श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 751–760

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य युधिष्ठिरउवाच

किं पार्थिवेन कर्तव्यं किं च कृत्वा सुखी भवेत् ।

एतदाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वधर्मभृतां वर ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा – समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! राजाको क्या करना चाहिये? क्या करनेसे वह सुखी हो सकता है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि शृणु कार्यैकनिश्चयम् ।

यथा राज्ञेह कर्तव्यं यच्च कृत्वा सुखी भवेत् ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा — नरेश्वर! राजाका जो कर्तव्य है और जो कुछ करके वह सुखी हो सकता है, उस कार्यका निश्चय करके अब मैं तुम्हें बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २ ॥

न चैवं वर्तितव्यं स्म यथेदमनुशुश्रुम ।

उष्ट्रस्य तु महद् वृत्तं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर! हमने एक ऊँटका जो महान् वृत्तान्त सुन रखा है, उसे तुम सुनो । राजाको वैसा बर्ताव नहीं करना चाहिये ॥ ३ ॥

जातिस्मरो महानुष्टुः प्राजापत्ये युगेऽभवत् ।

तपः सुमहादातिष्ठदरण्ये संशितव्रतः ॥ ४ ।

प्राजापत्ययुग ( सत्ययुग ) में एक महान् ऊँट था । उसको पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था । उसने कठोर व्रतके पालनका नियम लेकर वनमें बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ४ ॥

तपसस्तस्य चान्तेऽथ प्रीतिमानभवद् विभुः ।

वरेण च्छन्दयामास ततश्चैनं पितामहः ॥ ५ ॥

उस तपस्याके अन्तमें पितामह भगवान् ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने उससे वर माँगनेके लिये कहा ॥ ५ ॥

उष्ट्र उवाच

भगवंस्त्वत्प्रसादान्मे दीर्घा ग्रीवा भवेदियम् ।

योजनानां शतं साग्रं गच्छामि चरितुं विभो ॥ ६ ॥

पृष्ठ 752

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ऊँट बोला — भगवन्! आपकी कृपासे मेरी यह गर्दन बहुत बड़ी हो जाय, जिससे जब मैं चरनेके लिये जाऊँ तो सौ योजनसे अधिक दूरतककी खाद्य वस्तुएँ ग्रहण कर सकूँ ॥ ६ ॥

एवमस्त्विति चोक्तः स वरदेन महात्मना ।

प्रतिलभ्य वरं श्रेष्ठं ययावुष्ट्रः स्वकं वनम् ॥ ७ ॥

वरदायक महात्मा ब्रह्माजीने ' एवमस्तु ' कहकर उसे मुँहमाँगा वर दे दिया । वह उत्तम वर पाकर ऊँट अपने वनमें चला गया ॥ ७ ॥

स चकार तदाऽऽलस्यं वरदानात् सुदुर्मतिः ।

न चैच्छच्चरितुं गन्तुं दुरात्मा कालमोहितः ॥ ८ ॥

उस खोटी बुद्धिवाले ऊँटने वरदान पाकर कहीं आने -जानेमें आलस्य कर लिया । वह दुरात्मा कालसे मोहित होकर चरनेके लिये कहीं जाना ही नहीं चाहता था ॥ ८ ॥

स कदाचित् प्रसार्यैव तां ग्रीवां शतयोजनाम् ।

चचार श्रान्तहृदयो वातश्चागात् ततो महान् ॥ ९ ॥

एक समयकी बात है, वह अपनी सौ योजन लंबी गर्दन फैलाकर चर रहा था, उसका

मन चरनेसे कभी थकता ही नहीं था । इतनेमें ही बड़े जोरसे हवा चलने लगी ॥ ९ ॥

स गुहायां शिरो ग्रीवां निधाय पशुरात्मनः ।

आस्ते तु वर्षमभ्यागात् सुमहत् प्लावयज्जगत् ॥ १० ॥

वह पशु किसी गुफामें अपनी गर्दन डालकर चर रहा था, इसी समय सारे जगत्के जलसे आप्लावित करती हुई बड़ी भारी वर्षा होने लगी ॥ १० ॥

अथ शीतपरीताङ्गो जम्बुकः क्षुच्छ्रमान्वितः ।

सदारस्तां गुहामाशु प्रविवेश जलार्दितः ॥ ११ ॥

वर्षा आरम्भ होनेपर भूख और थकावटसे कष्ट पाता हुआ एक गीदड़ अपनी स्त्रीके साथ शीघ्र ही उस गुहामें आ घुसा । वह जलसे पीड़ित था, सर्दीसे उसके सारे अंग अकड़ गये थे ॥ ११ ॥

