श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 711–720
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
पृष्ठ 711
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
U कालकवृक्षीय मुनि राजा जनकका राजकुमार क्षेमदर्शीके साथ मेल करा रहे हैं
पृष्ठ 712
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
धर्मात्मनां क्वचिल्लोके नान्यास्ति गतिरीदृशी ।
महात्मा राजपुत्रोऽयं सतां मार्गमनुष्ठितः ॥ १३ ॥
‘ जगत्में धर्मात्मा राजाओंके लिये अच्छे मन्त्रीके समान दूसरी कोई गति नहीं है । यह राजकुमार महामना है । इसने सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय लिया है ॥ १३ ॥
सुसंगृहीतस्त्वेवैष त्वया धर्मपुरोगमः ।
संसेव्यमानः शत्रूंस्ते गृह्णीयान्महतो गणान् ॥ १४ ॥
' यदि तुमने धर्मको सामने रखकर इसे सम्मान- पूर्वक अपनाया तो तुमसे सेवित होकर यह तुम्हारे शत्रुओंके भारी - से- भारी समुदायोंको काबूमें कर सकता है ॥ १४ ॥
यद्ययं प्रतियुद्धयेत् त्वां स्वकर्म क्षत्रियस्य तत् ।
जिगीषमाणस्त्वां युद्धे पितृपैतामहे पदे ॥ १५ ॥
‘ यदि यह अपने बाप - दादोंके राज्यके लिये युद्धमें तुम्हें जीतनेकी इच्छा रखकर तुम्हारे साथ संग्राम छेड़ दे तो क्षत्रियके लिये यह स्वधर्मका पालन ही होगा ॥ १५ ॥
त्वं चापि प्रतियुद्धयेथा विजिगीषुव्रते स्थितः ।
अयुध्यैव नियोगान्मे वशे कुरु हिते स्थितः ॥ १६ ॥
उस समय तुम भी विजयाभिलाषी राजाके व्रतमें स्थित हो इसके साथ युद्ध करोगे ही । अतः मेरी आज्ञा मानकर इसके हित- साधनमें तत्पर हो जाओ और युद्ध किये बिना ही इसे वशमें कर लो ॥ १६ ॥
स त्वं धर्ममवेक्षस्व हित्वा लोभमसाम्प्रतम् ।
न च कामान्न च द्रोहात् स्वधर्मं हातुमर्हसि ॥ १७ ॥
‘ अनुचित लोभका परित्याग करके तुम धर्मपर ही दृष्टि रखो, कामना अथवा द्रोहसे भी अपने धर्मका परित्याग न करो ॥ १७ ॥
नैव नित्यं जयस्तात नैव नित्यं पराजयः ।
तस्माद् भोजयितव्यश्च भोक्तव्यश्च परो जनः ॥ १८ ॥
' तात! किसीकी भी न तो सदा जय होती है और न नित्य पराजय ही होती है । जैसे राजा दूसरे मनुष्योंको जीतकर उसका तथा उसकी सम्पत्तिका उपभोग करता है, वैसे ही दूसरोंको भी उसे अपनी सम्पत्ति भोगनेका अवसर देना चाहिये ॥ १८ ॥
आत्मन्यपि च संदृश्यावुभौ जयपराजयौ ।
निःशेषकारिणां तात निःशेषकरणाद् भयम् ॥ १ ९ ॥
‘ वत्स! अपनेमें भी जय और पराजय दोनोंको देखना चाहिये । जो दूसरोंकी सम्पत्ति छीनकर उसके पास कुछ भी शेष नहीं रहने देते, उन्हें उस सर्वस्वापहरणरूपी पापसे अपने लिये भी सदा भय बना रहता है ' ॥ १ ९ ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं वचनं ब्राह्मणर्षभम् ।
प्रतिपूज्याभिसत्कृत्य पूजार्हमनुमान्य च ॥ २० ॥
पृष्ठ 713
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मुनिके इस प्रकार कहनेपर राजाने उन पूजनीय ब्राह्मणशिरोमणि महर्षिका पूजन और आदर- सत्कार करके उनकी बातका अनुमोदन करते हुए इस तरह उत्तर दिया ॥ २० ॥
यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महाश्रुतः ।
श्रेयस्कामो यथा ब्रूयादुभयोरेव तत् क्षमम् ॥ २१ ॥
