर्तते पुनः ।
हन्तुकामस्य देवेन्द्र पुरुषस्य रिपून् प्रति ॥ २० ॥
देवेन्द्र! जो शत्रुको मारना चाहता है, उस पुरुषके लिये बारंबार मौका हाथमें नहीं लगता; अतः जब कभी अवसर मिल जाय, उस समय उसपर अवश्य प्रहार करे ॥
यो हि कालो व्यतिक्रामेत् पुरुषं कालकांक्षिणम् ।
दुर्लभः स पुनस्तेन कालः कर्मचिकीर्षुणा ॥ २१ ॥
समयकी प्रतीक्षा करनेवाले पुरुषके लिये जो उपयुक्त अवसर आकर भी चला जाता है, वह अभीष्ट कार्य करनेकी इच्छावाले उस पुरुषके लिये फिर दुर्लभ हो जाता है ॥ २१ ॥
ओजश्च जनयेदेव संगृह्णन् साधूसम्मतम् ।
अकाले साधयेन्मित्रं न च प्राप्ते प्रपीडयेत् ॥ २२ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर अपने बलको सदा बढ़ाता रहे । जबतक अनुकूल अवसर न आये, तबतक अपने मित्रोंकी संख्या बढ़ावे और शत्रुको भी पीड़ा न दे; परंतु अवसर आ जाय तो शत्रुपर प्रहार करनेसे न चूके ॥ २२ ॥
विहाय कामं क्रोधं च तथाहंकारमेव च ।
युक्तो विवरमन्विच्छेदहितानां पुनः पुनः ॥ २३ ॥
काम, क्रोध तथा अहंकारको त्यागकर सावधानीके साथ बारंबार शत्रुओंके छिद्रोंको देखता रहे ॥ २३ ॥
मार्दवं दण्ड आलस्यं प्रमादश्च सुरोत्तम ।
मायाः सुविहिताः शक्र सादयन्त्यविचक्षणम् ॥ २४ ॥
सुरश्रेष्ठ इन्द्र! कोमलता, दण्ड, आलस्य, असावधानी और शत्रुओंद्वारा अच्छी तरह प्रयोग की हुई माया — ये अनभिज्ञ राजाको बड़े कष्टमें डाल देते हैं ॥ २४ ॥
निहत्यैतानि चत्वारि मायां प्रति विधाय च ।
ततः शक्नोति शत्रूणां प्रहर्तुमविचारयन् ॥ २५ ॥
कोमलता, दण्ड, आलस्य और प्रमाद -इन चारोंको नष्ट करके शत्रुकी मायाका भी प्रतीकार करे । तत्पश्चात् वह बिना विचारे शत्रुओंपर प्रहार कर सकता है ॥ २५ ॥
यदैवैकेन शक्येत गुह्यं कर्तुं तदाचरेत् ।
यच्छन्ति सचिवा गुह्यं मिथो विश्रावयन्त्यपि ॥ २६ ॥
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राजा अकेला ही जिस गुप्त कार्यको कर सके, उसे अवश्य कर डाले; क्योंकि मन्त्रीलोग कभी - कभी गुप्त विषयको प्रकाशित कर देते हैं और नहीं तो आपसमें ही एक-दूसरेको सुना देते हैं ॥ २६ ॥
अशक्यमिति कृत्वा वा ततोऽन्यैः संविदं चरेत् ।
ब्रह्मदण्डमदृष्टेषु दृष्टेषु चतुरङ्गिणीम् ॥ २७ ॥
जो कार्य अकेले करना असम्भव हो जाय, उसीके लिये दूसरोंके साथ बैठकर विचार-विमर्श करे । यदि शत्रु दूरस्थ होनेके कारण दृष्टिगोचर न हो तो उसपर ब्रह्मदण्डका प्रयोग करे और यदि शत्रु निकटवर्ती होनेके कारण दृष्टिगोचर हो तो उसपर चतुरंगिणी सेना भेजकर आक्रमण करे ॥ २७ ॥
भेदं च प्रथमं युञ्ज्यात् तूष्णीं दण्डं तथैव च ।
काले प्रयोजयेद् राजा तस्मिंस्तस्मिंस्तदा तदा ॥ २८ ॥
राजा शत्रुके प्रति पहले भेदनीतिका प्रयोग करे । तत्पश्चात् वह उपयुक्त अवसर आनेपर भिन्न - भिन्न शत्रुके प्रति भिन्न-भिन्न समयमें चुपचाप दण्डनीतिका प्रयोग करे ॥ २८ ॥
प्रणिपातं च गच्छेत काले शत्रोर्बलीयसः ।
युक्तोऽस्य वधमन्विच्छेदप्रमत्तः प्रमाद्यतः ॥ २९ ॥
यदि बलवान् शत्रुसे पाला पड़ जाय और समय उसीके अनुकूल हो तो राजा उसके सामने नतमस्तक हो जाय और जब वह शत्रु असावधान हो, तब स्वयं सावधान और उद्योगशील होकर उसके वधके उपायका अन्वेषण करे ॥ २ ९ ॥
प्रणिपातेन दानेन वाचा मधुरया ब्रुवन् ।
अमित्रमपि सेवेत न च जातु विशङ्कयेत् ॥ ३० ॥