स दृष्ट्वा मांसजीवी तु सुभृशं क्षुच्छ्रमान्वितः ।

अभक्षयत् ततो ग्रीवामुष्ट्रस्य भरतर्षभ ॥ १२ ॥

भरतश्रेष्ठ! वह मांसजीवी गीदड़ अत्यन्त भूखके कारण कष्ट पा रहा था, अतः उसने ऊँटकी गर्दनका मांस काट - काटकर खाना आरम्भ कर दिया ॥ १२ ॥

यदा त्वबुध्यतात्मानं भक्ष्यमाणं स वै पशुः ।

तदा संकोचने यत्नमकरोद् भृशदुःखितः ॥ १३ ॥

जब उस पशुको यह मालूम हुआ कि उसकी गर्दन खायी जा रही है, तब वह अत्यन्त दुखी हो उसे समेटने का प्रयत्न करने लगा ॥ १३ ॥

यावदूर्ध्वमधश्चैव ग्रीवां संक्षिपते पशुः ।

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तावत् तेन सदारेण जम्बुकेन स भक्षितः ॥ १४ ॥

वह पशु जबतक अपनी गर्दनको ऊपर- नीचे समेटनेका यत्न करता रहा, तबतक ही स्त्रीसहित सियारने उसे काटकर खा लिया ॥ १४ ॥

स हत्वा भक्षयित्वा च तमुष्ट्रं जम्बुकस्तदा ।

विगते वातवर्षे तु निश्चक्राम गुहामुखात् ॥ १५ ॥

इस प्रकार ऊँटको मारकर खा जानेके पश्चात् जब आँधी और वर्षा बंद हो गयी, तब वह गीदड़ गुफाके मुहानेसे निकल गया ॥ १५ ॥

एवं दुर्बुद्धिना प्राप्तमुष्ट्रेण निधनं तदा ।

आलस्यस्य क्रमात् पश्य महान्तं दोषमागतम् ॥ १६ ॥

इस तरह उस मूर्ख ऊँटकी मृत्यु हो गयी । देखो, उसके आलस्यके क्रमसे कितना महान् दोष प्राप्त हो गया ॥

त्वमप्येवंविधं हित्वा योगेन नियतेन्द्रियः ।

वर्तस्व बुद्धिमूलं तु विजयं मनुरब्रवीत् ॥ १७ ॥

इसलिये तुम्हें भी ऐसे आलस्यको त्याग करके इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए बुद्धिपूर्वक बर्ताव करना उचित है । मनुजीका कथन है कि ' विजयका मूल बुद्धि ही है ' ॥ १७ ॥

बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि बाहुमध्यानि भारत ।

तानि जङ्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ॥ १८ ॥

भारत! बुद्धिबलसे किये गये कार्य श्रेष्ठ हैं । बाहुबलसे किये जानेवाले कार्य मध्यम हैं । जाँघ अर्थात् पैरके बलसे किये गये कार्य जघन्य ( अधम कोटिके ) हैं तथा मस्तकसे भार ढोनेका कार्य सबसे निम्न श्रेणीका है ॥ १८ ॥

राज्यं तिष्ठति दक्षस्य संगृहीतेन्द्रियस्य च ।

आर्तस्य बुद्धिमूलं हि विजयं मनुरब्रवीत् ॥ १ ९ ॥

जो जितेन्द्रिय और कार्यदक्ष है, उसीका राज्य स्थिर रहता है । मनुजीका कथन है कि संकटमें पड़े हुए राजाकी विजयका मूल बुद्धि- बल ही है ॥ १ ९ ॥ गुह्यं मन्त्रं श्रुतवतः सुसहायस्य चानघ ।

परीक्ष्यकारिणो ह्यर्थास्तिष्ठन्तीह युधिष्ठिर ।

सहाययुक्तेन मही कृत्स्ना शक्या प्रशासितुम् ॥ २० ॥

निष्पाप युधिष्ठिर! जो गुप्त मन्त्रणा सुनता है, जिसके सहायक अच्छे हैं तथा जो

भलीभाँति जान-बूझकर कोई कार्य करता है, उसके पास ही धन स्थिर रहता है ।

सहायकोंसे सम्पन्न नरेश ही समूची पृथ्वीका शासन कर सकता है ॥ २० ॥

इदं हि सद्भिः कथितं विधिज्ञैः पुरा महेन्द्रप्रतिमप्रभाव । मयापि चोक्तं तव शास्त्रदृष्ट्या