‘ कोई महाबुद्धिमान् - जैसी बात कह सकता है, कोई महाविद्वान्- जैसी वाणी बोल सकता है, तथा दूसरोंका कल्याण चाहनेवाला महापुरुष जैसा उपदेश दे सकता है, वैसी ही बात आपने कही है । यह हम दोनोंके लिये ही शिरोधार्य करने योग्य है ॥ २१ ॥
यद् यद् वचनमुक्तोऽस्मि करिष्यामि च तत् तथा ।
एतद्धि परमं श्रेयो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ २२ ॥
‘ भगवन्! आपने मेरे लिये जो- जो आदेश दिया है, उसका मैं उसी रूपमें पालन करूँगा । यह मेरे लिये परम कल्याणकी बात है । इसके सम्बन्धमें मुझे दूसरा कोई विचार नहीं करना है ' ॥ २२ ॥
ततः कौसल्यमाहूय मैथिलो वाक्यमब्रवीत् ।
धर्मतो नीतितश्चैव लोकश्च विजितो मया ॥ २३ ॥
अहं त्वया चात्मगुणैर्जितः पार्थिवसत्तम ।
आत्मानमनवज्ञाय जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २४ ॥
तदनन्तर मिथिलानरेशने कोसल- राजकुमारको अपने निकट बुलाकर कहा — ' नृपश्रेष्ठ! मैंने धर्म और नीतिका सहारा लेकर सम्पूर्ण जगत्पर विजय पायी है, परंतु आज तुमने अपने गुणोंसे मुझे भी जीत लिया । अतः तुम अपनी अवज्ञा न करके एक विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २३-२४ ॥
नावमन्यामि ते बुद्धिं नावमन्ये च पौरुषम् ।
नावमन्ये जयामीति जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २५ ॥
‘ मैं तुम्हारी बुद्धिका अनादर नहीं करता, तुम्हारे पुरुषार्थकी अवहेलना नहीं करता और विजयी हूँ, यह सोचकर तुम्हारा तिरस्कार भी नहीं करता; अतः तुम विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २५ ॥
यथावत् पूजितो राजन् गृहं गन्तासि मे भृशम् ।
ततः सम्पूज्य तौ विप्रं विश्वस्तौ जग्मतुर्गृहान् ॥ २६ ॥
' राजन्! तुम मेरेद्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर मेरे घर पधारो। ' इतना कहकर वे दोनों परस्पर विश्वस्त हो उन ब्रह्मर्षिकी पूजा करके घरकी ओर चल दिये ॥ २६ ॥
वैदेहस्त्वथ कौसल्यं प्रवेश्य गृहमञ्जसा ।
पाद्यार्घ्यमधुपर्केस्तं पूजार्हं प्रत्यपूजयत् ॥ २७ ॥
विदेहराजने कोसल - राजकुमारको आदरपूर्वक अपने महलके भीतर ले जाकर अपने उस पूजनीय अतिथिका पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा मधुपर्कके द्वारा पूजन
पृष्ठ 714
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किया ॥ २७ ॥
ददौ दुहितरं चास्मै रत्नानि विविधानि च ।
एष राज्ञां परो धर्मोऽनित्यौ जयपराजयौ ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् उनके साथ अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया और दहेजमें नाना प्रकारके रत्न भेंट किये । यही राजाओंका परम धर्म है, जय और पराजय तो अनित्य हैं ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हआ ॥ १०६ ॥
पृष्ठ 715
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति युधिष्ठिरउवाच
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
धर्मवृत्तं च वित्तं च वृत्त्युपायाः फलानि च ॥ १ ॥
राज्ञां वित्तं च कोशं च कोशसंचयनं जयः ।
अमात्यगुणवृत्तिश्च प्रकृतीनां च वर्धनम् ॥ २ ॥
षाड्गुण्यगुणकल्पश्च सेनावृत्तिस्तथैव च ।
परिज्ञानं च दुष्टस्य लक्षणं च सतामपि ॥ ३ ॥
समहीनाधिकानां च यथावल्लक्षणं च यत् ।