राजाको चाहिये कि वह मस्तक झुकाकर, दान देकर तथा मीठे वचन बोलकर शत्रुका
भी मित्रके समान ही सेवन करे । उसके मनमें कभी संदेह न उत्पन्न होने दे ॥ ३० ॥
स्थानानि शङ्कितानां च नित्यमेव विवर्जयेत् ।
न च तेष्वाश्वसेद् राजा जाग्रतीह निराकृताः ॥ ३१ ॥
जिन शत्रुओंके मनमें संदेह उत्पन्न हो गया हो, उनके निकटवर्ती स्थानोंमें रहना या आना- जाना सदाके लिये त्याग दे । राजा उनपर कभी विश्वास न करे; क्योंकि इस जगत्में उसके द्वारा तिरस्कृत या क्षतिग्रस्त हुए शत्रुगण सदा बदला लेनेके लिये सजग रहते हैं ॥ ३१ ॥
न ह्यतो दुष्करं कर्म किंचिदस्ति सुरोत्तम ।
यथा विविधवृत्तानामैश्वर्यममराधिप ॥ ३२ ॥
देवेश्वर! सुरश्रेष्ठ! नाना प्रकारके व्यवहारचतुर लोगोंके ऐश्वर्यपर शासन करना जितना कठिन काम है, उससे बढ़कर दुष्कर कर्म दूसरा कोई नहीं है ॥ ३२ ॥
तथा विविधवृत्तानामपि सम्भव उच्यते ।
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यतते योगमास्थाय मित्रामित्रं विचारयेत् ॥ ३३ ॥
वैसे भिन्न -भिन्न व्यवहारचतुर लोगोंके ऐश्वर्यपर भी शासन करना तभी सम्भव बताया गया है, जब कि राजा मनोयोगका आश्रय ले सदा इसके लिये प्रयत्नशील रहे और कौन मित्र है तथा कौन शत्रु; इसका विचार करता रहे ॥ ३३ ॥
मृदुमप्यवमन्यन्ते तीक्ष्णादुद्विजते जनः ।
मा तीक्ष्णो मा मृदुर्भूस्त्वं तीक्ष्णो भव मृदुर्भव ॥ ३४ ॥
मनुष्य कोमल स्वभाववाले राजाका अपमान करते हैं और अत्यन्त कठोर स्वभाववालेसे भी उद्विग्न हो उठते हैं; अतः तुम न कठोर बनो, न कोमल । समय- समयपर कठोरता भी धारण करो और कोमल भी हो जाओ ॥ ३४ ॥
यथा वप्रे वेगवति सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
नित्यं विवरणाद् बाधस्तथा राज्यं प्रमाद्यतः ॥ ३५ ॥
जैसे जलका प्रवाह बड़े वेगसे बह रहा हो और सब ओर जल -ही - जल फैल रहा हो, उस समय नदीतटके विदीर्ण होकर गिर जानेका सदा ही भय रहता है । उसी प्रकार यदि राजा सावधान न रहे तो उसके राज्यके नष्ट होनेका खतरा बना रहता है ॥ ३५ ॥
न बहूनभियुञ्जीत यौगपद्येन शात्रवान् ।
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन च पुरंदर ॥ ३६ ॥
एकैकमेषां निष्पिष्य शिष्टेषु निपुणं चरेत् ।
न तु शक्तोऽपि मेधावी सर्वानेवारभेन्नृपः ॥ ३७ ॥
पुरंदर! बहुत - से शत्रुओंपर एक ही साथ आक्रमण नहीं करना चाहिये । साम, दान, भेद और दण्डके द्वारा इन शत्रुओंमेंसे एक- एकको बारी- बारी से कुचलकर शेष बचे हुए शत्रुको पीस डालनेके लिये कुशलतापूर्वक प्रयत्न आरम्भ करे । बुद्धिमान् राजा शक्तिशाली होनेपर भी सब शत्रुओंको कुचलनेका कार्य एक ही साथ आरम्भ न करे ॥ ३६-३७ ॥
यदा स्यान्महती सेना हयनागरथाकुला ।
पदातियन्त्रबहुला अनुरक्ता षडङ्गिनी ॥ ३८ ॥
यदा बहुविधां वृद्धिं मन्येत प्रतिलोमतः ।
तदा विवृत्य प्रहरेद् दस्यूनामविचारयन् ॥ ३ ९ ॥
जब हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई और बहुत- से पैदलों तथा यन्त्रोंसे सम्पन्न, छ: * अंगोंवाली विशाल सेना स्वामीके प्रति अनुरक्त हो, जब शत्रुकी अपेक्षा अपनी अनेक प्रकारसे उन्नति होती जान पड़े, उस समय राजा दूसरा कोई विचार मनमें न लाकर प्रकटरूपसे डाकू और लुटेरोंपर प्रहार आरम्भ कर दे ॥ ३८-३९ ॥ न सामदण्डोपनिषत् प्रशस्यते । न मार्दवं शत्रुषु यात्रिकं सदा । न सस्यघातो न च संकरक्रिया