पृष्ठ 754

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यथैव बुद्ध्वा प्रचरस्व राजन् ॥ २१ ॥

महेन्द्रके समान प्रभावशाली नरेश! पूर्वकालमें राज्य संचालनकी विधिको जाननेवाले सत्पुरुषोंने यह बात कही थी । मैंने भी शास्त्रीय दृष्टिके अनुसार तुम्हें यह बात बतायी है । राजन्! इसे अच्छी तरह समझकर इसीके अनुसार चलो ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उष्ट्रग्रीवोपाख्याने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऊँटकी गर्दनकी कथाविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥

Face

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त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः शक्तिशाली शत्रुके सामने बेंतकी भाँति नतमस्तक होनेका उपदेश - सरिताओं और समुद्रका संवाद युधिष्ठिर उवाच

राजा राज्यमनुप्राप्य दुर्लभं भरतर्षभ ।

अमित्रस्यातिवृद्धस्य कथं तिष्ठेदसाधनः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भरतश्रेष्ठ! राजा एक दुर्लभ राज्यको पाकर भी सेना और खजाना आदि साधनोंसे रहित हो तो सभी दृष्टियोंसे अत्यन्त बढ़े - चढ़े हुए शत्रुके सामने कैसे टिक सकता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

सरितां चैव संवादं सागरस्य च भारत ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- भारत! इस विषयमें विज्ञ पुरुष सरिताओं तथा समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन उपाख्यानका दृष्टान्त दिया करते हैं ॥ २ ॥

सुरारिनिलयः शश्वत्सागरः सरिताम्पतिः ।

पप्रच्छ सरितः सर्वाः संशयं जातमात्मनः ॥ ३ ॥

एक समयकी बात है, दैत्योंके निवासस्थान और सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण नदियोंसे अपने मनका एक संदेह पूछा ॥ ३ ॥

सागर उवाच

समूलशाखान् पश्यामि निहतान् कायिनो द्रुमान् ।

युष्माभिरिह पूर्णाभिर्नद्यस्तत्र न वेतसम् ॥ ४ ॥

समुद्रने कहा— नदियो! मैं देखता हूँ कि जब बाढ़ आनेके कारण तुमलोग लबालब भर जाती हो, तब विशालकाय वृक्षोंको जड़-मूल और शाखाओंसहित उखाड़कर अपने प्रवाहमें बहा लाती हो; परंतु उनमें बेंतका कोई पेड़ नहीं दिखायी देता ॥ ४ ॥

अकायश्चाल्पसारश्च वेतसः कूलजश्च वः ।

अवज्ञया वा नानीतः किं च वा तेन वः कृतम् ॥ ५ ॥

बेंतका शरीर तो नहींके बराबर बहुत पतला है । उसमें कुछ दम नहीं होता है और वह तुम्हारे खास किनारेपर जमता है; फिर भी तुम उसे न ला सकी, क्या कारण है? क्या तुम अवहेलनावश उसे कभी नहीं लायीं अथवा उसने तुम्हारा कोई उपकार किया है? ॥ ५ ॥

तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वासामेव वो मतम् ।

पृष्ठ 756

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यथा चेमानि कूलानि हित्वा नायाति वेतसः ॥ ६ ॥

इस विषयमें तुम सब लोगोंका विचार मैं सुनना चाहता हूँ, क्या कारण है कि बेंतका वृक्ष तुम्हारे इन तटोंको छोड़कर नहीं आता है? ॥ ६ ॥

तत्र प्राह नदी गंगा वाक्यमुत्तममर्थवत् ।

हेतुमद् ग्राहकं चैव सागरं सरिताम्पतिम् ॥ ७ ॥

इस प्रकार प्रश्न होनेपर गंगानदीने सरिताओंके स्वामी समुद्रसे यह उत्तम अर्थपूर्ण, युक्तियुक्त तथा मनको ग्रहण करनेवाली बात कही ॥ ७ ॥

गङ्गोवाच

तिष्ठन्त्येते यथास्थानं नगा ह्येकनिकेतनाः ।

ते त्यजन्ति ततः स्थानं प्रातिलोम्यान्न वेतसः ॥ ८ ॥

गंगा बोली- नदीश्वर! ये वृक्ष अपने - अपने स्थानपर अकड़कर खड़े रहते हैं, हमारे प्रवाहके सामने मस्तक नहीं झुकाते । इस प्रतिकूल बर्तावके कारण ही उन्हें नष्ट होकर अपना स्थान छोड़ना पड़ता है; परंतु बेंत ऐसा नहीं है ॥ ८ ॥