मध्यमस्य च तुष्ट्यर्थं यथा स्थेयं विवर्धता ॥ ४ ॥
क्षीणग्रहणवृत्तिश्च यथाधर्मं प्रकीर्तितम् ।
लघुना देशरूपेण ग्रन्थयोगेन भारत ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने कहा - परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं । राजाओंके धन, कोश, कोश- संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि - विग्रह आदि छः गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं - उन सब लोगोंके यथावत् लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये – इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता— इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है ॥ १–५ ॥
विजिगीषोस्तथा वृत्तमुक्तं चैव तथैव ते ।
गणानां वृत्तिमिच्छामि श्रोतुं मतिमतां वर ॥ ६ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! आपने विजया- भिलाषी राजाके बर्तावका भी वर्णन कर दिया है । अब मैं गणों ( गणतन्त्र राज्यों )) -- का बर्ताव एवं वृतान्त सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
यथा गणाः प्रवर्धन्ते न भिद्यन्ते च भारत ।
अरींश्च विजिगीषन्ते सुहृदः प्राप्नुवन्ति च ॥ ७ ॥
भारत! गणतन्त्र-- राज्योंकी जनता जिस प्रकार अपनी उन्नति करती है, जिस प्रकार आपसमें मतभेद या फूट नहीं होने देती, जिस तरह शत्रुओंपर विजय पाना चाहती है और
पृष्ठ 716
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जिस उपायसे उसे सुहृदोंकी प्राप्ति होती है- ये सारी बातें सुननेके लिये मेरी बड़ी इच्छा है ॥ ७ ॥
भेदमूलो विनाशो हि गणानामुपलक्षये ।
मन्त्रसंवरणं दुःखं बहूनामिति मे मतिः ॥ ८ ॥
मैं देखता हूँ, संघबद्ध राज्योंके विनाशका मूल कारण है आपसकी फूट । मेरा विश्वास है कि बहुत - से मनुष्योंके जो समुदाय हैं, उनके लिये किसी गुप्त मन्त्रणा या विचारको छिपाये रखना बहुत ही कठिन है ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं निखिलेन परंतप ।
यथा च ते न भिद्येरंस्तच्च मे वद पार्थिव ॥ ९ ॥
‘ परंतप राजन्! इन सारी बातोंको मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहता हूँ । किस प्रकार वे संघ या गण आपसमें फूटते नहीं हैं, यह मुझे बताइये ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
गणानां च कुलानां च राज्ञां भरतसत्तम ।
वैरसंदीपनावेतौ लोभामर्षो नराधिप ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा - भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! गणोंमें, कुलोंमें तथा राजाओंमें वैरकी आग प्रज्वलित करनेवाले ये दो ही दोष हैं — लोभ और अमर्ष ॥ १० ॥
लोभमेको हि वृणुते ततोऽमर्षमनन्तरम् ।
तौ क्षयव्ययसंयुक्तावन्योन्यं च विनाशिनौ ॥ ११ ॥
पहले एक मनुष्य लोभका वरण करता है ( लोभवश दूसरेका धन लेना चाहता है ), तदनन्तर दूसरेके मनमें अर्मष पैदा होता है; फिर वे दोनों लोभ और अमर्षसे प्रभावित हुए व्यक्ति समुदाय, धन और जनकी बड़ी भारी हानि उठाकर एक- दूसरेके विनाशक बन जाते हैं ॥ ११ ॥
चारमन्त्रबलादानैः सामदानविभेदनैः ।
क्षयव्ययभयोपायैः प्रकर्षन्तीतरेतरम् ॥ १२ ॥