वेतसो वेगमायातं दृष्ट्वा नमति नापरे ।

सरिद्वेगेऽव्यतिक्रान्ते स्थानमासाद्य तिष्ठति ॥ ९ ॥

बेंत नदीके वेगको आते देख झुक जाता है, पर दूसरे वृक्ष ऐसा नहीं करते; अतः वह सरिताओंका वेग शान्त होनेपर पुनः अपने स्थानमें ही स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥

कालज्ञः समयज्ञश्च सदा वश्यश्च नोद्धतः ।

अनुलोमस्तथास्तब्धस्तेन नाभ्येति वेतसः ॥ १० ॥

बेंत समयको पहचानता है, उसके अनुसार बर्ताव करना जानता है, सदा हमारे वशमें रहता है, कभी उद्दण्डता नहीं दिखाता और अनुकूल बना रहता है । उसमें कभी अकड़ नहीं आती; इसीलिये उसे स्थान छोड़कर यहाँ नहीं आना पड़ता है ॥ १० ॥

मारुतोदकवेगेन ये नमन्त्युन्नमन्ति च ।

ओषध्यः पादपा गुल्मा न ते यान्ति पराभवम् ॥ ११ ॥

जो पौधे, वृक्ष या लता- गुल्म हवा और पानीके वेगसे झुक जाते तथा वेग शान्त होनेपर सिर उठाते हैं, उनका कभी पराभव नहीं होता ॥ ११ ॥

भीष्म उवाच

यो हि शत्रोर्विवृद्धस्य प्रभोर्बन्धविनाशने ।

पूर्वं न सहते वेगं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १२ ॥

पृष्ठ 757

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समुद्र देवताका मूर्तिमती नदियोंके साथ संवाद

पृष्ठ 758

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भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इसी प्रकार जो राजा बलमें बढ़े - चढ़े तथा बन्धनमें डालने और विनाश करनेमें समर्थ शत्रुके प्रथम वेगको सिर झुकाकर नहीं सह लेता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ १२ ॥

सारासारं बलं वीर्यमात्मनो द्विषतश्च यः ।

जानन् विचरति प्राज्ञो न स याति पराभवम् ॥ १३ ॥

जो बुद्धिमान् राजा अपने तथा शत्रुके सार-असार, बल तथा पराक्रमको जानकर उसके अनुसार बर्ताव करता है, उसकी कभी पराजय नहीं होती है ॥ १३ ॥

एवमेव यदा विद्वान् मन्यतेऽतिबलं रिपुम् ।

संश्रयेद् वैतसीं वृत्तिमेतत् प्रज्ञानलक्षणम् ॥ १४ ॥

इस प्रकार विद्वान् राजा जब शत्रुके बलको अपनेसे अधिक समझे, तब बेंतका ही ढंग

अपना ले; अर्थात् उसके सामने नतमस्तक हो जाय । यही बुद्धिमानीका लक्षण है ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सरित्सागरसंवादे त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सरिताओं और समुद्रका संवादविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हआ ॥ ११३ ॥

पृष्ठ 759

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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ युधिष्ठिर उवाच

विद्वान् मूर्खप्रगल्भेन मृदुतीक्ष्णेन भारत ।

आक्रुश्यमानः सदसि कथं कुर्यादरिंदम ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— शत्रुदमन भारत! यदि कोई ढीठ मूर्ख मधुर या तीखे शब्दोंमें भरी सभाके बीच किसी विद्वान् पुरुषकी निन्दा करने लगे, तो वह उसके साथ कैसा बर्ताव करे? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

श्रूयतां पृथिवीपाल यथैषोऽर्थोऽनुगीयते ।

सदा सुचेताः सहते नरस्येहाल्पमेधसः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा — भूपाल! सुनो, इस विषयमें सदासे जैसी बात कही जाती है, उसे बता रहा हूँ । विशुद्ध चित्तवाला पुरुष इस जगत् में सदा ही मूर्ख मनुष्यके कठोर वचनोंको सहन करता है ॥ २ ॥

अरुष्यन् क्रुश्यमानस्य सुकृतं नाम विन्दति ।

दुष्कृतं चात्मनो मर्षी रुष्यत्येवापमार्ष्टि वै ॥ ३ ॥

जो निन्दा करनेवाले पुरुषके ऊपर क्रोध नहीं करता, वह उसके पुण्यको प्राप्त कर लेता है । वह सहनशील मनुष्य अपना सारा पाप उस क्रोधी पुरुषपर ही धो डालता है ॥ ३ ॥