वे भेद लेनेके लिये गुप्तचरोंको भेजते हैं, गुप्त मन्त्रणाएँ करते तथा सेना एकत्र करनेमें लग जाते हैं । साम, दान और भेदनीतिके प्रयोग करते हैं, तथा जन - संहार, अपार धनराशिके व्यय एवं अनेक प्रकारके भय उपस्थित करनेवाले विविध उपायोंद्वारा एक - दूसरेको दुर्बल कर देते हैं ॥ १२ ॥
तत्रादानेन भिद्यन्ते गणाः संघातवृत्तयः ।
भिन्ना विमनसः सर्वे गच्छन्त्यरिवशं भयात् ॥ १३ ॥
संघबद्ध होकर जीवन निर्वाह करनेवाले गणराज्यके सैनिकोंको भी यदि समयपर भोजन और वेतन न मिले तो भी वे फूट जाते हैं । फूट जानेपर सबके मन एक- दूसरेके
पृष्ठ 717
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विपरीत हो जाते हैं और वे सबके सब भयके कारण शत्रुओंके अधीन हो जाते हैं ॥ १३ ॥
भेदे गणा विनेशुर्हि भिन्नास्तु सुजयाः परैः ।
तस्मात् संघातयोगेन प्रयतेरन् गणाः सदा ॥ १४ ॥
आपसमें फूट होनेसे ही संघ या गणराज्य नष्ट हुए हैं । फूट होनेपर शत्रु उन्हें अनायास ही जीत लेते हैं; अतः गणोंको चाहिये कि वे सदा संघबद्ध - एकमत होकर ही विजयके लिये प्रयत्न करें ॥ १४ ॥
अर्थाश्चैवाधिगम्यन्ते संघातबलपौरुषैः ।
बाह्याश्च मैत्रीं कुर्वन्ति तेषु संघातवृत्तिषु ॥ १५ ॥
जो सामूहिक बल और पुरुषार्थसे सम्पन्न हैं, उन्हें अनायास ही सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थोंकी प्राप्ति हो जाती है । संघबद्ध होकर जीवन निर्वाह करनेवाले लोगोंके साथ संघसे बाहरके लोग भी मैत्री स्थापित करते हैं ॥
ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति शुश्रूषन्तः परस्परम् ।
विनिवृत्ताभि संधानाः सुखमेधन्ति सर्वशः ॥ १६ ॥
ज्ञानवृद्ध पुरुष गणराज्यके नागरिकोंकी प्रशंसा करते हैं । संघबद्ध लोगोंके मनमें आपसमें एक -दूसरेको ठगनेकी दुर्भावना नहीं होती । वे सभी एक- दूसरेकी सेवा करते हुए सुखपूर्वक उन्नति करते हैं ॥ १६ ॥
धर्मिष्ठान् व्यवहारांश्च स्थापयन्तश्च शास्त्रतः ।
यथावत् प्रतिपश्यन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १७ ॥
गणराज्यके श्रेष्ठ नागरिक शास्त्रके अनुसार धर्मानुकूल व्यवहारोंकी स्थापना करते हैं । वे यथोचित दृष्टिसे सबको देखते हुए उन्नतिकी दिशामें आगे बढ़ते जाते हैं ॥ १७ ॥
पुत्रान् भ्रातॄन् निगृह्णन्तो विनयन्तश्च तान् सदा ।
विनीतांश्च प्रगृह्णन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १८ ॥
गणराज्यके श्रेष्ठ पुरुष पुत्रों और भाइयोंको भी यदि वे कुमार्गपर चलें तो दण्ड देते हैं । सदा उन्हें उत्तम शिक्षा प्रदान करते हैं और शिक्षित हो जानेपर उन सबको बड़े आदरसे अपनाते हैं । इसलिये वे विशेष उन्नति करते हैं ॥ १८ ॥
चारमन्त्रविधानेषु कोशसंनिचयेषु च ।
नित्ययुक्ता महाबाहो वर्धन्ते सर्वतो गणाः ॥ १ ९ ॥
महाबाहु युधिष्ठिर! गणराज्यके नागरिक गुप्तचर या दूतका काम करने, राज्यके हितके लिये गुप्त मन्त्रणा करने, विधान बनाने तथा राज्यके लिये कोश- संग्रह करने आदिके लिये सदा उद्यत रहते हैं, इसीलिये सब ओरसे उनकी उन्नति होती है ॥ १ ९ ॥
प्राज्ञान् शूरान् महोत्साहान् कर्मसु स्थिरपौरुषान् ।
मानयन्तः सदा युक्ता विवर्धन्ते गणा नृप ॥ २० ॥
पृष्ठ 718
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नरेश्वर! संघराज्यके सदस्य सदा बुद्धिमान्, शूरवीर, महान् उत्साही और सभी कार्योंमें दृढ़ पुरुषार्थका परिचय देनेवाले लोगोंका सदा सम्मान करते हुए राज्यकी उन्नतिके लिये
उद्योगशील बने रहते हैं । इसीलिये वे शीघ्र आगे बढ़ जाते हैं ॥ २० ॥
द्रव्यवन्तश्च शूराश्च शस्त्रज्ञाः शास्त्रपारगाः ।
कृच्छ्रास्वापत्सु सम्मूढान् गणाः संतारयन्ति ते ॥ २१ ॥
गणराज्यके सभी नागरिक धनवान्, शूरवीर, अस्त्र- शस्त्रोंके ज्ञाता तथा शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् होते हैं । वे कठिन विपत्तिमें पड़कर मोहित हुए लोगोंका उद्धार करते रहते हैं ॥ २१ ॥
क्रोधो भेदो भयं दण्डः कर्षणं निग्रहो वधः ।
नयत्यरिवशं सद्यो गणान् भरतसत्तम ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! संघराज्यके लोगोंमें यदि क्रोध, भेद ( फूट ), भय, दण्डप्रहार, दूसरोंको दुर्बल बनाने, बन्धनमें डालने या मार डालनेकी प्रवृत्ति पैदा हो जाय तो वह उन्हें तत्काल शत्रुओंके वशमें डाल देती है ॥ २२ ॥
तस्मान्मानयितव्यास्ते गणमुख्याः प्रधानतः ।
लोकयात्रा समायत्ता भूयसी तेषु पार्थिव ॥ २३ ॥
राजन्! इसलिये तुम्हें गणराज्यके जो प्रधान-प्रधान अधिकारी हैं, उन सबका सम्मान करना चाहिये; क्योंकि लोकयात्राका महान् भार उनके ऊपर अवलम्बित है ॥
मन्त्रगुप्तिः प्रधानेषु चारश्चामित्रकर्षण ।
न गणाः कृत्स्नशो मन्त्रं श्रोतुमर्हन्ति भारत ॥ २४ ॥
शत्रुसूदन! भारत! गण या संघके सभी लोग गुप्त मन्त्रणा सुननेके अधिकारी नहीं हैं । मन्त्रणाको गुप्त रखने तथा गुप्तचरोंकी नियुक्तिका कार्य प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंके ही अधीन होता है ॥ २४ ॥
गणमुख्यैस्तु सम्भूय कार्यं गणहितं मिथः ।
पृथग्गणस्य भिन्नस्य विततस्य ततोऽन्यथा ॥ २५ ॥
अर्थाः प्रत्यवसीदन्ति तथानर्था भवन्ति च । गणके मुख्य- मुख्य व्यक्तियोंको परस्पर मिलकर समस्त गणराज्यके हितका साधन करना चाहिये; अन्यथा यदि संघमें फूट होकर पृथक्- पृथक् कई दलोंका विस्तार हो जाय तो उसके सभी कार्य बिगड़ जाते और बहुत- से अनर्थ पैदा हो जाते हैं ॥ २५३ ॥
तेषामन्योन्यभिन्नानां स्वशक्तिमनुतिष्ठताम् ॥ २६ ॥
निग्रहः पण्डितैः कार्यः क्षिप्रमेव प्रधानतः । परस्पर फूटकर पृथक् - पृथक् अपनी शक्तिका प्रयोग करनेवाले लोगोंमें जो मुख्य- मुख्य नेता हों, उनका संघराज्यके विद्वान् अधिकारियोंको शीघ्र ही दमन करना चाहिये ॥ २६३ ||
पृष्ठ 719
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुलेषु कलहा जाताः कुलवृद्धैरुपेक्षिताः ॥ २७ ॥
गोत्रस्य नाशं कुर्वन्ति गणभेदस्य कारकम् । कुलोंमें जो कलह होते हैं, उनकी यदि कुलके वृद्ध पुरुषोंने उपेक्षा कर दी तो वे कलह गणोंमें फूट डालकर समस्त कुलका नाश कर डालते हैं ॥ २७३ ॥
आभ्यन्तरं भयं रक्ष्यमसारं बाह्यतो भयम् ॥ २८ ॥
आभ्यन्तरं भयं राजन् सद्यो मूलानि कृन्तति । भीतरी भय दूर करके संघकी रक्षा करनी चाहिये । यदि संघ में एकता बनी रहे तो बाहरका भय उसके लिये निःसार है ( वह उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता ) । राजन्! भीतरका भय तत्काल ही संघराज्यकी जड़ काट डालता है ॥ २८३ ॥