टिट्टिभं तमुपेक्षेत वाशमानमिवातुरम् ।

लोकविद्वेषमापन्नो निष्फलं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥

अच्छे पुरुषको चाहिये कि वह टिटिहरी या रोगीकी तरह टाँय -टाँय करते हुए उस निन्दाकारी पुरुषकी उपेक्षा कर दे । इससे वह सब लोगोंके द्वेषका पात्र बन जायगा और उसके सारे सत्कर्म निष्फल हो जायँगे ॥ ४ ॥

इति संश्लाघते नित्यं तेन पापेन कर्मणा ।

इदमुक्तो मया कश्चित् सम्मतो जनसंसदि ॥ ५ ॥

स तत्र व्रीडितः शुष्को मृतकल्पोऽवतिष्ठते ।

श्लाघन्नश्लाघनीयेन कर्मणा निरपत्रपः ॥ ६ ॥

वह मूर्ख तो उस पापकर्मके द्वारा सदा अपनी प्रशंसा करते हुए कहता है कि मैंने अमुक सम्मानित पुरुषको भरी सभामें ऐसी- ऐसी बातें सुनायीं कि वह लाजसे गड़ गया,

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उसका मुख सूख गया और वह अधमरा -सा हो गया, इस प्रकार निन्दनीय कर्म करके वह अपनी प्रशंसा करता है और तनिक भी लजाता नहीं है ॥

उपेक्षितव्यो यत्नेन तादृशः पुरुषाधमः ।

यद् यद् ब्रूयादल्पमतिस्तत्तदस्य सहेद्बुधः ॥ ७ ॥

ऐसे नराधमकी यत्नपूर्वक उपेक्षा कर देनी चाहिये । मूर्ख मनुष्य जो कुछ भी कह दे, विद्वान् पुरुषको वह सब सह लेना चाहिये ॥ ७ ॥

प्राकृतो हि प्रशंसन् वा निन्दन् वा किं करिष्यति ।

वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम् ॥ ८ ॥

जैसे वनमें कौआ व्यर्थ ही काँव- काँव किया करता है, उसी तरह मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है । वह प्रशंसा करे या निन्दा, किसीका क्या भला या बुरा करेगा? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकेगा ॥ ८ ॥

यदि वाग्भिः प्रयोगः स्यात् प्रयोगे पापकर्मणः ।

वागेवार्थो भवेत् तस्य न ह्येवार्थो जिघांसतः ॥ ९ ॥

यदि पापाचारी पुरुषके कटुवचन बोलनेपर बदलेमें वैसे ही वचनोंका प्रयोग किया जाय तो उससे केवल वाणीद्वारा कलहमात्र होगा । जो हिंसा करना चाहता है, उसका गाली देनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा ॥ ९ ॥

निषेकं विपरीतं स आचष्टे वृत्तचेष्टया ।

मयूर इव कौपीनं नृत्यं संदर्शयन्निव ॥ १० ॥

मयूर जब नाच दिखाता है, उस समय वह अपने गुप्त अंगोंको भी उघाड़ देता है । इसी प्रकार जो मूर्ख अनुचित आचरण करता है वह उस कुचेष्टाद्वारा अपने छिपे हुए दोषोंको प्रकट करता है ॥ १० ॥

यस्यावाच्यं न लोकेऽस्ति नाकार्यं चापि किंचन ।

वाचं तेन न संदध्याच्छुचिः संश्लिष्टकर्मणा ॥ ११ ॥

संसारमें जिसके लिये कुछ भी कह देना या कर डालना असम्भव नहीं है, ऐसे मनुष्यसे उस भले मनुष्यको बात भी नहीं करनी चाहिये जो अपने सत्कर्मके द्वारा विशुद्ध समझा जाता है ॥ ११ ॥

प्रत्यक्षं गुणवादी यः परोक्षे चापि निन्दकः ।

स मानवः श्ववल्लोके नष्टलोकपरावरः ॥ १२ ॥

जो सामने आकर गुण गाता है और परोक्षमें निन्दा करता है, वह मनुष्य संसारमें कुत्तेके सामन है । उसके लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं ॥ १२ ॥

तादृग्जनशतस्यापि यद् ददाति जुहोति च ।

परोक्षेणापवादी यस्तं नाशयति तत्क्षणात् ॥ १३ ॥