अकस्मात् क्रोधमोहाभ्यां लोभाद् वापि स्वभावजात् ॥ २ ९ ॥ अन्योन्यं नाभिभाषन्ते तत्पराभवलक्षणम् । अकस्मात् पैदा हुए क्रोध और मोहसे अथवा स्वाभाविक लोभसे भी जब संघके लोग आपसमें बातचीत करना बंद कर दें, तब यह उनकी पराजयका लक्षण है ॥ २ ९ ३ ॥ जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा ॥ ३० ॥
न चोद्योगेन बुद्धया वा रूपद्रव्येण वा पुनः ।
भेदाच्चैव प्रदानाच्च भिद्यन्ते रिपुभिर्गणाः ॥ ३१ ॥
तस्मात् संघातमेवाहुर्गणानां शरणं महत् ॥ ३२ ॥
जाति और कुलमें सभी एक समान हो सकते हैं; परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप-सम्पत्तिमें सबका एक- सा होना सम्भव नहीं है । शत्रुलोग गणराज्यके लोगोंमें भेदबुद्धि पैदा करके तथा उनमेंसे कुछ लोगोंको धन देकर भी समूचे संघमें फूट डाल देते हैं; अतः संघबद्ध रहना ही गणराज्यके नागरिकोंका महान् आश्रय है ॥ ३०-३२ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि गणवृत्ते सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें गणराज्यका बर्तावविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हआ ॥ १०७ ॥
पृष्ठ 720
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः माता - पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व युधिष्ठिर उवाच
महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत ।
किंस्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेय तमं मतम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- भारत! धर्मका यह मार्ग बहुत बड़ा है तथा इसकी बहुत - सी शाखाएँ हैं इन धर्मोंमेंसे किसको आप विशेषरूपसे आचरणमें लानेयोग्य समझते हैं? ॥ १ ॥
किं कार्यं सर्वधर्माणां गरीयो भवतो मतम् ।
यथाहं परमं धर्ममिह च प्रेत्य चाप्नुयाम् ॥ २ ॥
सब धर्मोंमें कौन- सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोकमें भी परम धर्मका फल प्राप्त कर सकूँ? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा बहुमता मम ।
इह युक्तो नरो लोकान् यशश्च महदश्नुते ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! मुझे तो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी पूजा ही अधिक महत्त्वकी वस्तु जान पड़ती है । इसलोकमें इस पुण्य कार्यमें संलग्न होकर मनुष्य महान् यश और श्रेष्ठ लोक पाता है ॥ ३ ॥
यच्च तेऽभ्यनुजानीयुः कर्म तात सुपूजिताः ।
धर्माधर्मविरुद्धं वा तत् कर्तव्यं युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
तात युधिष्ठिर! भलीभाँति पूजित हुए वे माता--पिता और गुरुजन जिस कामके लिये आज्ञा दें, वह धर्मके अनुकूल हो या विरुद्ध, उसका पालन करना ही चाहिये ॥ ४ ॥
न च तैरभ्यनुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ।
यं च तेऽभ्यनुजानीयुः स धर्म इति निश्चयः ॥ ५ ॥
जो उनकी आज्ञाके पालनमें संलग्न है, उसके लिये दूसरे किसी धर्मके आचरणकी आवश्यकता नहीं है । जिस कार्यके लिये वे आज्ञा दें, वही धर्म है ऐसा धर्मात्माओंका निश्चय है ॥ ५ ॥
एत एव त्रयो लोका एत एवाश्रमास्त्रयः ।
एत एव त्रयो वेदा एत एव त्रयोऽग्नयः ॥ ६ ॥